मछुआरों के लिए कल्याणकारी योजनओं (Welfare Schemes) का शुभारंभ

मत्स्यपालन विभाग, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय द्वारा भारत में मात्स्यिकी क्षेत्र के स्थायी और जिम्मेदार विकास और मछुआरों के कल्याण के माध्यम से नीली क्रांति (ब्लू रेवोल्यूशन) लाने के लिए सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 20,050 करोड़ रुपए के निवेश से एक प्रमुख योजना ‘प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना’ (पीएमएमएसवाई) का कार्यान्वयन  किया जा रहा है.

इस योजना में मछुआरों और मत्स्य किसानों के लिए कई कल्याणकारी गतिविधियों की परिकल्पना की गई है, जिस में विभाग ने पीएमएमएसवाई योजना के तहत वेस्सल कम्युनिकेशन एंड सपोर्ट सिस्टम के नैशनल रोलआउट प्लान को मंजूरी दी है, जिस में 364 करोड़ रुपए के कुल खर्च के साथ सभी तटीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों  में 1,00,000 फिशिंग वेसल्स पर ट्रांसपोंडर की स्थापना शामिल है.

नाव मालिकों को ट्रांसपोंडर के लिए मुफ्त में सहायता प्रदान की जाती है, जिस में टू वे कम्यूनिकेशन की सुविधा उपलब्ध है और संपूर्ण एक्सक्लूसिव इकोनोमिक जोन को कवर करते हुए किसी भी आपात स्थिति के दौरान छोटे टेक्स्ट मैसेज भेजे जा सकते हैं. यह मछुआरों को समुद्री सीमा के पास आने या उसे पार करने पर अलर्ट भी करता है.

इस के अलावा अन्य गतिविधियों जैसे समुद्री राज्यों/संघ  राज्य क्षेत्रों में इंटीग्रेटेड कोस्टल फिशिंग, गांवों का विकास, जिस का उद्देश्य स्थायी मत्स्य प्रथाओं के माध्यम से पर्यावरणीय नुकसान को कम करते हुए तटीय मछुआरों को आर्थिक और सामाजिक लाभ प्रदान  करना है.

18 से 70 साल की आयु समूह में आकस्मिक मृत्यु या स्थायी पूर्ण शारीरिक अक्षमता  पर 5 लाख रुपए, आकस्मिक स्थायी आंशिक शारीरिक अक्षमता पर 2.50 लाख रुपए और दुर्घटनावश अस्पताल में भरती होने पर 25,000 रुपए का बीमा लाभ प्रदान करना, 18 से 60 साल की आयु समूह के लिए मछली पकड़ने पर प्रतिबंध/मंद अवधि के दौरान मत्स्य संसाधनों के संरक्षण के लिए सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़े सक्रिय पारंपरिक मछुआरों के परिवारों के लिए आजीविका और पोषण संबंधी सहायता देना, जिस में  मछली पकड़ने पर प्रतिबंध/मंद अवधि के  दौरान  3 महीनों के लिए प्रति मछुआरे  को 3,000 रुपए की सहायता प्रदान की जाती है, जिस में लाभार्थी का योगदान 1,500 रुपए  होता है और इस के लिए सामान्य राज्य के लिए अनुपात 50:50, उत्तरपूर्वी राज्यों और हिमालयी राज्यों  के  लिए  80:20, जबकि केंद्र शासित प्रदेशों के लिए सौ फीसदी है.

वर्तमान में चल रही पीएमएमएसवाई के तहत मछुआरों और मत्स्य किसानों को माली रूप से सशक्त बनाने और उन की बारगैनिंग पावर बढ़ाने के लिए मत्स्य किसान उत्पादक संगठनों/फिश फार्मर प्रोड्यूसर और्गेनाइजेशन (एफएफपीओ) की स्थापना के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करने का प्रावधान है, जो मछुआरों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने में मदद करता है.

मत्स्यपालन विभाग ने अब तक 544.85 करोड़ रुपए की कुल परियोजना लागतपर कुल 2,195 एफएफपीओ की स्थापना के लिए मंजूरी दी है, जिस में 2,000 मत्स्य सहकारिताओं को एफएफपीओ का रूप देने और 195 नए एफएफपीओ गठित करना शामिल है.

इस के अलावा, मछुआरों और मत्स्यपालकों द्वारा संस्थागत ऋण तक पहुंच को सुविधाजनक बनाने के लिए साल 2018-19 से किसान क्रेडिट कार्ड की  सुविधा को मात्स्यिकी क्षेत्र तक विस्तारित किया गया है और आज तक मछुआरों और मत्स्यपालकों को 4,50,799 केसीसी कार्ड दिए गए हैं.

राष्ट्रीय गोकुल मिशन (Rashtriya Gokul Mission)

‘राष्ट्रीय गोकुल मिशन’ योजना दूध उत्पादन और बोवाइन पशुओं की उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है. इस योजना के कार्यान्वयन और पशुपालन एवं डेयरी विभाग द्वारा किए गए अन्य उपायों से देश में दूध उत्पादन साल 2014-15 में 146.31 मिलियन टन से बढ़ कर साल 2023-24 में 239.30 मिलियन टन हो गया है.

पिछले 10 सालों के दौरान 63.55 फीसदी की वृद्धि हुई है. देश में बोवाइन पशुओं की कुल उत्पादकता साल 2014-15 में प्रति पशु प्रति वर्ष 1,640 किलोग्राम से बढ़ कर साल 2023-24 में प्रति पशु प्रति वर्ष 2,072 किलोग्राम हो गई है. यह 26.34 फीसदी की वृद्धि है, जो विश्व में किसी भी देश द्वारा बोवाइन पशुओं की उत्पादकता में हुई सब से अधिक बढ़ोतरी है.

देशी और नौनडिस्क्रिप्ट गोपशुओं की उत्पादकता वर्ष 2014-15 में प्रति पशु प्रति वर्ष 927 किलोग्राम से बढ़ कर साल 2023-24 में प्रति पशु प्रति वर्ष 1,292 किलोग्राम हो गई है, जो 39.37 फीसदी  की वृद्धि है.

भैंसों की उत्पादकता साल 2014-15 में प्रति पशु प्रति वर्ष 1,880 किलोग्राम से बढ़ कर साल 2023-24 में प्रति पशु प्रति वर्ष 2,161 किलोग्राम हो गई है, जो 14.94 फीसदी  की वृद्धि है.

राष्ट्रीय गोकुल मिशन के अंतर्गत दूध उत्पादन और बोवाइन पशुओं की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए कई सफलतापूर्वक योजनाओं का कार्यान्वयन किया जा रहा है.

राष्ट्रव्यापी कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रम: राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत पशुपालन और डेयरी विभाग दूध उत्पादन और देशी नस्लों सहित बोवाइन पशुओं की उत्पादकता को बढ़ावा देने के लिए कृत्रिम गर्भाधान कवरेज का विस्तार कर रहा है. अब तक 8.32 करोड़ पशुओं को कवर किया गया है, 12.20 करोड़ कृत्रिम गर्भाधान किए गए हैं, जिस से 5.19 करोड़ किसान लाभान्वित हुए हैं.

संतति परीक्षण और नस्ल चयन: इस कार्यक्रम का उद्देश्य देशी नस्लों के सांडों सहित उच्च आनुवंशिक गुणवत्ता वाले सांडों का उत्पादन करना है. संतति परीक्षण को गोपशु की गिर, साहीवाल नस्लों और भैंसों की मुर्राह, मेहसाणा की नस्लों के लिए चलाया जा रहा है.

नस्ल चयन कार्यक्रम के अंतर्गत गोपशु की राठी, थारपारकर, हरियाणा, कांकरेज की नस्ल और भैंस की जाफराबादी, नीली रवि, पंढारपुरी और बन्नी नस्लों को शामिल किया गया है. अब तक 3,988 उच्च आनुवंशिक गुणवत्ता वाले सांडों का उत्पादन किया गया है और उन्हें वीर्य उत्पादन के लिए शामिल किया गया है.

