पूसा कृषि विज्ञान मेला (Pusa Agricultural Science Fair) 2025

नई दिल्ली : भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली का पूसा कृषि विज्ञान मेला 2025 22 फरवरी से 24 फरवरी में आयोजित होने जा रहा है. मेले का विषय “उन्नत कृषि विकसित भारत” है.

इस उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान होंगे. रामनाथ ठाकुर, राज्य मंत्री, कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय इस कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि होंगे. भागीरथ चौधरी, राज्य मंत्री, कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय 24 फरवरी, 2025 को आयोजित समापन सत्र के मुख्य अतिथि होंगे. डा. हिमांशु पाठक, सचिव डेयर और महानिदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद उद्घाटन और समापन सत्र की अध्यक्षता करेंगे.

इस साल के पूसा कृषि विज्ञान मेले के मुख्य आकर्षण होंगे :

– भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित नई किस्मों और तकनीकों का लाइव  प्रदर्शन.

– भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद  के संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि विज्ञान केंद्रों, एफपीओ, उद्यमियों, स्टार्टअप्स, सार्वजनिक और निजी कंपनियों द्वारा नवीन तकनीकों, उत्पादों और सेवाओं की प्रदर्शनी.

– तकनीकी सत्र और किसानों वैज्ञानिकों के साथ संवाद, जो जलवायु अनुकूल कृषि, फसल विविधीकरण, डिजिटल कृषि, युवाओं और महिलाओं का उद्यमिता विकास, कृषि विपणन, किसान संगठन और स्टार्टअप्स, और किसानों के नवाचार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर आधारित होंगे.

– पूसा द्वारा विकसित फसलों की किस्मों की बिक्री.

– मेले के दौरान कृषि वैज्ञानिकों द्वारा कृषि सलाह.

जलवायु जोखिम और पोषण के बढ़ते महत्व को समझते हुए पूसा संस्थान में अनुसंधान जलवायु अनुकूल किस्मों और बायोफोर्टिफाइड किस्मों के विकास पर केंद्रित है, जो उच्च उत्पादकता के साथ बेहतर पोषण सुरक्षा प्रदान करता है.

साल 2024 के दौरान 10 विभिन्न फसलों में कुल 27 नई किस्में विकसित की गई हैं, जिन में 7 गेहूं की किस्में, 3 चावल, 8 संकर मक्का, 1 संकर बाजरा, 2 चने की किस्में, 1 अरहर संकर, 3 मूंग दाल की किस्में, 1 मसूर की किस्म, 2 डबल जीरो सरसों की किस्में और 1 सोयाबीन की किस्म शामिल हैं. इन में 16 किस्में और 11 संकर किस्में हैं.

बदलते जलवायु परिदृश्य के तहत पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 10 जलवायु अनुकूल और बायोफोर्टिफाइड किस्मों का विकास किया गया है, जिस में 7 अनाज और मिलेट्स, 2 दालें और 1 चारा किस्म शामिल है.

संस्थान ने बासमती धान उत्पादन और व्यापार में श्रेष्ठ किस्मों के विकास के माध्यम से विशाल योगदान दिया है. पूसा बासमती धान की किस्मों में पूसा बासमती 1718, पूसा बासमती 1692, पूसा बासमती 1509 और उन्नत बासमती धान की किस्में, जिन में बैक्टीरियल ब्लाइट और ब्लास्ट रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता है, जैसे पीबी-1847, पीबी-1885 और पीबी-1886.

साल 2023-2024 में भारत से 5.2 मिलियन टन बासमती धान के निर्यात से 48,389 करोड़ रुपए की आय में लगभग 90 फीसदी योगदान करती है. अप्रैल, 2024 से नवंबर, 2024 तक पूसा के बासमती धान से निर्यात आय 31,488 करोड़ रुपए तक पहुंची है. 2 छोटी अवधि वाली धान की किस्में पूसा 1824 और पूसा 2090 विकसित की गई हैं, जो बाद में रबी फसल के खेतों की तैयारी के लिए पर्याप्त समय प्रदान कर सकती हैं.

पूसा आरएच 60 एक उच्च उपज वाली, छोटी अवधि वाली सुगंधित धान की संकर किस्म है, जिस में लंबे, पतले दाने होते हैं, जो बिहार और उत्तर प्रदेश के लिए सब से मुफीद है. पूसा नरेंद्र केएन-1 और पूसा सीआरडी केएन-2 उन्नत काला नमक धान की किस्में हैं, जिन में बेहतर प्रतिरोधक क्षमता और उच्च उपज है, जो उत्तर प्रदेश के लिए अनुशंसित हैं.

पूसा के अनुसंधान कार्यक्रम ने पोषण सुरक्षा पर भी ध्यान केंद्रित किया और 8 बायोफोर्टिफाइड किस्मों का विकास किया. एक गेहूं की किस्म (एचआई-1665) और एक ड्यूरम गेहूं की किस्म (एचआई-60 पीपीएम), प्रोविटामिन ए (6.22पीपीएम), उच्च लाइसीन (4.93 फीसदी) और ट्रिप्टोफैन (1.01 फीसदी) से समृद्ध किया गया है.

पूसा बायोफोर्टिफाइड मक्का संकर-4 को उच्च प्रोविटामिन A, लाइसीन, ट्रिप्टोफैन से बायोफोर्टिफाइड किया गया है. पूसा पौपकौर्न संकर-1 और संकर-2 उच्च पौपिंग फीसदी और बटरफ्लाई प्रकार के पौप किए गए फ्लैक्स प्रदान करते हैं, जो एनडब्ल्यूपीजेड और पीजेड क्षेत्रों के लिए अनुशंसित हैं. पूसा एचएम-4 मेल स्टीराइल बेबीकौर्न-2 एक मेल स्टीराइल आधारित संकर है, जिसे एनईपीजेडपीजेड और सीडब्ल्यूजेड क्षेत्रों के लिए विकसित किया गया है.

2 डबल जीरो सरसों की किस्में (पूसा सरसों-35 और पूसा सरसों-36), जिन में एरूसिक अम्ल और ग्लूकोसिनोलेट्स कम होते हैं. समय पर बोई गई सिंचित परिस्थितियों में यह उच्च उपज प्रदान करती हैं, जो क्षेत्र-III (मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और राजस्थान) के लिए उपयुक्त हैं. पूसा-1801 (एमएच 2417) बाजरा की एक द्विउद्देश्यीय किस्म (अनाज और चारा) है, जो उच्च लोहा (70 पीपीएम) और जिंक (57 पीपीएम) से युक्त बायोफोर्टिफाइड किस्म हैं. यह कई रोगों के प्रति प्रतिरोधक है और दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लिए सब से उपयुक्त है.

चने की किस्म पूसा चना विजय 10217 उच्च उपज वाली किस्म है, जो फ्यूजेरियम विल्ट के प्रति प्रतिरोधक है. उत्तर प्रदेश में यह सिंचित परिस्थितियों के लिए अनुशंसित है. चने की किस्म पूसा-3057 में उच्च प्रोटीन (24.3 फीसदी) है और कई रोगों, जैसे फ्यूजेरियम विल्ट (उकठा), कौलर रोट (तना गलन) और ड्राई रूट रोट (जड़ गलन) के प्रति प्रतिरोधक है.

यह पोड बोरर (फली बेधक सूँडी) के प्रति भी मध्यम प्रतिरोधक है और इस के बीज आकर्षक रंग और बड़े आकार के होते हैं.

अरहर की किस्म पूसा अरहर हाइब्रिड-5 उच्च उपज वाली किस्म है (औसतन 23.35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक, और संभावित उपज 25.46 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, जो एसएमडी, फाइटोफोथोरा स्टेम ब्लाइट, मैक्रोफोमिना ब्लाइट (अंगमारी) और अल्टरनेरिया लीफ स्पौट (पत्ती धब्बा रोग) के प्रति प्रतिरोधक है और यह दिल्ली व राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है.

