मसाला की मिश्रित खेती (Mixed farming of spices) : फायदे का सौदा

आज खेती के मौडर्न तरीकों से जहां किसान बढ़ती लागत और कुदरती प्रकोप के चलते खेती को फायदे का सौदा नहीं बना पा रहे हैं, वहीं कुछ किसान ऐसे भी हैं, जो अपने नवाचारों से सीमित जमीन पर मसाला जिंसों की मिश्रित खेती कर के सालाना अच्छी आमदनी ले रहे हैं.

नरसिंहपुर जिले की करेली तहसील में गांव रांकई पिपरिया के एक किसान जोगेंद्र किशोर द्विवेदी अदरक, धनिया, मिर्च, हलदी वगैरह की उन्नत खेती कर के क्षेत्र में किसानों के लिए एक जीतीजागती मिसाल बन गए हैं.

काफी पढ़ेलिखे जोगेंद्र किशोर द्विवेदी गांव के प्राइमरी स्कूल में टीचर हैं, पर खेतीकिसानी की पारिवारिक पृष्ठभूमि के चलते स्कूल के बाद का समय वे खेतीकिसानी में लगाते हैं.

परंपरागत खेती से हट कर उन्होंने गन्ने के साथ सोयाबीन और राजमा की मिश्रित फसल का इस्तेमाल किया है. वहीं अदरक का रिकौर्ड उत्पादन कर गांव वालों को एक नई राह दिखाने के साथ अपनी आमदनी भी बढ़ाई है.

कैसे करें अदरक की खेती

अपने खेत से निकले अदरक को 1-1 इंच के छोटेछोटे टुकड़ों में इस तरह काटते हैं कि प्रत्येक टुकड़े में 2-3 आंखें हों. इन्हीं आंखों में से अदरक का अंकुरण होता है. अदरक के टुकड़ों को धूप में सुखा कर रखते हैं.

खेत को अच्छी तरह तैयार कर मिट्टी में नीम के पाउडर का इस्तेमाल करते हैं, इस से अदरक की गठानों में कीट रोग का हमला नहीं हो पाता.

अदरक के सूखे हुए टुकड़ों को अच्छी तरह से तैयार खेत में अप्रैल के आखिर या मई के शुरू में बो दिया जाता है. अदरक बोने के लिए बनाई गई क्यारी में 25 सैंटीमीटर के अंतर से इन्हें बोया जाता है. क्यारी से क्यारी की दूरी 75 सैंटीमीटर रखें.

अदरक बोने के तुरंत बाद ही सिंचाई कर दी जाती है, जिस से अदरक के साथ मिट्टी अच्छी तरह से सेट हो जाए. प्रत्येक 5 से 7 दिन के अंतर पर अदरक की क्यारियों में सिंचाई की जाती है.

उन का कहना है कि गेहूं, चना या दूसरी फसल के स्थान पर मसाला जिंसों की खेती से ज्यादा फायदा मिल जाता है.

प्रगतिशील किसान जोगेंद्र किशोर द्विवेदी अपने खेत पर केंचुआ खाद, वर्मी कंपोस्ट, वर्मी वाश तैयार कर के उन का इस्तेमाल अपने खेतों में लगी इन्हीं मसाला फसलों पर करते हैं. साथ ही, खेती की नईनई तकनीक जानने के लिए यूट्यूब, गूगल के अलावा तमाम खेतीकिसानी से संबंधित कृषि पत्रिकाएं पढ़ते हैं.

उन का कहना है कि आने वाले समय में वे हलदी, मिर्च और धनिया के साथ अदरक की प्रोसैसिंग कर खुद का ब्रांड बाजार में लाना चाहते हैं. इस के लिए शुरुआती तैयारी चल रही है. मसाला जिंसों की प्रोसैसिंग कर के वे लोगों की रसोई में ही सीधे मसाले पहुंचाने का काम करने जा रहे हैं.

किसान ने बागबानी (Gardening) से की बंपर कमाई

भिंड : सरकार किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए उद्यानिकी फसलों के लिए प्रोत्साहित कर रही है. इस की महत्ता को समझ कर कई किसान परंपरागत खेती को छोड़ कर बागबानी कर रहे हैं. ऐसे ही भिंड जिले के विकासखंड अटेर के ग्राम ऐंतहार के प्रगतिशील किसान डीपी शर्मा ने परंपरागत खेती को छोड़ बागबानी शुरू की और अब वे इस से अच्छी आमदनी कर रहे हैं.

किसान डीपी शर्मा ने बताया कि कृषि विज्ञान केंद्र और उद्यानिकी विभाग से परामर्श ले कर 8 अगस्त, 2020 को वीएनआर अमरूद का बगीचा लगाया गया, जिस में 550 पौधे अमरूद के और 50 पौधे नीबू, 100 पौधे करौंदा और  11 पौधे कटहल का रोपण किया गया.

