Sunflower Crop Protection :

खरपतवार नियंत्रण : बीज बोने के बाद पहली सिंचाई से पहले अगर एक बार निराई कर दी जाए तो नतीजे अच्छे मिलते हैं, क्योंकि सूरजमुखी के पौधे जब तक छोटे होते हैं तब तक खरपतवारों से नुकसान होता है. इस के बाद सूरजमुखी के पौधे तेजी से बढ़ते हैं जो खरपतवारों को पनपने नहीं देते हैं.

बीजों के अंकुरण से पहले पैंडीमिथेलिन या ऐलाक्लोर 1 किलोग्राम सक्रिय तत्त्व प्रति हेक्टेयर का छिड़काव कर के भी खरपतवारों पर काबू पाया जा सकता है.

कीट नियंत्रण : अकसर सूरजमुखी की फसल पर ये कीट आक्रमण कर के नुकसान पहुंचाते हैं:

रस चूसने वाले कीट : चैंपा, हरा तैला.

पत्ती खाने वाला कीट : बिहारी रोएंदार सूंड़ी.

फल खाने वाला कीट : हैलियोथिस.

अकसर ऐसा देखने में आया है कि जायद फसल में इन कीटों का प्रकोप न के बराबर होता है. महज बिहारी रोएंदार सूंड़ी का प्रकोप कभीकभार दिखाई पड़ता है जो कुछ पौधों तक ही सीमित होता है. ऐसे पौधों की पत्तियों को तोड़ कर नष्ट कर देना चाहिए.

कभीकभी रस चूसने वाले कीटों का प्रकोप भी हो जाता है. इस वजह से पत्तियां सिकुड़ जाती हैं. ऐसी अवस्था में मोनोक्रोटोफास के 0.5 फीसदी घोल का छिड़काव करना चाहिए.

रोग नियंत्रण : सूरजमुखी की फसल पर अनेक रोगों का प्रकोप होता है, पर प्रमुख रोगों में झुलसा, रतुआ, डाउनी मिल्ड्यू, चूर्णी फफूंदी, काला सड़न वगैरह. उत्तरी भारत में जायद फसल में इन का प्रकोप न के बराबर होता है. यदि रोग लग जाए तो डायथेन एम 45 के 0.2 फीसदी घोल का छिड़काव करना चाहिए. (2 ग्राम दवा 10 लिटर पानी में मिला कर) शाम के समय छिड़काव करना चाहिए.

फसल की कटाई : सूरजमुखी की फसल 60-100 दिन में पक कर तैयार हो जाती है. जब फूल का पिछला भाग नीबू जैसे पीले रंग का हो जाए और फूल झड़ जाए तो फसल को तैयार समझना चाहिए.

इस अवस्था में फूलों को काट कर खलिहान में लाएं और 3-4 दिन सुखाने के बाद डंडों से पीटने पर बीज आसानी से बाहर आ जाते हैं. भंडारण से पहले बीजों को भलीभांति सुखा लें, ताकि उन में 6-10 फीसदी से ज्यादा नमी न रहे.

अनुमानित उपज : सूरजमुखी की पैदावार कई बातों पर निर्भर करती है.यदि इस की खेती सही तरीके से की जाए तो प्रति हेक्टेयर 20-25 क्विंटल तक उपज मिल जाती है.

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