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा छोटे किसानों के लिए 1.0 हेक्टेयर क्षेत्र के लिए एक एकीकृत कृषि प्रणाली मौडल विकसित किया गया है, जिस में फसलें, डेयरी, मछलीपालन, बतखपालन, बायोगैस संयंत्र, फलदार पेड़ और कृषि वनस्पति शामिल हैं. इस मौडल में प्रति हेक्टेयर हर साल 3 लाख, 79 हजार रुपए तक की शुद्ध आय प्राप्त करने की क्षमता है. इसी तरह, पूसा संस्थान द्वारा 0.4 हेक्टेयर क्षेत्र के लिए एकीकृत कृषि प्रणाली मौडल विकसित किया गया है, जिस में पौलीहाउस, मशरूम की खेती के साथसाथ फसल और बागबानी आदि गतिविधियां भी शामिल हैं. इस मौडल से प्रति एकड़ हर साल एक लाख, 75 हजार 650 रुपए की शुद्ध आय पैदा करने की क्षमता है.

बागबानी आधारित फसल विविधीकरण किसानों के बीच लोकप्रिय रहा है. सब्जियों, फलों और फूलों की खेती लाभदायक रही है, जबकि फलों और सब्जियों की खेती पोषण सुरक्षा को बढ़ावा देने में भी उपयोगी है.

सब्जियों की खेती को बढ़ावा देने के लिए संस्थान ने  48 सब्जी फसलों में 268 सुधारित सब्जी किस्में विकसित की हैं, जिन में 41 संकर और 227 किस्में शामिल हैं. आईएआरआई ने गाजर (पूसा प्रतीक, पूसा रुधिरा, पूसा असिता), भिंडी (पूसा लाल भिंडी-1), भारतीय सेम (पूसा लाल सेम), ब्रोकोली (पूसा पर्पल ब्रोकोली-1) और विटामिन सी से भरपूर पालक की किस्म (पूसा विलायती पालक) जैसे पोषणयुक्त किस्में विकसित की हैं, ताकि कुपोषण की समस्या का समाधान किया जा सके.

यलो वेन मोजेक वायरस (वेयूएमवी) प्रतिरोधी और ए नैशन लीफ कर्ल वायरस (ईएलसीवी) सहिष्णु भिंडी की किस्में (पूसा भिंडी-5 और डीओएच-1) पैस्टिसाइड्स के उपयोग को कम करने और खेती की लागत में कमी लाने के लिए विकसित की गई हैं.

हाल के सालों में बैंगन की 6 किस्में और एक संकर, प्याज की 3 किस्में, खीरे की 2 किस्में और 1 संकर, भारतीय सेम की 3 किस्में, करेला की 3 संकर किस्में और खरबूजे की 2 किस्में और 1 संकर विकसित की गई हैं. 2 सौफ्टसीडेड अमरूद की किस्में, पूसा आरुषि (लाल गूदा) और पूसा प्रतीक्षा (सफेद गूदा), साथ ही, एक उभयलिंगी, सैमीड्वार्फ पपीता किस्म, पूसा पीत भी विकसित की गई है.

एक गेंदा किस्म, पूसा बहार को केंद्रीय किस्म विमोचन समिति द्वारा जोन IV, V, VI और VII में विमोचन के लिए अनुशंसा की गई है. साल 2018-19 में (239.861 टन) से ले कर साल 2023-24 में (975.478 टन) तक गुणवत्ता वाले बीजों का उत्पादन चौगुना से अधिक बढ़ा है.

जैव रसायन संभाग द्वारा विकसित पोषणयुक्त खाद्य उत्पादों में डिवाइन डो (बाजरे का आटा, जिस में गुणवत्ता वाली प्रोटीन, प्रतिरोधी स्टार्च, फाइबर और सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे Fe और Zn होते हैं) शामिल हैं. पर्लीलोफ एक ग्लूटनमुक्त ब्रेड प्री-मिक्स है, जो पूरी तरह से बाजरा से बनाया गया है, जो गेहूं आधारित ब्रेड का पोषणयुक्त विकल्प प्रदान करता है. इस का ग्लाइसैमिक इंडेक्स (पीजीई 68-69 फीसदी) कम है, जो रक्तशर्करा के प्रबंधन में मदद करता है, जबकि यह फाइबर, आवश्यक खनिजों और बायोएक्टिव यौगिकों से भरपूर होता है.

पूसा संस्थान द्वारा एक त्वरित रंगमापी परीक्षण किट ‘स्पीडीसीड व्यायबिलिटी किट’ विकसित की गई है, जो 1–4 घंटे के भीतर बीज के प्रकार के आधार पर जीवित और अव्यायी बीजों के बीच अंतर करने में सक्षम है. इस किट में एक सूचक घोल शामिल है, जो जीवित बीजों द्वारा छोड़े गए CO₂ को पकड़ने पर रंग बदलता है. पूसा एसटीएफआर मीटर, जिसे पूसा संस्थान द्वारा विकसित किया गया है, एक कम लागत, यूजर फ्रेंडली, डिजिटल एम्बेडेड सिस्टम और प्रोग्रामेबल उपकरण है, जो 14 महत्वपूर्ण मृदा मापदंडों का विश्लेषण करने के लिए है, जिस में गौण और सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे कि मृदा pH, EC, जैविक कार्बन, उपलब्ध N (जैविक कार्बन से व्युत्पन्न), P, K, S, B, Zn, Fe, Cu, Mn, साथ ही, चूना और जिप्सम की आवश्यकता का परीक्षण किया जा सकता है.

पूसा डीकंपोजर, जिसे भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित किया गया है, एक पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित और आर्थिक रूप से प्रभावी सूक्ष्मजीव समाधान है, जो स्थल पर और स्थल के बाहर अवशेष प्रबंधन के लिए है.

पूसा डीकंपोजर को तैयार व उपयोग पाउडर रूप में भी किया गया है. यह पाउडर पूरी तरह से पानी में घुलने योग्य है और इसे आसानी से यांत्रिक स्प्रेयर के साथ उपयोग किया जा सकता है. खेत में धान के पुआल के विघटन के लिए प्रति एकड़ 500 ग्राम की सिफारिश की जाती है.

पूसा फार्म सन फ्रिज, जिसे संस्थान द्वारा विकसित किया गया है, एक औफ-ग्रिड, बैटरीरहित सौर संवर्धित और वाष्पन शीतलक संरचना है. इस प्रौद्योगिकी का उद्देश्य खेतों में एक सौर शीतलक भंडारण केंद्र स्थापित करना है. इस ठंडे भंडारण का उपयोग नाशवान वस्तुओं के भंडारण के लिए किया जाता है.

“पूसा मीफ्लाई किट” और “पूसा क्यूफ्लाई किट” तैयार व उपयोग किट हैं, जो क्रमशः फलमक्खी की समस्या को विभिन्न प्रकार के फल और ककड़ी सब्जियों में प्रबंधित करने के लिए हैं. यह एक विशिष्ट और प्रभावी तरीका अपनाती है, जो बैक्ट्रोसेरा प्रजाति के नर फलमक्खियों को आकर्षित करने और नष्ट करने के लिए पैराफेरोमोन इन्प्रेग्नेशन का उपयोग करती है. यह पूरे मौसम के लिए पर्याप्त होती है. विभिन्न किटों को रोग प्रबंधन के लिए विकसित किया गया है.

