मक्का एक प्रमुख बहुउपयोगी फसल है, जिसकी खेती अन्न, चारा, भुट्टा, पॉपकॉर्न और बेबीकॉर्न के लिए की जाती है. अधिकतर क्षेत्रों में मक्के की खेती असिंचित अवस्था में की जाती है, लेकिन वैज्ञानिक ढंग से खेती कर किसान इससे अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं. विशेष रूप से बेबीकॉर्न व भुट्टे के लिए मक्का नकदी फसल के रूप में उभर रही है.
मक्के की खेती कब करें
भारत में मक्का की खेती खरीफ, रबी और जायद—तीनों मौसमों में की जाती है.
• खरीफ: बरसात के मौसम में
• रबी: दक्षिण भारत व बिहार में प्रचलित
• जायद (बसंतकालीन): फरवरी से मार्च-अप्रैल
बसंतकालीन मक्का का महत्व
बसंतकालीन मक्का की खेती पहाड़ी क्षेत्रों और शहरों के नजदीकी मैदानी इलाकों में अधिक की जाती है. यह मुख्य रूप से भुट्टे और चारे के लिए बोई जाती है. पहाड़ी किसानों के लिए यह खास है क्योंकि फरवरी में बोआई और मई-जून में भुट्टे तैयार हो जाते हैं.
वैज्ञानिक ढंग से मक्का की खेती क्यों जरूरी
अधिकतर किसान स्थानीय प्रजातियों का उपयोग करते हैं, जिनमें रोग व कीट अधिक लगते हैं और उत्पादन कम होता है. मक्का एक पर-परागित फसल है, इसलिए एक ही बीज को बार-बार बोने से उसकी गुणवत्ता घटती जाती है. उन्नत किस्मों और वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर किसान अधिक उत्पादन और बेहतर गुणवत्ता पा सकते हैं.
मैदानी इलाकों के लिए उन्नत मक्का प्रजातियां
संकर (Hybrid) किस्में
वीएल-45, डेक्कन, हाईस्टार्च, गंगा सफेद-2, गंगा-4, गंगा-5, गंगा-7, संगम
संकुल (Composite) किस्में
शक्ति, तरुण, रतन, प्रताप कंचन, नवीन, श्वेता, विजय, किसान, सोना, विक्रम, जवाहर, प्रोटीना
पहाड़ी क्षेत्रों के लिए मक्का की किस्में
संकर (Hybrid)
विवेक हाईब्रिड मक्का-4, 5, 9, 15, 17, विवेक संकर-23, वीएल मक्का-42, गंगा-11, हिम-12, हिमालयन-123
संकुल (Composite)
वीएल मक्का-1, विवेक संकुल-11, वीएल-16, वीएल-54, वीटल-88, हिम-128
बीज उपचार व बोआई विधि
यदि किसान स्वयं का बीज प्रयोग कर रहे हैं तो बीज उपचार अनिवार्य है.
• रासायनिक उपचार: थीरम / कैप्टान / एग्रोसान GN @ 2.5 ग्राम प्रति किलो बीज
• जैविक उपचार: ट्राइकोडर्मा या स्यूडोमोनास @ 8 ग्राम प्रति किलो बीज
बोआई विधि
• खेत की 2–3 जुताई
• बीज 5 सेमी गहराई पर
• कतार से कतार दूरी: 60 सेमी
• पौधे से पौधे की दूरी: 25 सेमी
• बेबीकॉर्न के लिए- कतार दूरी 50 सेमी , पौधे की दूरी 15 सेमी
खाद व उर्वरक प्रबंधन
• गोबर की खाद: 10 टन/हेक्टेयर (बोआई से 15 दिन पहले)
• नाइट्रोजन: 3 भागों में
• फास्फोरस व पोटाश: पूरी मात्रा बोआई के समय
सिंचाई प्रबंधन
बसंतकालीन मक्का में 8–10 दिन के अंतर से सिंचाई आवश्यक है.
• चारा फसल: 4–6 सिंचाइयां
• दाना फसल: 8–10 सिंचाइयां
नरमंजरी, दाना बनते समय और दूधिया अवस्था में सिंचाई में देरी से 20% तक उपज घट सकती है.
खरपतवार नियंत्रण
• 2 बार निराई-गुड़ाई
• दूसरी निराई पर हल्की मिट्टी चढ़ाएं
• रसायनों की जरूरत कम
अंत:कृषि (Intercropping) से अधिक लाभ
मक्का की 2 कतारों के बीच मूंग, उड़द या लोबिया की 2 लाइनें उगाएं. इससे अतिरिक्त आमदनी मिलती है और मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ती है
मक्का की फसल में रोग प्रबंधन
भारत में मक्का पर 20–25 प्रकार के रोग लगते हैं, जिससे 10–12% उपज घटती है.
मुख्य रोग: पौध झुलसा, पत्ती झुलसा, रोमिल फफूंदी, तना विगलन, कंडुआ, गेरुई, मोजैक. लक्षण दिखते ही कृषि विशेषज्ञ से सलाह लें.
कटाई व मड़ाई
• छिलके भूरे और सूखे होने पर कटाई
• भुट्टे सुखाकर नमी 15% तक लाएं
• हाथ या मशीन से मड़ाई करें
बसंतकालीन मक्का किसानों के लिए एक बेहतरीन विकल्प है. जब रबी में मक्का नहीं बो पाते, तब यह नुकसान की भरपाई करती है. अंत:फसल के साथ मक्का उगाकर किसान अधिक उत्पादन और अधिक आमदनी हासिल कर सकते हैं.





