Production of Pulses: संयुक्त राष्ट्र की पहल पर हर वर्ष 10 फरवरी को विश्व दलहन दिवस मनाया जाता है. इसका मुख्य उद्देश्य दालों का हमारी सेहत के लिए जो महत्त्व है, उसके प्रति जागरूकता फैलाना है और इसकी खेती के बारे में लोगों को बताना है. दलहन की खेती पर्यावरण संरक्षण के हित में भी है, क्योंकि इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है. यह देखते हुए कि दालों से हमें कई लाभ मिलते हैं, हमें इसकी खेती की तरफ और ध्यान देना चाहिए.

दालों से मिलने वाले फायदे की बात करें, तो हरी मूंग हमारे पेट के लिए बहुत लाभकारी होती है. इसी तरह, चना और अरहर की दाल भी सेहत के लिए बहुत लाभकारी है. बावजूद इसके, इसकी खेती को लेकर जरूरी जागरूकता नहीं दिखती, जो दुखद है.

दलहन की पैदावार के लिए किसानों को मेहनत खूब करनी पड़ती है, पर जब मेहनत का उचित फल नहीं मिलता, तो उनकी रुचि दलहन की खेती को लेकर घटने लगती है.

यह अच्छी बात है कि केंद्र सरकार ने दालों की पैदावार बढ़ाने के प्रयास किए हैं, लेकिन उसकी योजनाएं तभी कामयाब हो सकेंगी, जब कृषि विभाग, कृषि विशेषज्ञ और किसान मिलकर इस दिशा में काम करेंगे. जैसे- कृषि विभाग की ओर से किसानों को जागरूक करने के प्रयास करने चाहिए.

कृषि विशेषज्ञ मौसमचक्र के अनुसार या जहां दलहन की पैदावार न के बराबर होती है, वहां इसकी उपज बढ़ाने के लिए नई तकनीक विकसित करें, और किसानों को चाहिए कि वे संबंधित विभागों से जरूरी जानकारियां लेकर दलहन की खेती पर अपना ध्यान केंद्रित करें, ताकि इसकी पैदावार बढ़े.

अगर इन तीनों का सही मायने में संगम हो गया, तो निस्संदेह देश में दलहन की खेती नई ऊंचाई को छू सकेगी और भारत जैसे कृषि प्रधान देश में किसी भी दाल की कीमत आसमान तक नहीं पहुंच सकेगी.

यह सब करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि भारत को दालों का ज्यादा से ज्यादा निर्यात करना चाहिए, ताकि देश की आर्थिक स्थिति पर सकारात्मक असर पड़े और किसानों की आय बढ़ सके. करीब डेढ़ साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसी लगभग 109 उन्नत किस्म के बीजों को जारी किया था, जो जलवायु परिवर्तन, अधिक उपज और जैविक कृषि को बढ़ावा देने वाले हैं. इनमें मुख्य तौर पर अनाज, तिलहन, फल और सब्जियां हैं.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का यह बहुत ही अच्छा प्रयास रहा, लेकिन दलहन को लेकर भी ऐसी कोशिशें होनी चाहिए. हालांकि, इन सबकी सफलता तभी सुनिश्चित हो सकेगी, जब संबंधित विभागों और किसानों के बीच उचित तालमेल बनाया जाएगा. सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए.

यह कोई छिपा सत्य नहीं है कि विश्व में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक देश भारत है. यहां करीब 280 लाख टन दलहन का उत्पादन होता है, जो वैश्विक उत्पादन का करीब 25 फीसदी है. जिस तरह से भारत दाल के उत्पादन में आगे बढ़ रहा है, उसी का नतीजा है कि अब सरकार ने दलहन में ‘आत्मनिर्भरता मिशन’ की शुरुआत की है, ताकि 2030-31 तक दालों का उत्पादन 350 लाख टन किया जा सके.

ऐसा करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि हम दालों के बड़े उपभोक्ता भी हैं. इतना ही नहीं, न्यूनतम समर्थन मूल्य, यानी एमएसपी पर सौ फीसदी खरीदारी सुनिश्चित करने पर भी सरकार जोर दे रही है, ताकि आयात पर निर्भरता कम हो.

दालों की सरकारी खरीद का गणित जो नहीं जानते, उनको बता दूं कि देश में पहले गेहूं और धान की खरीद तो एमएसपी पर होती थी, लेकिन दलहन व तिलहन के लिए ऐसी व्यवस्था नहीं थी, पर केंद्र सरकार ने किसानों को आय समर्थन देने के लिए दलहन व तिलहन को एमएसपी पर खरीदने की व्यवस्था की. नतीजतन, बीते 8 वर्षों में दलहन की 75 फीसदी तक उपज सरकारी मूल्यों पर खरीदी जा रही है, जिसका लाभ किसान पा रहे हैं.