चिली लीफ कर्ल वायरस और मूंगफली पीले मोजेक वायरस का त्वरित निदान करने के लिए प्वाइंट औफ केयर डायग्नोस्टिक किट और ईजी पीसीआर डिटेक्शन किट विकसित की गई हैं. पूसा धान बकानी परीक्षण किट को बीज और मृदा में बकानी रोग का कारण बनने वाले पैथोजन (रोग कारक) की पहचान करने के लिए विकसित किया गया है.

पौध रोपण के तहत एक एकड़ जमीन पर ‘मातृ वन’

नई दिल्ली : केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पिछले दिनों ‘एक पेड़ मां के नाम’ #Plant4Mother अभियान के तहत भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) कैंपस पूसा में पौधारोपण किया. उन्होंने बताया कि मंत्रालय लगभग एक एकड़ भूमि में ‘मातृ वन’ स्थापित करेगा.

कार्यक्रम में राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर, सचिव डेयर एवं महानिदेशक, आईसीएआर, डा. हिमांशु पाठक, कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्रालय के लगभग 200 अधिकारी व कर्मचारी और स्कूली छात्र भी उपस्थित थे.

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि देशभर में कृषि एवं किसान कल्याण विभाग (डीएएंडएफडब्ल्यू) के सभी अधीनस्थ कार्यालय, आईसीएआर संस्थान, सीएयू, केवीके और एसएयू भी अपनेअपने स्थानों पर इसी तरह का वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित किया गया. उन्होंने यह भी बताया कि कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत 800 से अधिक संस्थानों ने भाग लिया और उम्मीद है कि कार्यक्रम के दौरान 3000-4000 पौधे लगाए जाएंगे.

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उन्होंने आगे कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 5 जून, 2024 को ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ के अवसर पर वैश्विक अभियान ‘एक पेड़ मां के नाम #Plant4Mother’ का शुभारंभ किया था और प्रधानमंत्री के संकल्प को सुनिश्चित करने के लिए हमारे मंत्रालयों ने जनआंदोलन के रूप में ‘एक पेड़ मां के नाम’ #Plant4Mother अभियान की शुरुआत की है.

मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस अवसर पर उपस्थित सभी अधिकारियों, कर्मचारियों और स्कूली विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे इस अभियान में भाग लें और वृक्षारोपण कर के अपनी मां और धरती मां के प्रति सम्मान प्रकट करें.

वैश्विक अभियान के हिस्से के रूप में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहा है कि सितंबर, 2024 तक देशभर में 80 करोड़ पौधे और मार्च, 2025 तक 140 करोड़ पौधे लगाए जाएं.

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 20 जून, 2024 को असोला भाटी वन्यजीव अभयारण्य में वृक्षारोपण गतिविधि शुरू की, जिस में व्यक्तियों ने अपनी माताओं के सम्मान में पेड़ लगाए. पेड़ लगाने से सरकार द्वारा शुरू किए गए मिशन लाइफ (Mission LiFE) के उद्देश्य को भी पूरा किया जाता है, जो पर्यावरण के प्रति जागरूक जीवनशैली का एक जनआंदोलन है. कृषि में, पेड़ उगाना टिकाऊ खेती को प्राप्त करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है. पेड़ मिट्टी, पानी की गुणवत्ता में सुधार कर के और जैव विविधता को बढ़ा कर कृषि उत्पादकता में सुधार करने में मदद करते हैं. पेड़ किसानों को लकड़ी और गैरलकड़ी उत्पादों से अतिरिक्त आय का स्रोत भी प्रदान करते हैं. अभियान में भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण को रोकने और उलटने की अपार क्षमता है.

वंदना कुमारी को मिला नवोन्मेषी कृषक पुरस्कार

भागलपुर: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के तत्वावधान में आयोजित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान – नवोन्मेषी कृषक सम्मेलन-2024 के अवसर पर बिहार के बांका जिले के भेड़ा गांव की प्रगतिशील महिला किसान वंदना कुमारी को नवोन्मेषी कृषक पुरस्कार से नवाजा गया. यह पुरस्कार पूर्व निदेशक आईएआरआई, नई दिल्ली ने दिया गया.

कृषि गतिविधियों में प्राकृतिक संसाधन संरक्षण के माध्यम से यह काम भेड़ा गांव में किया गया. निकरा परियोजना के तहत सूखा/वर्षाधीत क्षेत्र में संकलित अंगीकृत गांव भेड़ा में वंदना कुमारी ने फसल उत्पादन में सूखारोधी प्रभेद सबौर दीप और सबौर अर्धजल का क्षैतिज हस्तांतरण करने के साथसाथ सघन बागबानी अमरूद, डेयरी, सालभर हरा चारा उपलब्धता, सामुदायिक बीज बैंक, टी सामुदायिक पशु स्वास्थ्य चिकित्सा केंद्र, पोषक वाटिका जैसी अनेक नवोन्मेषी कृषि काम को अंजाम दिया है, जिस का परिणाम भेड़ा गांव एवं आसपास के गांवों में देखने को मिलता है.

वंदना कुमारी ने बड़े पैमाने पर अपने गांव एवं आसपास के गांवो में इकाई विकसित कराई है. इन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र, बांका से प्रशिक्षण प्राप्त कर के अभी कई विषयों पर मास्टर ट्रेनर बन कर प्रगतिशील किसानों एवं महिला किसानों के बिहार के अलावा दूसरे प्रदेशों में प्रशिक्षित करने का काम करती हैं. कृषि एवं पशुपालन के साथसाथ समाजिक काम जैसे छोटे बच्चों का पढ़ाना, सिलाई, कटाई में ग्रामीण युवतियों को प्रशिक्षण देना आदि जैसे काम भी उन के द्वारा किए जाते हैं.

इस पुरस्कार के पूर्व वंदना कुमारी को बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर, राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, आत्मा, बिहार सरकार आदि जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से कई पुरस्कार प्राप्त किए हैं. वंदना कुमारी ने कृषि मशीनीकरण, यंत्रीकरण को बढ़ावा देने के लिए प्रत्यक्षण के तौर पर निकरा परियोजना के माध्यम से लोगों से जागरूक करने का काम भी किया है. इसी कार्यक्रम में बिहार के एक प्रगतिशील किसान महादेव सैनी, मधुबनी को भी इसी पुरस्कार से उन के उत्कृष्ट कार्यों के लिए नवाजा गया है.

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के दीक्षांत समारोह में 543 को डिग्री प्रदान

नई दिल्ली, 9 फरवरी, 2024. भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) के स्नातक विद्यालय का 62वां दीक्षांत समारोह, राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु के मुख्य आतिथ्य एवं केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और जनजातीय कार्य मंत्री अर्जुन मुंडा की अध्यक्षता में हुआ. भारत रत्न सी. सुब्रमण्यम हॉल, पूसा, नई दिल्ली में गरिमामय समारोह में कृषि विज्ञान के 26 विषयों में 5 विदेशी छात्रों सहित 543 छात्र-छात्राओं को डिग्री प्रदान की गई, साथ ही प्रतिभावान विद्यार्थियों को सम्मानित किया गया.

इस अवसर पर अर्जुन मुंडा ने आईएआरआई के प्रकाशनों का विमोचन किया एवं नई वैरायटीज को जारी कर इन्हें राष्ट्रपति को भेंट किया.

अपने दीक्षांत भाषण में राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मु ने कहा कि आईएआरआई ने भारत द्वारा खाद्य सुरक्षा प्राप्त करने में अतुलनीय योगदान दिया है. इस संस्थान ने न केवल कृषि से जुड़े अनुसंधान व विकास कार्यों को दक्षतापूर्वक किया है, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया है कि ऐसी जानकारी प्रयोगशाला के बाहर धरातल पर जाकर मूर्त रूप ले सकें. उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि संस्थान ने 200 से ज्यादा नई तकनीकों का विकास किया है.

