काले मोतियों की उजली कहानी, बस्तर के जंगलों की जबानी

काले मोतियों की खेती कोंडागांव में धीरेधीरे परवान चढ़ रही है. तकरीबन 25 साल पहले यहां के स्वप्नद्रष्टा किसान वैज्ञानिक डा. राजाराम त्रिपाठी ने अपने खेत में जैविक और हर्बल खेती के जो नएनए प्रयोग शुरू किए थे, उन में से उन का एक सब से प्रमुख सपना था, छत्तीसगढ़ के लिए काली मिर्च की नई प्रजाति का विकास करना और उसे छत्तीसगढ़ के किसानों के खेतों पर और बचेखुचे जंगलों में सफल कर के दिखाना.

मेहनत ने दिखाया अपना रंग

कामयाबी की एक नई इबारत बस्तर के जंगलों में भी लिखी जा रही है. दरअसल, कुछ समय पूर्व डा. राजाराम त्रिपाठी “मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म और रिसर्च सेंटर” इन की सहयोगी समाजसेवी संस्था संपदा ने प्रशासन और वन विभाग के सहयोग से व मार्गदर्शन में आसपास की कुछेक वन क्षेत्रों में भी प्रायोगिक रूप से साल के पेड़ों और अन्य प्रजाति के पेड़ों पर भी मां दंतेश्वरी हर्बल समूह द्वारा विकसित काली मिर्च की नई प्रजाति के पौधे लगाए थे. आज काली मिर्च की उन लताओं में फल आने लगे हैं.

बच्चों की मेहनत का नतीजा

गरमी की छुट्टियों में घर में खाली बैठे बच्चों ने निकट के जंगलों में पड़े उस काली मिर्च को इकट्ठा किया और ला कर आगे विपणन के लिए ‘मां दंतेश्वरी हर्बल समूह’ में जमा किया. बच्चों द्वारा जेबखर्च के लिए इकट्ठा किए गए इस काली मिर्च को उन्हें ‘मां दंतेश्वरी हर्बल समूह’ से 4000 रुपए तत्काल मिल गए हैं. इतना ही नहीं, यह काली मिर्च ‘मां दंतेश्वरी हर्बल समूह’ के अन्य सदस्यों की काली मिर्च के साथ आगे अगर ज्यादा कीमत पर बिकेगी, तो इन नन्हे संग्रहकर्ताओं को इस का अतिरिक्त लाभांश भी मिलेगा. इस के लिए इन लोगों का नाम, पता, फोन नंबर आदि दर्ज कर लिए गए हैं. इस से बच्चों और उन के परिवार वालों दोनों का उत्साह बढ़ा है.

बच्चों के खिले चेहरे

बच्चों के साथ आए उन के परिजनों का कहना था कि बच्चों के द्वारा खेलखेल में इकट्ठा किए गए इस काली मिर्च से बच्चों के आने वाले साल की पढ़ाई, किताबों और नए कपड़ों के खर्चे की व्यवस्था हो गई है, इस से बच्चे और उन के मांबाप सभी बहुत खुश हैं.

जाहिर है कि इस से बच्चों को और अधिक काली मिर्च इकट्ठा करने की प्रेरणा मिलेगी और अब गांव के लोग भी ये हर साल अतिरिक्त आमदनी देने वाली काली मिर्च की लताएं, जिन पेड़ों पर चढ़ी हैं, उन पेड़ों को काटने से परहेज करेंगे और शायद इस से बस्तर, छत्तीसगढ़ का जंगल भी बच जाए.

आम की फसल सुरक्षा

आम भारत का राष्ट्रीय फल है और प्रमुख फसल भी. भारत में साल 2021-22 में 2,313 हजार हेक्टेयर में 22,353 हजार टन का उत्पादन हुआ. भारत में आम उगाने वाले क्षेत्रों में सर्वाधिक क्षेत्रफल उत्तर प्रदेश में है, किंतु सर्वाधिक उत्पादन आंध्र प्रदेश में होता है.

आम से अच्छी पैदावार लेने के लिए फसल की सुरक्षा भी जरूरी है. कई बार आम की फसल में अनेक कीट व रोग लग जाते हैं, जिन से फसल उत्पादन पर बूरा असर पड़ता है. जरूरी है कि समय रहते कीट व रोगों को पहचान लें और उन की रोकथाम करें.

आम के प्रमुख कीट

कड़ी कीट या गुजिया

इस के अर्भक भूरे रंग के होते हैं. दिसंबरजनवरी में शिशु निकलते हैं, जो पेड़ों के ऊपर धीरेधीरे रेंग कर चढ़ते हैं.

शिशु कीट और प्रौढ़ मादा कोमल शाखाओं व वृंतों से बौर वाली टहनियों पर भारी मात्रा में जमा हो जाते हैं और उन का रस चूसते हैं. परिणामस्वरूप फूल सूख कर झड़ कर गिर जाते हैं और उन के फलों की संख्या कम हो जाती है. उन के डंठल इतने कमजोर हो जाते हैं कि हवा के हलके झोंकों में ही वे जमीन पर गिर जाते हैं तथा उन के द्वारा उत्सर्जित चिपचिपे पदार्थ का विसर्जन करते हैं, जिस पर काली फफूंद उग जाती है. अधिक प्रकोप में फल गिर जाते हैं.

रोकथाम

* इस की रोकथाम के लिए मईजून माह में बाग की गहरी खुताई करनी चाहिए, ताकि अंडे ऊपर आ कर तेज धूप से नष्ट हो जाएं.

