ब्याने के बाद मादा गौवंशों में जेर रुक जाना

कभीकभी गाय या भैंस ब्याने के बाद जेर या जड़ समय से नहीं गिराती, जिस से बच्चेदानी में संक्रमण का खतरा बना रहता है और पशुपालकों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है.

कब कहेंगे कि जेर रुक गई

यदि गाय या भैंस ब्याने के 24 से 36 घंटे के भीतर अपनी जेर खुद नहीं गिराती है

तभी हम कह सकते हैं कि जेर रुक गई है और अब इसे उपचार की जरूरत है. उस से पहले किसी भी प्रकार के उपचार की जरूरत नहीं होती.

किन कारणों से जेर रुक सकती है

* गर्भपात के बाद जेर रुक सकती है.

* असामान्य गर्भकाल यानी या तो गाय या भैंस ने समय से पहले या फिर निर्धारित अवधि के बहुत बाद बच्चा दिया.

* कठिन प्रसव यानी बच्चा खींच कर निकाला गया हो.

* आपरेशन द्वारा बच्चा निकाला गया हो.

* कुछ पशुओं में यह जन्मजात भी हो सकता है.

* कुछ आवश्यक तत्त्वों जैसे विटामिन ई, सैलेनियम, विटामिन ए, कैल्शियम, फास्फोरस वगैरह की कमी.

* अगर गाय या भैंस ने एकसाथ जुड़वां 2 बच्चे दिए हों.

पशुपालकों को क्या करना चाहिए

* ब्याने के 24 से 36 घंटे तक जेर के खुद गिरने का इंतजार करें.

* जेर के लटकते हुए भाग या हिस्से को किसी भी हालत में न काटें या तोड़ें.

* ध्यान रहे कि पशु जेर के लटके हुए हिस्से को चाटने या खाने की कोशिश न करे.

* जेर को बलपूर्वक खींच कर निकालने की कोशिश बिलकुल न करें. जेर को खींच कर या काट कर निकालने से उस का कुछ भाग बच्चेदानी में ही रह जाता है और बाद में उस में संक्रमण हो सकता है और मवाद पड़ सकता है जिस से पशु को बुखार भी आ सकता है व दुग्ध उत्पादन में भी कमी आ सकती है.

* बिना पशु चिकित्सक की सलाह लिए जेर को खींचने की कोशिश बिलकुल न करें. इस से कुछ भी फायदा नहीं होगा, जबकि नुकसान बहुत अधिक होगा.

* यदि पशु को बुखार है तो जेर को खींच कर निकालना एकदम वर्जित है.

रोकथाम व उपचार

* पशुओं को उन की जरूरत के मुताबिक दानाचारा, नमक व खनिज लवण (मिनरल मिक्सचर) प्रचुर मात्रा में दें.

* गर्भावस्था के दौरान ध्यान रहे कि पशुओं के आहार में अतिरिक्त खाद्यपूरकों (फीड सप्लीमैंट्स) जैसे कैल्शियम, फास्फोरस, विटामिन ई, सैनेनियम व दूसरे खनिज लवणों का प्रचुर मात्रा में समावेश हो.

* ब्याने के तुरंत बाद पशु का दूध जरूर दुह लें, जिस से जेर रुकने की संभावना कम हो जाती है.

* योग्य पशु चिकित्सक की ही सलाह ले कर अपने पशुओं का उपचार कराएं.

* ऐसी अवस्था में कैल्शियम, फास्फोरस, विटामिन ई, सैनेनियम व विटामिन ए के इंजैक्शन फायदेमंद होते हैं.

* इस के अतिरिक्त कुछ आयुर्वेदिक हर्बल दवाएं जैसे लिक्विड ऐक्सापार या हिमरोप 100 मिलीलिटर दिन में 2 बार 2-3 दिनों तक पिलाएं या पाउडर रीप्लांटा 100 ग्राम दिन में 2 बार 2-3 दिनों तक खिलाएं.

गर्भवती दुधारू पशुओं की देखभाल

ज्यादातर दुधारू पशु ब्याने के 3 से 4 महीने के अंदर गर्भ धारण कर लेते हैं. गर्भ की शुरुआत के समय में उन को कोई खास अलग से आहार देने की जरूरत नहीं पड़ती है, लेकिन जब गर्भ की अवस्था 5 माह की हो जाती है, तो गर्भ में पल रहा भ्रूण अपने विकास के लिए पोषक तत्त्वों के लिए मां पर ही निर्भर रहता है.

