आस्ट्रेलियन टीक (एमएचएटी 16) : 10 सालों में 5 करोड़ तक की आमदनी

आमतौर पर विश्व में अकेसिया बबूल की 1200 से भी ज्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं. भारत में लगभग सभी जगह पाया जाने वाला बबूल भी इसी अकेसिया की एक प्रजाति है. पान में जिस कत्था को हम खाते हैं, वह भी इसी की एक अन्य प्रजाति की लकड़ी से प्राप्त किया जाता है.

आज हम इस की एक विशेष प्रजाति की चर्चा कर रहे हैं, जिस का आस्ट्रेलिया और अन्य कई देशों में बहुत बड़े पैमाने पर व्यावसायिक रोपण किया गया है और इस से वहां के किसान भरपूर मुनाफा कमा रहे हैं. इस की लकड़ी का व्यापार जगत में लोकप्रिय नाम आस्ट्रेलियन टीक है. बेहतरीन, खूबसूरत, टिकाऊ, बहुमूल्य लकड़ी के सभी प्रमुख गुणों जैसे कठोरता, घनत्व, मजबूती एवं लकड़ी में पाए जाने वाले रेशों के मापदंड पर इस की लकड़ी आजकल पाए जाने वाले सागौन से कहीं भी उन्नीस नहीं बैठती. यही कारण है कि अल्पकाल में ही इस ने न केवल अपार लोकप्रियता हासिल की कर ली है और लकड़ी के व्यापार में बहुत बड़ा मुकाम बना लिया है.

भारत हर साल लगभग 40 लाख करोड़ रुपए की लकड़ी व नौनटिंबरवुड आयात करता है. बिहार से इस की खेती करने पर किसानों को न केवल बेहतरीन आमदनी होगी, बल्कि देश की बहुमूल्य विदेशी पैसे की बचत भी होगी.

यह एक तेजी से बढ़ने वाली प्रजाति है, जो न केवल उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करती है, बल्कि इस की लकड़ी का व्यापारिक मूल्य भी अत्यधिक है.

मौडर्न तो श्री हर्बल फार्म 2017 सैंटर पर पिछले 30 सालों में किए गए प्रयोगों से यह स्पष्ट हो गया कि इस की बढ़वार लंबाई और मोटाई दोनों ही मामलों में महोगनी, शीशम, मिलिया डुबिया, मलाबार नीम और टीक की अन्य प्रजातियों की तुलना में सर्वाधिक है. कई मामलों में तो इस की वृद्धि ‌इन सब से दोगुनी तक पाई गई है. इस की विशेषता तेज वृद्धि, उच्च गुणवत्ता की लकड़ी और मिट्टी को समृद्ध करने की क्षमता में निहित है.

वर्तमान में देश में उपलब्ध सब से तेजी से बढ़ने वाली और उच्चतम गुणवत्ता की लकड़ी उत्पादन देने वाली एकेसिया मंगियम (Acacia Mangium) की एकमात्र विकसित प्रजाति एमएचएटी-16 (MHAT-16) है, जिसे ‘मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म्स एवं रिसर्च सेंटर’, कोंडागांव ने पिछले कई दशकों के प्रयास से विकसित किया है. यह न केवल बेहतर गुणवत्ता की लकड़ी उत्पादन देती है, बल्कि मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा भी बड़ी तेजी से बढ़ाती है, जिस से यह एक टिकाऊ और लाभकारी और इकोफ्रैंडली विकल्प बन जाती है.

सही पौधे का चयन : सफलता की कुंजी

एकेसिया मंगियम (Acacia Mangium) वृक्षारोपण की सफलता सब से पहले इस बात पर निर्भर करती है कि कौन से पौधे चुने जाते हैं. इस प्रजाति में चयन करने की दिक्कत इसलिए बढ़ जाती है कि ज्यादातर प्रजातियों के पत्ते लगभग एकजैसे ही दिखाई देते हैं, लेकिन असली फर्क लकड़ी की गुणवत्ता में रहता है. एमएचएटी-16 (MHAT-16) प्रजाति का पौधा अपने तेजी से विकास और मजबूत जड़ प्रणाली के लिए प्रसिद्ध है. पौधे के स्वास्थ्य, उस की जड़ प्रणाली और तने की मोटाई जैसे कारकों को ध्यान में रखना चाहिए. उच्च शूट/रूट (shoot/root) अनुपात वाले पौधे तेजी से बढ़ते हैं और विपरीत परिस्थितियों में बेहतर जीवित रहते हैं.

मुख्य बिंदु :
– पौधा रोगमुक्त और कीटमुक्त होना चाहिए.
– अच्छी तरह से विकसित जड़ प्रणाली (lateral root system) होना चाहिए.
– तना मजबूत और काष्ठीय होना चाहिए.

पौधों का रोपण : समय पर और सही जगह :

एकेसिया मंगियम (Acacia Mangium) एमएचएटी-16 (MHAT-16) के पौधों को 3 से 5 महीने की आयु के बाद रोपण के लिए तैयार किया जा सकता है. इस के पौधे पौलीबैग या रूट ट्रेनर्स (root trainers) में उगाए जाते हैं. वर्षा ऋतु रोपण के लिए सर्वोत्तम समय है. हालांकि सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो, तो इसे शीत ऋतु में भी लगाया जा सकता है. जिस किसान के पास ड्रिप इरीगेशन की सुविधा हो, तो वे इसे मध्य मार्च तक भी लगा सकते हैं.

मुख्य बिंदु :
– पौधों की ऊंचाई 25-40 सैंटीमीटर होनी चाहिए.
– रोपण के लिए मानसून का समय आदर्श होता है.

कटिंग से पौधों का उत्पादन : एक सस्ती और कारगर विधि :

एकेसिया मंगियम (Acacia Mangium) की इस विशेष प्रजाति के पौधे मुख्य रूप से स्टेम कटिंग (stem cuttings) के माध्यम से उगाए जाते हैं. एमएचएटी- 16 (MHAT-16) प्रजाति की कटिंग से उगाए गए पौधे तेजी से बढ़ते हैं और उन की जड़ प्रणाली मजबूत होती है. कटिंग्स को आईबीए (IBA (Indole-3-butyric acid) के विशेष अनुपात के साथ उपचारित किया जाता है, ताकि जड़ें जल्दी विकसित हों.

मुख्य बिंदु :
– जड़ों के तीव्र गति से विकास के लिए वर्मी कंपोस्ट और साफसुथरी रेती का मिश्रण सब से उपयुक्त होता है.

सिंचाई :

पौधों की वृद्धि की आवश्यकता : एकेसिया मंगियम (Acacia Mangium) एमएचएटी -16 (MHAT-16) के पौधों को नर्सरी अवस्था में तो नियमित नमी की आवश्यकता होती है. पौधों को हर दूसरे दिन पानी देना चाहिए, विशेषकर गरम मौसम में. इस से पौधों का विकास तेजी से होता है और उन के मुरझाने की संभावना कम होती है. खेतों में लगाने के बाद एक बार भलीभांति जड़ पकड़ लेने के बाद इसे कोई विशेष सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती. हालांकि सिंचाई करते रहने पर इस के वृद्धि दर में बहुत अच्छे परिणाम देखे गए हैं.

मुख्य बिंदु :
– पौधों में आवश्यकतानुसार सिंचाई करें.
– गरम मौसम में पौधे की हालत को देखते हुए पानी की मात्रा और आवृति तय करें.

ग्रेडिंग : गुणवत्ता का मानक :
एकेसिया मंगियम (Acacia Mangium) के पौधों की ग्रेडिंग से यह सुनिश्चित किया जाता है कि केवल उच्च गुणवत्ता वाले पौधों का रोपण किया जाए. एमएचएटी-16 (MHAT-16) प्रजाति के पौधों की जड़ प्रणाली मजबूत होती है और तने की मोटाई अच्छी होती है, जो प्लांटेशन  की सफलता को सुनिश्चित करता है.

मुख्य बिंदु :
– उच्च गुणवत्ता वाले पौधों का उपयोग प्लांटेशन की सफलता के लिए अनिवार्य है.
– ग्रेडेड पौधों के रोपण से पौधे खेतों में बहुत कम मरते हैं और दोबारा रोपण की आवश्यकता कम होती है.

संभावित आर्थिक लाभ : निवेश का सुनहरा अवसर

एकेसिया मंगियम (Acacia Mangium) एमएचएटी-16 (MHAT-16) से प्राप्त लकड़ी उच्च गुणवत्ता की होती है. कई मायनों में यह आजकल मिलने वाली टीक की लकड़ी से भी बेहतर होती है. लगभग 10 साल बाद प्रत्येक पेड़ से औसतन 30-40 घन फीट लकड़ी प्राप्त की जा सकती है. इस की वर्तमान बाजार दर 1000-1500 प्रति घन फीट है. यदि एक एकड़ में लगाए गए 800 पेड़ों में से 600 पेड़ भी सफलतापूर्वक विकसित होते हैं, तो 10 वर्षों के बाद होने वाली कुल आय करोड़ों रुपए में हो सकती है.

आयव्यय के वास्तविक आंकड़े और विश्लेषण:-
(स्रोत:मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म्स एवं रिसर्च सैंटर, कोंडागांव, छत्तीसगढ़)
एक एकड़ में औसतन लगेंगे कुल पौधे – 800
प्रति पौधा लागत रु.100-150 औसतन – 125
कुल प्रारंभिक खर्च – 1,16,000
रखरखाव लागत (प्रति वर्ष) प्रति एकड़ – 10,000
(नोट: क्षेत्रफल बढ़ने पर या राशि कम होती जाती है.)

कुल 10 वषों में कुल रखरखाव लागत 10000×10=₹1,00,000.

