खाजा : स्वाद से भरपूर, देशी मिठाई

हमारे देश में मिठाइयों की भरमार है. मिठाई अलगअलग तरह के प्रयोग और नाम से तैयार की जाती है. उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तर भारत के कई राज्यों में बनने वाली मिठाई खाजा भी है. खाजा यानी वह मिठाई, जिसे देखते ही खाने का मन करे.

इसे बनाने में प्रमुख रूप से मैदा, घी और चीनी का प्रयोग होता है. कई शहरों में खाजा बनाते समय ही चेरी, मेवा, खोया और इलायची को भी मिला दिया जाता है.

उत्तर प्रदेश के पश्चिमी इलाकों में इस को खजला नाम से भी जाना जाता है. बुलंदशहर, औरैया, इटावा, आगरा और राजस्थान के तमाम इलाकों में इस को खजला के नाम से ही जाना जाता है.

खजला बड़ी पूरी के आकार का बनता है. इस में मेवा, चेरी भर कर स्वादिष्ठ बना दिया जाता है. गोलगोल खाजा बनने के अलावा चपटे आकार का खाजा भी बनता है. उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ इलाके में इस को केवल आटा, घी और चीनी के प्रयोग से तैयार किया जाता है.

गांव के कई इलाकों में खाजा का इस्तेमाल इसलिए भी ज्यादा होता है क्योंकि इस मिठाई को 15-20 दिन तक आराम से खा सकते हैं. ऐसे में इसे शादीविवाह में देने और खानेपीने के रूप में ज्यादा पसंद किया जाता है.

मेले में लगने वाली दुकानों में यह सब से ज्यादा दिखाई देता है. कीमत के हिसाब से देखें तो यह सस्ती मिठाई है. 150 से 250 रुपए किलोग्राम तक के भाव में यह आसानी से मिल जाती है.

खाजा खाने में बेहद कुरकुरा होता है. इस को कुरकुरा बनाने के लिए आटे में गूंदते समय घी का इस्तेमाल ज्यादा किया जाता है. इस को सजाने के लिए खोया, चेरी और मेवा का इस्तेमाल किया जाता है.

गोरखपुर की रहने वाली रंजना वर्मा कहती हैं कि खाजा केवल मिठाई नहीं है, बल्कि यह हमारे देशी चलन का हिस्सा है. आज के समय में शादीविवाह में पुरानी मिठाइयों का चलन वापस लौटता नजर आ रहा है. ऐसे में एक बार फिर से देशी मिठाइयां ट्रेंड में आ गई हैं. शादीविवाह में यह मिठाई उपहार के रूप में भी दी जाती है.

यही वजह है कि पुरानी देशी मिठाइयां बाजार में फिर से जगह बनाती जा रही हैं. मेलों में लोग देशी मिठाई का स्वाद लेना चाहते हैं. इन की दुकानें भी रोजगार का जरीया बन गई हैं. मेवा और खोया की जगह अनाज से बनी मिठाइयां सब से ज्यादा मशहूर हो रही हैं.

खाजा बनाने के लिए सामग्री

एक कप मैदा. मैदा में मिलाने के लिए 2 चम्मच घी. पेस्ट के लिए 2 चम्मच घी और मैदा अलग से लें. चाशनी बनाने के लिए आधा कप चीनी, आधा कप से कम पानी और इलायची पाउडर लें. खाजा को सजाने के लिए आधा कप सूखे और पिसे हुए मेवे का मिश्रण. मावा आधा कटोरी और चेरी आधा कप तैयार करें. खाजा को तलने के लिए घी या तेल इस्तेमाल करें.

ऐसे तैयार करें खाजा

मैदे में घी को हलका गरम कर के मोयन बना लें. पानी के सहारे मुलायममुलायम आटा गूंद लें. तकरीबन 20 मिनट तक आटा ढक कर रख दें. पानी और चीनी को मिला कर चाशनी तैयार करने के लिए पहले इस को गरम करें. इस में इलायची पाउडर भी मिला दें. चीनी गाढ़ी हो कर चाशनी में तबदील हो जाए तो इस को अलग रख दें.

अब आटे की पतली पूरी बेल कर इस में घी और मैदे का पेस्ट लगाएं. दूसरी पूरी बेल कर इस के ऊपर रखें. इस तरह से कई पूरियां पेस्ट लगा कर ऊपर रखें. इस को रोल करें और एक बार फिर से बेल कर कड़ाही में घी और तेल डाल कर तलें. पूरी तरह से यह पूरी गोलगोल हो कर तैयार होगी. इस को निकाल कर पहले से बनी चाशनी में डाल दें. जब चाशनी में ठंडी हो जाए तो सूखे मेवे, चेरी और मावा डाल कर इस को सजा दें. जब आप खा कर देखेंगे तो ऐसा लगेगा जैसे कह रहा हो मुझे खाजा.

रेन गन से सिंचाई

हमारे यहां खेतीकिसानी करना कोई आसान काम नहीं है. इस के लिए दिनरात खेतों में मेहनत करनी पड़ती है. कैसा भी मौसम हो, किसान के कामों में रुकावट नहीं आ सकती, क्योंकि हर मौसम में खेतों में खाद, पानी, कीटनाशक और खरपतवारों की निराईगुड़ाई करनी पड़ती है.

सर्दियों में कड़ाके की ठंड में दिन हो या रात, किसान सिंचाई के लिए खेतों में जाते हैं. कभीकभी तो किसानों की सर्दी लगने से मौत भी हो जाती है,क्योंकि सिंचाई करने के लिए उन्हें खेतों में घुसना पड़ता है और वे ठंड की चपेट में आ जाते हैं.

रेन गन तरीके से सिंचाई करने में कम पानी लगता है और किसानों की मेहनत कम लगती है. साथ ही, उन की आमदनी में भी इजाफा होता है.