दुधारू पशु को गर्भकाल के 5 महीने के बाद पोषक तत्त्वों की ज्यादा जरूरत पड़ती है. इस के लिए जो उसे दूध उत्पादन के लिए आहार दिया जा रहा था, उस के अतिरिक्त गर्भ के विकास के लिए 2 किलोग्राम अतिरिक्त दाना देना चाहिए. इस से गर्भ में पल रहे बच्चे का भलीभांति विकास होगा एवं जन्म के समय उस का वजन भरपूर होगा. दुधारू पशु से ब्यांत के बाद अच्छा दूध उत्पादन मिलेगा.

पशुपालक को यह भी ध्यान रखना होगा कि अगर आप दुधारू पशु से दूध उत्पादन ले रहे हैं तो ड़ेढ से 2 माह पहले उस के दूध को सुखाना होगा, जिस से कि वह खुद को को फिर से अगले दूध उत्पादन के तैयार कर ले.

दुधारू पशु को कम से कम 5 किलोग्राम भूसे के साथ 20 किलोग्राम से 25 किलोग्राम तक हरा चारा एवं 3 किलोग्राम दाना मिश्रण अवश्य देना चाहिए. दाने में चोकर एवं खली के साथ 50 ग्राम मिनरल मिक्सर, जिस में कैल्शियम फास्फोरस एवं सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की भरपूर मात्रा हो, देना चाहिए. अगर हरा चारा बिलकुल न मिल पा रहा हो तो दाने की मात्रा 3 किलोग्राम से बढ़ा कर 5 किलोग्राम तक कर देनी चाहिए.

गर्भवती पशु को ऊंचीनीची जगह से चढ़नेउतरने से बचाना चाहिए एवं अन्य पशुओं से दूर रखना चाहिए, वरना आपस में लड़ने की अवस्था में गर्भ को नुकसान पहुंचने का खतरा हो सकता है .

अधिक जानकारी के लिए अपने नजदीकी कृषि विज्ञान में पशुपालन के विशेषज्ञ से संपर्क करें.

पशुओं में लंपी वायरस के नियंत्रण के लिए टीकाकरण का शुभारंभ

उदयपुर : 24 मई, 2023.
महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर एवं पशुपालन विभाग, उदयपुर के संयुक्त तत्वाधान में स्मार्ट गांव मदार एवं ब्राह्मणों की हुंदर में एकदिवसीय पशुधन स्वास्थ्य शिविर का आयोजन किया गया. कार्यक्रम का आयोजन कुलपति डा. अजीत कुमार कनार्टक, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के मुख्य आतिथ्य में किया गया.

उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि स्मार्ट विलेज मदार एवं ब्राम्हणों की हुंदर में विश्वविद्यालय द्वारा किए गए सफल कार्याें को देखते हुये राज्यपाल द्वारा प्रशंसापत्र प्रदान किया गया.

उन्होंने आगे यह भी बताया कि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित नवीन कृषि प्रौद्योगिकी एवं नवाचार को अपनाने की अपील की.

इस अवसर पर उन्होंने लंपी वायरस के नियंत्रण के लिए टीकाकरण कार्यक्रम का शुभारंभ किया और 98 पशुपालकों को मिनरल मिक्चर वितरित किया.

कार्यक्रम के आरंभ में निदेशक प्रसार शिक्षा, डा. आरए कौशिक ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए अपने उद्बोधन में कहा कि स्मार्ट गांव मदार एवं ब्राम्हणों की हुंदर को राज्यपाल द्वारा एक वर्ष की अवधि और बढ़ा दी गई, ताकि गांव का सर्वांगीण विकास हो सके.

डा. शक्ति सिंह, संयुक्त निदेशक, पशुपालन विभाग, उदयपुर ने बताया कि ग्रीष्मकाल में पशुओं को कैसे सुरक्षित रखा जाए एवं उन्हें किस प्रकार से उचित वातावरण उपलब्ध कराया जाए, ताकि पशुओं के स्वास्थ्य को स्वस्थ रखा जा सके.

उन्होंने बताया कि ग्रीष्मकाल में पशुओं में होने वाले रोगों के लिए उचित टीकाकरण करवाना अनिवार्य है.

उन्होंने यह भी बताया कि गत वर्ष भी लंपी वायरस पर नियंत्रण किया गया था. इस वर्ष भी इस रोग से बचाव के लिए विभाग द्वारा घरघर जा कर पशुओं का टीकाकरण किया जा रहा है.

