Goat Farming: अगर बकरीपालन करने वाले व्यावसायिक तरीके से गोट फार्मिंग (बकरीपालन) करें तो बकरियों की तादाद और आमदनी दोनों में इजाफा हो सकता है. बड़े पैमाने पर बकरीपालन शुरू करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की बकरीपालन योजनाओं और अनुदान का लाभ लिया जा सकता है.
सब से पहले यह समझना जरूरी है कि व्यावसायिक बकरीपालन (Goat Farming) क्या है? इस में 100 से 1000 बकरियों को एक ही बाड़े में रखा जाता है और बड़े नाद में सभी को एकसाथ खाना खिलाया जाता है. यह तरीका मुरगीपालन की तरह ही होता है. घर में 5-7 बकरियां पालने और बकरियों का व्यावसायिक रूप से पालन करने में फर्क है.
बकरीपालन से रोजगार
अगर एक परिवार में कम से कम 100 बकरियों का पालन करें तो उस परिवार के 6-8 लोगों को काम मिलेगा और आमदनी भी बढ़ेगी. गौरतलब है कि भारत में मांस की मांग करीब 80 लाख टन है, जबकि 60 लाख टन का ही उत्पादन हो पाता है. इस में बकरी के मांस की खपत 12 फीसदी ही है.
बकरीपालन गांवों का एटीएम’
बकरीपालन की सब से बड़ी खासीयत यह है कि बाढ़ या सूखा जैसी आपदा होने पर ये फसलों की तरह बरबाद नहीं होती हैं. दूसरी बड़ी खासीयत यह है कि अचानक पैसों की जरूरत पड़ने पर बकरियों को बेचा जा सकता है, यानी इन्हें कभी भी कैश कर लीजिए. इसलिए इन्हें ‘गांवों का एटीएम’ कहा जाता है.
मिलते हैं अच्छे दाम
बकरी की तीसरी खासीयत यह है कि वह दूसरी चीजों की तरह खराब नहीं होती. उसे कभी भी कहीं भी बेचा जा सकता है. कई अवसरों पर तो बकरियों की मुंहमांगी कीमत मिलती है. ऐसे अवसरों को भुनाने के लिए बकरीपालक बकरियों को अच्छी तरह खिलापिला कर बड़ा करते हैं.
बकरीपालन यूनिट
पशु वैज्ञानिक डा. सुरेंद्र नाथ बताते हैं कि गोट फार्मिंग की एक मिनी यूनिट में 20 बकरियां और 1 बकरा होता है, जबकि बड़ी यूनिट में 40 बकरियां और 2 बकरे होते हैं. साधारण किस्म की बकरी 1 साल में 2 बार 2-2 बच्चे देती है. कुछ बकरियां 3-4 बच्चे भी देती हैं. इस हिसाब से 20 बकरियों वाली यूनिट से 1 साल में कम से कम 80 बच्चे मिल सकते हैं.
व्यावसायिक बकरीपालन के लिए मुख्य जरूरी चीजों के बारे में विशेषज्ञों से सलाह ले कर काम चालू करना चाहिए.
किसानों को होने वाली आमदनी का आधा हिस्सा पशुधन से ही आता है और बकरी गरीब राज्यों के लिए गाय की तरह है. बकरियों की नस्लों को सुधार कर बीपीएल परिवारों की आमदनी को आसानी से बढ़ाया जा सकता है.





