देशदुनिया में श्रीअन्न को बढ़ावा देगा ये शोध केंद्र

नई दिल्ली: 29 नवंबर 2023. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विशेष पहल पर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के भारतीय श्रीअन्न अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद में स्थापित किया जा रहा ‘‘श्रीअन्न वैश्विक उत्कृष्ट शोध केंद्र’’ सर्वसुविधायुक्त रहेगा, जिस के जरीए देशदुनिया में श्रीअन्न को बढ़ावा मिलेगा.

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के मार्गदर्शन में इस केंद्र के लिए कार्यवाही चल रही है. उन्होंने संबंधित अधिकारियों से कहा कि हमारे किसानों को इस केंद्र का अधिकाधिक लाभ मिलना सुनिश्चित किया जाना चाहिए, खासकर छोटे व सीमांत किसानों को लाभ पहुंचाने के मकसद से श्रीअन्न को बढ़ावा देने के लिए भारत की पहल पर अंतर्राष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष 2023 मनाया जा रहा है.

18 मार्च, 2023 को पूसा परिसर, नई दिल्ली में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय श्रीअन्न सम्मेलन में ‘‘श्रीअन्न वैश्विक उत्कृष्ट शोध केंद्र” की उद्घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई थी, जिस का मुख्य उद्देश्य श्रीअन्न अनुसंधान एवं विकास के लिए अत्याधुनिक सुविधाओं व उपकरणों से सुसज्जित बुनियादी ढांचे की स्थापना करना है, जिस में मूल्य श्रृंखला, मानव संसाधन विकास, श्रीअन्न के पौष्टिक गुणों के बारे में आम लोगों में जागरूकता फैलाना एवं वैश्विक स्तर पर पहुंच एवं पहचान बनाना है, ताकि किसानों को ज्यादा से ज्यादा लाभ मिल सके.

इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए इस केंद्र में जीन बैंक, प्रौद्योगिकी नवाचार केंद्र, श्रीअन्न मूल्य श्रृंखला एवं व्यापार सुविधा केंद्र, अंतर्राष्ट्रीय ज्ञान, कौशल व क्षमता विकास केंद्र और वैश्विक स्तर की अनुसंधान सुविधाओं की स्थापना का प्रावधान किया गया है.

केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर द्वारा “श्रीअन्न वैश्विक उत्कृष्ट शोध केंद्र” की प्रगति की समीक्षा के लिए आयोजित बैठक में बताया गया कि यहां अनुसंधान से संबंधित विभिन्न सुविधाओं में जीनोम अनुक्रमण, जीन संपादन, पोषक जीनोमिक्स, आणविक जीव विज्ञान, मूल्य संवर्धन और जीनोम सहायता प्रजनन के लिए उन्नत अनुसंधान उपकरणों से सुसज्जित प्रयोगशालाओं की स्थापना के साथसाथ स्पीड ब्रीडिंग, फाइटोट्रौन, जलवायु नियंत्रित कक्ष, ग्रीनहाउस व ग्लासहाउस एवं रैपिड फेनोमिक्स सुविधा की भी स्थापना की जा रही है.

इसी क्रम में संस्थान के नवस्थापित बाड़मेर, राजस्थान एवं सोलापुर, महाराष्ट्र स्थित 2 क्षेत्रीय केंद्रों को भी सुदृढ़ बनाया जा रहा है. केंद्र को वैश्विक स्तर का अनुसंधान और प्रशिक्षण परिसर बनाने के लिए उन्नत अनुसंधान प्रयोगशालाओं के साथ आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाओं, सम्मेलन कक्षों और अंतर्राष्ट्रीय अतिथिगृह की स्थापना का भी प्रावधान किया गया है. केंद्र की गतिविधियों को समयसीमा में पूरा करने व पूरे देश में लागू करने के लिए आईसीएआर के 15 संस्थान सहयोग करेंगे.

बैठक में कृषि सचिव मनोज आहूजा, डेयर के सचिव एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक डा. हिमांशु पाठक के साथ अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे. श्रीअन्न वैश्विक उत्कृष्ट शोध केंद्र की स्थापना के लिए केंद्रीय बजट में 250 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है. इस संबंध में केंद्र सरकार के स्तर पर कार्यवाही तेजी से प्रगति पर है, साथ ही नियमित बैठकें भी हो रही हैं.

उत्तरप्रदेश में हाईटैक नर्सरी बढ़ाएगी किसानों की आमदनी

लखनऊ : उत्तर प्रदेश में किसानों को विभिन्न प्रजातियों के उच्च क्वालिटी के पौधे उपलब्ध कराने के उद्देश्य से इजराइली तकनीक पर आधारित हाईटैक नर्सरी तैयार की जा रही है. यह काम मनरेगा अभिसरण के तहत उद्यान विभाग के सहयोग से कराया जा रहा है और राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत गठित स्वयं सहायता समूहों की दीदियां भी इस में हाथ बंटा रही हैं. इस से स्वयं सहायता समूहों को काम मिल रहा है.

उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने बताया कि इस योजना के क्रियान्वयन से कृषि और औद्यानिक फसलों को नई ऊंचाई मिलेगी. विशेष तकनीक का प्रयोग कर के ये नर्सरी तैयार की जा रही हैं. सरकार की मंशा है कि प्रदेश का हर किसान समृद्ध बने और बदलते समय के साथ किसान हाईटैक भी बने.

उन्होंने आगे बताया कि सरकार पौधरोपण को बढ़ावा देने के साथ ही बागबानी से जुड़े किसानों को भी माली रूप से मजबूत बनाने का काम कर रही है. मनरेगा योजना से 150 हाईटैक नर्सरी बनाने के लक्ष्य के साथ तेजी से काम किया जा रहा है.

उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के निर्देश व पहल पर ग्राम्य विकास विभाग ने इस को ले कर प्रस्ताव तैयार किया था, जिस को ले कर जमीनी स्तर पर युद्धस्तर पर काम हो रहा है. हाईटैक नर्सरी से किसानों की माली हालत भी मजबूत हो रही है.

प्रदेशभर में 150 हाईटैक नर्सरी बनाने का लक्ष्य रखा गया है. बुलंदशहर के दानापुर और जाहिदपुर में हाईटैक नर्सरी बन कर तैयार भी हो चुकी है. 32 जिलों की 40 साइटों पर ऐसी नर्सरी बनाने का काम किया जा रहा है.

कन्नौज के उमर्दा में स्थित सैंटर औफ एक्सीलेंस फौर वेजिटेबल की तर्ज पर प्रदेश के सभी जनपदों में 2-2 मिनी सैंटर स्थापित करने की कार्यवाही जारी है. किसानों को उन्नत किस्म के पौध के लिए भटकना नहीं पड़ेगा.

समूह के सदस्यों को रोजगार

नर्सरी की देखरेख करने के लिए स्वयं सहायता समूह को जिम्मेदारी दी गई है. समूह के सदस्य नर्सरी का काम देखते हैं, जो पौधों की सिंचाई, रोग, खादबीज आदि का जिम्मा संभालते हैं. इस के लिए स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को प्रशिक्षण भी दिया जा चुका है.

किसानों की आय में बढ़ोतरी के लिए सरकार उच्च क्वालिटी व उन्नत किस्म के पौधों की नर्सरी को बढ़ावा देने के लिए तेजी से काम कर रही है. प्रत्येक जनपद में पौधशालाएं बनाने का काम किया जा रहा है. इन में किसानों को फूल और फल के साथ सर्पगंधा, अश्वगंधा, ब्राह्मी, कालमेघ, कौंच, सतावरी, तुलसी, एलोवेरा जैसे औषधीय पौधों को रोपने के लिए जागरूक किया जा रहा है. किसानों को कम लागत से अधिक फायदा दिलाने के लिए पौधरोपण की नई तकनीक से जोड़ा जा रहा है.

अब तक 7 करोड़ रुपए से ज्यादा का भुगतान

उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने बताया कि हाईटैक नर्सरी के निर्माण में अब तक 7 करोड़ से ज्यादा की धनराशि खर्च की जा चुकी है. बुलंदशहर में 2, बरेली, बागपत, मुजफ्फरनगर, मेरठ, महोबा, बहराइच, वाराणसी, बलरामपुर समेत 9 जनपदों में हाईटैक नर्सरी की स्थापना के लिए अब तक 7 करोड़ रुपए की धनराशि का भुगतान किया जा चुका है.