वर्ष 2005 से 2020 के बीच ही आईएआरआई ने 100 से ज्यादा वैरायटीज विकसित की हैं और 100 से अधिक पेटेंट्स अपने नाम किए हैं.

राष्ट्रपति ने कहा कि भारत में एक बहुत बड़ी जनसंख्या कृषि से जीविका अर्जन करती है. कृषि का भारत के सकल घरेलू उत्पाद में भी महत्वपूर्ण योगदान है. एक कृषि प्रधान परिवार से आने के कारण मैं जानती हूं कि किसान खाद्यान्न उपलब्ध करा कर कितनी संतुष्टि का अनुभव करता है. देश की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होने में किसानों का बहुत बड़ा योगदान है.

IARI

उन्हें यह जान कर प्रसन्नता हुई कि सरकार किसानों की आय बढ़ाने, नई कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहित करने व सुचारू सिंचाई प्रणाली प्रदान करने के लिए काम कर रही है. सरकार ने किसानों की आय में वृद्धि के लिए सभी फसलों की एमएसपी में महत्वपूर्ण वृद्धि की है.

उन्होंने कहा कि हम सब किसानों व कृषि संबंधी समस्याओं से अवगत हैं. किसान को उस की उपज का सही मूल्य मिले, वह अभावग्रस्त जीवन से समृद्धि की ओर बढ़े, इस दिशा में हमें और भी अधिक तत्परता से आगे बढ़ना होगा. उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि वर्ष 2047 में जब भारत विकसित राष्ट्र बन कर उभरेगा, तब किसान इस यात्रा का अग्रदूत होगा.

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि ऐसा कहा जाता है कि किसान के हल की नोक से खींची गई रेखा सभ्यता के पूर्व के समाज और विकसित समाज के बीच की रेखा है. किसान न केवल विश्व के अन्नदाता है, बल्कि सही अर्थों में जीवनदाता है.

इस समारोह में डेयर के सचिव व भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक डा. हिमांशु पाठक भी मौजूद थे.

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) ने बनाए कई रिकॉर्ड

वर्तमान में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) द्वारा विकसित गेहूं की किस्में तकरीबन 9 मिलियन हेक्टेयर में फैली हुई हैं और अन्न भंडार में 40 मिलियन टन गेहूं का योगदान करती हैं. वर्ष 2023 में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा भारत के गेहूं उत्पादन क्षेत्रों के लिए ब्रेड गेहूं की 5 किस्में जारी की गईं.

इन में से एक एमएएस व्युत्पन्न किस्म है, एक एचडी 3437 किस्म है, जिस में पत्तियों और स्ट्राइप रस्ट्स के प्रति प्रतिरोधी है और क्रमशः एचडी 3386 व एचडी 3388 किस्में शामिल हैं, जो कि पश्चिमी मैदानी क्षेत्र और उत्तरपूर्वी मैदानी क्षेत्र की समय पर बोई गई सिंचित स्थितियों के लिए उपयुक्त हैं.

चावल किस्म विकास में अग्रणी

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान यानी IARI  बासमती चावल की किस्म के विकास में वैश्विक अग्रणी है. IARI द्वारा जारी बासमती किस्मों अर्थात पूसा बासमती 1121, पूसा बासमती 1718, पूसा बासमती 1509 और पूसा बासमती 6 ने देश में बासमती चावल के 95 फीसदी से अधिक क्षेत्र को अधिकृत कर लिया है. वर्ष 2023-2024 के दौरान 40,000 करोड़ रुपए का विदेशी मुद्रा में योगदान दिया है.

पराली जलाने में आएगी कमी

धान की पराली जलाने और वायु प्रदूषण की समस्या से निबटने के लिए IARI ने बासमती में कम समय में पकने  वाली धान की किस्में जैसे कि पूसा बासमती 1509, पूसा बासमती 1847, पूसा बासमती 1692 और गैरबासमती किस्में जैसे कि पूसा 2090 और पूसा 1824 विकसित और जारी की हैं, जो उक्त समस्या के समाधान में काफी हद तक मदद करेगा.

धान किस्म पूसा नरेंद्र काला नमक हुई जारी

भाकृअनुसं ने सुगंधित लघु अनाज वाले धान की भूमि प्रजाति वाली पूर्वी उत्तर प्रदेश की किस्म ‘‘काला नमक‘‘ में उपज, अपतन की समस्या में सुधार कर ‘‘पूसा नरेंद्र काला नमक” किस्म जारी की है, जो इस क्षेत्र के धान उपज करने वाले किसानों की लाभप्रदता में क्रांतिकारी बदलाव लाएगा.

धान की मैगा किस्म विकसित

सीआरआईएसपीआर-सीएएस जीनोम संपादन नई प्रजनन प्रौद्योगिकी के रूप में सामने आया है. इस अत्याधुनिक विज्ञान का उपयोग करते हुए संस्थान ने डीएसटी जीन को संपादित कर के धान की मैगा किस्म एमटीयू 1010 की पृष्ठभूमि में सूखा और लवणता सहिष्णु धान लाइन विकसित की हैं, जिन्हें वर्ष 2023 में पूरे भारत में एआईसीआरआईपी परीक्षणों में जांच के लिए उपयोग किया जा रहा है, ताकि इसे जारी किया जा सके.

मिलेट संकर, पूसा 1801 जारी

अंतर्राष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष‘ 2023 के उत्सव के एक भाग के रूप में, देश को पोषण सुरक्षा प्रदान करने के लिए आयरन और जिंक से समृद्ध एक बायोफोर्टिफाइड पर्ल मिलेट संकर, पूसा 1801 जारी किया गया था और विविध प्रकार के मिलेट्स के प्रदर्शन भी आयोजित किए गए थे.

दलहन की 8 नई किस्में जारी

संस्थान द्वारा दलहन की 8 किस्में जारी की गईं. साथ ही, चने की 2 उन्नत किस्में जारी वही की गई हैं, जिन में पूसा चना 3057, एक अधिक उपज देने वाली काबुली किस्म है और पूसा चना 10217, एक सूखा व सहिष्णु उच्च उपज देने वाली देसी किस्म शामिल है.

पूसा अरहर हाईब्रिड 5, एक सीजीएमएस आधारित अरहर संकर, हमारे संस्थान का पहला संकर भी खेती के लिए जारी किया गया था.

मूंग दाल की 3 उच्च उपज वाली किस्में, जिन में एक मध्यम लवण सहिष्णु किस्म पीएमएस-8 शामिल है. पीएमडी 9 और पीएमडी 10 और 2 लवण सहिष्णु मसूर दाल की किस्में अर्थात पीएसएल-17 और पीएसएल-19 जारी की गई हैं.

तिलहनी फसल सरसों की अनेक किस्में जारी

संस्थान ने भारतीय सरसों की किस्मों को विकसित करने और जारी करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, जो तकरीबन 45 फीसदी सरसों क्षेत्र को अधिकृत करती है. भाकृअनुसं ने कैनोला गुणवत्ता वाली भारतीय सरसों के विकास और व्यावसायीकरण में अग्रणी भूमिका निभाई है. वर्ष 2023 में, 2 उच्च उपज देने वाली डबल जीरो गुणवत्ता वाली सरसों की किस्में, पूसा डबल जीरो मस्टर्ड 35 और पूसा डबल जीरो मस्टर्ड 36 जारी की गईं. कम इरुसिक एसिड और ग्लूकोसाइनोलेट्स दोनों को वाणिज्यिक खेती के लिए जारी किया गया है.

सोयाबीन की नई किस्म

एक एमएएस व्युत्पन्न कुनित्ज ट्रिप्सिन अवरोधकमुक्त सोयाबीन किस्म, डीएस 9421 विकसित और जारी किया गया था.