* दिसंबर के प्रथम सप्ताह तक थालों की गुड़ाई करा कर बेवेरिया बैसियाना या फेनवैलेरेट 10 प्रतिशत ईसी 0.5 मिलीलिटर पानी में मिला कर मिट्टी में मिला देते हैं. क्लोरपाइरिफास चूर्ण 1.5 प्रतिशत से 250 ग्राम प्रति थाले के हिसाब से मिट्टी में मिला देना चाहिए.

* दिसंबर के अंतिम सप्ताह तक वृक्ष के मुख्य तने पर लगभग 1/2 मीटर की ऊंचाई पर 25-30 सैंटीमीटर 300-400 गेज की पौलीथिन शीट को पतली सुतली से बांध कर दोनों सिरों को चिकनी मिट्टी या ग्रीस से लेप देना चाहिए.

* पेड़ों की मुलायम पत्तियों, टहनियों और पुष्पक्रम पर चिपकी हुई चूर्णी बग को एल्फासाइपर मेथ्रिन 10 प्रतिशत 0.25 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी या मेटासिस्टौक्स के 0-025 प्रतिशत या रोगर के 0-04 प्रतिशत या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल की 0.5 मिलीलिटर प्रति लिटर घोल के छिड़काव द्वारा नष्ट किया जा सकता है.

भुनगा अथवा लस्सी कीट

इस कीट के व्यस्क व शिशु (भुनके) कोमल शाखाओं, पत्तियों एवं पुष्पक्रमों से रस चूसते हैं. निरंतर रस चूसे जाने के कारण प्रभावित हिस्से सूखने लगते हैं. ये फलों के मुलायम वृंत से भी रस चूसते हैं, जिस से फल गिर जाते हैं.

इस के द्वारा उत्सर्जित मधु लैस पदार्थ पर काली फफूंदी (सूटीमेल्ड) उग जाती है, जिस से पत्तियों की प्रकाश संश्लेष्ण की क्रिया अवरुद्ध हो जाती है.

इस कीट की मादा बौर वाली शाखाओं व फूलों में बड़ी संख्या में अंडे देती है, जिस से तंतुओं को भारी क्षति पहुंचती हैं. ये नमी वाले और छायादार स्थान पसंद करते हैं. घने बागों में ज्यादा प्रकोप होता है और जिन में पानी ज्यादा भरा होता है. यदि इन के प्रकोप के समय बादल रहते हैं और पुरवाई हवा चलती है, तो इस कीट का प्रकोप अधिक होता है. कीट का प्रकोप बौर निकलते ही जनवरी फरवरी माह में प्रारंभ हो जाता है.

रोकथाम

* बाग ज्यादा घना नहीं लगाना चाहिए. बाग को साफ रखना चाहिए और उस में पानी नहीं रुकने देना चाहिए.

* पुराने घने पेड़ों की बौर आने से पहले कटाई व छंटाई कर दें.

* इस कीट नियंत्रण हेतु कीटनाशकी इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल की 0.5 मिलीलिटर प्रति लिटर या डाइमेथोएट 30 ईसी दर 1-6 से 2-0 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी में या बाईफेन्थ्रीन 0.005 प्रतिशत या थायामेथोजाम 0.008 प्रतिशत की दर 2-0 मिलीलिटर की दर से करना चाहिए. यदि आवश्यकता हो तो फल बड़े होने पर अल्फासाइवमेथ्रिन का छिड़काव करें.

तना बेधक (बैटोसेरा रुफोमैक्यूलाटा)

इस कीट की इल्लियां पेड़ों व तनों व शाखाओं में छाल के नीचे वाली लकड़ी में सुरंग बना कर उस को अंदर ही अंदर खाती हैं.

इस कीट के डिंभक तने में कई वर्ष तक बने रहते हैं और इस बीच पेड़ों के तनों व शाखाओं में लंबी सुरंगें बना लेते हैं. ये सुरंगें कीट के मल, पेड़ की छाल व लकड़ी के छोटेछोटे टुकड़ों से भरी रहती हैं.

इस के प्रकोप से पेड़ की शाखाएं व तने कमजोर हो जाते हैं और आसानी से टूट जाते हैं. प्रौढ़ कीट पेड़ की पत्तियों, छाल व कभीकभी फल को भी खाते हैं.

रोकथाम

* प्रौढ़ कीट अधिकांशत: प्रकाश की तरफ आकर्षित होते हैं, इसलिए उन्हें प्रकाश ट्रैप में फंसा कर नष्ट किया जा सकता है.

* कीट ग्रसित शाखाओं को काट कर जलाने के काम में लाया जा सकता है.

* कीट द्वारा तनों व शाखाओं में बनाए गए छिद्रों में मिट्टी का तेल या पैट्रोल या एक गोली फास्टाक्सिल या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल की 0.5 मिलीलिटर प्रति लिटर या डीवीपी का घोल तने में किए गए छिद्र में डाल कर छेद को गीली मिट्टी से बंद कर देना चाहिए.

फल भेदक मक्खी

ये पीले भूरे रंग की मक्खी होती हैं. मादा मक्खी अपने कडे़ अंडनिक्षेप से पकने वालों फलों की छाल के नीचे सिंगार के आकार के जूनजुलाई के महीने में सफेद अंडे देती हैं.