ग्राम्य विकास आयुक्त जीएस प्रियदर्शी ने बताया कि प्रदेश में 150 हाईटैक नर्सरी के निर्माण की कार्यवाही मनरेगा कन्वर्जेंस के अंतर्गत की जा रही है, जिस के सापेक्ष 125 हाईटैक नर्सरी की स्वीकृति जनपद स्तर पर की जा चुकी है.

सांप हमारे मित्र भी हैं

राजस्थान के जोधपुर जिले के वाइल्ड लाइफर शरद पुरोहित सांपों के व्यवहार के बारे में बताते हैं, ‘‘ मुझे बचपन से ही सांपों ने अपनी ओर आकर्षित किया. मैं ने हमेशा ही इन्हें असहाय पाया. सांपों के कहीं भी दिखाई दे जाने पर इन्हें मार दिए जाने की परंपरा ने मुझे भीतर तक झंझोर दियाहै. उन की इसी अनदेखी के चलते न जाने कब मेरा स्वाभाविक स्नेह इन्हें जिंदगी देने की वजह बन गया.’’

दुनियाभर में सांपों की 3,400 प्रजातियां हैं. इन में से तकरीबन 2,000 तो भारत में ही पाई जाती हैं. चूंकि मेरे काम का क्षेत्र पश्चिमी राजस्थान है, इसलिए मैं ने यहीं पाई जाने वाली प्रजातियों पर ज्यादा काम किया है. तकरीबन 25 ऐसी प्रजातियां हैं, जो राजस्थान में मिल जाती हैं. इन में से कुछ ही सांप जहरीले और घातक होते हैं.

आम लोगों की जिंदगी और किसानों के लिए सांपों का होना क्यों जरूरी है? जैव संतुलन में चूहे इनसानी जिंदगी में सब से बड़े घाटे का सौदा हैं. वे हमारे सब से बड़े दुश्मन हैं. ये चूहे हर साल खाद्यान्न का एक बड़ा हिस्सा चट कर जाते हैं. सांप इन चूहों के सब से बड़े दुश्मन हैं, इसलिए सांपों का सरंक्षण किया जाना बेहद जरूरी है.

सांपों की प्रजातियों में 3 सांप ऐसे भी हैं, जो हमारे लिए घातक हैं, वह भी मुठभेड़ हो जाने पर या छू लेने भर से, वरना खुद से हमला करना इन की फितरत नहीं.

मेरा अनुभव कहता है कि हमारी असावधानी से ही हमारी जानें जाती हैं. कोबरा, करैत, वाइपर ये कुछ ऐसे सांप हैं, जिन से हमारी जान जोखिम में पड़ सकती है.

कोबरा

यह सांप हमारे घरों के आसपास रहना ज्यादा पसंद करता है. यह बहुत ही समझदार  होता है. पहले तो यह हमें सचेत करता है. एकदम हमला नहीं करता. हमारे द्वारा दूरी बनाए रहने तक हम से दूर जाने की कोशिश करता है.

करैत

यह सांप बहुत ही घातक है. अकसर रात को निकलने वाला यह सांप ठंडक से बचने के लिए इनसानी इलाकों के नजदीक चला आता है और नींद में सोए हुए बेकुसूर लोग इस का शिकार बनते हैं. इस के दंश यानी काटने के निशान बहुत सूक्ष्म होते हैं. इस वजह से इस की पहचान बड़ी मुश्किल से हो पाती है.

लोगों में एक गलतफहमी है कि एक पीवणा सांप भी होता है, उस का जिम्मेदार भी यही होता है, लेकिन यह भी बिना छेड़े, हम से दूर भागना पसंद करता है.

वाइपर

इस सांप को शुष्क इलाकों का राजा कहते हैं. यह घातक और विषैला सांप है. यह सांप छोटीछोटी झाड़ियों और मिट्टी में रहना ज्यादा पसंद करता है. करीब जाने पर यह फुंफकारता है. इस की फुंफकार बहुत डरावनी होती है. आम आदमी इसे सुनते ही दूर हट जाता है.

इस की खराबी या अवगुण यह है कि यह बिना छेड़े ही हम पर हमला कर सकता है. इस से दूर रहना ही बचाव है. आम भाषा में इसे ‘भांडी’ यानी ‘पूंछ कटी’ भी कहते हैं.

वाइपर चूहों का बड़ा शिकारी है. जैसलमेर और बाड़मेर जैसे सीमांत इलाकों में इस के डसने की सब से ज्यादा खबरें मिलती हैं.

शहरी इलाकों में है इन का राज

शहरी इलाकों या पुराने शहरी इलाकों में ‘सैंड बोआ’, ‘ग्लोसी बेलिड’, ‘अर्थ बोआ’, ‘वर्मस्नेक’, ‘कोबरा’ जैसे सांप सब से ज्यादा पाए जाते हैं, जो बरसात के दिनों में ज्यादा सक्रिय दिखते हैं.

गांवों और कसबों में बसे खेतों की बात करें, तो ‘सिंड अवल हैडेड’, ‘रैड स्पाटेड’, ‘ब्लैक हैडेड रौयल स्नेक’, ‘एफ्रो एशियन सैंड स्नेक’, ‘कैट स्नेक’, ‘रैट स्नेक’, ‘वुल्फ स्नेक’ जैसे सांप अधिक मिलते हैं.

तो बचाव किस तरह हो

सर्प व्यवहार विशेषज्ञ शरद पुरोहित बताते हैं कि हम क्या करें, जब ये हमारे सामने हों. ऐसे सवाल अकसर ही पूछे जाते हैं. मेरा जवाब होता है, बस अपनी नजरें उन पर जमाए रहें. अगर ये खुली जगह पर हैं तो खुद ही चले जाएंगे और यदि घर में निकल आए हैं तो आप का फर्ज बनता है, कि बिना कोई हलचल किए, बहादुरी दिखाने की कोशिश किए बगैर किसी माहिर सांप विशेषज्ञ की मदद ले कर इन का पुनर्वास सुनिश्चित किया जाए.

इन को भूल कर भी बिना पहचान किए छूने की कोशिश से बचें. लाठी, चिमटा, टोंग वगैरह से प्रहार इन के लिए घातक साबित हो सकता है, ये जितने ताकतवर दिखाई पड़ते हैं, उस से ज्यादा कमजोर इन की हड्डियां और सिर होते हैं. रैस्क्यू के बाद ये जी नहीं पाते, यथासंभव प्रबंधन होना चाहिए, हैंडलिंग बिलकुल भी न करें.

कुछ इलाकों में इन्हें देखते ही मार देने का रिवाज है. मेरा मानना है, चूंकि यह किसानों के परम मित्र हैं, इन्हें सम्मान दिया जाना जरूरी है. ये हमारे जीने की वजह हैं, हमारी जिंदगी में इन की उपयोगिता भी बराबर की है.

सांप को पलकें नहीं दीं, इन्हें सुनाई नहीं देता, इन के हाथपैर, सींग नहीं होते, महज मुंह और रेंगने के लिए पूरा शरीर धरती से चिपकाए रहते हैं. इन की फुंफकार या सर्र की आवाज ही एक हथियार है जो संकट में इन की हिफाजत करती है. अगर यह खुद को फंसा हुआ पाएंगे तो ही आक्रामक होंगे, मुठभेड़ करेंगे. ऐसे सांप जो घातक नहीं हैं, उन्हें खेतों, गोदामों वगैरह में घूमने दें. ये आप को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाएंगे.

तकरीबन 3,000 से भी ज्यादा सांपों की जिंदगी बचा चुके शरद पुरोहित कहते हैं, ‘‘अकसर देखता हूं कि मेरे पहुंचने से पहले ही इन से कोई छेड़खानी हुई हो तो यह सांप आक्रामक नजर आते हैं. इस के उलट अगर माहौल शांत रहा हो तो ऐसा लगता है मानो सांप बहुत कहने में लगता है और खुद ही रैस्क्यू का हिस्सा बन हमारा सहयोगी हो जाता है.

‘‘मुझे ये सांप बेहद शरीफ, सुंदर और आकर्षक लगने के साथसाथ असहाय लगते हैं. रेस्क्यू करने के शुरुआती दिनों में पहलेपहल मेरा परिवार बहुत घबराता था, पर अब वे सहयोगी हैं. हर साल वन विभाग द्वारा इस तरह की कार्यशालाओं का आयोजन किया जाता है.

