Mango Farming to Export : एक किसान जिसने खुद बनाई अपनी पहचान
“ कोई चलता पदचिन्हों पर, कोई पदचिन्ह बनाता है.
हे वही सूरमा इस जग में, दुनिया में पूजा जाता है.”
इसी सोच को साकार करने वाले किसान हैं – राकेश कुमार सिंह, आम की बागवानी में इनकी पहचान देश ही नहीं, बल्कि विदेशों तक है. इनके बाग के आम दुबई सहित कई देशों में निर्यात किए जाते हैं और इन्होंने 3000 से अधिक किसानों को अपने साथ जोड़ा है. आम की बागवानी से लेकर प्रसंस्करण और निर्यात तक का पूरा सफर एक प्रगतिशील किसान किस प्रकार तय कर सकता है. इसी विषय पर जानकारी प्राप्त करने के लिए हमने बिहार के भागलपुर जिले के प्रगतिशील किसान राकेश कुमार सिंह से बातचीत की. प्रस्तुत है कृषि संवाद के अंश –
कितनी है जमीन और कैसे करते हैं खेती
राकेश कुमार सिंह के पास लगभग 10 बीघा जमीन है, जिसमें से 5 से 6 बीघा क्षेत्र में उन्होंने आम की बागवानी की है. शेष जमीन पर वे सब्जियों और पारंपरिक खेती का कार्य करते हैं. वे मानते हैं कि खेती में विविधता बनाए रखना जरूरी है, ताकि जोखिम कम हो और आय के स्रोत बढ़ें.
आम की प्रमुख किस्में और उत्पादन
उनके बाग में 100 से अधिक आम के पेड़ हैं. प्रमुख किस्मों में जर्दालू, दूधिया मालदा, आम्रपाली और बंबैया शामिल हैं. इनमें बंबैया किस्म सबसे पहले पकने वाली होती है. इसके साथ ही वे मौसमी सब्जियां जैसे करेला, नेनुआ और भिंडी भी उगाते हैं. उनके बाग से हर वर्ष लगभग 10 से 15 टन आम का उत्पादन होता है.
प्रोफेसर से किसान बनने का बड़ा फैसला
राकेश कुमार सिंह ने प्रबंधन (एमबीए – आईटी और एचआर) की पढ़ाई की और प्राध्यापक के रूप में कार्य किया. एक सुरक्षित नौकरी छोड़कर खेती में आना उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने खेती को मजबूरी नहीं, बल्कि अवसर के रूप में देखा. उनका मानना है कि कृषि को “कृषि उद्यम” के रूप में अपनाया जाए, तो यह सबसे मजबूत और लाभकारी क्षेत्र बन सकता है.
पारंपरिक खेती से आधुनिक तकनीक तक
राकेश बताते हैं कि, सबसे पहले मैंने यह देखा कि किसान मेहनत तो बहुत करता है, लेकिन अपनी मेहनत का पूरा हिसाब नहीं रखता. वो सिर्फ वही हिसाब लिखते हैं जिसमें उन्होंने अपने जेब से पैसे निकालकर खर्च किए हैं, वो कभी यह हिसाब नहीं रखते हैं कि उन्होंने जो 365 दिन (24 घंटे,7 दिन) कार्य किया है उसके लिए उनको भी कुछ मिलना चाहिए. तो सबसे पहले तो किसानों को अपनी एक डायरी तैयार करनी चाहिए कि आज का हमारा जो मेहनताना है वो कितना हुआ. यह उनको एक आंकड़ा निकालना चाहिए.
मैंने बचपन से देखा है कि कृषक पिताजी कहते थे , इस बार गेहूं बेचेंगे तो ये चीजें आ जाएंगी घर में. इस बार मक्का बेचेंगे तो ये चीजें आ जाएंगी. किसानों के घर की अर्थव्यवस्था ऐसे ही चलती है. लेकिन मुझे यह देखना है कि अपने बच्चों के साल भर के खर्च यहां से मैं कैसे निकालूं ? कृषि को एक दूसरे नजरिए से देखना पड़ेगा. और आज जो अत्याधुनिक तकनीकों का प्रयोग करके या फिर यह कहें कि पुरानी पद्धति और नई तकनीकों दोनों का समन्वय करके खेती को कैसे बेहतर बना सकते हैं.