नई तकनीक के जमाने में किसानों की राह आसान करते हुए माहिरों ने रेन गन ईजाद की है. इस से किसानों को यह फायदा होगा कि वे खेतों में घुसे बिना बाहर से ही रेन गन के जरीए सिंचाई कर देंगे, जबकि अभी तक उन को अपनी जान जोखिम में डाल कर सिंचाई करनी पड़ती थी.

एक फायदा और होगा कि खेतों में बहुत ज्यादा पानी भरने की जरूरत नहीं होगी, बल्कि कम पानी में ही खेतों की सिंचाई हो जाएगी.

नई तकनीक से किसानों को खेतों में सिंचाई करना पहले के मुकाबले में अब आसान हो गया है. उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले में फसलों की सिंचाई के लिए किसानों ने रेन गन का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है.

सरकार किसानों की माली हालत देखते हुए इस में सब्सिडी भी दे रही है. जिले के कई किसानों को इस का फायदा दिया जा चुका है. संबंधित महकमे का टारगेट ज्यादा से ज्यादा किसानों तक इस तकनीक को पहुंचाना है, ताकि सुविधा के साथ ही पानी की भी बचत की जा सके.

देश के किसानों की समस्या यह है कि उन्हें जो भी स्कीम सरकार की तरफ से मिलती है, उस का ज्यादातर फायदा बड़े किसान ही उठाते हैं. छोटे किसानों को सरकार को दिखाने के लिए नाममात्र का फायदा दिया जाता है.

किसानों को रेन गन प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत दी जा रही है. इस स्कीम में किसानों को 3 इंच मोटे 20 फुट के 25 पाइप, 5 फुट का स्टैंड और रेन गन दी जाती है. इस की लागत 46,880 रुपए है.

किसानों को सब्सिडी में महज 11 हजार रुपए ही दिए जा रहे हैं. किसानों को यह फायदा डीबीटी योजना के तहत मिलता है.

rain gun irrigation

कृषि माहिरों का कहना है कि रेन गन से 25-30 मीटर तक सिंचाई की जा सकती है. यह चारों तरफ सिंचाई करती है. यदि किसान सिर्फ एक तरफ ही सिंचाई करना चाहें तो एक तरफ ही रेन गन लगाई जा सकती है.

उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में पानी का जमीनी लैवल काफी नीचे जा चुका है और कलक्ट्रेट ने ऐसे इलाकों में सबमर्सिबल बोर करवाने में रोक लगा रखी है.

इस फैसले से किसानों को नुकसान उठाना पड़ा था, लेकिन इस नए तरीके से उन के नुकसान की भरपाई की जा सकती है.

मक्का और गन्ने के लिए ज्यादा फायदेमंद : रेन गन मक्का और गन्ने की फसल के लिए काफी अच्छी है. इस का इस्तेमाल शुरुआती दौर में बागबानी में भी किया जा सकता है, खासकर पौधे जब छोटे हों.

5 फुट के पाइप को बीच में लगा कर चारों ओर बारिश कराई जा सकती है. इस तरीके से तकरीबन 1 एकड़ क्षेत्रफल में फायदा होगा.

मक्का और गन्ने की फसल के लिए रेन गन काफी कारगर साबित हो रही है. वजह यह है कि मक्का हो या गन्ना, इस के पौधे काफी बड़े और ऊंचे होते हैं. इस वजह से खेतों के अंदर जा कर सिंचाई करने में काफी परेशानी होती है. लेकिन इस के इस्तेमाल से बाहर से ही बड़े क्षेत्रफल में पानी की बारिश की जा सकती है.

सर्दियों के मौसम में आलू की फसल में हलकी सिंचाई की जरूरत पड़ती है. अभी तक किसानों की मुश्किल यह थी कि सिंचाई के नाम पर खेतों में खूब पानी भर दिया जाता था. इस से पानी की खपत भी ज्यादा होती थी और किसानों का खर्च भी ज्यादा होता था. आलू के खेतों में रेन गन से बारिश कराई जा सकती है और जो नमी बचती है, उसी में जुताई भी की जा सकती है. इस से पानी की तकरीबन 60 फीसदी बचत होती है और किसानों का खर्च भी कम होता है.

कुछ फसलें खेत में ज्यादा पानी भरने से खराब हो जाती हैं और पौधे कभीकभी सड़ भी जाते हैं, लेकिन रेन गन जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल की जा सकती है. इस में कम पानी की जरूरत होती है और फसल भी खराब नहीं होती.

इस नई तकनीक से किसानों को काफी फायदा हो सकता है. इसे एक किसान खरीद कर दूसरे किसान को किराए पर भी दे कर अपनी लागत निकाल सकता है. साथ ही, दूसरे किसान भी कम किराया अदा कर ज्यादा फायदा कमा सकते हैं.

वकालत का पेशा छोड़ जैविक खेती से तरक्की करता किसान

हाल के सालों में किसानों ने अंधाधुंध रासायनिक खादों और कीटनाशकों का प्रयोग कर धरती का खूब दोहन किया है. जमीन से अत्यधिक उत्पादन लेने की होड़ के चलते खेतों की उत्पादन कूवत लगातार घट रही है, क्योंकि रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग के चलते मिट्टी में कार्बांश की मात्र बेहद कम हो गई है, वहीं सेहत के नजरिए से भी रासायनिक उर्वरकों से पैदा किए जाने वाले अनाज और फलसब्जियां नुकसानदेह साबित हो रहे हैं.

कई देशों में कीटनाशकों से होने वाले नुकसान को देखते हुए उस पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है, क्योंकि फसलों में प्रयोग किए जाने वाले कीटनाशकों के चलते कैंसर और कई तरह की जानलेवा बीमारियां भी सामने आई हैं. ऐसे में जरूरत है कि जमीन की उत्पादकता को बचाए रखने और सेहत को ध्यान में रख कर खेतों में जैव उर्वरकों का प्रयोग किया जाए.