सरकारों का यह समझना भी सुखद है कि दालें केवल कृषि उत्पाद नहीं हैं, बल्कि पोषण सुरक्षा, मृदा स्वास्थ्य और ग्रामीण आजीविका की आधार भी हैं. इसी के मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 अक्तूबर, 2025 को 11,440 करोड़ रुपए के बजटीय आवंटन के साथ दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन की शुरुआत की. इसका लक्ष्य दाल उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ खेती के क्षेत्र को 310 लाख हेक्टेयर तक बढ़ाना भी है.

इसका एक मकसद यह भी है कि 4 वर्षों तक एमएसपी पर तुअर, उड़द और मसूर की सौ फीसदी खरीद सुनिश्चित हो. इसके लिए किसानों के बीच कुल 88 लाख निःशुल्क बीज किट और 126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज बांटने की व्यवस्था की गई है.

यह सब इसीलिए किया जा रहा है, क्योंकि सरकारें दाल उत्पादन की जरूरत और किसानों की आवश्यकता, दोनों को बखूबी समझ रही हैं. यह आत्मनिर्भर बनने की दिशा में बढ़ते भारत का संकेत है.

ऐसे में, यह कहना गलत होगा कि दालों के उत्पादन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा. अलबत्ता, पहले से कहीं अधिक गंभीरता दिख रही है. उम्मीद यही है कि जिस तरह से काम किए जा रहे हैं, जल्द ही हम दलहन के मामले में पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो जाएंगे. इससे न सिर्फ किसानों को लाभ मिलेगा, बल्कि आम आदमी के पोषण पर भी इसका सकारात्मक असर पड़ेगा.

भारत सरकार ने दलहन आत्मनिर्भरता मिशन (2025-26 से 2030-31) के तहत 11,440 करोड़ रुपए के बजट के साथ दालों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य रखा है. इसका उद्देश्य 2030-31 तक उत्पादन को 350 लाख टन तक पहुंचाना और किसानों के लिए तुअर, उड़द व मसूर की 100 फीसदी खरीद सुनिश्चित कर आयात पर निर्भरता कम करना है.

दलहन आत्मनिर्भरता की मुख्य बातें :

लक्ष्य : 2030-31 तक 350 लाख टन दलहन उत्पादन और 310 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र.

रणनीति : ‘बीज से बाजार तक’ (Seed to Market) दृष्टिकोण, क्लस्टर-आधारित खेती और उच्च उपज वाली किस्मों का उपयोग.

किसान सहायता : 88 लाख मुफ्त बीज किट और 126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीजों का वितरण.

खरीद गारंटी : 4 वर्षों तक नेफेड (NAFED) और एनसीसीएफ (NCCF) द्वारा एमएसपी (MSP) पर 100 फीसदी खरीद.

प्रभाव : लगभग 2 करोड़ किसानों को लाभ, विदेशी मुद्रा की बचत और कृषि में सुधार.

यह मिशन न केवल भारत को दालों के आयात से मुक्त करेगा, बल्कि ग्रामीण समृद्धि और पोषण सुरक्षा को भी मजबूत करेगा.

भारत सरकार ने दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए 11,440 करोड़ रुपए के बजट के साथ 2025-26 से 2030-31 तक के लिए एक विशेष मिशन शुरू किया है, जिसका लक्ष्य उत्पादन को 350 लाख टन तक बढ़ाना है. इसमें उच्च गुणवत्ता वाले बीज वितरण, एमएसपी पर 100 फीसदी खरीद, उन्नत कृषि तकनीकों (KVK) और 111 उच्च-संभावित जिलों पर केंद्रित क्लस्टर-आधारित रणनीतियां अपनाई जा रही हैं.

उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रमुख उपाय :

लक्ष्य और रणनीति : 2030-31 तक दलहन खेती का क्षेत्रफल 310 लाख हेक्टेयर तक बढ़ाना और उत्पादकता को 1130 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक ले जाना है.

बीज और तकनीक : किसानों को 88 लाख मुफ्त बीज किट और 126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज का वितरण किया जा रहा है. उन्नत बीजों और बोआई तकनीकों पर ध्यान दिया जा रहा है.

समर्थन और खरीद : पीएम-आशा के तहत अरहर, उड़द और मसूर की 100 फीसदी एमएसपी खरीद की गारंटी है, जिससे किसानों को बेहतर दाम मिलें.

क्षेत्रीय विकास : मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की तरह, देश में अन्य स्थानों पर भी उन्नत कृषि पद्धतियों को अपनाकर उत्पादन 8 मिलियन टन तक बढ़ाया जा सकता है.

तकनीकी सहयोग : 111 उच्च-क्षमता वाले जिलों में, विशेष रूप से रबी और खरीफ दोनों फसलों में उन्नत बीज का उपयोग (Seed Village) किया जा रहा है.

यह मिशन न केवल भारत को दालों के आयात में कम निर्भर बनाएगा, बल्कि किसानों की आय में वृद्धि और मृदा स्वास्थ्य में भी सुधार करेगा

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