Brinjal : बैगन की खेती

Brinjal : मजाक में अकसर लोग बैगन को बेगुन कह देते हैं, मगर हकीकत में ऐसा नहीं है. तमाम तरकारियों की तरह बैगन की भी अपनी खूबियां हैं.

यह स्वादिष्ठ सब्जी सेहत के लिहाज से भी खासी कारगर होती है. महिलाएं अपनी रसोई में बैगन को पूरीपूरी अहमियत देती हैं.

वे इस की सूखी व रसेदार तरकारी बनाने के साथसाथ इस का भरता भी बनाती हैं. भरवां बैगन व बैगनी यानी बैगन के पकौड़ों की भी भारतीय घरों में खूब मांग रहती है. कुल मिला कर हर उम्र के लोग हमेशा बैगन के पकवानों को चाव से खाते हैं, इसी वजह से बाजार में हमेशा बैगन की मांग बनी रहती है.

सब्जी के व्यापारी बैगन की बिक्री से खूब कमाई करते हैं, लिहाजा बैगन की खेती करना हमेशा फायदे का सौदा रहता है. इस लेख में संकर बैगन उगाने के बारे में जानकारी दी जा रही है.

आबोहवा:  संकर बैगन की खेती करने के लिए औसत तापमान 22 से 30 डिगरी सेंटीग्रेड के बीच होना मुनासिब होता है. इस तापमान में बैगन की फसल की बढ़वार सही तरीके से होती है और फल भी भरपूर तादाद में हासिल होते हैं.

बैगन की फसल ज्यादा गरम और सूखा मौसम नहीं सह पाती है. ज्यादा गरम आबोहवा में फलों की तादाद घट जाती है. जमीन बैगन की खेती के लिहाज से दोमट मिट्टी ज्यादा मुनासिब होती है.

अलबत्ता मिट्टी पानी की सही निकासी वाली होनी चाहिए. जमीन का पीएच मान 5.5 से 6.0 होना चाहिए. मिट्टी सही किस्म की होने से पैदावार पर बहुत ज्यादा माकूल असर पड़ता है. बीज की मात्रा बैगन की खेती के लिए 125 से 150 ग्राम बीजों की प्रति हेक्टेयर के हिसाब से दरकार रहती है.

बहुत ज्यादा या कम मात्रा में बीजों का इस्तेमाल करना ठीक नहीं रहता है. पौधे उगाना बैगन के पौधे उगाने के लिए 3 मीटर लंबी, 1 मीटर चौड़ी और 0.15 मीटर ऊंची क्यारियां बनानी चाहिए. इस साइज की 20-25 क्यारियों में इतने पौध तैयार हो जाते हैं, जो 1 हेक्टेयर खेत के लिहाज से काफी होते हैं. हर क्यारी में 25 किलोग्राम अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद मिलाएं.

इस के अलावा 200 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट व 10 ग्राम फुराडान डाल कर मिट्टी में अच्छी तरह मिलाएं. तैयार क्यारी में बीजों को 5 सेंटीमीटर गहराई में बोएं. बोआई के बाद बीजों को आधी मिट्टी और आधी सड़ी गोबर की खाद के मिश्रण से ढक दें.

इस के बाद क्यारी को घास से ढकें. जब अंकुरण होने लगे तो घास हटा दें.

शुरुआत में फुहारे से पानी दें और कुछ दिनों बाद सामान्य तरीके से सिंचाई करें.

बोआई के 2 दिनों बाद से हर 5 दिनों के अंतराल पर 3 मिलीलीटर एकोमिन या 2 ग्राम केपटाफ 50 डब्ल्यू पाउडर का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर क्यारियों को भिगोएं. बोआई के 15 दिनों बाद और पौधे उखाड़ने से 3-4 दिनों पहले 1 मिलीलीटर थायोडान का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें.

खाद व उर्वरक खेत तैयार करते वक्त 25-30 टन अच्छी तरह से सड़ीगली गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत में मिलाएं. इस के अलावा 7.50 क्विंटल नीम की खली भी प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में मिलाएं. इन के अलावा 200 किलोग्राम नाइट्रोजन, 100 किलोग्राम फास्फोरस और 100 किलोग्राम पोटाश का भी प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए. खेत की तैयारी के वक्त नाइट्रोजन की आधी मात्रा और पोटाश व फास्फोरस की पूरी मात्रा जमीन में मिलाएं. नाइट्रोजन की बची मात्रा का आधा भाग रोपाई के 25 दिनों बाद और बाकी भाग रोपाई के 50 दिनों बाद खेत में इस्तेमाल करें.

रोपाई बोआई के 4 से 6 हफ्तों के दौरान पौधे रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जब रोपाई के लिए पौधे उखाड़ने हों, उस से 2-3 घंटे पहले क्यारियों में भरपूर पानी डालें ताकि वे आसानी से निकल सकें. पौधों को 90 सेंटीमीटर की दूरी पर बनी मेंड़ों के बाजू में 60 सेंटीमीटर के फासले पर लगाएं. रोपाई के बाद फौरन हलकी सिंचाई करें.

खयाल रखें कि पौधों की रोपाई का काम शाम के वक्त करना बेहतर रहता है.

खास बीमारियां व बचाव

फाइटोपथोरा फलसड़न रोग : इस से बचाव के लिए रिडोमिल एमजेड या इंडोफिल एम 45 की 2.5 ग्राम मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें. जरूरत के मुताबिक 10 दिनों बाद दोबारा छिड़काव करें.

फायोप्सिस सड़न और ब्लाइट : इस से बचाव के लिए इंडोफिल एम 45 की 2.5 ग्राम मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर 7-8 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें.

डैंपिंग आफ (पौधविगलन) : इस से बचाव के लिए सेरेसान दवा की 2 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करें. पौधों को 3 फीसदी फाइटोलान या डाइथेन एम 45 द्वारा अच्छी तरह भिगोएं. नर्सरी में ज्यादा पासपास पौधे न रखें और बहुत ज्यादा सिंचाई भी न करें.

लिटिल लीफ रोग : इस रोग की चपेट में आने वाले पौधों को उखाड़ कर जला दें. इस के अलावा रोगोर 0.03 फीसदी का 10 से 15 दिनों के अंतराल पर फल आने तक छिड़काव करें. रोपाई के वक्त पौधों की जड़ों को टैट्रासाइक्लिन 1000 पीपीएम में भिगोने के बाद रोपाई करें.

खास कीट व बचाव

तनाछेदक व फलछेदक : कीड़े लगे भागों को सूंडि़यों सहित पौधों से अलग कर के जला दें. फसल की छोटी अवस्था में दानेदार सिस्टेमिक कीटनाशक का इस्तेमाल करें. इंडोसल्फान या मेटासिस्टाक्स की 2 मिलीलीटर मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर 10 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें.

हरा मच्छर (जैसिड) : 10 ग्राम थायमेट का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें. मेटासिस्टाक्स या मोनोक्रोटोफास की 2 मिलीलीटर मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर 10 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें.

माहू (एफिड) : इस से बचाव के लिए इंडोसल्फान या मोनोक्रोटोफास के 0.05 फीसदी घोल का छिड़काव करें. लाल मकड़ी : लाल मकड़ी से बचाव के लिए मैलाथियान के 0.02 फीसदी घोल का छिड़काव करें. इस के अलावा फसल पर सल्फर धूल का बुरकाव करें या बैटेवल सल्फर के 0.05 फीसदी घोल का छिड़काव करें.

इस प्रकार कीड़ों व रोगों से बैगन की फसल की हिफाजत करते हुए भरपूर पैदावार हासिल की जा सकती है. उम्दा नस्ल के बैगनों की मांग हमेशा बनी रहती है, लिहाजा इस की खेती करना बेहद फायदे का सौदा होता है.

कीटों व रोगों की रोकथाम के लिए दवाओं का इस्तेमाल करते वक्त दवाओं में चिपटाक या सेंडोविट जैसे चिपकने वाले पदार्थ जरूर मिलाएं. दवाओं का छिड़काव करते वक्त इस बात का खयाल रखें कि पूरा पौधा दवा से भीग जाना चाहिए.

Arvi Crop : अरवी की फसल का कीड़ों व रोगों से बचाव

Arvi crop :  अरवी (कोलोकेसिया) यानी घुइयां एक कंदीय पौधा है. इस की खेती खासकर कंदों के लिए की जाती है.

अरवी की पैदावार काफी अच्छी यानी 30-40 टन प्रति हेक्टेयर तक होती है. अरवी के मूल स्थान के बारे में लोगों की राय अलगअलग है.

भारत में इस की खेती कब और कहां शुरू हुई, इस का किसी को पक्का पता नहीं है. उत्तरी भारत में इसे खासतौर से उगाते हैं. अन्य प्रदेशों में भी इस का उत्पादन बढ़ रहा है.

