तराई में हो रही रंग बिरंगे फूलों की खेती (Flower Farming)

ग्लेडियोलस के फूलों की मांग देशविदेश तक में होती है. किसान इसे आसानी से अपने आसपास के मार्केट में बेच सकता है.

लखीमपुर खीरी जिले की बिजुवा ब्लौक के मड़ईपुरवा गांव के प्रगतिशील किसान अचल कुमार मिश्रा ने सीएसआईआर- एनबीआरआई के सहयोग से विदेशी ग्लेडियोलस फूलों की खेती शुरू की है.

किसान अचल कुमार मिश्रा ने बताया कि पारंपरिक खेती की तुलना में ग्लेडियोलस की खेती में अच्छा मुनाफा मिल रहा है. इसी वजह से आसपास के किसान भी इस खेती से प्रेरित हो रहे हैं.

उन्होंने आगे बताया कि एक एकड़ में उन्होंने ग्लेडियोलस की खेती की शुरुआत की है. इस खेती में कम लागत से मुनाफा मिल रहा है. इस के अलावा फूलों के साथ साथ स्टिक और बीजों से भी अच्छी आमदनी हो जाती है.

ग्लेडियोलस की उन्नतशील प्रजातियां

ग्लेडियोलस की लगभग 10,000 किस्में हैं, लेकिन कुछ मुख्य प्रजातियों की खेती उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों में होती है जैसे स्नो क्वीन, सिल्विया, एपिस ब्लास्मे, बिग्स ग्लोरी, टेबलर, जैक्सन लिले, गोल्ड बिस्मिल, रोज स्पाइडर, कोशकार, लिंकेन डे, पैट्रीसिया, जार्ज मैसूर, पेंटर पियर्स, किंग कीपर्स, किलोमिंगो, क्वीन, अग्नि, रेखा, पूसा सुहागिन, नजराना, आरती, अप्सरा, सोभा, सपना और पूनम आदि हैं.

ग्लेडियोलस की प्रति हेक्टेयर बोआई

एक हेक्टेयर भूमि की रोपाई के लिए लगभग 2 लाख कंदों की आवश्यकता पड़ती है. यह मात्रा कंदों की रोपाई की दूरी पर घटबढ़ सकती है.

कंदों का शोधन बाविस्टीन के 0.02 फीसदी के घोल में आधा घंटा डुबो कर छाया में सुखा कर बोआई या रोपाई करनी चाहिए.

कंदों की रोपाई का उत्तम समय उत्तरभारत के मैदानी क्षेत्रों में सितंबर से अक्तूबर तक होता है. कंदों की रोपाई लाइनों में करनी चाहिए. शोधित कंदों को लाइन से लाइन एवं पौधे से पौधे की दूरी 20 सैंटीमीटर अर्थात 20 गुणा 20 सैंटीमीटर की दूरी पर 5 सैंटीमीटर की गहराई पर रोपाई करनी चाहिए. लाइनों में रोपाई से निराईगुड़ाई में आसानी रहती है और नुकसान भी कम होता है.

कृषि मंत्री ने की फूलों की खेती की सराहना

मड़ई पुरवा में हो रही विदेशी फूलों की खेती को ले कर कृषि, कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने ग्लेडियोलस के फूलों को देख कर मंच से सराहना करते हुए कृषि में दिनप्रतिदिन हो रहे नवाचारों के बारे जानकरी दी. उन्होंने कहा कि फूलों की खेती से कम लागत में अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है.

नेपाल से भी आ रही डिमांड

ग्लेडियोलस के फूलों की पड़ोसी देश नेपाल से भी ज्यादा डिमांड हो रही है, वहीं सहालग शुरू होने की वजह से 10 से 15 रुपए प्रति स्टिक फूलों का अच्छा भाव मिल रहा है. अब तक नेपाल को 10,000 स्टिक सप्लाई की जा चुकी है.

एफपीओ बना कर करा रहे समूहबद्ध खेती

किसानों को उन की उपज का बेहतर मूल्य मिल सके, इस के लिए जगदेवपुर यूएस फार्मर आर्गनाइजेशन प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड बना कर के जनजाति समाज को भी फूलों की खेती से जोड़ कर उन्हें सशक्त बना रहे हैं. अचल कुमार मिश्रा ने बताया कि उन के समूह में अब तक 800 से अधिक किसान जुड़े हुए हैं.

छोटे किसानों के लिए बड़े काम के पावर टिलर (power tiller)

किसानों को खेती में कई तरह के कृषि यंत्रों  की जरूरत  होती है. कृषि यंत्रों में पावर टिलर (power tiller) भी काफी उपयोगी और ज्यादा किसानों तक पहुंच बनाने वाला कृषि यंत्र है. यह पावर टिलर कई ऐसे काम करता है, जो काम ट्रैक्टर द्वारा किए जाते हैं. इसलिए इस यंत्र को हम ‘छोटा ट्रैक्टर’ भी कह सकते हैं.

इस यंत्र की मदद से खेत की जुताई का काम, पावर टिलर में पानी का पंप जोड़ कर तालाब, नदीबंबे आदि से पानी भी खेतों तक पहुंचाया जा सकता है. इस के अलावा इस पावर टिलर के साथ अनेक तरह के कृषि यंत्रों को जोड़ कर खेती के अनेक काम आसानी से किए जा सकते हैं. छोटी जोट वाले किसनों के लिए यह यंत्र  ट्रैक्टर का काम करता है. उन के  लिए पावर टिलर एक खास उपयोगी कृषि यंत्र है.

आजकल 2 तरह के पावर टिलर मौजूद हैं. एक पावर टिलर को डीजल से चलाया जाता है, तो कुछ पावर टिलर को चलाने के लिए पैट्रोल का इस्तेमाल किया जाता है. किसान अपनी जरूरत और सुविधा के अनुसार पावर टिलर का चुनाव कर सकते हैं. इस तरह के कृषि यंत्रों पर सरकार द्वारा सब्सिडी भी दी जाती है, जिस से छोटे व सीमांत किसान भी इन्हें आसानी से खरीद सकते हैं.

ग्रीव्स कौटन जीएस 14 डीएल पावर टिलर

ग्रीव्स कौटन जीएस 14 डीएल एक 15.2 एचपी पावर टिलर है, जिस की 2,000 रेटेड आरपीएम जनरेट है. इस में हौरिजैंटल वाटर कूल्ड डीजल इंजन है.

इस पावर टिलर में 15 लिटर का बड़ा फ्यूल टैंक आता है. यह हैंडल स्टार्ट पावर टिलर है. इस की रोटरी चैड़ाई 600 मिमी. है. इस में टाइनों की संख्या 20 है. इस में 6 फारवर्ड और 2 रिवर्स गियर्स दिए गए हैं.

इस के टायरों का साइज 6.0 Û 12.00 (6 पीआर) है. इस में सीट रियल टेल व्हील पर लगाया गया है. इस टिलर का औसत वजन 478 किलोग्राम है. यह टिलर 1.5 टन तक वजन उठा सकता है.

वीएसटी 130 डीआई पावर टिलर

Power Tiller

 

यह एक प्रमुख पावर टिलर है, जो 4 स्ट्रोक सिंगल सिलैंडर वाटर कूल्ड डीजल इंजन के साथ आता है. यह पावर टिलर 6.00 मिमी. टिलिंग चैड़ाई, गहराई 150 मिमी. तक और 220 मिमी. तक गहरी जुताई के फीचर्स के साथ आता है.

इस पावर टिलर में 11 लिटर का फ्यूल टैंक लगा होता है. साथ ही, मल्टीपल प्लेट ड्राई डिस्क टाइप क्लच और हैंड औपरेटेड इंटरनल ऐक्सपैंडिंग मेटैलिक शू टाइप ब्रेक दिए गए हैं. इस में 2 स्पीड (वैकल्पिक 4 स्पीड) रोटरी ट्रांसमिशन सिस्टम है. इस में 6 सीधे और 2 रिवर्स स्पीड दी गई है.

इस पावर टिलर का वजन तकरीबन 405 किलोग्राम है. यह पावर टिलर के साथ 13 हौर्सपावर तक के कृषि यंत्रों के साथ बेहतर तरीके से काम करता है.

किर्लोस्कर का केएमडब्लू मेगा टी 12 पावर टिलर

केएमडब्लू मेगा टी 12 पावर टिलर की गिनती अच्छे पावर टिलर में होती है. यह पावर टिलर कम ईंधन खर्च करता है. चलते समय अच्छा संतुलन बनता है. यह पावर टिलर संकरी जगहों और छोटे खेतों के लिए अनकूल है. गीली व सूखी जमीन, दोनों तरह की जमीन पर यह आसानी से काम करता है. यह सिंगल सिलैंडर के साथ आता है. इस में हौरिजैंटल वाटर कूल्ड डीजल इंजन है. इस का वजन तकरीबन 138 किलोग्राम है.

इस पावर टिलर में 6 फारवर्ड व 2 रिवर्स गियर आते हैं. इस पावर टिलर में ड्राई मल्टी फ्रिक्शन डिस्क टाइप के पार्किंग ब्रेक दिए गए हैं और इस में लगे ब्लैडों की संख्या 20 है.