एक मक्खी 150 से 200 तक अंडे देती हैं. अंडे 2-3 के बाद फूटने पर इन से छोटेछोटे मैगट (सूंड़ी) निकलते हैं जो आम के गूदे को खाते हैं, जिस के परिणामस्वरूप फल सड़ कर गिर जाते हैं. वहां ये भूरे रंग के प्यूपा में परिवर्तित हो जाते हैं.

सर्दियों में प्यूपा शीतनिष्क्त्रयता तक निष्क्त्रय अवस्था में रहते हैं. यहां वे प्रौढ़ मक्खी बन कर अन्य फलों को ग्रसित करते हैं. इस कीट का प्रकोप पतली त्वचा व देर से पकने वाले फलों पर अधिक होता है.

रोकथाम

* आम के बाग में साफसफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए.

* पेड़ के आसपास पड़े ग्रसित फलों को जला देना चाहिए या एकत्रित कर के जमीन में एक मीटर की गहराई में दबा देना चाहिए.

* सर्दियों में बाग को मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई कर मिट्टी को पलट देना चाहिए. इस से कीट की प्यूपा अवस्था नष्ट हो जाती है.

* प्रौढ़ मक्खी को चारा प्रलोभन (कार्बोरिल 4 ग्राम प्रति लिटर पानी में व 0-1 प्रतिशत प्रोटीन हाइर्ड्रोजाइलेट अथवा शीरे के घोल का छिड़काव) से आकर्षित कर के नष्ट कर देते हैं.

* प्रौढ़ नर मक्खी को मिथाइल यूजिनोल 0-1 प्रतिशत मैलाथियान 0-1 प्रतिशत व एल्कोहल से बने ट्रैप को बागों में पेड़ पर लटकाएं, जिस से नर मक्खी ट्रैप में आक्रर्षित हो कर मर जाती हैं.

शाखा बेधक कीट

इस कीट की इल्लियां मुलायम पत्तियों की मध्य शिरा के अंदर छेद कर के घुस जाती हैं. उस के बाद मध्य शिरा से निकल कर मुलायम टहनियों के अग्रभाग से यह कीट अधिक हानि पहुंचाता है तथा इस का प्रकोप मार्चअप्रैल तथा अगस्त से अक्तूबर माह तक अधिक रहती है.

जब ये इल्लियां पूर्ण विकसित हो जाती हैं तो टहनियों से बाहर आ कर पेड़ों की छाल के नीचे, विकृत बौर या जमीन मे दरारों के अंदर प्यूपा अवस्था में परिवर्तित हो जाती हैं. क्षतिग्रस्त टहनियों की पत्तियां सूख कर गिर जाती हैं. पेड़ों पर बौर कम आता है और फल बहुत कम बनते हैं. इस प्रकार यह आम का बहुत हानिकारक कीट है.

रोकथाम

* नीम उत्पादित कीट विष जैसे 5 प्रतिशत एनएसकेई का प्रयोग करें.

* प्रमुख कीटनाशियों को प्रभावित प्ररोह व नई शाखाओं 15 दिन के अंतराल पर 3-4 बार छिड़काव 700 लिटर पानी में घोल कर करें.

* क्लोरपाइरिफास के 0-2 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी मात्रा को प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें.

* अधिक प्रकोप होने पर पेड़ों पर अगस्त से 2-3 बार लैंसर गोल्ड 0.75 ग्राम या एसिफेट 75 प्रतिशत डब्लूपी का छिड़काव करना चाहिए.

गुठली बेधक घुन

इस कीट के प्रौढ़ व ग्रब दोनों फलों को क्षति पहुंचाते हैं. ग्रब गूदे से होते हुए गुठली तक चले जाते हैं. पहले ये गुठली की बाह्य भित्ति को खाते हैं और बाद में अंदर घुस कर बीजपत्रों को नष्ट करते हैं. बाद में प्रौढ़ कीट पके हुए फलों से बाहर निकल आते हैं. इस कारण गुठली में सड़न पैदा हो जाती है. बीजपत्र काले हो जाते हैं और इस प्रकार की गुठली जमती नहीं हैं.

जुलाईअगस्त के बाद प्रौढ़ घुन पेड़ों की छाल के नीचे सुघुप्तावस्था में चले जाते हैं जो अगले साल फल आने के मौसम में दोबारा सक्रिय हो जाते हैं. इस प्रकार इस कीट की एक पीढ़ी ही पाई जाती है.

रोकथाम

* क्षतिग्रस्त फलों को पकने से पूर्व ही तोड़ कर नष्ट कर देना चाहिए.

* बाग में पेड़ों पर अगर ढीली छाल हो तो उसे नष्ट कर देना चाहिए.

* बाग मे पूर्ण सफाई रखनी चाहिए.

आम के प्रमुख रोगों का प्रबंधन

चूर्णिल आसिता

उष्ण, नम वातावरण और ठंडी रातों में इस रोग की उग्रता बढ़ जाती है. मंजरियों और नई पत्तियों पर सफेद या घूसर चूर्णिल वृद्धि दिखलाई पड़ती है.

रोग का संक्रमण मंजरियों की शिखा से प्रारंभ हो कर नीचे की ओर पुष्प अक्ष, नई पत्तियों और पतली शाखाओं पर फैल जाता है. इस से प्रभावित भागों की वृद्धि रुक जाती है. पुष्प और पत्तियां गिर जाती हैं. यदि संक्रमण के पूर्व फल लग गए हों तो वे अपरिपक्व अवस्था में ही गिर जाते हैं.