इस में कार्बोहाइड्रेट की उच्च मात्रा के अलावा अन्य कंदों वाली सब्जियोें के मुकाबले ज्यादा मात्रा में प्रोटीन, खनिज लवण, फास्फोरस व लोहा पाया जाता है.

अरवी पर लगने वाले कीट व रोग इस की पैदावार को प्रभावित करते हैं. अन्य सब्जियों की तरह अरवी की फसल पर भी कीटों का हमला होता है, जिन में तंबाकू का इल्ली कीट और लाही खास हैं.

अरवी के खास हानिकारक कीड़े

तंबाकू की सूंड़ी : इस के पतंगे भूरे रंग के 15-18 मिलीमीटर लंबे होते हैं. इन का अगला पंख कत्थई रंग का होता है, जिस पर सफेद लहरदार धारियां होती हैं, जबकि पिछले पंख सफेद रंग के होते हैं. पूरी तरह विकसित पिल्लू 35-40 मिलीमीटर लंबा पीलापन लिए हुए हरा भूरा होता है. इस के निचले हिस्से में दोनों ओर पीली धारी होती है.

मादा कीड़ा पत्तियों की निचली सतह पर 200 से 300 अंडे झुंड में देती है, जो भूरे रंग के बालों से ढके रहते हैं. 3 से 5 दिनों में अंडों से पिल्लू निकल कर झुंड में पत्तियों को खाते हैं. 20 से 30 दिनों में पिल्लू पूरी तरह बड़े हो कर मिट्टी के अंदर प्यूपा में बदल जाते हैं. प्यूपा काल गरमी व जाड़ों में क्रमश: 7-9 और 25-30 दिनों का होता है. इस के बाद प्यूपा से बड़े कीट बन जाते हैं. अंडे से बड़े होने में इस कीट को 30 से 56 दिनों का समय लगता है. 1 साल में इस की 8 पीढि़यां होती हैं.

अरवी के पौधों पर इस कीट का हमला जून से सितंबर तक होता है.

इस कीड़े के पिल्लू ही पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं. शुरू में अंडों से निकले पिल्लू अरवी की कोमल पत्तियों की निचली सतह पर झुंड में हमला कर के हरे भाग को खाते हैं. बाद में जवान पिल्लू अलगअलग पौधों पर हमला कर के पत्तियों को खा कर नुकसान पहुंचाते हैं. बहुत ज्यादा प्रकोप होने पर ये पूरे पौधों की पत्तियों को खा जाते हैं, जिस से पौधे ठूंठ हो जाते हैं और कंद पर रोग लग जाता है. इस कीट का हमला रात के समय ज्यादा होता है.

रोकथाम

* फसल की कटाई के बाद खेत की अच्छी जुताई कर देनी चाहिए.

* अंडों के गुच्छों व पिल्लुओं को पत्तियों समेत तोड़ कर नष्ट कर दें.

* रोशनी द्वारा जवान कीड़ों को जमा कर के नष्ट कर दें.

* ज्यादा हमला होने पर इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल या डायमिथोएट (30 ईसी) दवा का 1.0 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से पौधों पर 15 दिनों के अंतर पर 2 बार छिड़काव करना फायदेमंद होता है.

* मिश्रीकंद के बीज के घोल का 5 फीसदी की दर से छिड़काव करने पर इस कीड़े से बचा जा सकता है.

अरवी के लाही कीट : लाही कीट 2 से 3 मिलीमीटर लंबा हरेपीले रंग का होता है. जवान कीड़े पंखदार व बिना पंख दोनों प्रकार के होते हैं. लेकिन इस कीट के बच्चे बिना पंख के होते हैं.

मादा कीट अपने जीवन काल में 32 से 50 अंडे पैदा करती है. 7 से 8 दिनों में 3 से 4 निर्मोचन के बाद ये पूरी तरह जवान हो जाते हैं. इन का जीवनकाल 23 से 28 दिनों में पूरा हो जाता है.

इस कीट के जवान व बच्चे दोनों ही पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं. ये झुंड में अरवी की पत्तियों की निचली सतह और नई निकलती पत्तियों के बीच में रह कर लगातार रस चूसते हैं. इसलिए पत्तियां पीली पड़ कर सूख जाती हैं, जिस से पौधे बड़े नहीं हो पाते व कमजोर हो जाते हैं.

कंद अच्छी तरह बढ़ नहीं पाते जिस से पैदावार में भारी कमी आ जाती है.

रोकथाम

* माहू का प्रकोप होने पर पीले चिपचिपे ट्रैप का इस्तेमाल करें ताकि माहू ट्रैप पर चिपक कर मर जाएं.

* परभक्षी काक्सीनेलिड्स या सिरफिड या क्राइसोपरला कार्निया का संरक्षण कर 50,000 से 10,0000 अंडे या सूंड़ी प्रति हेक्टेयर की दर से छोड़ें.

* नीम का अर्क 5 फीसदी या 1.25 लीटर नीम का तेल 100 लीटर पानी में मिला कर छिड़कें.

* बीटी का 1 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

* यदि पौधे पर लाही कीट लगा हो तो किसी एक तरल कीटनाशी दवा जैसे डाइमिथोएट (30 ईसी) का 1.0 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से या मिश्रीकंद बीज के घोल के 5 फीसदी का छिड़काव 15 दिनों के अंतर पर 2 बार करें.

अरवी के खास रोग

अरवी का झुलसा रोग : इस रोग का प्रकोप फाइटोफ्थोरा कोलोकेसियाई नाम के कवक से होता है. यदि रात का तापमान 20-22 डिगरी सेंटीग्रेड व दिन का तापमान 25-27 डिगरी सेंटीग्रेड के बीच हो, नमी दिन में 65 फीसदी और रात में 100 फीसदी हो व आकाश में बादल छाए हों और बीचबीच में बारिश होती रहे तो इस रोग का फैलाव और भी तेजी से होता है.

पूरी फसल 5-7 दिनों के अंदर इस रोग से झुलस जाती है. यदि तापमान 20 डिगरी सेंटीग्रेड से कम या 28 डिगरी सेंटीग्रेड से ज्यादा हो तो यह रोग ज्यादा नहीं बढ़ पाता है.

यह अरवी का एक भंयकर रोग है, जो पत्तियों पर छोटेछोटे हलके भूरे रंग के धब्बों के रूप में शुरू होता है. जल्दी ही ये छोटेछोटे धब्बे आकार में बड़े और भूरे रंग के हो जाते हैं व अगलबगल के पौधों को भी प्रभावित कर देते हैं. यदि समय पर रोकथाम नहीं की जाए तो 1 हफ्ते के अंदर पूरी की पूरी फसल झुलस कर बरबाद हो जाती है.

खोज से यह साबित हो गया है कि रोग की तेजी व पैदावार में होने वाली कमी का आपस में सीधा संबंध है.

बिहार में इस रोग का प्रकोप अगस्त व सितंबर महीनों में होता है. रोकथाम भारत में अरवी की कई रोग न लगने वाली किस्में मौजूद हैं, जिन में जाखड़ी, टोपी व मुक्ताकेशी कुछ खास किस्में हैं.

रोग न लगने वाली किस्मों में रोग लगने वाली किस्मों की तुलना में रोग की शुरुआत देर से होती है और उस का फैलाव भी धीमा होता है. लिहाजा जहां यह बीमारी हर साल होती है, वहां मुक्ताकेशी वगैरह रोग न लगने वाली किस्मों का लगाना ठीक रहता है.

कंदों की रोपाई के समय में इस तरह बदलाव करें, जिस से कंद को रोग न लगे. इस तरह इस से होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है. लिहाजा जिस इलाके में इस बीमारी का असर ज्यादा या हमेशा होता है, वहां अरवी की रोपाई फरवरी से मार्च के बीच करें ताकि फसल पूरी तरह से बढ़ सके व उपज पर इस का कोई बुरा असर न पड़े.

रोपाई के बाद कंदों को शीशम की पत्तियों या काले पौलीथिन या सूखी घासफूस से ढक देने पर इस रोग का असर कम होता है व खेतों में नमी बनी रहती है. इस से खरपतवारों की संख्या में भी कमी होती है.

ताम्रयुक्त कवकनाशी दवा डाइथेन एम 45 (0.2 फीसदी) के 4-5 छिड़काव 1 हफ्ते के अंतर पर करने से रोग की काफी हद तक रोकथाम हो जाती है. मटलैक्सिल (0.05 फीसदी) का छिड़काव करने पर पैदावार 50 फीसदी तक बढ़ सकती है.