उन्होंने बताया कि उद्यानिकी विभाग भिंड की तरफ से उन के बगीचे में ड्रिप इरिगेशन सिस्टम लगवाया गया है. ड्रिप के माध्यम से सभी पौधों को पर्याप्त मात्रा में पानी और खाद दिया जा रहा है. वर्तमान में पौधे में लगभग 18 महीने में फल आने लगे हैं, जिस में एक फल लगभग 400 ग्राम से ले कर 650 ग्राम तक का अमरूद का उत्पादन होने लगा है.

किसान डीपी शर्मा ने किसानों को संदेश दिया है कि धान व गेहूं की खेती में पानी ज्यादा लगता है, जलस्तर को बचाने के लिए बागबानी की तरफ रुझान बढ़ाएं. अमरूद का बाग लगा कर अन्य किसान भी अच्छी आमदनी कर सकते हैं. पानी की बचत में बागबानी खेती सब से बेहतर है.

प्राकृतिक खेती (Natural Farming) वर्तमान समय की जरूरत

प्राकृतिक कृषि पद्धति आजकल खेती का एक प्रमुख विकल्प बन रहा है, जो कृषि क्षेत्र में पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान करने के लिए अपना योगदान दे रही है. इस पद्धति में खेती का प्रबंधन प्राकृतिक और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों के साथ किया जाता है, ताकि स्वास्थ्यवर्धक उत्पाद, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय को बढ़ावा मिले.

प्राकृतिक खेती एक भारतीय पारंपरिक कृषि पद्धति है, जो प्रकृति के साथ तालमेल स्थापित कर पर्यावरण संरक्षण के साथसाथ स्वास्थ्यवर्धक खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के साथ ही टिकाऊ खेती को बढ़ावा देता है.

प्राकृतिक खेती में रसायनों के प्रयोग को पूरी तरह से वर्जित किया जाता है और फसलोत्पादन के लिए स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का प्रयोग पौध पोषण एवं फसल सुरक्षा के लिए किया जाता है.

प्राकृतिक खेती क्यों?

प्राकृतिक खेती की जरूरत क्यों है? जबकि वर्तमान समय में प्रचलित रसायनयुक्त पारंपरिक कृषि से किसान को अच्छा फसलोत्पादन प्राप्त हो रहा है. इस का उत्तर प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि यह समझा जाए कि वर्तमान समय में प्रचलित रसायनयुक्त पारंपरिक खेती में क्याक्या समस्याएं हैं. वर्तमान समय में रसायन आधारित पारंपरिक कृषि के विभिन्न अनपेक्षित परिणाम हैं, जो पर्यावरण, समाज और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं. पारंपरिक खेती से होने वाले अनपेक्षित कुछ प्रमुख परिणाम हो सकते हैं.

जल प्रदूषण

पारंपरिक खेती में सिंथेटिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग से जल निकायों में रिसाव होता है, जिस से भूजल और सतही जल प्रदूषित हो रहे हैं. यह प्रदूषण जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचा रहा है और इनसान की सेहत को भी प्रभावित कर रहा है.

मृदा क्षरण

गहन जुताई, मोनोक्रापिंग और रासायनिक निवेशों के उपयोग से मिट्टी की क्वालिटी का खराब होना, भूक्षरण, मिट्टी का सख्त होना और कृषि भूमि की उत्पादन क्षमता में गिरावट हो रही है. इस के उलट प्राकृतिक खेती में मिट्टी की क्वालिटी में सुधार होने से उत्पादन क्षमता में निरंतर वृद्धि होती है.

जैव विविधता को नुकसान

पारंपरिक खेती में अकसर फसलोत्पादन के लिए प्राकृतिक रूप से उगे पेड़पौधे, जंगल आदि को (हैबिटैट) को साफ कर भूमि को खेती में शामिल किया जाता है. प्राकृतिक वास के इस नुकसान से जैव विविधता में गिरावट आ रही है, जिस से परागण और प्राकृतिक कीट नियंत्रण जैसी पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं प्रभावित हो रही हैं.

ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन

पारंपरिक कृषि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का एक महत्वपूर्ण स्रोत है. मुख्य रूप से सिंथेटिक रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से नाइट्रस औक्साइड, जो एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है, वातावरण में अवमुक्त होती है.

स्वास्थ्य पर प्रभाव

पारंपरिक कृषि में कीटनाशकों के उपयोग से कृषि श्रमिकों, उपभोक्ताओं और आसपास के समुदायों पर नकारात्मक स्वास्थ्य प्रभाव पड़ रहा है. खाद्य श्रंखला में कीटनाशकों के अवशेष स्वास्थ्य के लिए बेहद नुकसानदायक हैं.

ग्रामीण समुदायों का क्षरण

पारंपरिक कृषि पद्धतियों से कृषि भूमि को बड़े पैमाने पर मोनोकल्चर में समेकित किया जा रहा है, जो छोटे किसानों को खेती से विस्थापित कर रहा है, जिस से ग्रामीण समुदायों का सामाजिक तानाबाना प्रभावित हो रहा है.

