किसानों को मिले उन्नत तकनीकों का प्रशिक्षण

जयपुर : शासन सचिव, कृषि एवं उद्यानिकी, राजन विशाल ने पिछले दिनों दुर्गापुरा स्थित इंटरनैशनल हौर्टिकल्चर इनोवेशन एंड ट्रेनिंग सैंटर (आईएचआईटीसी) का दौरा किया. उन्होंने अधिकारियों को इस ट्रेनिंग सैंटर में ज्यादा से ज्यादा किसानों को उन्नत तकनीकी का कृषि प्रशिक्षण देने के लिए कहा.

राजन विशाल ने किसानों के प्रशिक्षण के दौरान प्रायोगिक प्रशिक्षण प्रदान किए जाने के लिए संस्थान के फल वृक्ष क्षेत्र, संरक्षित खेती, सब्जी उत्पादन, नर्सरी, ड्रिप इरिगेशन आदि गतिविधियों का निरीक्षण किया. उन्होंने आईएचआईटीसी के कैंपस,  छात्रावास, प्रयोगशाला आदि सभी जगहों का बारीकी से निरीक्षण किया और संस्थान की साफसफाई एवं मेंटेनेंस के आवश्यक दिशानिर्देश प्रदान किए.

शासन सचिव राजन विशाल ने प्रशिक्षण में किसानों की संख्या को बढ़ाने व पूरा ट्रेनिंग प्लान तैयार रखने के लिए अधिकारियों को निर्देशित किया. साथ ही, संस्थान में हाइड्रोपोनिक्स की स्थापना के लिए भी कहा. हाइड्रोपोनिक प्रणाली मिट्टी के बजाय पानी आधारित पोषक घोल का उपयोग कर के पौधे उगाने की तकनीक है. हाइड्रोपोनिक उत्पादन प्रणाली का प्रयोग छोटे किसानों और वाणिज्यिक उद्यमों द्वारा किया जाता है.

इस के बाद शासन सचिव राजन विशाल ने कर्ण नरेंद्र विश्वविद्यालय के संगठन संस्थान राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान, दुर्गापुरा, जयपुर में स्थित समन्वित कृषि प्रणाली क्षेत्र का दौरा किया. यह समन्वित कृषि प्रणाली डेढ़ हेक्टेयर कृषि जोत के लिए राजस्थान के सिंचित क्षेत्र के किसानों की पोषण उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए विकसित की गई है. इस समन्वित कृषि प्रणाली क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की फसल पद्धतियां, उद्यानिकी फल एवं सब्जियां, डेयरी यूनिट, बकरी यूनिट, पोल्ट्री यूनिट, अजोला यूनिट, वर्मी कंपोस्ट यूनिट और गोबर खाद यूनिट है.

समन्वित कृषि प्रणाली के मुख्य सस्य वैज्ञानिक डा. उम्मेद सिंह ने किसानों के लिए सालभर आय का अच्छा स्रोत होने एवं किसान के परिवार के लिए पोषणयुक्त भोजन जैसे फल, सब्जी, अनाज, दाल, मोटे अनाज, तिलहन, पशुओं के लिए चारा एवं इस से जनित अपशिष्ट के सदुपयोग के लिए वर्मी कंपोस्ट, गोबर की खाद इत्यादि के रूप में प्रयोग करने से मिट्टी की  सेहत में सुधार एवं बाहरी उर्वरकों पर निर्भरता कम करने की जानकारी दी.

विश्वविद्यालय के कुलपति बलराज सिंह ने कृषि विश्वविद्यालय एवं दुर्गापुरा में संचालित विभिन्न कृषि अनुसंधान योजनाओं की जानकारी दी.

इस दौरान आयुक्त उद्यानिकी सुरेश कुमार ओला, अतिरिक्त निदेशक कृषि (रसायन), एचएस मीना, संयुक्त निदेशक कृषि (रसायन) अजय कुमार पचौरी, संयुक्त निदेशक उद्यान महेंद्र कुमार शर्मा, संयुक्त निदेशक कृषि (गुण नियंत्रण) गजानंद यादव, उपनिदेशक, उद्यान (आईएचआईटीसी) राजेश कुमार गुप्ता सहित विभागीय अधिकारी उपस्थित रहे.

वैज्ञानिक तरीके से सिंचाई एवं खाद प्रबंधन से फसल उत्पादन में वृद्धि

बड़वानी : कृषि विज्ञान केंद्र, बड़वानी द्वारा कृषि आदान विक्रेताओं के एकवर्षीय डिप्लोमा कार्यक्रम (देसी) के अंतर्गत प्रशिक्षण कार्यक्रम के प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रमुख डा. एसके बड़ोदिया के मार्गदर्शन में केंद्र के सभागार में आयोजित किया गया. इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि एवं प्रमुख वक्ता के रूप में अधिष्ठाता बीएम कृषि महाविद्यालय खंडवा के डा. डीएच रानाडे द्वारा भागीदारी की गई.

सर्वप्रथम अधिष्ठाता डा. डीएच रानाडे ने कहा कि छोटीछोटी सावधानियां एवं प्रबंधन कार्य कर के फसल उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है जैसे अपने खेत की मिट्टी के अनुसार फसल का चयन, उपयुक्त प्रजाति का चुनाव, सिंचाई एवं उर्वरक का समुचित प्रबंधन कर 30-40 फीसदी तक उत्पादन में वृद्धि लाई जा सकती है.

अगर फसल में ड्रिप सिचांई पद्धति से सिंचाई की जाए व उचित उर्वरक प्रबंधन किया जाए, तो फसल में अच्छा उत्पादन देखा गया है. इस अवसर पर उन्होंने कहा कि हमें जल प्रबंधन की शुरुआत कृषि क्षेत्र से करनी चाहिए, क्योंकि सर्वाधिक मात्रा में कृषि कार्यों में ही जल का उपयोग किया जाता है और सिंचाई में जल का दुरुपयोग एक गंभीर समस्या है, जनमानस में धारणा है कि अधिक पानी, अधिक उपज, जो कि गलत है, क्योंकि फसलों के उत्पादन में सिंचाई का योगदान 15-16 फीसदी होता है. फसल के लिए भरपूर पानी का मतलब मात्र मिट्टी में पर्याप्त नमी ही होती है, परंतु वर्तमान कृषि पद्धति में सिंचाई का अंधाधुंध इस्तेमाल किया जा रहा है. धरती के गर्भ से पानी की आखिरी बूंद भी खींचने की कवायद की जा रही है.