Snacks : आगरा के भल्ले (Bhalle) कुरकुरे व टैस्टी

Snacks : आलू की टिक्की को उत्तर भारत में सब से ज्यादा पसंद किया जाता है. इसे कई अलगअलग नाम और तरह से चाट के तौर पर तैयार भी किया जाता है. दिल्ली और आगरा में इसे ‘आलू भल्ला’ (Bhalle) के नाम से जाना जाता है. आगरा, दिल्ली के हर बाजार, चाट की दुकानों में देशी घी से तैयार भल्ले खाने को मिलते हैं. आगरा के आलू भल्ले को दूसरे शहरों में आलू की टिक्की कहते हैं.

उत्तर प्रदेश में आगरा पर्यटकों के लिए सब से ज्यादा घूमने वाला शहर समझा जाता है. यहां आने वाला हर पर्यटक शाम को भल्ले जरूर खाना पसंद करता है. भल्ले भले ही आलू की टिक्की के रूप में दूसरे शहरों में मिलते हों, पर ‘आगरा के भल्ले’ अलग ही स्वाद देते हैं. कुछ चाट दुकानदार भल्ले के साथ काबुली चने और चटनी का इस्तेमाल भी करते हैं.

आगरा में शाम के समय हर सड़क पर ऐसी चाट की दुकानें मिल जाती हैं. सदर बाजार, आगरा में चाट की दुकानों पर भल्ले खाने वालों की लाइन लगी होती है. इस के अलावा फतेहाबाद रोड और ताजमहल के आसपास सड़कों पर स्ट्रीट फूड के रूप में भल्ले सभी जगह मिलते हैं. बड़े होटल और रैस्टोरैंट में भी भल्ले खाने को मिलते हैं. चटपटी चाट के रूप में भल्ले की दुकान लगाना रोजगार का बड़ा साधन हो गया है. यहां दुकान चलाने वाले लोग बताते हैं कि वैसे तो भल्ले आलू टिक्की की ही तरह होते हैं, पर आगरा में इन का स्वाद और भी ज्यादा टेस्टी हो जाता है. इस की वजह पश्चिम उत्तर प्रदेश में पैदा होने वाले आलू को माना जाता है. इस का स्वाद बाकी देश से अलग होता है.

आगरा की रहने वाली अर्चना श्रीवास्तव कहती हैं, ‘‘आगरा घूमने वाले पर्यटक ताजमहल देखने के साथ यहां के भल्ले जरूर खाना पसंद करते हैं. इस का स्वाद खाने वालों को बहुत भाता है. यही वजह है कि भल्ले की दुकानें आप को हर जगह मिल जाती हैं. आलू किसानों को भी आज एक नई पहचान मिल रही है. पश्चिम उत्तर प्रदेश का यह इलाका आलू की खेती के साथ देशी घी के लिए काफी जाना जाता है. देशी घी में तले हुए भल्ले का स्वाद बहुत अच्छा लगता है.’’

आवश्यक सामग्री: आलू 300 ग्राम उबले छिले हुए, हरी मटर के दाने 1 कप दरदरे पिसे हुए, तेल टिक्की सेंकने के लिए, गरम मसाला छोटी चम्मच, नमक स्वादानुसार, अमचूर पाउडर छोटी चम्मच, लाल मिर्च पाउडर छोटी चम्मच, धनिया पाउडर आधा छोटी चम्मच, अरारोट 2 चम्मच, दही, हरी चटनी, मीठी चटनी, चाट मसाला.

बनाने की विधि: आलू को कद्दूकस कर लें. इस में 2 छोटी चम्मच अरारोट डाल कर अच्छी तरह से मिलाते हुए एकदम गुंथे आटे जैसा तैयार कर लें. आलू के साथ मिक्स करने के लिए मटर में गरम मसाला, स्वादानुसार नमक, अमचूर, लाल मिर्च पाउडर और धनिया पाउडर डाल कर सारी चीजों को अच्छी तरह से मिला लीजिए. जितना बड़े भल्ले बनाना है, उतना बड़े गुंथे आलू से निकाल कर गोले बना लीजिए. इसी पिसी मटर को भी तैयार कर लीजिए. एक गोला उठाइए और इस के बीच में जगह बना कर एक भाग मटर इस में भर दीजिए. चारों तरफ से आलू ले कर मटर को बंद कर दीजिए.

तवा गरम कर के उस पर एक टेबल स्पून तेल डाल कर चारों ओर फैला दीजिए. एकएक कर के तवे पर जितनी टिक्की आ जाए, सिंकने के लिए लगा कर रख दीजिए. धीमी आग पर आलू टिक्की सेंकिए. टिक्कियों को उलटपलट कर दोनों ओर से ब्राउन होने तक सेंकें. टिक्कियां सिंकने के बाद और कुरकुरा करने के लिए इन्हें तवे के किनारे लगा कर रख दीजिए. बाकी टिक्कियां भी इसी तरह सेंक लें. लीजिए, आलू भल्ले तैयार हैं.

आलू भल्ले को खाने के लिए देने से पहले टिक्की को तवे पर बीच में ला कर दबा कर और कुरकुरा कर लीजिए. एक या 2 टिक्की प्लेट में निकाल कर रखिए. टिक्की के ऊपर दही, हरी चटनी, मीठी चटनी डालिए और ऊपर से चाट मसाला भी डालिए. गरमागरम आलू भल्ला परोसिए. कई जगहों पर इसे हरेभरे पत्तों से बने दोने में दिया जाता है, तो कई जगह पर मिट्टी के कुल्हड़ में भल्ले खाने को दिए जाते हैं. प्रयोग के तौर पर इस में ऊपर से महीन सेव भी डाल दी जाती है.

Paddy : सही समय पर करें काम अच्छा पैदा हो धान

Paddy : सही तकनीक का इस्तेमाल कर के किसान न केवल इस तरह की समस्याओं से बच सकते हैं, बल्कि ज्यादा उपज भी ले सकते हैं.

यहां हम बासमती धान की खेती कलैंडर पर रोशनी डाल रहे हैं, ताकि किसान अपने कामों को समय पर अंजाम दें और अच्छी उपज पाएं.

1 से 15 जून

बीज भरोसेमंद जगह से ही खरीदें. बीजोपचार जरूर करें. 5 किलो बीज के लिए 5 ग्राम एमीसान व एक ग्राम स्ट्रैप्टोसायक्लीन का 10 लिटर पानी में घोल बनाएं. 24 घंटे तक बीज को उस में डुबोएं. टब एल्यूमिनियम का न हो. थोड़ा बीज का नमूना और थैला सुरक्षित रखें.

16 से 30 जून

अगर पौध पीली पड़ती दिखाई दे तो 3 फीसदी फेरस सल्फेट का छिड़काव करें. पौध उखाड़ने के एक हफ्ते पहले एक बार किसी फफूंदीनाशक का छिड़काव करें. पौधशाला में सिंचाई शाम के समय में करें.

1 से 15 जुलाई

जिन किसानों की धान की पौध 20-25 दिन की हो गई हो, वे सिंचाई करें और सावधानी से पौध उखाड़ कर उस की रोपाई करें. रोपाई के समय 4-5 सैंटीमीटर से ज्यादा पानी न रखें. एक वर्गमीटर में 25-30 पौधे लगाएं. रोपाई 15 जुलाई से पहले खत्म कर लें. पूसा बासमती-1509 की रोपाई 15 जुलाई के बाद ही करें.

16 से 31 जुलाई

सिंचाई व खरपतवार का ध्यान रखें. नाइट्रोजन की पहली खुराक का बुरकाव करें. जहां पौध मर गए हैं, वहां नई पौध लगा दें. खेत की मेंड़ को साफ रखें. अच्छा रहेगा कि फफूंदीनाशक का छिड़काव मेंड़ पर भी कर दें.

1 से 15 अगस्त

इस समय धान की फसल पर तना छेदक, पत्ती मोड़क, हरा तेला, सफेद पीठ वाला तेला कीट का हमला हो सकता है इसलिए किसान खेत की लगातार जांच करें. फैरोमौन प्रपंच यानी ट्रैप फसल के बीचोंबीच लगा सकते हैं ताकि पीला तना छेदक नर पतंगे खत्म हो जाएं. कीटों के पाए जाने पर ट्राइकोग्रामा कार्ड 1-3 प्रति एकड़ की दर से लगा सकते हैं. दवा का छिड़काव तभी करें, जब उन की तादाद ज्यादा हो.

16 से 31 अगस्त

खरपतवार की समय से पहले रोकथाम करें और नाइट्रोजन की बाकी बची मात्रा डालें. मेंड़ को साफ रखें व एक बार फिर किसी फफूंदीनाशक का छिड़काव करें.