‘‘मैं जिज्ञासुओं को इन सांपों की पहचान, रैस्क्यू और बाइट प्रबंधन के तरीकों पर ट्रेनिंग देता हूं.  शहर के कई नौजवानों को मैं ने अपने साथ वालंटियर की तरह तैयार कर रखा है. मैं इस काम को वैज्ञानिक तरीके से करने की बारीकियां इन नौजवानों को सिखला रहा हूं.

‘‘कालेज, स्कूल समेत कई विभागों को मैं ने अपनी इस जागरूकता मुहिम में शामिल किया है, पत्रपत्रिकाओं के जरीए भी मेरा प्रयास जारी है.

‘‘खुशी की बात है कि अब मुझे जैसे कुछ जागरूक नौजवानों की बात का असर रंग दिखा रहा है, खासकर जोधपुर में अब कोई इन सांपों को मारता नहीं है.

हर साल जुलाई से अक्तूबर माह तक हम नौजवानों की टीम ‘यूथ अरण्य’ दिनरात मुफ्त सेवा देती रहती है. पर, अफसोस इस बात का है कि प्रशासन इस विषय को कभी आपदा प्रबंधन का हिस्सा नहीं मानता, जबकि यह एक जरूरी काम है कि इनसान और जानवर दोनों बचे रहें, सुरक्षित रहें.

‘‘हमारी जैसी कोशिशें शायद पूरे देश में जारी हैं. सुझाव  है कि सरकारी अस्पतालों में भी इस तरह की एक कार्यशाला रखी जाए और इन की पहचान संबंधी समझ को आम लोगों में गहरे उतारा जाए, को समझाया  जाए. आपातकाल में इन के संबंधित चित्र डिसप्ले हों, ताकि इन के डसने से पीडि़तों को तुरंत इलाज मिल सके.’’

 

समकलित खेती पर पांचदिवसीय प्रशिक्षण

अविकानगर (राजस्थान): भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के संस्थान केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर, तहसील मालपुरा, जिला टोंक (राजस्थान) के दक्षिण क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, माननावनूर जिला- कोडईकनाल राज्य-तमिलनाडु  द्वारा राज्य के पहाड़ी जिलों के एससी तबके के किसानों को अनुसूचित जाति उपयोजना के माध्यम से किसानवैज्ञानिक संवाद द्वारा समकलित खेती पर पांचदिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया.

वैज्ञानिक संवाद एवं स्थापना दिवस के कार्यक्रम मे मुख्य अतिथि संस्थान के निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर, प्रशासनिक अधिकारी भीम सिंह, माननावनूर सैंटर के प्रभारी डा. पी थिरूमुरुगान, वैज्ञानिक डा. एस. जगवीरा पांडेयन एवं केंद्र के समस्त कर्मचारियों द्वारा कार्यक्रम में हिस्सा लिया गया.

कार्यक्रम में पधारे मुख्य अतिथि निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर एवं अन्य अतिथि का केंद्र द्वारा दक्षिण परंपरा से स्वागतसत्कार किया गया.

Farmingकार्यक्रम को संबोधन करते हुए निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर ने सभी को समेकित खेती की ओर जाने का निवेदन करते हुए कहा कि इस से सालभर परिवार की आजीविका बनी रहेगी.

उन्होंने जानकारी देते हुए यह भी बताया कि आप भेड़, खरगोश, गाय आदि पशुओं के पालन के साथ ही सब्जी, फल और मसाले का और्गैनिक तरीके से उत्पादन कर के अच्छी आमदनी ले सकते हैं.

डा. अरुण कुमार तोमर ने आगे कहा कि आप उत्तरी भारत के हिमाचल प्रदेश के किसानों की बागबानी, सब्जी और टूरिस्ट आधारित पारिवारिक आजीविका से सीख कर कुछ अपने फार्मिंग सिस्टम को ऐसी दिशा देने की जरूरत है.

इस अवसर पर तमिलनाडु राज्य के किसानों के खरगोश मांस संगठन के साथ एमओयू किया गया, जिस से अविकानगर संस्थान की खरगोशपालन उन्नत तकनीकी को राज्य के पहाड़ी क्षेत्र के सभी तबके के लोगों तक पहुंचाया जाएगा.

केंद्र के कार्यालय प्रभारी डा. पी. थिरूमुरुगान ने बताया कि अनुसूचित जाति के  तबके के किसानों को तमिलनाडु राज्य की कृषि और पशुपालन संस्थान के साथ उन्नत खेती और पशुपालन पर भ्रमण और लेक्चर्स करवाया जाएगा.

नवंबर महीने से जुड़े  खेतीकिसानी के काम

रबी के सीजन में ली जाने वाली फसलों के नजरिए से नवंबर का महीना सब से अहम होता है. यह महीना गेहूं, जौ, तिलहन, दलहन, सब्जी के साथ ही बागबानी और फूलों की खेती के लिए सब से खास माना गया है. ऐसे में इस महीने में किसानों को खेतीकिसानी को ले कर खासा सतर्क रहने की जरूरत होती है, क्योंकि थोड़ी सी लापरवाही नुकसानदायक हो सकती है. लिहाजा, नवंबर महीने में किसान खेतीकिसानी से जुड़े कामों को समय से निबटाएं.

जिन किसानों ने काला नमक धान की किरण केएन-2, केएन-3 और किरन, बौना काला नमक 101 या 102 के अलावा पारंपरिक देशी प्रजाति लगा रखी है, वे इस महीने के पहले हफ्ते तक फसल की अंतिम सिंचाई कर दें, क्योंकि इस समय बारिश न होने से खेतों में नमी नहीं होती है.

इस के अलावा नवंबर महीने में धान की ज्यादातर प्रजातियों की कटाई और मड़ाई किसान पूरी कर चुके होते हैं. ऐसे में जरूरी हो जाता है कि मड़ाई के बाद तैयार फसल का उचित तरीके से भंडारण किया जाए. इस के लिए किसान नई बोरियों का इस्तेमाल करें.

किसान यह तय करें कि अगर धान की कटाई हो चुकी है और गेहूं की फसल लेने के लिए खेत में जरूरी नमी नहीं है, तो नवंबर महीने के पहले हफ्ते में हलकी सिंचाई कर दें, जिस से गेहूं की बोआई के समय खेत में पूरी नमी मुहैया हो.

यह भी तय करें कि खेत में जरूरी नमी के रहते खेत की अच्छी तरह से जुताई कर के मिट्टी को भुरभुरा बना कर खेत में पाटा लगा दिया जाए. इस से खेत की नमी बनी रहने में मदद मिलती है.

गेहूं की बोआई का सब से अच्छा समय 15 से 30 नवंबर तक का होता है. कोशिश करें कि इस बीच गेहूं की बोआई हर हालत में पूरी कर ली जाए. गेहूं बीज की खरीदारी लाइसैंसशुदा दुकानों से ही करें और प्रमाणित बीज ही खरीदें. खेतों में बीज डालने के पहले बीज शोधन करना न भूलें.

हाल ही में गेहूं की कई किस्में विकसित की गई हैं, जैसे एचडी 3298, डीडब्लू 187,  डीडब्लू 3030, डब्लूएच 1270, सीजी 1029, एचआई 1634, डीडीडब्लू 48, एचआई 1633, एनआईडीडब्लू 1149 आदि. किसान इन की बोआई कर सकते हैं. ये सभी प्रजातियां क्षेत्र विशेष को ध्यान में रख कर विकसित की गई हैं. ऐसे में अपने क्षेत्र के मुताबिक प्रजातियों को चुनें.

इस के अलावा गेहूं की उन्नत प्रजातियों में के 9107, एचपी 1731, के 9006, एनडब्लू 1012, यूपी 2382, एचपी 1761, एचयूडब्लू 468, एचडी 2733, एचडी 2834, पीबीडब्लू 343, पीबीडब्लू 443, यूपी 2338, के 0307, पीबीडब्लू 502, सीबीडब्लू 38, राज 4120, डीबीडब्लू 39, एनडब्लू 5054 वगैरह की बोआई कर सकते हैं.

अगर खेत की मिट्टी ऊसर है, तो केआरएल 19, लोक 1, एनडब्लू 1067, एनडब्लू 1076, केआरएल 210 और 213, केआरएल 14, राज 3077, के 8434 की बोआई करें.