कई बार यह भी तर्क दिया जाता है कि प्राकृतिक खेती लाभदायक नहीं है. प्राकृतिक खेती कम लागत (स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कृषि निवेशों के प्रयोग के कारण कई बार इसे जीरो बजट प्राकृतिक खेती कहा जाता है) अच्छी गुणवत्ता के उत्पाद, जिस का बाजार मूल्य अच्छा होता है, किसान की शुद्ध आय में कोई कमी नहीं होती है. रसायनयुक्त पारंपरिक कृषि में कई छुपे हुए खर्च निहित होते हैं, जिसे प्रायः हम आगणित ही नहीं करते. पारंपरिक कृषि से निम्नलिखित खर्च भी व्यक्ति अथवा समाज को करने पड़ते हैं.

पर्यावरणीय सफाई पर अनावश्यक खर्च

जल प्रदूषण, मिट्टी के क्षरण और अन्य पर्यावरणीय क्षति का निवारण अत्यंत महंगा होता है और इस के लिए पर्याप्त पैसों की जरूरत हो सकती है.

स्वास्थ्य देखभाल पर अनावश्यक खर्च

कीटनाशकों के संपर्क और दूषित जल स्रोतों से संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं का इलाज करने से स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों पर वित्तीय बोझ पड़ रहा है.

पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं का नुकसान

जैव विविधता के नुकसान और पारिस्थितिकी प्रणालियों के क्षरण से परागण और जल शुद्धीकरण जैसी पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं की उपलब्धता कम हो रही है, जिस का व्यक्ति पर आर्थिक और सामाजिक प्रभाव पड़ता है.

जलवायु परिवर्तन लागत

पारंपरिक कृषि से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन जलवायु परिवर्तन में योगदान देता है, जिस का बड़े पैमाने पर आर्थिक व सामाजिक प्रभाव है, जिस में बुनियादी ढांचे, कृषि और मानव स्वास्थ्य के नुकसान शामिल हैं.
प्राकृतिक खेती अपनाने से इन सभी नुकसानों से सुगमता से बचा जा सकता है. यदि इन नुकसानों को रोक कर इन पर होने वाले खर्चे को बचाया जाए, तो यह बहुत अधिक होगी. साथ ही, प्राकृतिक खेती से मानव स्वास्थ्य के साथसाथ मृदा एवं पर्यावरण के संरक्षण को भी बल मिलता है.

प्राकृतिक खेती की विशेषताएं

कैमिकल निर्भरता से नजात

प्राकृतिक खेती में कोई भी रासायनिक उर्वरक, सिंथेटिक कीटनाशक या खरपतवारनाशक का प्रयोग नहीं किया जाता है. प्राकृतिक कृषि पद्धति खेती को कैमिकल निर्भरता से पूरी तरह से मुक्त बनाता है.

मिट्टी का संरक्षण

प्राकृतिक खेती में मिट्टी के संरक्षण और उस की गुणवत्ता को बनाए रखने पर जोर दिया जाता है. इस में किसान के प्रक्षेत्र पर उपलब्ध स्थानीय उत्पादों को खेती के लिए उपयोग होता है, जो मृदा स्वास्थ्य को सुदृढ़ रखने में सहयोगी होता है.

बायोविविधता का संरक्षण

प्राकृतिक खेती के अनुसार, फसलों को प्राकृतिक तरीके से उगाया जाता है और एकल खेती को हतोत्साहित कर बहुफसली खेती को बढ़ावा देती है, जिस से बायोविविधता को संरक्षित करने को भी प्रोत्साहित किया जाता है.

प्राकृतिक वित्तीय उपाय

प्राकृतिक खेती में जैविक खादों, जैविक कीटनाशकों और प्रकृति के साथ तालमेल स्थापित कर उन्नत खेती तकनीकों का उपयोग कर के किसान स्वावलंबी बनते हैं. प्राकृतिक खेती में किसान को बाहर से कृषि निवेशों की निर्भरता समाप्त होती है.

सामुदायिक सहयोग

प्राकृतिक खेती में स्थानीय समुदायों को सहयोग दिया जाता है, जो साझेदारी और अनुभव के माध्यम से खेती का प्रबंधन करते हैं.

जैविक खेती तकनीकों का उपयोग

जैविक खेती तकनीकों के उपयोग से खेती को संवेदनशील बनाया जाता है, जैसे कि जैविक खाद, जैविक कीटनाशक और प्राकृतिक बायोफार्मिंग प्रविधि.

जल संरक्षण

प्राकृतिक खेती में जल संरक्षण को महत्व दिया जाता है, जैसे कि बूंदों के संचय तंत्र और सूखे के प्रतिरोध के लिए प्राकृतिक साधनों का उपयोग.

संरक्षण क्षेत्रों की गुणवत्ता

प्राकृतिक खेती में भूमि, वन्य जीवों और जल संपदा की सुरक्षा का खासा ध्यान रखा जाता है, जिस से संरक्षण क्षेत्रों की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिलती है.