होंडा एफजे 500 पावर टिलर

होंडा एफजे 500 पावर टिलर बेहतरीन क्वालिटी बेल्ट के साथ निर्मित किया गया है. आपरेटर सुरक्षा के लिए इस में एक टाइन कवर है. यह खेती के काम को आसानी से निबटा सकता है. इस में औनऔफ स्विच और स्पीड कंट्रोल के साथ एक हाइट एडजस्टेबल हैंडल आता है और  स्पीड कंट्रोल के लिए लीवर है.

इस की टीलिंग डेप्थ -3‘‘ध्5‘‘, टिलिंग चैड़ाई 18‘‘ से 36‘‘ है. इस टिलर में शक्तिशाली और बेहतरीन क्वालिटी के टाइन आते हैं. साथ ही,  5.5 एचपी ओएचवी जीएक्स 160 का शक्लिशाली इंजन है. यह ओएचवी, 4 स्ट्रोक, एयर कूल्ड टाइप फीचर्स के साथ आता है.

इस पावर टिलर में 2.4 लिटर का फ्यूल टैंक लगा होता है. यह पावर टिलर ढाई घंटे तक लगातार काम कर सकता है. पावर टिलर में 2 फारवर्ड व एक रिवर्स ट्रांसमिशन के साथ आता है.

 

सूरन (Elephant Foot Yam) की खेती लाभप्रद

सूरन (Elephant Foot Yam) न केवल सब्जी, बल्कि अचार के लिए भी जाना जाता है. सूरन में अनेक प्रकार के औषधीय तत्त्व मौजूद होते हैं. सूरन को ओल व जिमीकंद के नाम से भी जाना जाता है. यह एक औषधीय महत्त्व की सब्जी है.

गुण

यह रक्तविकार, कब्जनाशक, बवासीर, खुजली, उदर संबंधी बीमारियों के अलावा अस्थमा व पेचिश में भी काफी लाभदायक है.

भूमि

सूरन की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी सब से अधिक उपयुक्त होती है.

रोपाई का समय

रोपाई करने का सर्वोत्तम समय अप्रैल से जून महीने तक है.

प्रमुख प्रजातियां

सूरन की प्रजातियां एनडीए-5 , एनडीए-8 और गजेंद्रा -1 प्रमुख हैं. ये प्रजातियां पूरी तरह से कड़वापन से मुक्त हैं.

बीज व उन का उपचार

कंद की मात्रा कंद के आकार पर निर्भर करती है. आधा किलोग्राम से कम का कंद न रोपें. एक बिस्वा/कट्ठा (125 वर्गमीटर) क्षेत्रफल के लिए एक क्विंटल कंद बीज की आवश्यकता होती है. बीज के उपचार के लिए 5 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति लिटर पानी में घोल दें और 20 से 25 मिनट तक उस घोल में कंद को डाल दें. इस के बाद इन्हें निकाल कर 10-15 मिनट तक छाया में सुखा कर रोपाई करें.

खाद, उर्वरक और रोपाई की विधि

रोपाई के लिए आधाआधा मीटर की दूरी पर एकएक फुट के आकार का गड्ढा खोद कर प्रति गड्ढे की दर से 3 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद, 20 ग्राम अमोनियम सल्फेट या 10 ग्राम यूरिया, 37.5 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट व 16 ग्राम म्यूरेट औफ पोटाश डाल कर मिलाने के बाद कंद की रोपाई करें. रोपाई के 85 से 90 दिन बाद दूसरी सिंचाईनिराई करें. उस के बाद 10 ग्राम यूरिया प्रति पौधे में डालें.

सिंचाई

नमी की कमी रहने पर हलकी सिंचाई करें. पानी एक जगह इकट्ठा न होने दें.

सूरन के साथ सहफसली खेती

सूरन के साथ लोबिया या भिंडी की सहफसली खेती कर सकते हैं. आम, अमरूद वगैरह के बगीचे में सूरन लगा कर अच्छी आमदनी हासिल कर सकते हैं.

ऐसे करें उत्पादन

बोआई में प्रयुक्त कंदों के आकार, बोआई के समय व देखभाल के आधार पर प्रति बिस्वा 6-12 क्विंटल तक उपज 9-10 महीने में मिल जाती है.

चना और जौ से बने सत्तू के फायदे

सत्तू में ऐसे कई तत्त्व होते हैं, जो डायबिटीज और मोटापे जैसी गंभीर बीमारियों को ही नहीं, बल्कि कई दूसरी बीमारियों को भी शरीर से दूर करते हैं. सत्तू खाने में स्वादिष्ठ ही नहीं, बल्कि सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद होता है.

सत्तू के औषधीय गुण भी बहुत हैं. चना और जौ जब साथ में मिलाते हैं, तो गरमियों में यह मिश्रण दवा की तरह काम करता है. गरमियों में सत्तू खाने से अनेक बीमारियां दूर रहती हैं.

चना और जौ को पीस कर सत्तू बनता है, जो शरीर को ठंडक देता है. खास बात यह है कि इस का शरबत, भरवां परांठे या रोटी, पंजीरी, लड्डू, मठरी आदि के रूप में सेवन किया जा सकता है.

मोटापे का दुश्मन

सत्तू एक पूरा आहार है. इस में प्रोटीन के साथ मिनरल, आयरन, मैग्नीशियम और फास्फोरस बहुत होता है. साथ ही, यह फाइबर से भरा होता है. इसे खाने से पेट आसानी से भर जाता है और प्यास भी लगती है. पानी पीने से पेट और देर तक भरा रहता है. ऐसे में यह वजन कम करने के लिए बेहतर खाना है.

लू से बचाए

सत्तू की तासीर ठंडी होती है, इसलिए गरमी में इसे खाने से शरीर ठंडा भी रहता है और पानी ज्यादा पीने से यह डिहाइड्रेशन से भी बचाता है. इस से लू नहीं लगती है और यह शरीर का तापमान काबू करने में मददगार साबित होता है.

एनीमिया में फायदेमंद

सत्तू कैल्शियम, आयरन और प्रोटीन से भी भरा होता है. ऐसे में जिन्हें एनीमिया है, वे लोग इसे जरूर खाएं और किशोरावस्था में लड़कियों को ज्यादा से ज्यादा इस का सेवन करना चाहिए.

डायबिटीज में बढि़या

सत्तू में मौजूद बीटा ग्लूकोन शरीर में बढ़ते ग्लूकोज के अवशोषण को कम करता है. इस से ब्लड शुगर का लैवल कंट्रोल में रहता है. सत्तू कम ग्लाइसेमिक इंडैक्स वाला होता है और यह डायबिटीज को काबू रखने में मदद करता है.

वकालत के बाद कृषि विविधीकरण की ओर

बलिया जिला मुख्यालय से महज 16 किलोमीटर उत्तर और बांसडीह ब्लौक से तकरीबन 1 किलोमीटर पश्चिम दिशा में स्थित है, मिरिगिरी टोला, जो पिंडरा ग्राम सभा में आता है. इस गांव के 71 साल के वकील जय प्रकाश पांडेय हैं, जिन की शिक्षा स्नातक विज्ञान, एलएलबी है.

सरकारी वकील के रूप में उन्होंने साल 1975-2011 तक अपनी सेवा दी और उस के बाद रिटायर हुए. आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केंद्र, सोहांव, बलिया के अध्यक्ष प्रोफैसर रवि प्रकाश मौर्य ने वकील साहब के प्रक्षेत्र का भ्रमण किया और उन से चर्चा की.

प्रो. रवि प्रकाश मौर्य ने फार्म एन फूड को बताया कि वकील साहब के अनुसार उन के पास 5 एकड़ जमीन है. साथ ही, उन के पास आधुनिक कृषि यंत्र हैं, जैसे रोटावेटर, डिस्क हैरो, लेजर लैवलर, पैडी चापर हैरो, मल्टीप्लाऊ, ट्रैक्टर माउंटेड स्प्रेयर, स्प्रिंकलर सैट, टपक सिंचाई यंत्र वगैरह.

वकील से किसान बने जय प्रकाश पांडेय ने तकरीबन 4 एकड़ क्षेत्रफल में नीबू की प्रजाति ‘लेमनकला’ की खेती की, जिस में लगभग 1,500 पौधे हैं. वहीं दूसरी ओर 1,000 वर्गमीटर के पोषण वाटिका में शिमला मिर्च, ब्रोकली, फूलगोभी, पत्तागोभी, मिर्च, लालमूली, शलजम, चुकंदर, टमाटर, बैगन, बांकला, स्ट्राबेरी देखने लायक है, जो परिवार के लिए कीटनाशकमुक्त, जैविक सब्जियों का स्रोत है. इस के अलावा 10 वर्गमीटर में गेंदा फूल, डहेलिया और विभिन्न प्रकार के गुड़हल मनमोहक हैं, वहीं 40 वर्गमीटर में औषधि पौधे के रूप में लैमनग्रास, खस, तुलसी और पुदीना लगाया है.