देश में हरित क्रांति के बाद से कृषि के जरीए जल संकट का मार्ग प्रशस्त हुआ है. बूंदबूंद सिंचाई यानी बौछार (फव्वारा तकनीकी) और खेतों के समतलीकरण से सिंचाई में जल का दुरुपयोग रोका जा सकता है. फसलों के जीवनरक्षक या पूरक सिंचाई दे कर उपज को दोगुना किया जा सकता है.

जल उपयोग क्षमता बढ़ाने के लिए पौधों को संतुलित पोषक तत्वों को प्रबंध करने की आवश्यकता है, जल की सतत आपूर्ति के लिए आवश्यक है कि भूमिगत जल का पुनर्भरण किया जाए, खेतों के किनारे फलदार पेड़ लगाने चाहिए, छोटेबड़े सभी कृषि क्षेत्रों पर क्षेत्रफल के हिसाब से तालाब बनाने जरूरी हैं. रासायनिक खेती की बजाय जैविक खेती पद्धति अपना कर कृषि में जल का अपव्यय रोका जा सकता है. ऊंचे स्थानों, बांधों इत्यादि के पास गहरे गड्ढ़े खोदे जाने चाहिए, जिस से उन में वर्षा का जल एकत्रित हो जाए और बह कर जाने वाली मिट्टी को अन्यत्र जाने से रोका जा सके.

कृषि भूमि में मिट्टी की नमी को बनाए रखने के लिए हरित खाद और उचित फसल चक्र अपनाया जाना चाहिए. कार्बनिक अवशिष्टों को प्रयोग कर इस नमी को बचाया जा सकता है. वर्षा जल को संरक्षित करने के लिए शहरी मकानों में आवश्यक रूप से वाटर टैंक लगाए जाने चाहिए. इस जल का उपयोग अन्य घरेलू जरूरतों में किया जाना चाहिए. जल का संरक्षण करना वर्तमान समय की जरूरत है.

इस अवसर पर डा. रानाडे द्वारा केंद्र की प्रदर्शन इकाइयों बकरीपालन, मुरगीपालन, केंचुआ खाद इकाई, अजोला इकाई, डेयरी आदि का अवलोकन कर प्रशंसा व्यक्त की.

खेती में पानी की बचत करते सिंचाई उपकरण (Irrigation Equipment)

हमारे देश में सिंचाई के लिए टपक सिंचाई एक ऐसा तरीका है जिस में धीरेधीरे बूंदबूंद कर के पानी फसलों की जड़ों में पहुंचाया जाता है. बूंदबूंद कर के पानी पौधों तक प्लास्टिक के पाइपों के जरीए पहुंचता है. इस पाइप में जगहजगह छेद होते हैं.

इस तकनीक का सब से पहले इस्तेमाल इजरायल में किया गया था इसलिए इस को इजरायली तकनीक से सिंचाई भी कहा जाता है.

सिंचाई के दौरान खेत में उर्वरकों का घोल के रूप में इस तरीके से इस्तेमाल किया जाता जिस से उर्वरक सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है.

यह सिंचाई उन इलाकों के लिए बहुत ही उम्दा है जहां पानी की कमी है और खेती की जमीन भी समतल नहीं है.

इस टपक सिंचाई में चूंकि पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है, इस से पानी की बरबादी भी नहीं होती और फसल में सामान्य से अधिक पैदावार मिलती है.

लाइन में बोई गई फल और सब्जी की फसलों के लिए टपक सिंचाई खास उपयोगी है. लंबी दूरी पर बोई गई फसलों के लिए यह तकनीक फायदेमंद है. सेब, संतरा, नीबू, केला, अमरूद, अनार वगैरह और टमाटर, बैगन, खीरा, ककड़ी, कद्दू, फूलगोभी, बंदगोभी, भिंडी वगैरह सब्जी आदि फसलों के लिए यह विधि खास है.

टपक सिंचाई कंपनी

अत्याधुनिक तकनीक से बनी और सभी तरह की फसलों के लिए अनुकूल नेटाफिम ड्रिप सिंचाई तकनीक आजकल किसानों द्वारा काफी पसंद की जा रही है. आज देश में 3 लाख हेक्टेयर से भी ज्यादा क्षेत्र पर नेटाफिम ड्रिप सिंचाई तकनीक से सिंचाई की जा रही है.

ड्रिप लाइन : आधुनिक तकनीक से बनी नेटाफिम ड्रिप लाइन को बनाने का काम भारतीय खेती की जरूरतों को ध्यान में रख कर किया गया है. ड्रिप लाइन के हर ड्रिपर में फिल्टर होता है जो ड्रिप में कचरा जमा नहीं होने देता. जमीन व फसल की जरूरत के मुताबिक ड्रिपर के बीच की दूरी 20, 30, 40, 50, 60, 75 व 90 सैंटीमीटर और ड्रिपर 1, 2 या 3 लिटर पानी प्रति घंटा जल प्रवाह में उपलब्ध है. यह सभी प्रकार की सब्जियों, गन्ना, कपास, फूलों की खेती और सघन बागबानी के लिए उपयुक्त है.

सिंचाई उपकरण (Irrigation Equipment)

ड्रिप नेट पीसी (प्रवाह नियंत्रित ड्रिप लाइन) : इजरायली तकनीक से बनी यह ड्रिप लाइन प्रेशर नियंत्रित करते हुए समान बहाव से ऊंचीनीची जमीन पर सिंचाई करती है.

कूल नेट प्रो (फोगर) : यह 80 से 90 माइक्रोन आकार के बेहद सूक्ष्म जलबिंदुओं का वातावरण में छिड़काव करता है जिस से तापमान कम करने व आद्रता (नमी) बढ़ाने में मदद मिलती है. इस में एंटी वाल्व लगा होने से फोगर चलाने से पहले और बाद में पानी नहीं टपकता है. इस का इस्तेमाल ग्रीनहाउस, पोल्ट्री और डेरी में तापमान कम करने के लिए किया जाता है.

गायरोनेट (मायक्रो स्प्रिंकलर्स) : यह 20 से 140 लिटर पानी प्रति घंटा प्रवाह दर में मौजूद है. इस का इस्तेमाल नर्सरी व बागबानी में किया जा सकता है. अदरक, सब्जियों और स्ट्राबेरी में खास तापमान नियंत्रण करने के लिए भी यह उपयोगी है.