हमने सोच को बदला और खेती को व्यवस्थित तरीके से देखने लगे. जैविक खेती अपनाई और अपने ही खेत के कचरे से खाद बनाना शुरू किया. शून्य निवेश खेती पर काम किया. हमारा प्रयास रहता है कि कम से कम लागत में अधिक उत्पादन कैसे लिया जाए. हमने फल आवरण (फ्रूट कैप) जैसी तकनीक अपनाई जिससे आम की गुणवत्ता और सुंदरता दोनों में सुधार हुआ. साथ ही बाग का वैज्ञानिक प्रबंधन करके हम अपने उत्पाद को निर्यात योग्य बना पाए.
जैविक खेती और प्राकृतिक खाद का उपयोग
राकेश कुमार सिंह जैविक खेती करते हैं. वे जीवामृत, नीमास्त्र और अन्य जैविक खाद स्वयं तैयार करते हैं. उन्हें कृषि विज्ञान केंद्र, भागलपुर और सबौर कृषि विश्वविद्यालय से प्रशिक्षण प्राप्त हुआ है. वे इन जैविक घोलों का छिड़काव करते हैं और पेड़ों के चारों ओर खाद डालकर पौधों को पोषण देते हैं.
खेती में खर्च और मुनाफे का गणित
उनके अनुसार खेती में सबसे अधिक खर्च खाद या मजदूरी पर नहीं, बल्कि पैकेजिंग और प्रसंस्करण पर आता है. चूंकि वे खाद स्वयं तैयार करते हैं, इसलिए लागत कम रहती है. वहीं मजदूरी भी सीमित समय के लिए लगती है.
सिंचाई और जल प्रबंधन
वर्तमान में वे कुएं के पानी से सिंचाई करते हैं. हालांकि भविष्य में वे टपक सिंचाई और स्प्रिंकलर प्रणाली अपनाने की योजना बना रहे हैं, ताकि पानी की बचत हो सके और सिंचाई अधिक प्रभावी बन सके.
आवारा पशुओं से फसल की सुरक्षा
उनके बाग को बंदर और नीलगाय से नुकसान होता है. लेकिन वे उन्हें नुकसान पहुंचाए बिना घरेलू उपाय अपनाते हैं, जैसे ड्रम बजाना या बाग में आकृतियां लगाना. यह तरीका पर्यावरण और पशुओं के लिए सुरक्षित है.
खेती में मशीनरी और तकनीक का महत्व
राकेश कुमार सिंह के पास ट्रैक्टर, रोटावेटर, थ्रेशर और ब्रश कटर जैसी मशीनें हैं. उनका मानना है कि आज के समय में मशीनों का उपयोग अनिवार्य हो गया है, क्योंकि मजदूरों की कमी को मशीनें ही पूरा कर सकती हैं और काम तेजी से होता है.
आम की पैकेजिंग और प्रसंस्करण प्रक्रिया
आम की तुड़ाई के बाद उसे ठंडा किया जाता है, फिर उसकी सफाई और धुलाई की जाती है. इसके बाद गरम पानी और वाष्प ऊष्मा उपचार किया जाता है, जिससे गुणवत्ता बनी रहती है. फिर आम पर स्टिकर लगाया जाता है और जालीदार कवर में पैक किया जाता है ताकि परिवहन के दौरान नुकसान न हो. एक डिब्बे की कीमत लगभग 17 से 18 रुपये होती है, जबकि पूरी प्रक्रिया में प्रति किलो 60 से 75 रुपये तक खर्च आता है.
प्रसंस्करण से बढ़ता मुनाफा
प्रसंस्करण के माध्यम से आम का मूल्य कई गुना बढ़ जाता है. जहां कच्चा आम 5 से 10 रुपये में बिकता है, वहीं उससे बने उत्पाद आम पेय आदि 40 से 50 रुपये या उससे अधिक में बिक सकते हैं. इससे किसानों की आय में बड़ा अंतर आता है. किसान यह सोचते हैं कि बड़ी कंपनियां पहले से इस तरह के उत्पाद बना रही हैं, तो उनके उत्पाद कौन खरीदेगा. लेकिन यहां जरूरी यह है कि किसान सीधे उसी प्रकार का उत्पाद न बनाकर उसमें कुछ बदलाव करें. जैसे आम का गूदा, आम का पाउडर या आम पापड़ तैयार किया जा सकता है और इस तरह के कई अन्य उत्पाद बनाए जा सकते हैं, जिनकी बाजार में अच्छी मांग होती है. आजकल आम की गुठलियों से सौंदर्य प्रसाधन तक बनाए जा रहे हैं.