अंगूर के 6, अपराजिता, मौसम्मी, सहजन के 200 पौधे हैं. इन्होंने नीबू की बीजू 10,000 पौधों की नर्सरी और 5,000 कलमी पौधे तैयार कर रखे हैं.

उन्होंने मधुमक्खीपालन भी 100 बक्सों में किया है. उन के पास एक साहीवाल गाय है, जिस से परिवार के लिए दूध मिलता है. इस गाय की एक बछिया भी है, जो भविष्य की धरोहर है.

जैविक विधि से भी खेती करने के लिए जय प्रकाश पांडेय कोशिश कर रहे हैं. इन के प्रक्षेत्र को देखने के लिए हर रोज बाहर से भी किसान व अधिकारी आते रहते हैं. अन्य सेवानिवृत्त लोगों और नौजवानों को वकील साहब से प्रेरणा लेनी चाहिए. इन्होंने बांसडीह बायोएनर्जी फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड, मिरिगिरी टोला, बांसडीह-277202 नाम से किसानों के लिए एफपीओ बनाया है, जिस में 947 किसान जुड़े हुए हैं.

नैचुरल फार्मिंग से घर बैठे कमा रहे मुनाफा

आजकल खेतीकिसानी में कीटनाशकों का उपयोग बढ़ने से भले ही फसल उत्पादन बढ़ रहा है, लेकिन मिट्टी की उर्वराशक्ति घट रही है. किसानों द्वारा धान, गेहूं और मूंग की फसलों के साथ फल और सब्जियों में सब से ज्यादा कीटनाशकों का प्रयोग किया जा रहा है.

रासायनिक खाद और कीटनाशकों के उपयोग से पैदा होने वाले खाद्यान्न और फलसब्जियों के खाने से लोग तरहतरह की बीमारियों के शिकार होते जा रहे हैं. इसी वजह से कीटनाशकों के इस्तेमाल से बचने के लिए जैविक खेती या नैचुरल फार्मिंग की ओर किसानों का रुझान बढ़ा है.

मध्य प्रदेश की तहसील बनखेड़ी, जिला होशंगाबाद के गरधा गांव के किसान मान सिंह गुर्जर ने नैचुरल फार्मिंग कर के पूरे इलाके में मिसाल कायम की है. ‘फार्म एन फूड’ से बातचीत में मान सिंह बताते हैं, ‘‘मैं 10 वर्षों से नैचुरल फार्मिंग कर रहा हूं, जिस में देशी गाय के गोबर, गोमूत्र, दूध, छाछ से सभी तरह की खाद्य सामग्री का उत्पादन कर रहा हूं.’’

जिले के उपसंचालक, कृषि, जितेंद्र सिंह के मार्गदर्शन से मान सिंह गुर्जर अपनी 16 एकड़ जमीन पर नैचुरल फार्मिंग से सभी तरह की फसलों का भरपूर उत्पादन ले रहे हैं.

नैचुरल फार्मिंग का फायदा यह है कि खेती में खाद और कीटनाशकों की लागत कम हो गई है. गेहूं, चावल, चना, तुअर, गन्ना जैसी सभी तरह की खाद्य सामग्री उन के पास मौजूद है.

नैचुरल तरीके से उत्पादन लेने की वजह से उन के उत्पादों की मांग ज्यादा रहती है और बाजार मूल्य से भाव भी अधिक मिलता है.

मान सिंह गुर्जर बताते हैं कि सभी अनाजों की घर से ही बिक्री हो जाती है. हमारे लिए कभी बाजार जाने की जरूरत नहीं पड़ती. उन के नैचुरल फार्महाउस पर बंशी गेहूं, खपलि गेहूं, शरबती गेहूं, कठिया, चंदौसी, सफेद गेहूं, चना देशी, मसूर, सरसों, राई, मटर, मूंग, उड़द, तुअर, धान, कोदो, कुटकी जैसे अनाजों का उत्पादन होता है. इसी तरह सभी तरह की सब्जीभाजी के अलावा 7 फुट लंबी लौकी उन के खेतों में उगाई जाती है.

नैचुरल फार्मिंग के लिए मिला है सम्मान

नैचुरल फार्मिंग के लिए मान सिंह गुर्जर को स्थानीय विधायक, सांसद के अलावा कृषि मंत्री के साथसाथ मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा सम्मानित किया जा चुका है.

कृषि विश्वविद्यालय, पंतनगर, उत्तराखंड द्वारा साल 2017 में मान सिंह गुर्जर को मौडल बनाने के लिए बुलाया गया, जिस में उन के द्वारा सुभाष पालेकर नैचुरल फार्मिंग का मौडल वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तैयार किया गया, जिस की रिपोर्ट कृषि मंत्रालय को भेजी गई.

नीति आयोग, दिल्ली के उपाध्यक्ष राजीव कुमार के आदेशानुसार उन्हें नैचुरल फार्मिंग के मौडल तैयार करने के लिए हापुड़, उत्तर प्रदेश भेजा गया था. उन के द्वारा बनाए गए नैचुरल फार्म पर उपसंचालक, कृषि, जितेंद्र सिंह व वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक टीम द्वारा अनेक बार दौरा किया गया व मार्गदर्शन दिया गया.

भारत सरकार, निदेशक, कृषि सहकारिता व कल्याण विभाग, दलहन विकास निदेशालय डा. एके तिवारी और पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों के किसानों द्वारा नैचुरल फार्मिंग को देख कर सराहना की गई. वे अब तक हजारों किसानों को इस तरह की खेती का प्रशिक्षण दे चुके हैं.

नैचुरल फार्मिंग में किए गए नवाचार

नैचुरल फार्मिंग के लिए मान सिंह गुर्जर द्वारा तैयार किए गए नवाचारों की वजह से आसपास के इलाकों में उन्हें अलग पहचान मिली है. नैचुरल खेती की जानकारी देते हुए वे बताते हैं कि उन के द्वारा बनाए गए बीजामृत द्वारा सभी तरह के बीजों का उपचार किया जाता है.

जीवामृत और धनजीवामृत द्वारा सभी खाद व पोषक तत्त्वों की पूर्ति की जाती है. इस के लिए उन्होंने 4 देशी नस्ल की गाय पाली हैं. देशी गाय के दूध और हलदी के स्प्रे, छाछ, दही का स्प्रे फसलों पर किया जाता है.

गेहूं, धान की पराली और दूसरी फसलों के अवशेषों को जलाने के बजाय वे मल्चिंग कर के खाद बनाते हैं. इस से मिट्टी के पोषक तत्त्व नष्ट नहीं होते. नीम की पत्तियों की मदद से वे फसलों के लिए नीमस्त, ब्रह्मस्त, अग्निस्त जैसे कीटनाशक खुद बनाते हैं. इसी तरह दशपर्णी अर्क और सभी खाद और कीटनाशक घर पर तैयार करने से खेती की लागत बहुत कम हो जाती है.

क्या है सुभाष पालेकर नैचुरल फार्मिंग मौडल

प्राकृतिक खेती पद्धति के जनक सुभाष पालेकर महाराष्ट्र में पिछले 2 दशकों से कृषि में बिना किसी रासायनिक खादों और कीटनाशक के खेती कर रहे हैं. इन्होंने खेती की प्राकृतिक पद्धति को ईजाद किया है, जिस में देशी नस्ल की गाय के गोबर और गोमूत्र के प्रयोग खेती में प्रयोग होने वाले जीवामृत, घनजीवामृत, बीजामृत और कीटपतंगों और बीमारियों से फसलों को बचाए रखने के लिए दवाओं को तैयार किया जाता है.

सुभाष पालेकर की प्राकृतिक खेती पद्धति में बाजार से कुछ भी सामान को लाने की जरूरत नहीं होती है, जिस से कृषि में लागत शून्य के बराबर होती है. खेती में की गई इस खोज को देखते हुए भारत सरकार ने साल 2016 में सुभाष पालेकर को ‘पदमश्री’ अवार्ड से नवाजा था. इतना ही नहीं, सुभाष पालेकर की खेती पद्धति की यूनाइटेड नेशन में भी सराहना हो चुकी है.

जैविक खेती से अलग है प्राकृतिक खेती

प्राकृतिक खेती को कई लोग जैविक खेती के साथ जोड़ कर देखते हैं, लेकिन प्राकृतिक खेती कई हिसाब से जैविक खेती से अलग है. जैविक खेती में गाय के गोबर का प्रयोग खाद के रूप में किया जाता है. इस में भारी मात्रा में गाय के गोबर का प्रयोग किया जाता है, जबकि प्राकृतिक खेती में देशी गाय के गोबर का प्रयोग जैविक खाद के मुकाबले में नाममात्र का किया जाता है.

जैविक खेती पद्धति में देखा गया है कि जो किसान इसे शुरू करते हैं, तो शुरुआत के कुछ वर्षों में उत्पादन में कमी देखी जाती है, जबकि प्राकृतिक खेती में पहले ही वर्ष में उत्पादन में बढ़ोतरी देखी गई है और साल दर साल मिट्टी की उर्वरा क्षमता बढ़ने के साथ भरपूर उत्पादन मिलता है.