प्रबंधन

* रोकथाम के लिए 0.05 से 0.1 प्रतिशत कैराथेन/ 0.1 प्रतिशत बाविस्टिन/0.1 प्रतिशत बेनोमिल/कैलेक्जीन 0.1 प्रतिशत का छिड़काव करना उपयोगी है.

* घुलनशील गंधक (0.2 प्रतिशत) नामक कवकनाशक दवाओं का घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

श्याम वर्ण या एंथ्रेकनोज

पेड़ों की कोमल टहनियों, फलों और फूलों पर इस रोग को देखा जा सकता है. पत्तियों पर भूरे या काले, गोल या अनियमिताकार धब्बे पाए जाते हैं. परिणामस्वरूप पत्तियों की वृद्धि रुक जाती है और ये सिकुड़ जाती हैं. कभीकभी रोगग्रस्त ऊतक सूख कर गिर जाते हैं, जिस से पत्तियों में छिद्र दिखाई पड़ते हैं.

उग्र संक्रमण में रोगी पत्तियां गिर जाती हैं. कच्चे फलों पर काले धब्बे बनते हैं. धब्बे दाग के नीचे का गूदा सख्त हो कर फट जाता है और फल अंत में गिर जाते हैं. यह रोग मंजरी, अंगमारी तथा फल सड़न के रूप में भी प्रकट होता है.

प्रबंधन

* रोगी टहनियों की छंटाई कर उन्हें गिरी हुई पत्तियों के साथ जला देना चाहिए.

* रोकथाम के लिए रोगी पेड़ों पर 0.2 प्रतिशत ब्लाइटाक्स-50, फाइटलोन या बोर्डो मिश्रण (0.8 प्रतिशत) नामक दवाओं के घोल का छिड़काव करना चाहिए.

* भंडारण से पूर्व फल को 0.05 प्रतिशत करबेन्डाजीन के घोल में डुबा कर भंडारित करें.

काली फफूंदी या सूटी मोल्ड

यह आम पर आक्रमण करने वाले कीटों से संबंधित हैं. ये कीट पेड़ की पत्तियों एवं हरी टहनियों पर मीठा स्राव छोड़ता है. इस स्राव पर कज्जली फफूंद बड़ी तेजी से वृद्धि करता है तथा कवक काले रंग के असंख्य बीजाणु बनाता है.

इस काली वृद्धि के कारण पत्तियां, मंजर और टहनियां काली एवं भद्दी दिखती हैं. पौधा/पेड़ भोजन बनाने में असमर्थ हो जाता है. पत्तियां कमजोर हो कर गिर जाती हैं.

प्रबंधन

* स्केल कीट गुजिया तथा भुनका कीटों की रोकथाम उचित कीटनाशक से करने पर उन से विसर्जित मधुद्रव्य के अभाव में फफूंद भी पनप पाती है.

* इलोसाल (900 ग्राम प्रति 450 लिटर पानी) का 10-15 दिनों के अंतराल पर छिड़काव अत्यंत लाभदायी है.

* इस के अतिरिक्त वेटासुल (विलनशील गंधक), मेटासिड (मेथाइल पैराथियान), गोंद (0.2 प्रतिशत -0.1 प्रतिशत – 0.3 प्रतिशत) छिड़काव लाभदायक होगा.

पर्ण अंगमारी

यह रोग आम की पूरी पत्तियों पर अकसर देखा गया है. पत्तियों पर गोल, हलके भूरे धब्बों के रूप में प्रकट होते हैं. ये धब्बे अंडाकार या अनिश्चित आकार के तथा गहरे भूरे रंग के हो जाते हैं. इन की परिधि चौड़ी, कुछ उठी हुई और गहरे बैगनी रंग की होती है. पुराने धब्बों का रंग राख के समान हो जाता है.

प्रबंधन

* निवेश द्रव्य को कम करने हेतु रोगी पत्तियों को इकट्ठा कर जला देना चाहिए. श्याम वर्ण रोग की रोकथाम हेतु प्रयुक्त कवकनाशी इस रोग में भी लाभकारी होते हैं.

* बेनोमिल (0.2 प्रतिशत) या कौपर औक्सीक्लोराइड (0.3 प्रतिशत) का छिड़का करना उपयोगी होगा.

शीर्ष मरण

इसे उलटा सूखा रोग या शीर्ष मरण रोग कहते हैं, जिस का रोग कारक बाट्रीयोडिप्लोडिया थियोब्रोमी नामक फफूंद है. यह रोग वर्षभर कभी भी देखा जा सकता है किंतु स्पष्ट रूप से इसे अक्तूबर और नवंबर माह में देखा जा सकता है.

इस में सर्वप्रथम पत्तियों पर अनियमित आकार के गहरे धब्बे बनते हैं, जिस की वजह से पत्तियां पीली हो कर गिर जाती हैं तथा टहनी नंगी हो कर ऊपर से नीचे की तरफ सूखने लगती है. इस रोग के कारण कभी पीले रंग का गाढ़ा स्राव भी निकलते देखा गया है.

प्रबंधन

* टहनी जहां तक सूख गई है उस के 10 सैंटीमीटर नीचे से पेड़ के स्वस्थ भाग के साथ काट कर अलग करने के पश्चात कौपर औक्सीक्लोराइड (0.3 प्रतिशत) का 15 दिन के अंतराल पर 2 छिड़काव करते हैं.