इसी चीज को ध्यान में रख कर उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के रहने वाले 65 साल के किसान राममूर्ति मिश्र ने 30 साल पहले हाईकोर्ट की वकालत का पेशा छोड़ कर अपने पुरखों की जमीन पर जैविक खेती का फैसला किया. वे बस्ती जनपद के एकमात्र किसान हैं, जो फसल में अलगअलग सूक्ष्म पोषक तत्त्वों को ध्यान में रख कर खाद और उर्वरक बनाते हैं.

बस्ती शहर से महज 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गौरा गांव के रहने वाले राममूर्ति मिश्र ने एलएलबी तक की पढ़ाई की है, लेकिन उन्होंने नौकरी न कर खेती में ही किस्मत आजमाने की ठानी.

इस के लिए सब से पहले उन्होंने मार्केट को सम?ा तो पाया कि हर व्यक्ति रासायनिक उत्पादों से पैदा किए अनाज और सब्जियां नहीं खाना चाहता है, लेकिन जैविक उत्पादों की अनुपलब्धता लोगों की मजबूरी बन चुकी है.

ऐसे में उन्होंने जैविक खेती से जुड़ी कई जगहों पर जा कर जानकरी प्राप्त की, कई प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भी शामिल हुए. ऐसे किसानों के यहां भी गए, जो जैविक खेती के जरीए लाभ प्राप्त कर रहे थे.

जब राममूर्ति मिश्र को लग गया कि जैविक खेती को अगर पूरी तैयारी के साथ किया जाए, तो घाटे की संभावना कम होगी.

उन्होंने 30 साल पहले जैविक खेती की शुरुआत कर दी थी. उन्होंने जैविक खेती एक बार शुरू की, तो इस से मिले लाभ ने इन का हौसला दोगुना कर दिया.

घर पर ही तैयार करते हैं खाद और उर्वरक

किसान राममूर्ति मिश्र जगहजगह जा कर सीखे गए जैव उर्वरकों और जैव कीटनाशकों को घर पर ही तैयार करते हैं. वे अलगअलग तरीकों से जैविक खाद तैयार करते हैं.

उन के द्वारा जो जैव उर्वरक तैयार किए गए हैं, उस से उन्हें तमाम तरह के सूक्ष्म पोषक तत्त्व प्राप्त होते हैं, जिस में राख से फास्फोरस, सेंधा नमक से जिंक, मैग्नीज व लोहा गंधक से सल्फर, नीला थोथा से कौपर, सुहागा से बोरोन, सीप और अंडा से कैल्शियम, त्रिफला से लोहा एवं मैग्नीशियम, त्रिकूट से सल्फर और धान की भूसी से सिलिकौन मिलता है.

पहले से तैयार किए गए इन सभी जैव उर्वरकों को वे अलगअलग बोरियों में एकसाथ 20 किलोग्राम की बराबर मात्रा में मिला कर रखते हैं. इस 20 किलोग्राम की मात्रा को प्रति एकड़ की दर से खेत में प्रयोग किया जाता है. इस का प्रयोग जुताई व बोआई से पहले किया जाता है. साथ ही, खड़ी फसल में घोल बना कर स्प्रे करते हैं. इस के लिए 200 लिटर पानी में पहले से एकसाथ मिला कर रखे गए सभी तरह के 4 किलोग्राम जैव उर्वरक को प्रति एकड़ की दर से छिड़का जाता है.

इन जैव उर्वरकों को बनाने के लिए सभी के लिए अलगअलग एक फुट की चौड़ाई, लंबाई और गहराई में गड्ढे खोद लेते हैं. एकदूसरे से गड्ढे की दूरी 6 इंच रखी जाती है. जैव उर्वरक बनाने के लिए पहले से ही सेंधा नमक, नीला थोथा, चूना, सुहागा, नारियल का छिलका, गंधक, रौक फास्फेट और पत्थर के चूर्ण की खरीदारी कर लेनी उपयुक्त होती है. गड्ढों में इन्हें भरने के पहले इन सब को अच्छी तरह से पीस कर चूर्ण बना लेते हैं, फिर इन सभी चीजों को गाय के गोबर में मिला कर अलगअलग गड्ढों में भर लेते हैं.

गड्ढे में भरने के पूर्व ही इन सभी सामग्रियों को अच्छे से तैयार किया जाता है. इस के लिए सुहागा को गरम कर पूरी तरह फुला लेते हैं, फिर उसे पीस कर गड्ढे में गोबर के साथ भरा जाता है. गंधक को भी पीस कर गोबर में मिलाते हैं. त्रिफला को भी पीस कर 20 किलोग्राम गोबर में मिला कर गड्ढे में भरते हैं.

नारियल के छिलके को जला कर उपयोग में लाया जाता है और उसे पीस कर अलग गड्ढे में डालते हैं. यह ‘चारकोल पाउडर’ कहलाता है. धान के 4 किलोग्राम भूसी को लोहे की कड़ाही में गरम कर पूरा काला कर लेते हैं. औक्सीजन की अनुपस्थिति में गरम करने पर इस से सिलिकौन प्राप्त होता है. इसे ‘सिलिकौन भस्म’ भी कहते हैं. अंडे के चूर्ण से कैल्शियम प्राप्त होता है. इसे ‘कैल्शियम भस्म’ कहते हैं. पत्थर के चूर्ण का भी उपयोग उसी गड्ढे में किया जाता है.

इन सभी को गड्ढों में भरने के बाद उस के ऊपर गाय के गोबर के उपले रख देते हैं और फिर उस के ऊपर मिट्टी से लीप देते हैं. ध्यान रखते हैं कि जो गड्ढे बनाए जा रहे हैं, छाया में हों.