डा. ओपी साहु, पशु चिकित्सा अधिकारी, पशुपालन विभाग, उदयपुर ने बताया कि इन पशुओं में होने वाले बाह्य एवं आंतरिक परजीवियों को नियंत्रण करने के लिए संक्षिप्त जानकारी दी.

शिविर में डा. पी. भटनागर, वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष, कृषि विज्ञान केंद्र, बड़गांव ने बताया कि पशुओं के बांझपन का उपचार किए जाने की जरूरत है व इस समस्या के निदान के लिए कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा परियोजना चलाई जा रही है.

डा. सिद्धार्थ मिश्रा, विभागाध्यक्ष, पशु उत्पादन विभाग, राजस्थान कृषि महाविद्यालय, उदयपुर ने पशु प्रबंधन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि बकरियों की नस्ल सुधार के लिए सिरोही नस्ल के बकरे वितरित किया जाना प्रस्तावित है, ताकि नस्लों में सुधार कर अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सके.

डा. दत्रादेय, पशु चिकित्सक, बड़गांव, उदयपुर ने कार्यक्रम के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए पशुओं में होने वाले रोगों के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी. साथ ही, पशुओं में होने वाले रोगों की रोकथाम के लिए उचित दिशानिर्देश भी दिए.

उन्होंने आगे बताया कि शिविर में 320 बड़े पशुओं का उपचार किया गया एवं 148 छोटे पशुओं को कृमिनाशी दवा पिलाई गई, जिस से 215 पशुपालकों को लाभान्वित किया गया.

डा. आरएस राठौड़, स्मार्ट विलेज समन्वयक, मप्रकृप्रौविवि, उदयपुर ने कार्यक्रम का संचालन किया. अंत में वहां उपस्थित सभी लोगों को धन्यवाद ज्ञापित किया.

पशुपालन के लिए कुछ जरूरी जानकारी

हमारे देश में पशुपालन बड़े पैमाने पर किया जाता है और आज का समय ऐसा नहीं रह गया कि खेतीकिसानी करने वाले लोग ही पशुपालन करते हों. आज पशुपालन आमदनी का अच्छा जरीया है, जिसे अन्य लोग भी कर रहे हैं.

आज के समय पशुपालन के लिए सरकार द्वारा भी अनेक योजनाएं चलाई जा हैं जो लोगों के लिए मददगार साबित हो रही हैं. जरूरत है केवल उन की जानकारी पशुपालक होनी चाहिए.

इस के अलावा आज तकनीकी का दौर है, इसलिए नईनई जानकारियां मिलती रहती हैं. पशु वैज्ञानिकों तक पहुंचना भी आसान है. अनेक ह्वाट्सएप ग्रुपों पर भी पशुपालन के बारे में जानकारी मिलती रहती है, इसलिए पशुपालन को सही तरीके से किया जाए तो यह बेहतर रोजगार भी बन सकता है. केवल जरूरत है इन छोटीछोटी बातों का ध्यान रखना :

पशुधन प्रबंधन

पशु बाड़े में सफाई का खास ध्यान रखें. धुलाई के लिए उचित रसायन जैसे कि सोडियम कार्बोनेट (4 फीसदी)/ सोडियम हाइपोक्लोराइट (1 फीसदी) के घोल का प्रयोग करें. पशुओं को स्वच्छ पानी उपलब्ध होना चाहिए तथा पानी को स्वच्छ रखने के लिए नांद की समयसमय पर चूने से पुताई करें.

यदि किसी पशु में संक्रामक रोग के लक्षण दिखाई दें तो उसे अन्य पशुओं से तुरंत अलग कर दें तथा तुरंत पशु डाक्टर से सलाह लें.

पशुओं पर गरमी का तनाव कम करने के लिए शैड में पंखे/फोगर आदि की व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि पशु स्वस्थ रहें और उत्पादन भी बना रहे.

पशुपोषण प्रबंधन

पशुपालक घर में उपलब्ध आहार अवयवों को मिला कर संतुलित रातिब मिश्रण बना सकते हैं. इस रातिब मिश्रण में अनाज की मात्रा बढ़ा कर 40 फीसदी तक कर दें तथा इस में 2 फीसदी खनिज मिश्रण और 1 फीसदी नमक जरूर मिलाएं.