उच्च बायोइथेनाल के लिए संकर मक्का

वर्ष 2025 तक 20 फीसदी बायोइथेनाल मिश्रित पैट्रोल के सरकार के लक्ष्य की दिशा में आईएआरआई ने उच्च बायोइथेनाल रिकवरी के साथ 2 मक्का संकर विकसित की हैं.

सब्जियों की नई किस्म जारी  

सब्जियों की फसलों में, बैगन की किस्म पूसा छोटा बैगन 1 और संरक्षित खेती के लिए उपयुक्त 2 किस्में अर्थात करेले की किस्म पूसा करेला 2, और पूसा टीओएलसीवी चेरी टमाटर संकर 1 को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के लिए जारी किया गया.

आम की बौनी प्रजाति जारी

देश में पहली बार आम के 2 बौने मूलवृंतों, पूसा मूलवृंत 1 और पूसा मूलवृंत 2 जारी किए गए, जो कलम किए गए आम की ऊंचाई को कम करने में मदद करेंगे और बागबानी के बेहतर प्रबंधन की सुविधा प्रदान करेंगे.

फूलों की अनेक नई किस्में

पुष्प की फसलों में, ग्लेडियोलस की एक मध्य ऋतुकालीन बहुरंगी किस्म, ‘पूसा सिंदूरी‘ को पश्चिम बंगाल, पंजाब, दिल्ली और राजस्थान में खेती के लिए जारी की गई थी. गुलाब की 2 किस्में, जिन में ‘पूसा लक्ष्मी‘, एक फ्लोरिबंडा प्रकार की गहरे गुलाबी रंग की किस्म और ‘पूसा भार्गव‘, एक हाइब्रिड टी टाइप गुलाबी रंग की किस्म को उद्यान प्रदर्शन के उद्देश्यों के लिए पहचाना गया था.

गेंदे की 2 किस्मों, ‘पूसा पर्व‘, जिस में गहरा लाल रंग होता है और ‘पूसा उत्सव‘, जिस में गहरे नारंगी रंग के फूल होते हैं, को लूज फ्लावर और बेडिंग के उद्देश्यों के लिए पहचाना गया था.

8 बीज उत्पादन में बढ़ोतरी

भाकृअनुसं किस्मों को लोकप्रिय बनाने के लिए संस्थान ने लगभग 6,700 क्विंटल प्रजनक बीज और 16,400 क्विंटल ट्रुथफुली लैबल वाले बीज का उत्पादन किया है और लगभग 22.00 करोड़ रुपए की राजस्व प्राप्त किया है.

पराली जलाने के मामलों पर निगरानी

अक्तूबर और नवंबर माह के दौरान एक प्रमुख समस्या धान के पुआल जलाने को कम करने के लिए, भाकृअनुसं उपग्रह चित्रों का उपयोग कर के भारत के 6 राज्यों में धान के अवशेष जलाने की वास्तविक समय पर निगरानी करता है. इसे दैनिक बुलैटिन को हितधारकों के साथ साझा किया गया. धान के पुआल को जलाने की रोकथाम में उपयोग के लिए क्रीम्स वैबसाइट और आईसीएआर जियो पोर्टल पर मानचित्र के रूप में उपलब्ध कराया गया. पिछले साल की तुलना में पंजाब व हरियाणा में पुआल के जलने के घटनाक्रम में 26.5 फीसदी और 37.0 फीसदी की कमी आई, जबकि उत्तर प्रदेश में 32.5 फीसदी, राजस्थान में 40.0 फीसदी और मध्य प्रदेश में 6.5 फीसदी की वृद्धि हुई.

नई पद्धति विकसित

संस्थान ने ‘‘कार्बन क्रेडिट‘‘ को प्रोत्साहित करने के लिए उपग्रह रिमोट सैंसिंग का उपयोग कर के किसानों द्वारा अपनाई गई पुनर्योजी कृषि पद्धतियों के मापन, रिपोर्टिंग और सत्यापन के लिए कम लागत वाली पद्धति विकसित की है.

उर्वरक पर भी फोकस

हम ने नत्रजन, फास्फोरस, जिंक, और बोरोन से भरपूर नवीन नैनो क्ले पौलिमर कंपोजिट उर्वरक फार्मूलेशन विकसित और मान्य किया है, जिस में नत्रजन और फास्फोरस के लिए उर्वरक निर्माणी दर को 25 फीसदी तक कम करने और बोरोन व जिंक की दक्षता को 3 से 5 गुना तक कम करने की क्षमता है.

ड्रोन का इस्तेमाल

संस्थान ने जमीन, ड्रोन और उपग्रह प्लेटफार्म आधारित सैंसर का उपयोग कर के कृत्रिम बुद्धिमत्ता के आधार पर मिट्टी और फसल स्वास्थ्य की निगरानी हेतु पद्धति विकसित की है. साथ ही, पोषक तत्वों सहित 14 मृदा स्वास्थ्य मापदंडों के माप के लिए एक सैंसर आधारित विधि विकसित की गई है.

उच्च एनयूई चावल किस्में

मिट्टी के स्वास्थ्य और जलवायु तन्यकता हेतु, संस्थान ने उच्च एनयूई चावल की किस्मों से सिनकौम (सिंथैटिक माइक्रोबियल समुदाय) विकसित किया है. इसे चावल में पौधों की वृद्धि को बढ़ावा देने में अत्यधिक कुशल पाया गया है.

रोबोट से होगी रसायनों की बचत

खरपतवारनाशी के सटीक अनुप्रयोग के लिए एक सौर ऊर्जा संचालित वैरिएबल स्वाथ हर्बिसाइड एप्लिकेटर रोबोट विकसित किया गया है, जो पारंपरिक विधि की तुलना में लगभग 25 फीसदी रसायनों की बचत करता है.

कीट प्रबंधन तकनीक का विकास

पर्यावरण के अनुकूल और कम लागत वाला प्रभावी कीट प्रबंधन तकनीक, ‘‘मीफ्लाई किट‘‘ का विकास किया गया है, जो कि फल मक्खियों और सब्जियों की फसलों में सफेद मक्खियों के प्रबंधन के लिए उपयुक्त है.

किसानों की समस्या का समाधान

संस्थान ने कृषि सलाहों के साथ दूरदराज के किसानों तक पहुंचने के लिए एक वीडियो आधारित प्रसार मौडल ‘‘पूसा समाचार‘‘ विकसित किया है. यह हिंदी, तेलुगु, कन्नड़, तमिल, बांग्ला और उड़िया सहित 6 अलगअलग भाषाओं में एक साप्ताहिक कार्यक्रम है, जो हर शनिवार को शाम 7 बजे संस्थान के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर प्रसारित होता है. वर्तमान में यह 44,000 सब्सक्राइबर के साथ 14 लाख व्यूज प्राप्त कर चुका है. इस के अंतर्गत ‘पूसा व्हाट्सएप सलाह‘ (9560297502) नंबर भी किसानों को दिया गया है, जिस के द्वारा किसानों को व्हाट्सएप के माध्यम से प्रश्न पूछने और विशेषज्ञों से उत्तर देने की सुविधा दी जा रही है.

28 फरवरी से 1 मार्च तक किसान मेला

संस्थान नवीनतम तकनीकों का प्रदर्शन करने और हितधारकों के बीच कृषि जानकारी को बढ़ावा देने के लिए सालाना आधार पर पूसा कृषि विज्ञान मेले का आयोजन करता है. पिछले साल मेले की थीम ‘‘श्रीअन्न पोषण, खाद्य एवं पर्यावरण सुरक्षा‘‘ रखी गई थी, जिस में एक लाख से अधिक किसानों ने भाग लिया था. इस साल मेला 28 फरवरी से 1 मार्च, 2024 के दौरान ‘कृषि उद्यमिताः समृद्ध किसान‘ विषय पर आयोजित किया जाएगा.