डी नेट (मिनी स्प्रिंकलर) : यह अपनी श्रेणी के सभी मिनी स्प्रिंकलर में खास है. इस का इस्तेमाल खुले खेत की सभी फसलों, सब्जियों और बागबानी में किया जा सकता है. इस का पानी बिखराव पूरे खेत में एकसमान है.

एनएमसी (आटोमेशन कंट्रोलर) : नेटाफिम आटोमेशन में कंट्रोलर्स उच्च तकनीकी और विस्तृत संचालन में सहायक है. इस श्रेणी में 2 मौडल एनएमसी प्रो और एनएमसी जूनियर मौजूद हैं.

डिजिटल तंत्र ज्ञान पर आधारित ये कंट्रोलर्स एक ही जगह से अनेक जगहों पर स्थित वाल्वों को संचालित करते हैं. एनएमसी प्रो में सिंचाई, खाद और वातावरण नियंत्रक है. एनएमसी जूनियर सिंचाई और खाद नियंत्रक है.

डिस्क फिल्टर : इस का इस्तेमाल सिंचाई करते समय पानी में घुलनशील खाद को देने में किया जाता है. डिस्क फिल्टर के पूरी तरह से प्लास्टिक के बने होने के कारण इस में जंग नहीं लगता है.

इस के इस्तेमाल से जरूरी खाद एकसमान मात्रा में दिया जा सकता है. यह पंप ड्रिप सिंचाई तकनीक में एसिड और क्लोरीन ट्रीटमैंट के लिए भी उपयोगी है.

फर्टिलाइजर पंप (वेंचूरी) : इस यंत्र का इस्तेमाल भी घुलनशील खाद को पानी में मिला कर पाइपों के जरीए पौधों तक पहुंचाने के लिए किया जाता है.

दी जाने वाले सेवाएं

बढि़या डिजाइन : फसल की जरूरत के मुताबिक बनाई गई ड्रिप डिजाइन, ड्रिप सिंचाई तकनीक में सही नतीजे दे सकती है. किसानों को जरूरत के मुताबिक इन्हें बनाया गया है जो अपने तजरबेकार लोगों द्वारा आप तक पहुंचाते हैं.

इस्तेमाल और रखरखाव : किसानों को संयंत्र चलाने और रखरखाव के लिए ट्रेनिंग दी जाती है. साथ ही, ड्रिप सिंचाई तकनीक के दूसरे पहलुओं की भी जानकारी दी जाती है.

कृषि विशेषज्ञ द्वारा सलाह : सही पैदावार के लिए ड्रिप सिंचाई तकनीक के साथ खेती के माहिर किसानों को सलाह भी देते हैं. पानी और खाद व्यवस्था, फसल, जमीन और पानी की मांग के बारे में खेती के माहिरों द्वारा सलाह दी जाती है.

नेटाफिम सिंचाई तकनीक के बारे में  ज्यादा जानकारी के लिए आप कंपनी के मोबाइल फोन नंबर दिल्ली, 9582596704/3, हरियाणा 8053100864/956/962, पंजाब 8054703457 और हिमाचल प्रदेश 9736544382 पर बात कर सकते हैं.

फसल बदली तो संजीव की होने लगी लाखों की कमाई

ग्वालियर : संजीव पहले धान की पारंपरिक खेती करते थे. जीतोड़ मेहनत के बावजूद उन्हें अपनी खेती से उतनी आमदनी नहीं हो पाती थी, जितनी वे उम्मीद रखते थे. ऊपर से यदि मानसून दगा दे जाए, तो उत्पादन और घट जाता है. संजीव ने फसल में बदलाव क्या किया, उन की जिंदगी ही बदल गई. प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना ने उन के जीवन में सुखद बदलाव लाने में अहम भूमिका निभाई है.

ग्वालियर जिले के भितरवार विकासखंड के ग्राम गोहिंदा के रहने वाले प्रगतिशील किसान संजीव बताते हैं कि धान की फसल में लागत ज्यादा और आमदनी कम होती थी. जब तमाम प्रयासों के बावजूद आशा के मुताबिक आमदनी नहीं बढ़ी, तब हम ने उद्यानिकी फसल की ओर कदम बढ़ाए. इस के लिए हम ने उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों से तकनीकी मदद ली. उन की सलाह पर हम ने “प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना” के तहत ड्रिप विथ मल्चिंग पद्धति से बैगन उत्पादन शुरू किया.

संजीव बताते हैं कि एक हेक्टेयर रकबे में हम ने इस पद्धति से बैगन की खेती शुरू की. इस पर लगभग एक लाख, 55 हजार रुपए की लागत आई, जिस में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत 70,000 रुपए का अनुदान भी मिला.

संजीव का कहना है कि जब हम अपने एक हेक्टेयर खेत में धान उगाते थे, तब एक लाख रुपए की लागत आती थी और हमें लगभग एक लाख, 92 हजार रुपए की आय होती थी. इस में अगर हम अपनी मेहनत जोड़ लें, तो आमदनी न के बराबर होती. अब हमें उसी एक हेक्टेयर रकबे में ड्रिप विथ मल्चिंग पद्धति से बैगन की खेती करने पर लागत निकाल कर 5 लाख रुपए की शुद्ध आमदनी हो रही है.

वे बताते हैं कि धान का उत्पादन 55 क्विंटल प्रति हेक्टेयर था, वहीं बैगन का उत्पादन 700 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो रहा है. ड्रिप विथ मल्चिंग पद्धति से बैगन उत्पादन में 2 लाख रुपए प्रति हेक्टेयर का खर्चा आता है और 7 लाख रुपए की आय होती है. इस प्रकार हमें 5 लाख रुपए की आमदनी एक हेक्टेयर रकबे से होने लगी है.

आमदनी बढ़ने से संजीव के चेहरे पर आई खुशी देखते ही बनती है. वे कहते हैं कि प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना ने हमजैसे जरूरतमंद किसानों का जीवन संवार दिया है.

फव्वारा सिंचाई (Sprinkler Irrigation) से पानी की हर बूंद पर नियंत्रण

पारंपरिक तरीकों से खेती की सिंचाई करने पर अधिक पानी बरबाद होता है. पानी की बचत व अच्छी उपज के लिए अनेक प्रकार की उन्नत सिंचाई प्रणालियां मौजूद हैं. ऐसी ही एक प्रणाली है फव्वारा सिंचाई यानी स्प्रिंक्लर प्रणाली. इस के इस्तेमाल से 25 से 50 फीसदी तक पानी की बचत की जा सकती है.