अगर रातिब में खनिज मिश्रण नहीं मिलाया है तो हर एक पशु को कम से कम 50 ग्राम उत्तम गुणवत्ता का खनिज मिश्रण अथवा पशु चाटन/यूरियाखनिज ईंट (यूएमएमबी) अवश्य दें. नया भूसा रातभर भिगोने के बाद ही पशुओं को खिलाएं.

पशु के ब्याने से 2 महीने पहले उस का दूध सुखा दें व पशु को पौष्टिक हरा चारा व दाना मिश्रण दें. इस अवस्था में जितनी अच्छी देखरेख होगी, उतना ही ब्याने के बाद अच्छा दूध उत्पादन होगा.

प्रजनन प्रबंधन

ग्रीष्मकाल में मद के लक्षणों को पहचानने के लिए सुबह और शाम पशु पर निगरानी रखें. पशु यदि सुबह गरमी में आया है तो उसी दिन शाम को और यदि शाम में आया है तो अगले दिन सुबह कृत्रिम गर्भाधान करवा लें.

जिस पशु में कृत्रिम गर्भाधान होना है उसे बाकी पशुओं से पहले ही अलग बांध लें, ताकि तकनीशियन/पेरावेट कम अवधि में अपना काम पूरा कर सके. तकनीशियन द्वारा पशु को छूने से पहले व उस के बाद साबुन से हाथों की सफाई पर ध्यान दें.

मदहीनता के निवारण हेतु पशु के आहार में खनिज मिश्रण व कौपर, कोबाल्ट और आयरन की ये गोलियां रोज मिलाएं व पेट के कीड़ों की दवा दें.

गाभिन पशुओं में 7वें व 8वें महीने से फूला दिखने की शिकायत से बचने हेतु गर्भावस्था के अंतिम तिमाही में अत्यधिक वसा वाला आहार न दें व कैल्शियम, फास्फोरस और सेलेनियम की पूर्ति खनिज मिश्रणों द्वारा करें.

पशु के योनिद्वार को साफ रखें व जब तक डाक्टर सलाह न दे, बाहर निकले हुए अंगों पर ठंडे पानी का छिड़काव करें. बैठने का स्थान ऐसा चयन करें कि पशु का पिछला हिस्सा उठा हुआ हो.

ब्यांत के 12-24 घंटे के बाद जेर न गिरने की अवस्था में पशु को रिपलेंटा (50 ग्राम, दिन में 2 बार) इन्वोलोन या यूटेरोटोन जैसे सीरप (पहले दिन 200 मिलीलिटर व फिर 100 मिलीलिटर 3 से 5 दिन तक) दें. अगर इन दवाओं से जेर न गिरे तो पशु डाक्टर से सलाह लें.

पशुओं की लंपी स्किन डिजीज : कारण और निवारण

आजकल फैली लंपी स्किन डिजीज के कारण पशुओं और पशुपालकों को बहुत ही परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. इस रोग के कारण पशुओं की उत्पादकता कम हो जाने के साथसाथ पशु हानि का भी सामना करना पड़ रहा है. हाल ही में राजस्थान में लंपी स्किन डिजीज के कारण हजारों गाएं बेमौत मर गई हैं. गुजरात, पंजाब, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश आदि राज्यों में भी उक्त रोग (एलएसडी) की घटनाओं की खबरें हैं.

भारत में लंपी स्किन डिजीज का पहला मामला अगस्त, 2019 में ओडिशा के 5 जिलों में दर्ज किया गया था, जहां कुलमिला कर 2,539 पशुओं में से 182 पशु इस रोग से ग्रसित पाए गए और बीमारी की दर 7.16 फीसदी आंकी गई, मगर इन में से कोई भी पशु हताहत नहीं हुआ. तब से यह रोग केरल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि राज्यों सहित पूरे देश में फैल चुका है.

रोग की वजह, लक्षण, रोगजनन और निदान

लंपी स्किन डिजीज यानी एलएसडी गोवंशी पशुओं और भैंसों का एक अत्यधिक संक्रामक रोग है, जो कैप्रीपौक्स वायरस के चलते होता है. इस के कारण संक्रमित पशुओं की त्वचा पर गांठें बन जाती हैं. यह वायरस पौक्सविरिडे परिवार का सदस्य है, जो मुख्यत: पशुओं और पक्षियों में संक्रमण की वजह बनता है.