नवाचारों को मान्यता

मेले के दौरान संस्थान ने 40 किसानों को उन के नवाचारों के लिए ‘अध्येता’ और ‘नवोन्मेषी’ किसानों के रूप में मान्यता दी है.

किसानों को हुआ लाभ

विभिन्न आउटरीच कार्यक्रमों के तहत सलाह और क्षमता निर्माण के अलावा बीज, रोपण सामग्री और उपकरणों की उपलब्धता के माध्यम से लगभग 76,497 किसान सीधे लाभान्वित हुए हैं.

कृषि नवाचारों को बढ़ावा

‘‘पूसा कृषि‘‘ के माध्यम से हम इस संस्थान में कृषि नवाचारों को बढ़ावा देते हैं. साल 2023-24 के दौरान, 3 पेटेंट दिए गए, और 6 ट्रेडमार्क और 3 कौपीराइट पंजीकृत किए गए. 176 कंपनियों के लिए 64 प्रौद्योगिकियों का व्यावसायीकरण किया गया और 4.75 करोड़ रुपए का राजस्व अर्जित किया गया.

आलू फसल में पिछेती झुलसा, करें बचाव

हिसार : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला, हिमाचल प्रदेश द्वारा विकसित इंडोब्लाइटकास्ट पैन इंडिया मौडल से पिछेती झुलसा बीमारी का पूर्वानुमान लगाया गया है.

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बीआर कांबोज ने कहा कि वैज्ञानिक फसलों में आने वाली समस्याओं के बारे में समय से पहले किसानों को लगातार सलाह दे रहे हैं. इसी कड़ी में आलू से संबंधित किसानों को सलाह दी जा रही है कि भविष्य में हिसार जिले में आलू की फसल में पिछेती झुलसा बीमारी आने की संभावना है.

करें फफूदीनाशक का छिड़काव

जिन किसानों ने आलू की फसल में अभी तक फफूंदनाशक दवा का छिड़काव नहीं किया है या जिन की आलू की फसल में पिछेती झुलसा बीमारी प्रकट नहीं हुई है, वे किसान भी मैन्कोजेब इंडोफील एन-45 या मैनजेब दवा 600 से 800 ग्राम प्रति एकड़ के हिसाब से फसल में छिड़काव करें. साथ ही, 10 दिन के अंतराल पर किसान आलू की फसल से जल निकासी का उचित प्रबंध करें और खेतों को खरपतवार रहित रखें.

कृषि महाविद्यालय के सब्जी विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डाक्टर एसके तेहलान ने कहा कि पिछेती झुलसा बीमारी फाइटोपथोरा इन्फेसटाइंस फफूंद के कारण होता है, जिस का प्रभाव पौधों के सभी भागों जैसे पत्तियों, तने व कंदों पर दिखाई पड़ता है. पिछेती झुलसा बीमारी का प्रांरभिक लक्षण आलू के पौधों की पत्तियों पर धब्बों के रूप में दिखाई देता है जो बाद में गहरे भूरे तथा बैगनी रंग में बदल जाता है.

उन्होंने आगे कहा कि किसानों को आलू की फसल को पिछेती झुलसा बीमारी से बचाने के लिए समयसमय पर फफूंदनाशक दवाओं का छिड़काव करते रहना चाहिए. साथ ही, फसल की निगरानी हर 10 दिन के अंदर करते रहना चाहिए.

वैज्ञानिक डाक्टर राकेश चुघ ने किसानों को आलू की फसल में पिछेती झुलसा बीमारी के लक्षण और रोकथाम की विस्तारपूर्वक जानकारी देते हुए बताया कि आलू के पौधों की पत्तियों पर यदि धब्बे दिखाई देते हैं तो उस के चारों तरफ हलके पीले रंग का घेरा भी बन जाता है. साथ ही, मौसम में बदलाव होने पर तापमान में अधिक नमी का होना और बादल छाए रहते हैं तो धब्बे बड़े होने लग जाते हैं, जिस से पत्तियों की निचली सतह पर फफूंद की परत जमने लगती है, इसलिए आलू किसान समय रहते फसल सुरक्षा का ध्यान रखें.

खेतीकिसानी के विकास में महिलाओं की खास भूमिका

नई दिल्ली, 9 अक्तूबर 2023. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद व सीजीआईएआर जैंडर इंपैक्ट प्लेटफार्म द्वारा ‘अनुसंधान से प्रभाव तक: न्यायसंगत और अनुकूल कृषि खाद्य प्रणालियों की दिशा में बढ़ते कदम’ विषय पर आयोजित 4 दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किया.

इस समारोह में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, राज्य मंत्रीगण कैलाश चौधरी व शोभा करंदलाजे, कृषि सचिव मनोज अहूजा, आईसीएआर के महानिदेशक डाक्टर हिमांशु पाठक, सीजीआईएआर के कार्यकारी प्रबंध निदेशक डाक्टर एंड्रयू कैंपबैल, दक्षिण एशिया क्षेत्रीय निदेशक डाक्टर टेमिना ललानी शरीफ, जैंडर प्लेटफार्म निदेशक डाक्टर निकोलीन डे हान विशेष रूप से मौजूद थे.

मुख्य अतिथि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सम्मेलन में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिनिधियों व वैज्ञानिक समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि यदि कोई समाज न्याय रहित है, तो उस की समृद्धि के बावजूद अस्तित्व समाप्त हो जाएगा. कोविड-19 महामारी ने कृषि और खाद्य प्रणालियों और समाज में संरचनात्मक असमानता के बीच मजबूत संबंध भी सामने ला दिया है.

वैश्विक स्तर पर हम ने देखा है कि महिलाओं को लंबे समय तक कृषि और खाद्य प्रणालियों से बाहर रखा गया, जबकि वे कृषि संरचना के सब से निचले पिरामिड का बड़ा हिस्सा हैं, लेकिन उन्हें निर्णय लेने वालों की भूमिका निभाने के लिए सीढ़ी पर चढ़ने के अवसर से वंचित किया जाता है. दुनियाभर में उन्हें भेदभावपूर्ण सामाजिक मानदंडों और ज्ञान, स्वामित्व, संपत्ति, संसाधनों व सामाजिक नैटवर्क में बाधाओं द्वारा रोका जाता है.

उन के योगदान को मान्यता नहीं दी गई, उन की भूमिका को हाशिए पर रखा गया, कृषि और खाद्य प्रणालियों की पूरी श्रृंखला में उन के योगदान को नकार दिया गया है. इस कहानी को अब बदलने की जरूरत है. भारत में हम विधायी और सरकारी हस्तक्षेपों के माध्यम से महिलाओं को और अधिक सशक्त होने के साथ उन परिवर्तनों को देख रहे हैं.

Female Farmerराष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने आगे कहा कि आधुनिक महिलाएं अबला नहीं, बल्कि सबला हैं यानी असहाय नहीं, बल्कि शक्तिशाली हैं. हमें न केवल महिला विकास, बल्कि महिला नेतृत्व वाले विकास की जरूरत है. हमारी कृषि और खाद्य प्रणालियों को अधिक न्यायसंगत, समावेशी और न्यायसंगत बनाना न केवल वांछनीय है, बल्कि धरा और मानव जाति की भलाई के लिए महत्वपूर्ण भी है.