सिंचाई का तरीका

बौछारी या फव्वारा सिंचाई वह विधि है, जिस में सिंचाई जल को पंप द्वारा पाइप की सहायता से खेत तक ले जाया जाता है और दबाव द्वारा फुहारों, बारिश की बूंदों के समान सीधे फसल पर छिड़का जाता है. इस में खेतों में पाइप लाइन बिछा कर जगहजगह फव्वारे लगा दिए जाते हैं, जिन से छिड़काव द्वारा पानी खेतों के चारों तरफ फैलता है.

इस विधि में शुरुआती दौर में जरूर खर्चा आता है, लेकिन यह विधि असमतल और ज्यादा पानी सोखने वाली जमीनों और सिंचाई जल की कमी वाली जगहों के लिए बहुत ही उपयोगी है. सरकार की तरफ से फव्वारा सिंचाई संयंत्र पर किसानों को सब्सिडी भी दी जाती है.

कुछ खास पुरजे

हारवैल फव्वारा सिंचाई प्रणाली में पंप, मुख्य पाइप, सहायक पाइप, पार्श्व पाइप लाइन व स्प्रिंक्लर मुख्य भाग होते हैं. इस सिंचाई प्रणाली को सुचारु रूप से चलाने के लिए कम गहरी जगहों (8 मीटर से कम) से पानी उठाने के लिए सैंटीफ्यूगल पंप और ज्यादा गहरी जगहों से पानी उठाने के लिए टर्बाइन पंप का इस्तेमाल करते हैं. पंप को चलाने के लिए डीजल इंजन और बिजली की मोटर का इस्तेमाल किया जाता है.

हारवैल फव्वारा सिंचाई से लाभ

* पंप सैट या नहर से सिंचाई करने पर खेत तक पहुंचने में क्रमश: 20 से 50 फीसदी पानी बेकार हो जाता है, जबकि फव्वारा सिंचाई से पानी की खासी बचत होती है.

* जिन इलाकों की जमीन ऊंचीनीची होती है, उन जगहों पर बौछारी सिंचाई वरदान साबित होती है.

* इस विधि में पानी के साथ घुलनशील उर्वरक कीटनाशी और खरपतवारनाशी दवाओं का भी इस्तेमाल छिड़काव के साथ आसानी से किया जा सकता है.

* पाला पड़ने से पहले ही अगर बौछारी सिंचाई की जाए तो तापमान बढ़ जाने से फसल को पाले से नुकसान नहीं होता है.

* पानी की कमी या फिर सीमित पानी उपलब्धता वाले इलाकों में दोगुना से तिगुना ज्यादा क्षेत्रफल सतही सिंचाई की अपेक्षा कवर किया जा सकता है.

* सिंचाई के लिए नाली, मेंड़ बनाने व उन के रखरखाव की जरूरत नहीं पड़ती है. इस प्रकार कृषि जमीन, श्रम व व्यय की बचत होती है.

अधिक जानकारी के लिए हारवैल इरीगेशंस प्राइवेट लिमिटेड के फोन नंबर 011-26413370 और 011-26485365 पर संपर्क कर सकते हैं.

यों करता है काम

इस यंत्र की खासीयत है कि यह वजन में हलका, कम पानी में अधिक सिंचाई, एकसमान पानी का फैलाव और ऊंचीनीची जमीन पर इसे बिछाने में कोई परेशानी नहीं होती. इस के पाइप लचीले होते हैं, जिन्हें आसानी से लगाया जा सकता है और पाइपों में दबाव सहने की अधिक कूवत है. यह संयंत्र जंगरहित और धूप में भी बेकार नहीं होता है.

हारवैल फव्वारा संयंत्र लगाना बहुत ही आसान है. कम वजन के हारवैल पाइपों को अनफिटिंग के साथ जरूरत के हिसाब से लगाया जा सकता है. इस यंत्र के 4 श्रेणियों में पाइप आते हैं. उन के हिसाब से ही दूसरी फिटिंग्स भी साथ में मिलती हैं.

ध्यान रखने योग्य बातें

*  ज्यादा हवा होने पर खेतों में पानी सही से नहीं पहुंच पाता है.

*    पके हुए फलों को फुहारे से बचाना चाहिए.

*    पद्धति के सही उपयोग के लिए लगातार जलापूर्ति की जरूरत होती है.

*    पानी साफ हो, उस में रेत, कूड़ाकरकट न हो और पानी खारा नहीं होना चाहिए.

*    इस पद्धति को चलाने के लिए ज्यादा ऊर्जा की जरूरत होती है. चिकनी मिट्टी और गरम हवा वाले इलाकों में इस पद्धति द्वारा सिंचाई नहीं की जा सकती है.

*    यह विधि सभी तरह की फसलों की सिंचाई के लिए सही है. कपास, मूंगफली, तंबाकू, कौफी, चाय, इलायची, गेहूं, चना वगैरह फसलों के लिए यह विधि ज्यादा फायदेमंद है.

*    यह विधि बलुई मिट्टी, उथली मिट्टी, ऊंचीनीची जमीन, मिट्टी के कटाव की समस्या वाली जमीन और जहां पानी की उपलब्धता कम हो, वहां ज्यादा उपयोगी है.

कम लागत में प्राकृतिक खेती (Natural Farming) से कैसे करें अच्छी कमाई?

प्राकृतिक खेती के जरीए खेती की लागत में न केवल कमी लाई जा सकती है, बल्कि फसलों पर किए जाने वाले अंधाधुंध रसायनों के प्रयोग पर लगाम लगा कर सेहतमंद अनाज, फलसब्जियों आदि का उत्पादन भी किया जा सकता है.

प्राकृतिक खेती का सब से प्रमुख आधार है पशुपालन. क्योंकि पशुपालन से प्राप्त गोबर और गौमूत्र को मिट्टी की उत्पादन कूवत में कई गुना वृद्धि करने में सहायक माना जाता है.

गौपालन के जरीए खेती करने वाले प्रगतिशील किसान राममूर्ति मिश्रा ने अपने खेत की लागत को न केवल कम करने में सफलता पाई है, बल्कि वह जहरमुक्त खेती के जरीए लोगों की सेहत को सुधारने का काम भी कर रहे हैं.

किसान राममूर्ति मिश्रा से गौआधारित खेती को ले कर लंबी बातचीत हुई. पेश है उन से हुई बातचीत के खास अंश :

खेती की लागत में कमी लाने के साथ उसे टिकाऊ कैसे बनाएं?