इन गड्ढों में दबाए गए उर्वरक 45 दिनों के बाद ऊपर लोहे की छड़ से छेद कर देते हैं. जब इन को दबाए 90 दिन का समय बीत जाता है, तो गड्ढों से इस तैयार उर्वरक को बाहर निकाल लेते हैं, जिन्हें हम अपनी फसल के उपयोग में ला सकते हैं.

पराली नियंत्रण के लिए वेस्ट डीकंपोजर का उपयोग

जहां देशभर के किसान पराली को ले कर हलकान दिखते हैं, वहीं किसान राममूर्ति मिश्र वेस्ट डी कंपोजर के जरीए पराली को नियंत्रित करते हैं. यह मात्र 20 रुपए की एक सीसी आती है, जिस में गुड़बेसन को एकसाथ मिला कर 500 लिटर पानी का घोल बनाते हैं.

20 दिनों के बाद इस तैयार घोल को अगर पराली या फसल के अवशेष पर छिड़का जाए, तो वह अवशेष पूरी तरह समाप्त हो जाता है. उन के द्वारा तैयार इस वेस्ट डीकंपोजर घोल को आसपास के किसान भी इन के जरीए अपने खेतों में प्रयोग करते हैं.

जैविक खेती (Organic Farming)

खेतों में लहलहा रही है फसल

पिछले 3 सालों में राममूर्ति मिश्र ने जैविक खेती के जरीए कई तरह की व्यावसायिक खेती करने में सफलता पाई है. वे मौसम के अनुसार तमाम तरह की सब्जियों की खेती करते हैं. उन के खेतों में उस समय भी फसल लहलहा रही होती है, जब बाजार में कई तरह की सब्जियों की आवक बहुत कम होती है.

वे कई तरह की सब्जियों की खेती करते हैं, जिस में लौकी, नेनुआ, पालक, सरपुतिया, सोया, टमाटर, करेला, मटर, गाजर, मूली, सहित दर्जनों तरह की फसलें शामिल हैं.

इस के अलावा वे अनाज वाली फसलों में भी खुद के द्वारा तैयार किए गए जैविक उत्पादों का ही प्रयोग करते हैं. इस के जरीए वे कालानमक, अलसी, गेहूं जैसी तमाम फसलें भी उगा रहे हैं.

खेतों से सीधे होती है मार्केटिंग

किसान राममूर्ति मिश्र द्वारा उगाई गई जैविक फसलों की मार्केटिंग की अगर बात की जाए, तो आढ़ती इन के खेतों से ही मंडी मूल्य से ज्यादा रेट पर खरीद कर ले जाते हैं, जिस के चलते उन्हें मार्केटिंग के लिए किसी तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता है.

‘हजार और्गैनिक फार्म’ के नाम से पौपुलर

किसान राममूर्ति मिश्र द्वारा शुरू की गई जैविक खेती को उन्होंने ‘हजार और्गैनिक फार्म’ का ब्रांड नाम दे रखा है. ‘हजार’ शब्द में उन के पुरखों का नाम छिपा है. इस मसले पर उन का कहना है कि जिन पुरखों की जमीन ने मुझे रोजगार दिया है, उन को सम्मान देने का इस से बढि़या तरीका और कुछ हो ही नहीं सकता है.

किसान राममूर्ति मिश्र द्वारा की जा रही जैविक खेती से मिली सफलता के मुद्दे पर कृषि विशेषज्ञ डा. प्रेम शंकर का कहना है कि जैविक खेती से भूमि की उपजाऊ क्षमता में वृद्धि हो जाती है, साथ ही साथ सिंचाई के अंतराल में भी वृद्धि होती है.

उन का यह भी कहना है कि जैविक उर्वरकों के उपयोग से रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होने से लागत में कमी आती है और फसलों की उत्पादकता में वृद्धि होती है.

जैविक खेती से मिट्टी को होने वाले लाभ के सवाल पर किसान राममूर्ति मिश्र का कहना है कि अगर मिट्टी की दृष्टि से देखें, तो जैविक खाद के उपयोग से भूमि की गुणवत्ता में सुधार आता है और भूमि की जलधारण की क्षमता बढती है. भूमि से पानी का वाष्पीकरण भी कम होता है.

जैविक खेती की विधि रासायनिक खेती की विधि की तुलना में बराबर या अधिक उत्पादन देती है अर्थात जैविक खेती मिट्टी की उर्वरता एवं किसानों की उत्पादकता बढ़ाने में पूरी तरह सहायक है.

जैविक विधि द्वारा खेती करने से उत्पादन की लागत तो कम होती ही है, साथ ही किसानों को अधिक आय प्राप्त होती है और अंतर्राष्ट्रीय बाजार की स्पर्धा में जैविक उत्पाद अधिक खरे उतरते हैं. नतीजतन, सामान्य उत्पादन की अपेक्षा किसान अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं.

लखनऊ में मिला रामजी दुबे को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन इंटीग्रेटेड फार्मिंग

रामजी दुबे ग्राम नुआंव, मिर्जापुर , उत्तर प्रदेश से हैं. और बड़े पैमाने पर ड्रैगन फ्रूट की खेती कर लगभग 15 लाख सालाना का मुनाफा ले रहे हैं. इसके अलावा स्ट्राबेरी, खीरा, केला आदि की खेती करते हैं. पॉलीहाउस में नर्सरी तैयार करते हैं. पशुपालन भी करते हैं जिससे उन्हें खेती में बाजार से रासायनिक उर्वरक भी नहीं खरीदना पड़ता. इन्हीं खासियतों के चलते हाल ही में उन्हें उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में फार्म एन फूड कृषि सम्मान मिला. जिसके तहत उन्हें ‘बेस्ट फार्मर अवार्ड फार्मर इन इंटीग्रेटेड फार्मिंग’ सम्मान दिया गया.