* वर्ष में 2 बार बोर्डो पेस्ट मुख्य तने पर लगाएं.

* ऐसे बाग जहां पर प्रकोप अधिक व बारबार होता हो वहां नेप्थलीन एसिटिक एसिड (एनएएन) (200 पीपीएम 900 मिलीलिटर दवा प्रति 200 लिटर पानी) का छिड़काव अक्तूबरनवंबर में करना चाहिए.

बैक्टीरियल कैंकर

यह रोग जल सिक्त काला धब्बा पत्तियों, पर्णवृत और फलों पर देखे जाते हैं. फलों में फटने के लक्षण भी दिखाई देते हैं. पहले संक्रमित सतह पर जलसिक्त धब्बे बनते हैं जो बाद में उभरे से कैंकर बन जाते हैं.

छोटेछोटे जलसिक्त अनियमित कोणिक उभरे हुए 1-4 मिलीमीटर के धब्बे पत्तियों पर बनते हैं, जो अनियमिताकार में हो कर गहरे भूरे कैंकर में परिवर्तित हो जाते हैं. रोग की तीव्रता बढ़ने पर पत्तियां पीली पड़ती हैं और पेड़ से गिर जाती हैं.

प्रबंधन

* बाग की बराबर निगरानी और साफसफाई रखना, संक्रमित फलों, पत्तियों और टहनियों को जला कर नष्ट कर देना चाहिए.

* अधिक प्रकोप होने पर स्ट्रोप्टोमाइक्लीन (300 पीपीएम) और साथ में कौपर औक्सीक्लोराइड (0.3 प्रतिशत) का छिड़काव करें.

गुच्छा रोग या कुरचना

इस रोग में पेड़ों की शाखाओं एवं पुष्पक्रमों की बनावट विकृत हो जाती है. नई शाखाएं व पुष्पक्रम गुच्छों के रूप में परिणत हो जाते हैं. शाखा गुच्छा रोग अधिकतर नर्सरी के छोटे पौधों में पाया जाता है, परंतु बड़े पेड़ों पर भी रोग देखा जा सकता है.

पुष्पक्रम गुच्छा रोग में सारे पुष्प गुच्छों का रूप धारण कर लेते हैं. बाद में कभीकभी इन गुच्छों में से छोटीछोटी पत्तियां ठीक तरह से निकल आती हैं. इन गुच्छों में फल नहीं आते हैं. यह व्याधि कई कारणों के सम्मिलित प्रभाव से उत्पन्न होती है. इस दिशा में शोध कार्य जारी है.

प्रबंधन

* रोकथाम के लिए निम्न उपाय करने चाहिए? पौध तैयार हमेशा स्वस्थ पौधों से ही करनी चाहिए. विकृत भागों को काट कर नष्ट कर देना चाहिए. अक्तूबर के महीने में 2 ग्राम अल्फा नेफ्थलीन एसिटिक एसिड प्रति 10 लिटर पानी में मिला कर छिड़काव करने से उपज बढ़ाई जा सकती है.

* सर्वप्रथम निकलने वाले पुष्प गुच्छों को हाथ से तोड़ देना चाहिए. यह काम मंजरियों के या 2 सैंटीमीटर लंबी होने से पूर्व ही करना चाहिए. ऐसा करने से प्ररोह के ऊपर अनेक कक्षस्थ कलिकाएं बढ़ने लगती हैं और वे 2 सप्ताह में मंजरी का रूप ले लेती हैं. ऐसी मंजरियों में फल लगने लगते हैं. समय से पूर्व निकलने वाले फूल को तोड़ कर हटाते रहना चाहिए.

काला सिरा या ऊतक क्षय

यह रोग विषैली गैस के कारण होता है. इसे कोयली या सिरा विगलन रोग से भी जाना जाता है. ईंट के भट्ठों के पास के पेड़ों में अधिकांश फल रोग से प्रभावित होते हैं.

फल के अग्र (कोणीय) सिरे पर काला धब्बा बनता है जो पूरे सिरे को ढक लेता है. बाद में चपटा हो जाता है. ग्रसित त्वचा सख्त एवं कुछ दबी होती है तथा अंदर का ऊतक मीठा हो जाता है.

अमरूद की बागबानी

अमरूद ऐसा फल है, जो देश के ज्यादातर हिस्सों में पाया जाता है. गुणों की भरमार वाले इस फल की तुलना सेब से की जाती है. अमरूद की बागबानी न केवल आसानी से हो जाती है, बल्कि इस के जरीए अच्छा मुनाफा भी कमाया जा सकता है.

अमरूद का उत्पादन देश में सब से ज्यादा उत्तर प्रदेश, गुजरात, बिहार, मध्य प्रदेश, कर्नाटक व आंध्र प्रदेश में होता है. अमरूद की बागबानी सभी तरह की जमीन पर की जा सकती है. वैसे, गरम और सूखी जलवायु वाले इलाकों में गहरी बलुई दोमट मिट्टी इस के लिए ज्यादा अच्छी मानी जाती है.

उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में रेलवे स्टेशन के नजदीक स्थित ऐतिहासिक खुशरूबाग में बना ‘औद्यानिक प्रयोग एवं प्रशिक्षण केंद्र’ अमरूद की न केवल पौध तैयार करता है, बल्कि वहां इच्छुक लोगों को अमरूद की बागबानी का प्रशिक्षण भी दिया जाता है. वहां के इलाहाबाद सफेदा और सरदार अमरूद खासतौर पर मशहूर हैं. वहां अमरूद की एक और उन्नत किस्म ललित को भी तैयार किया गया है.