प्राकृतिक खेती के लाभ

स्वास्थ्य लाभ

प्राकृतिक खेती से प्राप्त उत्पादों में कैमिकल का कम उपयोग होता है, जिस से उन में पोषक तत्वों की अधिक मात्रा पाई जाती है. इस से उपभोक्ताओं को स्वस्थ और पौष्टिक आहार मिलता है और विभिन्न बीमारियों से बचाव होता है.

पर्यावरण संरक्षण

प्राकृतिक खेती में कैमिकल का कम उपयोग किया जाता है, जिस से प्रदूषण कम होता है और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण होता है. इस से जल, मिट्टी और वायु की स्थिरता बनी रहती है.

आर्थिक लाभ

प्राकृतिक खेती में कम खर्च और अधिक मूल्य प्राप्ति के चलते किसानों को अधिक लाभ होता है. इस के अलावा जब उत्पादों की मांग बढ़ती है, तो उन की कीमतें भी बढ़ जाती हैं, जिस से खेती करने वालें किसानों की आर्थिक स्थिरता बढ़ती है.

सामाजिक लाभ

प्राकृतिक खेती के माध्यम से किसान समुदाय आपस में साझेदारी करते हैं, जो सामाजिक भाईचारा और सामूहिक समृद्धि को बढ़ावा देता है. इस से सामाजिक न्याय, समर्थन और भाईचारा बढ़ता है.

बायोडाइवर्सिटी का संरक्षण

प्राकृतिक खेती में जलवायु, वन्य जीवों और जलवायु के संरक्षण का विशेष ध्यान रखा जाता है, जिस से बायोडाइवर्सिटी का संरक्षण होता है. इस से प्राकृतिक प्रणालियों का संतुलन बना रहता है.

आत्मनिर्भरता

प्राकृतिक खेती के प्रयोग से किसान आत्मनिर्भर बनते हैं. वे अपनी जरूरतों को स्वयं पूरा कर सकते हैं और स्थानीय संसाधनों का सही उपयोग कर के उत्पादन में वृद्धि कर सकते हैं.

जल संरक्षण

प्राकृतिक खेती में जल संचयन, स्थल संरक्षण और जल संपादन की प्रणालियों का प्रयोग किया जाता है. इस से जल संसाधन का सही उपयोग होता है और जल की कमी को कम किया जाता है.

अनुसंधान और विकास

प्राकृतिक खेती में नई और समृद्ध प्राकृतिक तकनीकों का अनुसंधान और विकास किया जाता है. यह न केवल खेती की उत्पादकता को बढ़ाता है, बल्कि विशेषज्ञों को भी नए और संबंधित क्षेत्रों में नए अवसर प्रदान करता है.

अनुभव और साझेदारी

प्राकृतिक खेती के माध्यम से किसान अनुभवों को साझा करते हैं और एकदूसरे से सीखते रहते हैं. यह सामूहिक उत्पादन और साझेदारी को प्रोत्साहित करता है, जिस से कृषि समुदाय का विकास होता है.
प्राकृतिक खेती के इन लाभों से न केवल कृषि सैक्टर में सुधार होता है, बल्कि समाज और पर्यावरण को भी स्थिरता और समृद्धि प्राप्त होती है. प्राकृतिक कृषि, खेती करने का वह प्राचीन तरीका है, जिस का रथ बीजामृत, जीवामृत, आच्छादन एवं वाफ्सा नामक चार पहियों पर आगे बढ़ता है.

प्राकृतिक खेती में शून्य अथवा न्यूनतम जुताई, स्थानीय स्तर पर उपलब्ध बीज, फसल आच्छादन, पूरे साल खेत में फसल, पौध पोषण के लिए जीवामृत अथवा घनजीवामृत का प्रयोग, फसल सुरक्षा के लिए खेत पर तैयार अवयवों के प्रयोग के साथसाथ गायों का पालन किया जाना सम्मिलित है, जिस के कारण खेती की लागत न्यूनतम, उच्च गुणवत्ता का उत्पादन और पर्यावरण के अनुकूल एक टिकाऊ कृषि पद्धति है, जो ऋषि कृषि परंपरा पर आधारित है. अतः वर्तमान समय में प्राकृतिक कृषि, खेती का अनुकूलतम विकल्प है.

परंपरागत खेती (Traditional Farming) को छोड़, कर रहे हैं फलों की खेती

भिंड: जिले के गांव दबोहा के किसान धर्मेंद्र शर्मा के परिवार में पहले कई सालों से परंपरागत खेती चली आ रही थी, जिस से खेती में लाभ कम मिल पा रहा था. एक दिन इन्होंने उन्नत खेती के गुर सीखने के लिए कृषि महकमे से संपर्क किया, जहां से उन्हें किसान संगोष्ठी व किसान प्रशिक्षण में शामिल होने का मौका मिला. वहां उन्हें फल उत्पादन करने की जानकारी दी गई.