जैविक खेती भी रासायनिक खेती की तरह बहुत खर्चीला काम है, जबकि प्राकृतिक खेती में देशी गाय के गोबर और गोमूत्र व कुछ घरेलू सामग्री के प्रयोग से ही खेती की जाती है. ऐसे में कृषि की लागत शून्य के बराबर रहती है.

रबी मौसम की सब्जियों में लगने वाली प्रमुख बीमारियां एवं उन की रोकथाम

हमारे भोजन में सागसब्जियों का खासा महत्व है. इस से हमारी सभी जरूरी तत्वों की पूर्ति होती है. रबी के मौसम में सभी प्रकार की सागसब्जियां उगाई जाती हैं. ये सब्जियां सभी प्रायः सीमित प्रक्षेत्रांे में ही लगाई जाती हैं. किसान फसल चक्र नहीं अपनाते हैं, जिस से सागसब्जियों में रोगों का प्रकोप बहुत ज्यादा मिलता है.

रबी मौसम की प्रमुख सब्जियों में जहां आलू, टमाटर, मटर एवं गोभी (फूलपत्ता व गांठगोभी), मूली, गाजर, शलगम आदि हैं, वहीं पत्तेदार साग में पालक, चुकंदर प्याज, लहसुन और शिमला मिर्च को माना जाता है. लेकिन मौडर्न जमाने में माली नजरिए से आलू, टमाटर व मटर का खासा महत्व है. सब्जियों में बीमारी की समस्या प्रधान बनती जा रही है. इन में लगने वाली प्रमुख बीमारियों के नुकसान से तत्काल नियंत्रण के लिए समुचित मात्रा में फफूंदनाशकों का उपयोग कर के रोकथाम की जा सकती है.

आलू की प्रमुख बीमारी व रोकथाम

अगेती झुलसा: आल्टनेरिया सोलेनाई नामक फफूंद से यह बीमारी होती है. इस के लक्षण फसल बोने के 3-4 हफ्ते बाद पौधों की निचली पत्तियों पर हलके भूरे रंग के छोटेछोटे बिखरे हुए धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं, जो कि बाद में अनुकूल परिस्थितियों में पूरी पत्तियों पर फैल जाते हैं, जिस से पत्तियां खराब हो जाती हैं. इस बीमारी के लक्षण आलू में भी दिखते हैं. भूरे रंग के धब्बे आलू में भी फैल जाते हैं. इस वजह से आलू का आकार छोटा और उस की क्वालिटी में भी कमी आ जाती है.

रोकथाम: ब्लाईटौक्स-50 को 3 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल कर 12 से 15 दिन के अंतराल में 2 बार छिड़काव करना चाहिए अथवा  मैंकोजेब (एम. 45) को 3 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए.

पछेती झुलसा: यह बीमारी फाइटोप्थोरा इनफेस्टेंस नामक फफूंद से होती है. जब वातावरण में नमी व आर्द्रता अधिक होती है और कई दिनों तक बरसात होती है, तब इस बीमारी का प्रकोप अधिक होता है. यह बीमारी एक सप्ताह के अंदर पौधों की हरी पत्तियों को नष्ट कर देती है. पत्तियों की निचली सतहों पर सफेद रंग के गोले बन जाते हैं, जो बाद में भूरे व काले रंग के  हो जाते हैं. इस बीमारी की विशेष पहचान पत्तियों के किनारे और चोटी का भाग भूरा हो कर झुलस जाता है. इस बीमारी का असर आलू की पत्तियों, शाखाओं व कंदों पर भी देखने को मिलता है.

रोकथाम: जहां आलू की फसल में अभी भी पछेती झुलसा की बीमारी प्रकट नहीं हुई है, वहां पर मैंकोजेब, प्रोपीनेब, क्लोरोथेलौनीलयुक्त फफूंदनाशक दवा की बीमारी सुगाही किस्मों पर 0.2-0.25 फीसदी की दर से यानी 2.0-2.5 किलोग्राम दवा 1,000 लिटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें. वहीं जिन खेतों में बीमारी प्रकट हो चुकी हो, उन में किसी भी फफूंदनाशक साईमोक्सेनिल़, मैंकोजेब का 3.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर को 1,000 लिटर पानी की दर से अथवा डाईमेथोमार्फ, मैंकोजेब का 3.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर को 1,000 लिटर पानी की दर से छिड़काव करें. फफूंदनाशक का छिड़काव 10-12 दिन के अंतराल पर दोहराया जा सकता है. लेकिन बीमारी की तीव्रता के आधार पर इस अंतराल को घटाया या बढ़ाया जा सकता है. इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि एक ही फफूंदनाशक का बारबार छिड़काव न करें. खेतों में जल निकास का उचित प्रबंध करें एवं खेतों को खरपतवार से रहित रखें.

टमाटर की प्रमुख बीमारी व रोकथाम

आर्द्र गलन: टमाटर में यह बीमारी फफूंद राइजोक्टोनिया एवं पीथियम कवकों के मिलेजुले संक्रमण से होती है. इस से प्रभावित पौधे का निचला तना गल जाता है. शुरुआत में इस बीमारी के लक्षण कुछ जगहों में दिखाई पड़ते हैं और 2-3 दिन में पूरी तरह पौधों में फैल जाते हैं. टमाटर के पौधे भूरे और सूखे धब्बों के साथ पीलेहरे दिखाई पड़ते हैं. पौधे अचानक ही सूख जाते हैं और जमीन पर गिर कर सड़ जाते हैं.

रोकथाम: कैप्टान अथवा कौपर औक्सीक्लोराइड 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज दर से उपचारित कर के बोना चाहिए. इस के अलावा रोगी पौधों को खेत से निकाल कर नष्ट कर दें. खेत में जल निकास की उत्तम व्यवस्था रखें.

अगेती झुलसा: टमाटर की फसल में यह बीमारी अल्टरनेरिया सोलेनाई नामक कवक से होती है. प्रभावित पौधों की पत्तियों पर छोटे काले रंग के धब्बे दिखाई पड़ते हैं, जो बड़े हो कर गोल छल्लेनुमा धब्बों में बदल जाते हैं. फल पर धब्बे शुष्क धंसे हुए और गहरे होते हैं. इन धब्बों के बढ़ने के साथ ही पत्तियां झुलस कर गिर जाती हैं.

रोकथाम: टमाटर के बीजों को बोने से पहले केप्टान 75 फीसदी डब्ल्यूपी 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करना चाहिए, वहीं फसल में रोग के लक्षण दिखाई देने पर मैंकोजेब 75 फीसदी डब्ल्यूपी का 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 10-15 दिन के अंतराल पर छिडकाव करना चाहिए.

पछेती झुलसा: यह बीमारी टमाटर की फसल में फाइरोप्थोरा इनफेस्टेंस नामक कवक से होती है. शुरुआत में पत्तियों पर जलीय अनियमित आकार के धब्बे बनते हैं, जो बाद में भूरे से काले धब्बों में बदल जाते हैं.  टमाटर की फसल में यह बीमारी पौधे की किसी भी अवस्था में लग सकती है. पौधे के किसी भी भाग पर भूरे, बैंगनी या काले रंग के धब्बे दिखाई पड़ते हैं. वातावरण में लगातार नमी रहने पर इस बीमारी का प्रकोप बढ़ जाता है.

रोकथाम: प्रभावित फसल पर साईमोक्सेनिल़मैंकोजेब का 3.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर (1,000 लिटर पानी) की दर से छिडकाव करें.

उकठा: टमाटर की फसल में यह बीमारी फ्यूजियम औक्सीस्पोरम लाइकोपर्सिकी नामक कवक से होती है. इस में रोगी पौधे की निचली पत्तियां पीली पड़ कर झुलस जाती हैं, पौधे मुरझा जाते हैं व पौधों की बढ़वार रुक जाती है. साथ ही, उस पर फल भी नहीं लगते हैं. मुख्य तने के संवहन तंतु के साथ भूरी धारियां देखी जा सकती हैं.

रोकथाम: बीजों को बोने से पहले ट्राइकोडर्मा हारजिएनम 5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें. इस के अलावा ट्राइकोडर्मा हारजिएनम 2.5 किलोग्राम को 50 किलोग्राम गोबर की खाद में मिला कर प्रति हेक्टेयर बोआई से पूर्व खेत में मिलाएं. पौध रोपने के 30 दिन बाद कार्बंडाजिम 25 फीसदी, मैंकोजेब 50 फीसदी, डब्ल्यूएस 0.2 फीसदी की दर से खेत में छिडकाव करें.

Rabiमटर की प्रमुख बीमारी व रोकथाम

उकठा: यह बीमारी फ्यूजेरियम औक्सीस्पोरम पाइसी कवक से होती है. इस बीमारी का संक्रमण फसल की शुरुआती अवस्था में उस समय होता है, जब पौधे 5-6 सप्ताह के होते हैं. बीमारी का प्रमुख लक्षण प्रौढ़ पौधों का मुरझाना है. पौधे पानी की कमी में मुरझा जाते हैं, जबकि खेत में नमी प्रर्याप्त मात्रा में होती है, तब भी पत्तियां पीली पड़ कर मुरझाने और सूखने लगती हैं व पौधा सूख जाता है. मुख्य जड़ों और तनों के आधार वाले ऊतक काले रंग के दिखाई देते हैं व जड़ों पर काले रंग की धारियां बन जाती हैं.