यह गुलाबी और केसरिया रंग लिए होता है. इस की पैदावार दूसरे अमरूदों के मुकाबले 24 फीसदी ज्यादा होती है. गुलाबी आभा, मुलायम बीज व अधिक मिठास वाले अमरूदों की पैदावार हर कोई वैज्ञानिक तरीके से कर सकता है.

पौधारोपण

अमरूद का पेड़ 2 साल बाद ही फल देना शुरू कर देता है. यदि शुरुआत में ही पेड़ की देखरेख अच्छी तरह से हो जाए, तो 30-40 सालों तक अच्छा उत्पादन मिल सकता है. देश में अमरूद के पौधे ज्यादातर बीजों के द्वारा तैयार किए जाते हैं, लेकिन माना जाता है कि इस से पेड़ों में भिन्नता आ जाती है.  इसलिए अब वानस्पतिक विधि द्वारा पौधे तैयार किए जाने पर जोर दिया जा रहा है.

कलमी अमरूद के पौधे जुलाई, अगस्त व सितंबर महीने में पौध रोपण के लिए मुनासिब माने जाते हैं. सिंचित इलाकों में पौधरोपण फरवरी व मार्च के महीनों में भी किया जा सकता है. अमरूद के पौधों को 5×5 मीटर या 6×6 मीटर की दूरी पर लगाया जाना ज्यादा लाभकारी होता है. अमरूद के छोटे पेड़ों की सिंचाई अच्छी होनी चाहिए, जिस से कि जहां जड़ें हों, वहां की मिट्टी को नम रखा जा सके. पेड़ बड़े होने के बाद 10 से 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए.

खाद व उर्वरक

पौधा लगाते समय प्रति गड्ढा तकरीबन 20 किलोग्राम गोबर की खाद डालनी चाहिए. इस के बाद आगे बताए अनुसार हर साल खाद डालनी चाहिए.

पहला साल : गोबर की खाद 15 किलोग्राम, यूरिया 250 ग्राम, सुपर फास्फेट 375 ग्राम व पोटैशियम सल्फेट 500 ग्राम डालें.

दूसरा साल : गोबर की खाद 30 किलोग्राम, यूरिया 500 ग्राम, सुपर फास्फेट 750 ग्राम व पोटैशियम सल्फेट 200 ग्राम डालें.

तीसरा साल : गोबर की खाद 45 किलोग्राम, यूरिया 750 ग्राम, सुपर फास्फेट 1125 ग्राम व पोटैशियम सल्फेट 300 ग्राम डालें.

चौथा साल : गोबर की खाद 60 किलोग्राम, यूरिया 1050 ग्राम, सुपर फास्फेट 1500 ग्राम व पोटैशियम सल्फेट 400 ग्राम डालें.

पांचवां साल : गोबर की खाद 75 किलोग्राम, यूरिया 1300 ग्राम, सुपर फास्फेट 1875 ग्राम व पोटैशियम सल्फेट 500 ग्राम डालें.

ज्यादा अच्छा होगा कि पेड़ की आयु के अनुसार हर पेड़ के लिए खाद को 2 भागों में बराबर बांट लें. इस का आधा भाग जून में व आधा भाग अक्तूबर में तने से 1 मीटर दूर चारों ओर डालने के साथ ही सिंचाई भी कर दें. फसल में और्गैनिक दवाओं का प्रयोग भी किया जा सकता है.

कटाई, छंटाई और सधाई

शुरू में पेड़ों को मजबूत ढांचा देने के लिए सधाई की जानी चाहिए. यह देखना चाहिए कि मुख्य तने पर जमीन से लगभग 90 सैंटीमीटर ऊंचाई तक कोई शाखा न हो. इस ऊंचाई पर मुख्य तने से 3 या 4 प्रमुख शाखाएं बढ़ने दी जाती हैं. इस के बाद हर दूसरे या तीसरे साल ऊपर से टहनियों को काटते रहना चाहिए, जिस से पेड़ की ऊंचाई ज्यादा न बढ़े. यदि जड़ में कोई फुटाव निकले, तो उसे भी काटते रहना चाहिए.

फसल प्रबंधन व तोड़ाई

पेड़ के पूरी तरह तैयार हो जाने के बाद साल में अमरूद की 2 फसलें प्राप्त होती हैं. एक फसल बरसात के दौरान व दूसरी जाड़े के मौसम में प्राप्त होती है. बरसात के मौसम में ज्यादा उपज प्राप्त होती है, पर इस के फल घटिया होते हैं. छेदक कीट भी उन्हें नुकसान पहुंचा देते हैं. व्यापार के लिहाज से जाड़े की फसल को ज्यादा महत्त्व दिया जाना चाहिए. पेड़ों की देखरेख और समय पर खादपानी देने से ज्यादा पैदावार प्राप्त की जा सकती है.

यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि उपज की मात्रा किस्म, जलवायु व पेड़ की उम्र पर निर्भर करती है. पूरी तरह तैयार पेड़ से सीजन में तकरीबन 400 से 600 तक फल प्राप्त हो जाते हैं. अमरूद की तोड़ाई थोड़ी सी डंठल व कुछ पत्तों सहित कैंची से करनी चाहिए. तोड़ाई एकसाथ नहीं, बल्कि 2-3 बार में करनी चाहिए. आधे पके अमरूदों को तोड़ना ठीक रहता है.