किसान धर्मेंद्र शर्मा ने बताया कि 0.20 हेक्टेयर में केला के पौधे लगाए, जिस में 700 पौधे लगे हुए हैं. उन्होंने ये पौधे टिशू कल्चर लैब, दबोह से प्राप्त किए. उस के बाद केले के बीच में सफेद मूसली लगाई, जिस से तकरीबन 4 क्विंटल उत्पादन प्राप्त हुआ. इस वजह से किसान धर्मेंद्र शर्मा को 60,000 से 70,000 रुपए की आमदनी हासिल हुई.

उन्होंने केले के बीच में टमाटर के पौधे भी लगाए. उन्होंने बताया कि केले की तकरीबन 11 महीने में फसल तैयार हो जाएगी. इस के साथसाथ उन्होंने अपने खेत पर ताइबान अमरूद, आम और बेर के कुछ पौधे लगाए हुये हैं, जिन से भी उन्हें अच्छी आय प्राप्त हो रही है.

केले की खेती ने दिखाई मुनाफे की राह

परंपरागत रूप से हो रही खेती में हर साल लागत बढ़ती जा रही है, पर फसल के सही दाम न मिलने से मुनाफे में कमी आ रही है. सरकार द्वारा फसल का सही समर्थन मूल्य न मिलने व अनाज व्यापारियों द्वारा किसान की फसल औनेपौने दाम पर खरीदने से किसानों की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं. ऐसे में खेती करने के तरीकों में बदलाव की ओर किसानों ने ध्यान देना शुरू कर दिया है.

मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के एक किसान राकेश शुक्ला ने परंपरागत खेती को छोड़ कर कुछ अलग करने की जिद ठान ली और अपने खेतों में केले की खेती कर के मुनाफे कमाने के साथ आसपास के दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा देने का काम कर रहे हैं.

प्रयोगधर्मी किसान राकेश शुक्ला जानकारी देते हुए बताते हैं कि वे परंपरागत खेती में रबी और खरीफ की फसलों के अलावा गन्ने की खेती भी करते थे, पर एक एकड़ में गन्ने की फसल से जहां 300 क्विंटल की उपज बेचने पर मुश्किल से एक लाख रुपए की आमदनी हो पाती थी, केले की खेती से एक एकड़ में कम से कम 300 क्विंटल केले बेचने पर 3 लाख रुपए की आमदनी होती है.

राकेश शुक्ला वर्तमान में 18 एकड़ जमीन पर केले की फसल लगाए हुए हैं. उन्होंने अपने खेत में बाजार में टिश्यू कल्चर विधि से तैयार केले की नई किस्म जी-9 का प्लांटेशन किया था. उन्होंने प्रति एकड़ 1,500 पौधों के हिसाब से अपने खेतों में 18 एकड़ जमीन पर तकरीबन 25,000 से 28,000 पौधे लगाए हैं, जिन में फल आने शुरू हो गए हैं.

राकेश शुक्ला ने बताया कि वे प्रत्येक 2-3 दिन में केलों की तुड़ाई करते हैं और बिक्री के लिए भेज देते हैं. केले के खेतों से मार्चअप्रैल माह तक उन्हें उत्पादन मिलेगा.

वे कहते हैं कि परंपरागत खेती से कहीं ज्यादा बेहतर केला की खेती है. एक बार पौधा लगाने के बाद गन्ने की तरह अगले सालों में भी इस का उत्पादन लिया जा सकता है.

क्या है लागत और मुनाफे का गणित

केले की खेती में आमतौर पर प्रति एकड़ 20,000 से 22,000 रुपए पौधों की कीमत और प्रति एकड़ ड्रिप सिंचाई सिस्टम की अनुमानित लागत 25,000 रुपए और मजदूरी आदि के खर्चों को मिला कर पौधों के रोपने की अवधि से ले कर उत्पादन तक तकरीबन 10 माह की फसल में प्रति एकड़ की कुल लागत 70,000 से 80,000 रुपए आती है, जबकि एक एकड़ की फसल से कम से कम 300 क्विंटल का उत्पादन मिलता है, जिस से 1,000 रुपए प्रति क्विंटल के बाजार मूल्य के हिसाब से 3 लाख रुपए प्राप्त होते हैं.

लागत खर्च घटाने के बाद भी लगभग 2 लाख रुपए का शुद्ध मुनाफा केले की खेती से किसान को मिल रहा है, जबकि गन्ने की फसल से बमुश्किल एक लाख रुपए की आमदनी होती है.

राकेश शुक्ला बताते हैं कि केले की फसल को ठंड से बचाना सब से अहम काम है. इस के लिए सही तरीका फरवरीमार्च माह में इसे खेतों में लगाना चाहिए.

