Aromatic Rice : भारत में धान केवल एक फसल नहीं, बल्कि संस्कृति, स्वाद और परंपरा का हिस्सा है. खाने में सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली धान किस्मों में बासमती, काला नमक, कतरनी और मर्चा जैसी सुगंधित किस्में शामिल हैं. इन किस्मों की मांग देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी लगातार बढ़ रही है.

भारत से सबसे अधिक जिस धान किस्म का निर्यात किया जाता है, वह बासमती है. बासमती चावल के निर्यात से साल 2021-22 में लगभग 25,053 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा आय प्राप्त हुई. भारत के बासमती जीआई क्षेत्र में पूसा बासमती 1121, पूसा बासमती 1509 और पूसा बासमती 6 जैसी किस्में कुल बासमती क्षेत्र के 90 प्रतिशत से अधिक हिस्से में उगाई जाती हैं और देश के 90 प्रतिशत से अधिक बासमती निर्यात में इनका योगदान है.

रोगरोधी बासमती धान की उन्नत किस्में

पूसा बासमती 1847

पूसा बासमती 1847 लोकप्रिय किस्म पूसा बासमती 1509 का उन्नत संस्करण है, जिसमें बैक्टीरियल ब्लाइट और ब्लास्ट रोगों के प्रति अंतर्निहित प्रतिरोध क्षमता विकसित की गई है.
यह एक जल्दी पकने वाली अर्धबौनी बासमती किस्म है, जिसकी औसत उपज लगभग 5.7 टन प्रति हेक्टेयर है. इसे वर्ष 2021 में व्यावसायिक खेती के लिए जारी किया गया.

ब्लास्ट रोग के प्रति इसका संवेदनशीलता सूचकांक केवल 2.5 है, जबकि पूसा बासमती 1509 का सूचकांक 7.0 है. इसी प्रकार बैक्टीरियल ब्लाइट के प्रति इसका सूचकांक 3.0 है, जो मूल किस्म की तुलना में काफी बेहतर है.

पूसा बासमती 1885

पूसा बासमती 1885, पूसा बासमती 1121 का उन्नत संस्करण है, जिसमें बैक्टीरियल ब्लाइट और ब्लास्ट रोगों के प्रति मजबूत प्रतिरोध क्षमता विकसित की गई है.

यह मध्यम अवधि की बासमती किस्म है, जिसकी फसल अवधि लगभग 135 दिन है. इसके पौधे अर्धलंबे होते हैं तथा दाने अतिरिक्त लंबे और पतले होते हैं. इसकी पकाने की गुणवत्ता पूसा बासमती 1121 के समान है.

इसकी औसत उपज लगभग 4.68 टन प्रति हेक्टेयर है. ब्लास्ट रोग के प्रति इसका संवेदनशीलता सूचकांक केवल 2.3 है, जबकि पूसा बासमती 1121 का सूचकांक 7.3 है.

पूसा बासमती 1886

पूसा बासमती 1886 लोकप्रिय किस्म पूसा बासमती 6 का उन्नत संस्करण है. इसमें बैक्टीरियल ब्लाइट प्रतिरोध तथा ब्लास्ट प्रतिरोध क्षमता विकसित की गई है.

इसकी फसल अवधि लगभग 145 दिन है और औसत उपज लगभग 4.49 टन प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है. ब्लास्ट रोग के प्रति इसका संवेदनशीलता सूचकांक केवल 2.5 है, जबकि पूसा बासमती 6 का सूचकांक 8.5 है.

इन नई उन्नत किस्मों के माध्यम से किसानों को कम रासायनिक उपयोग, बेहतर उत्पादन और उच्च गुणवत्ता वाले सुरक्षित बासमती उत्पादन में सहायता मिलेगी.

खुशबूदार काला नमक धान की उन्नत किस्में

पूसा नरेंद्र काला नमक-1

पूसा नरेंद्र काला नमक-1, जिसे पूसा-1638 के नाम से भी जाना जाता है, काला नमक धान की एक नई उन्नत किस्म है. इसे भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा विकसित किया गया है.
काला नमक धान की खेती को पूर्वी उत्तर प्रदेश के 11 जिलों के लिए जीआई टैग प्रदान किया गया है.

पारंपरिक काला नमक धान की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि इसके पौधे काफी लंबे होते थे और पकने के समय गिर जाते थे. लेकिन पूसा नरेंद्र काला नमक-1 एक बौनी किस्म है, जिसकी ऊंचाई एक मीटर से कम रहती है.

जहां पारंपरिक काला नमक धान की उपज लगभग 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक मिलती थी, वहीं यह किस्म लगभग 45 से 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन देने में सक्षम है.

सीआरडी काला नमक-2

सीआरडी काला नमक-2 काला नमक धान की एक नई उन्नत किस्म है. यह खासतौर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्रों की जलवायु को ध्यान में रखकर तैयार की गई है.