रोकथाम: बीजों को ट्राइकोडर्मा की 5.0 ग्राम प्रति किलोग्राम मात्रा से उपचारित कर के ही बोएं. फसल में ज्यादा सिंचाई न करें, क्योंकि रोग की उग्रता मिट्टी में ज्यादा नमी से बढ़ती है. कार्बंडाजिम (बाविस्टिन)  0.2 फीसदी फफूंदनाशी के घोल से छिडकाव करें.

चूर्णिल आसिता: यह बीमारी इरिसीफे पीसी कवक से होती है. इस बीमारी से पत्तियां सब से पहले प्रभावित होती हैं और बाद में तनों और फली पर भी असर होता है. पत्तियों की दोनों सतह पर सफेद चूर्ण धब्बे बनते हैं. पहले धब्बे छोटीछोटी रंगहीन कलंक या चित्तियों के रूप में बनते हैं. लेकिन बाद में इन के चारों ओर चूर्णी समूह फैल जाता है. रोगी पौधों में प्रकाश संश्लेषण की कमी हो जाती है, पौधे छोटे रह जाते हैं और उन पर फलियां भी कम और हलकी लगती हैं. पत्तियों के जिस स्थान पर परजीवी का कवक जाल फैला रहता है, वहां की कोशिकाएं ऊतक क्षय की वजह से मर जाती हैं.

रोकथाम: बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर 2.5 से 3.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से सल्फर पाउडर  बुरकना चाहिए अथवा सल्फैक्स (2.5 ग्राम प्रति लिटर पानी) का छिड़काव करें.

मृदुरोमिल आसिता: पेरोनोस्पोरा पाइसी नामक कवक से यह बीमारी होती है. इस के लक्षण तरुण पौधों पर उस समय दिखते हैं, जब उन में तीसरी और चैथी पत्तियां निकल आती हैं. सब से पहले पत्तियों पर पीलापन दिखने लगता है और बाद में भूरे धब्बे बनने लगते हैं. पहले ये धब्बे निचली पत्तियों पर बनते हैं और बाद में ऊपर वाली पत्तियों पर फैल जाते हैं. बीमारी का प्रभाव फलियों पर भी होता है. फलियों के दोनों सतह पर हलके हरे दागों के रूप में धब्बे बनते हैं.

रोकथाम: मैंकोजेब (एम. 45) की 0.25 फीसदी (2.5 ग्राम प्रति लिटर पानी) का घोल बना कर 2 बार 12-15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें.

– डा. रवि प्रकाश मौर्य, निदेशक, प्रसार्ड ट्रस्ट मल्हनी, भाटपार रानी देवरिया,
– डा. प्रदीप कुमार दलाल

शरदकालीन बैगन की उन्नत खेती

अगर सब्जियों की बात करें, तो कुछ मौसम के अनुसार उगाई जाती है और कुछ सब्जियों की खेती सालभर की जाती है. लेकिन सालभर उगाई जाने वाली सब्जियों में भी इन की नर्सरी व रोपाई का समय मौसम के अनुसार अलगअलग होता है. सालभर उगाई जाने वाली सब्जियों में बैगन की खेती महत्वपूर्ण स्थान रखती है, क्योंकि बैगन का प्रयोग सब्जी के अलावा भरतां व कलौंजी के रूप में भी किया जाता है, जो भोजन का जायका बढ़ाती है.

बैगन की कई प्रजातियां उपलब्ध हैं, जिस में रंग के अनुसार हरासफेद व बैगनी और बनावट के अनुसार लंबी व गोल प्रजातियों का प्रयोग खेती में किया जाता है. बैगन की बनावट व रंग के अनुसार भी बाजार भाव तय होता है. बैगन की खेती के लिए पौधशाला में बोआई व रोपाई सालभर में 3 बार की जाती है.

बैगन की खेती के लिए सब से अच्छी मिट्टी दोमट व जीवांश की पर्याप्त मात्रा वाली होनी चाहिए. बैगन में सब से अच्छी फलत दोमट मिट्टी में आती है. इस के अलावा बैगन की उन्नत खेती के लिए खेत में जल निकासी की व्यवस्था का होना जरूरी है.

शरदकालीन बैगन की नर्सरी डालने का उचित समय जुलाई माह के पहले सप्ताह से ले कर अगस्त माह का अंतिम सप्ताह होता है. किसानों को पौधशाला में बैगन की नर्सरी डालने से पहले पौधशाला की भूमि का चयन करना चाहिए. किसानों को चाहिए कि पौधशाला की भूमि 01 हेक्टेयर खेत की रोपाई के लिए 75-100 वर्गमीटर के क्षेत्रफल में 200 किलोग्राम गोबर की खाद या 50 किलोग्राम केंचुए की खाद डाल कर मिट्टी को भुरभुरी बना लेनी चाहिए. इस के अलावा दीमक आदि से बचाव के लिए 50 किलोग्राम नीम की खली भी मिलाना जरूरी हो जाता है.

एक हेक्टेयर खेत में बैगन की रोपाई के लिए सामान्य किस्मों का 250-300 ग्राम एवं संकर किस्मों का 200-250 ग्राम बीज पर्याप्त होता है. पौधशाला में बोने से पहले को ट्राईकोडर्मा 2 ग्राम प्रति किलोग्राम अथवा बाविस्टीन 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें. बोआई 5 सैंटीमीटर की दूरी पर बनी लाइनों में की जानी चाहिए. बीज से बीज की दूरी एवं बीज की गहराई 0.5-1.0 सैंटीमीटर के बीच रखनी चाहिए.

अच्छे जमाव के लिए गोबर की खाद व बालू की हलकी परत बिछा कर पौलीहाउस बना लें, जिस में जमाव अच्छा हो. अगर पौलीहाउस नहीं बन पाए तो पुआल से पौधशाला को ढक देते हैं और सुबहशाम पुआल के ऊपर पानी का छिड़काव करना चाहिए.

बीज को बोने के बाद सौरीकृत मिट्टी से ढकना उचित रहता है. पौधशाला को अधिक वर्षा एवं कीटों के प्रभाव से बचाने के लिए नाइलोन की जाली (मच्छरदानी का कपड़ा) लगभग 1.0-1.5 फुट ऊंचाई पर लगा कर ढकना चाहिए एवं जाली को चारों ओर से मिट्टी से दबा देना चाहिए, जिस से बाहर से कीट घुस न सकें.

पौधशाला में बैगन के बीज 6 वें दिन से अंकुरित होने लगते हैं. इस के बाद पुआल हटा कर 10 ग्राम ट्राईकोडर्मा को 1 लिटर पानी में मिला कर छिड़काव करना चाहिए. इस से कीट नहीं लगता है. पौधशाला में तकरीबन एक से डेढ़ माह में पौधे रोपाई योग्य हो जाते हैं.

उन्नत बीज

प्रगतिशील किसान राममूर्ति मिश्र के मुताबिक, बैगन की खेती के लिए अच्छी प्रजाति के बीजों का चयन सब से जरूरी होता है, क्योंकि अच्छे बीज के प्रयोग से अच्छा उत्पादन मिलता है. किसान कम लागत में अधिक लाभ प्राप्त करता है. बैगन की उन्नत किस्मों में किसानों को किस्मों का चयन बाजार की मांग व लोकप्रियता के आधार पर करना चहिए. इस में लंबे फल की किस्में पूसा पर्पल लोंग, पूसा पर्पल क्लस्टर, पूसा क्रांति, पंत सम्राट, आजाद क्रांति, एस-16,पंजाब सदाबहार, एआरयू 2-सी और एच-7 आदि प्रमुख हैं, जबकि गोल फल में पूसा पर्पल राउंड, एच-4, पी-8, पूसा अनमोल, पंत ऋतु राज, टी-3, एच-8, डीबीएसआर-31, पीबी-91-2, के-202-9, डीबीआर-8 और एबी-1 आदि प्रमुख हैं, वहीं बैगन के छोटे गोल फल की किस्मों में डीबीएसआर-44 और पीएलआर-1 प्रमुख हैं.

संकर किस्मों में अर्का नवनीत और पूसा हाईब्रिड-6, एमएचबी-2, एमएचबी-3, एमएचबी-9, एमईबीएच- 11, एमईबीएच-16, एमईबीएच-54, एमएचबी-56 प्रमुख हैं. बैगन की लंबे फल वाली किस्मों में एआरबीएच-201 प्रमुख है.

साथ ही, गोल फल में एनडीबीएच- 1, एबीएच-1, एमएचबी-10, एमएचबी-39, एबी-2 और पूसा हाईब्रिड-2 आदि प्रमुख हैं.