अंत:वर्ती फसल ले कर बढ़ा सकते हें मुनाफा

नरसिंहपुर के कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक डा. आशुतोष शर्मा कहते हैं कि जिले में केले की खेती गन्ने का बेहतर विकल्प साबित हो सकती है, जो किसानों के मुनाफे को भी बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगी, बशर्ते इसे पाले जैसी स्थिति से बचाया जा सके.

डा. आशुतोष शर्मा बताते हैं कि केले की खेती को अंत:वर्ती तरीके से टमाटर, शिमला मिर्च या पपीता लगा कर किया जाए, तो किसान की आमदनी और भी बढ़ाई जा सकती है.

वे बताते हैं कि चूंकि केले की खेती में पौधे एक निश्चित अंतराल पर रोपे जाते हैं, इसलिए इस में अंत:वर्ती फसलों का उत्पादन लेने की पर्याप्त संभावना रहती है और एकसाथ 2 फसलों के होने से इस का तापमान कंट्रोल में रहता है. इस में ठंड के मौसम में तुषार यानी पाला पड़ने के प्रकोप की संभावना को भी कम किया जा सकता है.

Banana
Banana

जिले के दूसरे किसान भी कर रहे हैं खेती

खुरसीपार गांव में केले की सफल खेती कर रहे राकेश शुक्ला के इस नवाचार को देखने के लिए रोजाना आसपास के गांव के किसान आते हैं. खेती को मुनाफे का सौदा बनाने के लिए वे किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बन गए हैं. उन से प्रेरणा ले कर जिले के बारछी, घूरपुर वगैरह गांव के किसानों ने भी बुरहानपुर, जलगांव से केले के पौधे मंगा कर अपने खेतों में केले की खेती शुरू की है.

खुरसीपार गांव के ही युवा किसान शैलेंद्र कौरव ने अपने खेतों में केले की उन्नत खेती कर के रिकौर्ड उत्पादन कर अपनी आमदनी बढ़ाई है. इस की वजह से उन्हें जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर का 2020 का कृषक फैलो सम्मान भी मिला है.

प्रदेश में सर्वाधिक गन्ना उत्पादन करने वाले जिले में किसानों ने खेती में बढ़ती लागत से राहत पाने के लिए मुनाफे की खेती की तरफ कदम बढ़ा दिए हैं. करेली ब्लौक के ग्राम मोहद में युवा किसान अविनाश शर्मा ने खेती में मुनाफे का नवाचार किया है.

उन्होंने तकरीबन आधा एकड़ रकबे में केले के 300 पेड़ लगाए हैं. हर 5 फुट की दूरी पर लगे केले के पेड़ों के बीच क्यारियों में प्याज भी लगाई. प्याज से उन्हें तकरीबन 25,000 रुपए का मुनाफा मिला, जिस ने कोरोना काल में उन्हें थोड़ी राहत दी.

इंदौर में एक नैटवर्किंग कंपनी में काम कर रहे अविनाश शुक्ल कहते हैं कि इसी साल फरवरी महीने में बीते माह फरवरी वह जबलपुर से तकरीबन 17 रुपए प्रति नग की दर पर टिश्यू कल्चर केले के 300 पौधे लाए थे. केले की खेती के इस प्रयोग में 8,000 से 10,000 रुपए का खर्चा आया है.

वे कहते हैं कि सीजन में गन्ने के दाम 300 रुपए प्रति क्विंटल तक ही जाते हैं, लेकिन कच्चा केला 10 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बिकता है. खास बात यह भी कि केले की फसल में बीमारी भी अधिक नहीं लगती और लागत भी कम है. इन दिनों कोरोना महामारी के समय में वे घर और खेतों में ज्यादा समय दे रहे हैं.

वे कहते हैं कि कोरोना संक्रमण काल में जो हालात हैं, उन में अब बाहर रह कर कोई जौब करना भी मुश्किल होगा. ऐसे में प्रायोगिक खेती से ही वे अपनी आमदनी में इजाफा कर सकते हैं.

अविनाश शुक्ल बताते हैं कि कृषि वैज्ञानिकों द्वारा विकसित केले की नई किस्म ग्रांड 9 का रोपण उन्होंने किया है. फसल 10 महीने में पक कर तैयार हो जाएगी.

सघन खेती प्रणाली में लाभकारी जैविक खेती

हरित क्रांति की शुरुआत के बाद से देश की बेतहाशा बढ़ रही आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए खेतीबारी में उर्वरकों के इस्तेमाल को भारी बढ़ावा मिला है और हम ने अपने लक्ष्यों को पूरा किया है, खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल की है. लेकिन सघन खेती प्रणाली के खतरे बड़े चुनौती भरे हैं, क्योंकि इन से पारिस्थितिकीय संतुलन पर भारी असर पड़ता है.

इसी बात को ध्यान में रखते हुए और्गेनिक या जैविक खेती पर आधारित प्रणाली की बात सोची गई, जिस में रासायनिक उर्वरकों के बजाय कार्बनिक पदार्थों के सड़नेगलने से हासिल खाद का इस्तेमाल किया जाता है.