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने आगे कहा कि जलवायु परिवर्तन एक अस्तित्वगत खतरा है, हमें अभी व तेजी से कार्रवाई करने की जरूरत है. जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, बर्फ पिघलने और प्रजातियों के विलुप्त होने से खाद्य उत्पादन बाधित हो रहा है और कृषि और खाद्य चक्र भी टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल नहीं है. कृषि और खाद्य प्रणालियों को दुष्चक्र से बाहर निकालने के लिए चक्रव्यूह तोड़ने की जरूरत है. उन्होंने जैव विविधता बढ़ाने व पारिस्थितिकी तंत्र बहाल करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया, ताकि सब के लिए अधिक समृद्ध व न्यायसंगत भविष्य के साथ कृषि और खाद्य प्रणालियों के माध्यम से खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकें.

इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय अध्यक्षता में जी-20 का ऐतिहासिक आयोजन हुआ, जिस के घोषणापत्र में महिलाओं की खाद्य सुरक्षा एवं पोषण पर बल दिया गया है, जो व्‍यक्तिगत व सामुदायिक विकास की आधारशिला है, क्‍योंकि इस से महिलाओं के स्‍वास्‍थ्‍य के साथ बच्‍चों, परिवार, समुदाय की बेहतरी की बुनियाद पड़ती है.

खाद्य प्रणालियों में कृषि की महत्‍वपूर्ण भूमिका है, जिस का देश के सामाजिक विकास में व्‍यापक व महत्वपूर्ण योगदान है. कृषि आउटपुट में भारत विश्‍व का दूसरा सब से बड़ा देश है. जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान 14 फीसदी है. इस क्षेत्र में आधी से भी अधिक आबादी को रोजगार मिलता है. 84 फीसदी भारतीय महिलाएं आजीविका के लिए कृषि व संबद्ध क्षेत्रों पर निर्भर हैं.

भारतीय कृषि की सफलता में मेहनतकश किसानों की अहम भूमिका है. देश में 86 फीसदी छोटेमझौले किसान हैं, जिन्‍होंने चुनौतियों का सामना करते हुए राष्‍ट्र का भरणपोषण करने में लगातार योगदान दिया व अन्य देशों को भी आपूर्ति कर पाए.

नाबार्ड के अध्यक्ष ने भाकृअनुप-नार्म में 113वें फाउंडेशन कोर्स का किया उद्घाटन

हैदराबाद: 18 जुलाई, 2023. नाबार्ड के अध्यक्ष शाजी केवी ने भाकृअनुप-राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रबंधन अकादमी, हैदराबाद में कृषि अनुसंधान सेवा के लिए 113वें फाउंडेशन कोर्स का उद्घाटन किया. फाउंडेशन कोर्स में 21 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों से कृषि और संबद्ध विज्ञान विषयों के 32 एआरएस विषयों का प्रतिनिधित्व करने वाले 69 वैज्ञानिक परिवीक्षार्थियों का नामांकन हुआ.

परिवीक्षाधीनों को अगले 3 महीनों के लिए 3 चरणों में फाउंडेशन प्रशिक्षण से गुजरना होगा. इस में 27 महिला और 42 पुरुष परिवीक्षाधीन थे.

शाजी केवी ने अपने उद्घाटन संबोधन में जलवायु परिवर्तन से संबंधित मुद्दों पर काबू पाने के लिए स्थायी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर जोर दिया. उन्होंने अनुसंधान और विकास में अधिक व्यय करने के महत्व पर भी जोर दिया और वैश्विक स्थिरता के प्रति हमारे देश की प्रतिबद्धता पर भी प्रकाश डाला.

उन्होंने आगे कहा कि हमारे देश को उत्पादन और उत्पादकता के मौजूदा स्तर को बनाए रखना चाहिए और फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने की दिशा में काम करना चाहिए.

सम्मानित अतिथि प्रो. अप्पा राव पोडिले, पूर्व कुलपति, हैदराबाद विश्वविद्यालय ने युवा परिवीक्षार्थियों से वन हेल्थ अवधारणा पर काम करने का आग्रह किया यानी मिट्टी, पौधे और पशु स्वास्थ्य को बनाए रखना.

उन्होंने बताया कि 30-40 फीसदी फसल जैविक रूप से सूक्ष्मजीवों से प्रभावित होती है और जीन संपादन सामान्य रूप से फसल उत्पादन और विशेष रूप से उत्पादकता को बढ़ावा देने के लिए आधुनिक तंत्र है.

सभी वैज्ञानिक प्रशिक्षुओं ने देश के साथसाथ भारत के संविधान की सेवा के प्रति निष्ठा की शपथ ली.

भाकृअनुप-एनएएआरएम के निदेशक, डा. चिरुकमल्ली श्रीनिवास राव ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में युवा वैज्ञानिकों की बदलती जरूरतों के अनुसार नवाचारों, जैसे- युवा वैज्ञानिकों के साथ इंटरैक्टिव सत्र, महिला निदेशकों की बातचीत और अकादमी उद्योग इंटरफेस एवं 113वें एफओसीएआरएस में वैज्ञानिक परिवीक्षार्थियों के साथ स्टार्टअप बातचीत का उल्लेख किया.

उन्होंने एफओसीएआरएस प्रशिक्षण कार्यक्रम के 3 चरणों का भी उल्लेख किया. पहला चरण अभिविन्यास एवं क्षमता निर्माण पर केंद्रित है, जबकि दूसरा और तीसरा चरण क्रमशः फील्ड अनुभवात्मक प्रशिक्षण (एफईटी) एवं बहुविषयक परिप्रेक्ष्य पर केंद्रित है.

नार्म के संयुक्त निदेशक डा. जी. वेंकटेश्वरलू ने नाबार्ड और नार्म के बीच संस्थागत सहयोग पर प्रकाश डाला.

डा. एनए विजय अविनाशिलिंगम, डा. बीएस यशवंत और डा. बीएस सोंतक्के पाठ्यक्रम निदेशक थे.

पूसा डीकंपोजर से बनाएं कंपोस्ट

कंपोस्ट एक कार्बनिक पदार्थ है, जिसे कृषि अवशेषों को सड़ागला कर बनाया जाता है. यह पौधों को बढ़ने में उर्वरक की तरह मदद करता है. फसल अवशेषों से कंपोस्ट बनाना बेहद आसान है.

कंपोस्ट बनाने के लिए फसल के बाद बचीखुची खेती की बेकार चीजों जैसे पुआल, फूल, पत्ते, घास, सब्जियां वगैरह के अवशेष और पशुओं के मल जैसे गाय, भैंस, मुरगी व रसोई का हरा कचरा पर्याप्त होते हैं.

धान के पुआल के अलावा सब्जियों, मक्का, दलहनी फसलों के अवशेष, पेड़ों की पत्तियां वगैरह का भी अच्छी क्वालिटी का कंपोस्ट बना सकते हैं.

इन फसल अवशेषों का तेजी के साथ जैव विघटन यानी कंपोस्ट खाद बनाने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली के सूक्ष्म जीव विज्ञान संभाग द्वारा एक कंपोस्ट कल्चर पूसा डीकंपोजर विकसित किया है. इसे हम आसान भाषा में टीका भी कह सकते हैं.

इस कंपोस्ट कल्चर टीका की मदद से फसल या कंपोस्ट बनाने की प्रक्रिया तेजी से होती है और उच्च गुणवत्ता वाली कंपोस्ट से मिट्टी में मौजूद पोषक तत्त्वों का सुधार होता है. इस कंपोस्ट को अच्छी क्वालिटी का जैविक खाद माना गया है.

कंपोस्ट बनाने की सरल पिट या गड्ढा विधि

सब से पहले कंपोस्ट बनाने के लिए किसानों को पशुओं के बाड़े के पास गड्ढा बनाना चाहिए, जिस से अवशेषों को डालने में आसानी हो.