इस रोग में त्वचा के ऊपर गोलगोल गांठें बन जाती हैं, जो आकार में 0.5 सैंटीमीटर से 5 सैंटीमीटर व्यास की हो सकती हैं. इस रोग के कारण लसिका ग्रंथियों में भी सूजन आ जाती है, नाक से स्राव बहता रहता है, पशु को बुखार हो जाता है और पशु के पूरे शरीर में अकड़न हो जाती है. संक्रमित पशुओं के अंगों में सूजन आ जाती है और लंगड़ापन भी हो सकता है. इस के अतिरिक्त यह रोग शारीरिक कमजोरी, कम दूध देना, बांझपन, गर्भपात और कभीकभी मौत की वजह बनता है. दुधारू पशुओं में दूध का उत्पादन घट जाता है और पशुपालक को माली नुकसान पहुंचता है.

वैसे तो इस रोग में मृत्युदर आमतौर पर कम है, मगर पहले से ही कमजोर पशुओं में रोग की अधिकता अथवा द्वितीयक संक्रमण के कारण पशु की मौत तक हो सकती है. यह रोग एक वायरस द्वारा फैलता है, मगर इस के फैलने का प्रमुख माध्यम काटने वाले कीड़े जैसे मच्छर, मक्खी और चिंचडि़यां या किलनियां ही हैं. इन कीटों के काटने से यह वायरस संक्रमित पशु से स्वस्थ पशु तक पहुंच जाता है और स्वस्थ पशु भी संक्रमित हो जाता है. इस के अलावा यह संक्रमित पशुओं के स्वस्थ पशुओं से संपर्क में होने के कारण व दूषित चारे से भी फैल सकता है.

लंपी स्किन डिजीज पैदा करने वाला वायरस कीटों के काटने से मेजबान पशु की त्वचा से होता हुआ शरीर में प्रवेश करता है. यह वायरस गैस्ट्रो आंत्र पथ के माध्यम से भी पशु शरीर में प्रवेश कर सकता है. इस के बाद यह वायरस लसिका ग्रंथियों (लिम्फ नोड्स) में पहुंच जाता है, जिस से लसिका ग्रंथि शोथ (लिम्फैडेनाइटिस) हो जाता है. वायरस त्वचा पर सूजन वाले नोड्यूल के विकास के साथ विशिष्ट कोशिका और रक्त वाहिकाओं की दीवारों में तेजी से गुणन करने के कारण त्वचा के घावों का कारण बनता है. एक बार संक्रमित होने के बाद यह वायरस पशु शरीर में 2 से 5 सप्ताह तक रह सकता है. इस रोग में पशुओं को तेज बुखार होता है, जो 105 से 107 डिगरी फारेनहाइट तक पहुंच जाता है.

पशु की नाक से लगातार स्राव गिरता रहता है और दूध उत्पादन में गिरावट आती है. पशुओं की त्वचा की गांठें मुख्यत: सिर, गरदन और थन पर विकसित होती हैं. मुंह और नाक की श्लेष्मा झिल्ली पर भी नोड्यूल विकसित होते हैं. छोटी गांठें इलाज के दौरान ठीक हो जाती हैं, जबकि बड़ी गांठों की कोशिकाएं निर्जीव हो जाती हैं और कुछ समय बाद वे सख्त होने लगती हैं. कभीकभी गांठों में मवाद भी बन जाता है और वे फूट जाती हैं, जिस के कारण इन गांठों पर मक्खियां बैठने लगती हैं और उन में कीड़े पड़ जाते हैं. साथ ही, दूसरे जीवाणु संक्रमण भी हो जाते हैं, जो स्थिति को और भी गंभीर बना देते हैं.

संक्रमित पशु को पुन: ठीक होने में कई महीने भी लग सकते हैं. प्रभावित पशु अकसर कमजोर हो जाते हैं और पेट से होने वाली गायों में गर्भपात भी हो सकता है. माथे, पलकों, कान, थूथन, नासिका, थन, शरीर के सभी अंगों पर उभरी त्वचा की गांठों को देख कर भी समझा जा सकता है कि पशु लंपी स्किन डिजीज वायरस से ग्रसित है. फिर भी रोग की और अधिक पुष्टि के लिए त्वचा से लिए गए नमूनों की बायोप्सी कर के भी इस रोग का पता लगाया जा सकता है.