जैविक पदार्थों से बनी खाद के इस्तेमाल पर आधारित यह प्रणाली हमारे समाज में काफी समय से ही प्रचलित रही है. जैविक खेती में परंपरा और विज्ञान का समन्वय कर के फायदा उठाया जाता है. नतीजे के रूप में कहा जा सकता है कि जैविक खेती कृषि उत्पादन में स्थिरता बढ़ाने का एक सही उपाय है.

देश के 30 करोड़ किसान कर्जों के जाल में फंस कर बदहाली के शिकार हैं. तकरीबन 8 करोड़ किसान खेती छोड़ कर शहरों में मजदूरी कर रहे हैं. किसानों की इस हालत की वजहों में एक प्रमुख वजह है खेती में बढ़ती लागत और घटता मुनाफा. किसान अपने खेत में जो मेहनत अथवा पूंजी लगाता है, उतना उत्पादन उसे नहीं मिलता और जो मिलता है, उस का उसे उचित मूल्य नहीं मिलता.

FARMINGजहां कुछ जगहों पर ऐसे हालात हैं, वहीं कुछ जागरूक किसान विकल्प तलाशने में लगे हैं और यह महसूस कर रहे हैं कि खेती में आत्मनिर्भरता ही एक ऐसा रास्ता है, जो उन्हें ऐसी समस्याओं से बाहर ला कर भरपेट भोजन मुहैया करा सकता है.

यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि 60 के दशक की हरित क्रांति ने यद्यपि देश को खाद्यान्न की दिशा में आत्मनिर्भर बनाया, लेकिन इस के दूसरे पहलू पर यदि गौर करें तो खेती में अंधाधुंध उर्वरकों के इस्तेमाल की हकीकत से पानी के लैवल में गिरावट के साथ मिट्टी की उर्वरता भी प्रभावित हुई है और एक समय बाद खाद्यान्न उत्पादन न केवल स्थिर हो गया, बल्कि प्रदूषण में भी बढ़ोतरी हुई है और स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा हुआ है, जिस से सोना उगलने वाली धरती मरुस्थल का रूप धारण करती नजर आ रही है.

मिट्टी में सैकड़ों किस्म के जीवजंतु व जीवाणु होते हैं, जो खेती के लिए हानिकारक कीटों को खा जाते हैं. नतीजतन, उत्पादन प्रभावित होता है, इसलिए खेती में रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल में सावधानी बरतते हुए जैविक खेती पर ध्यान देना चाहिए. जैविक खेती में हम कंपोस्ट खाद के अलावा नाडेयप, कंपोस्ट खाद, केंचुआ खाद, नीम खली, लेमनग्रास व फसल अवशेषों को शामिल करते हैं.

जैविक खाद के इस्तेमाल से न केवल मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, बल्कि उस में नमी की वजह से काफी हद तक सूखे की समस्या से भी नजात मिलती है. जैविक खाद के इस्तेमाल से भूजल धारण क्षमता बढ़ती है. इस के साथ ही जैविक कीटनाशक से मित्र कीट भी संरक्षित होते हैं. इस प्रकार घटते भूजल स्तर के लिए जैविक खेती एक फायदेमंद साबित होगी.

एक अनुमान के अनुसार, किसान अपनी उत्पादित फसल का 25-40 प्रतिशत ही उपयोग कर पाते हैं. भारत में हर साल 600 मिलियन टन कृषि अवशेष पैदा होता है. इस में ज्यादातर अवशेषों को किसान अगली फसल के लिए खेत को तैयार करने के लिए खेत में ही जला देते हैं, जबकि इस का उपयोग जैविक खाद को तैयार करने के लिए आसानी से किया जा सकता है.

पुराने समय में किसान परंपरागत रूप से खेती में स्थानीय तकनीकों व संसाधनों का इस्तेमाल करते थे, जिस में स्थानीय बीज, वर्षा आधारित खेती व जैविक खाद है, जिस से सड़ेगले पत्ते व घासों का उपयोग कर बनाने में भारतीय किसान माहिर थे.

पारंपरिक खाद के प्रयोग से फसल अधिक गुणवत्ता वाली होती थी. साथ ही, आसपास का वातावरण भी साफ रहता था. 1-2 दशक पहले तक आम काश्तकार खेती से इतना उत्पादन कर लेता था कि परिवार का गुजरबसर हो जाता था और अपनी आर्थिक जरूरतें भी पूरी हो जाती थीं, लेकिन आधुनिकता व बाजारवाद की आंधी ने किसानों का रुख जैविक खाद से रासायनिक खादों की तरफ मोड़ दिया. रासायनिक खाद, बीज व कीटनाशकों के इस्तेमाल से उत्पादन में बढ़ोतरी हुई, लेकिन एक सीमा के बाद उस पर बढ़ती लागत से किसानों पर आर्थिक दबाव पड़ने लगा.