खेती में प्रयुक्त रसायनों की बढ़ती कीमतों एवं घटती उत्पादकता और मानव स्वास्थ्य व पर्यावरण प्रदूषण जैसी चुनौतियों का समाधान प्राकृतिक खेती में ही संभव है. अगर किसान फसल चक्र अपनाएं, तो खेती में विविधीकरण होता है और इस से पैदावार बिना लागत बढ़ाए ही बढ़ जाती है. प्राकृतिक खेती करने पर पारिस्थितिकी में विभिन्न वनस्पतियों, जीवों व जंतुओं की विविधता अधिक होने से इन का संतुलन बना रहता है और फसलों के स्वस्थ होने पर उन में रोग व व्याधि भी नहीं लगते. साथ ही, पैदावार भी अधिक प्राप्त होती है.

अगर किसान खेती की लागत में कमी के साथ टिकाऊ बनाना चाहते हैं, तो उन्हें गौआधारित प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए आगे कदम बढ़ाना होगा.

चूंकि प्राकृतिक खेती से प्राप्त उपज को सेहतमंद माना जाता है, इसलिए किसानों को उत्पाद की कीमत अधिक मिलती है.

अगर किसान जैविक खेती प्रमाणीकरण के नियमों का पालन कर जैविक प्रमाणीकरण करा लें, तो उन की उपज की मांग अपनेआप बढ़ जाती है.

प्राकृतिक खेती से मिट्टी की उत्पादन कूवत कैसे बढ़ती है?

हरित क्रांति से उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन कई प्रकार की गंभीर समस्याएं भी पैदा हुई हैं. रसायनों के बहुत ज्यादा उपयोग के कारण कीटों में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने से उन की जनसंख्या का नियंत्रण नहीं हो पा रहा है. साथ ही, जैव विविधता में कमी आ रही है. प्राकृतिक खेती से मिट्टी की सेहत अच्छी होगी और उत्पादन भी बेहतर होगा.

प्राकृतिक खेती में जीवाणु और केंचुए की संख्या बढ़ाने के लिए कुछ सस्य क्रियाएं, जैसे खेत की कम से कम जुताई, जीवाणुओं के फूड सोर्स के तौर पर फसल अवशेष व हरी खाद का प्रयोग, मल्चिंग, वापसा, जैव विविधता और ड्रिप सिंचाई के माध्यम से जीवामृत के प्रयोग खेत में जीवाणुओं की वृद्धि करने में सहायक होते हैं. इसे अपना कर किसान कृषि निवेशों की बाजार से निर्भरता को कम कर सकते हैं. इस प्रकार लागत में भी कमी आएगी. इस से उत्पादित खाद्य पदार्थों से मानव स्वास्थ्य को सुरक्षित बनाया जा सकता है. साथ ही, मृदा स्वास्थ्य को सुधारा जा सकता है.

किसान शुरुआत में प्राकृतिक खेती के जरीए थोड़ी सी भूमि पर इस का परीक्षण अवश्य करें.

आधुनिक रासायनिक खेती से उत्पादन बढ़ा है, तो किसानों की आय भी बढ़ी है, किंतु आमदनी का ज्यादा हिस्सा बीमारी में चला जाता है और पर्यावरण का नुकसान हो रहा है. साथ ही, उत्पादकता भी घट रही है. इसलिए प्राकृतिक खेती एक अच्छा विकल्प हो सकती है.

एक देशी गाय से किसान कितने क्षेत्रफल में प्राकृतिक खेती कर सकते हैं?

प्राकृतिक खेती में एक देशी गाय से 30 एकड़ तक की खेती की जा सकती है, क्योंकि एक एकड़ की खुराक तैयार करने के लिए गाय के एक दिन के गोबर और गौमूत्र की आवश्यकता होती है. प्राकृतिक खेती में बाजार से कुछ भी खरीदने की जरूरत नहीं है, जबकि जैविक खेती एक महंगी पद्धति है.

किसान ने बागबानी (Gardening) से की बंपर कमाई

भिंड : सरकार किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए उद्यानिकी फसलों के लिए प्रोत्साहित कर रही है. इस की महत्ता को समझ कर कई किसान परंपरागत खेती को छोड़ कर बागबानी कर रहे हैं. ऐसे ही भिंड जिले के विकासखंड अटेर के ग्राम ऐंतहार के प्रगतिशील किसान डीपी शर्मा ने परंपरागत खेती को छोड़ बागबानी शुरू की और अब वे इस से अच्छी आमदनी कर रहे हैं.

किसान डीपी शर्मा ने बताया कि कृषि विज्ञान केंद्र और उद्यानिकी विभाग से परामर्श ले कर 8 अगस्त, 2020 को वीएनआर अमरूद का बगीचा लगाया गया, जिस में 550 पौधे अमरूद के और 50 पौधे नीबू, 100 पौधे करौंदा और  11 पौधे कटहल का रोपण किया गया.

उन्होंने बताया कि उद्यानिकी विभाग भिंड की तरफ से उन के बगीचे में ड्रिप इरिगेशन सिस्टम लगवाया गया है. ड्रिप के माध्यम से सभी पौधों को पर्याप्त मात्रा में पानी और खाद दिया जा रहा है. वर्तमान में पौधे में लगभग 18 महीने में फल आने लगे हैं, जिस में एक फल लगभग 400 ग्राम से ले कर 650 ग्राम तक का अमरूद का उत्पादन होने लगा है.

किसान डीपी शर्मा ने किसानों को संदेश दिया है कि धान व गेहूं की खेती में पानी ज्यादा लगता है, जलस्तर को बचाने के लिए बागबानी की तरफ रुझान बढ़ाएं. अमरूद का बाग लगा कर अन्य किसान भी अच्छी आमदनी कर सकते हैं. पानी की बचत में बागबानी खेती सब से बेहतर है.

पीएम कुसुम योजना के तहत मिलेगा सोलर पंप

बस्ती: प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (पीएम कुसुम) योजना वित्तीय साल 2023-24 से 2024-25 तक प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (पीएम कुसुम) के अंतर्गत अनुदान पर सोलर पंप पाने के लिए 17 जनवरी, 2024 से विभागीय वैबसाइट https://pm kusum.upagriculture.com पर लक्ष्य पूरा होने तक औनलाइन बुकिंग की जाएगी.