बागबानी

अमरूद की फसल में सब से ज्यादा खतरनाक उकठा रोग माना जाता है. एक बार बाग में इस का संक्रमण होने से कुछ सालों में पूरे बाग को नुकसान पहुंच जाता है. ऐसी जगह पर दोबारा अमरूद का बाग नहीं लगाना चाहिए. इस बीमारी से शाखाएं और टहनियां एकएक कर के ऊपरी भाग से सूखने लगती हैं और नीचे की तरफ सूखती चली जाती हैं. एक समय ऐसा भी आता है, जब पूरा पेड़ ही सूख जाता है. इस बीमारी से बचने के लिए ये उपाय जरूर करने चाहिए :

* जैसे ही पेड़ में रोग के लक्षण दिखाई दें, तो उस पेड़ को उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए.

* बाग को साफसुथरा रखें, खरपतवार न रहने दें.

* बाग में ज्यादा पानी होने पर उस की निकासी का इंतजाम करें.

* हरी और कार्बनिक खाद का इस्तेमाल करें.

संक्रमण

अमरूद के बाग में फल गलन या टहनीमार रोग  का संक्रमण भी हो जाता है. नतीजतन, बनते हुए फल छोटे, कड़े व काले रंग के हो जाते हैं. इस रोग के सब से ज्यादा लक्षण बारिश के मौसम में पकते हुए फलों पर दिखाई पड़ते हैं.

फल पकने वाली अवस्था में फलों के ऊपर गोलाकार धब्बे पड़ जाते हैं और बाद में बीच में धंसे हुए स्थान पर नारंगी रंग की फफूंद हो जाती है. डालियों पर संक्रमण होने पर डालियां पीछे से सूखने लगती हैं. इस रोग के होने पर डालियों को काट कर 0.3 फीसदी कौपर औक्सीक्लोराइड के घोल का छिड़काव करना चाहिए. फल लगने के दौरान 15 दिनों के अंतराल पर 2-3 बार छिड़काव करें.

कीट नियंत्रण

बरसाती फसल पर फलमक्खियां सब से ज्यादा मंडराती हैं. मादा मक्खी फलों में छेद कर देती है और छिलके के नीचे अंडे देती है. इस के इलाज का तरीका यही है कि मक्खी से ग्रसित फलों को जमा कर के नष्ट कर दें. मक्खियों को मारने के लिए 500 लिटर मैलाथियान 50 ईसी, 5 किलोग्राम गुड़ या चीनी को 500 मिलीलिटर पानी में मिला कर प्रति एकड़ की दर से छिड़कें. अगर प्रकोप बना रहता है, तो छिड़काव 7 से 10 दिनों के अंतर पर दोहराएं.

छाल सूंड़ी

अमरूद के पेड़ों को नुकसान पहुंचाने वाला एक और कीट है, छाल खाने वाली सूंड़ी. यह कीट आमतौर पर दिखाई नहीं देता, पर जहां पर टहनियां अलग होती हैं, वहां पर इस का मल व लकड़ी का बुरादा जाल के रूप में दिखाई देता है. इस का हमला सब से ज्यादा पुराने पेड़ों पर होता है. सालभर में इस की एक ही पीढ़ी होती है, जो जूनजुलाई महीने से शुरू होती है.

इलाज के तौर पर संक्रमित शाखाओं में कीट द्वारा बनाए गए छेदों में डाईक्लोरोवास (नुवान) में डुबोई रूई के फाहों को किसी तार की सहायता से डाल दें और सुराख को गीली मिट्टी से ढक दें. यह काम फरवरीमार्च माह में करना चाहिए.

दूसरे उपाय के तौर पर, सितंबरअक्तूबर माह में 10 मिलीलिटर मोनोक्रोटोफास (नुवाक्रोन) या 10 मिलीलिटर मिथाइल पैराथियान (मैटासिड) को 10 लिटर पानी में मिला कर सुराखों के चारों ओर की छाल पर लगाएं.

बाग का रखरखाव

बरसात के बाद ही ज्यादातर पेड़ों के ऊपर से पत्तियां पीली होने लगती हैं व पेड़ों की शाखाएं एक के बाद एक सूखने लगती हैं. इसलिए रखरखाव किया जाना चाहिए.

दिसंबर से फरवरी माह के दौरान पेड़ों में काटछांट करने के बाद पर्याप्त मात्रा में नए कल्ले बनते हैं. इन कल्लों के फैलाव व विकास के लिए मईजून माह में प्रबंधन किया जाना चाहिए. इस से जाड़े में फसल अच्छी होती है. इसी प्रकार मई माह में काटछांट कर ठीक किए गए पेड़ों से निकलने वाले कल्लों का प्रबंधन अक्तूबर माह में किया जाना चाहिए. ऐसा करने से बरसात में फसल अच्छी होती है.

सघन बागबानी : कमाई का दमदार जरिया

खेतीबागबानी की जमीन बढ़ती जनसंख्या के साथसाथ लगातार घट रही है, ऐसे में लंबेचौड़े इलाके में खुलेआम बाग लगाना घाटे का सौदा है. हालात से निबटने के लिए सघन बागबानी अपनाने में ही बागबानों व देश की भलाई है. फल इनसानों के लिए सभी जरूरी पोषक तत्त्वों से भरपूर होते हैं. वर्तमान में फलों की पैदावार में देश का दूसरा स्थान है. आजादी के बाद देश का फल उत्पादन 6 गुने से भी अधिक बढ़ा, मगर देश की बढ़ती हुई जनसंख्या को देखते हुए इसे और बढ़ाने की जरूरत है. इस समय देश में फलों के पेड़ों को लगाने की जो परंपरा है,वह ज्यादा जगह लेने के साथसाथ ज्यादा समय भी ले रही है.