पौधरोपण एवं खाद उर्वरक

बैगन के तैयार पौधों को रोपने से पहले 25-303 टन गोबर की सड़ी खाद को मिट्टी में मिला कर 100 किलोग्राम यूरिया, 60 किलोग्राम फास्फोरस व 50 किलोग्राम पोटाश की मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से मिलाना चाहिए. इस के उपरांत बैगन को 50 सैंटीमीटर की दूरी पर रोपित कर के सिंचाई कर देनी चाहिए. पौधो में फास्फोरस की उचित मात्रा के लिए जैविक खाद के रूप में फास्फेटिका का प्रयोग करना चाहिए.यह मिट्टी के अंदर बचे फास्फोरस को घुलनशील बना देता है. इस के अलावा पौधों को रोपाई के 20 से 40 दिन व 60 दिन बाद टौप ड्रैसिंग के माध्यम से ऊपर बताई गई उर्वरक की मात्रा देनी चाहिए.

इस के अलावा ठंड में बैगन को पाले से बचाने के लिए 15 दिनों पर सिंचाई करते रहना चाहिए. पौधों के समुचित विकास व खरपतवार नियंत्रण के लिए पौध रोपण के बाद 2 बार गुड़ाई कर के पौधों पर मिट्टी चढ़ाना आवश्यक हो जाता है. इस के अलावा अधिक खरपतवार की अवस्था में स्टांप 3.3 लिटर की मात्रा ले कर 1,000 लिटर पानी में घोल कर रोपाई से पूर्व ही छिड़काव कर देना चाहिए.

कीट एवं प्रबंधन

बैगन को सब से अधिक कीड़ों से नुकसान पहुंचता है, जो बैगन को खाने योग्य नहीं रहने देते हैं. बैगन की फसल को सब से नुकसान तना व फल छेदक कीट की वजह से होता है. इस का प्रकोप पौध रोपने के एक सप्ताह बाद ही दिखने लगता है. इस में मादा तितली पत्तियों, कलियों तनों व फलों पर अंडे देती है. अंडे से निकलने वाली नवजात सुंडी पौधों के तनों में छेद कर देती है, जिस से पौधे मुरझाने लगते हैं. इस के अलावा पौधों में फल लगने पर ये कीट छेद बना कर बैगन के फल के अंदर जा कर उसे खा डालते हैं.

इन कीड़ों से बैगन को बचाने के लिए पहले सुंडीग्रस्त पौधों को नष्ट कर देना चाहिए. इस के अलावा बैसिलस थुरिनजिएंसिस नामक जैविक कीटनाशक को 500 ग्राम की दर से प्रति हेक्टेयर में छिड़काव करें. तना छेदक कीट से बचाव के लिए नीम गिरी 40 ग्राम एक लिटर पानी के हिसाब से मिला कर हर 10 दिन पर छिड़काव करना चाहिए. इस के अलावा बैगन की पत्ती खाने वाला कीट, जो पत्तियों के पर्ण हरित रस को चूस लेती है, इस से पत्तियां मात्र जाली बन कर रह जाती हैं. इस से पौध की बढ़वार पर असर पड़ता है. इस से बचाव के लिए कीटग्रस्त पत्तियों  को तोड़ कर नष्ट कर देना चाहिए. इन कीटों की रोकथाम के लिए अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों से संपर्क करें.

रोग प्रबंधन

बैगन के पौधों को सब से ज्यादा झुलसा रोग प्रभावित करता है. इस में पौधे की पत्तियों का रंग भूरा हो जाता है, जो बाद में फलों पर पीले रंग का धब्बा बनाता है. इस के बाद फलों में सड़न शुरू हो जाती है. पौधे की रोपाई करने के पहले बीज को 4 ग्राम ट्राईकोडर्मा पाउडर से उपचारित करना चाहिए या फिर पोधों को रोपाई से पहले 1 फीसदी ट्राईकोडर्मा के घोल में उपचारित करना चाहिए.

बैगन में लगने वाले रोगों में उकठा रोग से पौधों को अधिक नुकसान पहुंचता है. इस में पौधा मुरझा कर सूख जाता है. इस की पहचान के लिए तने को काट कर देखने पर इस में भूरे रंग का जमा हुआ पदार्थ  दिखाई पड़ता है.

इस रोग से पौधे को  बचाने  के लिए खेत में 200 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से नीम की खली  मिलानी चाहिए. साथ ही, 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर ब्लीचिंग पाउडर को मिट्टी में मिलाने से भी इस रोग की संभावना नहीं होती है.

अगर उपरोक्त विधि से शरदकालीन बैगन की खेती की जाती है, तो किसानों को आमतौर पर ली जाने वाली बैगन की फसल से ज्यादा आमदनी होती है. जुलाई माह में रोपे गए पोधों  में अगस्त माह के अंतिम सप्ताह से सितंबर माह तक फल आने लगते हैं, जिस से 5 माह की कम अवधि में किसान 8 लाख रुपए का खालिस मुनाफा प्राप्त कर सकता है.

जहांगीरी घंटा साबित हुआ पीएम का ‘शिकायतसुझाव पोर्टल’

कहा जाता है कि, मुगल काल में बादशाह जहांगीर ने लोगों को त्वरित न्याय देने के लिए किले के दरवाजे पर एक बड़ा घंटा लटकवाया था. इसे कोई भी फरियादी दिनरात कभी भी बजा कर सीधे मुल्क के बादशाह से अपनी शिकायत दर्ज कर न्याय प्राप्त कर सकता था.

इसी जहांगीरी घंटे की तर्ज पर प्रधानमंत्री ने खूब तामझाम व प्रचारप्रसार के साथ पीएमओ पोर्टल शुरू किया. सोशल मीडिया के इस प्लेटफार्म पर लोग अपनी जायज शिकायत सीधे प्रधानमंत्री तक पहुंचा सकते थे और उन शिकायतों पर त्वरित कार्यवाही व निराकरण कर उन्हें राहत पहुंचाने का दावा किया गया था.

कहा गया था कि इस पोर्टल पर देश का हर नागरिक अपनी सीधी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अपने उपयोगी सुझाव, योजनाएं सीधे अपने प्रधानमंत्री को भेज सकता है.

प्रधानमंत्री के इस पीएमओ पोर्टल का वास्तविक हश्र क्या हुआ, यह समझने के लिए हमें पहले इन की कार्यप्रणाली समझनी होगी.

मोदी के पिछले लगभग 10 सालों के कार्यकाल की अगर एक वाक्य में व्याख्या करनी हो, तो इसे वादों, नारों, जुमलों और भव्य आयोजनों की सरकार कहा जा सकता है.

मोदी ने देश को भले ही कुछ और दिया हो अथवा न दिया हो, लेकिन निश्चित रूप से इन्होंने कई लोकप्रिय नारे दिए हैं. इन्हीं नारों में इन का एक प्रमुख नारा था: ‘सब का साथ, सब का विश्वास.’

लेकिन यह सरकार और मोदी साथ और विश्वास तो सब का चाहते हैं, परंतु किसी को भी, उस के योगदान के लिए श्रेय देना तो जैसे इन्होंने सीखा ही नहीं, बल्कि इस बात का ध्यान रखा जाता है कि हर काम और उपलब्धियों का श्रेय मोदी और केवल मोदी को ही जाना चाहिए. किसी भी उपलब्धि का श्रेय वो अपनी पार्टी यहां तक कि संबंधित विभाग के मंत्रियों के साथ भी बांटने को तैयार नहीं हैं.

अब आते हैं जहांगीरी घंटे यानी पीएमओ पोर्टल पर. इस पोर्टल पर औनलाइन शिकायत दर्ज होने के बाद शिकायत के बारे में पोर्टल पर और कभीकभी फोन पर आप की शिकायत पर की गई कार्यवाही की जानकारी दी जाती है और शिकायतकर्ता को आशा बंधती है कि शायद उस की शिकायत का अब निराकरण होगा.

लेकिन शिकायत के निराकरण के नाम पर संबंधित विभाग या अधिकारियों से उन का पक्ष पूछ कर, अंततः आप को बता दिया जाता है कि आप की शिकायत निराधार है और आप की शिकायत की फाइल या खिड़की बंद कर दी जाती है.

समझें इन मामलों से

मामला नंबर 1:

अखिल भारतीय किसान महासंघ आईआई के राष्ट्रीय संयोजक किसान नेता डा. राजाराम त्रिपाठी ने उत्तर प्रदेश के लगभग डेढ़ लाख शिक्षाकर्मी और अनुदेशकों को लगभग 20 साल की सेवा के बाद भी नियमित न किए जाने और आज भी उन्हें एक कुशल मजदूर की मजदूरी भी न देते हुए, छुट्टियों, मैडिकल सुविधाएं, पेंशन, बीमा आदि सभी जरूरी सुविधाओं से वंचित रखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा किए गए ऐतिहासिक शोषण, अन्याय, पक्षपात की पीएमओ को की गई शिकायत पर कोई कार्यवाही नहीं हुई.

शिकायतकर्ता द्वारा अपील किए जाने के बावजूद बिना शिकायत की जांच किए और उत्तर प्रदेश सरकार से गोलमोल जवाब ले कर शिकायत को बंद कर दिया गया.