कुल खर्च (10 वर्षों) में 116000 + 100000 =₹2,16,000 (2 लाख, 16 हजार रुपए)

आमदनी :
औसतन लकड़ी उत्पादन प्रति पेड़ – 35 घन फीट
लकड़ी की संभावित औसतन न्यूनतम कीमत (टीक के औसतन मूल्य 5000 प्रति क्यूबिक फीट का केवल 25= 1250 प्रति घन फीट
लगाए गए 800 पेड़ों में से केवल 600 उत्पादक पेड़ों से कुल लकड़ी – 600 x35 = 21,000 घन फीट,
लकड़ी का मूल्य = 1250× 21000 रुपए घन फीट – 2,62,5000 (2 करोड़, 62 लाख, 50 हजार रुपए)
कुल आय (10 वर्षों में) – 2,62,50,000 रुपए
शुद्ध आय (10 वर्षों में) कुल आय 26250000- कुल खर्च 216000= 2,60,34,000 रुपए
प्रति वर्ष औसत आय – 26034000 ÷ 10 वर्ष = 26,03,400 (लगभग छ्ब्बीस लाख रुपए) सालाना

नोट : यह गणना प्राप्त होने वाली लकड़ी के संभावित न्यूनतम मूल्य 1250 रुपए के बीच फीट पर की गई है और एक एकड़ के 800 पेड़ों में से केवल 600 पेड़ों के औसत उत्पादन की गणना की गई है. पौधों की बेहतर देखभाल से उत्पादन में वृद्धि और लकड़ी का सही मूल्य मिलने पर एक एकड़ की आमदनी इस से दोगुनी अर्थात 5 करोड रुपए प्रति एकड़ तक भी हो सकती है.)

अतिरिक्त आय : आस्ट्रेलियन टीक (MHAT-16) के पेड़ों पर काली मिर्च एमडीबीपी-16 (MDBP-16) की बेल चढ़ा कर को 5 लाख से ले कर 15 लाख रुपया सालाना की अतिरिक्त आय प्राप्त की जा सकती है. आस्ट्रेलियन टीक और काली मिर्च के अलावा वृक्षारोपण के बीच खाली पड़ी 50 फीसदी भूमि पर अंतरवर्ती फसल के रूप में औषधि और सुगंधी पौधों की खेती से भी अतिरिक्त कमाई की जा सकती है.

आस्ट्रेलियन टीक (MHAT-16) प्रजाति तेजी से बढ़ने वाली, टिकाऊ और अत्यधिक लाभदायक प्रजाति है, जो न केवल उच्च गुणवत्ता की लकड़ी प्रदान करती है, सालभर में अपनी पत्तियों से लगभग 6 टन बेहतरीन हरी खाद भी देता है.

इस के अलावा यह अपनी तरह का एकलौता पौधा है, जो वायुमंडल की नाइट्रोजन को ले कर धरती में इतनी ज्यादा मात्रा में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करता है कि इसे जैविक नाइट्रोजन की फैक्टरी भी कहा जाता है. इस के रोपण से प्राप्त होने वाले आर्थिक लाभ और कम लागत ने आज इसे किसानों और निवेशकों के लिए एक आदर्श विकल्प बना दिया है.

आस्ट्रेलियन टीक (MHAT-16) प्रजाति की विशेषताएं इसे अन्य किस्मों से बेहतर बनाती है, जिस से यह निवेश का सुनहरा अवसर देती है.

मुख्य लाभ :
– तेजी से बढ़ने वाली प्रजाति (MHAT-16)
– उच्च गुणवत्ता वाली लकड़ी का उत्पादन
– नाइट्रोजन स्थिरीकरण से मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार
– अंतरवर्ती फसलों से अतिरिक्त आय
– साल में इस के पत्तों से लगभग 6 टन की बेहतरीन गुणवत्ता की हरी खाद का उत्पादन
– इस पेड़ पर काली मिर्च चढ़ाने पर इस से मिलने वाली नाइट्रोजन और पत्तों की हरी खाद के कारण काली मिर्च का उत्पादन कई गुना बढ़ गया है और इस से किसान की आमदनी में भी जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है.

सुझाव :

एकेसिया मंगियम (Acacia Mangium) एमएचएटी- 16 (MHAT-16) प्लांटेशन को आर्थिक समृद्धि और पर्यावरणीय संरक्षण के दृष्टिकोण से एक आदर्श योजना माना जा सकता है. इस का सही प्रबंधन और देखभाल आप के निवेश को बड़े पैमाने पर लाभदायक बना सकता है.
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आंकड़ों का स्रोत : ‘मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म्स एवं रिसर्च सैंटर, कोंडागांव, छत्तीसगढ़)

छोटी मंडियों ने दिलाई बागबानों को राहत

हिमाचल प्रदेश सेब उत्पादक राज्य के रूप में अपनी अलग पहचान रखता है. हिमाचल प्रदेश को फलों के कटोरे के रूप में भी जाना जाता है. इस पहाड़ी राज्य में सेब के अलावा आम, खुमानी, नाशपाती, स्ट्राबेरी व चेरी आदि फलों की भी काफी अधिक पैदावार की जाती है. लेकिन हिमाचल की खास पहचान सेब उत्पादक के रूप में ही की जाती है.

फलों की पैदावार के साथसाथ राज्य में बेमौसमी सब्जियां भी काफी उगाई जाती हैं. पहाड़ी राज्य होने की वजह से हिमाचल को बागबानी और बेमौसमी पैदावार के लिए सही पाया गया है.

सेब की पैदावार के लिए जहां सत्यानंद स्टोक्स को हमेशा याद किया जाता है, ठीक उसी तरह प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री यशवंत सिंह परमार को भी हिमाचल में सेब की व्यावसायिक खेती और बागबानों को प्रोत्साहित करने के लिए याद किया जाता है. पहले हिमाचल में परंपरागत तरीके से कृषि फसलों की पैदावार की जाती थी यानी किसान केवल गेहूं, मक्का, महुआ, जौ, मटर, गोभी, टमाटर व फ्रांसबीन वगैरह की पैदावार करते थे. लेकिन डा. परमार ने पहल की कि यदि इस प्रदेश के किसानों को सेब और अन्य फलों की पैदावार के लिए प्रोत्साहित किया जाए तो राज्य में खुशहाली लाई जा सकती है.

इसी बात को ध्यान में रख कर परमार ने जब शुरू में सेब के पेड़ लगाने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया तो उस समय लोगों ने उन की आलोचना की. किसान यहां तक कहने लगे थे कि पहले तो खेतों में थोड़ाबहुत अनाज और सब्जी पैदा हो जाती थी, लेकिन अब सेब के पेड़ लगाने से फसली नुकसान उठाना पड़ रहा है.

जैसेजैसे समय निकलता गया और पेड़ों पर सेब लगने शुरू हुए तो यह देख कर बागबानों ने चैन की सांस ली और धीरेधीरे खुशहाली की तरफ कदम बढ़ाने लगे. इस के बाद सेब की पैदावार में बड़ी क्रांति आई और देखादेखी प्रदेश के ऊंचाई वाले इलाकों में भी किसानों ने बागबानी को अपनाना शुरू कर दिया. इसी वजह से भारत में आज हिमाचल सेब राज्य के रूप में जाना जाता है.

प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने में सेब का मुख्य योगदान रहा है. सेब के कारोबार से लाखों लोगों को रोजगार मिला है. लोगों की आर्थिक हालत मजबूत करने में भी सेब की खास भूमिका रही है. सेब से प्रदेशवश क` की खुशहाली काफी बढ़ी है.

प्रदेश के बागबान पहले सेब की बिक्री के लिए बाहरी राज्यों की बड़ी मंडियों पर निर्भर रहते थे ताकि सेब खराब होने से पहले मंडियों में पहुंचाया जा सके. प्रदेश के बागबान पहले देश की सब से बड़ी मंडी आजादपुर, दिल्ली में काफी सेब भेजा करते थे. बागबानों की पसंदीदा मंडी आजादपुर ही हुआ करती थी, लेकिन आजादपुर मंडी में भी बिचौलए धीरेधीरे सेब बागबानों का आर्थिक शोषण करने लगे और बागबानों से सेब बेचने पर कमीशन वसूला जाने लगा. इस के चलते सरकार पर हिमाचल के भीतर छोटीछोटी मंडियां विकसित करने का दबाव डाला जाने लगा. नतीजतन सरकार ने उन जिलों में मंडियां तैयार करनी शुरू कर दीं, जहां फलों और सब्जियों की पैदावार ज्यादा होती थी.

आज प्रदेश के अंदर कई मध्यम और छोटी मंडियां हैं. इन मंडियों का इस्तेमाल किसान और बागबान खुल कर कर रहे हैं. आज किसान और बागबान अपनी फसलों को बेचने के लिए इन छोटी मंडियों को ज्यादा पसंद कर रहे हैं. छोटे और मध्यम दर्जे के किसान और बागबान तो अपने घरों के नजदीक की मंडियों में ही सेब और सब्जियां बेच रहे हैं.

बागबानों और किसानों का लंबे समय तक जो शोषण बड़ी मंडियों में हो रहा था, अब  उन्हें उस से नजात मिल गई है. अब बागबान और किसान खुल कर कहते हैं कि प्रदेश की मंडियों में फल और सब्जियां बेचने से उन को दूसरे राज्यों की सिरदर्दी से राहत मिली है. उन्हें प्रदेश की मंडियों में फलसब्जियां बेचने का काफी ज्यादा फायदा मिल रहा है. साथ ही वे अन्य खर्चों से भी बच गए हैं.

प्रदेश के तमाम हिस्सों में छोटीछोटी मंडियां खुलने से किसानों को घरों के पास ही सुविधा मिल गई है. बागबानों और किसानों को सब से बड़ा फायदा यह हुआ है कि अब उन के घरों के पास ही उन की फसलों के खरीदार पहुंच रहे हैं.