बस्ती जिले के लिए सोलर पंप लगाने के लिए कुल 393 आवेदन प्राप्त हुए हैं. इस के तहत राज्यांश और केंद्रांश के रूप में सोलर पंप किसान अंश के रूप में 1800 वाट 2 एचपी डीसी सरफेस पंप पर कुल लागत 1,71,716 रुपए के सापेक्ष 63,686 रुपए का भुगतान करना होगा, जबकि एसी सरफेस पंप लागत 1,71,716 रुपए के सापेक्ष महज 63,686 रुपए देना होगा.

इसी तरह डीसी सबमर्सिबल पंप के लिए कुल लागत 1,74,541 रुपए के सापेक्ष 64,816 रुपए किसान को भुगतान करना होगा, वहीं एसी सबमर्सिबल पंप के लिए कुल लागत 1,74,073 रुपए के सापेक्ष महज 64,629 रुपए किसान को देना होगा.

जो किसान 3,000 वाट 3 एचपी डीसी सबमर्सिबल पंप लगाना चाहते हैं, उन्हें कुल मूल्य 2,32,721 रुपए के सापेक्ष किसान को 88,088 रुपए का भुगतान करना होगा. इसी तरह एसी सबमर्सिबल पंप के कुल लागत 2,30,445 रुपए के सापेक्ष किसान को 87176 रुपए देना होगा. इस के अलावा 4800 वाट 5 एचपी एसी सबमर्सिबल पंप के कुल लागत 2,27,498 रुपए में से किसान को अंश के रूप में 1,25,999 रुपए का भुगतान करना होगा.

जो किसान 6750 वाट 7.5 एचपी एसी सबमर्सिबल पंप लगाना चाहते हैं, उन्हें कुल लागत का 2,44,094 रुपए के सापेक्ष किसान अंश के रूप में 1,72,638 रुपए देना होगा. इसी तरह 9000 वाट 10 एचपी एसी सबमर्सिबल पंप के कुल मूल्य 5,57,620 रुपए के सापेक्ष किसान को अंश के रूप में 2,86,164 रुपए का भुगतान करना होगा.

उपनिदेशक, कृषि, अशोक कुमार गौतम ने बताया कि जो किसान इस योजना का लाभ लेना चाहते हैं, उन्हें कृषि विभाग की विभागीय वैबसाइट https://agriculture.up.gov.in पर रजिस्टर होना अनिवार्य है.

उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि किसानों की बुकिंग जिले के लक्ष्य की सीमा से 110 फीसदी तक ‘पहले आओ पहले पाओ’ के आधार पर किया जाएगा. किसानों को औनलाइन बुकिंग के साथ 5,000 रुपए टोकन मनी के रूप में औनलाइन जमा करना होगा.

जो किसान अनुदान पर सोलर पंप लेना चाहते हैं, वह औनलाइन बुकिंग के लिए विभागीय वैबसाइट https://agriculture.up.gov.in पर बुकिंग करें. लिंक पर क्लिक कर औनलाइन बुकिंग कर सकते हैं.
उपनिदेशक कृषि, अशोक कुमार ने बताया कि औनलाइन टोकन कन्फर्म करने के बाद किसान को चालान के माध्यम से अथवा औनलाइन किसान अंश की धनराशि एक सप्ताह के भीतर किसी भी भारतीय बैंक की शाखा में जमा करनी होगी, अन्यथा किसान का चयन स्वतः निरस्त हो जाएगा.

उन्होंने यह भी जानकारी दी कि इस से सिंचाई के लिए बिना बिजली वाले इलाकों में प्रयोग किए जा रहे डीजल पंप अथवा दूसरे सिंचाई के साधनों को सोलर पंप में बदला जा सकेगा. इस के अलावा उन किसानों, जिन के ट्यूबवैल पर सोलर पंप लगाए जाएंगे, उन लाभार्थियों के ट्यूबवैल पूर्व से लगे बिजली के कनैक्शन काट दिए जाएंगे और जिन किसानों के ट्यूबवैल पर सोलर पंप की सुविधा दी जाएगी, ऐसे लाभार्थियों को भविष्य में भी उस बोरिंग पर बिजली का कनैक्शन नहीं दिया जाएगा.

उन्होंने बताया कि 2 एचपी के लिए 4 इंच, 3 एवं 5 एचपी के लिए 6 इंच और 7.5 एवं 10 एचपी के लिए 8 इंच की बोरिंग होना अनिवार्य है. किसान को बोरिंग खुद ही करानी होगी. सत्यापन के समय उपयुक्त बोरिंग न पाए जाने पर टोकन मनी की धनराशि के लिए 2 एचपी सरफेस, 50 फुट तक की गहराई के लिए 2 एचपी सबमर्सिबल, 150 फुट तक की गहराई के लिए 3 एचपी सबमर्सिबल, 200 फुट तक की गहराई के लिए 5 एचपी सबमर्सिबल, 300 फुट की गहराई के लिए 7.5 एचपी और 10 एचपी सबमर्सिबल के सोलर पंप उपयुक्त होंगे

स्ट्राबेरी की खेती से किसान मालामाल

उन्नतशील किसानों के लिए यह जरूरी है कि लाभदायक खेती की जाए, जिस से खेती में मुनाफा हो और किसान उसी पैसे का उपयोग कर के उन्नतशील खेती कर सकें. स्ट्राबेरी की खेती कैश क्रौप की तरह होती है. ऐसे में भारत में बड़ी तेजी से स्ट्राबेरी की खेती किसानों को लुभा रही है.

भारत में स्ट्राबेरी की खेती सब से पहले उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश के कुछ पहाड़ी इलाकों में तकरीबन 60 के दशक से शुरू हुई. बहुत दिनों तक इस की खेती केवल हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश के पहाड़ी हिस्से उत्तराखंड में ही हुई.

किसान यह मान रहे थे कि स्ट्राबेरी की खेती पहाड़ी जलवायु में ही हो सकती है. समय के साथसाथ स्ट्राबेरी की नई किस्म की फसलें आने लगीं, जिन की पैदावार मैदानी इलाकों में भी होने लगी. किसानों में तकनीकी जानकारी बढने लगी, तो स्ट्राबेरी की खेती मैदानी इलाकों में होने लगी.

शहरों में नएनए मौल खुलने लगे और शादीविवाह की दावतों में स्ट्राबेरी का प्रयोग फल के रूप में बढ़ने लगा. साथ ही, स्ट्राबेरी केक की मांग बढ़ी, तो स्ट्राबेरी की खेती मुनाफे का सौदा होने लगी. किसान इस की खेती से मालामाल होने लगे.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के बक्शी का तालाब और मलिहाबाद इलाके के किसानों ने इस की शुरुआत की. बाराबंकी जिले के किसानों ने भी इस की शुरुआत कर दी थी. अब लखनऊ जिले के बाकी हिस्सों में रहने वाले किसानों ने भी इस की खेती करनी शुरू कर दी. मुनाफे को देखते हुए तमाम लोग जो विदेशों में नौकरी कर रहे थे, वे भी अपने गांव वापस आ कर उन्नतशील खेती के सहारे अपना कैरियर संवार रहे हैं.