रामजी दुबे ने साल 2018 से एकीकृत बागबानी के तहत 2000 वर्गमीटर एरिया में पौलीहाउस बनाया है. उस के बाद पौलीहाउस में उच्च गुणवत्ता का खरबूजा, रंगीन शिमला मिर्च एवं खुले खेत में केला, स्ट्रौबेरी, पपीता एवं एक हेक्टेयर में ड्रैगन फ्रूट की खेती आरंभ की, जिस से उन्हें 12 महीने कुछ न कुछ फसल उत्पाद मिलता रहता है और पूरे साल अच्छीखासी आमदनी होती रहती है.

किसान रामजी दुबे ने बताया कि ड्रैगन फ्रूट की खेती से उन्हें 10 से 15 लाख की सालाना आमदनी होती है. रामजी दुबे पर्यावरण के प्रति भी लोगों को जागरूक करने का काम कर रहे हैं. इस के तहत वे अपने जिले और आसपास के क्षेत्र के अलावा उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार आदि अनेक राज्यों में भी एक लाख से अधिक पौधों का वितरण कर चुके हैं. उन्हें जिला स्तर, राज्य स्तर के साथसाथ राष्ट्रीय पुरस्कारों से भी सम्मानित किया जा चुका है.

रामजी दुबे का कहना है कि उन्हें स्ट्रौबेरी की खेती से 5 से 6 महीने में एक एकड़ में 8 से 10 लाख रुपए तक की आमदनी हो जाती है. खेती में तकरीबन 2 से 3 लाख रुपए का खर्च भी आता है. इस प्रकार तकरीबन 7 लाख रुपए के आसपास शुद्ध आमदनी हो जाती है.

Integrated Farming

इसी प्रकार रामजी दुबे को रंगीन शिमला मिर्च से तकरीबन 8 से 10 लाख रुपए तक की आमदनी हो जाती है, वहीं पशुपालन के तहत वे गौपालन भी करते हैं, जिस के गोबर से वह बिना किसी लागत के वर्मी कंपोस्ट तैयार करते हैं. इस से उन्हें अपनी खेती में बाजार से उर्वरक नहीं खरीदना होता है.

रामजी दुबे साल 2018 के पहले पारंपरिक तरीके से गेहूं, धान, चना, मटर, सरसों की खेती करते थे, जिस से उन्हें बहुत अच्छा मुनाफा नहीं होता था, परंतु आज एकीकृत खेती के माध्यम से बागबानी के द्वारा साल में 25 से 30 लाख रुपए तक की आमदनी हो जाती है. वे अब पपीता की खेती भी करते हैं. पपीते की पौध जूनजुलाई माह में लगाते हैं, जिस की हार्वेस्टिंग अगले वर्ष मार्चअप्रैल के महीने में शुरू हो जाती है. उस समय नवरात्र एवं अन्य त्योहारों के कारण डिमांड अच्छीखासी रहती है. उन्हें एक एकड़ में तकरीबन 5 से 6 लाख रुपए का मुनाफा एक एकड़ में हो जाता है.

इस तरह से रामजी दुबे को समेकित व एकीकृत खेती से अनेक लाभ हो जाते हैं. आज अपने क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि जिले एवं आसपास के दूसरे क्षेत्रों में आप प्रेरणा के स्रोत बने हुए हैं. आसपास के जिलों से क्षेत्र से तमाम किसान तमाम सरकारी अधिकारी उन के खेतों को देखने आते हैं, जिस से उन्हें भी काफी प्रेरणा मिलती है.

 

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वैसे, 63 साल की उम्र पर रामजी दुबे के इस तरह के काम देख कर लोग बहुत प्रभावित होते हैं और दूसरे लोगों को प्रेरणा भी मिलती है.

महिला किसानों के लिए प्रेरणा बनी पुष्पा गौतम

हाल ही में पुष्पा गौतम को दिल्ली प्रेस, नई दिल्ली द्वारा लखनऊ में राज्यस्तरीय फार्म एन फूड ‘बेस्ट फार्मर अवार्ड इन मार्केटिंग’ से नवाजा गया है.

पुष्पा गौतम बस्ती जिले के बिहरा खास गांव से हैं. आप अनेक कृषि उत्पादों जैसे मल्टीग्रेन आटा, चावल, चना, अचारमुरब्बा, आदि की प्रोसेसिंग कर बाजार से कई गुना अधिक मुनाफा कमाने के साथसाथ अनेक लोगों को ट्रेनिंग व रोजगार भी दे रही हैं.

पुष्पा गौतम एमएबीएड हैं. फैजाबाद विश्वविद्यालय से मुख्य 2020 में कोरोना के समय एनआरएलएम के तहत आप समूह से जुड़ीं और सरकार द्वार समूह में दी जाने वाली अनेक प्रकार की ट्रेनिंग सुविधायों का लाभ उठाया. अनेक प्रकार के प्रशिक्षण लेने के बाद पुष्पा गौतम को अनेक जानकारियां मिलीं. किस तरह से नए रोजगार का सृजन हो और उस को शुरू करने के लिए फंड कहां से मिल सकेगा, इस पर उन्होंने जानकारी प्राप्त की. उस के बाद पुष्पा गौतम ने ब्लौक, कृषि विभाग, उद्यान विभाग, गन्ना विभाग, नाबार्ड और आरसेटी से जुड़ कर आज अनेक उत्पादों की प्रोसैसिंग शुरू की.

women farmers

इन दिनों पुष्पा गौतम मल्टीग्रेन आटा, मक्का आटा, बाजरा आटा, चना बेसन, मसाला, अचार, मुरब्बा, आवला लड्डू आदि की प्रोसैसिंग और पैकिंग कर अच्छा मुनाफा कमा रही हैं. अनेक तैयार उत्पादों की पैकिंग के लिए मशीन भी समूह द्वारा प्राप्त फंड से खरीदी गई हैं.

