Improved varieties of Rice : जलवायु परिवर्तन का असर अब खेती-किसानी पर साफ दिखाई देने लगा है. कभी सूखा, कभी अत्यधिक बारिश और कभी बढ़ता तापमान किसानों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है. खासकर धान की खेती में पानी की बढ़ती कमी और मौसम की अनिश्चितता ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है. ऐसे समय में कृषि वैज्ञानिक लगातार ऐसी नई किस्में विकसित करने में लगे हैं, जो कम पानी में अच्छी पैदावार दें और बदलते मौसम को आसानी से सहन कर सकें.

इसी दिशा में भारत के कृषि वैज्ञानिकों ने बड़ी सफलता हासिल करते हुए धान की दो नई जीनोम एडिटेड किस्में विकसित की हैं. इसी के साथ भारत जीनोम संपादित चावल की किस्में विकसित करने वाला विश्व का पहला देश बन गया है. इस किस्म को विकसित करने के लिए साल 2018 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने राष्ट्रीय कृषि विज्ञान कोष के तहत 2 प्रमुख चावल किस्मों सांबा महसूरी और एमटीयू 1010 में सुधार के लिए जीनोम संपादन अनुसंधान शुरू किया था. ये किस्में उसी शोध के तहत विकसित की गई हैं.

माना जा रहा है कि ये किस्में आने वाले समय में धान की खेती की तस्वीर बदल सकती हैं. इन किस्मों की खास बात यह है कि ये कम पानी में बेहतर उत्पादन देने के साथ सूखा और लवणीयता जैसी समस्याओं को भी सहन करने में सक्षम हैं.

डीआरआर धान 100 (कमला)

जीनोम-एडिटेड 2 किस्मों में पहली किस्म डीआरआर धान 100 यानी कमला किस्म है, जिसे देश की लोकप्रिय बारीक दाने वाली धान किस्म सांबा महसूरी यानी बीपीटी 5204 को सुधार कर तैयार किया गया है. वैज्ञानिकों ने इसमें दानों की संख्या बढ़ाने और पौधे को अधिक सक्षम बनाने के लिए जीनोम एडिटिंग तकनीक का उपयोग किया है.

यह नई किस्म अपनी मूल किस्म सांबा महसूरी की तुलना में अधिक उत्पादन देने वाली है. साथ ही इसमें सूखा सहन करने की क्षमता भी ज्यादा है. यह पौधा नाइट्रोजन का बेहतर उपयोग करता है, जिससे खाद की जरूरत भी कम हो सकती है.

इस किस्म की एक बड़ी विशेषता यह है कि यह लगभग 20 दिन पहले यानी 130 दिन में ही पक कर तैयार हो जाती है. इससे किसानों को कम समय में फसल मिल जाती है और अगली फसल की बुआई भी समय पर हो सकती है.

अगर उत्पादन की बात करें तो इसकी औसत पैदावार लगभग 5.3 टन प्रति हेक्टेयर पाई गई है, जबकि इसकी मूल किस्म सांबा महसूरी की पैदावार लगभग 4.5 टन प्रति हेक्टेयर रहती है. यानी यह किस्म लगभग 19 प्रतिशत अधिक उत्पादन देने में सक्षम है.

पूसा डीएसटी राइस 1

पूसा डीएसटी राइस 1 को पूसा संस्थान नई दिल्ली ने धान की लोकप्रिय किस्म एमटीयू 1010 को सुधार कर विकसित किया है. इसमें ‘डीएसटी’ नामक जीन को एडिट किया गया है, जो पौधे को सूखा और लवणीयता जैसी कठिन परिस्थितियों को सहन करने में मदद करता है. यह लगभग 120-130 दिनों में तैयार हो सकती है.

एमटीयू 1010 पहले से ही किसानों के बीच काफी लोकप्रिय किस्म है, क्योंकि इसका दाना लंबा और बारीक होता है. लेकिन यह किस्म सूखा और खारेपन जैसी परिस्थितियों के प्रति संवेदनशील मानी जाती थी. नई डीएसटी राइस 1 किस्म में इस कमी को दूर किया गया है. यह किस्म खासतौर पर दक्षिण भारत में रबी मौसम की धान खेती के लिए अधिक उपयुक्त मानी जा रही है.
लवणीय और क्षारीय मिट्टी वाले क्षेत्रों में यह किस्म सामान्य एमटीयू 1010 की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत अधिक पैदावार देने में सक्षम पाई गई है.

इन किस्मों को आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, पुदुचेरी, केरल, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, ओडिशा, झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के लिए विकसित किया गया है.

वैज्ञानिकों के अनुसार इन राज्यों में लगभग 50 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में इन किस्मों की खेती की जा सकती है. इससे देश के धान उत्पादन में लगभग 45 लाख टन तक की बढ़ोतरी होने की संभावना है.

सूखा सहनशील, कम अवधि और रोगरोधी धान की प्रमुख किस्में

डीआरआर 58

डीआरआर 58 एक लवणता सहिष्णु धान की उन्नत किस्म है, जिसे विशेष रूप से तटीय क्षेत्रों में खारे पानी की स्थिति में उगाने के लिए विकसित किया गया है. यह उन्नत सांबा महसूरी पर आधारित किस्म है. यह रोपाई की अवस्था में लवणता को सहन कर सकती है और उच्च उपज देती है.