अमरूद (Guava) से बनाएं बहुत कुछ

अमरूद विटामिन सी, पैक्टिन और कैल्शियम, फास्फोरस और आयरन जैसे तत्त्वों से लबरेज होता है.

अमरूद विटामिन ए का एक बहुत अच्छा स्रोत है, इसलिए आंखों के लिए भी फायदेमंद है. यह शरीर को स्वस्थ रखने में भी सहायक है और रक्तचाप को भी कम करता है. साथ ही खून की तरलता को बनाए रखता है. यह विटामिन सी की कमी के कारण होने वाले रोग स्कर्वी के इलाज के लिए भी सब से अच्छा उपाय माना जाता है. अमरूद खनिज, लवण, विटामिन और आहार फाइबर का यह एक अच्छा स्रोत है, जो वजन घटाने के लिए भी अच्छा माना जाता है. इसलिए अमरूद खाने से हम कई तरह के रोगों से बचे रह सकते हैं.

अमरूद का फल विटामिन बी कांलैक्स जैसे पैंटोथैनिक एसिड, विटामिन बी सिक्स या पाइडौक सीन, विटामिन ई, नियासिन के साथसाथ मैग्नीशियम, कौपर और मैगनीज जैसे खनिजों का भी एक मध्यम स्रोत है.

अमरूद से निम्नलिखित खाद्य पदार्थ बनाए जा सकते हैं :

अमरूद की जैली

अमरूद की जैली बनाने के लिए निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है :

सामग्री   :               मात्रा

अमरूद   :               1 किलोग्राम

चीनी      :               750 गाम

साइट्रिक एसिड     :               4 ग्राम

जैली बनाने की विधि

* ताजे पके फल को ले कर पानी से साफ कर लें और गोलाई में पतलेपतले काट लें.

* कटे हुए अमरूद के टुकड़ों को एलुमीनियम के बरतन में डाल कर उस में इतना पानी डालें कि टुकड़े अच्छी तरह डूब जाएं.

* गैस पर रखें और इस में 2 ग्राम साइट्रिक एसिड मिला दें.

* अब टुकड़े मुलायम होने पर मलमल के कपड़े से छान कर किसी बरतन में रस निकाल लें.

* उस रस में चीनी मिला कर गरम करें और उबाल आने पर बाकी 2 ग्राम साइट्रिक एसिड मिला दें.

* अब इसे इतना पकाएं कि वह गाढ़ा हो जाए. और जांच करने के लिए तैयार पदार्थ को एक चम्मच में ले कर थोड़े ठंडे पानी से भरे कांच के गिलास में एकएक बूंद कर के गिराएं. यदि बूंद पानी में गिर कर जम जाए, तो समझें कि जैली तैयार है.

ठंडा हो जाने पर जैली को कांच के जार में भर कर ढक्कन लगा कर सूखी जगह पर रखें.

अमरूद की टौफी

अमरूद की टौफी बनाने के लिए निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है :

सामग्री   :               मात्रा

अमरूद का गूदा     :               1 किलोग्राम

चीनी      :               1 किलोग्राम

मक्खन या वनस्पति घी           :               100 ग्राम

साइट्रिक एसिड     :               5 ग्राम

नमक       :               5 ग्राम

खाने का औरेंज रंग           :               जरूरत के मुताबिक

टौफी बनाने की विधि

* अमरूद से गूदा निकाल कर उसे इतना पकाएं कि एकतिहाई मात्रा रह जाए.

* अब इस में चीनी, मक्खन या घी, नमक व साइट्रिक एसिड को अच्छी तरह से मिला कर इतना पकाएं कि यह बरतन के किनारे को छोड़ने लगे. इसी समय रंग को भी मिला दें.

* एक थाली या ट्रे में घी लगा कर गरम पदार्थ को जमा दीजिए. आधे इंच की मोटाई के बराबर जम जाएं.

* जब पदार्थ ठंडा हो जाए, तो टौफी के आकार के टुकड़े चाकू की मदद से काट लीजिए और बटर पेपर में लपेट कर किसी कांच के जार में रख लीजिए.

अमरूद से चीज

चीज बनाने में निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है :

सामग्री   :               मात्रा

अमरूद का गूदा     :               1 किलोग्राम

चीनी      :               1.25 किलोग्राम

साइट्रिक एसिड     :               5 ग्राम

मक्खन    :               1 किलोग्राम

नमक       :               स्वादानुसार

चीज बनाने की विधि

* पके हुए फल को पानी से अच्छी तरहसाफ कर के छोटेछोटे टुकड़ों में काट लें और इस में बराबर का पानी मिला कर गरम करें, जिस से कि टुकड़े बिलकुल गल जाएं.

* छलनी की सहायता से बीज को अलग कर लें.

* गूदे में चीनी और साइट्रिक एसिड को मिला कर अच्छी तरह पकाएं. इस के बाद मक्खन और नमक को इस में मिलाएं और उस के बाद उसे इतना पकाएं कि पदार्थ हलवा की तरह गाढ़ा हो जाए और बरतन का किनारा छोड़ने लगे.

* एक थाली या ट्रे में थोड़ा मक्खन लगा कर चीज को चम्मच की मदद से समान रूप से फैला दें और जमने के लिए 56 घंटे के लिए छोड़ दें.

* जब चीज जम जाए, तो चोकोर टुकड़ों में काट कर बटर पेपर में लपेट कर रख दें.

अमरूद का स्क्वैश

अमरूद का स्क्वैश बनाने के लिए निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है :

सामग्री : मात्रा

अमरूद का रस :1 लिटर

चीनी      : 1.5 किलोग्राम

पानी       : 500 मिलीलिटर

साइट्रिक एसिड : 3 ग्राम

सोडियम या पोटैशियम मेटाबाईसल्फाइट : 2 ग्राम

स्क्वैश बनाने की विधि

* अच्छी तरह से पके हुए फल को ले कर कद्दूकस कर लें और इस के बाद आधी मात्रा पानी मिला कर गरम करें और रस को मलमल के कपड़े से छान लें.

* चीनी, पानी और साइट्रिक एसिड को मिला कर इतना गरम करें कि चीनी अच्छी तरह घुल जाए. इस के बाद इसे मलमल के कपड़े से छान लें.

* अमरूद के रस में छने हुए चीनी के घोल को मिला दे. इसी में सोडियम मैटाबाईसल्फाइट को थोड़े से रस में घोल कर छान ले.

* इस घोल बोतलों में भर कर ढक्कन लगा कर बंद कर लें और इसे किसी ठंडे स्थान पर रखे.

अमरूद का नैक्टर

नैक्टर बनाने में निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है :

सामग्री   :               मात्रा

अमरूद का रस       :               1 लिटर

साइट्रिक एसिड     :               10 ग्राम

पानी       :               3 लिटर

नैक्टर बनाने की विधि

* खूब पके फल को ले कर स्क्वैश की तरह रस निकालें.

* चीनी, पानी और साइट्रिक एसिड को एकसाथ मिला कर गरम करें और चीनी घुल जाने पर मलमल के कपड़े से छान लें.

* अमरूद के रस में चीनी के घोल को अच्छी तरह से मिला दें.

* अब इसे कांच की बोतलों में भर कर ठंडे स्थान पर रखें.

अपनी अच्छी सेहत को  दें लिफ्ट वर्टिकल गार्डनिंग (Vertical Gardening) के साथ

कहते हैं कि स्वच्छ वातावरण, साफ हवा और खुश मन, ये तीनों ही जरूरी होते हैं एक स्वस्थ शरीर के लिए, लेकिन, आज बड़ेबड़े शहरों में छोटेछोटे फ्लैट्स में रहने का चलन तेजी से बढ़ता नजर आ रहा है. और शायद यही एक वजह है, जिस के चलते आज हम शुद्ध वातावरण और साफ हवा से कहीं दूर होते जा रहे हैं, जो सीधा हमारी सेहत पर असर डाल रहे हैं. ऐसे में वर्टिकल गार्डनिंग का चलन तेजी से देखा जा सकता है.

तो क्या है यह वर्टिकल गार्डनिंग का कौंसेप्ट, बता रहे हैं यहां :

क्या है वर्टिकल गार्डनिंग?

यह एक ऐसी व्यवस्था है, जिस के द्वारा आप फ्लैट्स के अंदर कम जगह में ही अपनी सेहत के लिए जरूरी पौधों और फूलों को दीवार या जमीन पर एक सपोर्ट देते हुए पंक्तिबद्ध तरीके से लगवा सकती हैं.

इन पौधों और फूलों की सहायता से आप अपने घर के अंदर और आसपास के वातावरण में मौजूद कार्बनडाईऔक्साइड जैसे हानिकारक तत्त्वों को दूर कर खुद और अपने परिवार के सदस्यों को स्वच्छ हवा देने के साथसाथ अपने इंटीरियर को भी दे सकती हैं एक नया और स्टाइलिश लुक.

कैसे काम करता है वर्टिकल गार्डनिंग का ढांचा?

आप के फ्लैट्स के अनुसार वर्टिकल गार्डन के लिए मैटल के स्टैंडनुमा ढांचे बाजार में अब हर साइज और शेप में उपलब्ध हैं. इन के अंदर छोटेछोटे गमलों को एक कतार में उन की साइज और शेप के अनुसार उचित दूरी पर स्टैपल कर के रखा जाता है.

इस के बाद पौधों में आवश्यक मिट्टी और खाद इत्यादि मिलाने के बाद उन्हें पानी देने के लिए इस पूरे स्ट्रक्चर में पाइप का एक पैटर्न बनाया जाता है. इस में एक ही साइज के कई छेद होते हैं, जिन के द्वारा सभी पौधों या फूलों को सही और उपयुक्त मात्रा में पानी दिया जाता है.