इनविट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) तकनीक का कार्यान्वयन : देशी नस्लों के उत्कृष्ट पशुओं का प्रसार करने के लिए विभाग ने 22 आईवीएफ प्रयोगशालाएं स्थापित की हैं. आईवीएफ तकनीक की आनुवंशिक उन्‍नयन में महत्‍वपूर्ण भूमिका है और यह कार्य एक ही पीढ़ी में संभव है. इस के अतिरिक्‍त किसानों को उचित दरों पर तकनीक उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने आईवीएफ मीडिया शुरू किया है.

सेक्ससौर्टेड वीर्य उत्पादन : विभाग ने गुजरात, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में स्थित 5 सरकारी वीर्य स्टेशनों पर सैक्स सौर्टेड वीर्य उत्पादन सुविधाएं स्थापित की हैं. 3 निजी वीर्य स्टेशन भी सैक्ससौर्टेड वीर्य खुराक का उत्पादन कर रहे हैं. अब तक उच्च आनुवंशिक गुणवत्ता वाले सांडों से 1.15 करोड़ सैक्ससौर्टेड वीर्य खुराकों का उत्पादन किया गया है और उसे कृत्रिम गर्भाधान के लिए उपलब्ध कराया गया है.

जीनोमिक चयन : गोपशु और भैंसों के आनुवंशिक सुधार में तेजी लाने के लिए विभाग ने देश में जीनोमिक चयन शुरू करने के लिए विशेष रूप से तैयार की गई एकीकृत जीनोमिक चिप विकसित की है – देशी गोपशुओं के लिए गौ चिप और भैंसों के लिए महिष चिप.

ग्रामीण भारत में बहुद्देश्यीय कृत्रिम गर्भाधान तकनीशियन (मैत्री): इस योजना के तहत मैत्री को किसानों के द्वार पर गुणवत्तापूर्ण कृत्रिम गर्भाधान सेवाएं प्रदान करने के लिए प्रशिक्षित और सुसज्जित किया जाता है. पिछले 3 सालों के दौरान राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत 38,736 मैत्री को प्रशिक्षित और सुसज्जित किया गया है.

सैक्ससौर्टेड वीर्य का उपयोग कर के त्वरित नस्ल सुधार कार्यक्रम : इस कार्यक्रम का उद्देश्य 90 फीसदी सटीकता के साथ बछियों का उत्पादन करना है, जिस से नस्ल सुधार और किसानों की आय में वृद्धि हो. किसानों को सुनिश्चित गर्भधारण के लिए सैक्ससौर्टेड वीर्य की लागत के 50 फीसदी तक सहायता मिलती है.

इस कार्यक्रम से अब तक 341,998 किसान लाभान्वित हो चुके हैं. सरकार ने किसानों को उचित दरों पर सैक्ससौर्टेड वीर्य उपलब्ध कराने के लिए देशी रूप से विकसित सैक्ससौर्टेड वीर्य तकनीक शुरू की है.

इनविट्रो फर्टिलाइजेश तकनीक का उपयोग कर त्वरित नस्ल सुधार कार्यक्रम : इस तकनीक का उपयोग बोवाइन पशुओं के तीव्र आनुवंशिक उन्नयन के लिए किया जाता है और आईवीएफ तकनीक अपनाने में रुचि रखने वाले किसानों को प्रत्येक सुनिश्चित गर्भावस्था पर 5,000 रुपए की प्रोत्साहन राशि उपलब्ध कराई जाती है.

देशी बोवाइन नस्लों के विकास और संरक्षण के लिए साल 2014-15 और साल 2024-25 (दिसंबर, 2024 तक) के बीच कार्यान्वयन एजेंसियों को 4,442.87 करोड़ रुपए की वित्तीय सहायता जारी की गई और इस के मुकाबले साल 2004-05 और साल 2013-14 के बीच गोपशु और भैंस विकास के लिए 983.43 करोड़ रुपए की राशि जारी की गई. इस योजना का लाभ दूध उत्पादन और बोवाइन पशुओं की उत्पादकता में वृद्धि के रूप में डेयरी से जुड़े किसानों को मिल रहा है.

कृषि विज्ञान केंद्र भीलवाड़ा को बेस्ट केवीके अवार्ड (Award)

उदयपुर : महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर एवं आईसीएआर-कृषि तकनीकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, जोधपुर क्षेत्र 2 के अधीन कृषि विज्ञान केंद्र भीलवाड़ा को कृषि में नवाचार के क्षेत्र में तकनीकी हस्तांतरण के माध्यम से कृषक समुदाय के बीच में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए बेस्ट केवीके अवार्ड हेतु नामित किया गया है.

यह पुरस्कार कृषि अनुसंधान, नवाचार, अभियांत्रिकी, पोषण और प्रौद्योगिकी में अद्वितीय रुझानों पर ध्यान केंद्रित करने वाला पांचवां अंतर्राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन- न्यूट्रिएंट-2025 (NUTRIENT-2025), जो कि एग्री मीट फाउंडेशन भारत द्वारा 20-21 फरवरी, 2025 के दौरान आइके गुजराल पंजाब तकनीक विश्वविद्यालय से संबद्ध संस्थान भाई गुरूदास ग्रुप औफ इंस्टिट्यूट, संगरूर, पंजाब में दिया जाना प्रस्तावित है.

कृषि विज्ञान केंद्र भीलवाड़ा देश का अग्रणीय ISO 9001:2015 प्रमाणित संस्थान है. साथ ही, केंद्र पर विभिन्न प्रदर्शन इकाइयां जैसे सिरोही बकरी, प्रतापधन मुरगी, डेयरी, चूजा पालन, वर्मी कंपोस्ट, वर्मी वाश, प्राकृतिक खेती इकाई, नर्सरी, नेपियर घास, वर्षा जल संरक्षण इकाई, बायोगैस, मछलीपालन, कम लागत से तैयार हाइड्रोपौनिक हरा चारा उत्पादन इकाई, आंवला, अमरूद एवं नींबू का मातृवृक्ष बगीचा, बीजोत्पादन एवं क्राप केफेटेरिया आदि के माध्यम से कृषक समुदाय के लिए समन्वित कृषि प्रणाली के उद्यम स्थापित कर, स्वरोजगार का सृजन एवं आजीविका को सुदृढ कर आत्मनिर्भर किया जा रहा है, जिस से किसानों का गांव से शहरों की ओर पलायन कम हुआ है.

कृषि विज्ञान केंद्र भीलवाड़ा के तकनीकी सहयोग एवं मार्गदर्शन से जिले में 2 कृषक उत्पादक संगठन (एफपीओ) क्रमशः भीलवाड़ा गोटरी प्राइड फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड़ एवं मीव किसान बाजार कृषक उत्पादक संगठन का सफल संचालन किया जा रहा है, जिस से कृषक समुदाय के फसल उत्पादन और अन्य कृषि उत्पादों का समय पर विपणन होने से आमदनी में इजाफा हुआ है.

कृषि विज्ञान केंद्र भीलवाड़ा पर राष्ट्रीय जलवायु समुत्थान कृषि में नवप्रवर्तन (निक्रा), प्राकृतिक खेती, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन दलहन एवं तिलहन, अनुसूचित जनजाति परियोजना, पोषण संवेदी कृषि संसाधन और नवाचार (नारी) जनजातीय क्षेत्रों में ज्ञान प्रणाली और होम स्टेड कृषि प्रबंधन (क्षमता), मूल्य संवर्धन और प्रौद्योगिकी ऊष्मायन केंद्र (वाटिका) आदि परियोजनाओं के माध्यम से महिला किसानों, किसानों एवं ग्रामीण युवाओं का आर्थिक उत्थान किया जा रहा है.