जौब छोड़ शुरू की किसानी

लखनऊ की मोहनलालगंज तहसील के गोपाल खेड़ा गांव के रहने वाले सिद्धार्थ सिंह यूके की मल्टीनैशनल कंपनी में अच्छी नौकरी कर रहे थे. कुछ समय के बाद सिद्धार्थ सिंह ने मल्टीनैशनल कंपनी का पैकेज ठुकरा कर अपने गांव लौट कर नई तरह से खेती करने की शुरुआत की.

इस के तहत सिद्धार्थ सिंह ने स्ट्राबेरी की खेती करनी शुरू की. इस में उन के भाई राजेश सिंह ने सहयोग दिया. दोनों भाइयों ने मिल कर गांव में स्ट्राबेरी उगा कर उन्नत तकनीक के सहारे 6 महीने में ही तकरीबन 20 लाख रुपए की आमदनी हासिल की.

गोपाल खेड़ा गांव उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से महज 20 किलोमीटर दूर है. यहीं के रहने वाले किसान राजेश सिंह के मौसेरे भाई सिद्धार्थ सिंह ने यूके से एमबीए करने के बाद वहीं मल्टीनैशनल कंपनी में मोटे वेतन पैकेज पर नौकरी कर ली. विदेश जा कर भी देशी खेती को उन्नत तकनीक के सहारे अच्छी आमदनी का जरीया बनाने की सोच ने कुछ सालों में ही सिद्धार्थ सिंह को वापस आने पर मजबूर किया. अपने देश वापस आ कर गोपाल खेड़ा गांव में स्ट्राबेरी की खेती करने की योजना तैयार की.

यूके के नाटिंघम, भारत के पुणे और हिमाचल प्रदेश जा कर उन्होंने स्ट्राबेरी उगाने की बारीकियां सीखीं. इस के बाद मोहनलालगंज की जलवायु में स्ट्राबेरी की खेती करने की ठान ली. भाई राजेश सिंह के साथ जिला बाराबंकी पहुंच कर स्ट्राबेरी की खेती कर रहे किसानों से भी जानकारी ली. 2019 के सितंबर महीने में एक एकड़ में स्ट्राबेरी का पौधरोपण करने की तैयारी पूरी की. लेकिन ऐन समय पर बारिश की वजह से फसल बोआई में देरी हो गई.

इस के बाद अक्तूबर में पुणे से 25,000 पौधे ला कर नर्सरी की. मेहनत और तकनीक के सहारे डेढ़ महीने में ही स्ट्राबेरी के पौधों से खेत हरेभरे हो गए. दिसंबर के पहले हफ्ते से शुरूहुई स्ट्राबेरी की अच्छी उपज ने 2 सप्ताह में ही तकरीबन साढ़े 3 क्विंटल का उत्पादन दिया है.

किसान राजेश सिंह ने बताया कि दिनोंदिन बढ़ रहे उत्पादन के साथ मार्च के आखिरी हफ्ते तक तकरीबन 20 लाख रुपए की स्ट्राबेरी उगाने का अनुमान है.

फसल सुरक्षा के लिए पौली टनल का सहारा

किसान सिद्धार्थ सिंह ने बताया कि स्ट्राबेरी फसल के लिए पौलीहाउस सर्वाधिक बेहतर माना जाता है, लेकिन कम संसाधन में फसल सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने पौली टनल का सहारा लिया, जबकि पौधों को बूंदबूंद पानी देने के लिए ड्रिप सिंचाई की व्यवस्था की. यह फसल अधिकतर ठंडे जलवायु की फसल है. लेकिन फसल का धूप और पाले से बचाव भी बेहद जरूरीहै. इस के अलावा सिंचाई भी जरूरत के मुताबिक ही होनी चाहिए.

किसान राजेश सिंह ने बताया कि खेत में खरपतवार न उगें, इस के लिए उन्होंने खेत में पौली मल्चिंग करा रखी है, जबकि एक एकड़ में एक फुट ऊंचे और डेढ़ फुट चौड़े 70 बैड तैयार करा कर उन पर 15-15 सैंटीमीटर की दूरी पर स्ट्राबेरी के पौधे उगाए हैं. फसल तैयार करने में तकरीबन 4 लाख रुपए की लागत आई है.

जानें तकनीकी खेती

सिद्धार्थ सिंह ने बताया कि आसपास के गांवों के किसान भी अब स्ट्राबेरी की खेती करने का अपना मन बना  रहे हैं. ये लोग उन से स्ट्राबेरी की खेती के गुर लेने आते हैं.

स्ट्राबेरी की फसल के लिए खेत की तैयारी मईजून महीने में शुरू हो जाती है. सब से पहले खेत में ढैंचा की बोआई, फिर बारबार जुताई और गोबर की खाद डाल कर मिट्टी को भुरभुरा बनाया जाता है. फफूंद व रोगों से बचाव के लिए मिट्टी का प्रारंभिक उपचार कराया जाना भी जरूरी होता है. इस के बाद सितंबर महीने में स्ट्राबेरी के पौध ला कर नर्सरी कराई जाती है.