घर में रहेगा खुशी का माहौल

स्वस्थ रहने के लिए खुश रहना जरूरी होता है. कहा भी गया है कि हरियाली है जहां, खुशहाली है वहां. पेड़पौधों में से निकलने वाली औक्सीजन आप के मूड को अच्छा रखने में काफी कारगर होती है. इस के

चलते सभी प्रकार की चिंताओं और समस्याओं को भूल कर मन अपनेआप ही खुश हो उठता है.

तो, क्यों ना आप भी वर्टिकल गार्डन के द्वारा अपने परिवार के सदस्यों को दें एक स्ट्रैस फ्री और हैल्दी वातावरण.

बोल उठेंगी पुरानी दीवारें

इस के द्वारा आप अपने घर की दीवारों को भी दे सकते हैं एक नया और स्टाइलिश लुक. यों तो अमूमन लोग अपने घर की दीवारों पर नया पेंट करवाते हैं, लेकिन आप अपने घर की पुरानी दीवारों पर वर्टिकल गार्डनिंग के कौंसेप्ट से नई जान डाल सकते हैं.

इस के लिए आप फर्न्स और मौस के पौधों को एक वुडन फ्रेम में लगा सकते हैं. इसे थोड़ा सा स्टाइलिश बनाने के लिए वुडन फ्रेम को डायनिंग या लिविंग रूम की दीवार पर एक पेंटिंग की तरह टांग सकते हैं. इस से आप की पुरानी दीवारों को एक नया और क्रिएटिव लुक मिल जाएगा.

पौधों के चयन का रखें खास खयाल

एक सही और अच्छे वर्टिकल गार्डन के लिए जगह के अनुसार पौधों का चयन बहुत महत्त्वपूर्ण होता है. इन पौधों के चयन में उस जगह के लोकल क्लाइमेट जैसे- न्यूनतम तापमान, सूरज की किरणों की दिशा और अवधि, हवा की रफ्तार और रुख इत्यादि एक अहम भूमिका निभाते हैं.

अपने वर्टिकल गार्डन के लिए पौधों का चयन करते समय निम्न बिंदुओं का खास खयाल रखें :

* एक परफैक्ट वर्टिकल गार्डन के लिए ज्यादातर लताओं वाले, ऊपर की ओर बढ़ने वाले और गूदेदार पौधों का ही चयन किया जाता है.

* चयनित पौधे सूखे, छाया और धूप तीनों ही अवस्था में खिलने वाले हों.

* अच्छी बढ़वार वाले पौधे या फूलों का चयन करें.

* पौधे कम लंबाई वाले हों.

कितनी डैंसिटी होनी चाहिए पौधों की?

ध्यान रखें कि पौधों की डैंसिटी 30 पौधे प्रति स्क्वायर मीटर होनी चाहिए. साथ ही, आप के इस वर्टिकल गार्डन के पौधों और फ्रेम इत्यादि को मिला कर कुल वजन 30 किलोग्राम/मीटर2 होना चाहिए.

घर के अंदर लगाए जाने वाले पौधे

अगर आप अपने घर के अंदर डायनिंग रूम या लिविंग रूम की दीवारों पर वर्टिकल गार्डन बनवाना चाहते हैं, तो आप फिलोडेन्ड्रान और एपीप्रेम्नम या गेस्नेरियाड्स के पौधे जैसे : एकाइनेन्थस, कालमिया और सेंटपौलिया के पौधों के अलावा पेपेरोमिया और बेगानिया या नेफ्रोलेपिस और टेरिस जैसे विभिन्न प्रकार के फर्न्स भी इस्तेमाल कर सकते हैं.

साथ ही, क्लोरोफाइटम के पौधे घर के वातावरण में मौजूद नुकसानदेह कार्बनमोनोऔक्साइड, फार्माल्डीहाइड और जाइलिन जैसे हानिकारक प्रदूषित तत्त्वों को दूर कर के स्वच्छ हवा के साथसाथ सेहत के लिए जरूरी पोषक तत्त्व भी मुहैया कराते हैं.

लाइट और पानी का रखें खास खयाल

वर्टिकल गार्डन में लगने वाले पौधों और फूलों की अच्छी सेहत के लिए सही मात्रा में सूरज की किरणें और पानी आवश्यक होते हैं, इसीलिए यह सुनिश्चित करें कि उन्हें ऐसी जगह पर लगाएं, जहां सूरज की किरणें सही तरीके से आती हों. साथ ही, एक ही प्रकार के पौधों को एक ही स्थान पर लगाएं, ताकि उन्हें उपयुक्त मात्रा में पानी एकसाथ मिल जाए.

आटोमैटिक सिंचाई का विकल्प है बैस्ट

अपने वर्टिकल गार्डन में लगे पौधों को पानी देने के लिए हार्डवर्क न कर स्मार्टवर्क कर के लगा सकती हैं थोड़ा युनीक स्टाइल का तड़का. जहां एक ओर पौधों को पानी देने के लिए और लोग हाथ से चलाने वाले स्प्रेयर का इस्तेमाल करते हैं, वहीं आप आटोमैटिक आपरेटेड वर्टिकल गार्डनिंग का ढांचा लगवा सकती हैं.

आटोमैटिक ढांचे के अंदर पाइप के एक पैटर्न को पानी की टंकी के साथ जोड़ कर पूरे ढांचे में लगे पौधों और फूलों को एकसाथ बराबर और पर्याप्त मात्रा में पानी पहुंचाने की व्यवस्था की जाती है और वह भी कुछ ही मिनटों में.

इस तरह की व्यवस्था से आप पौधों और फूलों को कम समय में पानी देने के साथसाथ उन की अच्छी सेहत और लंबी आयु सुनिश्चित कर सकते हैं.

दे सकती हैं अपनी कलात्मक सोच को उड़ान

किसी भी वर्टिकल गार्डन के लिए यह जरूरी नहीं है कि आप पौधे या फूल सिर्फ गमलों में ही लगाएं. इस के लिए आप अपने घर में बेकार पड़े हुए पुराने प्लास्टिक के डब्बे, कौफी मग, जार, बोतल इत्यादि में भी पौधों और फूलों को लगा कर एक नया स्टाइलिश लुक दे सकते हैं.

पौधों की सेहत के लिए कुछ जरूरी बातें

* इंडोर प्लांट्स को ज्यादा एयरकंडीशनर वाले कमरे में रखने से बचाएं. ऐसे कमरों में पौधों को ज्यादा लंबे समय तक रखने से उन की नमी सूख जाती है. इस वजह से पौधों को सही तरह से बढ़ने में परेशानी होती है.

* खाद और सही मात्रा में कीटनाशक का इस्तेमाल जरूरी है. इस से पौधों में लगने वाले विभिन्न प्रकार के कीट और कीटाणुओं को नियंत्रण करने में मदद मिलेगी.

* पौधों की अच्छी सेहत के लिए गमलों में मिट्टी, कोकोपीट इत्यादि जैसी जरूरी चीजें डालें. इस से पौधों को उन की अच्छी सेहत के लिए आवश्यक पोषक तत्त्व मिल सकेंगे.

* नियमित रूप से पौधों की लंबाई को नियंत्रित करें. ऐसा करने से पौधों की लंबी उम्र को सुनिश्चित किया जा सकता है.

* पौधों और फूलों की किस्म के अनुसार उचित मिट्टी का चयन जरूरी है .

ड्रैगन फ्रूट (Dragon Fruit) की खेती से लाखों का मुनाफा

जलवायु में पिछले 2-3 दशक में काफी बदलाव आया है. इस से वर्षा की अनियमितता और फसल खराब होने की संभावना भी काफी बढ़ गई है. इन सभी समस्याओं को देखते हुए कई किसानों ने ड्रैगन फ्रूट की खेती की ओर रुख किया है, क्योंकि इस फल की खास बात यह है कि इस का उत्पादन सूखा, बाढ़ या किसी अन्य मौसम संबंधी आपदाओं से प्रभावित नहीं होता है. यह लगभग कैक्टस पौधे की तरह है. इसे बहुत कम देखभाल की जरूरत होती है.

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में सब से ज्यादा ड्रैगन फ्रूट की खेती की जा रही है. यहां तकरीबन 85 एकड़ भूमि में ड्रैगन फ्रूट की खेती हो रही है. 15 किसान बड़े स्तर पर ड्रैगन फ्रूट की पैदावार कर रहे हैं, जहां 100 से अधिक किसान खेती करते हैं.

जिले के प्रगतिशील किसान परंपरागत खेती से हट कर पूरी तरीके से आधुनिक और नई खेती पर जोर दे रहे हैं. मिर्जापुर जिले के मडि़हान के राजगढ़ सहित अन्य क्षेत्रों में ड्रैगन फ्रूट की खेती की जा रही है. ड्रैगन फ्रूट की खेती कर के किसान अब लाखों रुपए का मुनाफा कमा रहे हैं.

मिर्जापुर के किसान प्रभाकर सिंह ने बताया कि जिले में पानी की बेहद कमी के चलते परंपरागत खेती धान व गेहूं की करना लाभहीन सिद्ध हो रहा है, जिस के कारण हमें नई खेती की ओर रुख करना पड़ रहा है. ड्रैगन फ्रूट की खेती हम लोगों के लिए काफी लाभदायक सिद्ध हो रही है, इसलिए हम ने साल 2017 में एक हेक्टेयर जमीन में ड्रैगन फ्रूट की खेती करने के बारे में सोचा. शुरुआत में इस में लगभग 6 लाख रुपए की लागत आई और 2 साल में इस में फल आने लगे. अब ड्रैगन फ्रूट से 300-400 रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से दाम मिल जाता है.