आज यह बात पूरी तरह साबित हो चुकी है कि स्वयं पर निर्भर जैविक खेती से सालभर की खाद्य सुरक्षा तय की जा सकती है और अनेक प्राकृतिक प्रकोपों के बावजूद भुखमरी की हालत से बहुत हद तक बचा जा सकता है.

इन तथ्यों पर अमल कर के बहुत से किसानों ने आज अपने जीवन में क्रांतिकारी बदलाव किए हैं, जो पहले धान व गेहूं उगा कर जीवनयापन की दूसरी सभी जरूरतों के लिए बाजार पर निर्भर रहते थे, पर आज दलहन, तिलहन, मसाले, चारा, जलौनी, सागसब्जी, फल आदि अनेक जरूरी चीजें उगा कर भोजन के साथसाथ अच्छा पैसा भी कमा रहे हैं.

जैविक खेती से स्वस्थ आहार

जैविक खेती प्रणाली में दूसरे फायदों के अलावा स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयुक्त आहार के उत्पादन की गारंटी दी जाती है. पारंपरिक कृषि प्रणाली में खाद और पर्यावरण संबंधी मुद्दों को ले कर बढ़ती चिंता ने पर्यावरण की दृष्टि से अनुकूल तौरतरीकों वाली कृषि प्रणाली के विकास को बढ़ावा दिया है, जिसे आमतौर पर और्गेनिक फार्मिंग यानी जैविक खेती कहा

जाता है. इस में जैव खेती, प्राकृतिक खेती, पुनरोत्पादक खेती, क्रमिक खेती, परमाकल्चर, कम आधान वाली सतत खेती शामिल हैं.

जैविक खेती के घटक

फसल और मृदा प्रबंधन : इस प्रणाली का उद्देश्य मिट्टी के उपजाऊपन को दीर्घकालीन आधार पर बनाए रखने के लिए उस में जैविक पदार्थों के स्तर में वृद्धि करना है.

इस घटक के तहत फसल की विभिन्न किस्मों में से चयन, समय पर बोआई करने, फसलों की अदलाबदली कर के बोआई करने, हरी खाद के उपयोग और लैग्यूम जैसी फसलों को साथ बोने पर जोर दिया जाता है.

पौष्टिक तत्त्वों का प्रबंधन : इस में जैविक पदार्थों जैसे पशुओं के गोबर की खाद के उपयोग, कंपोस्ट, वर्मी कंपोस्ट, फसल अपशिष्ट के उपयोग, हरी खाद और जमीन की उत्पादकता बढ़ाने के लिए कवर क्रौप को उगाया जाता है.

पोषक तत्त्वों के पुनर्चक्रण के महत्त्व को ध्यान में रखते हुए फसलों की अदलाबदली कर के बोआई और जैव उर्वरकों को भी शामिल किया जाता है.

पादप संरक्षण : कीड़ेमकोड़ों, बीमारी फैलाने वाले पैथोजीनों और दूसरी महामारियों को नियंत्रित करने के लिए मुख्य रूप से फसलों की अदलाबदली कर के बोआई, प्राकृतिक कीट नियंत्रकों, स्थानीय किस्मों, विविधता और जमीन की जोत का सहारा लिया जाता है. इस के बाद वानस्पतिक, तापीय और रासायनिक विकल्पों का इस्तेमाल सीमित स्थितियों में अंतिम उपाय के तौर पर किया जाता है.

पशुधन प्रबंधन : मवेशियों को पालने के लिए उन के उद्विकास संबंधी अनुकूलन, व्यवहार संबंधी आवश्यकताओं और उन के कल्याण संबंधी मुद्दों जैसे पोषाहार, आश्रय, प्रजनन आदि पर पूरा ध्यान दिया जाता है.

मृदा और जल संरक्षण : बारिश के फालतू पानी से जमीन का कटाव होता है. इसे कंटूर खेती, कंटूर बांधों के निर्माण, सीढ़ीदार खेती, पानी के बहाव के मार्ग में घास उगाने जैसे उपायों से रोका जा सकता है.

शुष्क इलाकों में क्यारियों के बीच बारिश के पानी को जमा कर के, ब्राड बैड और फरो प्रणाली, भूखंडों के बीच वर्षा जलसंचय और स्कूपिंग जैसे उपाय अपना कर पानी का संरक्षण किया जा सकता है.

खेती में फसलों के चयन का बड़ा ही महत्त्व है, क्योंकि बहुत सी फसलें कई तरह से उपयोग में लाई जा सकती हैं. जैसे मोथबीन की फसलों में सूखे का प्रतिरोध करने की क्षमता होती है, वहीं इन्हें चारे के तौर पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है.

शुष्क और अर्धशुष्क क्षेत्रों में मोथबीन की फसलें उगा कर ज्यादा से ज्यादा फायदा लिया जा सकता है. इन की खेती से मिट्टी के कटाव को रोकने और जमीन में पोषक तत्त्वों के पुनर्चक्रण में भी मदद मिलती है.