इन समस्याओं से नजात पाने के लिए वर्तमान में हाईडैंसिटी प्लांटिंग (एचडीपी) यानी सघन बागबानी एक दमदार जरीया साबित हुई है. इस से प्रति इकाई अधिकतम उत्पादन और लाभ लिया जा सकता है.

क्या है सघन बागबानी: यह फलों के पेड़ लगाने की नई तरकीब है, जिस का मतलब है प्रति इकाई क्षेत्र में अधिकतम पैदावार लेने के लिए कम अंतर पर फलों के पेड़ों को लगाना. इस विधि में जमीन का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने के लिए पौधों को रोपते समय कम दूरी रखी जाती है.

बहुत से देशों में आम, सेब, आड़ू व संतरा वगैरह फलों में इस विधि के जरीए सामान्य विधि के मुकाबले कई  गुना ज्यादा उपज हासिल की जा रही है. खास बात यह है कि भारत में बागबानी क्षेत्र को बढ़ाने के साथसाथ उस के उत्पादन में इजाफा करने के लिए वर्ष 2005-2006 से चलाए जा रहे राष्ट्रीय बागबानी मिशन के तहत सघन बागबानी को पूरा बढ़ावा व सहयोग दिया जा रहा है.

भारत में इस तकनीक का इस्तेमाल प्राय आम, अमरूद, नीबूवर्गीय फलों, सेब, केला, पपीता, अनार, नाशपाती, अनानास वगैरह में किया जा रहा है और उत्तर भारत के राज्यों में आम, अमरूद और नीबूवर्गीय फलों में सघन बागबानी बहुत ही सफल साबित हुई है.

सघन बागबानी में ध्यान रखने वाली बातें

जल्दी फल व अधिक उपज देने वाली प्रजातियां : फलों की अधिक बढ़ने वाली जातियों के मुकाबले कम बढ़ने वाली जातियां सघन रोपण के लिए ज्यादा अच्छी होती हैं. जैसे कि आम की आम्रपाली, अमरूद की लखनऊ 49 (सरदार), सेब की सुपर गोल्डन प्रजातियां. इसी प्रकार जल्दी फल व अधिक उपज देने वाली प्रजातियों का चयन करना चाहिए.

उपजाऊ मिट्टी : फलों के पेड़ों के सघन रोपण के लिए अच्छी उपजाऊ मिट्टी की जरूरत होती है, क्योंकि इस विधि में प्रति इकाई क्षेत्र में अधिक पेड़ों को लगाया जाता है, इसीलिए जमीन से अधिक मात्रा में पोषक तत्त्व लिए जाते हैं.

अच्छी आबोहवा : तापमान, रोशनी, बारिश, वातावरण की नमी और वायु वगैरह आबोहवा के खास कारक हैं, जो फलों के पेड़ों के लगाने के अंतर को प्रभावित करते हैं. सघन बागबानी के लिए, बाग लगाने वाले क्षेत्र में सही तापमान व रोशनी का भरपूर मात्रा में होना जरूरी है. इस के अलावा बारिश की मात्रा, वातावरण की नमी और हवा का असर भी जरूरत के हिसाब से होना चाहिए.

सिंचाई : जिन क्षेत्रों में सिंचाई का सही इंतजाम नहीं है और बारिश भी जरूरत के मुताबिक नहीं होती है, वहां सघन बागबानी करना मुनासिब नहीं है, क्योंकि प्रति इकाई क्षेत्र ज्यादा पेड़ होने के कारण ज्यादा मात्रा में पानी की जरूरत होती है. सघन बागबानी में सिंचाई का ड्रिप तरीका अधिक मुफीद साबित हुआ है. साधारण बागबानी के मुकाबले सघन बागबानी में पेड़ों की सही बढ़वार के लिए अधिक कटाई की जरूरत होती है. शुरुआती सालों में फल के पेड़ों का ढांचा बनाने के लिए और बाद के सालों में पेड़ों को उपजाऊ बनाने के लिए कटाई व सधाई की जाती है.

सघन बागबानी के फायदे

* प्रति इकाई पेड़ों की संख्या अधिक होने के कारण उत्पादन भी अधिक.

* जल्दी फल उत्पादन.

* पौधों का आकार छोटा होने के कारण बागों की देखरेख में आसानी.

* कम मजदूरों की जरूरत.

* कम लागत, अधिक उत्पादन.

* कम जगह में भी अधिक पैदावार मुमकिन.

सघन बागबानी की जानकारी का जरीया : चूंकि सघन बागबानी के लिए काफी तकनीकी जानकारी की जरूरत होती है, लिहाजा, शुरुआत करने से पहले बेहतर होगा कि इस के माहिरों से जरूर मिलें.

इस के लिए आप अपने जिला उद्यान अधिकारी या कृषि विज्ञान केंद्र के उद्यान विशेषज्ञ से संपर्क कर सकते हैं. इस के अलावा नजदीकी कृषि विश्वविद्यालय के बागबानी संस्थान से भी संपर्क कर सकते हैं.