ड्रैगन फ्रूट (Dragon Fruit)

मुख्य प्रकार

बाहरी रंग और गूदे के आधार पर यह फल मुख्य रूप से 3 प्रकार का होता है :

सफेद गूदा वाला, लाल रंग का फल.

लाल गूदा वाला, लाल रंग का फल.

सफेद गूदा वाला, पीले रंग का फल.

जलवायु

ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए उष्ण जलवायु, जिस में निम्नतम वार्षिक वर्षा 50 सैंटीमीटर और तापमान 20 से 36 डिगरी सैल्सियस हो, सर्वोत्तम मानी जाती है. पौधों के बढि़या विकास और फल उत्पादन के लिए इन्हें अच्छी रोशनी व धूप वाले क्षेत्र में लगाना चाहिए.

लगाने की विधि

ड्रैगन फ्रूट का प्रवर्धन कटिंग द्वारा होता है, लेकिन इसे बीज से भी लगाया जा सकता है. बीज से लगाने पर यह फल देने में ज्यादा समय लेता है, जो किसान के नजरिए से सही नहीं है, इसलिए बीज वाली विधि व्यावसायिक खेती के लिए उपयुक्त नहीं है.

कटिंग से इस का प्रवर्धन करने के लिए कटिंग की लंबाई 20 सैंटीमीटर रखते हैं. इस को खेत में लगाने से पहले गमलों में लगाया जाता है. इस के लिए गमलों में सूखा गोबर, बलुई मिट्टी और रेत को आधा व एक के अनुपात में भर कर छाया में रख दिया जाता है.

खाद एवं उर्वरक

अधिक उत्पादन लेने के लिए प्रत्येक पौधे को अच्छी सड़ी हुई 10 से 15 किलोग्राम गोबर या कंपोस्ट खाद देनी चाहिए. इस के अलावा लगभग 250 ग्राम नीम की खली, 30-40 ग्राम फोरेट एवं 5-7 ग्राम बाविस्टिन प्रत्येक गड्ढे में अच्छी तरह मिला देने से पौधों में मृदाजनित रोग एवं कीट नहीं लगते हैं.

50 ग्राम यूरिया, 50 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट और 100 ग्राम म्यूरेट औफ पोटाश का मिश्रण बना कर पौधों को फूल आने से पहले अप्रैल माह में फल विकास अवस्था और जुलाईअगस्त और फल तुड़ाई के बाद दिसबंर में देना चाहिए.

तुड़ाई

प्राय: ड्रैगन फ्रूट पहले साल में फल देना शुरू कर देता है. आमतौर पर मई और जून माह में फूल लगते हैं और जुलाई से दिसंबर माह तक फल लगते हैं. पुष्पन के एक महीने बाद फल तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इस अवधि के दौरान इस की 6 तुड़ाई की जा सकती है.

ड्रैगन फ्रूट के कच्चे फल हरे रंग के होते हैं, जो पकने पर लाल रंग में बदल जाते हैं. फलों की तुड़ाई का सही समय रंग परिवर्तित होने के 3-4 दिनों बाद का होता है. फलों की तुड़ाई दरांती या हाथ से की जाती है.

ड्रैगन फ्रूट (Dragon Fruit)स्वास्थ्य लाभ

इस फल के बारे में एक रोचक तथ्य यह है कि चीनी लोगों का मानना है कि इस की उत्पत्ति एक युद्ध के दौरान ड्रैगन के आग उगलने से हुई थी. इस से जुड़े मिथकों को तोड़ते हुए इस फल में कुछ ऐसी चीजें हैं, जो हमारी सेहत के लिए काफी सेहतमंद होती हैं.

हैल्दी पोषक तत्त्व मात्रा (227 ग्राम ड्रैगन फ्रूट के अनुसार)

प्रोटीन –  3 ग्राम

वसा (फैट) –  शून्य

कैलोरी – 136

आयरन  –  8 फीसदी

फाइबर  – 7 ग्राम

विटामिन सी  –  9 फीसदी

विटामिन ई   –  4 फीसदी

मैग्नीशियम  – 18 फीसदी

कैल्शियम  – 107

कैंसर के खतरे को करे कम

इस फल में एंटीकैंसर के गुण होते हैं, जिस से कोलन कैंसर होने का खतरा कम होता है. विटामिन सी से भरपूर होने की वजह से यह प्रतिरक्षा प्रणाली यानी इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है. विटामिन सी एक शक्तिशाली एंटीऔक्सीडेंट है, जो मधुमेह, अल्जाइमर, पार्किंसंस, कैंसर आदि जैसी पुरानी बीमारियों से बचाता है.

त्वचा को रखे स्वस्थ

चेहरे पर तेजी से बुढ़ापा दिखने का कारण तनाव, प्रदूषण और अन्य कारक जैसे असंतुलित भोजन आदि हो सकते हैं. हालांकि यह फल एंटीऔक्सीडेंट से भरपूर होता है, जो सनबर्न, शुष्क त्वचा और मुंहासों के इलाज में सहायक होता है. इस में मौजूद विटामिन सी त्वचा में चमक ला सकता है.

दिल के लिए अच्छा

लाल रंग के गूदे वाले ड्रैगन फ्रूट में बेटालेन (जो फल के अंदर लाल रंग बनाता है) होता है, जो खराब कोलैस्ट्रौल (एलडीएल कोलैस्ट्रौल) को कम करता है. फल के अंदर छोटे गहरे काले बीज ओमेगा-3 और ओमेगा-9 फैटी एसिड से भरपूर होते हैं, जो दिल के लिए अच्छे होते हैं और दिल की बीमारियों के खतरे को काफी हद तक कम करते हैं.

कृषि शिक्षा पर केंद्र सरकार का फोकस : शिवराज सिंह चौहान, कृषि मंत्री

 नई दिल्ली :  14 अगस्त, 2024. केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कृषि और संबद्ध विज्ञान में उच्च शिक्षा के लिए आसियानभारत फैलोशिप लांच की. आईसीएआर कन्वेंशन सैंटर, राष्ट्रीय कृषि विज्ञान केंद्र परिसर, पूसा, नई दिल्ली में आयोजित इस कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर और भागीरथ चौधरी भी उपस्थित थे.

यहां केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आसियान देशों का जिक्र करते हुए कहा कि हम सब एक हैं और एकदूसरे के बिना हमारा काम नहीं चल सकता. कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. आज भी हमारी एक बड़ी आबादी खेती से ही रोजगार प्राप्त करती है. आज कृषि के सामने जलवायु परिवर्तन सहित कई चुनौतियां हैं. भारत ने सदैव कृषि को प्रधानता दी है.

उन्होंने आगे कहा कि समस्याओं के समाधान में कृषि शिक्षा की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है. सरकार ने पिछले समय में कृषि शिक्षा पर बहुत ध्यान दिया है, फोकस किया है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद इस काम में गंभीरता से लगी हुई है. देश में 66 राज्य कृषि विश्वविद्यालय, 4 डीम्ड विश्वविद्यालय, 3 केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय और कृषि संकाय वाले 4 केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं, जिन की देखरेख आईसीएआर द्वारा की जाती है.

उन्होंने कहा कि ये संस्थान स्नातक से ले कर डाक्टरेट तक कई तरह के पाठ्यक्रम प्रदान करते हैं, जिन में कृषि, बागबानी, पशुपालन, मत्स्यपालन, पशु चिकित्सा, कृषि इंजीनियरिंग आदि शामिल हैं. वे कृषि विज्ञान में महत्वपूर्ण शोध भी करते हैं और किसानों व हितधारकों को सेवाएं प्रदान करते हैं. उच्च कृषि शिक्षा के लिए छात्रों को आकर्षित करने व कृषि और संबद्ध विज्ञान विषयों में शिक्षण और अनुसंधान में शैक्षिक उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए, आईसीएआर यूजी, पीजी और पीएचडी के छात्रों को परिषद द्वारा विकसित निर्धारित मानदंडों के आधार पर विभिन्न छात्रवृत्ति प्रदान कर के सहायता करता है.

ये छात्रवृत्ति आईसीएआर कोटा सीटों, आईसीएआर प्रवेश परीक्षा द्वारा कृषि विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेने वाले छात्रों को प्रदान की जाती हैं. आईसीएआर एयू प्रणाली की क्षमता और योग्यता को अब दुनियाभर में मान्यता मिल चुकी है. कई विकासशील देशों के छात्र भारतीय कृषि विश्वविद्यालयों में विकसित अनुसंधान और शिक्षण सुविधाओं से आकर्षित हो कर लाभान्वित हो रहे हैं.

उन्होंने बताया कि भारत सहित विकासशील देशों में निजी क्षेत्र में अधिक नौकरियां पैदा हो रही हैं, इसलिए विकासशील देशों के छात्रों में भारतीय कृषि को समझने के लिए भारत आ कर अध्ययन करने की रुचि बढ़ रही है. भारत में उन के उच्च अध्ययन का समर्थन करने के लिए, आईसीएआर द्वारा नेताजी सुभाष फैलोशिप, भारतअफ्रीका फैलोशिप, भारतअफगानिस्तान फैलोशिप, बिम्सटेक फैलोशिप जैसे कई कार्यक्रम/फैलोशिप शुरू किए गए हैं.

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि आसियानभारत की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ और उस के बाद इस पर निर्मित ‘इंडोपैसिफिक विजन’ की आधारशिला है. भारत आसियान एकता, आसियान केंद्रीयता, इंडोपैसिफिक पर आसियान के दृष्टिकोण का समर्थन करता है. हमारे लिए आसियान के साथ राजनीतिक, आर्थिक, सुरक्षा सहयोग सर्वोच्च प्राथमिकता है. भारत आसियान और पूर्वी एशिया शिखर मंचों को जो प्राथमिकता देता है, वह पिछले साल हमारे जी-20 शिखर सम्मेलन की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री मोदी की जकार्ता यात्रा से साफ है. उन्होंने 12 सूत्रीय योजना की घोषणा की थी, जिस पर काफी हद तक अमल किया गया है.

मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि भारत और आसियान के सदस्य देशों के बीच कृषि सहयोग की अपार संभावनाएं हैं, क्योंकि आसियान व भारत कृषि जलवायु क्षेत्रों के मामले में बहुत समानताएं साझा करते हैं. अब कृषि और वानिकी में आसियानभारत सहयोग के लिए कृषि व संबद्ध विज्ञान में उच्च शिक्षा के लिए आसियानभारत फैलोशिप आरंभ की जा रही है. फैलोशिप विशेष रूप से कृषि और संबद्ध विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में शक्तियों की पूर्ति और क्षमता का दोहन करने के लिए साझा हितों के नए और उभरते क्षेत्रों में स्नातकोत्तर कार्यक्रम के लिए है. इस से आसियान सदस्य देशों के छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शोध आधारित शिक्षा प्राप्त करने में मदद मिलेगी, जिस से भारत और आसियान समुदाय एकदूसरे के करीब आएंगे व आसियान देशों से आने वाले छात्रों के बीच जानकारी के अंतर-सांस्कृतिक और अंतर्राष्ट्रीय आदानप्रदान के लिए मंच प्रदान होगा.

फैलोशिप से आसियान राष्ट्रीयता के छात्रों को आईसीएआर व कृषि विश्वविद्यालय प्रणालियों के तहत सर्वश्रेष्ठ भारतीय कृषि विश्वविद्यालयों में, जरूरत अनुसार, पहचाने गए प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में कृषि व संबद्ध विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के लिए सहायता प्रदान की जाएगी.

इस के अलावा भाग लेने वाले संस्थानों के भारतीय संकाय सदस्यों की आसियान सदस्य देशों में परिचयात्मक यात्राओं के माध्यम से आसियान क्षमता निर्माण में सहायता प्रदान की जाएगी. इस से कृषि और संबद्ध विज्ञान क्षेत्र के विकास के लिए आसियान में विशेषज्ञ मानव संसाधन के एक पूल के निर्माण को बढ़ावा मिलेगा.
उन्होंने आगे कहा कि भारतीय कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा पेश किए जाने वाले मास्टर्स प्रोग्राम छात्रों को अत्याधुनिक शोध से परिचित कराएंगे, उन्हें भविष्य के नवाचारों के लिए तैयार करेंगे. साथ ही, देश में दीर्घकालिक डिगरी कोर्स शोधकर्ताओं को लंबे समय तक जुड़े रहने में मदद कर सकता है और आसियान व भारत को कृषि से संबंधित मुद्दों को बेहतर तरीके से समझने में मदद कर सकता है. शैक्षणिक वर्ष 2024-25 से कृषि और संबद्ध विज्ञान में मास्टर डिगरी के लिए आसियान सदस्य देशों के छात्रों को 50 फैलोशिप (प्रति वर्ष 10) प्रदान की जाएंगी. परियोजना 5 साल के लिए आसियानभारत कोष के तहत वित्त पोषण के लिए मंजूर की गई है, जिस में फैलोशिप, प्रवेश शुल्क, रहने का खर्च व आकस्मिकता शामिल है.

करें तरबूज (watermelon) की उन्नत खेती

तरबूज गरमियों के मौसम का एक ऐसा फल है जिसे हर कोई खाना पसंद करता है. तरबूज की खेती के लिए किसी खास जमीन की जरूरत नहीं होती, लेकिन नदियों के कछार में इस की खेती करने से काफी फायदा होता है.

आमतौर पर यह देखा गया है कि भारतीय किसान साल में 2 ही फसल उगाते हैं. बहुत कम किसान ही ऐसे होते हैं जो जायद की फसल करते हैं. अगर किसान अपनी आमदनी में इजाफा करना चाहते हैं तो उन के लिए जायद मौसम में तरबूज की खेती अच्छे मुनाफे का जरीया बन सकती है.

तरबूज की खेती कई तरह की मिट्टी में की जाती है, लेकिन बलुई दोमट मिट्टी इस की खेती के लिए सही रहती है. खेत तैयार करने के लिए पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें और बाद की जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करें. खेत को समतल कर लें तो पूरे खेत में पानी की खपत एकसमान रहेगी.

अगर खेत नदी के किनारे है तो नालियों और थालों को पानी की मौजूदगी के हिसाब से बनवाएं. इन नालियों और थालों में सड़ी गोबर की खाद और मिट्टी के मिश्रण से भर देते हैं. गरम और औसत नमी वाले इलाके इस की खेती के लिए सब से अच्छे रहते हैं. बीजों के जमाव व पौधे की बढ़वार के लिए 25-32 सैंटीग्रेड तापमान अच्छा होता है.

भूमि और जलवायु

तरबूज की खेती कई तरह की मिट्टी में की जाती है, लेकिन बलुई दोमट मिट्टी बेहतर रहती है. खेत तैयार करने के लिए पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें और बाद की जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करते हैं.

खेत को समतल कर लें तो पूरे खेत में पानी की पहुंच एकसमान रहती है, इस से यह फायदा होता है कि पानी कुछ ही जगह इकट्ठा नहीं होता. अगर खेत नदियों के किनारे है तो नालियों और थालों को पानी की मौजूदगी के हिसाब से बनवाएं. इन नालियों और थालों में सड़ी हुई गोबर की खाद और मिट्टी के मिश्रण से भर देते हैं. गरम और नमी वाले इलाके इस की खेती के लिए सब से अच्छे रहते हैं. बीज के जमाव व पौधों की बढ़वार के लिए 25-32 सैंटीग्रेड तापमान सही होता है.

आज के समय में तरबूज बाजार में तरहतरह के आ रहे हैं. पहले ज्यादा किस्में नहीं थीं, लेकिन अब नईनई किस्मों के बीज बाजार में आसानी से मिल रहे हैं. नई किस्म के बीज से एक तरफ जहां उत्पादन बढ़ा है, वहीं तरबूज में मिठास भी बढ़ी है.

कुछ उन्नत किस्मों के बीजों को उपजा कर आप भी अपने उत्पादन में इजाफा कर फायदा पा सकते हैं.

शुगर बेबी : इस की बेलें औसत लंबाई की होती हैं और फलों का वजन 2 किलोग्राम से 5 किलोग्राम तक होता है. फल का ऊपरी छिलका गहरे हरे रंग का और उन पर धूमिल सी धारियां होती हैं.

फल का आकार गोल और गूदे का रंग गहरा लाल होता है. यह जल्दी पकने वाली प्रजाति है. औसत पैदावार 200-300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. यह किस्म 85 दिन में पक कर तैयार हो जाती है.

दुर्गापुर केसर : यह देर से पकने वाली किस्म है. तना 3 मीटर लंबा, वजन 6 से 8 किलोग्राम, गूदे का रंग पीला, छिलका हरे रंग का और धारीदार होता है. इस की औसत उपज 350-450 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है.

अर्का मानिक : इस किस्म के फल गोल, अंडाकार व छिलका हरा, जिस पर गहरी हरी धारियां होती हैं और गुलाबी रंग का होता है. फल का वजन 6 किलोग्राम है. इस की भंडारण और परिवहन कूवत अच्छी है. औसत उपज 500 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है और यह 110-115 दिन में पक कर तैयार होता है.

दुर्गापुर मीठा : इस किस्म का फल गोल, हलका हरा होता है. फल का वजन तकरीबन 8-9 किलोग्राम और इस की औसत उपज 400-500 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है. यह किस्म 125 दिन में तैयार हो जाती है.

खाद और उर्वरक

कंपोस्ट या सड़ी हुई गोबर की खाद 2 किलोग्राम प्रत्येक नाली या थाले में डालते हैं. इस के अलावा 50 किलोग्राम यूरिया, 47 किलोग्राम डीएपी और 67 किलोग्राम म्यूरेट औफ पोटाश प्रति एकड़ की दर से देनी चाहिए. नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा खेत में नालियां या थाले बनाते समय देते हैं. नाइट्रोजन की आधी बची मात्रा को 2 बराबर भागों में बांट कर खड़ी फसल में जड़ों से 30-40 सैंटीमीटर की दूरी पर गुड़ाई करते समय या फिर 45 दिन बाद देनी चाहिए.

बोआई का समय

किसी भी फसल की अच्छी पैदावार के लिए समय पर बोआई करना बहुत जरूरी है. अकसर किसान समय को ले कर लेटलतीफी कर देते हैं, जिस से आगे चल कर फसल की पैदावार पर बुरा असर पड़ता है.

उत्तरी भारत के मैदानी इलाकों में तरबूज की बोआई फरवरी से अप्रैल माह के बीच की जानी चाहिए और नदियों के किनारे इस की बोआई नवंबर से जनवरी के बीच की जाती है.

बीज और बोआई

तरबूज की खेती के लिए बीजों की जरूरत एक हेक्टेयर खेत के लिए 25.4 किलोग्राम पड़ती है. तरबूज की बोआई के लिए 2.5 से 3.0 मीटर की दूरी पर 40 से 50 सैंटीमीटर चौड़ी नाली या थाले बना लेते हैं. इन नालियों के दोनों किनारों पर 60 सैंटीमीटर की दूरी पर बीज बोते हैं.

नदियों के किनारे 60×60×60 सैंटीमीटर क्षेत्रफल वाला गड्ढा बना कर उस में 1:1:1 के अनुपात में मिट्टी, गोबर की सड़ी खाद और बालू के मिश्रण से थाले को भर देते हैं. उस के बाद प्रत्येक थाले में 3 से 4 बीज डालते हैं.