इस दौरान धान में पत्ती लपेटक कीट का हमला देखा जाता है. अगर हमला ज्यादा हो तो कार्बोफ्यूरान 3जी/6 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से बुरकाव करें.

1 से 30 सितंबर

धान में पत्ती लपेटक कीट की जांच करें. इस समय धान की फसल को चौपट करने वाले ब्राउन प्लांट होपर यानी भूरा फुदका का हमला शुरू हो सकता है.

किसान खेत के अंदर जा कर पौधों के तनों के निचले भाग पर मच्छर जैसे कीट की जांच करें.

धान में ब्लास्टर यानी बदरा बीमारी का हमला होने की निगरानी भी हर 2-3 दिन के अंतर पर करें. शुरू में पत्तियों पर सूई की नोक के बराबर गोल तांबे के रंग के धब्बे बनना इस बीमारी की निशानी है. 2-3 दिन के अंदर ये धब्बे लंबाई में बढ़ कर आंख के आकार के हो जाते हैं.

अगर इस कीट की समय पर रोकथाम न की जाए तो बाली के नीचे के हिस्से पर इस का असर पड़ता है. इसे आम भाषा में गरदन तोड़ कहते हैं.

इस की रोकथाम के लिए बाविस्टीन 2 ग्राम प्रति लिटर की दर से 3 बार छिड़काव करें. पहली बार रोपाई के 30-40 दिन बाद, दूसरा छिड़काव पहले छिड़काव से 20-25 दिन बाद और तीसरा, दूसरे छिड़काव से 20-25 दिन बाद करने से बीमारियों की रोकथाम की जा सकेगी. जैसे ही बीमारी का लक्षण दिखाई दे, तुरंत छिड़काव करें.

इस समय धान में आभासी कंड यानी हलदी बीमारी आने की काफी संभावना है. इस बीमारी के आने से धान के दाने फूल जाते हैं और पीले रंग के हो जाते हैं. इस की रोकथाम के लिए ब्लाइटौक्स-50 की 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर मात्रा को पानी में मिला कर 10 दिन के अंतर पर 2 बार बालियां आने से पहले छिड़काव करें. खेत में पानी जमा न होने दें.

इसी समय ब्राउन प्लांट होपर यानी भूरा फुदका का हमला शुरू हो सकता है. किसान खेत की नियमित निगरानी करते रहें और कीटों की ज्यादा तादाद होने पर मोनोक्रोटोफास 2 एमएल प्रति लिटर पानी की दर से जहां कीट हो, वहां छिड़काव करें.

1 से 30 अक्तूबर

दाना पकने पर खेत में दूसरी किस्मों के पौधे दिखाई दें तो उन्हें निकाल दें. अगर फसल में दूसरी जाति के दाने होते हैं तो भाव कम कर दिया जाता है.

पछेते धान में इस मौसम में एक सिंचाई जरूर करें. मौसम को ध्यान में रखते हुए किसानों को यह सलाह है कि धान की पकने वाली फसल को कटाई से 2 हफ्ते पहले सिंचाई लगाना बंद कर दें. फसल कटाई के बाद फसल को 2-3 दिन खेत में सुखा कर गहाई कर लें. उस के बाद दानों को अच्छी तरह से सुखा कर ही मंडी ले जाएं या स्टोर करें.

Workshop : प्याज एवं लहसुन पर अनुसंधान परियोजना की कार्यशाला

Workshop : भाकृअनुप-विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, हवालबाग, अल्मोड़ा में प्याज एवं लहसुन पर अखिल भारतीय नैटवर्क अनुसंधान परियोजना की 16वीं सालाना कार्यशाला का शुभारंभ अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (एआईओनआरपीओजी) के अंतर्गत किया गया. इस कार्यशाला के मुख्‍य अतिथि अजय टम्‍टा, केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग राज्य मंत्री ने अपने संबोधन में संस्थान के निदेशक एवं सभी वैज्ञानिकों को कृषि क्षेत्र में प्राप्त उपलब्धियों के लिए बधाई दी. उन्होंने कहा कि इस कार्यशाला में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए वैज्ञानिक अपने अनुभवों को साझा करेंगे.

मंत्री अजय टम्टा ने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के निर्देशन में 29 मई से 12 जून, 2025 तक चलने वाली ‘विकसित कृषि संकल्प अभियान : अनुसंधान किसान के द्वार’ कार्यक्रम में किसानों से अधिक से अधिक संख्या में भागीदारी कर कार्यक्रम को सफल बनाने का आह्वान किया.

इस कार्यशाला के अध्यक्ष डा. संजय कुमार सिंह, उपमहानिदेशक (बागबानी विज्ञान), भाकृअनुप ने बताया कि कार्यशाला के दौरान 3 साल के लिए बनाए जाने वाले इस कार्यक्रम में ‘किसानों को कैसे आगे बढ़ाया जाए’ विषय पर गहन चर्चा की जाएगी. उन के मुताबिक, देवभूमि में ऐसी क्षमता है कि यहां बेमौसमी एवं दुर्लभ सब्‍जी उत्‍पादन कर अत्यधिक लाभ लिया जा सकता है.

उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि हमारा देश आज प्याज एवं लहसुन की उत्पादकता में दूसरे स्थान पर है. यदि युवा तबका इस की खेती अच्छी क्वालिटी के बीज, तकनीकी एवं आधुनिक तरीका अपना कर करें, तो कम लागत पर अधिक मुनाफा ले सकते हैं.

इस से पूर्व संस्थान के निदेशक डा. लक्ष्‍मी कांत ने संस्थान की उपलब्धियां भी बताईं. उन्होंने कहा कि संस्थान द्वारा ही प्याज की पहली संकर किस्म वीएल प्‍याज 67 का विकास किया गया. उन्होंने बताया कि संस्थान द्वारा प्याज की 2 एवं लहसुन की 2 किस्मों का विकास कर उन्हें अधिसूचित किया गया और प्याज की 1 व लहसुन की 2 किस्मों का व्यावसायीकरण भी किया गया है.

इस दौरान डा. विजय महाजन, निदेशक, प्याज एवं लहसुन अनुसंधान निदेशालय, पुणे ने अखिल भारतीय प्याज एवं लहसुन परियोजना की सालाना उपलब्धियों से सभी को अवगत कराया.

इस संस्थान के 3 प्रकाशनों बुलबिल ऐज प्लांटिंग मैटिरियल: नोवल अप्रोच टू कल्‍टीवेट लौग डे गार्लिक इन नौर्थ वैस्‍टर्न हिमालयाज, पर्वतीय क्षेत्रों में प्‍याज का बीजोत्‍पादन एवं पर्वतीय इलाकों में लहसुन का बीज उत्पादन और प्याज एवं लहसुन अनुसंधान निदेशालय की पुस्तिका गाइडलाइंस फौर आइडेंटिफिकेशन औफ औनियन एंड गार्लिक वैरायटी/हाइब्रिड इवैल्‍यूएटेड अंडर एआईएनपीओआरजी फौर रिलीज का भी विमोचन किया गया.

प्रगतिशील किसानों को कार्यशाला के दौरान किया गया सम्मानित

इस अवसर पर अजय वर्मा, महापौर, अल्‍मोड़ा, डा. सुधाकर पांडे, सहायक महानिदेशक (बागबानी संभाग), भाकृअप, डा. केई लवांडे, पूर्व कुलपति, डा. बीएसकेकेवी, जलगांव एवं पूर्व निदेशक डीओजीआर, पुणे, डा. प्रवीण मलिक, सीईओ, एग्रीइनोवेट, नई दिल्‍ली, डा. संजय कुमार, डा. बीएस पाल, डा. विक्रमादित्य पांडे, डा. बीएस तोमर, डा. पीके गुप्ता एवं देश के विभिन्‍न संस्‍थानों और कृषि विश्वविद्यालयों के 70 से भी अधिक लोग उपस्थित रहे.

Trolley : छोटी ट्रौली से करें काम, बोझ ढोना हुआ आसान

Trolley : कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भी भागीदारी अहम है. पशुपालन में भी महिलाओं की तकरीबन 70 फीसदी भागीदारी है. महिलाओं द्वारा पशुओं के लिए चारा काटना और उसे लाना, दूध दुहना, गोबर डालना व उस के उपले बनाना और पशुओं की देखरेख करना ये सभी काम शामिल हैं.

ये सभी काम मेहनत वाले हैं जिन से थकावट होती है इसलिए अब कृषि में अनेक प्रयोग होने लगे हैं जो खेती से जुड़े कामों को आसान बना रहे हैं.