गेहूं में कम लागत से ज्यादा से ज्यादा उत्पादन के लिए सीड ड्रिल से बोआई करना सही होता है. इस से बीज और उर्वरक की मात्रा भी कम लगती है. सीड ड्रिल से बोआई करने पर प्रति हेक्टेयर 100 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है.

किसान गेहूं की बोआई के समय प्रति हेक्टेयर की दर से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फेट व 40 किलोग्राम पोटाश का इस्तेमाल करें. अगर खेत में हरी खाद का इस्तेमाल किया गया है, तो केवल 40 किलोग्राम नाइट्रोजन बहुत है.

अगर आप ने मिट्टी की जांच कराई है और अगर उस में जस्ते की कमी पाई गई है, तो तो प्रति हेक्टेयर 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट को गेहूं की बोआई के पहले अंतिम जुताई के समय खेत में मिला दें.

जिन किसानों ने अगेती फसल के रूप में गेहूं की बोआई कर दी है, वे यह तय करें कि बोआई के 20-25 दिन बाद फसल की सिंचाई कर दें, साथ ही सिंचाई के 3-4 दिन बाद 40-60 किलोग्राम नाइट्रोजन की टौप ड्रैसिंग कर दें.

जौ की बोआई के लिए सब से सही समय 15 से 30 नवंबर तक का होता है. जौ के लिए प्रमाणित व उपचारित बीज का ही इस्तेमाल करें. इस के लिए प्रति हेक्टेयर खेत के लिए 15 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है. जौ की बोआई के समय प्रति हेक्टेयर 30 किलोग्राम नाइट्रोजन, 30 किलोग्राम फास्फेट व 20 किलोग्राम पोटाश की जरूरत पड़ती है.

जौ की उन्नत किस्मों में ज्योति (के. 572/10), आजाद (के.125), के.141, हरीतिमा (के. 560), प्रीती (के. 409), जागृति (के. 287), एनडीबी 1445 (नरेंद्र जौ-7), लखन (के. 226), मंजुला (के. 329), आरएस 6, नरेंद्र जौ 192 (एनडीबी 209), नरेंद्र जौ 2 (एनडीबी 940), नरेंद्र जौ 3 (एनडीबी 1020), आरडी 2552, के. 603, एनडीबी 1173, के.1149 गीतांजली, नरेंद्र जौ 5 (एनडीबी 943) व उपासना शामिल हैं.

माल्ट के लिए नई प्रजाति डीडब्लू, आरबी 91 के अलावा प्रचलित प्रजातियों में प्रगति (के. 508), ऋतंभरा (के. 551), डीडब्लूआर 28, डीएल 88, रेखा (बीसीयू 73) का बोआई के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.

जिन किसानों को सरसों व लाही की बोआई किए 15-20 दिन बीत गए हों, वे फसल के घने होने की दशा में अतिरिक्त पौधों को खेत से निकाल कर विरलीकरण कर लें, क्योंकि फसल के घने होने की दशा में फसल का उत्पादन 20-30 फीसदी कम हो सकता है.

पौधों का विरलीकरण करते समय यह ध्यान दें कि पौध से पौध की दूरी 10-15 सैंटीमीटर हो, तो ज्यादा अच्छा होता है. फसल बोआई के 30 दिन बाद हलकी सिंचाई करना न भूलें. इस के बाद लाही के लिए 75 किलोग्राम नाइट्रोजन की टौप ड्रैसिंग करें.

सरसों को आरा मक्खी व माहू कीट से बचाने के लिए इमिडा क्लोरोप्रिड 17.8 फीसदी 300 मिलीलिटर मात्रा को 600 लिटर पानी में घोल बना कर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करें.

सरसों के पौधों को सफेद गेरुई व ?ालसा बीमारियों से बचाने के लिए प्रोपिकोनाजोल 25 फीसदी ईसी की 500 मिलीलिटर मात्रा को 600-800 लिटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

इस महीने के दौरान तोरिया की फलियों में दाना भरता है. ऐसे में खेत में भरपूर नमी होनी चाहिए. नमी कम लगे तो तुरंत खेत की सिंचाई करें, ताकि फसल बढि़या हो.

नवंबर महीने में अरहर की फलियां पकने लगती हैं. अगर 75 फीसदी फलियां पक गई हों, तो कटाई का काम करें. अरहर की देरी से पकने वाली किस्मों पर अगर फलीछेदक कीट का हमला दिखाई दे, तो स्पाइनोसेड 5 फीसदी एससी की 750 मिलीलिटर मात्रा को 500 लिटर पानी में घोल कर छिड़कें. इस से फलीछेदक की रोकथाम हो सकेगी.

जिन किसानों ने चने की बोआई अक्तूबर के दूसरे या तीसरे हफ्ते तक कर दी थी, वे फसल की निराईगुड़ाई तय करें. इस के अलावा सिंचित क्षेत्रों में नवंबर के दूसरे हफ्ते तक चने की बोआई की जा सकती है.

किसानों ने अगर मटर की समय से बोआई कर दी है, तो फसल की निराई कर लें. बोआई के 40-45 दिन बाद पहली सिंचाई करें.

जो किसान मसूर की खेती करना चाहते हैं, वे 15 नवंबर तक ऐसा जरूर कर लें. मसूर की उन्नत प्रजातियों में शेखर 2, शेखर 3, पंत मसूर 4, पंत मसूर 5  या नरेंद्र मसूर 1 पीएल 2, वीएल मसूर 129, वीएल 133, वीएल 154, वीएल 125, पंत मसूर (पीएल 063), केएलबी 303, पूसा वैभव (एल 4147), आवीएल 31 और आपीएल 316 प्रमुख हैं. मसूर के एक हेक्टेयर खेत में 40 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है. किसान प्रमाणित और शोधित बीज का ही इस्तेमाल करें.

कुसुम की खेती करने वाले किसान इस की बोआई मध्य नवंबर तक जरूर कर लें. कुसुम की सब से अच्छी प्रजाति के. 65 है, जो 180 से 190 दिन में पक कर तैयार हो जाती है. इस में तेल की मात्रा 30 से 35 फीसदी पाई जाती है और औसत उपज 14 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. वहीं दूसरी प्रजाति मालवीय कुसुम 305 है, जो 160 दिन में पकती है. इस में तेल की मात्रा 36 प्रतिशत है. कुसुम के एक हेक्टेयर खेत के लिए 18-20 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है.

शीतकालीन मक्का की बोआई के लिए मध्य नवंबर का समय सब से मुफीद होता है. ऐसे में हर हाल में बोआई कर के बोआई के समय ही प्रति हेक्टेयर 40 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फेट, 40 किलोग्राम पोटाश और 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट भूमि में जरूर मिलाएं.

जो किसान अक्तूबर के महीने में आलू की बोआई नहीं कर पाए हैं, वे हर हाल में इस महीने के दूसरे हफ्ते तक बोआई खत्म कर लें. आलू की उन्नत प्रजातियों में कुफरी बहार, कुफरी बादशाह, कुफरी अशोका, कुफरी सतलज, कुफरी आनंद, लाल छिलके वाली कुफरी सिंदूरी और कुफरी लालिमा मुख्य हैं. प्रसंस्करण के लिए आलू की कुफरी चिप्सोना 1 और चिप्सोना 2 उपयुक्त प्रजातियां मानी गई हैं.

किचन गार्डन में फ्रैंचबीन, पालक, मेथी, धनिया, मूली की बोआई नवंबर महीने में की जा सकती है.

जो किसान वसंतग्रीष्म ऋतु में टमाटर की फसल लेना चाहते हैं, वे पौधशाला में नर्सरी तैयार करने के लिए बीज की बोआई कर दें. टमाटर की उन्नत प्रजातियों में पूसा रूबी, पंजाब छुहारा, पंत बहार उन्नत और पूसा हाईब्रिड 2, अविनाश 2, नवीन, रूपाली व रश्मि संकर किस्में अच्छी मानी गई हैं.

लहसुन की खेती करने वाले किसान अगर अभी तक लहसुन की बोआई न कर पाए हों, तो नवंबर महीने तक बोआई पूरी कर लें. उन्नत किस्मों में एग्रीफाउंड पार्वती (जी 313), टी 56-4. गोदावरी (सैलेक्शन 2), एग्रीफाउंड ह्वाइट (जी 41), यमुना सफेद (जी 1), भीमा पर्पल, भीमा ओंकार, यमुना सफेद (जी 282) प्रजाति उपयुक्त हैं. जिन किसानों ने अक्तूबर महीने में ही लहसुन की बोआई कर दी है, वे फसल की निराईगुड़ाई और सिंचाई कर लें.