सिंचाई

तरबूज की खेती में सिंचाई की जरूरत कम या ज्यादा होती है. अगर तरबूज की खेती नदियों के कछारों में की जाती है तो सिंचाई की कम जरूरत होती है या कम मात्रा में पानी की जरूरत होती है, क्योंकि नदी के कछारों में पहले से ही नमी रहती है, लेकिन जब मैदानी इलाकों में इस की खेती की जाती है तो सिंचाई 7 से 10 दिनों के बीच करनी पड़ती है.

तरबूज की फसल में सिंचाई तभी बंद करनी चाहिए जब तरबूज आकार में पूरी तरह से बढ़ जाते हैं. इस से किसानों को यह फायदा होगा कि उन के फल में मिठास बनी रहती है और फल भी नहीं फटते हैं.

खरपतवार और निराईगुड़ाई

खरपतवार किसी भी फसल के लिए नुकसानदायक होते हैं. अगर समय पर खरपतवारों से फसल को बचा न लिया गया तो वे पूरी फसल को अपनी चपेट में ले कर पैदावार कम कर देते हैं. इस के लिए तरबूज के जमाव से ले कर पहले 30-35 दिनों तक निराईगुड़ाई कर के खरपतवार को निकाल देते हैं. इस से फसल की बढ़वार अच्छी होती है.

खरपतवारनाशी के रूप में बूटाक्लोर 1.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बीज बोआई के तुरंत बाद छिड़काव करते हैं. इस घोल के छिड़काव से खरपतवार का सफाया हो जाता है.

तरबूज (watermelon)

फलों की तुड़ाई

आमतौर पर सभी किस्म के तरबूज 3 से साढ़े 3 महीने में पकने लगते हैं. तरबूज तोड़ते समय किसानों को इस बात का खयाल रखना चाहिए कि अगर नजदीक के बाजार में तरबूज भेजना हो तब देर से तोड़ना चाहिए. अगर तरबूज को दूर के बाजारों में भेजना है तो उन्हें थोड़ा जल्दी तोड़ना चाहिए. इस से यह फायदा होगा कि फल ले जाने में खराब नहीं होंगे.

फलों की तुड़ाई यह देख कर करनी चाहिए कि फल पका भी है या नहीं. इस के लिए देख कर पता लगा सकते हैं या फिर उन्हें हाथों से दबा कर भी पता लगाया जा सकता है.

तरबूज को तेज धार चाकू से डंठल की जगह से काटना चाहिए वरना लताओं के टूटने का डर रहता है.

भंडारण

तरबूज के फल को 2 से 3 हफ्तों तक आसानी से महफूज रखा जा सकता है. इस के भंडारण के लिए 2 से 5 डिगरी सैंटीग्रेड का तापमान सही रहता है. ज्यादा गरमी में इस के भंडारण में दिक्कत आती है, क्योंकि यह जल्दी खराब होने वाला फल होता है, इसलिए ज्यादा दिनों तक इसे महफूज नहीं रखा जा सकता.

गेंदा की खेती (Marigold Cultivation) से महकता किसान

हमारे देश में किसान पुराने समय से फूलों की खेती तो करते आ रहे हैं लेकिन पिछले कुछ सालों से फूलों की खेती को काफी बढ़ावा मिला है और बहुत से किसान फूलों की खेती कर अपना जीवन महका रहे हैं.

फूलों की खेती से किसान के अलावा अनेक लोगों को भी रोजगार मिल रहा है. आज घरों की सजावट से ले कर तीजत्योहारों व शादीविवाह के मौके पर गेंदा के फूलों का बहुत इस्तेमाल होता है. इस के चलते सालोंसाल फूलों का कारोबार बढ़ रहा है. गेंदा की खेती को ले कर किसान खासा जागरूक हैं क्योंकि यह कम समय में तैयार होने वाली और अधिक पैदावार देने वाली फसल है.

गेंदा की कुछ प्रजातियों को जैसे हजारा और पावर से सालोंसाल पैदावार ली जा सकती है. मैदानी इलाकों में गेंदा की 3 फसलें ली जाती हैं और अगस्त से अक्तूबर माह तक तो गेंदा के फूलों की मांग काफी बढ़ जाती है.

उन्नतशील प्रजातियां : गेंदा की 2 तरह की प्रजातियां खास होती हैं. पहली अफ्रीकन गेंदा और दूसरी फ्रांसीसी गेंदा.

अफ्रीकन गेंदा : आमतौर पर अफ्रीकन गेंदा की पौध काफी लंबी तकरीबन 80-100 सैंटीमीटर होती है. इन की पत्तियां चौड़ी और फूल पीले, नारंगी और सफेद रंग वाले और गोलाकार लिए होते हैं. अफ्रीकन गेंदा 2 प्रकार का होता है. पहला, कारनेशन के समान फूल वाला और दूसरा, गुलदाउदी के समान फूल वाला. खासतौर पर कारनेशन के समान फूल वाले नारंगी रंग की किस्में व्यापारिक नजरिए से बहुत ही खास हैं.

मुख्य किस्में

गेंदा की खेती (Marigold Cultivation)

पूसा नारंगी गेंदा : यह बीज बोने से फूल आने तक 125-135 दिन लेती है. इस के पौधे तकरीबन 60 सैंटीमीटर ऊंचे और स्वस्थ होते हैं. इस के फूल नारंगी रंग के होते हैं. यह माला बनाने में काफी इस्तेमाल होता है. अनेक जलसोंकार्यक्रमों में इस वैरायटी का फूल काफी इस्तेमाल किया जाता है.

पूसा बसंती गेंदा : यह बीज बोने से फूल आने तक 135-145 दिन लेती है. पौधे ऊंचे और स्वस्थ होते हैं. फूल गंधक समान पीले रंग के अनेक पंखुडि़यां जो 6 से 9 सैंटीमीटर व्यास वाली होती हैं. एक पौधे पर तकरीबन 60 फूल आते हैं. फूल आने का समय 40 से 45 दिन है. यह किस्म घरों और उद्यानों में गमलों और क्यारियों में उगाने के लिए काफी अच्छी है.

इस के अलावा पिस्ता, सुप्रीम, जीनिया गोल्ड, क्राउन औफ गोल्ड, मैलिंग स्माइल, नारंगी जाइंट डबल पीला, यैलो स्पेन, फर्स्ट लेडी आदि खास किस्में हैं.

फ्रांसीसी गेंदा : इस के पौधे 20-60 सैंटीमीट की ऊंचाई तक बढ़ते हैं. इन्हें आम भाषा में जाफरी भी कहते हैं. इस के फूलों का आकार 3-5 सैंटीमीटर होता है. फूल पीले, नारंगी, मटियाले, चित्तीदार लाल या इस तरह के मिलेजुले रंग के होते हैं.

गेंदा की खेती (Marigold Cultivation)

मुख्य किस्में : डैंटी मेरिटा, नौटी मेरिटा, सन्नी, बोनीटा, बटरस्कौच, डबल हारमोनी, लेमन ड्रौप, मिलोडी, पिटाइट हारमोनी, पिटाइट ओरैंज, पिटाइट यैलो, रैड ब्रोकेड रस्टी रैड, टैंजेरिन यैलो, पिगमी, स्टार औफ इंडिया, बोलेरो, गोल्डन, गोल्डन जेम रैड हेट आदि हैं.

ये सभी किस्में हर तरह के क्षेत्रों में सालभर उगाई जा सकती हैं. गेंदे के पौधों के लिए धूप वाली जगह काफी सही होती है.

मिट्टी और उस की तैयारी : गेंदे की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी काफी अच्छी रहती है. वह मिट्टी जिस का पीएच मान 7 से 7.5 हो और जिस में हवा का बहाव अच्छा हो और पानी का निकास भी सही हो, मुफीद रहता है.

पौध तैयार करना : नर्सरी तैयार करने के लिए जमीन को अच्छी तरह से 30 सैंटीमीटर गहराई तक खोद लेना चाहिए और उस में गोबर की सड़ी खाद मिला कर मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिए. इस के बाद उस में नर्सरी तैयार करने के लिए 15 सैंटीमीटर ऊंची, एक मीटर चौड़ी और 5 से 6 मीटर लंबी क्यारियां बनाते हैं.

एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए 700-800 ग्राम बीज की जरूरत होती है. क्यारियां तैयार होने के बाद बीज को 6-8 सैंटीमीटर की दूरी पर 2 सैंटीमीटर गहराई तक बोते हैं. इस के बाद बीजों को अच्छी तरह छनी हुई गोबर की हलकी परत से ढक देते हैं. नर्सरी में रोजाना पानी का छिड़काव करना चाहिए. यदि बीज ठीक है तो वे 5 से 6 दिनों में उग आएंगे.

गरमियों में फसल लेने के लिए बीज जनवरीफरवरी महीने में बो दिए जाते हैं. बरसात में फसल लेने के लिए बोआई मईजून महीने में करना सही रहती है. सितंबरअक्तूबर महीना सर्दियों की फसल की बोआई के लिए सही समय है.

पौधों को क्यारियों में लगाना : आमतौर पर बीज के 1 महीने बाद पौधों को नर्सरी से निकाल कर क्यारियों में लगा दिया जाता है. अफ्रीकन गेंदे को 40×40 सैंटीमीटर की दूरी पर और फ्रांसीसी गेंदे को 30×30 सैंटीमीटर की दूरी पर लगाते हैं.

गरमी और बरसात के दिनों में पौधों में बढ़ोतरी शुरू हो जाए और उन में जब कलियां निकल आएं तब इन कलियों को तोड़ देना चाहिए. ऐसा करने से ज्यादा शाखाएं बनेंगी और ज्यादा फूल आएंगे.