इसी दिशा में चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के ‘पारिवारिक संसाधन प्रबंधन विभाग’ द्वारा एक बहुद्देशीय ट्रौली को बनाया गया है जिस पर सामान लादना व ढोना आसान है. इस ट्रौली से किसी भी सामान को एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है जैसे गोबर, ईंधन, पानी वगैरह. इस ट्रौली को हाथों से धक्का दे कर चलाया जाता है. बोझ को सिर पर उठा कर नहीं चलना पड़ता इसलिए इस ट्रौली के इस्तेमाल में आराम रहता है.

यह ट्रौली खेतिहर महिलाओं के लिए काफी आरामदायक है. इस ट्रौली को लोहे की चादर और पाइपों से बनाया गया है जिस में तकरीबन 17-18 किलो वजन होता है. इस की अनुमानित कीमत 2,000 रुपए है.

आप इसे स्थानीय बाजार से भी ले सकते हैं या हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के ‘पारिवारिक संस्थान प्रबंधन विभाग’ से संपर्क कर सकते हैं.

Farming Schemes : खेती योजनाओं की भरमार,किसानों को जानकारी नहीं

Farming Schemes : सरकारें किसानों की हिमायती बनने का दिखावा कर के उन को लुभानेरिझाने में लगी हैं, इसलिए हर रोज नई स्कीमों के फरमान जारी हो रहे हैं. नेता गाल और अफसर खड़ताल बजा रहे हैं. यह बात अलग है कि ज्यादातर किसान आज भी बदहाल हैं, क्योंकि बहुत से किसानों को सरकारी स्कीमों का फायदा मिलना तो दूर उन्हें पता तक नहीं चलता, क्योंकि निकम्मे व भ्रष्ट सरकारी मुलाजिम किसानों को उन के फायदे की योजनाओं की कानोंकान खबर तक नहीं लगने देते.

सरकारी योजनाओं के ज्यादातर घोड़े कागजों पर दौड़ते हैं. छुटभैए नेता और बिचौलियों की मिलीभगत से हिस्साबांट हो जाता है. सरकारी स्कीमों की छूट व सहूलियतों का फायदा लेने के लिए किसानों को खुद ही जागना होना. अपनी जानकारी बढ़ाने के लिए उन्हें पत्रपत्रिकाओं का सहारा लेना पड़ेगा.

नईनई तकनीकें सीख कर खेती की लागत घटे, बेहतर इंतजाम से नुकसान घटे व प्रोसैसिंग से आमदनी बढ़े, ऐसी बातें सीखनी होंगी. खेती में कम आमदनी की अहम वजह सही जानकारी की कमी भी है.

दर्जनों स्कीमें

खाद, बीज, कीड़ेमार दवा व खेती की मशीनें उधार लेने के लिए हर बार किसानों को कर्ज लेने के पहले अपनी खेती के कागज जमा कराने पड़ते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में अब ऐसा नहीं है. ज्यादातर किसान नहीं जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में खेती महकमे की स्कीमों का फायदा लेने के लिए ह्वश्चड्डद्दह्म्द्बष्ह्वद्यह्लह्वह्म्द्ग.ष्शद्व पर महज एक बार औनलाइन रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी है. फिर इस के बाद बारबार कागज जमा कराने का झंझट खत्म.

किसान अपनी जमीन की खतौनी, आधारकार्ड व बैंक पासबुक की फोटोकौपी ले कर अपने जिले में खेती महकमे के दफ्तर, जनसेवा केंद्र या साइबर कैफे में यह काम करा सकते हैं.

अगर इस तरह की बुनियादी जानकारी किसानों को मिले तो सरकारी स्कीमों का फायदा आसानी से लिया जा सकता है.

उत्तर प्रदेश में किसान अपने खेत से मिट्टी का नमूना ले कर बिना कुछ खर्च किए ही खेती महकमे की लैब से उस की जांच करा सकते हैं. इस की जानकारी ब्लौक दफ्तर के सहायक विकास अधिकारी, कृषि से ली जा सकती है. मृदा स्वास्थ्य कार्ड पर दर्ज जांच रिपोर्ट के आधार पर खेत की मिट्टी में जिन चीजों की कमी हो, जरूरी खुराक खेत में डाल कर किसान अपनी पैदावार व आमदनी में इजाफा कर सकते हैं.

Farming Schemesमशीनों पर छूट

खेती में समय और मेहनत बचा कर बेहतर काम के लिए मशीनों का इस्तेमाल करना बहुत ही फायदेमंद साबित हुआ है इसलिए सरकार उन की खरीद पर माली इमदाद देती है ताकि ज्यादा से ज्यादा किसान उन्हें खरीद सकें.

छोटे किसानों को खेती की मशीनें किराए पर मुहैया कराने के लिए अगर 8-10 किसान मिल कर अपना एक समूह बनाएं तो वे अपना खुद का कस्टम हायरिंग सैंटर या फार्म मशीनरी बैंक खोल सकते हैं.

सिंचाई में सहायता

गांव में अमूमन बिजली कम ही आती है. बिजली आए भी तो वोल्टेज कम आती है. उधर डीजल की बढ़ती कीमतों ने फसलों की सिंचाई को महंगा कर दिया है. ऐसे में सोलर पंप सैट का इस्तेमाल करना फायदेमंद है.

किसान अगर बोरिंग खुद करा लें तो 2, 3 व 5 हौर्सपावर का सोलर पंप लगाने पर उत्तर प्रदेश का खेती महकमा 40 से 70 फीसदी तक की छूट देता है.

जमीन के अंदर का पानी सब से ज्यादा फसलों की सिंचाई में खर्च होता है. पानी की कमी वाले इलाकों में फव्वारा यानी स्प्रिंकलर सिस्टम को बढ़ावा दिया जा रहा है.

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केंचुआ खाद में माली इमदाद

कैमिकल खाद के अंधाधुंध इस्तेमाल ने जमीन की सेहत को काफी हद तक खराब कर दिया है इसलिए केंचुओं की खाद यानी वर्मी कंपोस्ट के उत्पादन व इस्तेमाल पर खासा जोर दिया जा रहा है.

खेती का कचरा यानी अवशेष (पराली) का इस्तेमाल कंपोस्ट बना कर जमीन की उपजाऊ ताकत को बढ़ाने में बखूबी किया जा सकता है, जबकि इस को जलाने से माहौल खराब होता है.

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से अलग राष्ट्रीय पशुधन बीमा योजना में पशुपालक जानवरों के नजदीकी अस्पताल में  बीमा करा सकते हैं.

सावधानी

गौरतलब है कि सभी स्कीमों में दी जाने वाली छूट किसानों के बैंक खातों में जमा की जाती है इसलिए अपना बैंक खाता जरूर चालू रखें. साथ ही, जो भी चीज नकद या उधार कृषि विभाग के स्टोर से खरीदें, उस की पक्की रसीद जरूर लें वरना छूट नहीं मिलेगी. किसान गूगल प्ले स्टोर से यूपी पारदर्शी किसान नामक मोबाइल एप भी डाउनलोड कर सकते हैं.

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दूसरे राज्यों में भी हैं ये सुविधाएं

उत्तर प्रदेश में 1 लाख रुपए तक, महाराष्ट्र में डेढ़ लाख रुपए तक, राजस्थान, कर्नाटक, मध्य प्रदेश व पंजाब में 2-2 लाख रुपए तक किसानों के कर्ज माफ किए गए हैं. महाराष्ट्र में कर्ज चुकाने वालों को 25,000 रुपए तक की माली इमदाद दी जाती है. पंजाब में खुदकुशी करने वाले किसानों के परिवारों को 5 लाख रुपए का मुआवजा दिया जाता है.

ओडि़सा में रबी खरीफ की फसल पर 5-5 हजार रुपए प्रति एकड़ खेती से जुड़े कामधंधों के लिए 12,500 रुपए, 2 लाख रुपए का दुर्घटना बीमा, बूढ़े किसानों को 10,000 रुपए व 50,000 रुपए तक बिना ब्याज के कर्ज की सहूलियत दी जा रही है. झारखंड में खरीफ की फसल पर 5,000 रुपए प्रति एकड़ की इमदाद दी जा रही है.

तेलंगाना में किसानों के लिए 24 घंटे मुफ्त बिजलीपानी मिलता है. बीते दिनों 7 अरब रुपए के पानी के बिल माफ किए गए हैं. साल में 2 फसलों के लिए 4,000 रुपए प्रति एकड़ की माली इमदाद व 5 लाख रुपए की दुर्घटना बीमा की सहूलियत दी जाती है. पश्चिम बंगाल में किसानों की फसल बीमा का प्रीमियम व किसानों की मौत पर उन के परिवार को 2 लाख रुपए का मुआवजा दिया जाता है. खेती महकमे के दफ्तर से किसान ज्यादा जानकारी हासिल कर सकते हैं.