मामला नंबर 2:

वरिष्ठ पत्रकार और ऐक्टिविस्ट यशवंत सिंह (भड़ास 4मीडिया) का निजी मोबाइल पुलिस के उच्चाधिकारियों द्वारा छीनने, एवं  दुर्वव्हायवहार  की शिकायत पर भी पीएमओ द्वारा आज तक कोई प्रभावी कार्यवाही नहीं हुई.

वे सोशल मीडिया पर बारबार कह रहे हैं कि उन के खिलाफ की गई शिकायतें पूरी तरह से फर्जी हैं, और वह शिकायत करने वालों को जानतेपहचानते तक नहीं, बावजूद इस के बिना पर्याप्त जांच के ही उन का निजी मोबाइल जब्त कर लिया जाता है और मांगने के बावजूद न तो शिकायत की प्रति दी जाती है और न ही मोबाइल की पावती दी जाती है.

देश के सर्वोच्च जिम्मेदार और शक्तिशाली प्रधानमंत्री के निजी कार्यालय को की गई शिकायत पर भी किसी तरह की जांचपड़ताल किए बिना ही, इस कांड से संबंधित दोषी पुलिस उच्च अधिकारियों से प्राप्त जानकारी के आधार पर शिकायत बंद कर दी जाती है. जाहिर है कि कोई भी गलती करने वाला अधिकारी अपनी गलती भला क्यों कर स्वीकार कर के सजा भुगतना चाहेगा?

बात प्रधानमंत्री द्वारा अपने पोर्टल पर मांगे जाने वाले सुझाव

यह किसी भी देशवासी के लिए बड़े गौरव की बात होती है कि देश की बेहतरी के लिए उस की सलाह, सुझाव, योजनाएं सीधे उन के प्रधानमंत्री द्वारा सुनी जाती है. लेकिन साथ ही वो देशवासी यह भी चाहता है कि प्रधानमंत्री अगर उस की सलाह, सुझाव, योजनाओं पर यदि कोई पहल करते हैं, तो कम से कम उस की सहभागिता का श्रेय भी उसे दें, ताकि वो और उस के जैसे अन्य देशवासी भी उत्साहित हो कर राष्ट्रनिर्माण के काम में बढ़चढ़ कर आगे आएं. आम नागरिक की सक्रिय सहभागिता सफल परिपक्व लोकतंत्र का अहम लक्षण है. परंतु सुझावसलाह के माने में भी पीएमओ पोर्टल वन वे ट्रैफिक बन कर रह गया.

जब वैश्विक महामारी कोविड 19 की वजह से दुनिया के साथसाथ भारत भी इस की चपेट में आया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च, 2020 को राष्ट्रव्यापी लौकडाउन की घोषणा की, तो पूरे राष्ट्र ने उन का समर्थन किया. सब लोग घरों में कैद हो गए.

यह अवाम के अभूतपूर्व अनुसाशन का प्रदर्शन था. लेकिन घरों में रहने के बावजूद लोगों को खाद्य पदार्थों की आवश्यकता तो पड़ती ही है. इसलिए कुछ आपात सेवाएं जारी रखी गई. पर उन में से एक काम ऐसा था कि जिसे भी जारी रखना बहुत जरूरी था. और वह काम था खेतीकिसानी का. जब खेतों से फलसब्जियों का उत्पादन नियमित होता है, तभी सप्लाई चेन द्वारा लोगों के घरों तक आपूर्ति हो पाती है.

इसी बात को ध्यान में रख कर 25 मार्च को मैं ने प्रधानमंत्री कार्यालय को टैग करते हुए सुझाव दिया कि खेती के काम को तत्काल लौकडाउन से मुक्त किया जाए और कैसे केवल फलसब्जी और तत्कालीन खेतों में खड़ी रबी की फसलों को भी सही समय पर कटाई कर के खलिहान और फिर खलिहान से गोदाम तक या किसानों के घरों तक और फिर जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने के काम को लौकडाउन से मुक्त रखा जाए.

इस सलाह को पंजीकृत कर प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा तुरंत अमल में लाया गया और 27 मार्च, 2020 को गृह मंत्रालय के द्वारा इसी आशय के संशोधित आदेश जारी कर खेती के ज्यादातर कामों को लौकडाउन से मुक्त कर दिया गया.

हालांकि अलगअलग राज्यों ने केंद्र सरकार के उन आदेशों की अपनी समझ और सुविधा के अनुसार अलगअलग व्याख्या करते हुए उन का क्रियान्वयन समुचित ढंग से नहीं किया, जिस से किसानों को भारी नुकसान और तमाम परेशानियां हुईं, स्थानीय प्रशासन ने भी कोरोना को रोकने और खेती के काम को रोकने का अंतर समझने की कोशिश नहीं की और सुदूरवर्ती इलाकों में पुलिस अपना पराक्रम निरीह किसानों पर दिखाती रही. आज भले कोरोना नहीं है, पर 3 साल बाद आज भी देश के किसान उस की मार से उबर नहीं पाए हैं.

केंद्र सरकार द्वारा कोरोना में गरीबों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए और अन्य तबकों के लिए जब विभिन्न प्रकार के राहत की घोषणाएं की गईं, तब देखा गया कि इन घोषणाओं में कृषि और किसानें के लिए कोई बहुत सार्थक पैकेज नहीं था, जिस से लौकडाउन से खेती को हुए नुकसान की भरपाई करते हुए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सके.

इसे ध्यान में रखते हुए, 25 अप्रैल, 2020 को डा. राजाराम त्रिपाठी की अगुआई में 52 किसान संगठनों से सलाहमशवरा कर मैराथन बैठकों के बाद काफी मेहनत कर के 25 सूत्री मार्गदर्शी सुझाव व मांगपत्र प्रधानमंत्री को सौंपा गया. इन अधिकांश सुझावों का स्पष्टदर्शी प्रभाव सरकार के तत्कालीन विशेष पैकेज में दिखाई दिया, पर सरकार ने इन सुझावों का श्रेय देने की बात तो दूर, सुझावों के लिए धन्यवाद देना तक जरूरी नहीं समझा.

कोरोना से जुड़ी एक और बानगी

भारत विश्व के सब से ज्यादा वन क्षेत्र वाले 10 देशों में से एक है. भारत के कुल क्षेत्रफल के लगभग 21.23 फीसदी क्षेत्र पर वन स्थित हैं. देश के कई राज्यों में जैसे कि छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, ओड़िसा, झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र और पूर्वोत्तर राज्यों में जहां आज भी पर्याप्त वन क्षेत्र है, जैसे कि छत्तीसगढ़ में तो तकरीबन 44 फीसदी हिस्सा वन क्षेत्र है और भारत के समूचे 1 क्षेत्रों का 7.7 फीसदी वन छत्तीसगढ़ में ही है. इन वन क्षेत्रों में बहुसंख्यक जनजातीय समुदाय रहता है और इन क्षेत्रों की तकरीबन 70 फीसदी आबादी जंगलों से वनोपज एकत्र कर होने वाली आय से ही अपना जीवनयापन करती है.

छत्तीसगढ़ में तो 425 ऐसे वन राजस्व गांव भी हैं, जिन की आजीविका का साधन केवल जंगल ही है.

छत्तीसगढ़ में इस काम को सुचारु संचालन के लिए 901 प्राथमिक लघु वनोपज सहकारी समितियां काम कर रही हैं, जो पूरी तरह से वनोपज संग्रहण और विपणन पर ही निर्भर है.

भारत में कमोबेश इसी तर्ज पर तकरीबन 250 से अधिक प्रकार की वनोपज संग्रहण किया जाता है, इन सारे वनोपजों में से तकरीबन 70 फीसदी प्रमुख वनोपज मार्चअप्रैल में एकत्र की जाती हैं और यह वनोपज इन दिनों अगर एकत्र नहीं की गई तो या तो यह इन दिनों वनों में प्रायः हर साल लगने वाली आग से जल कर नष्ट हो जाती है, या फिर मईजून की गरमी में यह सूख कर अनुपयोगी जाती है, और इन सब से भी अगर बची भी तो आगे आने वाली मानसून पूर्व की बारिश की बौछारों में तो पूरी तरह से बरबाद हो ही जाती है.

अतः डा. राजाराम त्रिपाठी अखिल भारतीय किसान महासंघ (आइफा) द्वारा सरकार को समर्थन तथ्यों, आंकड़ों के साथ सुझाव देते हुए 4 अप्रैल, 2020 को प्रधानमंत्री कार्यालय विस्तार से वस्तुस्थिति की जानकारी देते हुए मांग की गई थी कि देश में तत्काल लौकडाउन के दरमियान बचाव के साधनों और सुरक्षा के साथ वनोपजों के संग्रहण और उन की खरीदी सुनिश्चित की जाए और संग्राहक परिवारों को इन वनोपजों का उचित मूल्य’ दिलाया जाए.