खाद : अच्छी फसल के लिए 120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 80 किलोग्राम फास्फोरस और 80 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए. फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा जमीन तैयार करते समय और नाइट्रोजन की आधी मात्रा पौधों के क्यारियों में लगाने के एक महीने बाद और बाकी आधी मात्रा 2 महीने बाद लगानी चाहिए.

सिंचाई : गरमी के दिनों में पौधों को 4 से 5 दिन के अंतर पर पानी देना चाहिए. जाड़ों के दिनों में 8-10 दिन के अंतर पर सिंचाई की जरूरत होती है. बारिश के दिनों में पौधों की सिंचाई जरूरत के मुताबिक की जाती है.

गेंदा की खेती (Marigold Cultivation)

फूल उत्पादन का समय और फूल तोड़ना : गरमियों की फसल मई के मध्य से फूल देना शुरू कर देती है. बारिश के मौसम वाली फसल में सितंबर के मध्य से फूल आने शुरू हो जाते हैं. सर्दियों में फसल में मध्य जनवरी से फूलों का आना शुरू हो जाता है. फूलों को पूरा खिलने पर ही तोड़ना चाहिए.

जहां तक संभव हो, फूलों को सुबह के समय ही तोड़ना चाहिए. अगर फूल शाम के समय तोड़ रहे हैं तो उन्हें तोड़ कर ठंडी जगह पर इकट्ठा करना चाहिए. इस के बाद उन्हें बांस की टोकरियों में भर कर उचित साधन से बाजार या मंडी में ले जाना चाहिए.

कीट और रोगों से बचाव

गेंदे में लाल रंग की जाल बनाने वाली मकड़ी पौधों का रस चूस कर नुकसान पहुंचाती है. इसे 0.2 फीसदी मैलाथियान या डाइकोफोल 0.1 फीसदी घोल को पौधों पर छिड़क कर नियंत्रित किया जा सकता है. चूर्णी फफूंद, रतुआ और विषाणु (वायरस) गेंदे की मुख्य बीमारियां हैं.

चूर्णी फफूंद और रतुआ को 0.2 फीसदी घुलनशील गंधक के घोल का छिड़काव करने से नियंत्रित किया जा सकता है. कीटनाशक दवाओं जैसे नुवाक्रोन या न्यूवान (0-03 फीसदी) या मैटासिस्टाक्स (0-2 फीसदी) के घोल का 15 दिन के अंतर पर छिड़काव करने से विषाणु बीमारियां फैलाने वाले कीटों को नियंत्रण में रखा जा सकता है.

फूलों की खेती से 8 लाख सालाना कमाई

नालंदा : बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर, भागलपुर के कुलपति डा. डीआर सिंह एवं निदेशक प्रसार, शिक्षा, डा. आरके सोहाने के द्वारा नालंदा जिले के प्रगतिशील किसान आलोक आनंद, पिता बीरेंद्र कुमार सिन्हा, ग्राम- मेद्यी, प्रखंड – बिहारशरीफ में संरक्षित खेती के अंतर्गत तकरीबन 1 एकड़ में जरबेरा फूल एवं 3 पौलीहाउस, रकबा 2 एकड़ में गुलाब फूल की खेती का भ्रमण किया एवं किसान  की दूसरी गतिविधियों से भी रूबरू हुए.

किसान आलोक आनंद से फूलों की मार्केटिंग के बारे में बात की, तो उन्होंने बताया कि हमें जरबेरा फूल की मार्केटिंग में कोई दिक्कत नहीं है, साथ ही, इन के यहां फूलों को स्टोर करने के लिए कूल चैंबर का इंतजाम है.

किसान आलोक आनंद ने बताया कि फूलों की खेती से तकरीबन 7-8 लाख की शुद्ध वार्षिक आमदनी हो जाती है. इस के अलावा वह तकरीबन 6 एकड़ में शिमला मिर्च, 2 एकड़ में केला प्रभेद जी-9 की खेती कर रहे हैं, जिस का कुलपति डा. डीआर सिंह ने अवलोकन किया और अधिक मेहनत कर के नौजवानों के लिए रोल मौडल बने.

इस अवसर पर कृषि विज्ञान केंद्र, हरनौत, नालंदा के डा. उमेश नारायण ‘उमेश’, वैज्ञानिक, मृदा विज्ञान एवं कुमारी विभा रानी, वैज्ञानिक, उद्यान भी उपस्थित थे.

बुरांस (Rhododendron) : गुणकारी जंगली फूल

भारत में रोडोडैंड्रान की तकरीबन 80 प्रजातियां हैं. ये प्रजातियां अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, जम्मूकश्मीर, मणिपुर, नागालैंड, सिक्किम और उत्तराखंड में पाई जाती हैं.

हिमाचल प्रदेश में यह प्रजाति मुख्य रूप से बिलासपुर, सिरमौर, चंबा, कांगड़ा और सोलन जिलों के जंगलों में पाई जाती है.

आमतौर पर हिमाचल प्रदेश के विभिन्न जिलों में रोडोडैंड्रान की 3 प्रजातियां रोडोडैंड्रान आर्बोरियम, रोडोडैंड्रान कंपनुलेटम और रोडोडैंड्रान एंथीपोजेन पाई जाती हैं. लेकिन इन में से रोडोडैंड्रान आर्बोरियम सब से लोकप्रिय प्रजाति है.

मूल रूप से उत्तरमध्य भारत में पौधे को लाली बुरांश, बरास, बराह के फूल, बुरांश और बुरांस के नाम से जाना जाता है. बुरांस के फूल, पत्ते और रंग की विशेषता में बेहद बहुमुखी है.

यह एक सदाबहार पेड़ है. इस की ऊंचाई 12 मीटर तक दर्ज की गई है. तना अकसर डाली जैसा कुटिल और ग्रंथियुक्त होता है. बुरांस के पत्ते बेहद आकर्षक होते हैं. इस की पत्तियां चमकदार, हरे रंग की दीर्घाकार, भालाकार, 10-12 सैंटीमीटर लंबी और 3.6 सैंटीमीटर चौड़ी होती हैं.

इस के पुष्पक्रम को ट्रस कहा जाता है. एक ट्रस में 10 से 20 तुरही और घंटी के आकार के 30 मिलीमीटर लंबे व 7 मिलीमीटर चौड़े फूल पाए जाते हैं. एक पेड़ पर 20 सग लग बर 100 ट्रस पाए जाते हैं. एक ट्रस का वजन 25-40 ग्राम होता है और एक फूल का वजन 0.9-2.5 ग्राम तक होता है. इस के फूल हलके लाल व गुलाबी लाल से गहरे लाल रंग के होते हैं.

पारंपरिक रूप से बुरांस के फूल की पंखुडि़यों का इस्तेमाल पहाड़ी लोग चटनी बनाने में करते हैं. हिमाचल प्रदेश में इस का इस्तेमाल चटनी और स्थानीय वाइन बनाने में भी किया जाता है. लेकिन इस के फूलों से बनी चीजों से संबंधित ज्यादा जानकारी मुहैया नहीं है.

पोषक तत्त्व व औषधीय गुण

बुरांस के फूल कार्बोहाइड्रेट अमिनो एसिड, क्यूमैरिक एसिड, अरसौलिक एसिड और रेजिन के उच्च स्रोत होते हैं. फूलों में फिनोल्स जेंथोप्रोटीन, सैपोनिंस, स्टेरौयड, क्यूमेरिन टैनिन होते हैं. इस की पंखुडि़यों में विटामिन सी पाया जाता है. यह शर्करा पेक्टिन और एंथोसाइमिन का भी अच्छा स्रोत है.

इस के अलावा बुरांस के फूल पोटैशियम, आयरन, फास्फोरस, सोडियम, कौपर और कैल्शियम जैसे खनिजों का भी अच्छा स्रोत है.

बुरांस (Rhododendron)

औषधीय गुणों और पोषक तत्त्व प्रचुर मात्रा में होने के चलते बुरांस के फूलों का इस्तेमाल कई रोगों के इलाज के लिए दवा बनाने में किया जाता है. न केवल फूल बल्कि इस की जड़ों, छाल और पत्तियों में भी कई तरह के औषधीय गुण पाए जाते हैं इसलिए इस का इस्तेमाल दवा उद्योग में बड़े पैमाने पर किया जा रहा है.

आज की जरूरत

ये फूल साल में 1-2 महीनों तक ही मिलते हैं. सामान्य हालात में ये एक से डेढ़ दिन तक और प्रशीतित परिस्थितियों यानी 45 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान में 4-5 दिन में खराब हो जाते हैं. फूलों के आकर्षक की वजह से इस के रस से कई तरह के व्यावसायिक उत्पाद जैसे ड्रिंक, स्क्वैश, सिरप, जैली और चटनी वगैरह बनाए जा सकते हैं.

फूलों से तमाम तरह की चीजें बनाने के लिए रस निकालने की सही तकनीक अपनाने की जरूरत है ताकि परंपरागत रूप से रस निकालने की तकनीक से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके.

जंगलों में बुरांस की और इस के विशेष गुणों को ध्यान में रखते हुए डाक्टर यशवंत सिंह परमार द्वारा औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय में बुरांस के फूलों से पेय पदार्थों के विकास पर काम किया जा रहा है.

पारंपरिक रूप से रस निकालने की तकनीकों से होने वाले नुकसानों को कम करने के लिए और ज्यादा से ज्यादा रस निकाल कर अधिकतम पोषक तत्त्वों को निकालने के लिए एंजाइम का इस्तेमाल कर रस निकालने की मानकीकृत तकनीक लगाई जा रही है.

फूलों से 4 तरह के पेय पदार्थ (स्क्वेश, ड्रिंक, एपेटाइजर और सिरप) बनाने के लिए मानकीकृत तकनीक लगाई जा रही है.