यह न केवल खारे पानी में जीवित रहती है, बल्कि मध्यम से उच्च उपज और अच्छी अनाज गुणवत्ता भी प्रदान करती है. यह कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाली किस्म है, जो मधुमेह के रोगियों के लिए अच्छी मानी जाती है. इसकी उपज लगभग 5.5 टन प्रति हेक्टेयर है. यह एक मध्यम अवधि की किस्म है, जो 130-135 दिन में पक कर तैयार होती है.

जया

जया धान की एक पुरानी लेकिन भरोसेमंद किस्म है, जिसे किसान लंबे समय से सफलतापूर्वक उगा रहे हैं. यह लगभग 133 दिनों में तैयार हो जाती है और सिंचित क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन करती है.

इसके दाने छोटे और मोटे होते हैं. यह किस्म सामान्य रोगों के प्रति सहनशील मानी जाती है और विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में स्थिर उत्पादन देती है. इसकी उत्पादन क्षमता लगभग 45 से 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक रहती है.

डीआरआर 42

डीआरआर 42 विशेष रूप से सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए विकसित की गई उन्नत धान किस्म है. यह लगभग 120 से 125 दिनों में तैयार हो जाती है और कम पानी की स्थिति में भी अच्छा उत्पादन देने की क्षमता रखती है.

सामान्य परिस्थितियों में इसकी उपज लगभग 55 से 60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है, जबकि मध्यम सूखे की स्थिति में भी यह 35 से 40 क्विंटल तक उत्पादन दे सकती है. इसके दाने लंबे और पतले होते हैं. यह किस्म ब्लास्ट रोग के प्रति प्रतिरोधी है और बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट तथा ब्राउन स्पॉट रोग के प्रति मध्यम सहनशीलता रखती है.

डीआरआर 47

डीआरआर 47 कम अवधि में तैयार होने वाली उन्नत धान किस्म है, जो लगभग 110 से 115 दिनों में पक जाती है. यह असिंचित और कम वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए उपयोगी मानी जाती है.
इसकी उत्पादन क्षमता लगभग 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है. इसके दाने मध्यम पतले होते हैं. यह किस्म सूखा सहनशील है और जलवायु परिवर्तन की परिस्थितियों में किसानों के लिए बेहतर विकल्प बन रही है.

डीआरआर 50

डीआरआर 50 एक सूखा सहनशील धान किस्म है, जिसे कम पानी और असिंचित क्षेत्रों के लिए विकसित किया गया है. यह लगभग 142 दिनों में तैयार होती है और लगभग 50 से 55 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन देने की क्षमता रखती है. इसके दाने लंबे और पतले होते हैं. सूखा प्रभावित क्षेत्रों में यह किस्म किसानों को स्थिर उत्पादन देने में मदद करती है.

डीआरआर 52

डीआरआर 52 शीघ्र पकने वाली धान किस्म है, जो लगभग 110 से 115 दिनों में तैयार हो जाती है. यह उन किसानों के लिए उपयोगी है, जो धान के बाद समय पर गेहूं, चना या सरसों जैसी दूसरी फसल लेना चाहते हैं. इसके दाने छोटे और मोटे होते हैं और इसकी उत्पादन क्षमता लगभग 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक रहती है.

डीआरआर 45

डीआरआर 45 लगभग 130 दिनों में पकने वाली मध्यम अवधि की उन्नत धान किस्म है. इसके दाने लंबे और पतले होते हैं और बाजार में इसकी अच्छी स्वीकार्यता है. यह सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है और लगभग 47 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन देने की क्षमता रखती है.

डीआरआर 75

डीआरआर 75 लगभग 125 दिनों में तैयार होने वाली मध्यम अवधि की धान किस्म है. इसके दाने मध्यम पतले होते हैं और इसकी उत्पादन क्षमता लगभग 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक मानी जाती है. यह रोग सहनशील किस्म है और दक्षिण व पूर्वी भारत के राज्यों में इसकी खेती उपयुक्त मानी जाती है.

डीआरआर 48

डीआरआर 48 उच्च उत्पादन और बेहतर चावल गुणवत्ता वाली धान किस्म है. यह लगभग 137 दिनों में तैयार होती है और सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है. इसके दाने लंबे और पतले होते हैं और चावल आकर्षक तथा स्वादिष्ट होता है. इसकी उत्पादन क्षमता लगभग 50 से 55 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक मानी जाती है. यह एक उच्च जिंक वाली बायोफोर्टिफाइड किस्म है.

डीआरआर 49

डीआरआर 49 लगभग 133 दिनों में पकने वाली मध्यम अवधि की धान किस्म है. यह सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है और लगभग 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन दे सकती है. इसमें जिंक की मात्रा सबसे अधिक यानी 25.2 पीपीएम होती है.

डीआरआर 51

डीआरआर 51 लगभग 133 दिनों में तैयार होने वाली सिंचित धान किस्म है. इसके दाने छोटे और मोटे होते हैं. इसकी उत्पादन क्षमता लगभग 45 से 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक मानी जाती है.

डीआरआर 60

डीआरआर 60 लगभग 130 दिनों में पकने वाली उन्नत धान किस्म है. इसके दाने लंबे और पतले होते हैं और बाजार में इसकी गुणवत्ता अच्छी मानी जाती है. इसकी उत्पादन क्षमता लगभग 50 से 55 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है. यह कम फास्फोरस वाली मिट्टी के लिए अनुकूल किस्म मानी जाती है.

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