इस अगेती तौर पर रोपे गए लहसुन के खेतों का बारीकी से मुआयना करें. अगर खेतों में सूखापन दिखाई दे, तो फौरन सिंचाई करें. सिंचाई के अलावा निराईगुड़ाई भी करें, ताकि खरपतवारों से नजात मिल सके.

प्याज की खेती करने वाले किसान नर्सरी में बीज की बोआई जरूर कर लें. एक हेक्टेयर में प्याज की रोपाई के लिए 8-10 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है.

आम के साथ ही दूसरे फलों के बाग की जुताई का नवंबर महीना सब से सही समय होता है. ऐसे में खरपतवार नष्ट कर दें.

आम के मिलीबग कीट के नियंत्रण के लिए फिप्रोनिल की 1 लिटर मात्रा को 600 लिटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें. इस के अलावा आम के पेड़ों में थालों की सफाई कर दें और सूखी व बीमार टहनियों को काट दें.

अमरूद में छाल खाने वाले कीड़ों की रोकथाम के लिए फिप्रोनिल की 1 लिटर मात्रा को 600 लिटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

आंवला, नीबू, पपीता में सिंचाई करें. आंवले की तुड़ाई और मार्केटिंग का इंतजाम करें. केले में प्रति पौधा 55 ग्राम यूरिया का इस्तेमाल करें और 10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें.

देशी गुलाब की कलम काट कर अगले साल के स्टाक के लिए क्यारियों में लगा दें. ग्लेडियोलस में मौसम के अनुसार हफ्ते में एक या 2 बार सिंचाई करें. रजनीगंधा के स्पाइक की कटाईछंटाई, पैकिंग, मार्केटिंग और पोषक तत्त्वों के मिश्रण का अंतिम चरणीय छिड़काव करें.

पिछले महीने लगाई गई सब्जियों के खेतों की जांच करें. उन में खरपतवार पनपते नजर आएं, तो निराईगुड़ाई के जरीए उन का खात्मा करें. जरूरत के मुताबिक सिंचाई भी करें.

सब्जियों के पौधों व फलों पर अगर कीड़ों या बीमारियों के लक्षण नजर आएं, तो कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिकों से सलाह लें.

नवंबर महीने में ठंड की हलकी शुरुआत हो चुकी होती है. ऐसे में अपने मवेशियों के ठंड से बचाव का खास खयाल रखें. गायभैंसों के बच्चों को सर्दी से बचाने का पूरा बंदोबस्त करें.

अपने मुरगेमुरगियों को भी सर्दी से महफूज रखने का इंतजाम करें. जरूरत पड़ने पर डाक्टर को बुलाना न भूलें.

हरे चारे के लिए बरसीम की खेती करने वाले किसान वरदान, मेस्कावी, बुंदेलखंड बरसीम 2 (जेएचबी 146), बुंदेलखंड बरसीम 3 (जेएचटीबी 146) की बोआई 15 नवंबर तक जरूर कर दें. इस के लिए प्रति हेक्टेयर 25-30 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है. बोआई के लिए खेत में 5 सैंटीमीटर गहरा पानी भर कर उस के ऊपर बीज छिड़क देते हैं. बोआई के 24 घंटे बाद क्यारी से पानी निकाल देना चाहिए.

जो किसान पशुओं के चारे के लिए जई की बोआई करना चाहते हैं, वे केंट, ओएस 6, बुंदेल जई 99-2 (जेएचओ 99-2), यूपीओ 212, बुंदेल जई 822 (जेएचओ 822), बुंदेल जई 851 (जेएचओ 851) का इस्तेमाल कर सकते हैं. इस के लिए एक हेक्टेयर खेत में 75 से 80 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है. जई की बोआई का उचित समय नवंबर महीने के पहले पखवारे से ले कर आखिरी पखवारे तक का होता है.

नोट : लेख में कीटनाशकों के नाम कृषि विज्ञान केंद्र, बस्ती के वैज्ञानिक फसल सुरक्षा डा. प्रेम शंकर द्वारा  सुझाए गए हैं. बागबानी व सब्जियों की खेती समेत दूसरी जानकारी कृषि विज्ञान केंद्र, बस्ती के विशेषज्ञ  राघवेंद्र विक्रम सिंह द्वारा सुझाए गए हैं.

साल 2022-23 में रिकौर्ड खाद्यान्‍न उत्‍पादन

नई दिल्ली : 18 अक्तूबर 2023. कृषि एवं किसान कल्‍याण मंत्रालय ने वर्ष 2022-23 के लिए मुख्‍य फसलों के उत्‍पादन के अंतिम अनुमान जारी कर दिए हैं. इस के अनुसार देश में कुल खाद्यान्‍न उत्‍पादन रिकौर्ड 3296.87 लाख टन अनुमानित है, जो 2021-22 के 3156.16 लाख टन खाद्यान्न उत्‍पादन की तुलना में 140.71 लाख टन अधिक है. इस के अलावा साल 2022-23 के दौरान खाद्यान्‍न उत्‍पादन गत 5 वर्षों (2017-18 से 2021-22) के औसत खाद्यान्‍न उत्‍पादन की तुलना में 308.69 लाख टन अधिक है.

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा है कि हमारे किसान लगातार कड़ी मेहनत कर रहे हैं, वहीं कृषि वैज्ञानिक व संस्थान भी बहुत अच्छा काम कर रहे हैं. साथ ही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में कृषि मंत्रालय द्वारा योजनाओं व कार्यक्रमों का सुचारु रूप से क्रियान्वयन हो रहा है. इस तरह सब के प्रयासों से कृषि क्षेत्र में रिकौर्ड खाद्यान्‍न उत्‍पादन सहित बेहतर नतीजे परिलक्षित हो रहे हैं.
अंतिम अनुमान के अनुसार, 2022-23 के दौरान मुख्‍य फसलों का उत्‍पादन इस प्रकार है :

खाद्यान्‍न – 3296.87 लाख टन
चावल – 1357.55 लाख टन
गेहूं – 1105.54 लाख टन
पोषक/मोटे अनाज – 573.19 लाख टन
मक्‍का – 380.85 लाख टन
दलहन – 260.58 लाख टन
तूर- 33.12 लाख टन
चना – 122.67 लाख टन
तिलहन – 413.55 लाख टन
मूंगफली– 102.97 लाख टन
सोयाबीन– 149.85 लाख टन
रेपसीड एवं सरसों – 126.43 लाख टन
गन्‍ना – 4905.33 लाख टन
कपास – 336.60 लाख गांठें (प्रति 170 किलोग्राम)
पटसन एवं मेस्‍टा– 93.92 लाख गांठ (प्रति 180 किलोग्राम)

वर्ष 2022-23 के दौरान चावल का कुल उत्‍पादन रिकौर्ड 1357.55 लाख टन अनुमानित है. यह पिछले वर्ष के 1294.71 लाख टन चावल उत्पादन से 62.84 लाख टन एवं विगत 5 वर्षों के 1203.90 लाख टन औसत उत्‍पादन से 153.65 लाख टन अधिक है.

Food Grain
Food Grain

वर्ष 2022-23 के दौरान गेहूं का कुल उत्‍पादन रिकौर्ड 1105.54 लाख टन अनुमानित है. यह पिछले वर्ष के 1077.42 लाख टन गेहूं उत्पादन से 28.12 लाख टन एवं 1057.31 लाख टन औसत गेहूं उत्‍पादन की तुलना में 48.23 लाख टन अधिक है.

श्री अन्न (पोषक/मोटे अनाजों) का उत्‍पादन 573.19 लाख टन अनुमानित है, जो 2021-22 के दौरान प्राप्त 511.01 लाख टन उत्‍पादन की तुलना में 62.18 लाख टन अधिक है. इस के अलावा यह औसत उत्‍पादन से भी 92.79 लाख टन अधिक है. श्री अन्न का उत्पादन 173.20 लाख टन अनुमानित है.

साल 2022-23 के दौरान कुल दलहन उत्‍पादन 260.58 लाख टन अनुमानित है, जो विगत 5 वर्षों के 246.56 लाख टन औसत दलहन उत्‍पादन की तुलना में 14.02 लाख टन अधिक है.