इन दिनों पुष्पा गौतम तकरीबन 30 महिलाओं के साथ काम कर रही हैं और उन्हें स्वावलंबी बनाने का काम कर रही हैं.

इस के अलावा पुष्पा गौतम ने जनवरी, 2021 से ले कर सितंबर, 2024 तक तकरीबन 300 महिलाओं को नर्सरी, वर्मी कंपोस्ट, डेयरी फार्मिंग, वाशिंग पाउडर बनाना, अचार, मसाला, पापड़, मोमबती आदि पर ट्रेनिंग करा कर उन को रोजगार से जोड़ने का काम किया है. उन की इन सफलताओं को देखते हुए नाबार्ड से उन्हें एक ग्राम दुकान स्वीकृत की और नाबार्ड ने 2 साल में साढ़े 3 लाख रुपए का फंड मुहैया कराया. उन के समूह की अनेक महिलाओं द्वारा बनने वाले उत्पाद की मार्केटिंग और सप्लाई में काफी मदद मिल रही है. उन्हें इस काम के लिए ब्लौक, जिला, केवीके, नाबार्ड आदि से समयसमय पर सम्मानित किया जाता रहा है.

 

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साधना सिंह : डेयरी फार्मिंग से लाखों की कमाई

लखनऊ में आयोजित दिल्‍ली प्रैस द्वारा ‘फार्म एन फूड’  कृषि सम्‍मान अवार्ड 2024 में उत्तर प्रदेश के ग्राम बहुअन मदार माझा की साधना सिंह को  फार्म एन फूड ‘बैस्ट  डेयरी ऐंड एनिमल कीपर अवार्ड’ से सम्मानित किया गया.

साधना सिंह साल 2012 से कृषि क्षेत्र से जुड़ी हुई हैं. इस समय वे कृषि आधारित कई व्यवसाय भी कर रही हैं. उन्होंने 2 भैंसों के साथ पशुपालन का काम शुरू किया और इस समय उन के पास 35 दुधारू भैंसें हैं. उन के दूध से पारंपरिक बिलोना विधि से भैंस का देशी घी तैयार किया जाता है, जो ‘अवध गोल्ड’ के नाम से बिकता है.

साधना सिंह के पास 2 पोल्ट्री फार्म हैं, जिस में एक पोल्ट्री फार्म 10,000 वर्गफुट का है, जिस से उन्हें सालाना 7 से 8 लाख का मुनाफा होता है. इस के अलावा 2 हेक्टेयर में वे मछलीपालन व्यवसाय से भी जुड़ी हैं, जिस से उन्हें सालाना 10 लाख का लाभ प्राप्त होता है.

dairy farming

साधना सिंह का कहना है कि हम पंगास मछली का उत्पादन करते हैं. यह हाईडेंसिटी में उत्पादन होने वाली मछली है, जिस से ज्यादा मुनाफा होता है. मछलीपालन में फायदा होते देख कई महिला किसानों ने मछलीपालन शुरू किया है, जिस से गांव में अनेक महिला किसान मछलीपालन से फायदा उठा रही हैं.

इस के अलावा उन्होंने बताया कि वे 40 एकड़ में गन्ने की खेती और 20 एकड़ में धान की खेती करती हैं. 2 एकड़ में वे जैविक खेती से धान और गेहूं उत्पादन करते हैं.

साधना सिंह के पास सोलर ड्रायर है, जिस में आम, टमाटर, तुलसी के पत्तों को सुखा कर बेचा जाता है. कृषि विभाग द्वारा मसूर उत्पादन के लिए उन्हें जिले में प्रथम पुरस्कार दिया गया है. नाबार्ड द्वारा जिले में 8 मार्च, 2024 (महिला दिवस) को ‘सक्रिय महिला’ का प्रथम पुरस्कार दिया गया. कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा 15 अगस्त के शुभ अवसर पर प्रगतिशील महिला किसान के रूप में उन्हें सम्मानित किया गया. एनआरएलएम द्वारा मुरगीपालन के लिए ‘शक्ति वंदन सम्मानपत्र’ दिया गया. उपकृषि निदेशक गोंडा द्वारा कृषि क्षेत्र में महिला प्रगतिशील किसान से रूप में प्रशस्तिपत्र दिया गया. जिला अधिकारी गोंडा द्वारा जैविक खेती के लिए प्रशस्तिपत्र दिया गया

 

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नारायण दत्त जोशी: सोंठ प्रोसैसिंग से तरक्की

राजधानी लखनऊ में आयोजित  दिल्‍ली प्रैस की कृषि पत्रिका ‘फार्म एन फूड’ की ओर से  कृषि सम्‍मान अवार्ड 2024 में उत्तराखंड के नारायण दत्त जोशी को  ‘बैस्‍ट फार्मर अवार्ड इन हार्वेस्टिंग ऐंड प्रोसैसिंग’ का सम्‍मान  दिया गया.

नारायण दत्त जोशी लगभग 30 वर्षों से खेती कर रहे हैं, जिस में उन के द्वारा मुख्य रूप से अदरक, गेहूं, मक्का, सरसों और राजमा की खेती की जाती है. इन सभी फसलों में इन के क्षेत्र की सब से महत्त्वपूर्ण व लाभप्रद फसल अदरक है. अदरक एक औषधीय जड़ वाली फसल है. अदरक की फसल को जमीन की खुदाई कर उसे निकाला जाता है, तत्पश्चात उसे प्रोसैस कर के उस से सोंठ बनाई जाती है. सोंठ के मंडी में अच्छे दाम मिलते हैं.

ginger processing

नारायण दत्त जोशी ने बताया कि सोंठ 2 प्रकार की होती हैं. एक सुखझोल सोंठ और दूसरी पनझोल सोंठ.