कृषि लाभ के लिए फसल व किस्म चयन जरूरी

1.  फसल का चयन: खेती को लाभ का धंधा बनाने के लिए फसल का चयन सर्वाधिक महत्वपूर्ण है. किसान अपने संसाधनों जैसे मौसम, मिट्टी, पानी, मजदूर एवं बाजार को ध्यान में रख कर फसल का चयन करना चाहिए. फसल अधिक उत्पादन एवं लाभ देने वाली होनी चाहिए, जैसे गेहूं की तुलना में मसाला एवं औषधीय फसलों की उत्पादन लागत कम और दाम बढ़िया मिलने से मसाला एवं औषधीय फसलों का उत्पादन लाभकारी है.
2.  किस्म का चयन: फसल चयन के बाद उस की किस्म का चयन महत्वपूर्ण है, इसलिए अपने क्षेत्र के लिए अधिसूचित किस्म का प्रयोग बोनी के लिए करना चाहिए. हर किस्म प्रत्येक क्षेत्र के लिए अनुकूल नहीं होती है. ऐसी स्थिति में उत्पादन प्रभावित होना स्वाभाविक है.
3.  प्रमाणित बीज का उपयोग: बीज बढ़िया होगा, तो उत्पादन भी बढ़िया होगा. इसलिए चयनित किस्म का प्रमाणित बीज या स्वयं द्वारा उत्पादित बीज का प्रयोग बोने के लिए करना चाहिए. मिलावट वाले बीज के उपयोग से फसल एकसार नहीं होने से बाजार मूल्य कम मिलता है.
4.  बीजोपचार: रोगमुक्त पौधे प्राप्त करने के लिए बीज को उपचारित करना आवश्यक है. बीज को जरूरत के मुताबिक फफूंदनाशी, कीटनाशी एवं जीवाणु खाद से उपचारित किया जाता है. बीजोपचार तीनों से करने के लिए पहले फफूंदनाशी का उपयोग करें, फिर कीटनाशी करें एवं अंत में जीवाणु खाद से बीजोपचार करें.
5. बीज की सही मात्रा: प्रत्येक फसल के लिए वैज्ञानिकों द्वारा सामान्य एवं उलट हालात के लिए बीज दर का निर्धारण किया गया है. उचित बीज दर का उपयोग किए जाने से प्रति हेक्टेयर उचित पौध संख्या प्राप्त होती है, जिस से अधिकतम उत्पादन प्राप्त होता है. अधिक बीज के उपयोग से पौधे घने हो जाते हैं और उन में खाद, पानी, धूप के लिए प्रतिस्पर्धा होती है, जिस से प्रति पौधा उत्पादन कम होता है और किसान का लाभ कम हो जाता है.
6. सही विधि से बोनी: ज्यादातर किसान रबी में छिटकवां विधि से बोनी करते हैं, जिस से बीज की अधिक मात्रा लगती है. साथ ही, प्रत्येक पौधा समान दूरी पर नहीं होता है. नतीजतन, प्रत्येक पौधे की उपज एकसमान न होने से उत्पादन प्रभावित होता है.
परीक्षणों द्वारा यह जानकारी हुई है कि कतार में सही दूरी पर फसल लगाने से छिटकवां विधि की तुलना में अधिक उत्पादन प्राप्त होता है, इसलिए फसल के अनुसार सही दूरी पर कतार में बोनी करें.
7.  बोनी की दिशा: खरीफ फसलों में बोनी पूर्व से पश्चिम और रबी फसलों में बोनी उत्तर से दक्षिण करने से अधिक उत्पादन प्राप्त होता है.
8. समय पर खरपतवार प्रबंधन: किसी भी फसल में खरपतवार अधिक होने से उत्पादन बहुत प्रभावित होता है. सही समय पर नियंत्रण न होने से पूरी फसल खराब हो सकती है. साथ ही, उत्पाद के साथ खरपतवार के बीज मिले होने से दाम भी कम मिलता है. ज्यादातर फसलों में 20 से 40 दिन की फसल अवस्था खरपतवारों से सर्वाधिक प्रभावित होती है. इसलिए 20 से 40 दिन की अवस्था पर फसल को खरपतवारमुक्त रखना चाहिए.
9. खाद एवं उर्वरक प्रबंधन: जैविक खाद का प्रयोग अवश्य करना चाहिए. साथ ही, अनुशंसित मात्रा में ही उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए. गंधक एवं जिंक का प्रयोग जरूर करना चाहिए. तेल वाली फसलों में गंधक से तेल की मात्रा बढ़ती है. इसी प्रकार से फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा बोनी के समय ही प्रयोग करनी चाहिए.
दलहनी फसलों में नाइट्रोजन की मात्रा केवल बोनी के समय प्रयोग करनी चाहिए, अन्य सभी फसलों में नाइट्रोजन की मात्रा 2 या 3 भागों में बांट कर प्रयोग करनी चाहिए. सही अवस्था पर दिया गया नाइट्रोजन उर्वरक फसल की उत्पादन क्षमता बढ़ाता है, वहीं गलत समय पर नाइट्रोजन का उपयोग उत्पादन कम करता है और पौधों में रोगों व कीटों के प्रभाव को बढ़ाता है.
10. फसल संरक्षण: फसल में रोग व कीटांे का हमला होना स्वाभाविक है. इस के लिए समयसमय पर फसल निरीक्षण करते रहें और माली नुकसान का अधिक प्रकोप होने पर ही रसायनांे का प्रयोग करें. प्राकृतिक कीट एवं रोग नियंत्रण के उपाय अपनाने से लागत कम होती है. सही रसायनों का उपयोग कृषि वैज्ञानिकों की सलाह से करें.
drip irrigation11. सिंचाई प्रबंधन: प्रत्येक फसल में पानी की जरूरतें भिन्न होती हैं. साथ ही, मिट्टी की बनावट का इस पर बहुत प्रभाव होता है. पानी की उपलब्धता के आधार पर ही फसल का चयन करना चाहिए, अन्यथा इस की कमी से उत्पादन प्रभावित हो सकता है. प्रत्येक फसल में वैज्ञानिकों द्वारा कुछ अवस्थाएं चिन्हित की गई हैं, जिन पर पानी न मिलने से फसल का उत्पादन अप्रत्याशित रूप से प्रभावित होता है. अतः पानी की उपलब्धता के आधार पर इन क्रांतिक अवस्थाओं पर सिंचाई करने से उत्पादन कम प्रभावित होता है.
12. सिंचाई की विधि: सतह पर सिंचाई करने की अपेक्षा ड्रिप से सिंचाई करने पर पानी की अत्यधिक बचत होती है. स्प्रिंकलर द्वारा सिंचाई कर के भी पानी को बचाया जा सकता है. सतही सिंचाई करने पर क्यारी छोटी बनाएं और उन्हें अत्यधिक न भरें.
13. समय पर कटाई एवं गहाई: फसल की समय पर कटाई अत्यंत आवश्यक है. अधिक सूखने पर कटाई करने से फसलें झड़ सकती हैं, जिस से उत्पादन प्रभावित होने के साथ ही अगली फसल में ये खरपतवार का काम करते हैं. सब्जी एवं फल वाली फसलों में भी तुड़ाई अत्यंत महत्वपूर्ण है. कटाई सुबह के समय किए जाने से नुकसान कम होता है. कटी फसल को खलिहान में सुखा कर थ्रैशिंग करनी चाहिए.