साल 2022-23 के दौरान देश में तिलहन उत्‍पादन रिकौर्ड 413.55 लाख टन अनुमानित है, जो साल 2021-22 के दौरान उत्‍पादन की तुलना में 33.92 लाख टन अधिक है. इस के अलावा साल 2022-23 के दौरान तिलहनों का उत्पादन 340.22 लाख टन औसत तिलहन उत्‍पादन की तुलना में 73.33 लाख टन अधिक है.

साल 2022-23 के दौरान गन्‍ना उत्‍पादन 4905.33 लाख टन अनुमानित है. साल 2022-23 के दौरान गन्‍ने का उत्‍पादन पिछले वर्ष के 4394.25 लाख टन गन्ना उत्पादन से 511.08 लाख टन अधिक है.
कपास का उत्‍पादन 336.60 लाख गांठ (प्रति 170 किग्रा की गांठ) अनुमानित है, जो पिछले वर्ष के कपास उत्‍पादन की तुलना में 25.42 लाख गांठें अधिक है. पटसन एवं मेस्‍ता का उत्‍पादन 93.92लाख गांठ (प्रति 180 किग्रा की गांठ) अनुमानित है.

वैज्ञानिक तरीके से करें रामदाना की उन्नत खेती

पोषक तत्वों से भरपूर रामदाना को कौन नहीं जानता है. रामदाना में 12-15 फीसदी प्रोटीन, 6-7 वसा, फीनाल्स- 0.045-0.068 फीसदी एवं एंटीऔक्सीडेंट डीपीपीएच 22.0-270 फीसदी पाया जाता है. इसीलिए शरीर को स्वस्थ्य रखने के लिए रामदाने के दाने से लइया और लड्डू बनाया जाता है, जो खाने में कुरकुरा व बेहद स्वादिष्ठ होता है. इसलिए यह सब के लिए प्यारा खाद्य प्रदार्थ माना जाता है.

रामदाना की खेती दाना प्राप्त करने व पशुओं के लिए चारा प्राप्त करने के लिए की जाती है. इन की खेती रबी व खरीफ दोनों ही सीजन में की जाती है. यह गरम एवं नम जलवायु की फसल है. कम वर्षा वाले क्षेत्रों में रामदाना की खेती भरपूर मात्रा में की जाती है.

रामदाना की खेती के लिए भारत में जम्मूकश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, तमिलनाडु, बिहार, गुजरात, पूर्वी उत्तर प्रदेश व बगांल प्रमुख रूप से जाना जाता है. रामदाना की खेती संयुक्त फसल के रूप में भी बेहद सफल रही है.

रामदाना की खेती के लिए दोमट, बलुई दोमट व उचित जलनिकासी वाली मिट्टी ज्यादा उपयुक्त होती है. रामदाना की बोआई करने से पहले खेत की जुताई मिट्टी पलटने वाले हल या हैरो से कर के सितंबर माह में पाटा लगा कर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए.

बीज का चयन

रामदाना की बोआई के लिए खेत की तैयारी करने के साथ ही उन्नतशील व अधिक उत्पादन वाले बीज का चयन भी कर लेना जरूरी होता है. रबी सीजन की बोआई के लिए रामदाना की 3 उन्नतिशील प्रजातियों खेती के लिए योग्य पाई गई है.

पहली, जीए-1- रामदाना की किस्म 110-115 दिन में पक कर तैयार होती है. पौधे की ऊंचाई 200-200 सैंटीमीटर होती है. इस किस्म की बाली का रंग हरा एवं पीला होता है. उपज 20-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

दूसरी, जीए- 2- रामदाना की किस्म कम समय में पक कर तैयार होती है. इस की फसल तैयार होने में 98-102 दिन का समय लगता है. इस के पौधे 180-190 सैंटीमीटर व उपज 23-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पाई जाती है जबकि तीसरी को तैयार होने में 105-110 दिन का समय लगता है. इस के पौधों की लंबाई 200-205 सैंटीमीटर व उपज 20-22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

रामदाना की इन प्रजातियों की बोआई का उपयुक्त समय सितंबर के आखिरी सप्ताह से नवंबर का प्रथम सप्ताह तक होता है.

रामदाना के बीजों की खेत में बोआई करने से पहले बीज की मात्रा एवं उपचार सुनिश्चित वजन 8 ग्राम होता है. इसलिए एक हेक्टेयर में मात्र 1 किलोग्राम बीज ही बोआई के लिये पर्याप्त होता है. बीज को बोआई के पहले 2-2.5 ग्राम थीरम में प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित कर लेना चाहिए.

रामदाना की बोआई विधि

रामदाना की बोआई 2 विधियों से की जाती है. पहली छिटकवां विधि से, जिस में बीज को छिटक कर पाटा चला दिया जाता है. इस विधि में फसल के दानों के कमजोर होने की शंका बनी रहती है. वहीं दूसरी विधि में रामदाना की बोआई लाइन से की जाती है. इस में लाइन से लाइन की दूरी 45 सैंटीमीटर व पौधे से पौधे की दूरी 15 सैंटीमीटर रखते हैं. इस विधि से रामदाना की फसल अच्छी व दाने मोटे होते हैं.

खाद एवं उर्वरक

रामदाना की बोआई के समय नाइट्रोजन 30 किलोग्राम, फासफोरस 40 किलोग्राम व पोटाश 20 किलोग्राम की मात्रा की आवश्यकता पड़ती है. इस के बाद नाइट्रोजन की 15-15 किलोग्राम मात्रा 2 बार में रामदाना की फसल को देनी चाहिए.

निराईगुड़ाई एवं सिंचाई

रामदाना फसल की सिंचाई जरूरत होने पर अवश्य देनी चाहिए. इस के अलावा फसल में फल आने के पहले हलकी सिंचाई जरूरी होती है. फसल की उचित बढ़वार व अच्छी उपज के लिए बोआई के 20-25 दिन बाद एक बार निराईगुड़ाई आवश्यक होती है. इस के अलावा पौधे की उचित बढ़वार के लिए 2 बार सिंचाई व गुड़ाई करनी चाहिए.

कीट एवं बीमारियों का नियंत्रण

रामदाना की फसल में आमतौर पर कीट व बीमारियों का प्रकोप नहीं होता है. रामदाना की फसल में ब्लास्ट झोका व ब्लास्ट सड़न का प्रकोप होता है. इस के नियंत्रण के लिए डाइथेन जेड 78 व 0.05 फीसदी बाविस्टीन के घोल का छिड़काव करना चाहिए.

कटाईमड़ाई व भंडारण

प्रगतिशील किसान प्रवींद्र राय का कहना है कि जब रामदाना की पत्तियां व फसल पीली पड़ जाए, तो फसल की कटाई कर उस की मड़ाई कर लें. इस के बाद दानों को 2 घंटे धूप में सुखा कर उस का भंडार किसी शुष्क स्थान पर कर देना चाहिए.

जुलाई महीने  के खेती से जुड़े जरूरी काम

खरीफ की खेती के नजरिए से सब से अहम खेती धान की होती है. जो किसान धान की नर्सरी समय से डाल चुके होते हैं, वह धान की रोपाई जुलाई के पहले हफ्ते से शुरू कर सकते हैं. देर से नर्सरी डालने वाले किसान नर्सरी में पौधों के 20 से 30 दिन के हो जाने पर ही रोपाई करें.

धान की शीघ्र पकने वाली प्रजातियों की रोपाई जुलाई के दूसरे पखवाड़े तक की जा सकती है. जिन किसानों ने कालानमक धान, बासमती जैसी सुगंधित प्रजातियों की नर्सरी डाली है, वह रोपाई का काम जुलाई महीने के अंत तक निबटा लें.

धान के पौधों की रोपाई के समय यह ध्यान रखें कि कतार से कतार की दूरी 20 सैंटीमीटर रखी जाए और एक जगह पर एकसाथ 2 से 3 पौधे लगाएं.

जिन किसानों ने ढैंचा की फसल बो रखी है, वह रोपाई के 3 दिन पूर्व ही उसे मिट्टी पलटने वाले हल से पलट कर सड़ने के लिए खेत में पानी भर दें.

खेत में उर्वरक का प्रयोग मिट्टी जांच के आधार पर ही करें. जिन किसानों ने खेत की मिट्टी की जांच नहीं करवाई है, वे अधिक उपज वाली फसलों में रोपाई के पहले प्रति हेक्टेयर की दर से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन के साथ 60 किलोग्राम फास्फेट व 60 किलोग्राम पोटाश को लेव लगाते समय खेत में मिला दें.