नारायण दत्त जोशी से प्रेरणा ले कर क्षेत्र के अनेक किसान अदरक की खेती करते हैं. इस के अलावा सोंठ प्रोसैसिंग में कार्य करने वाली अनेक महिलाओं को भी रोजगार प्राप्त होता हैं. सोंठ के द्वारा ही हमारा क्षेत्र तरक्की की ओर अग्रसर होता जा रहा है.

 

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नारायण दत्त जोशी को उन के कामों के लिए अनेक पुरस्कार भी मिल चुके हैं.

पुष्पा नेगी : गोपालन से प्रकृति संरक्षण और रोजगार सृजन

ग्राम कोटी अठुरर्वाला अठूरवाला, जनपद देहरादून, उत्तराखंड की रहने वाली पशुपालक पुष्पा नेगी पशुपालन के क्षेत्र में नवीनतम तकनीक अपना कर स्थानीय किसानों को भी जागरूक करती हैं. उनके इन्ही योगदानों के लिए उन्हें दिल्‍ली प्रैस की कृषि पत्रिका ‘फार्म एन फूड’ द्वारा लखनऊ में आयोजित  कृषि सम्‍मान अवार्ड 2024 में ‘बैस्‍ट  डेयरी ऐंड एनिमल कीपर अवार्फाड ‘ से सम्मानित किया गया.

cow rearing

पशुपालक पुष्पा नेगी के द्वारा साल 2016 से गोपालन किया जा रहा है और इस समय उन के पास लगभग 30 गाय हैं, जिन में होल्सटीन फ्रीसियन और साहीवाल दोनों नस्ल की गई गाय शामिल हैं. पुष्पा नेगी गाय के दूध से घी, छाछ, मक्खन आदि बना कर बाजार में अच्छे दामों पर बेचती हैं और प्रकृति संरक्षण को ध्यान में रखते हुए उन के यहां गाय के गोबर से दीया दीपक, मूर्ति, समरानी कप, गौ काष्ठ एवं वर्मी कंपोस्ट आदि चीजें तैयार की जाती हैं. इस काम में उन्होंने अनेक लोगों को जोड़ रखा है, जिस से उन्हें भी रोजगार मिल रहा है.

 

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प्रगतिशील पशुपालक के रूप में पुष्पा नेगी को मुख्यमंत्री द्वारा ‘किसानश्री सम्मान’, हंस फाउंडेशन और आरडीसी -2024 में केंद्रीय मंत्री परशोत्तम रूपाला द्वारा दिल्ली में सम्मानित किया गया जा चुका है. पुष्पा नेगी अपने खेत में उत्तराखंड का प्रसिद्ध अनाज मंडावा उगा रही हैं, जो अपने पौष्टिक गुणों के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है. पुष्पा नेगी का कहना है कि उन के इन कामों में परिवार ने सदैव पूरा सहयोग किया है.

कर्नल हरिश्चंद्र सिह: चिया सीड की खेती की प्रशंसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी की

कर्नल हरिश्चंद्र सिह लखनऊ, उत्तरप्रदेश से हैं और 54 वर्ष की उम्र में सैन्य सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद वर्ष 2016 में जनपद बाराबंकी से जैविक खेती की शुरुआत की. उनकी असाधारण उपलब्धियों के लिए दिल्‍ली प्रैस की कृषि पत्रिका ‘फार्म एन फूड’ आयोजित कृषि सम्‍मान अवार्ड 2024 में उन्हें बैस्ट फार्मर अवार्ड इन और्गेनिक फार्मिंग अवार्ड से सम्मानित किया गया.

उन की पारिवारिक पृष्ठभूमि का भी इस में योगदान रहा.

कर्नल हरिश्चंद्र सिंह का उद्देश्य उन फलों, फसलों और सब्जियों को उगाना है, जो स्वास्थ्यवर्धक हों, जिन में कम से कम देखरेख हो, कम से कम लागत लगे और अच्छा मुनाफा हो. इस क्रम में उन्होंने चिया सीड, ड्रैगन फ्रूट, एप्पल बेर, जिमीकंद और कालेबैगनी आलू की खेती से अपने नए शौक की शुरू की. इस में वे काफी हद तक सफल रहे. बाद में उन्होंने अपनी फसलों में केला, लाल गूदे वाले आलू, क्वीनोआ, रामदाना, काले चावल और काले गेहूं आदि को भी सम्मिलित किया.

लगभग 4 साल पहले कर्नल हरिश्चंद्र सिंह के चिया सीड की खेती की प्रशंसा देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ‘मन की बात कार्यक्रम’ में करते हुए इसे आत्मनिर्भर भारत में एक बड़ा कदम बताया.

स्वास्थ्यवर्धक एवं लाभप्रद फसलों, फलों तथा सब्जियों की जैविक खेती स्वयं करना तथा ज्यादा से ज्यादा किसानों को इस मुहिम से जोड़ना अब कर्नल हरिश्चंद्र सिंह का जुनून सा बन गया है. उन्होंने बताया कि साल 2023 में भारत सरकार द्वारा प्रकाशित ‘कौफी टेबल बुक’ में मुझे एक प्रगतिशील किसान के रूप में स्थान दिया गया है. यह मेरे लिए गर्व की बात है.

 

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कर्नल हरिश्चंद्र सिंह का कहना है कि हमारे इस प्रयास में कृषि क्षेत्र से जुड़ी संस्थाओं, कृषि विशेषज्ञों, प्रगतिशील कृषकों, पत्र पत्रिकाओं एवं मीडियाकर्मियों का बहुत बड़ा योगदान है, जो हमारे मार्ग दर्शक और प्रेरणास्रोत हैं. इन से प्रेरित हो कर अब मैं अपने जैविक खेती के रकबे को बढ़ा रहा हूं, साथ ही श्रीअन्न और नीबू की खेती भी शुरू कर चुका हूं.