आम का निर्यात: प्रक्रिया और गुणवत्ता मानक
राकेश कुमार सिंह ने अपने उत्पाद को निर्यात के स्तर तक पहुंचाया है. इसके लिए उन्होंने एपीडा से पंजीकरण कराया और आवश्यक प्रमाणपत्र प्राप्त किए.
आम के निर्यात के लिए सबसे पहले एपीडा से पंजीकरण कराना होता है. इसके साथ ही आयात-निर्यात कोड (IEC) और पंजीकरण सह सदस्यता प्रमाणपत्र (RCMC) लेना अनिवार्य होता है. निर्यात प्रक्रिया में कई गुणवत्ता प्रमाणपत्रों की आवश्यकता होती है, जैसे—फाइटोसैनिटरी प्रमाणपत्र ,पेस्ट कंट्रोल प्रमाणपत्र , रेजिड्यू एनालिसिस प्रमाणपत्र , गरम पानी उपचार प्रमाणपत्र (HWT Certificate) ,वाष्प ऊष्मा उपचार प्रमाणपत्र (VHT Certificate). इसके अलावा, कई देशों में निर्यात के लिए होर्टिनेट पोर्टल पर बाग का पंजीकरण भी आवश्यक होता है, जिससे उत्पाद की ट्रेसबिलिटी सुनिश्चित होती है.
निर्यात के लिए गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखना होता है, जैसे रसायनों का उपयोग न करना, उचित प्रसंस्करण करना और अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करना.

वित्तीय चुनौतियां और निवेश
शुरुआत में उन्होंने अपनी बचत को पूरी तरह खेती में लगाया. लगभग चार वर्षों तक उन्होंने लाभ का पैसा अपने पास नहीं रखा और उसे खेती में ही निवेश किया. धीरे-धीरे उनका काम बढ़ा और अब उन्हें बैंक का सहयोग भी मिलने लगा है.
युवाओं के लिए संदेश: खेती में है भविष्य
राकेश कहते हैं कि, युवाओं के लिए दूसरी जगह जाकर कहीं भी काम करने से बेहतर है कि आप खुद हल उठाएं, अपने खेतों में आएं और वहां तकनीकी रूप से कृषि को शुरू करें. कृषि में अपार संभावनाएं हैं और यह भविष्य का सबसे मजबूत क्षेत्र बन सकता है. मुझे उम्मीद है कि उन्हें कभी कोई परेशानी नहीं होगी, और यदि कभी कोई परेशानी आती भी है तो एग्रो पॉइंट मदद करने के लिए हमेशा तैयार है. आप हमारे एफपीओ से आकर जुड़ सकते हैं, यहां प्रशिक्षण ले सकते हैं और भविष्य को कृषि से जोड़कर आप भी एक कृषि उद्यमी बन सकते हैं.
बदलती सोच, बदलती खेती
युवा किसान राकेश की कहानी यह बताती हैं कि, कैसे एक युवा अपने हौसलों से पारंपरिक खेती का रुख बदलकर आम को अपने बागों से लेकर प्रसंस्करण और निर्यात तक पहुंचा सकता है. उनकी यह यात्रा केवल एक किसान की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस बदलते भारत की तस्वीर है, जहां खेती अब मजबूरी नहीं, बल्कि एक सशक्त कृषि उद्यम बनती जा रही है.
सीमित संसाधनों से शुरुआत कर, वैज्ञानिक सोच, प्रशिक्षण, तकनीक और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि यदि सही दिशा और प्रबंधन हो, तो गांव की मिट्टी से ही वैश्विक बाजार तक पहुंच बनाई जा सकती है.
आज जब बड़ी संख्या में युवा गांव छोड़कर शहरों की ओर जा रहे हैं, ऐसे में राकेश जैसे प्रगतिशील किसान यह संदेश देते हैं कि संभावनाएं हमारे अपने खेतों में ही मौजूद हैं—बस उन्हें पहचानने और सही तरीके से विकसित करने की आवश्यकता है. जैविक खेती, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और निर्यात—ये सभी मिलकर खेती को एक लाभकारी और सम्मानजनक व्यवसाय बना सकते हैं.
राकेश कुमार सिंह की कहानी हर उस किसान और युवा के लिए प्रेरणा है, जो कुछ नया करने का साहस रखता है. यह साक्षात्कार हमें यह विश्वास दिलाता है कि—
“जब सोच बदलती है, तभी खेती बदलती है… और जब खेती बदलती है, तभी किसान की किस्मत बदलती है.”