धान की रोपाई से पहले 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से जिंक सल्फेट खेत में जरूर मिलाएं, लेकिन यह ध्यान रखें कि फास्फोरस वाले उर्वरक के साथ जिंक सल्फेट कभी न मिलाएं.

जब भी खेत में दानेदार रसायनों का प्रयोग करें, तो उस के पूर्व यह पक्का कर लें कि खेत में 2 से 3 सैंटीमीटर पानी भरा हो.

अगर किसान धान की फसल में नैनो यूरिया का प्रयोग करते हैं, तो उर्वरकों पर लागत में काफी कमी लाई जा सकती है.

किसान को अगर खेत में खैरा रोग का प्रकोप दिखाई पड़े, तो प्रति हेक्टेयर 20 से 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट व ढाई किलोग्राम चूने को 800 लिटर पानी में मिला कर घोल बना लें और इस घोल का छिड़काव रोगग्रस्त फसल पर करें.

जिन किसानों ने मक्के की बोआई समय से कर दी हो, वह बोने के 15 दिन बाद फसल की पहली निराईगुड़ाई का काम पूरा करें. इसी के साथ दूसरी गुड़ाई फसल के 30 से 35 दिन के हो जाने पर करें.

मक्के की पौध जब घुटने के बराबर हो जाए, तो पौधों को 40 किलोग्राम नाइट्रोजन यानी 87 किलोग्राम यूरिया कतारों के बीच में डालें.

ज्वार की बोआई का काम किसान जुलाई महीने की 15 तारीख तक निबटा लें. एक हेक्टेयर खेत के लिए ज्वार की 10 से 15 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है.

ध्यान रखें कि ज्वार के बीज की कतार से कतार की दूरी 45 सैंटीमीटर व बीज की दूरी 15 से 20 सैंटीमीटर पर की जाए.

बाजरा की खेती करने वाले किसान उन्नत प्रजातियों के बीज का प्रयोग करें. इस में आईसीएमवी-155, डब्ल्यूसीसी-75, राज-171, पूसा-322, पूसा-23 और आईसीएमएच-451 जैसी किस्मों का चयन करें.

बाजरे की बोआई 15 जुलाई के बाद से पूरे महीने की जा सकती है. इस के लिए एक हेक्टेयर में 4-5 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है.

जो किसान मूंग और उड़द की खेती करते हैं, उस के लिए जुलाई का महीना उपयुक्त माना जाता है. इस के लिए एक हेक्टेयर खेत में 12 से 15 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है.

उड़द या मूंग को खेत में बोने के पूर्व राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना न भूलें. बीज को खेत में बोते समय 15 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फेट और 20 किलोग्राम गंधक का प्रयोग करें.

जिन किसानों ने अरहर बो दी है, वे बोआई के 20 से 30 दिन बाद फसल की निराईगुड़ाई कर के खरपतवार निकाल दें.

जिन किसानों ने अभी तक अरहर नहीं बोई है, वे जुलाई महीने के पहले सप्ताह तक बोआई का काम निबटा लें. इस की अगेती उन्नत प्रजातियां पारस, टाइप-21, पूसा-992, उपास-120, वहीं देर से पकने वाली प्रजातियां पूसा-9, नरेंद्र अरहर-1, आजाद अरहर-1, मालवीय विकास और मालवीय चमत्कार हैं.

अरहर को खेत में बोने से पहले बीज को 2 ग्राम थीरम या एक ग्राम कार्बंडाजिम से प्रति किलोग्राम बीज की दर से शोधित कर लेना चाहिए.

बीज को खेत में बोने से पूर्व ही राइजोबियम कल्चर के एक पैकेट को 10 किलोग्राम बीज को शोधित कर के बोआई कर देनी चाहिए.

सोयाबीन की बोआई के लिए जुलाई के दूसरे सप्ताह तक का समय उपयुक्त होता है. बीज को खेत में बोने के पूर्व उसे राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना न भूलें. इस की उन्नत किस्में जेएस-335, जेएस-93-05, जेएस- 95-60, एनआरसी-86, पूसा-16, पूसा-20, पीके-416 है.

जो किसान मूंगफली की खेती करते हैं, वह बोआई का काम जुलाई महीने के पहले हफ्ते तक पूरा कर लें. इस की उन्नत किस्में एचएनजी-10, गिरनार-2, प्रकाश, अंबर, उत्कर्ष, टीजी-37, जीजी-14 व 21, एचएनजी-69 व 123, राज मूंगफली-1, टीबीजी-39, प्रताप मूंगफली-1 व 2, जेजीएन-3 व 23, एके-159, जीजी-8 आदि हैं.

जिन किसानों ने गन्ने की फसल ले रखी है, वह फसल में मिट्टी चढ़ाने का काम पूरा कर लें. वहीं सूरजमुखी की खेती करने वाले किसान बोआई का काम इस महीने के दूसरे हफ्ते तक निबटा लें. सूरजमुखी के पौधे जब 15-20 दिन के हो जाएं, तो फालतू पौधों को निकाल कर पौधों की दूरी लगभग 20 सैंटीमीटर तक कर दें.

जो किसान पशुपालन से जुड़े हुए हैं, वे चारे के लिए लोबिया, ग्वार, मक्का, ज्वार, बाजरा व बहुकटाई वाली चरी की बोआई कर लें.

जुलाई के महीने में बैगन, मिर्च और अगेती फूलगोभी की रोपाई की जा सकती है. ठंड में ली जाने वाली टमाटर की फसल के लिए बैड बना कर नर्सरी डालें.

खरीफ सीजन के लिए बोए जाने वाले प्याज के लिए प्रति हेक्टेयर की दर से 12 से 15 किलोग्राम बीज का प्रयोग करते हुए 10 जुलाई तक नर्सरी डाल दें.

जो किसान साग की खेती करते हैं, वे चौलाई की बोआई पूरे महीने कर सकते हैं. एक हेक्टेयर में चौलाई के 2-3 किलोग्राम  बीज की जरूरत पड़ती है.

जिन किसानों ने भिंडी की बोआई जून महीने में कर दी है, वे फसल में 76 से 87 किलोग्राम की दर से यूरिया दें. बरसात वाली भिंडी की बोआई जुलाई महीने में की जा सकती है.

सब्जी की खेती करने वाले लौकी, खीरा, चिकनी तोरई, करेला, टिंडा की बोआई कर सकते हैं.

जिन किसानों ने लतावर्गीय सब्जियों की बोआई जून महीने में कर दी हो, वे बरसात के पानी से फसल को होने वाले नुकसान से मचान बना कर सहारा दें.

जिन किसानों ने अदरक और हलदी की फसल ले रखी है, वे बोआई के 40 दिन बाद प्रति हेक्टेयर की दर से हलदी में 87 किलोग्राम व अदरक में 54 किलोग्राम यूरिया दें. वहीं सूरन की फसल लेने वाले किसान जुलाई महीने में फसल की बोआई के 60 दिन बाद 130 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से यूरिया दें.

जुलाई का महीना कुंदरू की रोपाई के लिए उपयुक्त होता है. इस की रोपाई पौध से पौध और कतार से कतार की दूरी 3 मीटर रखते हुए करनी चाहिए. कुंदरू में नर और मादा अलगअलग होते हैं, इसलिए भरपूर उपज के लिए 9 मादा पौधों के बीच में एक नर पौध जरूर लगाएं.

जुलाई का महीना फलदार पौधों की रोपाई के लिए सब से मुफीद होता है. इस महीने में आम, अमरूद, लीची, आंवला, कटहल, नीबू, जामुन, बेर, केला, पपीता की रोपाई की जा सकती है.

जो किसान नर्सरी का व्यवसाय करना चाहते हैं, वे लीची और नीबू में गूटी बांध सकते हैं.

जिन किसानों ने गुलाब की फसल ले रखी है, वे फसल से वर्षा जल निकास का उचित प्रबंध कर लें. रजनीगंधा की खेती करने वाले किसान फसल से खरपतवार निकाल कर पोषक तत्त्वों के घोल का छिड़काव करें. इसी के साथ ही समयसमय पर रजनीगंधा के पुष्प डंडियों की तुड़ाई का काम पूरा कर लें.