Aquaponics : खेती का भविष्य है ‘एक्वापौनिक्स’ तकनीक

Aquaponics : हमारे देश की 60 फीसदी आबादी का हिस्सा किसी न किसी रूप से खेती से जुड़ा है. यही वजह है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है. अगर हम इस क्षेत्र में दूर तक नजर दौड़ाएं तो खेती में नवाचार की खासी कमी है. आज भी अनेक किसान पारंपरिक तरीके से खेती कर रहे हैं. खेती में हमें आज बहुतकुछ नए प्रयोग करने की जरूरत है. इन्हें इस्तेमाल कर के अच्छी पैदावार ली जा सकती है.

ऐसी ही एक आधुनिक तकनीक है एक्वापौनिक्स (Aquaponics). इस तकनीक में मछलियां और पौधे आपस में एकदूसरे की मदद करते हैं यानी इस सिस्टम का इस्तेमाल कर मछलियों को सब्जियों के उत्पादन के एक्वाकल्चर और हाइड्रोपौनिक्स (पानी में पौधे उगाना) सिस्टम का एकसाथ इस्तेमाल किया जाता है. इस तकनीक को हम कम जगह में भी अपना सकते हैं. इस में मिट्टी या जमीन की जरूरत नहीं होती है.

Aquaponics

एक्वापौनिक्स (Aquaponics) की शुरुआत शायद एशिया से हुई. यहां के किसानों ने देखा कि ज्यादा बरसात या बाढ़ आने के बाद खेतों में पानी भर जाता है जिस में मछलियां भी होती हैं. उन खेतों में उगाई गई धान की फसलों से अच्छी पैदावार मिलती है. मछलियों से निकलने वाली गंदगी धान या दूसरी फसल के लिए पोषक तत्त्वों का काम करती है.

अगर आसान तरीके से बताया जाए तो जिस पानी का इस्तेमाल इस तकनीक में किया जाता है उस पानी में मछली छोड़ दी जाती हैं, जो उस पानी में रह कर अपना मल वगैरह छोड़ती हैं, वही पानी पौधों के लिए जैविक उर्वरक का काम करता है. इस के उलट हाइड्रोपौनिक्स सिस्टम में हमें पानी में जैविक उर्वरक के रूप में कुछ रसायन डालने होते हैं.

Aquaponics

इसी तकनीक को आज विकसित कर एक्वापौनिक्स (Aquaponics) सिस्टम का नाम दिया है. पारंपरिक खेती, एक्वाकल्चर या हाइड्रोपौनिक्स की तुलना में एक्वापौनिक्स (Aquaponics) तकनीक के कई फायदे हैं.

इस तकनीक में पौधे पानी से अमोनिया और नाइट्रोजन लेते हैं जिस से मछलियां शुद्ध और आक्सिजनयुक्त बेहतर माहौल में पलतीबढ़ती हैं.

माहिरों का मानना है कि जमीन में खेती करने की तुलना में एक्वापौनिक्स (Aquaponics) सिस्टम के तहत सलाद और सब्जियां, जिस में टमाटर, बैगन, शलगम वगैरह पैदा की जा सकती हैं. इस तरह के पौधों में पानी की बहुत ही कम जरूरत होती है. साथ ही, इस सिस्टम के लिए ऊर्जा भी कम लगती है.

Aquaponicsआने वाले समय में इस तकनीक को इस्तेमाल किया जाएगा तो इस से मछलियों के साथसाथ रसायनमुक्त सब्जियां भी मिलेंगी.

दुनियाभर में प्राकृतिक रूप से मछलियों का उत्पादन घटा है और अब माहिर भी मछली उत्पादन के लिए नए समाधान तलाश रहे हैं. फार्म में मछलीपालन करने वालों के लिए भी एक्वापौनिक्स (Aquaponics) सिस्टम बेहतर विकल्प साबित हो सकता है.

इस बारे में हमारी बात अनुभव दास से हुई. वे एक्वापौनिक्स (Aquaponics) के क्षेत्र में काम कर रही कंपनी ‘रैड ओटर फार्म्स’ के संस्थापक हैं. उन का कहना है कि पैदावार के मामले में हम दुनियाभर में कुछ उत्पादों में ऊंचाई पर हो सकते हैं, लेकिन हमारी फसल पैदावार प्रति हेक्टेयर के हिसाब से कम है. पिछले 5 सालों में हमारे कृषि उत्पादन की वृद्धि दर 0.2 फीसदी से 4.2 फीसदी के आसपास रही है.

टमाटर का उदाहरण लें. साल 2017 में भारत चीन के बाद दुनिया में सब से ज्यादा टमाटर पैदा करने वाला देश था. चीन ने तकरीबन 110,000 हेक्टेयर जमीन पर 56.8 मिलियन टन टमाटर का उत्पादन किया, वहीं भारत ने तकरीबन 10 फीसदी कम जमीन पर 18.7 मिलियन टन का उत्पादन किया. टमाटर की यह प्रति हेक्टेयर उत्पादकता अतुलनीय है.

उन्होंने आगे बताया कि आज बड़े पैमाने पर सरकार द्वारा खेती से जुड़े कामों के लिए मदद भी की जाती है. इस के बाद भी भारत का कृषि उत्पादन कमजोर है. तो क्या आने वाले कृषि उत्पादन बढ़ती आबादी की मांगों को पूरा करेगा  क्या हमारे खेत की पैदावार और उस की क्वालिटी बेहतर होगी जो स्वस्थ जीवन के लिए जरूरी है? क्या खेती कभी मौडर्न होगी? वगैरह.

इस पर अनुभव दास ने कहा कि आने वाले कल को बेहतर बना सकें, इस के लिए हमें कृषि क्षेत्र की मौडर्न तकनीकों की तरफ जाना होगा. बदलाव बहुत जरूरी है. एक बेहतर राष्ट्र के लिए खेती के विकास पर ध्यान देना ही होगा. दिनोंदिन हमारी खेत की जोत घट रही है जबकि आबादी बढ़ रही है. हमारे 65 फीसदी खेत फसल विकास के लिए मानूसन पर निर्भर हैं. इसलिए अगर हम प्रकृति के भरोसे रहे तो हम प्रगति की राह नहीं चल सकते. सामाजिक नवाचारकों के रूप में हम एक बदलाव लाना चाहते थे. हमें कृषि के क्षेत्र में एक अलग और नई सोच पैदा करने की जरूरत है. मानसून के भरोसे रह कर खेती नहीं की जा सकती. इस के अलावा हमें रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल को भी कम करने की जरूरत है.

Aquaponics

हमारा मानना है कि एक्वापौनिक्स (Aquaponics) हमें यह यह मौका देता है. इसे हमें अपनाना चाहिए. एक्वापौनिक्स चक्र पारंपरिक मिट्टी आधारित कृषि की तुलना में 90 फीसदी से ज्यादा बढ़ने वाली फसलों के लिए पानी की जरूरत को कम करता है.

एक्वापौनिक्स (Aquaponics) तकनीक खेती की जमीन पर निर्भर नहीं है. यह बिना मिट्टी के होने वाली इस तकनीक को दुर्गम इलाकों, यहां तक कि शहरी जगहों में ले जाया जा सकता है. इस से बड़ी मात्रा में पानी की बचत होती है और खेती की पैदावार रासायनिक मुक्त होती है. पारंपरिक खेती के मुकाबले पैदावार भी 10-12 गुना ज्यादा है और क्वालिटी बेहतर है. एक लाइन में अगर कहा जाए तो एक्वापौनिक्स जिम्मेदार और टिकाऊ कृषि प्रणाली है और आने वाले समय में यह खेती का भविष्य है.

इंटरनैशनल लैवल पर एक्वापौनिक्स (Aquaponics) ने खेती के विकल्प के रूप में अच्छा कदम बढ़ाया है. खासतौर पर संयुक्त राज्य अमेरिका और आस्ट्रेलिया में. भारत में एक्वापौनिक्स (Aquaponics) अभी शुरुआती दौर में है. लेकिन अगर हम मिल कर कदम बढ़ाएंगे तो आने वाले समय में एक्वापौनिक्स (Aquaponics) एक प्रभावी तकनीक साबित होगी और अपनेआप में कृषि क्षेत्र में एक लीडर का काम करेगी.

Brinjal : बैगन की नई किस्में उगाइए

Brinjal : भारतीय बागबानी अनुसंधान संस्थान, बेंगलुरु के वैज्ञानिकों ने बैगन की 3 नई किस्में ईजाद की हैं, अर्का अवनाश, अर्का हर्षित और अर्का उन्नति.