कृषि विज्ञान केंद्र भीलवाड़ा द्वारा समयसमय पर किसान मेलों, कृषकवैज्ञानिक संवाद, किसान गोष्ठी, जागरूकता कार्यक्रम, महत्वपूर्ण दिवस, प्रदर्शन, प्रक्षेत्र दिवस, प्रक्षेत्र परीक्षण आदि प्रसार गतिविधियों का आयोजन कर कृषि नवाचार की सफल तकनीकीयों का हस्तांतरण किया जा रहा है.

उपरोक्त उल्लेखनीय कार्यों को दृष्टिगत रखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र भीलवाड़ा को बेस्ट केवीके अवार्ड से नवाजा गया.

मत्स्यपालन क्षेत्र में हैं रोजगार की अपार संभावनाएं: राजीव रंजन सिंह

गुवाहाटी : मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत मत्स्यपालन विभाग ने असम के गुवाहाटी में ‘पूर्वोत्तर क्षेत्र के राज्यों की बैठक 2025’ का आयोजन किया. इस की अध्यक्षता मत्स्यपालन, पशुपालन, डेयरी मंत्रालय और पंचायती राज मंत्रालय केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने की.

पशुपालन मंत्री राजीव रंजन सिंह ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) के तहत लगभग 50 करोड़ रुपए की लागत वाली प्रमुख परियोजनाओं की शुरुआत की, जिस के तहत पूर्वोत्तर क्षेत्र में आत्मनिर्भर मत्स्यपालन क्षेत्र बनाने की मंशा जाहिर की.  इन परियोजनाओं से मत्स्यपालन क्षेत्र में लगभग 4,530 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होने का अनुमान है.

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने मत्स्यपालन लाभार्थियों को राष्ट्रीय मातिस्यकी विकास बोर्ड (एनएफडीबी) पंजीकरण प्रमाणपत्र, केसीसी कार्ड, सर्वश्रेष्ठ एफएफपीओ और मत्स्यपालन स्टार्टअप के लिए पुरस्कार सहित प्रमाणपत्र भी  दिए. साथ ही, क्षेत्रीय विकास की गति को जारी रखने और टिकाऊ बनाने के उद्देश्य से मत्स्य विभाग ने सिक्किम राज्य में जैविक मत्स्यपालन और जलीय कृषि के विकास के लिए सिक्किम के सोरेंग जिले में जैविक मत्स्यपालन क्लस्टर को अधिसूचित किया.

केंद्रीय मत्स्य एवं पशुपालन मंत्री राजीव रंजन सिंह ने मत्स्यपालन क्षेत्र की अपार संभावनाओं के बारे में बताते हुए कहा कि प्रजातियों के विविधीकरण, मछली उत्पादन में 20-25 फीसदी की वृद्धि के लक्ष्य को प्राप्त करने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने व रोजगार सृजन के लिए उत्पादन खपत के अंतर को कम करने की जरूरत है.

उन्होंने राज्यों को क्षेत्र विशेष की कमियों को दूर करने के लिए राज्य केंद्रित योजनाएं बनाने के लिए भी प्रोत्साहित किया. केंद्र सरकार की  प्रमुख पहलों में मत्स्यपालन और अवसंरचना विकास कोष का लाभ उठाना, एनएफडीबी क्षेत्रीय केंद्रों के जरीए नवाचार को बढ़ावा देना, असंगठित क्षेत्र को औपचारिक बनाना, ब्रूड बैंक विकसित करना और केंद्रीय मीठाजल जीवपालन अनुसंधान संस्थान और केंद्रीय अंतर्स्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान में प्रगतिशील किसानों को प्रशिक्षण देना शामिल है.

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण और पंचायती राज, उपराज्य मंत्री प्रो. एसपी सिंह बघेल ने जोर दे कर कहा कि किसानों की आय को दोगुना करना केवल कृषि को संबंधित क्षेत्रों, विशेष रूप से मत्स्यपालन के साथ एकीकृत कर के ही संभव है.

उन्होंने आगे कहा कि पूर्वोत्तर क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना हमारी प्रमुख प्राथमिकताओं में से एक  है, जिस में भूमि और संसाधन सीमाओं को दूर करने के लिए बायोफ्लोक और रीसर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम जैसी नई जलीय कृषि पद्धतियों को अपनाने पर हमें जोर देना है.

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण और अल्पसंख्यक कार्य, उपराज्य मंत्री जौर्ज कुरियन ने पूर्वोत्तर क्षेत्र और केरल में एकीकृत मछलीपालन की पारंपरिक प्रथाओं का जिक्र किया, जिस में टैपिओकासहमछलीपालन और सूअरसहमछलीपालन शामिल है, जिन्हें बेहतर दक्षता के लिए आधुनिक तकनीकों के साथ पुनर्जीवित किया गया है.

राज्य मंत्री जौर्ज कुरियन ने मछली उत्पादन को बढ़ाने और क्षेत्र के मत्स्यपालन के क्षेत्र को और अधिक बढ़ावा देने के लिए नई तकनीकों को अपनाने पर भी जोर दिया.

इस सत्र में एनएफडीबी के मुख्य कार्यकारी डा. बिजय कुमार बेहरा द्वारा ‘पूर्वोत्तर राज्यों में मत्स्यपालन विकास के लिए पर्यावरणीय और पारिस्थितिक चुनौतियों’ और केंद्रीय अंतर्स्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, गुवाहाटी के प्रधान वैज्ञानिक डा. बीके भट्टाचार्य द्वारा ‘पूर्वोत्तर राज्यों में खुले जल मत्स्यपालन संसाधनों का विकास’ पर व्यावहारिक चर्चाएं भी शामिल थीं, जिस ने क्षेत्र में इस सैक्टर के भविष्य पर महत्वपूर्ण दृष्टिकोण साझा किए.

इस सम्मलेन के अवसर पर असम सरकार के मत्स्यपालन मंत्री कृष्णेंदु पौल ने भारतीय मत्स्यपालन क्षेत्र में असम के महत्वपूर्ण योगदान पर चर्चा करते हुए बताया कि असम ने 4.75 लाख मीट्रिक टन का उल्लेखनीय मछली उत्पादन और लगभग 20,000 मीट्रिक टन का निर्यात किया, जिस से मछली किसानों और मछुआरों को काफी फायदा हुआ है.

उन्होंने आगे कहा कि राज्य की 90 फीसदी से अधिक आबादी मछली का सेवन करती है, इसलिए मत्स्यपालन असम की अर्थव्यवस्था में प्रमुख स्थान रखता है. पहाड़ियों में उत्पादन, उत्पादकता और जल भंडारण क्षमता बढ़ाने के लिए पीएमएमएसवाई के तहत परियोजनाओं की पहचान की गई है, जिस का उद्देश्य संसाधनों का कायाकल्प और क्षेत्रीय विकास है.

इस के अलावा जापान के जेआईसीए द्वारा समर्थित असम मत्स्य विकास और ग्रामीण आजीविका परियोजना, समग्र जलीय कृषि विकास पर ध्यान केंद्रित करती है और यह क्षेत्र के लिए स्थायी आजीविका पैदा कर रही है और जमीनी स्तर पर अच्छी तरह से प्रगति कर रही है.

अरुणाचल प्रदेश सरकार के मत्स्यपालन, कृषि, बागबानी, एएचवीडीडी मंत्री गेब्रियल डेनवांग वांगसू ने मत्स्यपालन विकास में राज्य की अपार संभावनाओं को रेखांकित किया और पीएमएमएसवाई के तहत छोटे और शिल्पकार किसानों को समर्थन देने पर जोर दिया.

मंत्री गेब्रियल डेनवांग वांगसू ने अरुणाचल प्रदेश में एक समर्पित शीत जल मत्स्यपालन संस्थान की स्थापना का प्रस्ताव रखा और बीज उत्पादन के बुनियादी ढांचे को बढ़ाने के लिए एकमुश्त अनुदान की वकालत की. खुले पानी में मत्स्यपालन और टिकाऊ तौरतरीकों को अपनाने के अवसरों का जिक्र करते हुए उन्होंने हिमालयी राज्यों की अनूठी ताकतों को संबोधित करने के लिए विशेष रूप से तैयार की गई योजना का भी आह्वान किया.

मिजोरम सरकार के मत्स्यपालन मंत्री पु. ललथनसांगा ने राज्य में मत्स्यपालन विकास में तेजी लाने के लिए प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत मंजूरी और राशि जारी करने में तेजी लाने की आवश्यकता पर जोर दिया. पीएमएमएसवाई के तहत तालाबों के जीर्णोद्धार और कायाकल्प को शामिल करने के महत्व पर प्रकाश डाला गया, क्योंकि ये गतिविधियां मिजोरम के मत्स्यपालन क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं.

इस के अलावा कम उत्पादकता का समाधान निकालने, गुणवत्ता वाले बीज एवं चारे की उपलब्धता में सुधार करना और मछली किसानों के लिए क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण को प्राथमिकता देने आदि की पहचान उन प्रमुख क्षेत्रों के रूप में की गई, जिन पर ध्यान देने की जरूरत है.

मणिपुर सरकार के मत्स्यपालन, समाज कल्याण, कौशल, श्रम, रोजगार और उद्यमिता मंत्री एच. डिंगो सिंह ने राज्य में मत्स्यपालन और जलीय कृषि क्षेत्र पर पीएमएमएसवाई की सफलता को स्वीकार किया. हैचरी, बायोफ्लोक सिस्टम, तालाब, केग कल्चर की स्थापना, सजावटी मछलीपालन, मछली कियोस्क, मूल्यवर्धित उद्यम, रोग निदान सुविधाएं और कोल्ड स्टोरेज इकाइयों की स्थापना से मणिपुर में सामूहिक रूप से बुनियादी ढांचे और अवसरों में बढ़ोतरी हुई है.

त्रिपुरा सरकार के मत्स्यपालन मंत्री सुधांशु दास ने बताया कि राज्य में मछली उत्पादन की क्षमता 2 लाख है, जिस में 38,594 हेक्टेयर क्षेत्र मछलीपालन के लिए है. वर्तमान में 85,000 मीट्रिक टन उत्पादन की तुलना में मांग 117,000 मीट्रिक टन है, जिस की कमी पश्चिम बंगाल, असम और आंध्र प्रदेश से आयात कर के पूरी की जाती है.

मंत्री सुधांशु दास ने बताया कि त्रिपुरा में 98 फीसदी आबादी मछली का सेवन करती है. उन्होंने बायोफ्लोक और मोतीपालन से जुड़ी चुनौतियों पर भी चर्चा की, जिस में इस क्षेत्र की मौसमी निर्भरता को एक प्रमुख कारण बताया.

सिक्किम सरकार के कृषि, बागबानी, पशुपालन व पशु चिकित्सा सेवाएं, मंत्री पूरन कुमार गुरुंग ने पीएमएमएसवाई से राज्य को होने वाले महत्वपूर्ण लाभों पर प्रकाश डाला, जिस में ट्राउट रेसवे हैचरी, जलीय कृषि प्रणाली और सजावटी मछलीपालन जैसी गतिविधियां शामिल हैं.

उन्होंने रेसवे और सजावटी मछली इकाइयों के निर्माण जैसे लंबित प्रस्तावों के लिए समर्थन का अनुरोध किया और मत्स्यपालन प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की मांग की. सिक्किम की जैविक स्थिति पर जोर देते हुए उन्होंने अतिरिक्त समर्थन का आह्वान किया और राज्य के मत्स्य विकास के लिए आईसीएआर संस्थानों के महत्व पर जोर दिया.

नागालैंड सरकार के मत्स्यपालन और जलीय संसाधन मंत्री ए. पंगजंग जमीर ने राज्य के मत्स्य संसाधनों, खासकर नए तालाबों और टैंकों के विकास की महत्वपूर्ण संभावनाओं पर जोर दिया. उन्होंने उत्पादकता बढ़ाने और मछली किसानों की आय को बढ़ाने के लिए एक प्रमुख रणनीति के रूप में एकीकृत मछलीपालन की शुरुआत पर जोर दिया. इस क्षेत्र की इकोटूरिज्म की आशाजनक संभावनाओं की भी पहचान की गई और पहाड़ी क्षेत्रों में मछली परिवहन में सुधार के अवसरों को भविष्य के विकास के क्षेत्र के रूप में देखा गया है.

मत्स्यपालन विभाग, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय में सचिव डा. अभिलक्ष लिखी ने अपने मुख्य भाषण में पीएमएमएसवाई के तहत 1,700 करोड़ सहित पूर्वोत्तर क्षेत्र को आवंटित की गई. साथ ही, 2,000 करोड़ रुपए किनकिन क्षेत्रों को दिए जाएंगे, इस पर भी प्रकाश डाला.

उन्होंने 3 प्रमुख क्षेत्रों पर ज्यादा जोर दिया, जिन में डिजिटलीकरण के माध्यम से मत्स्यपालन को औपचारिक बनाना, राज्य के अधिकारियों से इसे प्राथमिकता देना, ब्याज अनुदान और ऋण गारंटी जैसे वित्तीय साधनों के साथ मत्स्यपालन और जलीय कृषि अवसंरचना विकास निधि को बढ़ावा देना और एफएफपीओ और स्वयं सहायता समूह के माध्यम से एकीकृत खेती को आगे बढ़ाना शामिल है. उन्होंने युवा स्टार्टअप का समर्थन करने और मछली उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए अंतराल को दूर करने का भी आह्वान किया, जिस का लक्ष्य 12 लाख टन है.

मत्स्यपालन विभाग, भारत सरकार में संयुक्त सचिव सागर मेहरा ने भारतीय मत्स्यपालन क्षेत्र की उपलब्धियों पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिस में उत्पादन, उत्पादकता, आय और निर्यात जैसे प्रमुख पहलुओं पर जोर दिया गया.

इस रिपोर्ट में पूर्वोत्तर क्षेत्र में प्रचुर संसाधनों पर भी ध्यान दिया गया. साथ ही, रिपोर्ट में पूर्वोत्तर क्षेत्र में मौजूदा चुनौतियों और कमियों का भी जिक्र किया गया. भविष्य में इस के विकास के लिए रणनीतिक दृष्टिकोण और फोकस क्षेत्रों पर भी चर्चा की गई.

 

‘किसान दिवस’ पर किसानों को मिला सम्मान

बस्ती : प्रधानमंत्री रह चुके चौधरी चरण सिंह के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में आत्मा योजनांतर्गत जनपद स्तरीय किसान मेले का आयोजन कृषि विज्ञान केंद्र, बंजरिया, बस्ती में किया गया, जिस का आरंभ जिलाधिकारी रवीश गुप्ता ने संयुक्त रूप से किया.

हर्रैया के विधायक सरोज मिश्र ने अपने संबोधन में कहा कि प्रदेश सरकार द्वारा संचालित योजनाओं का लाभ जनपद के सभी किसानों को मिले. उन्होंने किसानों से अपील की कि वे मोटे अनाज की खेती करें, जिस से लोगों की सेहत सुधरने के साथ ही किसानों को लाभ भी हो, मोटा अनाज खाने से ब्लडप्रेशर, शुगर, गठिया आदि तमाम तरह की बीमारियां नहीं होती हैं.

जिला पंचायत अध्यक्ष ने किसानों को संबोधित करते हुए बताया कि सरकार द्वारा किसानों के लिए अनेक योजनाएं चल रही हैं. इस समय किसानों को मुफ्त में बिजली भी दी जा रही है. उन्होंने स्व. चौधरी चरण सिंह के योगदान पर विस्तृत से चर्चा करते हुए उन के द्वारा लिए गए निर्णयों से किसानों में कैसे समृद्धि आई, इस पर बताया.

जिलाधिकारी रवीश गुप्ता ने बताया कि कृषि एवं इस के संवर्गी विभागों द्वारा किसानों के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही  हैं. वर्तमान में किसानों की फार्मर रजिस्ट्री की जा रही है. इस से किसान अपने किसान क्रेडिट कार्ड द्वारा फसल बीमा, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि और सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का लाभ ले सकते हैं.

उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि किसान कृषि विभाग द्वारा चलाई जा रही भूमि परीक्षण प्रयोगशाला में मिट्टी की जांच करा कर ही उर्वरक का प्रयोग करें, जिस से लागत में कमी आएगी और उर्वरक पर निर्भरता भी कम होगी.

इस अवसर पर कृषि, उद्यान, रेशम, मत्स्य विभाग, फसल बीमा, इफको, कृषि विज्ञान केंद्र, खाद एवं बीज और पशुपालन विभाग से संबंधित स्टालों का विधायक, जिला पंचायत अध्यक्ष, जिलाधिकारी व मुख्य विकास अधिकारी ने निरीक्षण किया और उन्नतशील कृषि निवेशों, नवीनतम तकनीकी जानकारी एवं शासन द्वारा किसानों के लिए  चलाई जा रही किसान उपयोगी विभिन्न योजनाओं की जानकारी उन्हें दी गई.

इस अवसर पर कृषि समेत उस के संवर्गी जैसे डेयरी, पशुपालन, सब्जी की खेती, मोटे अनाज की खेती, प्राकृतिक खेती आदि के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले किसानों को पुरस्कृत किया गया, जिस में 15 किसानों को प्रथम पुरस्कार, प्रमाणपत्र, शाल के साथ 7,000 रुपए, 15 किसानों को द्वितीय पुरस्कार हेतु प्रमाणपत्र, शाल एवं 5,000 रुपए और विकास खंड स्तर पर 70 किसानों को प्रथम पुरस्कार हेतु प्रमाणपत्र, शाल एवं 2,000 रुपए का पुरस्कार दिया गया. इस के अलावा कृषि सखियों को भी सम्मानित किया गया.

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इस दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि इस समय गेहूं और सरसों की बोआई पूरी हो चुकी है. इस साल बोआई दूसरे सालों की अपेक्षा 10-15 दिन पहले हो गई है, इस से हमारा उत्पादन बढ़ेगा.

उन्होंने आगे बताया कि सरसों की सिंचाई 35-45 दिन के बाद ही करें. सरसों की कच्ची सिंचाई बिलकुल न करें, इस से पौधे मजबूत होते हैं. जिन के गेहूं की पहली सिंचाई हो चुकी हो, वे किसान गेहूं में 10 किलोग्राम प्रति एकड़ जिंक डालें. साथ ही, खरपतवारनाशी का पहले प्रयोग कर फिर उर्वरक का प्रयोग करें. इस के साथ ही गेहूं/सरसों में जिंक के साथ माइक्रोन्यूट्रेंट 3 किलोग्राम प्रति एकड़ डालने से पैदावार बढ़ जाती है. वहीं तिलहनी फसलों में 12 किलोग्राम प्रति एकड़ सल्फर का प्रयोग अवश्य करें. सरसों की पहली सिंचाई के बाद एक बोरी यूरिया प्रति एकड़ प्रयोग करने से उत्पादन अच्छा मिलता है.

उपकृषि निदेशक अशोक कुमार गौतम ने कृषि विभाग एवं संवर्गी विभागों के योजनाओं की विस्तार से जानकारी दी. इस के अलावा मुख्य पशु चिकित्साधिकारी, मुख्य कार्यकारी अधिकारी मत्स्य, जिला उद्यान निरीक्षक, प्रबंधक अग्रणी बैंक, बस्ती आदि ने अपने विभाग से संबंधित योजनाओं की जानकारी दी.

इस अवसर पर हर्रैया के विधायक सरोज मिश्र एवं अखिलेश सिंह, कप्तानगंज के गुलाब चंद्र सोनकर, जिला कृषि अधिकारी, जिला कृषि रक्षा अधिकारी, भूमि संरक्षण अधिकारी, सहायक निदेशक (मृदा परीक्षण/कल्चर), जिला उद्यान अधिकारी, उपदुग्धशाला अधिकारी, जिला प्रबंधक लीड बैंक व अधिक तादाद में किसान उपस्थित रहे.

कपास तेल (Cotton Oil) की खास प्रक्रिया गौसीपोल के लिए मिला पेटेंट

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय ने कपास बीज उत्पादों से गौसीपोल को हटाने के लिए एक रासायनिक प्रक्रिया में पेटेंट हासिल किया है. इस पेटेंट को भारत सरकार की ओर से प्रमाणपत्र मिल गया है.

भारत सरकार के पेटेंट नियंत्रक की ओर से जैव रसायन, कपास अनुभाग, आनुवांशिकी और पौध प्रजनन विभाग द्वारा विकसित इस तकनीक को पेटेंट संख्या 555667 दी गई है. पेटेंट कार्य में डा. शिवानी मानधनिया, डा. राजबीर सांगवान और डा. अरुण ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

कुलपति प्रो बीआर कंबोज ने कहा कि विश्वविद्यालय के लिए यह गौरव की बात है कि कपास के तेल से हानिकारक गौसीपोल यौगिक को हटाने का पेटेंट विश्वविद्यालय को प्राप्त हुआ है. इस से यह तेल खाने के लिए उपयुक्त हो जाता है. ऐसा तेल खाने से सेहत बिगड़ जाती है. गौसीपोलयुक्त तेल के सेवन से सांस लेने में तकलीफ, शरीर के वजन में कमी और कमजोरी आदि के लक्षण दिखाई देते हैं. कपास के तेल से गौसीपोल के दोनों स्टीरियोइसोमर्स को हटाना इस के सेवन के लिए बहुत जरूरी है.

पेटेंटकर्ता वैज्ञानिक डा. शिवानी मानधनिया ने हटाने गौसीपोल की तकनीकी जानकारी साझा करते हुए बताया कि बिनौले के तेल को कार्बनिक विलायक के साथ मिलाया जाता है और कुछ रासायनिक यौगिकों की उपस्थिति में फिल्टर किया जाता है, जो कि एक सोखना और अवशोषित करने के रूप में काम करता है.

उन्होंने पेटेंट के विश्लेषणात्मक कामों में प्रयुक्त उपकरण की खरीद के लिए धनराशि उपलब्ध कराने के लिए राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई), हरियाणा सरकार का आभार व्यक्त किया.

पेटेंट की विशेषताएं:

– इस प्रक्रिया का विशेष गुण यह है कि इस में तेल को बिना उबाले गौसीपोल को हटाया जाता है, जिस से कपास के तेल के प्राकृतिक गुण बने रहते हैं.

– गौसीपोल के दोनों आइसोमर्स (+ और -) को हटाने के अलावा बिनौले के तेल से कुछ भारी धातुओं को भी हटाया गया है.

– इस प्रक्रिया को आम आदमी भी आसानी से न्यूनतम संसाधन की सहायता से गौसीपोल को हटा सकता है.

गैरपारंपरिक खाद्य तेलों में कपास के बीज का तेल अपने उच्च पोषक मूल्य, उच्च स्मोक पौइंट और विटामिन ई की उपस्थिति के कारण सब से अधिक उपयोग किया जाता है. वर्ष 2023 में तकरीबन 1.36 मिलियन मीट्रिक टन कपास के बीज के तेल का उपयोग किया गया. कपास के बीज के तेल का उपयोग आमतौर पर खाद्य उत्पादों, सलाद ड्रैसिंग और मार्जरीन के प्रकारों के उत्पादन के लिए किया जाता है.

कपास अनुभाग के प्रमुख डा. करमल सिंह ने बताया कि यह उपलब्धि वैज्ञानिकों को कपास में बेहतर शोध कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करेगी.

चल कृत्रिम गर्भाधान प्रयोगशाला (अवि मेल) : भारत में भेड़ प्रजनन के क्षेत्र में एक गेमचेंजर

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय भेड़ और ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर ने भेड़ प्रजनन के क्षेत्र में एक अभूतपूर्व नवाचार शुरू किया है. भेड़ों के लिए चल कृत्रिम गर्भाधान प्रयोगशाला, जिसे अवि मेल नाम दिया गया है. पहली बार डिज़ाइन की गई इस अत्याधुनिक सुविधा का उद्देश्य मद समाकलन और कृत्रिम गर्भाधान सेवाओं को सीधे किसानों के दरवाजे पर पहुंचा कर भेड़ प्रजनन के क्षेत्र में क्रांति लाना है.

कई चुनौतियों के चलते भेड़ों में कृत्रिम गर्भाधान लोकप्रिय नहीं रहा है और इस का कम उपयोग किया गया है. भेड़ की सर्विक्स (बच्चेदानी का मुंह) की जटिल शारीरिक रचना के कारण कृत्रिम गर्भाधान के लिए भेड़ यानी मेढ़े के क्रायोप्रिजर्व्ड  सीमेन को, जिसे कई सालों तक महफूज  रखा जा सकता है, उस का सफलतापूर्वक उपयोग नहीं किया जा सकता.

तरल शीतित सीमेन के साथ कृत्रिम गर्भाधान काफी सफल होता है और 50 से 60 फीसदी गर्भधारण दर प्राप्त होती है. हालांकि, उसे बहुत कम समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है और इसे संग्रह के बाद 8 से 10 घंटे में उपयोग करने पर ही वांछित सफलता मिलती है.

इस वजह से कृत्रिम गर्भाधान तकनीक सीमेन स्टेशन के 25 से 30 किलोमीटर के दायरे में किसानों के लिए पहुंच पाती है और देश में भेड़ों के लिए स्थापित सीमेन लैबोरेट्रीज की संख्या न के बराबर है.

इन चुनौतियों को पहचानते हुए भेड़ों में नस्ल सुधार कार्यक्रमों के लिए कृत्रिम गर्भाधान के सफल कार्यान्वयन को सक्षम बनाने के लिए इस प्रौद्योगिकी और किसानों के बीच की खाई को पाटने के लिए ‘अवि मेल’ की अवधारणा लाई गई थी.

भारत सरकार के पशुपालन एवं डेयरी विभाग के राष्ट्रीय पशुधन मिशन द्वारा वित्तीय रूप से समर्थित अवि  मेल, पहियों पर पूरी तरह से सुसज्जित मोबाइल सीमेन प्रयोगशाला है, जिसे दूरदराज के क्षेत्रों में भी फील्ड स्थितियों में संचालित करने के लिए डिजाइन किया गया है.

यह एक रोगाणुहीन वातावरण में उच्चतम मेंड़ों से  स्वच्छ सीमेन संग्रह, मूल्यांकन और प्रसंस्करण की सुविधाएं प्रदान करता है, जिसे भेड़ों के अलावा बकरियों, सूअरों और घोड़ों सहित अन्य पशुओं की प्रजातियों में भी उपयोग किया जा सकता है.

अवि मेल को कृषि एवं पशुपालन क्षेत्रों के प्रमुख व्यक्तियों और विशेषज्ञों से काफी तारीफ मिली है. विभिन्न दौरों के दौरान इस नवाचार की कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ लल्लन सिंह, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के राज्य मंत्री प्रो. एसपीएस बघेल, डेयर सचिव और आईसीएआर के महानिदेशक डा. हिमांशु पाठक, कृषि वैज्ञानिक भरती बोर्ड के अध्यक्ष डा. संजय कुमार, एग्रीनोवेट के सीईओ डा. प्रवीण मलिक, डीएएचडी के पूर्व संयुक्त सचिव (एनएलएम) डा. ओपी चौधरी के साथसाथ अन्य मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी और विभिन्न राज्यों के अनुसंधान संस्थानों, विश्वविद्यालयों और पशुपालन विभागों के विशेषज्ञों ने प्रशंसा की और इसे बड़े स्तर पर प्रयोग करने की अनुशंसा की.

एक प्रायोगिक परीक्षण में राजस्थान के टोंक और जयपुर जिलों के 5 गांवों के 10 किसानों की 450 भेड़ों में कृत्रिम गर्भाधान के लिए अवि मेल का इस्तेमाल किया गया, जिस से 58 फीसदी भेड़ों में एक समय पर उन्नत नस्ल के मेमने प्राप्त हुए.

यह सफलता भेड़ उत्पादकता में सुधार लाने और छोटे किसानों के माली उत्थान में योगदान देने के लिए अवि  मेल की क्षमता को उजागर करती है.

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केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर के निदेशक डा. अरुण तोमर ने ‘अवि  मेल’ की परिवर्तनकारी क्षमता पर जोर देते हुए कहा, “यह नवाचार उन्नत प्रजनन तकनीकों को किसानों के लिए सुलभ बनाने में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, खासकर दूरदराज के क्षेत्रों में और प्रवासी भ्रमणकारी भेड़पालकों के लिए. अवि मेल में कुशल नस्ल सुधार कार्यक्रमों को सक्षम बनाने की क्षमता है, जिस से पशुधन क्षेत्र में भेड़ उत्पादकता और आर्थिक विकास में वृद्धि का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है.”

अवि  मेल को संस्थान के निदेशक डा. अरुण तोमर के मार्गदर्शन में एनएलएम द्वारा वित्तपोषित परियोजना के प्रधान अन्वेषक डा. अजीत सिंह महला और उन की टीम द्वारा बनाया गया है.

डा. अरुण महला ने इस बात पर प्रकाश डाला कि भारत में दुनिया की दूसरी सब से बड़ी भेड़ आबादी होने और पशुओं में कृत्रिम गर्भाधान के 7 दशकों के सफल प्रयोग के बावजूद देश अभी तक भेड़ों में एक वांछनीय कृत्रिम गर्भाधान कवरेज हासिल नहीं कर पाया है. यहां तक कि देशभर में कुल गर्भाधानों की संख्या 4 अंकों तक पहुंचाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है.

उन्होंने बताया कि नीति बनाने वाले इस तकनीक का बड़े स्तर पर प्रयोग सुनिश्चित करने के लिए देशभर में भेड़, बकरी और सूअर जैसी प्रजातियों के लिए वीर्य स्टेशनों या कृत्रिम गर्भाधान प्रयोगशालाओं के लिए बुनियादी ढांचे को बढ़ाने की सिफारिश करते हैं.

संस्थान द्वारा विकसित की गई यह चल कृत्रिम गर्भाधान प्रयोगशाला कम लागत में बुनियादी ढांचे को मजबूत कर प्रजनन तकनीकों को भेड़पालकों तक पहुंचा कर भेड़ प्रजनन के क्षेत्र में  क्रांति लाने की संभावनाएं रखती है.

अवि मेल को राज्य पशुपालन विभागों, शोध संस्थानों, नस्ल सुधार कार्यक्रमों में लगे गैरसरकारी संगठनों और उद्यमियों द्वारा अपनाया जा सकता है. हाल ही में एनएलएम सब्सिडी योजना की शुरूआत ने देशभर में व्यावसायिक भेड़पालन में उल्लेखनीय वृद्धि की है, जिस से इस क्षेत्र का असंगठित से संगठित सैक्टर में परिवर्तन हो रहा है.

इस बदलाव के साथ भेड़ों में कृत्रिम गर्भाधान की खासकर प्रगतिशील किसानों और उद्यमियों के बीच बढ़ती मांग देखी गई है. इस के अलावा अविकानगर जैसी शोध संस्थाओं द्वारा विकसित उच्च मांग वाली भेड़ की नस्लों, जिन की मांग और उपलब्धता में उल्लेखनीय अंतर है , जैसे अविशान जो 2 से 4 मेमने देने के लिए जानी जाती है और अविदुम्बा जो असाधारण वजन और वृद्धि के लिए जानी जाती है, के बेहतर जर्म प्लाज्म के प्रसार के लिए कृत्रिम गर्भाधान  का उपयोग कर भारतीय भेड़ों की उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है.

अविकानगर संस्थान ‘अवि मेल’ जैसी तकनीकों के सफल विकास के साथ नवीन तकनीकों के माध्यम से पशुधन उत्पादकता को आगे बढ़ाने में अपनी अहम भूमिका निभा रहा है  और आधुनिक प्रजनन पद्धतियों को पशुपालकों के दरवाजे तक ला कर संस्थान भारत के भेड़ उद्योग के लिए अधिक टिकाऊ और समृद्ध भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर रहा है.

ड्रैगन फ्रूट परियोजना : चार प्रजातियों का पौधरोपण

भागलपुर : सबौर कृषि विश्वविद्यालय बिहार के उद्यान में ड्रैगन फ्रूट परियोजना के अंतर्गत 4 प्रजातियों का पौधरोपण किया गया. ये प्रजातियां अपने रंग एवं पोषक तत्वों के आधार पर अपनी अलग पहचान बनाती हैं.

प्रमुख रूप से लाल छिलका, सफेद गूदा, जो कि राष्ट्रीय अजैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान, बारामती, महाराष्ट्र से लाया गया है. गुलाबी छिलके, बैगनी गूदे वाली प्रजाति को केंद्रीय द्वितीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अंडमान व निकोबार से लाया गया है. इस के अतिरिक्त पीला छिलका और सफेद गूदे वाली प्रजाति को कांधल एग्रो फार्म लुधियाना से लाया गया है.

परियोजना के अंतर्गत इन चारों प्रजातियों का मूल्यांकन कृषि जलवायु क्षेत्र जोन 3-। के अंतर्गत किया जाना है. वर्तमान समय में बढ़ती हुई कुपोषण की समस्या को देखते हुए ड्रैगन फ्रूट अपने विशिष्ट पोषक तत्वों जैसे प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, लोहा एवं फास्फोरस के समावेश होने से एक उत्तम फल है, जो कुपोषण की समस्या को कम करने में लाभकारी सिद्ध होगा.

ग्रामीण महिलाएं (Rural Women): सहकारिता क्षेत्र में कितनी हिस्सेदारी और क्या हैं योजनाएं

नई दिल्ली : राष्ट्रीय सहकारी डेटाबेस के अनुसार, 28 नवंबर, 2024 तक देश में 25,385 महिला कल्याण सहकारी समितियां पंजीकृत हैं. इस के अलावा देश में 1,44,396 डेयरी सहकारी समितियां हैं, जहां काफी तादाद में ग्रामीण महिलाएं इस क्षेत्र में कार्यरत हैं.

सरकार ने सहकारी समितियों में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न पहल की हैं, जिस में बहुराज्य सहकारी समितियां (एमएससीएस) अधिनियम, 2002 को एमएससीएस (संशोधन) अधिनियम, 2023 के माध्यम से संशोधित किया गया, जिस में एमएससीएस के बोर्ड में महिलाओं के लिए 2 सीटों के आरक्षण के लिए एक विशिष्ट प्रावधान किया गया, जिसे अनिवार्य कर दिया गया है. इस से सहकारी क्षेत्र में लैंगिक समानता को बढ़ावा देने का रास्ता साफ होगा.

वहीँ सहकारिता मंत्रालय द्वारा पैक्स के लिए मौडल उपनियम तैयार किए गए हैं और देशभर के राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा अपनाए गए हैं. इस में पैक्स के बोर्ड में महिला निदेशकों की जरूरत को अनिवार्य किया गया है. इस से 1 लाख से अधिक पैक्स में महिलाओं का प्रतिनिधित्व और उन के द्वारा निर्णय लेना सुनिश्चित हो रहा है.

राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी), सहकारिता मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के तहत एक सांविधिक निगम है, जो पिछले कई सालों से महिला सहकारी समितियों की सामाजिकआर्थिक स्थिति को सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, जिस से उन्हें व्यवसाय मौडल आधारित गतिविधियां अपनाने में सक्षम बनाया जा सके.

एनसीडीसी विशेष रूप से महिला सहकारी समितियों के लिए निम्नलिखित योजनाओं को लागू कर रहा है :

स्वयंशक्ति सहकारी योजना : इस योजना के अंतर्गत महिला स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) को सामान्य/सामूहिक सामाजिकआर्थिक गतिविधियों के लिए पर्याप्त बैंक ऋण की सुविधा के लिए 3 साल तक के लिए कार्यशील पूंजी ऋण प्रदान किया जाता है.

नंदिनी सहकार : इस योजना के तहत महिला सहकारी समितियों को 5-8 साल तक की अवधि के लिए सावधि ऋण प्रदान किया जाता है, जिस में सावधि ऋण पर 2 फीसदी तक की ब्याज छूट दी जाती है. इस योजना के तहत वित्तीय सहायता एनसीडीसी को सौंपे गए व्यवसाय योजना आधारित गतिविधि/सेवा के लिए प्रदान की जाती है.

इस के अलावा सहकारिता मंत्रालय, नाबार्ड, एनडीडीबी, एनएफडीबी और राज्य सरकारों के साथ मिल कर भारत में सहकारिता आंदोलन को मजबूत करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहा है. इस में सभी पंचायतों/गांवों में नई बहुद्देशीय पैक्स, डेयरी और मत्स्य सहकारी समितियों की स्थापना करना शामिल है. प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए, एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) शुरू की गई है. एनडीडीबी को 1,03,000 से अधिक डेयरी सहकारी समितियों के गठन/मजबूतीकरण का काम सौंपा गया है.

इस के अतिरिक्त गुजरात में “सहकारी समितियों के बीच सहयोग” पायलट परियोजना का उद्देश्य प्राथमिक डेयरी सहकारी समितियों को बिजनैस कौरेसपोंडेंट/बैंक मित्र बना कर और सदस्यों को रुपे केसीसी प्रदान कर के उन्हें सशक्त बनाना है. इस पहल का उद्देश्य डेयरी सहकारी समितियों में काफी संख्या में ग्रामीण महिलाओं को शामिल कर के उन की बाजार तक पहुंच को बढ़ाना और उन के वित्तीय व सामाजिक सशक्तीकरण में योगदान देना है.

एमएससीएस (संशोधन) अधिनियम, 2023 के तहत सहकारी चुनाव प्राधिकरण की स्थापना की गई है और इस ने बहुराज्य सहकारी समितियों के 70 चुनाव आयोजित किए हैं और बोर्ड में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की है.

एनसीडीसी ने 31 मार्च, 2024 तक विशेष रूप से महिलाओं द्वारा प्रवर्तित सहकारी समितियों के विकास के लिए क्रमशः 7,708.09 करोड़ रुपए और 6,426.36 करोड़ रुपए की संचयी वित्तीय सहायता स्वीकृत और वितरित की है.

भारत सरकार ने गुजरात राज्य के पंचमहल और बनासकांठा जिलों में “सहकारी समितियों के बीच सहयोग” नामक एक पायलट परियोजना लागू की है, जिस के तहत प्राथमिक डेयरी सहकारी समितियों को जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों (डीसीसीबी) का बिजनैस कौरेसपोंडेंट/बैंक मित्र बनाया गया है और सदस्यों को माइक्रोएटीएम प्रदान किए गए हैं.

इस के अलावा डेयरी सहकारी समितियों के सदस्यों (विशेष रूप से महिला सदस्यों) को उन की तत्काल वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए डीसीसीबी द्वारा रुपे केसीसी प्रदान किया जा रहा है. पायलट प्रोजैक्ट के दौरान दोनों जिलों में डीसीसीबी ने अपने सदस्यों को 22,344 रुपे केसीसी जारी किए हैं, जिन में 6,382 पशुपालन केसीसी शामिल हैं, जिस का लाभ ज्यादातर महिलाओं को मिला है. मंत्रालय ने ग्रामीण महिलाओं के सशक्तीकरण पर इन पहलों के प्रभाव के लिए कोई विशेष अध्ययन नहीं किया है.

Agriculture News : हकृवि कार्यशाला (Workshop) में 19 सिफारिशें स्वीकृत

हिसार : चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कृषि महाविद्यालय के सभागार में आयोजित 2 दिवसीय राज्य स्तरीय कृषि अधिकारी कार्यशाला (Workshop) का समापन हुआ, जिस में मुख्य अतिथि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बीआर कंबोज रहे. इस कार्यशाला (Workshop) में प्रदेशभर के कृषि अधिकारियों और हकृवि के वैज्ञानिकों द्वारा रबी फसलों की समग्र सिफारिशों के बारे में विस्तृत चर्चा की गई और कई महत्वपूर्ण तकनीकी पहलुओं पर विचारविमर्श किया गया.

कुलपति प्रो. बीआर कंबोज ने कहा कि इस कार्यशाला में 19 सिफारिशें स्वीकृत की गई हैं, जिन में एक गेहूं, दो वसंतकालीन मक्का, एक मसूर, एक चारा जई की एवं एक औषधीय फसल बाकला के अलावा गरमी के मौसम में मक्का को चारे की फसल के रूप में उगाने के लिए समग्र सिफारिश, धानगेहूं फसलचक्र में पराली प्रबंधन, गन्ने की फसल में चोटी बेदक व कंसुआ कीट की रोकथाम और एकीकृत कृषि प्रणाली के लिए फसल चक्र भी शामिल हैं.

कार्यशाला (Workshop) में हकृवि के वैज्ञानिकों एवं कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के अधिकारियों द्वारा संयुक्त रूप से की गई इन सिफारिशों से किसानों को फायदा होगा. उन्होंने बताया कि इस कार्यशाला  (Workshop) में दी गई कृषि से संबंधित सिफारिशों से केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा किसानों की आय बढ़ाने के लिए किए जा रहे कार्यों को और गति मिलेगी.

कुलपति प्रो. बीआर कंबोज ने वैज्ञानिकों से आह्वान किया कि वे कम जोत के किसानों की समस्या को पहले अच्छे ढंग से समझें, उस के बाद उन समस्या के निवारण पर शोध करें.

इस अवसर पर कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के अतिरिक्त निदेशक डा. आरएस सोलंकी, डा. रमेश वर्मा, डा. एचएस सहारण सहित विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक एवं कृषि और किसान कल्याण विभाग के अधिकारी मौजूद रहे. मंच का संचालन डा. सुनील ढांडा ने किया.

कार्यशाला (Workshop)

इस कार्यशाला (Workshop) में 19 सिफारिशें स्वीकृत हुई हैं, जिन में मुख्य निम्रलिखित हैं :

डब्ल्यूएच 1402 : गेहूं की यह बौनी किस्म सूखा सहनशील एवं अगेती बिजाई के लिए उपयुक्त है. डब्ल्यूएच 1402 की औसत पैदावार 20.1 क्विंटल प्रति एकड़ व उत्पादन क्षमता 27.2 क्विंटल प्रति एकड़ है. यह किस्म अत्यंत रोगरोधी है और गुणवत्ता में उत्तम है.

आईएमएच 225 : यह मक्का की पीले दाने व मध्यम अवधि वाली एकल संकर किस्म है, जो वसंत ऋतु में 115-120 दिन में पक कर तैयार हो जाती है. यह किस्म राष्ट्रीय स्तर पर मक्का की मुख्य बीमारियों व कीटों के अवरोधी व मध्यम अवरोधी पाई गई है. इस की औसत पैदावार 36-38 क्विंटल प्रति एकड़ है.

आईएमएच 226 : यह मक्का की हलकी नारंगी दाने व मध्यम अवधि वाली एकल संकर किस्म है, जो वसंत ऋतु में 115-120 दिन में पक कर तैयार हो जाती है. यह किस्म मुख्य बीमारियों व कीटों के अवरोधी व मध्यम अवरोधी पाई गई है. इस की औसत पैदावार 34-38 क्विंटल प्रति एकड़ है.

एलएच 17-19 : मसूर की इस छोटे दाने वाली किस्म भारत के उत्तरपश्चिमी क्षेत्रों में काश्त के लिए अनुमोदित की गई है. मध्यम अवधि वाली यह किस्म 6.0 – 6.5 क्विंटल प्रति एकड़ की औसत पैदावार देती है.

आरएच 1975 : इस किस्म की सिफारिश जम्मू, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली एवं उत्तरी राजस्थान के सिंचित क्षेत्रों में समय पर बिजाई के लिए की गई है. यह किस्म 145 दिनों में पक कर 10.5-11.5 क्विंटल प्रति एकड़ औसत पैदावार देती है. इस किस्म में तेल की औसत मात्रा 39.3 फीसदी है.

एचएफओ 906 : एक कटाई वाली चारा जई की इस किस्म की हरियाणा के लिए सिफारिश की गई है. यह किस्म 262.00 क्विंटल प्रति एकड़ हरे चारे की पैदवार देती है.

हरियाणा बाकला 3 : इस किस्म की औसत उपज 9.5 क्विंटल प्रति एकड़ है और इस की अधिकतम उपज 20 क्विंटल प्रति एकड़ है. इस में प्रोटीन की मात्रा 28 फीसदी होती है. इस की खेती हरियाणा के सिंचित और अर्धसिंचित क्षेत्रों में की जा सकती है.

– धानगेहूं फसल चक्र में पराली प्रबंधन के लिए स्ट्रा मैनेजमेंट सिस्टम लगे हुए कंबाइन हार्वेस्टर द्वारा धान की कटाई के उपरांत पराली को मिट्टी में मिलाने के साथसाथ गेहूं की बिजाई के लिए सुपर सीडर का उपयोग करें. इस मशीन से गेहूं की बिजाई करने पर परंपरागत विधि की तुलना में 43 फीसदी ईंधन, 36 फीसदी मेहनत और 40 फीसदी बिजाई लागत की बचत होती है.

– गन्ने की फसल में चोटी बेदक व कंसुआ कीट की रोकथाम के लिए अप्रैल माह के अंत से मई माह के पहले सप्ताह तक क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 18.5 फीसदी एससी (कोराजन/सिटीजन) 150 मिलीलिटर प्रति एकड़ की दर से 400 लिटर में मिला कर पीठ वाले पंप से मोटा फव्वारा बना कर फसल के जड़ क्षेत्र में डाल कर हलकी सिंचाई करें.

– गरमी के मौसम में मक्का को चारे की फसल के रूप में उगाने के लिए समग्र सिफारिश.

– एकीकृत कृषि प्रणाली की एक हेक्टेयर मौडल पर शोध के आधार पर मूंगगेहूं (देसी) + सरसों (10:2), मक्का+लोबिया-जई-मीठी सूडानघास एवं मूंगसरसोंमूंग फसल चक्रों की सिफारिश की गई.