जो किसान औषधीय और सगंध पौधों की खेती करना चाहते हैं, वे औषधीय गुणों से भरपूर लैमनग्रास की खेती कर सकते हैं. लैमनग्रास की एक बार फसल लगाने के बाद किसान 4-5 साल तक पैदावार ले सकते हैं. इस के अलावा सतावर की रोपाई भी जुलाई महीने में की जाती है.

किसान कई गुणों से भरपूर ब्राह्मी की रोपाई भी जुलाई महीने में कर सकते हैं. इस का उपयोग कब्ज, गठिया, रक्तशुद्धी, दिमाग को तेज करने व याददाश्त को बढ़ाने में बहुतायत होता है. इस से कैंसर, एनीमिया, दमा, किडनी और मिरगी जैसी बीमारियों के इलाज के लिए दवाएं भी बनाई जाती हैं.

जो किसान कौंच की खेती करना चाहते हैं, वे इस के बीजों की बोआई 15 जुलाई तक जरूर कर दें. इस के लिए प्रति एकड़ 6 से 8 किलोग्राम की दर से बीज की आवश्यकता होती है.

इसी के साथ एलोवेरा की रोपाई के लिए सब से मुफीद समय जुलाई से अगस्त माह का होता है. इस मौसम में रोपाई करने से पौधे पूरी तरह जीवित रहते हैं और बढ़वार अच्छी होती है.

पशुपालक अपने पशुओं को गलघोंटू और लंगडि़या बुखार का टीका जरूर लगवा लें. इसी के साथ ही पशुओं को पीत में कीड़े मारने की की दवा खिलाएं.

पशुओं के चारे में खडि़या मिलाना सुनिश्चित करें. बरसात के महीने में लगने वाली सीलन से अपने मुरगेमुरगियों को बचाने का उचित प्रबंध करें. साथ ही, मुरगीखाने में रोशनी की उचित व्यवस्था करें.

संभागीय किसान महोत्सव में एमपीयूएटी :  किसानों के महाकुंभ में बही एमपीयूएटी की ज्ञानगंगा

उदयपुर : 26 जून 2023. उदयपुर के बलीचा स्थित कृषि उपज मंडी सबयार्ड में आयोजित 2 दिवसीय संभाग स्तरीय किसान महोत्सव का आगाज धूमधाम से हुआ. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस किसान महोत्सव का उद्घाटन किया. संभाग स्तरीय किसानों के महाकुंभ में महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की 20 से अधिक स्टाल लगाई गई, जिन पर विश्वविद्यालय में विकसित नवीनतम कृषि तकनीकों से संभाग भर से आए किसानों को रूबरू करवाया गया.

मेला स्थल पर उपस्थित कृषि विश्वविद्यालय एमपीयूएटी के कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने बताया कि विश्वविद्यालय की विभिन्न इकाइयों में संचालित कृषि अनुसंधान परियोजनाओं मुख्यतः भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा प्रायोजित अखिल भारतीय समन्वित कृषि अनुसंधान परियोजनाओं, जिन में मुख्यतः मशरूम उत्पादन एवं अनुसंघान, खरपतवार नियंत्रण, जैविक खाद, जैविक खेती, जैविक कीटनाशक, मोटे अनाजों पर संचालित परियोजना, विभिन्न प्रकार की कंदीय फसलों, गेहूं, जो, मूंगफली, ज्वार, मक्का, बीजीय फसलों, उद्यानिकी फसलों, फूलों की खेती, कृषि अभियांत्रिकी, मृदा एवं जल संरक्षण अभियांत्रिक, रोबोटिक्स, आभासी तकनीकी, इंटरनेट औफ थिंग्स, सेंसर आधारित खेती, समन्वित खेती पद्धति, कृषि यांत्रिकी विभाग एवं परियोजना में विकसित अनेक कृषि यंत्रों का प्रर्दशन, सामुदायिक विज्ञान और कृषक महिला विकास से संबंधित परियोजनाओं, कटाई के उपरांत खाद्य प्रसंस्करण प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय ऊर्जा, सोलर ऊर्जा चालित विभिन्न यंत्रों, सोलर चालित पंप, साइकिल, सोलर ड्रायर इत्यादि तकनीकों का विस्तृत प्रर्दशन किया गया.

इस अवसर पर एमपीयूएटी में विकसित विभिन्न पशु नस्लों प्रतापधन मुरगी, बकरी की नस्लें, खरगोश, बटेर व मछलीपालन स्टाल में मछली की विभिन्न खाने योग्य और रंगीन मछलियां की पालन योग्य प्रजातियों का प्रदर्शन किया गया, जिस में विभिन्न उम्र के किसानों ने विशेष रुचि दिखाई.

प्रसार शिक्षा निदेशक डा. आरए कौशिक ने बताया कि किसानों ने विश्वविद्यालय द्वारा विकसित विभिन्न फसलों के बीज की किस्में लगाने के लिए अपनी रुचि दिखाई है. अनुसंधान निदेशक अरविंद वर्मा ने बताया कि एमपीयूएटी की विभिन्न अनुसंधान तकनीकों को जानने एवं अपनाने में किसानों की रुचि देखी गई. दिनभर इन स्टालों पर किसानों का रेला लगा रहा. किसानों के विभिन्न सवालों के जवाब कृषि वैज्ञानिकों ने मौके पर ही दिए और इस अवसर पर सवालजवाब के लिए विशेष रुप से आयोजित जाजम चौपाल में विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों ने कृषि, पशुपालन, मछलीपालन, बीज उत्पादन, फसल संरक्षण, जैविक खेती, फसल संरक्षण कीट व्याधि नियंत्रण और उद्यानिकी फसलों से संबंधित विभिन्न सवालों के जवाब दे कर किसानों को संतुष्ट किया.

नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन-इंडिया के साथ मिल कर नवाचारों पर काम करेगी एमपीयूएटी

उदयपुर : महाराणा प्रताप यूनिवर्सिटी औफ एग्रीकल्चर एंड टैक्नोलौजी और नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन-इंडिया (एनआईएफ) ने एक समझौता ज्ञापन में प्रवेश किया है. एनआईएफ विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के तहत एक स्वायत्त निकाय है, जिस का कार्यालय गांधीनगर, गुजरात में है.

यह जमीनी तकनीकी नवाचारों और उत्कृष्ट पारंपरिक ज्ञान को मजबूत करने के लिए भारत की राष्ट्रीय पहल है. इस का मिशन जमीनी तकनीकी नवप्रवर्तकों के लिए नीति और संस्थागत स्थान का विस्तार कर के भारत को एक रचनात्मक और ज्ञान आधारित समाज बनने में मदद करना है.

एमपीयूएटी कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने बताया कि इस समझौता ज्ञापन के माध्यम से दोनों संस्थान शैक्षणिक और अनुसंधान सहयोग के माध्यम से एक समावेशी नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने के लिए सहयोग करने पर सहमत हुए हैं. इस समझोते से छात्रों और विश्वविद्यालय की फैकल्टी को समाज के लिए उपयोगी नवीन परियोजनाओं पर काम करने (मूल्यवर्धन और सत्यापन) का अवसर मिलेगा.

एमपीयूएटी की फैकल्टी और छात्र अपने नवाचारों को विपणन योग्य समाधानों में बदलने के लिए जमीनी स्तर और छात्र नवप्रवर्तकों को अपना परामर्श व समर्थन प्रदान करेंगे. एनआईएफ में अनुसंधान कार्य करने के लिए छात्रों/शोधकर्ताओं का आदानप्रदान जमीनी स्तर के उत्पादों के सत्यापन और मूल्यवर्धन से संबंधित अनुसंधान और/या समाज की अपूर्ण जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रौद्योगिकियों के विकास के लिए किया जा सकता है.

डा. अरविंद सी. रानाडे, निदेशक, एनआईएफ और सुधांशु सिंह, रजिस्ट्रार, एमपीयूएटी, उदयपुर ने कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक, प्रो. महेश कोठारी, निदेशक योजना और विस्तार, प्रो. पीके सिंह, अधिष्ठाता सीटीएई, डा. सांवल सिंह मीना, विभागाध्यक्ष और वरिष्ठ संकाय सदस्य की उपस्थिति में समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए.

कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक, डा. अरविंद सी. रानाडे और सुधांशु सिंह ने उल्लेख किया कि समाज और राष्ट्र निर्माण के लिए सहयोग को सर्वोत्तम स्तर तक पहुंचाने के लिए प्रत्येक संस्थान का पूर्ण सहयोग दिया जाएगा.