प्रयोगशाला में वायरस न्यूट्रिलाइजेशन टैस्ट, इनडायरैक्ट फ्लोरेसैंस टैस्ट, अगार जेल इम्यूनोडिफ्यूजन टैस्ट, एलिसा और वैस्टर्न ब्लौट टैस्ट सहित विभिन्न परीक्षणों का उपयोग कर के इस वायरस का निदान किया जाता है. इस रोग से ग्रसित पशुओं की मृत्यु होने पर शव विच्छेदन करने पर ऊपर वर्णित एपिडर्मल और म्यूकोसल घाव स्पष्ट दिखाई देते हैं. श्वास की नली और जठरांत्र संबंधी मार्ग की अंदरूनी सतह में अल्सर पाया जा सकता है. हलके भूरे रंग के पिंडों से युक्त फेफड़े के घाव भी देखे जा सकते हैं. रोग का निवारण, उपचार और नियंत्रण लंपी स्किन डिजीज से बचने के लिए पशुओं का टीकाकरण बहुत ही आवश्यक है. संक्रमण की स्थिति में पशुओं के शरीर पर बनी गांठों में घाव होने पर द्वितीयक जीवाणु संक्रमण को रोकने के लिए एंटीबायोटिक दवाओं से उपचार किया जाता है.

साथ ही, घावों पर मक्खियों को न बैठने देने के लिए कोई भी मक्खीरोधी दवा लगाई जाती है और घावों की ड्रैसिंग की जाती है. पशु को बुखार होने पर एंटीपाईरेटिक दवाएं दी जाती हैं. इस के अलावा शरीर की सूजन उतारने और दर्द कम करने के लिए सूजनरोधी और दर्द निवारक दवाएं दी जाती हैं. पशुओं की भूख बढ़ाने के लिए पाचक चूर्ण, प्रीबायोटिक और मल्टीविटामिन दवाएं दी जाती हैं. इस रोग से ग्रसित पशुओं को तरल चारा, हरा नरम सुपाच्य मौसमी चारा और अच्छी क्वालिटी का अधिक प्रोटीनयुक्त दाना रातिब, गुड़ आदि खिलाने की सिफारिश की जाती है. पशु की त्वचा पर बनी गांठों में घाव होने पर उसे किसी भी एंटीसैप्टिक दवा से साफ कर के कोई भी हर्बल स्प्रे या हर्बल मलहम या एंटीसैप्टिक एलोपैथिक मलहम लगा कर ड्रैसिंग करनी चाहिए.

इस के साथ ही पशु को लेवामिसोल, जो कि एक इम्यूनोमौड्यूलेटरी दवा है, का इंजेक्शन लगाया जा सकता है. साथ ही, एंटीहिस्टामाइन की 10 मिलीलिटर दवा प्रतिदिन 3 दिन तक दी जा सकती है. घावों में द्वितीयक जीवाणु संक्रमण की रोकथाम के लिए एंटीबायोटिक्स जैसे एमोक्सिलिन 10-12 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम शरीर भार की दर से बीमार पशु को दी जा सकती है. पशुपालक इन औषधियों का उपयोग योग्य पशु चिकित्सक की सलाह पर ही करें, जो कि पशु की वास्तविक स्थिति के अनुसार दवाएं बता सकते हैं. जहां तक मुमकिन हो, संक्रमित जानवर का उपचार खिलाने वाली दवा और त्वचीय मलहम इत्यादि के माध्यम से किया जाना चाहिए, ताकि उपचार प्रक्रियाओं के माध्यम से बीमारी के प्रसार और उपचार के दौरान उपचार के सामान और कर्मियों के संदूषण से बचा जा सके. इस रोग के स्वदेशी उपचार (आयुर्वेदिक उपचार) के अंतर्गत वे सब जड़ीबूटियां दी जा सकती हैं, जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करती हैं. पान के पत्ते-10 नग, काली मिर्च-10 ग्राम, नमक-10 ग्राम ले कर उन्हें पीस लें और थोड़े से गुड़ के साथ मिलाएं. पहले दिन हर 3 घंटे में एक खुराक खिलाएं. दूसरे दिन से आगामी 2 सप्ताह तक प्रतिदिन 3 खुराकें खिलाएं. इस नुसखे से अप्रत्याशित लाभ बतलाया गया है.