अर्का अविनाश : इस किस्म के पौधे लंबे और फैलाव लिए होते हैं. इस की पत्तियां गहरे हरे रंग की होती हैं. इस के फल हरे, कोमल और अधिक भंडारण क्षमता वाले होते हैं. पकने की क्वालिटी भी उत्तम पाई गई है. यह जीवाणु उकटा की प्रतिरोधी किस्म है. यह किस्म प्रति हेक्टेयर 30 टन तक उपज दे देती है.

अर्का हर्षित : इस किस्म के पौधे लंबे और फैले हुए होते हैं. इस किस्म की पत्तियां गहरे हरे रंग की होती हैं. यह किस्म प्रति हेक्टेयर 40 टन तक उपज दे देती है.

अर्का उन्नति : इस किस्म के पौधे लंबे व उठे हुए होते हैं. पत्तियां गहरी हरी और हरे कैलिक्स वाले फल होते हैं जो गुच्छों में लगते हैं. फल कोमल और उन की भंडारण क्षमता ज्यादा होती है.

यह किस्म जीवाणु उकटा की प्रतिरोधी है. इस किस्म की एक खूबी यह भी है कि इसे खरीफ और रबी दोनों मौसमों में उगाया जा सकता है. यह किस्म प्रति हेक्टेयर 40 टन तक उपज दे देती है.

जलवायु : बैगन उष्णकटिबंधीय जलवायु वाला पौधा है. इसे गरम मौसम की जरूरत होती है. पौधों की अच्छी बढ़वार और विकास के लिए 20-30 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान की जरूरत होती है.

अगर मौसम लंबी अवधि तक ठंडा रहे तो पौधों की बढ़वार पर बुरा असर पड़ता है. थोड़े पाले से भी इसे ज्यादा नुकसान हो जाता है.

भूमि : बैगन को वैसे तो तमाम तरह की जमीनों में उगाया जा सकता है, पर सही जल निकास वाली दोमट मिट्टी, जिस का पीएच मान 5.5-6.0 हो, अच्छी मानी गई है.

जमीन की तैयारी : पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें. उस के बाद 2-3 जुताइयां कल्टीवेटर या हैरो से आरपार कर के कुछ सप्ताह तक खूली धूप में छोड़ दें. रोपाई करने से पहले खेत में सिंचाई के लिए सुविधानुसार क्यारियां बना लें.

खाद और उर्वरक: बैगन की फसल लंबी अवधि वाली होती है. उच्च उर्वरता वाली जमीनों में यह ज्यादा उपज देने वाली फसल है. इस की उच्च गुणवत्ता वाली ज्यादा उपज लेने के लिए इस की मिट्टी जांच कराना बहुत जरूरी है. अगर किसी कारणवश मिट्टी जांच न हो सके तो उस स्थिति में प्रति हेक्टेयर निम्न मात्रा में खाद व उर्वरक जरूर डालें:

गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद 250-300 क्विंटल, नाइट्रोजन 100 किलोग्राम, फास्फोरस 60 किलोग्राम, पोटाश 40 किलोग्राम.

गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद को पहली जुताई से पहले खेत में समान रूप से बिखेर देना चाहिए. नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा का मिश्रण बना कर आखिरी जुताई के समय डालना चाहिए. नाइट्रोजन की बाकी बची आधी मात्रा को 2 बराबर हिस्सों में बांट कर एक भाग रोपाई के 30 दिन बाद और दूसरा भाग रोपाई के 45 दिन बाद टौप ड्रैसिंग के दौरान देना चाहिए.

पौध रोपाई

बीज द्वारा पहले बैगन की पौध तैयार की जाती है, फिर पौध तैयार होने पर उसे खेत में रोपा जाता है. बैगन की बोआई के 3 प्रमुख मौसम हैं:

शरद शिशिर : इस मौसम में पौधशाला में बीज जून माह के अंत से जुलाई माह के मध्य तक बोए जाते हैं और रोपाई जुलाई माह में की जाती है.

वसंतग्रीष्म : इस के लिए पौधशाला में बीज अक्तूबरनवंबर माह में बोए जाते हैं और रोपाई जनवरीफरवरी माह में की जाती है.

बीज की मात्रा : एक हेक्टेयर के लिए 400-500 ग्राम बीज पर्याप्त हैं.

बीजों को पौधशाला में बोने से पहले 2.5 ग्राम थाइरम या सेरेसान जीएन प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए. ग्रीष्म व वर्षा ऋतु में पौधा महज 4 हफ्ते में रोपने लायक हो जाता है.

पौधों की रोपाई : पौधशाला से पौधा निकालने के 2-3 दिन पहले हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए ताकि पौधों को सुगमता से बिना जड़ों के नुकसान पहुंचाए उखाड़ा जा सके. लंबे बैगन की किस्मों को पंक्तियों व पौधों की दूरी क्रमश: 60 सैंटीमीटर × 60 सैंटीमीटर और गोल बैगन की किस्मों में क्रमश: 75 सैंटीमीटर × 60 सैंटीमीटर रखें. पौधों की रोपाई के तुरंत बाद हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए ताकि पौधे सुगमता से जम सकें.

सिंचाई और जल निकास

बैगन में सिंचाई कई बातों पर निर्भर करती है. इन में जमीन, फसल उगाने का समय और वातावरण प्रमुख हैं. जांच से पता चला है कि बैगन की ज्यादा उपज लेने के लिए 100-110 सैंटीमीटर पानी की जरूरत होती है. बहुत ज्यादा या कम सिंचाई करने से बैगन की फसल खराब हो सकती है.

आमतौर पर गरमियों में प्रति सप्ताह और सर्दियों में 15 दिन के अंतर पर सिंचाई करना सही रहता है, जबकि खरीफ फसल में सिंचाई की जरूरत नहीं होती है, पर काफी लंबी अवधि तक बारिश न हो तो जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें.

कभीकभी बारिश के मौसम में ज्यादा बारिश होने से पानी खेत में जमा हो जाता है. अगर ऐसी स्थिति पैदा हो जाए तो  फालतू पानी को तुरंत ही निकालने का बंदोबस्त करना चाहिए वरना पौधे पीले पड़ कर मर जाते हैं.

फसल सुरक्षा

खरपतवार नियंत्रण : बैगन के पौधों की बढ़वार धीमी गति से होती है इसलिए वे खरपतवारों के साथ होड़ नहीं कर पाते हैं इसलिए पौधों की शुरुआती बढ़वार के समय हलकी निराईगड़ाई करनी चाहिए. पूरी फसल में 3-4 निराईगुड़ाई करना काफी होता है.

खरपतवार की सही रोकथाम करने के लिए खरपतवारनाशकों का इस्तेमाल भी किया जा सकता है. फ्लोक्लोरलिन की 1.0-1.5 किलो सक्रिय अवयव प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें. इस के बाद एक बार हाथ से निराईगुड़ाई करें, जब फसल 30 दिन की हो जाए.

कीट नियंत्रण

एपीलेकना बीटिल : यह कीट पौधशाला से नुकसान पहुंचाना शुरू कर देता है. इस कीट का शिशु छोटा व लाल रंग का होता है. इस से पहले पीले रंग का होता है. यह कीट पत्तियों को खा कर छलनी जैसा बना देता है.

रोकथाम : हाथ से अंडों, सूंडि़यों व प्रौढों को इकट्ठा कर नष्ट कर देना चाहिए. कार्बोरिल या मैलाथियान के 0.1 फीसदी घोल का पर्णीय छिड़काव करना चाहिए. कीटरोधक किस्में जैसे अर्का शिरीष, हिसार चयन 14, संकर विजय नामक किस्में उगानी चाहिए.

शाखा व फल छेदक : इस कीट की सूंड़ी चिकनी व गुलाबी रंग की होती है जो बालरहित होती है. इस की पीठ पर बैगनी रंग की धारियां होती हैं. इस की सूंडि़यां नई शाखाओं में घुस जाती हैं जिस की वजह से शाखाएं मुरझा जाती हैं. बाद में ये सूंडि़यां फल में छेद कर के घुस जाती हैं.

रोकथाम : कीट लगी शाखाओं और फलों को तोड़ कर नष्ट कर दें. मैटासिस्टौक्स 2 मिलीलिटर दवा प्रति लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें. 4-5 साल का फसल चक्र अपनाएं.

तना छेदक : इस कीट की सूंड़ी तने में घुस कर फसल को नुकसान पहुंचाती है और तना नीचे की ओर झुक जाता है.

रोकथाम : कीट लगी शाखाओं और फलों को तोड़ कर नष्ट कर दें. मैटासिस्टौक्स 2 मिलीलिटर दवा प्रति लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें. 4-5 साल का फसल चक्र अपनाएं.