उक्त पत्र को प्रधानमंत्री कार्यालय के द्वारा आदिवासी मामलों के मंत्रालय को आगे कार्यवाही के लिए तत्काल 4 अप्रैल को ही भेज दिया गया. तत्पश्चात संबंधित राज्यों में 5-6 अप्रैल से वनोपज संग्रहण का काम सुचारु रूप से प्रारंभ हुआ, और 2 मई को केंद्र सरकार के आदिवासी मामलों के मंत्रालय द्वारा 49 वनोपज के जिसे माइनर फारेस्ट प्रोड्यूस (एमएफपी) कहते हैं, उस के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा भी की गई, जो कि भले ही देर से उठाया गया, पर निश्चित रूप से अच्छा कदम था.

इन्हीं महत्वपूर्ण निर्णयों के कारण हम कोरोना से लड़ाई लड़ते हुए भी अपनी अर्थव्यवस्था को काफी हद तक बचा पाए, लेकिन उपरोक्त सभी मामलों में सरकार ने जिन व्यक्ति या संगठनों के सुझाव को आधार पर उपरोक्त निर्णय लिए, उन का जिक्र तक नहीं किया है. यहां तक कि धन्यवाद ज्ञापन का एक मुफ्त ईमेल तक भेजने में सरकार कंजूसी बरतती है.

पिछले लोकसभा चुनाव के पूर्व, भाजपा के चुनावी घोषणापत्र बनाते समय जिन कृषि विशेषज्ञों को आमंत्रित कर उन से सलाह ली गई थी, उन में डा. राजाराम त्रिपाठी भी एक थे.

उल्लेखनीय है कि, वर्तमान में किसानों की मदद के लिए संचालित कृषक पेंशन निधि और किसान सम्मान निधि जैसी केंद्र सरकार की स्टार योजनाओं की आवश्यकता और उस के संभावित स्वरूप के बारे में अपनी परिकल्पना को स्पष्ट करते हुए इन्हें भाजपा के चुनावी घोषणापत्र में शामिल करने के बारे में डा. राजाराम त्रिपाठी ने ही सलाह दी थी, इन सुझावों को भाजपा की तत्कालीन समूची चुनाव घोषणापत्र समिति ने सराहा भी था और इन्हें अपने घोषणापत्र में शामिल भी किया था और इस चुनाव में किसानों के वोटों से अभूतपूर्व सफलता भी प्राप्त की.

इन योजनाओं के दम पर पिछला चुनाव जीतने के बाद भी योजनाओं का सुझाव देने वाले का नाम भी कभी इन के द्वारा नहीं लिया गया. यह दीगर बात है कि इन योजनाओं के निर्माण, क्रियान्वयन और संचालन में इतनी खामियां रह गई हैं कि इन महात्वाकांक्षी योजनाओं का मूल उद्देश्य कहीं खो गया.

आखिर में एक सवाल?

सोचने की बात यह है कि एक ओर तो सरकार यह कहते नहीं थकती है कि वह हर नागरिक की सहभागिता शासन में चाहती है, ऐसे में कोई विशेषज्ञ अगर मेहनत कर के कोई सार्थक सुझाव सरकार को भेजता है, तो उन्हें कोई श्रेय देना तो दूर उस की अभिस्वीकृति तक नहीं की जाती है. ऐसे में सब से पहला लाख टके का सवाल यही है कि ‘सब का साथ, सब का विकास’ जैसे खोखले नारों के भरोसे क्या यह भाजपा सरकार साल 2024 चुनाव की वैतरणी पार कर पाएगी?

-किसान नेता डा. राजाराम त्रिपाठी, अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा) के राष्ट्रीय संयोजक और एमएसपी गारंटी कानून किसान मोरचा के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं.

मिलेट से बनाएं सेहतमंद पकवान

कोदो, कुटकी, नाचनी या रागी और बाजरा आदि मिलेट के अंतर्गत आने वाले अनाज हैं. ये अनाज ग्लूटेन फ्री और फायबर से भरपूर होते हैं, जिस से इन्हें पचाने के लिए हमारे पाचनतंत्र को अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती, इसीलिए इन्हें सुपर फ़ूड भी कहा जाता है. इन्हें अपनी रोज की डाइट में शामिल करना हमारे उत्तम स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक होता है.

आज हम आप को ऐसे ही मिलेट की 2 रैसिपी बनाना बता रहे हैं, जिन्हें आप आसानी से घर पर बना सकती हैं. तो आइए देखते हैं कि इन्हें कैसे बनाया जाता है :

रागी मिक्स वेज परांठा

कितने लोगों के लिए : 4

बनने में लगने वाला समय:  30 मिनट
मील टाइप: वेज

सामग्री (कवर के लिए)
रागी का आटा –  2 कप
नमक – स्वादानुसार
घी –  1/2 टीस्पून
पानी – 1 कप

अजवाइन – 1 चुटकी
तेल – परांठा सेंकने के लिए

सामग्री (भरावन के लिए)

उबले मैश किए आलू  – 2
बारीक कटा प्याज  – 1
बारीक कटी हरी मिर्च  – 3
बारीक कटा हरा धनिया  – 1 लच्छी
बारीक कटी शिमला मिर्च  – 1/2 कप
बारीक कटी बींस  – 1/4 कप
नमक  – स्वादानुसार
लाल मिर्च पाउडर  – स्वादानुसार
अमचूर पाउडर  – 1/4 टीस्पून
जीरा  – 1/8 टीस्पून
गरम मसाला  – 1/4 टीस्पून
टोमेटो सौस  – 2 टेबलस्पून
तेल  – 1 टीस्पून

विधि :

एक नौनस्टिक पैन में तेल गरम कर के जीरा तड़का कर प्याज को सुनहरा होने तक भून लें. अब इस में हरी मिर्च, शिमला मिर्च, बींस और नमक डाल कर ढक कर 5 मिनट तक पकाएं. उस के बाद उबले हुए आलू और सभी मसाले डाल कर अच्छी तरह चलाएं. 2-3 मिनट भून कर हरा धनिया डाल कर गैस बंद कर दें.

अब आटा तैयार करने के लिए पानी को नमक, घी और अजवाइन के साथ एक भगौने में उबाल लें. जैसे ही पानी उबलने लगे तो गैस बंद कर दें और रागी का आटा डाल कर अच्छी तरह चलाएं. जब पानी में आटा अच्छी तरह मिक्स हो जाए, तो इसे एक प्लेट में निकाल कर हाथ से अच्छी तरह मिला कर एकदम गेहूं के आटे जैसा नरम कर लें.

अब चकले पर थोड़ा सा तेल या घी लगा कर 2 रोटी बेल लें. एक रोटी के किनारों पर उंगली से पानी लगाएं और ब्रश से पूरी रोटी पर टोमेटो सौस लगा कर 1 टेबलस्पून भरावन अच्छी तरह फैला दें. ऊपर से दूसरी रोटी रख कर उंगलियों की सहायता से चारों तरफ से दबा दें. तैयार परांठे को चिकनाई लगे तवे पर डाल कर घी लगा कर दोनों तरफ से सुनहरा होने तक सेंक लें.

गरमागरम परांठे को चटनी या अचार के साथ सर्व करें.

कोदो मिलेट पिज्जा

कितने लोगों के लिए:  6
बनने में लगने वाला समय:  30 मिनट
मील टाइप : वेज

सामग्री
कोदो मिलेट –  1 कप
चना दाल  – 1/4 कप
चावल  – 1/2 कप
दही  – 1/2 कप
ईनो फ्रूट साल्ट  – 1 सैशे
बारीक कटी हरी मिर्च  – 4
अदरक  – 1 छोटी गांठ
हींग  – 1 चुटकी
जीरा  – 1/8 टीस्पून
नमक  – स्वादानुसार
हल्दी पाउडर  – 1/4 टीस्पून
बारीक कटी लाल शिमला मिर्च – 1 टीस्पून
बारीक कटी हरी शिमला मिर्च – 1 टीस्पून
बारीक कटी पीली शिमला मिर्च – 1 टीस्पून
चीज क्यूब्स  – 6
चिली फ्लेक्स  – 1/2 टीस्पून
ओरेगेनो  – 1/2 टीस्पून
चाट मसाला  – 1 टीस्पून
घी  – 1 टीस्पून

विधि :

कोदो मिलेट, चावल और दाल को बनाने से पहले ओवरनाइट भिगो दें. सुबह पानी निकाल कर हरी मिर्च, नमक और दही के साथ बारीक पीस लें. अब इस में ईनो फ्रूट साल्ट, जीरा, हींग और हल्दी पाउडर डाल कर अच्छी तरह चलाएं. तैयार मिश्रण से चिकनाई लगे तवे पर एक बड़ा चम्मच मिश्रण ले कर मोटामोटा फैलाएं. जब इस का रंग बदल जाए तो पलट दें और एक पूरा चीज क्यूब ग्रेट कर दें. ऊपर से तीनों शिमला मिर्च डाल कर ढक कर एकदम धीमी आंच पर चीज के मेल्ट होने तक पकाएं. ऊपर से ओरेगेनो, चिली फ्लेक्स और चाट मसाला बुरक कर सर्व करें.