गड्ढा जमीन की सतह से ऊपर होना चाहिए, जिस से बाहरी पानी गड्ढे में न आ सके. इस के अलावा गड्ढे के ऊपर टिन या खपरैल की छत बनानी चाहिए, ऐसा करने से बारिश का पानी अंदर नहीं गिरता और चील, कौए व दूसरे पक्षी का कोई भी अवांछित पदार्थ जैसे मरे हुए चूहे, छिपकली व हड्डियां वगैरह नहीं फेंक सकते और पक्षियों की बीट यानी मल उस के ऊपर नहीं गिरता, जिस से फालतू के खरपतवार नहीं उग पाते.

गड्ढे को पक्का बनाने से पानी और पोषक तत्त्वों का जमीन के अंदर रिसाव नहीं हो पाता. गड्ढे की गहराई 1.0 मीटर, चौड़ाई 2 मीटर और लंबाई 8 मीटर होनी चाहिए.

गड्ढे को 2 तरीकों से भरा जा सकता है, लेकिन जब भी गड्ढा भरना हो, उसे 24 घंटे में संपूर्ण कर देना चाहिए.

गड्ढे में सब से पहले धान के पुआल या सूखी पत्तियों की 1-2 परत फैलाई जाती है, फिर उस में गोबर/फार्म से निकला कचरा, कुक्कुट बीट व पूसा डीकंपोजर, पुरानी सड़ीगली खाद, उर्वरक मिट्टी का घोल बना कर एकसमान तरीके से छिड़काव किया जाता है. इस प्रक्रिया को तब तक दोहराया जाता है, जब तक गड्ढा पूरा न भर जाए.

मिश्रण बनाने का तरीका

इस विधि में फसल के अवशेष, गोबर या कुक्कुट बीट, पुराना कंपोस्ट व उर्वरक मिट्टी का अनुपात क्रम के हिसाब से 8:1:0.5:0.5  में रखा जाता है. सूखे पुआल के लिए कम से कम 90 फीसदी नमी हो. पानी की मात्रा अधिक नहीं होनी चाहिए. एक मुट्ठी में मिश्रण को दबा कर देखने से बूंदबूंद पानी गिरना चाहिए. सारे मिश्रण को गड्ढे में पूसा कंपोस्ट कल्चर यानी टीका के साथ मिला कर सड़नेगलने के लिए छोड़ देना चाहिए. अधिक गरमी या सर्दी होने पर सब से ऊपर एक हलकी परत मिट्टी की डालनी चाहिए, इस से नमी की मात्रा कम नहीं होती है.

15 दिनों के अंतर पर गड्ढे के अंदर पलटाई की जाती है और इसी तरह से अगले 15 दिनों के अंतर पर 3 पलटाई की जाती हैं.

धान का पुआल 90 दिनों में, सूखी पत्तियां 60 दिनों में और हरी सब्जियों के अवशेष 45 दिनों में पूरी तरह सड़गल जाते हैं और उत्तम गुणवत्ता वाली कंपोस्ट तैयार हो जाती है. तैयार खाद गहरी भूरी, भुरभुरी व बदबूरहित होती है.

कंपोस्ट के लाभ

* कंपोस्ट के प्रयोग से मिट्टी अपने अंदर अधिक मात्रा में कार्बनिक कार्बन का संगठन करती है, जिस के बहुत लाभकारी प्रभाव होते हैं.

* निरंतर कंपोस्ट का प्रयोग करने से मिट्टी की अपने अंदर हवा और पानी बनाए रखने की कूवत व मात्रा बढ़ जाती है.

* भूमि नरम हो जाती है. पौधों की जड़ें गहराई तक जाती हैं और जुताई आसानी से हो जाती है.

* मिट्टी में पोषक तत्त्वों का संतुलन बना रहता है. पोषक तत्त्वों से समृद्ध खाद के प्रयोग से मिट्टी की सेहत में काफी सुधार हो जाता है.

* कंपोस्ट बनाना और बेचना एक कामयाब धंधा भी है और यह देश के नौजवानों की बेरोजगारी को दूर करने में मददगार हो सकता है.

कृषि एवं खाद्य सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के समाधान में वैज्ञानिकों की महती जिम्मेदारी

नई दिल्ली : 18 जुलाई 2023. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के 95वें स्‍थापना दिवस समारोह का समापन केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के मुख्य आतिथ्य में हुआ.

इस अवसर पर उन्होंने कहा कि कृषि एवं खाद्य सुरक्षा के संबंध में वर्तमान व भविष्य की चुनौतियों के समाधान में आईसीएआर के वैज्ञानिकों की महती जिम्मेदारी है, इन में वे सफल हों. साथ ही, वैज्ञानिकों का अनुसंधान आम लोगों के ध्यान में भी आएं, वे और प्रशंसा के पात्र बनें, इस दृष्टि से स्थापना दिवस को प्रौद्योगिकी दिवस के रूप में मनाने की सार्थकता है.

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि हमारे कृषि प्रधान देश में किसानों के अथक परिश्रम, वैज्ञानिकों के अनुसंधान व केंद्र एवं राज्यों की किसान हितैषी नीतियों के कारण हमारा देश आज खाद्यान्न अतिशेष बन चुका है और अधिकांश कृषि उत्पादों की दृष्टि से दुनिया में नंबर वन या टू पर है.

farming

उन्होंने यह भी कहा कि हमारे वैज्ञानिकों का दूरगामी दृष्टिकोण भारत को हर विधा में नंबर वन पर पहुंचाने का है और इस दिशा में आईसीएआर के संस्थानों से ले कर देशभर के कृषि विज्ञान केंद्रों तक, सभी वैज्ञानिक प्रयत्नशील हैं.

कृषि क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन की चुनौती हम सब लोगों क सामने है, सारी दुनिया इस से जूझ रही है. जलवायु परिवर्तन के दौर में जिन बीजों की जरूरत है और खाद्यान्न-बागबानी, पशुपालन, मत्स्यपालन क्षेत्र में भी दूरगामी सोच व आपूर्ति की अपेक्षा के अनुरूप हमारे वैज्ञानिक काम कर रहे हैं, उन की सफलता का विश्वास है.

उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि उद्घाटन समारोह के दौरान विभिन्न विषयों से संबंधित 17 समझौतों का आदानप्रदान हुआ. साथ ही, आईसीएआर एवं वैज्ञानिकों को परामर्शदाता के रूप में आगे आने के लिए भागीदारों द्वारा रुचि की अभिव्यक्ति भी की गई है.

आईसीएआर ने 16 जुलाई, 2023 को 95वां स्थापना दिवस मनाया. पहली बार स्थापना दिवस को प्रौद्योगिकी दिवस के रूप में मनाया गया. परिषद द्वारा विकसित प्रौद्योगिकियों व नवाचारों के बारे में लोगों को बताने व जागरूक करने के लिए प्रदर्शनी भी आयोजित की गई, जिस में किसानों, कृषि उद्योग से जुड़े लोगों ने सहभागिता की.

प्रदर्शनी का केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने अवलोकन किया. इस में नई दिल्ली के विभिन्न विद्यालयों के विद्यार्थियों ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया व वैज्ञानिकों से संवाद किया. इस तरह के प्रयासों से छात्रछात्राओं को कृषि विज्ञान के क्षेत्र से जुड़ने की प्रेरणा मिलती है.

 

आईसीएआर के महानिदेशक डा. हिमांशु पाठक ने बताया कि आयोजन के दौरान कृषि नवाचारों को बढ़ावा देने व व्यावसायीकरण के लिए वैज्ञानिक उद्योग इंटरफेस बैठकें भी साइड इवेंट में आयोजित की गई. कार्यक्रम में किसान, स्टार्टअप प्रतिनिधि, आईसीएआर कर्मी भी मौजूद थे.