इस के अलावा हरा तेला एक छोटा कीट होता है जो पत्तियों के निचले भाग में पाया जाता है. यह पत्तियों का रस चूसता है. इस के चलते पत्तियां मुड़ जाती हैं और आखिर में मुरझा जाती हैं और भूरे रंग की हो जाती हैं. इस की रोकथाम में कीट लगे पौधों को नष्ट करे दें.

आर्द्र विगलन : यह एक फफूंदीजनित रोग है. यह रोग पौधशाला में लगता है. जिन पौधों में यह रोग लगता है, वे भूस्तर से सड़ने लगते हैं. पौधशाला में पौधों का मुरझाना और सूख जाना इस रोग का प्रमुख लक्षण है.

रोकथाम : पौधशाला में बीज बोने से 10-15 दिन पहले कैप्टान या थाइरम की 2 ग्राम दवा प्रति लिटर पानी में घोल कर पर्णीय छिड़काव करना चाहिए.

बीज बोने से पहले कैप्टान या थाइरम की 2 ग्राम दवा प्रति लिटर पानी में घोल कर उपचारित करना चाहिए. बीज बोने से पहले 50 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान के गरम पानी से 30 मिनट तक उपचारित करना चाहिए.

रोगी पौधों पर रोग के लक्षण दिखाई देते ही उन्हें उखाड़ देना चाहिए. 3-4 साल का फसल चक्र अपनाना चाहिए.

फोमोप्सिस झुलसा : यह एक फफूंदीजनित रोग है. रोगी पत्तियों पर छोटेछोटे गोल भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं. अनियमित आकार के धब्बे पत्तियों के किनारे दिखाई देते हैं. फलों के धब्बों में धूल के कणों के समान भूरी रचना साफ दिखाई देती है. इस रोग का प्रकोप पौधशाला के पौधों पर भी होता है, जिस के चलते पौधे झुलस जाते हैं.

रोकथाम : सेहतमंद बीज ही बोएं. बीज बोने से पहले कैप्टान या थाइरम से उपचारित कर लें. पौधशाला में कैप्टान के 0.2 फीसदी घोल का प्रति सप्ताह पर्णीय छिड़काव करें. रोपाई के बाद 0.2 फीसदी जिनेब या मैनेब का छिड़काव करें.

पत्तियों के धब्बे : यह रोग 4 प्रकार की फफूंदियों द्वारा फैलता है जैसे आल्टरनेरिया मेलांजनि, आल्टरनेरिया सोलेनाई, स्कोस्पोरा-सोलेनाई मेलांजनि और सरकोस्पोरा मेलांजनि.

आल्टरनेरिया की दोनों प्रजातियों के कारण पत्तियों पर अनियमित आकार के भूरे धब्बे बन जाते हैं. इस वजह से पत्तियां पीली पड़ कर मर जाती हैं और आखिर में गिर जाती हैं. इस के अलावा रोगी पत्तियां भी गिर जाती हैं और पौधों पर फल कम लगते हैं.

रोकथाम : रोगी पत्तियों को तोड़ कर जला देना चाहिए. खेत को खरपतवार से मुक्त रखना चाहिए. ब्लाइटौक्स के 0.2 फीसदी घोल का 7-8 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें.

फलों की तोड़ाई: जब फल पूरी तरह से पक जाएं, कोमल हों और उन में रंग आ जाए तब उन्हें तोड़ लेना चाहिए क्योंकि फलों को देरी से तोड़ने पर वे कठोर हो जाते हैं और उन में बीज पक जाते हैं व फलों का रंग फीका पड़ जाता है. इस वजह से फल सब्जी बनाने के लिए अनुपयुक्त हो जाते हैं. आमतौर पर फल लगने के तकरीबन 8-10 दिन बाद फल तोड़ने लायक हो जाते हैं.

उपज : बैगन की उपज कई बातों पर निर्भर करती है, जिन में जमीन की किस्म, उगाई जाने वाली किस्म, फसल की देखभाल प्रमुख हैं. अगर बैगन की किस्मों को सही तरीके से बोया जाए तो प्रति हेक्टेयर 40 टन तक उपज मिल जाती है.

Kitchen Garden : बेहतर सेहत के लिए लगाएं किचन गार्डन

Kitchen Garden : सब्जियों के उत्पादन में बेहिसाब रासायनिक खादों व कीटनाशक दवाओं के इस्तेमाल के कारण सब्जियां सेहत के लिए नुकसानदायक साबित हो रही हैं. लेकिन समस्या यह भी है कि बिना रासायनिक खादों व कीटनाशकों के इस्तेमाल वाली सब्जियां बाजार में या तो मिलती नहीं हैं या कई गुनी महंगी मिलती हैं. इस समस्या का एकमात्र हल यह है कि घर व आसपास की खाली जगह में किचन गार्डन (Kitchen Garden) लगा कर जैविक सब्जियां खुद उगाई जाएं.

अपने मकान के आसपास खाली पड़ी जमीन या खाली स्थानों पर गमले लगा कर उन में किचन गार्डन (Kitchen Garden) तैयार किया जा सकता है. किचन गार्डन (Kitchen Garden) तैयार करने के लिए बेल वाली सब्जियों की बोआई गमलों में की जा सकती है, जबकि पत्ती वाली व जड़युक्त सब्जियों की बोआई खाली जमीन पर कर सकते हैं.

किचन गार्डन (Kitchen Garden) बनाने के लिए खाली जमीन के एक किनारे पर खाद का गड्ढा बनाना होगा, जिस में घर का प्लास्टिकमुक्त कचरा व पौधों के अवशेष डालने होंगे. इस से बढि़या जैविक खाद बन जाएगी.

Kitchen Garden

किचन गार्डन (Kitchen Garden) के लिए तैयार की गई क्यारियों में खुदाई कर के मिट्टी को कई बार पलट देना चाहिए और उस के बाद उस में कंपोस्ट खाद डाल कर मिला देनी चाहिए. क्यारियों के बीच मिट्टी की चौड़ी मेंड़ बना दें ताकि पानी एक क्यारी से दूसरी क्यारी में न जा सके. इन क्यारियों में लगाने के लिए पहले सब्जियों के पौध तैयार करें और उन्हें 15 दिनों बाद इन क्यारियों में लगा दें. सिंचाई जहां तक हो सके स्प्रिंकलर से करें. इसी प्रकार गमलों में बेलदार सब्जियों के पौधों की बोआई करने से पहले उन में कंपोस्ट खाद मिट्टी में मिला कर भर दें.

यदि सब्जियों में कोई रोग या कीटजनक समस्या पैदा होती है, तो उस का जैविक इलाज करें. जो पौधे रोगग्रस्त हो गए हों, उन्हें किचन गार्डन (Kitchen Garden) से हटा दें. जहां तक हो सके समयसमय पर सिंचाई करें और पौधों के आसपास उगने वाले खरपतवार हटा दें. तय अंतराल के बाद निराईगुड़ाई करते रहें.

किचन गार्डन (Kitchen Garden) से खरीफ के मौसम में लोबिया, तुरई, भिंडी, अरवी, करेला, लौकी, ग्वार, मिर्च, टमाटर, कद्दू, बैगन व पालक वगैरह सब्जियां हासिल की जा सकती हैं. रबी के मौसम सितंबर से नवंबर तक किचन गार्डन में आलू, मेथी, मिर्च, टमाटर, बैगन, प्याज, लहसुन, धनिया, पालक, गोभी, गाजर व मटर जैसी सब्जियों का उत्पादन किया जा सकता है. इसी तरह जायद में फरवरी व मार्च में भिंडी व कद्दूवर्गीय सब्जियां हासिल की जा सकती हैं. यदि घर के आसपास खाली जगह ज्यादा हो तो उस में केला, पपीता, नीबू, अमरूद व करौंदा आदि के पौधे लगाए जा सकते हैं.

Kitchen Garden

किचन गार्डन (Kitchen Garden) से कीटनाशक व रासायनिक खादों से मुक्त सब्जियां परिवार को भरपूर मात्रा में हासिल होंगी, वहीं इन सब्जियों से भरपूर विटामिन, खनिज लवण व कार्बोहाइड्रेट भी मिलते रहेंगे. पोषण वैज्ञानिकों के अनुसार, एक व्यक्ति को संतुलित भोजन के रूप में रोजाना 85 ग्राम फल और 300 ग्राम सब्जियों की जरूरत होती है, जिस में 125 ग्राम हरी पत्तेदार सब्जियां और 100 ग्राम जड़ वाली सब्जियां व 75 ग्राम अन्य सब्जियां होना जरूरी है. लेकिन मौजूदा वक्त में इस मात्रा में लोगों को सब्जियां मिल नहीं पा रहीं, जिस से उन के शरीर में कुपोषण के कारण रोगों के आक्रमण की संभावना बनी रहती है. इस का हल किचन गार्डन से काफी हद तक किया जा सकता है.