किसानों को नई तकनीक से जोड़ उन की आमदनी बढ़ा रहीं डा. पूजा गौड़

उत्‍तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में आयोजित दिल्‍ली प्रैस की कृषि पत्रिका ‘फार्म एन फूड’ द्वारा आयोजित कृषि सम्‍मान अवार्ड 2024 में बैस्ट फार्मर अवार्ड इन मार्केटिंगसे सम्मानित उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में जन्मी पूजा गौड़ की शुरुआती पढ़ाईलिखाई मऊ में और बाद की पढ़ाईलिखाई मुंबई में हुई.

मुंबई में मल्टीनैशनल कंपनी इनफोर्मेशन टैक्नोलौजी में उच्च पद पर वे आसीन रहीं, लेकिन शादी उत्तराखंड में होने के बाद उन का झुकाव वहां के जनजातीय इलाके से हुआ. वहां उन्होंने समाजसेवा का काम शुरू किया, लेकिन लौकडाउन के दौरान जब साल 2020 में वे वर्क फ्रोम होम होने की वजह से जब ससुराल आईं, तब देहरादून के सुंदर आदिवासी इलाके के गांव में समाजसेविका के रूप में काम करना शुरू किया और समाजसेवा के रूप उन्होंने उन आदिवासी किसान  महिला को चुना, जो दिनभर खेत, जंगल और चूल्हा व परिवार में अपनी पूरी जिंदगी काठिन मेहनत और बहुत ही न्यूनतम आय के साथ व्यतीत कर रही थीं.

Dr. Pooja Gaur

डा. पूजा गौड़ व्यावसायिक रूप से सूचना प्रौद्योगिक के क्षेत्र में मुख्य प्रबंधक, पश्चिमी भारत में कार्यरत रही हैं और प्रबंधक में ही डाक्टर औफ फिलौसफी (पीएचडी) की उपाधि हासिल की है, लेकिन 2 मास्टर डिगरी एवं पीएचडी की डिगरी लेने के बावजूद भी एवं सूचना प्रौद्योगिकी में अच्छे पद पर कार्यरत होने के बवजूद भी जिंदगी में उन्हें कहीं न कहीं कमी सी लगती थी और दिल में एक कसक सी थी कि कहीं दूर जा कर गंवई इलाके में काम करने की.  और एक ग्रामीण समाज की सेवा का भाव  ने उन को गांव की तरफ मोड़ दिया.

जब वे गांव लौटीं तो उन्होंने देखा कि किसानों की दशा व दिशा को सुधारने के लिए सरकार द्वारा चलाई जा रही दूरदर्शी योजना से किसान व गांव वाले इस के वास्तविक हकदार थे, वे लोग इन योजनाओं का लाभ नहीं उठा पा रहे थे और यही हाल उन के खेतों में उगाई जा रही फसलों और सब्जियों आदि का था, जिस का उन को उन की मेनहत का वाजिब दाम नहीं मिल पा रहा था. इस तरह की विषम परिस्थितियों को देखते हुए उन्होंने लोकतांत्रिक रूप से उन की स्थिति को उभरने के लिए 2 संगठनों की स्थापना की और उन्हें रजिस्टर्ड कराया.

बनाया फेडीज कपसाड वेलफेयर एसोसिएशन

फेडीज कपसाड़ कृषि बहुद्देशीय सहकारी समिति लिमिटेड के माध्यम से किसानों को सुखसुविधाएं प्रदान की गई हैं. यह एक साधरण सहकारी समिति नहीं है. इस समिति के माध्यम से पूजा गौड़ ने अपने वेतन का पैसा खर्च कर तकरीबन 7,000 वर्गफुट की जमीन पर कोऔपरेटिव हाउस बनाया. उन्हें संगठित किया गया और उन के अधिकार को समझाया गया. सरकार की विभिन्न दूरदर्शी इन महत्त्वपूर्ण योजनाओं के बारे में जनजागरूकता अभियान चलाया गया, जिस का परिणाम यह रहा कि प्रधानमंत्री आवास योजना, मनरेगा, जनजीवन मिशन और जिला परिषद और ब्लौक एवं ग्राम पंचायत स्तर पर चलाई गई योजना का सीधा लाभ वास्तविक लोगों को पहुंचना शुरू हुआ.

यह डा. पूजा गौड़ की दूरदर्शी सोच थी, जो वर्तमान में अध्यक्ष के रूप में हैं और चकराता प्रखंड के किसानों की भलाई के बारे में सोचा और उन को रोजगार मुहैया कराने की योजना बनाई और पुनर्वास की मुहिम को सफल बनाने में योगदान दिया. डा. पूजा गौड़ की पहली प्रथमिकता है कि किसानों को नई तकनीक से जोड़ कर उन की आमदनी को बढ़ाया जा सके.

 

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डा. पूजा गौड़ ने किसानों और महिलाओं को उन की माली स्थिति को बेहतर करने के लिए कोरोना काल में भी किसानों और महिलाओं द्वारा उत्पादित चीजों का बेहतर मूल्य दिलाने के लिए कंपनियों के साथ अनुबंध किया गया. इस का नतीजा यह हुआ कि ये कंपनियां सीधे कोऔपरेटिव हाउस पहुंचीं एवं किसानों के समस्त उत्पाद जैसे टमाटर, गोभी, शिमला मिर्च, खीरा, सेब, आड़ू और अन्य घरलू उत्पाद आदि को एक अच्छा बाजार दिलाया, जिस से किसानों को इलाके में तकरीबन डेढ़ करोड़ रुपए का राजस्व हासिल हुआ.