यह एक बौनी किस्म है, जिसकी ऊंचाई लगभग एक मीटर तक रहती है. इसकी औसत पैदावार लगभग 4.5 से 5 टन प्रति हेक्टेयर तक बताई गई है.

यह किस्म लगभग 130 से 140 दिनों में पककर तैयार हो जाती है. इस किस्म की सबसे खास बात इसकी प्राकृतिक सुगंध और स्वाद है. साथ ही इसमें लोहा और जस्ता जैसे पोषक तत्व अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं.

बिहार की प्रसिद्ध जीआई टैग वाली धान किस्में

मर्चा धान

मर्चा धान एक स्वदेशी सुगंधित प्रजाति है, जिसका आकार काली मिर्च के बराबर होता है.
मर्चा धान की खेती पश्चिमी चंपारण जिले के मैनाटांड़, गौनाहा, नरकटियागंज, रामनगर और चनपटिया क्षेत्रों में की जाती है.

यह किस्म बुआई के 145 से 150 दिनों के अंदर पककर तैयार हो जाती है और लगभग 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है.

खुशबूदार कतरनी धान

बिहार के भागलपुर, बांका और मुंगेर क्षेत्र का कतरनी धान अपनी खास खुशबू, छोटे दानों और बेहतरीन स्वाद के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है. कतरनी धान की फसल तैयार होने में लगभग 155 से 160 दिन का समय लगता है. इसके दाने छोटे, पतले और सुगंधित होते हैं.

कतरनी चावल लगभग 3,500 से 4,500 रुपए प्रति क्विंटल तक बिक जाता है. यही कारण है कि कम उत्पादन होने के बावजूद किसान इससे अच्छा मुनाफा कमा लेते हैं. इस धान को जीआई टैग भी मिल चुका है, जिससे इसकी पहचान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत हुई है.

कतरनी धान की फसल तैयार होने में लगभग 155 से 160 दिन का समय लेती है. इस के दाने छोटे, पतले और सुगंधित होते हैं. पकने के बाद इस की खुशबू दूर तक महसूस की जा सकती है. यही विशेषता इसे बाजार में खास पहचान दिलाती है.

इस धान की खेती मुख्य रूप से बिहार के भागलपुर, बांका जिले के रजौन क्षेत्र और मुंगेर जिले में की जाती है. इन क्षेत्रों की जलवायु और मिट्टी कतरनी धान के लिये काफी उपयुक्त मानी जाती है. किसान पारंपरिक तरीके के साथ अब आधुनिक और जैविक खेती पद्धति को भी अपनाने लगे हैं, जिस से इस की गुणवत्ता और बेहतर हो रही है.

कृषि वैज्ञानिकों और कृषि विभाग की सलाह के अनुसार किसान जैविक खाद जैसे ढैंचा और मूंग की हरी खाद का उपयोग कर रहे हैं. इस से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और रासायनिक खादों पर खर्च कम होता है.

कतरनी धान की खेती का सब से बड़ा फायदा इस का बाजार मूल्य है. जहां सामान्य धान की कीमत कम रहती है, वहीं कतरनी चावल लगभग 3,500 से 4,500 रुपए प्रति क्विंटल तक बिक जाता है. यही कारण है कि कम उत्पादन होने के बावजूद किसान इस से अच्छा मुनाफा कमा लेते हैं.

इस धान को भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग भी मिल चुका है. जीआई टैग मिलने के बाद इस की पहचान राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत हुई है. इस से इस की ब्रांडिंग बढ़ी है और बाजार में मांग भी तेजी से बढ़ रही है.

सरकार और कृषि विभाग भी कतरनी धान की खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों को क्लस्टर आधारित खेती की सलाह दे रहे हैं. क्लस्टर फार्मिंग के तहत एक ही क्षेत्र में बड़े स्तर पर इस की खेती की जाती है, ताकि इस की शुद्धता और खुशबू बनी रहे. किसानों को इस के लिए तकनीकी सहायता और अनुदान भी दिया जा रहा है.

हालांकि, कतरनी धान की खेती में कुछ सावधानियां भी जरूरी हैं. इसे दूसरी धान किस्मों से अलग क्षेत्र में लगाना चाहिए, ताकि इस की गुणवत्ता प्रभावित न हो. साथ ही सिंचाई की उचित व्यवस्था भी जरूरी होती है, क्योंकि सही समय पर पानी मिलने से उत्पादन और गुणवत्ता दोनों बेहतर रहती हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान वैज्ञानिक तरीके और जैविक पद्धति से कतरनी धान की खेती करें तो यह बिहार के किसानों के लिए कम लागत में अधिक आमदनी का मजबूत माध्यम बन सकती है.

अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें...