काला नमक धान की खेती करने वाले किसानों मिलेगी विशेष पहचान

बस्ती : बस्ती जिले की आबोहवा में पैदा होने वाले धान की खास किस्म काला नमक धान की खेती करने वाले किसानों की भी जीआई टैगिंग की जाएगी, जिस से इन किसानों को काला नमक धान के उत्पादन और इस के बिजनैस का विशेष अधिकार मिल जाएगा.

बस्ती जिले सहित पूर्वांचल के जिलों में किसानों द्वारा उत्पादित सुगंधित धान काला नमक दुनिया के सभी उन्नत किस्मों को मात देने वाला है. बस्ती जिले के सैकड़ों किसान काला नमक धान के देशी किस्म सहित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा ईजाद की गई उन्नत बौनी किस्मों की खेती कर रहे हैं, जो अधिक उत्पादन के साथ ही ज्यादा पैदावार देने वाली है.

काला नमक धान की इन किस्मों में प्रोटीन, आयरन और जिंक जैसे पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. इस में जहां जिंक चार गुना, आयरन तिगुना और प्रोटीन दोगुना अन्य किस्मों की तुलना में अधिक पाया जाता है. यही वजह है कि काला नमक चावल को कुपोषण दूर करने के लिए भी खाया जाता है.

जनपद के किसानों द्वारा बनाए गए सिद्धार्थ एफपीओ द्वारा लगातार काला नमक धान की खेती को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित किया जा रहा है, जिस से उन की आमदनी को बढाया जा सके, क्योंकि काला नमक चावल की ऊंची कीमत आम चावल के मुकाबले चार गुना तक अधिक मिलती है और चावल बेचने के लिए भी किसानों को परेशान नहीं होना पड़ता है.

नेशनल अवार्डी प्रगतिशील किसान और सिद्धार्थ एफपीओ के निदेशक राममूर्ति मिश्र ने बताया कि बस्ती जिले में काला नमक धान की खेती करने वाले 35 किसानों का आवेदन अभी जीआई टैग के लिए संदीप वर्मा, ज्येष्ठ (कृषि) विपणन निरीक्षक को उपलब्ध कराया गया है. इन किसानों के काला नमक धान के जीआई टैगिंग हो जाने से उन्हें मूल उत्पादक की श्रेणी मिल जाएगी.

किसानों के स्वयं के नाम से होगी जीआई टैगिंग

किसान राम मूर्ति मिश्र ने बताया कि काला नमक धान के लिए 11 जिलों को जीआई टैग मिला था. लेकिन इस बार यह जीआई टैग किसानों के नाम से स्वयं होगा. इस से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में काला नमक चावल की कीमत और मांग बढ़ जाएगी.

कौन देगा जीआई टैग

राममूर्ति मिश्र ने बताया कि भौगोलिक संकेत यानी जीआई टैग एक प्रतीक है, जो मुख्य रूप से किसी उत्पाद को उस के मूल क्षेत्र से जोड़ने के लिए दिया जाता है. उन्होंने जानकारी दी कि जीआई टैग बताता है कि विशेष उत्पाद किस जगह पैदा होता है.

उन्होंने यह भी बताया कि जीआई टैग उन उत्पादों को ही दिया जाता है, जो अपने क्षेत्र की विशेषता रखते हैं. काला नमक धान भी उन्हीं में से एक है.

उन्होंने बताया कि भारत द्वारा संसद में वर्ष 1999 में रजिस्ट्रेशन एंड प्रोटेक्शन एक्ट के तहत ‘जियोग्राफिकल इंडिकेशंस औफ गुड्स’ लागू किया था, जिस के तहत ही जीआई टैगिंग की जाती है.

धान की फसल का कीड़ों से बचाव

धान की खेती हमारे देश में तकरीबन 42.3 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल में होती है. देश में खाद्यान्न उत्पादन का तकरीबन 42 फीसदी धान है और देश में तकरीबन 75 फीसदी लोगों का भोजन भी चावल ही है.

धान खरीफ की फसल है. जिस तरह धान की फसल लेने के लिए नम व गरम आबोहवा की जरूरत होती है, ठीक उसी तरह से कीट की बढ़वार और प्रजनन के लिए भी इसी तरह की जलवायु की जरूरत होती है. इसी वजह से धान की फसल पर अनेक कीटों का हमला होता है.

यही वजह है कि फसल को कम नुकसान पहुंचाने वाले कीट भी नुकसान पहुंचाने लगते हैं. कीटों की वजह से धान की फसल में तकरीबन 10-15 फीसदी उत्पादन में कमी आ जाती है.

मुख्य कीट और बचाव

पीला तना बेधक :

इस कीट की मादा के अगले जोड़ी पंख पीले रंग के होते हैं जिन के मध्य में काले रंग का बिंदु होता है. कीड़े के पिछले पंख भूसे के रंग जैसे होते हैं. मादा कीट की उदर की नोक पर भूरे पीले रंग का गुच्छा होता है.

इस कीट की पूरी तरह से विकसित सूंड़ी का रंग पीला सफेद होता है. इस कीड़े के प्रौढ़ रात में घूमते हैं. कीड़े की मादा रात में 7 से 9 बजे के बीच अपने अंडे मुलायम पत्तियों की नोक पर देती है.

मादा गुच्छों में 100 से 200 अंडे देती है. अंडे 7-8 दिन में फूट जाते हैं और उन से सूंडि़यां निकल आती हैं. नवजात सूंड़ी पत्ती की ऊपरी सतह पर चढ़ कर रेशमी धागों के सहारे दूसरे पौधों पर पहुंच जाती है.

शुरुआती अवस्था में इस कीट की सूंड़ी पत्ती के ऊपर धारी सी बना कर खाती है. तकरीबन 1 हफ्ते बाद सूंड़ी तने में छेद कर के अंदर घुस जाती है और नुकसान पहुंचाती है.

इस कीट का प्रकोप फसल की बढ़वार अवस्था में होता है और पौधे का नया बढ़ने वाला भाग यानी बीच की पत्ती वाला भाग सूख जाता है. इसे मृत गोभ कहते हैं. इस गोभ को आसानी से बाहर खींचा जा सकता है.

फसल की बाली में प्रकोप होने पर कुछ पौधों की बालियां अंदर ही अंदर सूख जाती हैं और बाहर नहीं निकलती हैं. पौधों में बालियां निकलने के बाद जब कीट का हमला होता है तब बालियां सूख कर सफेद दिखाई देती हैं और उन में दाने नहीं पड़ते हैं. इन्हें सफेद बाली कहते हैं. इस कीड़े द्वारा नुकसान करने पर फसल के उत्पादन में भारी कमी आ जाती है.

भूरा फुदका :

इस कीड़े का रंग हलका भूरा होता है. आकार पच्चर की तरह होता है. इस कीट की मादा पत्ती की मध्य शिरा के पास खुरच कर या पत्ती के पर्णच्छंद को खुरच कर 250 से ले कर 300 तक समूह में अंडे देती है.

एक समूह में 15-30 अंडे होते हैं. ये अंडे बेलनाकार व सफेद रंग के होते हैं. अनुकूल वातावरण में अंडे 5-8 दिन में फूट जाते हैं. इस कीट के शिशु व प्रौढ़ दोनों ही पौधे के तने से रस को चूस कर फ्लोयम व जाइलम को बंद कर देते हैं.

इस कीट के प्रकोप से पत्तियां सूख कर भूरी हो जाती हैं और फसल की इस अवस्था को फुदका झुलसा रोग कहा जाता है.

इस कीट का प्रकोप अगर फसल की बढ़वार अवस्था में होता है तो पौधों में बालियां नहीं निकलती हैं. अगर कीट का हमला फूल के गुच्छे निकलने के बाद होता है तो ज्यादातर बाली में दाने नहीं बनते हैं. इस कीट के हमले से कभीकभी पूरी फसल चौपट हो जाती है.

सफेद पीठ वाला फुदका :

इस कीड़े के हर अगले पंख के पिछले सिरे के मध्य में एक सुस्पष्ट काला धब्बा होता है जो अगले पंखों के एकसाथ आने पर मिल जाता है. इस कीड़े का पृष्ठक हलके पीले रंग का होता है. इस कीड़े के प्रौढ़ काले भूरे रंग के होते हैं व शरीर का रंग हलका पीला होता है. इस कीड़े के अगले व पिछले पंखों के जोड़ पर सफेद रंग की पट्टी होती है.

एक मादा अपने जीवनकाल में 500-600 अंडे देती है. 5-6 दिन बाद अंडों से शिशु निकलते हैं. शिशु का रंग हलका भूरा होता है. इस कीड़े के शिशु व प्रौढ़ दोनों ही पत्तियों का रस चूसते हैं. नतीजतन, नीचे की पत्तियां पीली पड़ कर मुरझा जाती हैं और छोटे पौधे सूख जाते हैं, वहीं बड़े पौधे से कल्ले निकलने में देरी हो जाती है. इस वजह से बालियों की तादाद कम रह जाती है और फसल का उत्पादन घट जाता है. इस कीट के प्रकोप से चावल की क्वालिटी भी प्रभावित होती है.

हरा फुदका :

हरा फुदका कीड़े के शिशु व प्रौढ़ दोनों ही पच्चर की शक्ल और हरे रंग के होते हैं. इन के अगले पंखों के ऊपर काले रंग के धब्बे होते हैं और पंखों के बाहरी किनारे भी काले रंग के होते हैं. ये कीड़े रोशनी के प्रति काफी आकर्षित होते हैं. इस कीड़े के शिशु व प्रौढ़ दोनों ही पत्तियों से रस चूसते हैं. इस के चलते पौधे पीले पड़ जाते हैं और छोटे भी रह जाते हैं. जब कीड़े का प्रकोप ज्यादा होता है तो पौधे की पत्तियां भूरे रंग की हो जाती हैं.

यह कीड़ा टुग्रो नामक विषाणु का वाहक है. फसल में इस विषाणु के हमले के फलस्वरूप पौधे पीले पड़ जाते हैं और उन का फुटाव भी कम पड़ जाता है. टुग्रो प्रभावित पौधों से जो बालयां निकलती हैं, उन में दानों की तादाद भी कम होती है.

पत्ती लपेटक :

इस कीड़े का प्रौढ़ भूरे नारंगी रंग का होता है. इस कीट के पंख के किनारे भूरे रंग के होते हैं. इस कीड़े की मादा संगम के बाद 1-2 दिन के बाद अंडे देना शुरू कर देती है. मादा कीड़ा 300 अंडे तक देती है जो हलके पीले रंग के होते हैं. अंडे पत्ती की मध्य शिरा के आसपास दिए जाते हैं. अंडे 6-8 दिन में फूटने लगते हैं. सूंड़ी की अवधि 15-17 दिन रहती है.

इस कीट की प्रथम अवस्था सूंड़ी इधरउधर घूमती है और अपनी लार द्वारा रेशमी धागा बना कर पत्ती के किनारों को जोड़ लेती है और अंदर ही रह कर पत्ती के हरे भाग को खुरचखुरच कर खाती है. इस से पत्ती पर शुरू में सफेद धारी दिखाई देती है और धीरेधीरे ये पत्तियां सूख जाती हैं. पत्तियों के सूखने से पौधा कमजोर पड़ जाता है और फसल का उत्पादन घट जाता है.

गंधी बग : इस कीड़े के प्रौढ़ तकरीबन 15 मिलीमीटर लंबे व पीलापन लिए चपटे हरे रंग के होते हैं. इस कीट के शिशु भी हरे रंग के होते हैं. मादा कीट पत्तियों की निचली सतह पर लाइनों में अंडे देती है. एक मादा अपने जीवनकाल में तकरीबन 150 से 250 अंडे देती है. इस कीड़े को अगस्त से नवंबर माह तक खेतों में देखा जा सकता है.

शुरुआती अवस्था में यह कीट धान के खेतों की मेंड़ों पर उगे खरपतवारों पर अपना जीवनयापन करते हैं. लेकिन जैसे ही सितंबरअक्तूबर माह में जब बालियां दूधिया अवस्था में होती हैं, वयस्क कीड़े दानों से रस चूस लेते हैं. इस के फलस्वरूप बाली दानों से खाली रह जाती है. इस कीड़े के हमले से दानों के टूटने की संभावना बढ़ जाती है. इस कीड़े से एक विशेष प्रकार की गंध आती है. इसी वजह से इस कीड़े को गंधी बग भी कहते हैं.

कीड़ों से बचाव के ऐसे उपाय

कीड़ों के आने का पता लगाएं:

* पीला तना भेदक कीड़े की निगरानी के लिए 5 फैरोमौन ट्रैप प्रति हेक्टेयर के हिसाब से लगाएं.

* खेत में फूल आने से पहले प्रकाश प्रपंच लगा कर कीड़ों को आकर्षित कर मार देना चाहिए.

* खेत व नर्सरी में कीड़ों की तादाद का पता लगाने के लिए जाल ट्रैप से स्वीप कर पता लगा लें.

कृषि क्रियाएं :

* धान के कीड़े प्रतिरोधी किस्मों की रोपाई और बोआई करनी चाहिए.

* स्वस्थ बीज व स्वस्थ नर्सरी पौधों का इस्तेमाल करना चाहिए.

* फसल में संतुलित मात्रा में उर्वरकों का इस्तेमाल करना चाहिए. ज्यादा यूरिया के इस्तेमाल से पत्ती लपेटक कीट का प्रकोप फसल पर देखा जाता है, जबकि पोटाश का इस्तेमाल करने पर कीड़े का प्रकोप कम होता है.

* गरमी में गहरी जुताई करनी चाहिए, जिस से कीड़े की सुषुप्तावस्था को नष्ट किया जा सके.

* फसल की जल्दी रोपाई कर देनी चाहिए ताकि कीड़े के हमले से पहले पौधे की लंबाई सही बढ़ चुकी हो.

* गाल मिज के हमले के समय खेत में पानी भरा हो तो उसे तुरंत निकाल देना चाहिए क्योंकि पानी भरे खेत में गाल मिज का हमला ज्यादा पाया जाता है.

* मुख्य खेत में पौधे की रोपाई से पहले नर्सरी पौधे की ऊपर की तरफ यानी नोक की तरफ से 1.5-2.0 इंच पत्तियों को काट देना चाहिए ताकि मुख्य खेत में कीट के अंडे न पहुंच पाएं.

* खेत में पक्षियों के बैठने के लिए बांस के डंडे यानी बर्डपर्चर लगा देने चाहिए, ताकि पक्षी डंडों पर बैठ कर कीटों को खाते रहें. फसल में बाली निकलने पर?डंडों को उखाड़ कर रख लेना चाहिए.

यंत्रों से रोकथाम :

* धान के खेत के आसपास मेंड़ों पर खड़े खरपतवारों के साथसाथ घास को उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए ताकि खरपतवार और घास पर पनपने वाले कीड़े धान की फसल को नुकसान न पहुंचाएं.

* कीटों के समूह को एकत्र कर नष्ट कर देना चाहिए.

* पीला तना बेधक कीट के प्रकोप से बचने के लिए लंबी बढ़ने वाली प्रजातियों को बांध कर रखना चाहिए.

* पानी के साथसाथ जो सूडि़यां खोल सहित दूसरे खेत में बह कर जाती हैं, उन को रोकना चाहिए.

* फूल आने से पहले खेत में खोल सहित सूंडि़यों को रस्सी से हिला कर इकट्ठा कर नष्ट कर देना चाहिए.

व्यावहारिक विधि

* पीला तना बेधक कीट के प्रकोप से बचने के लिए खेत में 20 फैरोमौन ट्रैप प्रति हेक्टेयर के हिसाब से लगाएं ताकि तना बेधक कीट के प्रौढ़ नर ट्रैप में इकट्ठा हो कर मरते रहें. पौधों की रोपाई के 20 दिन बाद और 10-12 दिन बाद ल्यूर को बदलते रहना चाहिए.

जैविक विधि द्वारा रोकथाम

* सूंड़ी परजीवी प्लेटीगेस्टर ओराइजी का इस्तेमाल गाल मिज के प्रकोप वाली फसल में करना चाहिए.

* भूरा फुदका कीट के लिए क्रटोरहिनस लिविडिपेनिस 50-75 अंडे प्रति वर्गमीटर के अंतराल पर और 3 परभक्षी मकड़ी लाइकोसा स्यूडोनोलेटा प्रति पौधा खेत में छोड़ना चाहिए.

* 1.5 किलोग्राम लहसुन को पीस कर रातभर पानी में भिगो दें. सुबह पानी को छान कर उस में 250 ग्राम गुड़ और 200 ग्राम कपड़े धोने वाला साबुन मिला दें. पानी की मात्रा को 150 लिटर कर के उस का छिड़काव फसल पर करें. ऐसा करने से गंधी बग दानों से रस नहीं चूस पाएगा.

* अगर फसल के अंदर मित्र जीव जैसे मिरिड बग और तमाम तरह की मकडि़यां नियंत्रण कर रही हैं तो इन का संरक्षण करना चाहिए.

* नीम की निंबोली की 5 किलोग्राम मात्रा कूटपीस कर रातभर 25 लिटर पानी में भिगोएं. निंबोली का सफेद रस निकाल कर उसी पानी में डालें. पानी में 250 ग्राम कपड़े धोने वाला साबुन मिला कर पानी को छान लें और इस पानी की मात्रा को 100 लिटर कर के फसल पर छिड़काव करें.

* बिवेरिया बेसियाना की 2.5 किलोग्राम मात्रा को 500-600 लिटर पानी में मिला कर छिड़कें.

* फसल रोपने के एक महीने बाद या खेत में तना बेधक कीट के अंडे दिखाई देने पर ट्राईकोग्रामा जपोनिकम के 75000-1,00000 अंडे प्रति हेक्टेयर की दर से ट्राइकोकार्ड को काट कर पत्तियों के नीचे लगाना चाहिए. इस प्रक्रिया को 5-6 बार 8-10 दिन के अंतराल पर दोहराना चाहिए.

कीटनाशी द्वारा रोकथाम

* नर्सरी में बोते समय कार्बोफ्यूरान 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से या फोरेट 12.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से नर्सरी में डालना चाहिए.

* कीट की तादाद के आधार पर फोलीडाल या कार्बारिल 5 फीसदी धूल का 20-25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बुरकाव करें.

* यदि तना बेधक कीट का प्रकोप दिखाई दे तो कौरटौप हाइड्रोक्लोराइड 4 जी की 18 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर के हिसाब से सूखी रेत या राख में मिला कर खेत में बिखेर देनी चाहिए.

* कीटनाशक का प्रयोग करते समय खेत में हलका पानी खड़ा रहना चाहिए. 0.5 मिलीलिटर कोराजन की मात्रा प्रति लिटर पानी की दर से छिड़कना चाहिए.

* यदि पौधे के प्रति झुंड पर 10 कीट दिखाई दें तो फसल के ऊपर इथोफेनप्रौक्स 20 ईसी की 1 मिलीलिटर या डाईक्लोरोवास 1 मिलीलिटर व वीपीएमसी की 1 मिलीलिटर के मिश्रण को एक लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें या क्विनालफास 25 ईसी (1.5 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी की दर से) या इथोफेनप्रौक्स 20 ईसी या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल (1 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी की दर से) का छिड़काव करें.

नीलहरित शैवाल  जैव उर्वरक : बढ़ाए पैदावार

समुचित विकास के लिए पौधे में नाइट्रोजन एक जरूरी पोषक तत्त्व है. रासायनिक उर्वरकों के अलावा शैवाल और जीवाणुओं की कुछ प्रजातियां वायुमंडल में नाइट्रोजन (80 फीसदी) का स्थिरीकरण कर मिट्टी और पौधों को देती हैं और फसल की उत्पादकता में बढ़वार करती हैं. इस क्रिया को जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण कहते हैं. इन सूक्ष्म जीवाणुओं को ही जैव उर्वरक कहते हैं.

नीलहरित शैवाल एक विशेष प्रकार की काई होती है. इन की कई प्रजातियां होती हैं, जिस में आलोसाइरा, नास्टाक, एनाबीन, सिटोनिमा, टालिपोथ्रिक्स, वेस्टीवापसिस वगैरह प्रमुख हैं.

नाइट्रोजन स्थिरीकरण की क्रिया शैवाल की संरचना में स्थित एक विशिष्ट प्रकार की कोशिका होती है, इसे हैटेरोसिस्ट कहते हैं. यह सामान्य कोशिकाओं से संरचना करने में अलग होती है. इस का निर्माण सामान्य कोशिकाओं में ही कोशिकाभित्ति मोटी होने और कुछ आंतरिक परिवर्तनों के फलस्वरूप होता है.

नीलहरित शैवाल यानी बीजीए धान के लिए महत्त्वपूर्ण जैव उर्वरक है. इस के प्रयोग से 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर (25 फीसदी) रासायनिक नाइट्रोजन की बचत और धान के उत्पादन में 8-10 फीसदी की बढ़ोतरी होती है. साथ ही, जमीन की उर्वरक क्षमता में बढ़ोतरी होती?है. धान के खेत का वातावरण नीलहरित शैवाल की बढ़वार के लिए मुफीद होता है. इस की बढ़ोतरी के लिए जरूरी तापमान, समुचित रोशनी, नमी और पोषक तत्त्व की मात्रा धान के खेत में मौजूद रहती है.

नीलहरित शैवाल द्वारा स्थिर किया गया नाइट्रोजन पौधों को शैवाल की जीवित अवस्था में ही मिल जाता है या शैवाल कोशिकाओं के मृत होने के बाद जीवाणुओं द्वारा विघटन होने पर मिलता है.

उत्पादन की विधि

नीलहरित शैवाल जैव उर्वरक उत्पादन के लिए 5 मीटर लंबा, 1 मीटर चौड़ा और 8-10 इंच गहरा पक्का सीमेंट का टैंक बना लें. टैंक की लंबाई जरूरत के मुताबिक घटाई या बढ़ाई जा सकती है. टैंक ऊंची व खुली जगह पर होना चाहिए. सीमेंट के टैंक के स्थान पर कच्चा गड्ढा भी बना सकते हैं. कच्चे गड्ढ़े में तकरीबन 400-500 गेज मोटी पौलीथिन बिछा लें. खेत के स्थान पर खुली छतों पर भी 2 इंच ऊंचा गड्ढा व टैंक बना सकते हैं.

टैंक व गड्ढे में 4-5 इंच तक पानी भर लें और प्रति वर्गमीटर के हिसाब से एक किलोग्राम खेत की साफसुथरी भुरभुरी मिट्टी, 100 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट व 10 ग्राम कार्बोफ्यूरोन डाल कर अच्छी तरह मिला कर 2-3 घंटे के लिए टैंक को छोड़ दें. मिट्टी बैठ जाने पर 100 ग्राम प्रति वर्गमीटर के हिसाब से उच्च गुणवत्ता का शैवाल र्स्टाटर कल्चर पानी के ऊपर समान रूप से बिखेर दें. 8-10 दिन में शैवाल की मोटी परत बन जाती है. साथ ही, पानी भी सूख जाता है. यदि तेज धूप या किसी दूसरी वजह से शैवाल परत बनाने से पहले ही पानी सूख जाए तब टैंक में और पानी सावधानीपूर्वक किनारे से धीरेधीरे डालें, जिस से शैवाल की मोटी परत टूटने न पाए. 8-10 दिन बाद काई की मोटी परत बनने के बाद भी अगर गड्ढे व टैंक में पानी भरा हो तो उसे डब्बे वगैरह से सावधानीपूर्वक बाहर निकाल दें. इस के बाद टैंक व गड्ढे को धूप में सूखने के लिए छोड़ दें. सूख जाने पर शैवाल कल्चर को इकट्ठा कर पौलीथिन बैग में भर कर खेतों में प्रयोग करने के लिए रख लें.

फिर उपरोक्त विधि से उत्पादन शुरू करें और स्टार्टर कल्चर के स्थान पर उत्पादित कल्चर का प्रयोग कर सकते हैं. यह उत्पादित कल्चर उच्च गुणवत्ता का होता है. एक बार में 5 मीटर साइज के टैंक या गड्ढे से 6.5-7.5 किलोग्राम शैवाल जैव उर्वरक हासिल होता है.

नीलहरित शैवाल जैव उर्वरक के उत्पादन के लिए बलुई दोमट मिट्टी सब से अच्छी होती है. अप्रैल, मई, जून माह इस के उत्पादन के लिए सब से मुफीद होते हैं.

बरतें ये सावधानिया

* नीलहरित शैवाल जैव उर्वरक के प्रयोग में लाई जाने वाली मिट्टी साफसुथरी और भुरभुरी होनी चाहिए.

* उत्पादन में प्रयोग की जा रही मिट्टी ऊसर जमीन की नहीं होनी चाहिए.

* मिट्टी में कंकड़, पत्थर और घास को छलनी से अच्छी तरह छान लें.

* जैव उर्वरक उत्पादन के लिए प्रयोगशाला द्वारा जांच किए गए उच्च गुणवत्ता वाले स्टार्टर कल्चर का ही प्रयोग करें.

* किसान अपने यहां उत्पादित जैव उर्वरक की गुणवत्ता की जांच परिषद के वैज्ञानिकों द्वारा करा लें.

* शैवाल जैव उर्वरक की परतों को नाइट्रोजन उर्वरकों और कीटनाशक रसायनों के साथ कभी न रखें.

* शैवाल जैव उर्वरक की थैलियों को नमी से दूर रखें.

* चूंकि शैवाल जैव उर्वरक के उत्पादन में कार्बोफ्यूरान का इस्तेमाल किया जाता है इसलिए ध्यान रखें कि टैंक के पानी कोजानवर न पी जाएं, वरना उन पर कार्बोफ्यूरान का जहरीला असर हो सकता है, इसलिए टैंक व गड्ढे को जानवरों से बचा कर रखें.

* यदि उत्पादन के समय बारिश हो तो टैंक व गड्ढे को पौलीथिन शीट से ढक दें और बारिश खत्म होने पर हटा दें.

प्रयोग की विधि

धान की रोपाई के एक हफ्ते बाद स्थिर पानी में 12.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से शैवाल कल्चर बिखेर दें और शैवाल जैव उर्वरक प्रयोग करने के 4-5 दिन बाद तक खेत में पानी भरा रहने दें.

खेतों में यदि खरपतवारनाशक जैसे ब्यूटाक्लोर वगैरह रसायनों का इस्तेमाल कर रहे हों तो खरपतवारनाशक डालने के 3-4 दिन बाद जैव उर्वरक का इस्तेमाल करें वरना शैवाल की बढ़ोतरी प्रभावित होगी.

खरपतवारनाशी रसायनों का प्रयोग रोपाई के 2 दिन बाद जरूर कर लें और अन्य सभी खेती के काम और निराईगुड़ाई सामान्य तरह ही करते रहें.

खेत में नीलहरित शैवाल जैव उर्वरक का प्रयोग पहली व दूसरी टौप ड्रेसिंग के दौरान जरूर कर दें. बेसल ड्रेसिंग में रासायनिक नाइट्रोजन का प्रयोग कम मात्रा में करें. धान के पूर्व जिस खेत में हरी खाद के रूप में ढैंचा लगाया गया हो, उस खेत में उपरोक्त विधि से नीलहरित शैवाल जैव उर्वरक का प्रयोग करने से बेसल ड्रेसिंग में भी संस्तुत रासायनिक नाइट्रोजन की मात्रा में 50 फीसदी की कमी कर दें. ध्यान रखें, नीलहरित शैवाल जैव उर्वरक का प्रयोग जिस खेत में करना हो, उस की मेंड़बंदी अच्छी तरह कर लें, जिस से उर्वरक के प्रयोग के बाद पानी बाहर न निकले.

प्रयोग से लाभ

कृषक प्रक्षेत्र पर नीलहरित शैवाल जैव उर्वरक की 12.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की मात्रा 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन देती है इसलिए रासायनिक नाइट्रोजन की मात्रा 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर (66 किलोग्राम यूरिया) की बचत हो सकती है. इस के प्रयोग से धान की उपज में औसतन 2-4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की बढ़ोतरी होती है. साथ ही, पर्यावरण को साफ रखने में सहायक है.

शैवाल जैव उर्वरक इस्तेमाल करने से मिट्टी की भौतिक दशा में सुधार होता है और उपजाऊ ताकत बढ़ती है. मिट्टी में नाइट्रोजन और मौजूद फास्फोरस की मात्रा में बढ़ोतरी होती है.

कार्बनिक तत्त्वों की बढ़ोतरी से मिट्टी की जलधारण कूवत में भी बढ़ोतरी होती है.

अम्लीय जमीन में लोहे वगैरह तत्त्वों की विषाक्ता कम करता है.

शैवाल जैव उर्वरक के प्रयोग से ऊसर जमीन में सुधार होता है.

नीलहरित शैवाल जैव उर्वरक बढ़ोतरी नियंत्रक, विटामिन बी12, अमीनो अम्ल वगैरह भी छोड़ते हैं, जिस से पौधों की अच्छी बढ़ोतरी होती है और दानों की गुणवत्ता भी बढ़ती है.

धान की उन्नत प्रजातियां

आज खेती से अच्छी पैदावार लेने के लिए खाद, पानी से पहले बीज की बारी आती है. खेती से अच्छी उपज हासिल करने के लिए बोते समय सेहतमंद बीज का इस्तेमाल करें. अशुद्ध बीज या इधरउधर से बीज ले कर बोना घाटे का सौदा हो सकता है क्योंकि ऐसे बीजों की कोई प्रमाणिकता नहीं होती.

खेत में सही बीज न बोने से खरपतवार वगैरह भी जल्दी उग आते हैं जो पैदावार हमें फसल से मिलनी चाहिए, वह नहीं मिल पाती. इसलिए किसानों को चाहिए कि वह बीज भरोसेमंद जगह से ही लें, प्रमाणित बीज खरीदें.

देश के कृषि वैज्ञानिक इस दिशा में हर रोज नए प्रयोग कर रहे हैं, उन्हें हमें अपनाना चाहिए. यहां धान की कुछ उन्नत किस्मों की जानकारी दी गई है जिन्हें अपना कर किसान अच्छी फसल ले सकते हैं. किसानों को समयसमय पर अपने खेत की मिट्टी जांच जरूर करानी चाहिए और नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से खाद, बीज की भी जानकारी लेनी चाहिए.

उन्नत पूसा बासमती

(पूसा बासमती 1460)

यह झुलसा प्रतिरोधक किस्म है. अधिक उपज देने वाली बासमती धान की यह उन्नत किस्म?है. धान की यह किस्म पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड व पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए मुफीद है. इस की उपज 55 से 60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर मिलती है और फसल तैयार होने का समय 135 से 140 दिन है.

कीट और रोग प्रभाव : इस में जीवाणु पर्ण झुलसा प्रतिरोधक क्षमता को समाहित कर के एक्स ए 13 और एक्स ए 21 जीनों को मिला कर खास विधि से विकसित किया गया है. पकने में इस के दानों की गुणवत्ता बहुत अच्छी?है, दूधिया दानों की तादाद 10 फीसदी से कम पाई गई है.

सीआर धान 206

(गोपीनाथ)

एरोबिक (कम पानी वाली) परिस्थिति के लिए यह ज्यादा उपज वाली धान की उन्नत किस्म है. यह किस्म ओडि़शा के ऊपरी इलाकों वाले इलाकों के लिए खास है. इस की उपज 35-40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

फसल तैयार होने का समय 110 से 115 दिन है. जल्दी पक कर तैयार होने वाली यह प्रजाति उत्तर पश्चिमी राज्यों में बहुफसलीय चक्र के लिए खास है.

सितंबर से मध्य दिसंबर माह तक बोई जाने वाली रबी फसलों की एक से अधिक फसल लेने के लिए यह उपयुक्त है. पौधों की लंबाई लगभग 97-100 सैंटीमीटर, छोटे व मोटे दाने, उच्च मिलिंग और हेड राइस रिकवरी, मध्यम एमाइलाज की मात्रा और मध्यम सूखे इलाके के लिए खास किस्म है.

सीआर धान 802

बारिश पर आधारित यह किस्म अधिक उपज देने वाली है. यह किस्म पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, असम, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्य के लिए मुफीद है. यह सूखे की अवस्था में 25-30 और सामान्य स्थिति में 60 से 65 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है. इस के पकने का समय 140 से 155 दिन है.

यह बाढ़ और सूखा प्रभावित इलाकों के लिए मुफीद, स्वर्णा सब 1 की पृष्ठभूमि के सस्य गुण बनाए रखते हुए विकसित की गई है. दाने मोटे हैं और 100 दानों का वजन तकरीबन 19 ग्राम  है. जीवाणु पर्ण झुलसा, शीत रौट, स्टेम बोरर, लीफ फोल्डर और प्लांट हौपर से प्रतिरोधक प्रजाति है.

पूसा बासमती 1637

यह ब्लास्ट प्रतिरोधक बढि़या उपज वाली बासमती धान की उन्नत किस्म है. उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश राज्य के लिए काफी मुफीद है. इस की उपज 40 से 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. यह 130 से 135 दिन में पक कर तैयार हो जाती है.

इस में पूसा बासमती 1 के सस्य गुण सुरक्षित हैं. पकने में इस के दानों की गुणवत्ता बहुत अच्छी है. दूधिया दानों की तादाद 10 फीसदी से कम पाई गई है.

धान की खेती की खास विधि- श्री पद्धति

धान एक खाद्यान्न फसल है. इस का उपयोग अकसर सभी देशों मे किया जाता है. दुनिया के कुल धान उत्पादन का 90 फीसदी उत्पादन और उपयोग ‘एशिया’ में किया जाता है. धान का उत्पादन समुद्र की तलहेटी से ले कर मैदानी भागों और पहाड़ की चोटियों तक में किया जाता है.

धान फसल की एक खास खूबी यह है कि इसे हर तरह के वातावरण में उगाया जा सकता है, जैसे वर्षा आधारित क्षेत्र, सूखा प्रभावित क्षेत्र, बाढ़ग्रस्त क्षेत्र, लवणीय और क्षारीय प्रतिकूल परिस्थितियों में.

वर्तमान में धान की फसल में ठहराव सा आ गया?है, जबकि आबादी दिनोंदिन बढ़ रही है. भविष्य में धान में आत्मनिर्भरता बनाए रखने के लिए हमें हर साल 20 लाख टन ज्यादा धान पैदा करना होगा. उन्नतशील और संकर बीजों के इस्तेमाल एकीकृत पोषक व कीटनाशी प्रबंधन से भी उत्पादन में बहुत ही कम बढ़ोतरी मुमकिन है.

धान हमारी जरूरत है. हमारे सीमित विकल्पों से ज्यादा उत्पादन केवल धान की ‘श्रीपद्धति’ अपना कर ही हासिल किया जा सकता है क्योंकि इस तकनीक को अपना कर धान का उत्पादन 10-12 टन प्रति हेक्टेयर बढ़ाया जा सकता है.

श्रीपद्धति यानी सिस्टम औफ राइस इंटेसीफिकेशन : इस पद्धति को मेडागास्कर सिस्टम के नाम से भी जाना जाता है. भारत में यह पद्धति साल 2002-03 में दक्षिणी भारत (कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, त्रिपुरा) वगैरह राज्यों के किसानों द्वारा अपनाई गई. अब इस का चलन भारत के दूसरे धान उत्पादक राज्यों में तेजी से बढ़ रहा है.

इस तकनीक में बीज, खाद, पानी, कीट, रोगनाशक व खरपतवारनाशकों का खेती में कम मात्रा में इस्तेमाल कर के उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है. परीक्षणों से पता चला है कि धान के पौधों से अच्छी क्वालिटी वाली ज्यादा उपज लेने के लिए इन बिंदुओं पर ध्यान दिया जाए:

* प्रति पौध शाखाओं की तादाद ज्यादा हो.

* बालियों की लंबाई ज्यादा हो.

* प्रति बाली दानों की तादाद ज्यादा हो.

* दानों का?भाग ज्यादा हो.

* जड़ों का विकास ज्यादा हो ताकि पौधों का विकास और बढ़वार हो सके.

श्रीपद्धति की प्रबंधन विधियां

किसानों की जानकारी के लिए श्रीपद्धति की प्रबंधन विधियों को अपना कर धान की बेहतर क्वालिटी वाली भरपूर उपज ली जा सकती है.

जमीन का चयन : धान उगाने के लिए ऐसी जमीन जहां पानी न भरे, जमीन समतल हो. साथ ही, लवणीय या क्षारीय जमीन नहीं होनी चाहिए. इसलिए जमीन का चयन करते समय इन बातों का ध्यान रखें:

लवणीय या क्षारीय जमीन : अगर जमीन लवणीय या क्षारीय है तो श्रीपद्धति को नहीं अपनाना चाहिए क्योंकि ऐसी जमीन की ऊपरी सतह पर लवण होते हैं, जो धान के पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं.

इस पद्धति में जमीन का समतल होना बहुत ही जरूरी है, क्योंकि ऐसी जमीन में पानी जमा नहीं होता. साथ ही, सही विधि से सिंचाई प्रबंधन यानी पानी को बाहर निकाला जा सकता है.

मिट्टी उर्वरता : इस पद्धति में कार्बनिक पदार्थ व जैविक खादों का इस्तेमाल उर्वरकों से ज्यादा मात्रा में किया जाता है. कार्बनिक पदार्थ न केवल मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाने में मददगार होते हैं, बल्कि मिट्टी में मौजूद फायदेमंद सूक्ष्म जीवों के भोजन के रूप में भी काम आता है.

ये सूक्ष्म जीव मिट्टी में मौजूद पोषक तत्त्वों को पौधों की उपलब्ध अवस्था में परिवर्तित करने में सहायक होते?हैं, जिस की वजह से अधिक फसल उत्पादन हासिल होता है. इन विधियों का उपयोग कर के जमीन में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा में बढ़ोतरी की जा सकती है.

गोबर की खाद : श्रीपद्धति द्वारा धान उत्पादन के लिए गोबर की खाद का उपयोग जरूरी है. इस के लिए कम से कम 6 टन प्रति एकड़ गोबर की खाद का उपयोग करना चाहिए.

हरी खाद का उपयोग : हरी खाद जमीन की उर्वराशक्ति बढ़ाने में सहायक होती है. अगर हरी खाद के रूप में ढैंचा या सनई का इस्तेमाल किया जाना हो तो उसे खेत में 45-50 दिन या 50 फीसदी फूल आने की अवस्था में मिट्टी में भलीभांति पलट दें. इस प्रकार हरी खाद के विगलन के बाद धान की पौध की रोपाई की जा सकती है.

बीज दर : पौधों के बीच की दूरी ज्यादा कर के बीज  दर को आसानी से कम किया जा सकता है. साथ ही, स्वस्थ पौध लगाने से कीट व रोगों का प्रकोप कम होगा. साथ ही, ज्यादा उत्पादन हासिल होगा.

पौध रोपण : जब पौध में 2 पत्तियां निकल आएं यानी 8-10 दिन की हो जाएं, तब उन की रोपाई शाम के समय करनी चाहिए. इस विधि में पौध की रोपाई सावधानी से करते हैं, ताकि पौधे ज्यादा स्वस्थ और उपजाऊ हों.

पौधे से पौधे की दूरी : इस तकनीक में पौधों के बीच की दूरी सामान्य प्रचलित विधियों की अपेक्षा ज्यादा रखते हैं ताकि पौधों को हवा सही से मिल सके, साथ ही, सूरज की रोशनी भी सुगमता से मिल सके ताकि ज्यादा शाखाओं का उत्पादन हो सके. पौधों के बीच की दूरी ज्यादा होने से पौधे की जड़ों का विकास समुचित ढंग से हो पाएगा, जिस से पौधे ज्यादा स्वस्थ होंगे.

जैविक खादों का इस्तेमाल : जमीन में जैविक खादों का इस्तेमाल कर के न केवल पोषक तत्त्वों की भरपाई होती है, बल्कि लाभदायक सूक्ष्म जीवों की तादाद में भी बढ़ोतरी होती है, जो जमीन और फसल दोनों की उत्पादन क्षमता को बढ़ाने में सहायक होते हैं.

नर्सरी की तैयारी : इस पद्धति में नर्सरी की तैयारी करने के लिए किसी भी उन्नतशील या संकर किस्म का बीज इस्तेमाल किया जा सकता है. नर्सरी में केवल कार्बनिक पदार्थ या हरी खाद का ही इस्तेमाल करें.

क्यारियां तैयार करना: क्यारियां 1-2 मीटर चौड़ी और लंबाई उपलब्ध जगह के आधार पर रखें. क्यारियों के किनारे दोनों ओर की मिट्टी निकाल कर नाली बनाएं और निकाली गई मिट्टी को?क्यारियों में डाल कर 12-15 सैंटीमीटर ऊपर उठे स्तर की बनाएं. इस प्रकार 2 किलोग्राम बीज द्वारा एक एकड़ क्षेत्र की पौध तैयार की जा सकती है. एक एकड़ क्षेत्र के लिए 400 वर्गफुट की नर्सरी तैयार करते हैं.

खेत की तैयारी: सामान्य धान की फसल के समान श्रीपद्धति में खेत की तैयारी की जाती है. खेत को सूखी व पानी भर कर दोनों तरह की दशाओं में तैयार किया जा सकता है किंतु बिना पडलिंग वाले खेत में खरपतवार नियंत्रण के लिए मार्कर चलाना सुगम होगा क्योंकि रोपाई से पहले खेत में मार्कर चलाने और सही जल प्रबंधन के लिए खेत का समतल होना बहुत जरूरी है.

पौधे और पंक्ति की दूरी : श्रीपद्धति में पौधों और पंक्ति की दूरी का खास महत्त्व है. इस पद्धति में पौधे और पंक्ति की दूरी तकरीबन 25 सैंटीमीटर × 25 सैंटीमीटर रखते हैं. इस पद्धति में 16 पौधे प्रति वर्गमीटर रखते हैं, जबकि साधारण धान पद्धति में प्रति वर्गमीटर 33-40 थाले लगाते हैं व 1 थाले में 4-5 पौधे होते हैं. ज्यादा उपजाऊ जमीन में दूरी तकरीबन 30 सैंटीमीटर × 30 सैंटीमीटर तक रख सकते हैं.

मार्कर का उपयोग: श्रीपद्धति में 25 सैंटीमीटर × 25 सैंटीमीटर की दूरी पर निशान लगाते हैं, जिस के लिए विभिन्न प्रकार के मार्करों का इस्तेमाल किया जाता है. ये मार्कर लकड़ी या लोहे के बने होते हैं. मुख्य रूप से 8 पंक्तियों के रोलर वर्ग की पंक्ति बनाते हैं. प्रत्येक 2 मीटर के बाद 30-32 सैंटीमीटर का अंतराल रखें, ताकि पानी न भरे. पौधे को हवा भी आसानी से मिल सके. पौधे कीट व रोगों से सुरक्षित रहें, साथ ही निराईगुड़ाई सुगमता से हो सके. रोपाई के एक दिन पहले मार्कर लगाएं ताकि समय की बचत की जा सके.

खाद और उर्वरक प्रबंधन

श्रीपद्धति में कार्बनिक पदार्थ व जैविक खादों का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करते हैं. इस पद्धति से धान उत्पादन के लिए खेत की तैयारी के समय 6 टन गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद व 300 किलोग्राम अजोला प्रति एकड़ का इस्तेमाल करते हैं.

उच्च गुणवत्ता वाली अच्छी उपज में मिट्टी जांच के आधार पर 50 फीसदी उर्वरकों का इस्तेमाल सही रहता है. मिट्टी जांच न किए जाने की दशा में 24 किलोग्राम नाइट्रोजन, 12 किलोग्राम फास्फोरस, 8 किलोग्राम पोटाश और 10 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति एकड़ उपयोग करें.

रोपाई के पहले फास्फोरस, पोटाश व जिंक सल्फेट की पूरी मात्रा डालें, जबकि नाइट्रोजन की मात्रा को 3 भागों में बांट कर 25 फीसदी रोपाई के समय, 50 फीसदी कल्ले फूटते समय और 25 फीसदी पुष्प गुच्छ निकलते समय डालें. ऐसा करने से अधिक उत्पादन मिलेगा.

रोपाई: श्रीपद्धति में रोपाई के लिए 8-10 दिन की पौध का उपयोग करना चाहिए. साथ ही, पौध की जड़ों को नर्सरी से निकालते समय और खेत में रोपाई करते समय किसी तरह का नुकसान नहीं होना चाहिए. ऐसा करने से पौध के जमाव व वृद्धि में सुगमता रहती है. श्रीपद्धति में पौध छोटी होती है इसलिए लोहे की पट्टी द्वारा मिट्टी के साथ 10.0-12.5 सैंटीमीटर गहराई से सावधानीपूर्वक निकालें.

पौधे को निकालने के तुरंत बाद आधे घंटे के अंदर मार्कर द्वारा लगाए गए निशानों पर रोपाई करें. ऐसा करने से पौधे सूखते नहीं हैं और जल्दी ही स्थापित हो जाते हैं.

रोपाई विधि: धान की सामान्य प्रचलित विधियों में पौध रोपाई ‘यू’ आकार में करते हैं, जिस के चलते पौधों को जमाने में मुड़ने या सीधा होने में समय लगता है, जबकि श्रीपद्धति में पौध लगाने से जड़ों की दिशा ‘एल’ आकार में रखते?हैं. इस प्रकार पौध रोपाई 25 सैंटीमीटर × 25 सैंटीमीटर की दूरी पर 2-3 सैंटीमीटर गहराई से अंगूठे और अनामिका उंगली की सहायता से 1-1 पौध बीज चोल और मिट्टी सहित प्रति थाले में रोपते हैं.

इस विधि से रोपाई करने से पौधों को रोशनी, हवा व पोषक तत्त्व आसानी से और जल्दी मिल जाते हैं. इस वजह से पौधों का जमाव व बढ़ोतरी भी जल्दी हो जाती है. पौधों की रोपाई के बाद उसी दिन या दूसरे दिन हलकी सिंचाई जरूर करें, ताकि पौधे अच्छी तरह से जम सकें.

जल प्रबंधन : धान की खेती की प्रचलित विधियों में खेत में पानी भरा रहता है, जिस के चलते पौधों की जड़ों का सही विकास नहीं हो पाता है, क्योंकि पानी भरे रहने से हवा ठीक से नहीं पहुंच पाती है जबकि श्रीपद्धति में पानी का भरा होना जरूरी नहीं है क्योंकि इस विधि में जमीन को नम कर के रखते हैं. मिट्टी में हलकी दरारें पड़ने पर ही सिंचाई करते हैं.

खेत को समतल करने के बाद छोटीछोटी क्यारियों में बांट लेते हैं, ताकि सिंचाई करने में आसानी रहे. क्यारियों में सिंचाई अंतिम छोर की क्यारी से शुरू करें और हर क्यारी का चौथाई भाग सिंचित होते ही क्यारी को बंद कर दें. इस तरह पानी की मात्रा को कम किया जा सकता है. धान में पुष्प गुच्छ बनने की अवस्था तक तकरीबन 2.5 सैंटीमीटर पानी भरा रहना चाहिए. इस पानी को खेत से तब ही निकालें, जब धान की फसल में 70 फीसदी तक दाने कठोर हो जाएं.

खरपतवार प्रबंधन : श्रीपद्धति में धान की फसल में पानी शुरू से खड़ा न रहने के चलते खरपतवारों का प्रकोप ज्यादा होता है इसलिए पौध की रोपाई के 10 दिन बाद 3-4 बार ‘कोनो वीडर’ चला कर खरपतवारों को खेत के अंदर ही दबा कर हरी खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. वीडर चलाने से हवा के बहाव में बढ़ोतरी होती है. हरी खाद के रूप में इस्तेमाल करने से लाभकारी सूक्ष्म जीवाणुओं की क्रियाशीलता व पोषक तत्त्वों के स्तर में बढ़ोतरी होती है. इस वजह से फसल का उत्पादन अधिक मिलता है.

कीट व रोग प्रबंधन : श्रीपद्धति में कीट व रोगों का प्रकोप साधारण प्रचलित विधियों की अपेक्षा कम होता है क्योंकि पंक्तियों और पौधों की दूरी ज्यादा होने के चलते हवा और रोशनी का संचार सुगमता से हो जाता है. इस वजह से कीट व रोगों के पनपने के लिए अनुकूल वातावरण नहीं मिल पाता है. साथ ही, जैविक खादों के इस्तेमाल से पौध अधिक स्वस्थ रहते हैं, फिर भी अगर इन कीटों का प्रकोप हो जाए तो जैविक विधि से फसल संरक्षण करना चाहिए.

रोग पर काबू पाने के लिए 1 लिटर गौमूत्र, 1 किलोग्राम गोबर, 250 ग्राम गुड़ को 10 लिटर पानी में घोल कर 24 घंटे तक रखें. इस के बाद उसे छान कर इस घोल की 1 लिटर मात्रा ले कर उसे 10 लिटर पानी में मिला कर पर्णीय छिड़काव करें. इस घोल को एक माह तक महफूज रख सकते हैं.

कटाई और मड़ाई : जब फसल के दाने पक जाएं और थोड़े हरे हों, तब कटाई कर लेनी चाहिए. समय पर कटाई करने से दानों के झड़ने की समस्या से बचा जा सकता है. अगर कंबाइन से कटाई करनी हो तो दानों में 14 फीसदी नमी होनी चाहिए.

कटाई के एक दिन बाद मड़ाई कर लेनी चाहिए. इस के बाद दानों को छाया में सुखा कर नमी को 12 फीसदी तक आने दीजिए. ऐसा करने से चावल कम टूटते हैं और क्वालिटी भी सही बनी रहती है.

धान की श्रीपद्धति के फायदे

* श्रीपद्धति में धान की सामान्य प्रचलित विधियों की अपेक्षा कम बीज (2 किलोग्राम प्रति एकड़) लगता है साथ ही, पानी की कम खपत होती है.

* इस पद्धति में जैविक खादों के इस्तेमाल व पंक्ति व पौधों की आपसी दूरी ज्यादा रखने से कीट व रोगों का प्रकोप कम होता है.

* इस पद्धति से उत्पादित धान की फसल धान की सामान्य विधियों की तुलना में 7-15 दिन पहले पक कर तैयार हो जाती है.

* धान की सामान्य प्रचलित विधियों की अपेक्षा इस पद्धति से ज्यादा उपज मिलती है.

* इस विधि द्वारा उत्पादित धान के दानों की क्वालिटी और स्वाद उत्तम होते हैं.

* इस विधि द्वारा लागत को कम कर के ज्यादा आमदनी हासिल की जा सकती है.

* कैमिकलों के कम इस्तेमाल से उत्पादित धान के लिए ज्यादा लाभकारी होता है.

* इस विधि को अपना कर छोटे किसान भी प्रति इकाई उत्पादन हासिल कर सकते हैं. इसलिए उन्हें श्रीपद्धति को अपनाना चाहिए.

नर्सरी की क्यारियां इस तरह तैयार करें

पहली परत : 2.5 सैंटीमीटर मोटी गोबर की गलीसड़ी खाद या कंपोस्ट खाद.

दूसरी परत : 3.7 सैंटीमीटर मोटी भुरभुरी मिट्टी.

तीसरी परत : 2.5 सैंटीमीटर मोटी गोबर की सड़ीगली गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद.

चौथी परत: 6.7 सैंटीमीटर मोटी भुरभुरी मिट्टी.

सभी चारों परतों को भलीभांति मिलाएं. नर्सरी की क्यारियों के चारों तरफ बांस की पुआल वगैरह पदार्थों को लगा कर नम मिट्टी को क्यारी में गिरने से रोकते हैं.

बीज बोने की विधि : बोने से पहले बीज को 12 घंटे तक पानी में भिगोते हैं, उस के बाद उन्हें एक गीली बोरी में डाल कर 24 घंटे तक किसी गड्ढे में उत्तम अंकुरण के लिए दबा देते हैं. जब इन बीजो से रंग की जड़ें विकसित होने लगें तब उन्हें रोप दें.

नर्सरी की क्यारी में 2.5-5.0 सैंटीमीटर की ऊंचाई तक कार्बनिक खाद को फैला कर 2 किलोग्राम अंकुरित बीजों को समान रूप से बिखेर कर उस के ऊपर कार्बनिक खाद की हलकी परत बिछा देते हैं, ताकि बीजों को पक्षियों, सूरज की तेज रोशनी, बारिश वगैरह से बचाया जा सके.

हर दिन सुबहशाम नर्सरी में पानी का छिड़काव नियमित रूप से करें. पानी का छिड़काव करने के लिए फव्वारे का इस्तेमाल करें. इस तरह 10-12 दिन में 2 पत्तियां निकलने पर पौध खेत में रोपाई के लिए तैयार हो जाती है, पर कुछ इलाकों में कम तापमान के चलते पौध ठीक तरह से तैयार नहीं हो पाती है, ऐसी जगहों पर 15 दिन की पौध की रोपाई करनी चाहिए.