इसी तरह एक अन्य स्वदेशी पद्यति में : लहसुन-2 पोथी, काली मिर्च-10 ग्राम, धनिया-10 ग्राम, जीरा-10 ग्राम, हलदी का पाउडर-10 ग्राम, चिरायता पाउडर-30 ग्राम, ताजा तुलसी पत्ता-1 मुट्ठी, तेज पत्ता-10 ग्राम, पान के पत्ते-5 नग, बेल पत्ता-1 मुट्ठी, गुड़-100 ग्राम को एक जगह घोंट कर 2 सप्ताह तक रोज 3 खुराकें खिलाने को कहा गया है.

इस से भी पशु की प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होने और पशु के शीघ्र स्वस्थ होने की संभावना है. पशु के शरीर पर बनी गांठों में हुए घावों की ड्रैसिंग करने के लिए : हलदी पाउडर-20 ग्राम, हरित मंजरी के पत्ते-1 मुट्ठी, मेहंदी के पत्ते-1 मुट्ठी, तुलसी के पत्ते-1 मुट्ठी, नीम के पत्ते-1 मुट्ठी, लहसुन-10 पोथी को नारियल या तिल का तेल-500 मिलीलिटर में मिला कर पेस्ट बना कर पशु के शरीर पर बनी गांठों में हुए घावों पर लगाया जा सकता है.

इस रोग की रोकथाम के लिए सभी स्वस्थ पशुओं का टीकाकरण अवश्य कराएं. उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में प्रवेश करने से पहले आयातित पशुओं का टीकाकरण अवश्य कराएं. प्रभावित क्षेत्र से आनेजाने वाले लोगों की आवाजाही प्रतिबंधित रखें. पशुपालकों और प्रभावित पशुओं की देखभाल करने वालों को स्वस्थ पशुओं से दूर रहने की सलाह दें. संक्रमित जानवर से निबटने वाले व्यक्ति दस्ताने और चेहरे पर मास्क पहनें और हर समय स्वच्छ और कीटाणुशोधन उपाय करें.

इन सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. संक्रमित गांवों की पहचान करें, ताकि एक विशिष्ट क्षेत्र में एहतियाती योजना बनाई जा सके और प्रभावित गांव के आसपास 5 किलोमीटर तक के गांवों में रिंग टीकाकरण किया जा सके. पशुओं की किसी भी असामान्य बीमारी की सूचना नजदीकी पशु चिकित्सालय को जरूर दें. पशुशाला का नियमित अंतराल पर कीटाणुशोधन करें और स्वस्थ पशुओं को भी बाह्य परजीवीनाशक लगा कर बाह्य परजीवी मुक्त करते रहें. मच्छर, मक्खियों, चिंचड़ी, पिस्सू आदि वैक्टर को नियंत्रित करने के लिए पशुशाला, सामान्य चराई क्षेत्र, जानवरों के इकट्ठा होने वाले स्थानों और जानवरों की आवाजाही के रास्तों पर कीटनाशकों का छिड़काव करें.

इस रोग से संक्रमित पशु की मृत्यु होने पर मृतक पशु के शव को गहरे गड्ढे में चूने एवं नमक के साथ दबा देना चाहिए. ऐसे पशुओं के मृत शरीर को खुले में नहीं फेंकना चाहिए. मृत पशु को दफनाने का स्थान आवासीय क्षेत्र, पशु आवास एवं जल स्रोतों से दूर होना चाहिए. मृत पशु के परिवहन के लिए प्रयोग किए गए वाहन व जिस पशु आवास में वह पशु रखा गया था, को सोडियम हाईपोक्लोराइड के 2-3 फीसदी के घोल से विसंक्रमित करना चाहिए.

मृत पशु के चारे, दाने को विसंक्रमित कर जला कर नष्ट कर देना चाहिए. वैसे तो मनुष्यों में इस रोग के फैलने का जोखिम लगभग न के बराबर है, फिर भी संक्रमण के खतरे से बचने के लिए दूध को पीने से पहले भलीभांति उबाल लेना चाहिए. संक्रमित पशु के कच्चे दूध के सेवन से बचना चाहिए और लाने व ले जाने से बचा जाना चाहिए. लंपी स्किन डिजीज ने देश के कई हिस्सों में महामारी का रूप ले लिया है. टीकाकरण ही इस रोग से बचाव का एकमात्र प्रभावी उपाय है. विषाणुजनित रोग होने के कारण रोग लाक्षणिक उपचार ही संभव है. अच्छे खानपान प्रबंधन और साफसफाई के द्वारा भी जल्द ही इस रोग पर काबू पाया जा सकता है.