Watermelon : तरबूज की फसल उत्तरी भारत के अनेक इलाकों में पैदा की जाती है. यह खासकर मईजून माह की तेज धूप व लू से बचाव के लिए खासा फायदेमंद फल है.

भूमि व जलवायु : तरबूज के लिए ज्यादा तापमान वाली जलवायु सब से अच्छी होती है. गरम जलवायु ज्यादा होने से बढ़वार अच्छी होती है. ठंड व पाले वाली जलवायु सही नहीं होती. बीजों के अंकुरण के लिए 22-25 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान सब से अच्छा है और अच्छा अंकुरण होता है. नमी वाली जलवायु में पत्तियों में बीमारी आने लगती है.

खेत की तैयारी : तरबूज के लिए रेतीली व रेतीली दोमट मिट्टी सब से अच्छी होती है. इस की खेती गंगा, यमुना व नदियों की खाली जगहों में क्यारियां बना कर की जाती है. खेत में गोबर की खाद को अच्छी तरह से मिलाना चाहिए. रेत ज्यादा होने पर ऊपरी सतह को हटा कर नीचे की मिट्टी में खाद मिलानी चाहिए. इस तरह से जमीन का पीएच मान 5.5-7.0 के बीच होना चाहिए. जरूरत के मुताबिक खेत की जुताई करनी चाहिए. भारी मिट्टी को ढेलेरहित कर लेना चाहिए. रेतीली जमीन के लिए अधिक जुताइयों की जरूरत नहीं पड़ती.

खाद व उर्वरकों का प्रयोग

गोबर की खाद खेत में भलीभांति मिला देनी चाहिए. 80 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से देनी चाहिए और फास्फेट व पोटाश की मात्रा 60-60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से देनी चाहिए. फास्फेट, पोटाश और नाइट्रोजन की आधी मात्रा को खेत की तैयारी के समय मिलाना चाहिए और बाकी नाइट्रोजन की मात्रा को बोआई के 25-30 दिन के बाद देनी चाहिए.

खाद उर्वरकों की मात्रा जमीन की उर्वराशक्ति के ऊपर निर्भर करती है. उर्वराशक्ति जमीन में अधिक हो तो उर्वरक व खाद की मात्रा कम की जा सकती है.

बगीचों के लिए तरबूज की फसल के लिए खाद 5-6 टोकरी व यूरिया व फास्फेट 200 ग्राम व पोटाश 300 मात्रा 8-10 वर्गमीटर क्षेत्र के लिए सही होती है. फास्फेट, पोटाश व 300 ग्राम यूरिया को बोने से पहले जमीन तैयार करते समय मिला देनी चाहिए. बाकी यूरिया की मात्रा 20-25 दिनों के बाद और फूल बनने से पहले 1-2 चम्मच पौधों में डालते रहना चाहिए.

उन्नतशील जातियां

आसाही पामाहो :

इस किस्म के फल माध्यम आकार के, छिलका हलका हरा होता है. गूदा लाल, मीठा और फल के छोटे बीज होते हैं. फल 6-8 किलोग्राम वजन के होते हैं और 90-100 दिनों में तैयार हो जाते हैं.

शुगर बेबी :

यह किस्म भी 95-100 दिनों में तैयार होती है जिन का छिलका ऊपर से गहरे रंग की हलकी गहरी धारियां लिए होता है. गूदा गहरा लाल, मीठा और बीज भी छोटे होते हैं. फल छोटे व मध्यम आकार के होते हैं.

न्यू हेंपसाइट मिडमेट :

यह किस्म गृहवाटिका के लिए उपयुक्त है. इस के फल 2-3 किलोग्राम के होते हैं. फल अधिक लगते हैं. छिलका हरा काली धारियों के साथ होता है. गूदा लाल, मीठा होता है.

अन्य जातियां:

पूसा रसाल, अर्का ज्योति, कटागोलास वगैरह जातियां अच्छी उपज देती हैं.

बोने का सही समय:

तरबूज की बोआई का समय नवंबर से मार्च माह तक होता है. नवंबरदिसंबर की बोआई कर के पौधों को पाले से बचाना चाहिए और अधिकतर बोआई जनवरीमार्च के शुरू तक की जाती है. पहाड़ी इलाकों में मार्चअप्रैल माह में बोया जाता है.

बीज और बोआई का तरीका :

तरबूज की बोआई के समय दूरी भी निश्चित होनी चाहिए. लंबी जाति बढ़ने वाली के लिए 3 मीटर कतारों की दूरी रखते हैं और थामरों की आपस की दूरी 1 मीटर रखते हैं. एक थामरे में 3-4 बीज लगाने चाहिए और बीज की गहराई 4-5 सैंटीमीटर से अधिक नहीं रखनी चाहिए. कम फैलने वाली जातियों की दूरी 1.5 मीटर कतारों की और थामरों की दूरी 90 सैंटीमीटर रखनी चाहिए. बगीचों के लिए कम क्षेत्र होने पर कम दूरी रखने की सिफारिश की जाती है.

नवंबरदिसंबर माह में बोई जाने वाली फसल में बीज ज्यादा, फरवरीमार्च माह में बोई जाने वाली फसल में बीज कम लगते हैं. बीजों को ज्यादातर हाथों से लगाना चाहिए. इस से ज्यादा बीज बेकार नहीं होता है और थामरों में हाथ से छेद कर के बीज बो दिया जाता है. बगीचे के लिए थामरे में 2-3 लगाते हैं और इस प्रकार से बीज की मात्रा 20-25 ग्राम 9-10 वर्गमीटर इलाके के लिए काफी होती है.

सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण :

तरबूज की सिंचाई बोने के 10-15 दिन के बाद करनी चाहिए. अगर खेत में नमी की मात्रा कम हो तो सिंचाई पहले की जा सकती है. फसल की सिंचाई नालियों से 8-10 दिन के अंतर से करते रहना चािहए.

सिंचाई के बाद खरपतवार पनपने लगता है. इन को फसल से निकालना बहुत जरूरी होता है अन्यथा इन का असर पैदावार पर पड़ता है. साथ ही साथ ज्यादा पौधों को थामरे से निकाल देना चाहिए. 2 या 3 पौधे ही रखने चाहिए. इस तरह से पूरी फसल में 2 या 3 निराईगुड़ाई करनी चाहिए.

रोगों से बचाव :

तरबूज में भी रोग व कीट लगते हैं लेकिन बीमारी ज्यादातर क्यूजैरियम बिल्ट व एंथ्रेक्नोज लगती है और कीट रेड बीटिल ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं. बीमारी के लिए रोग प्रतिरोधी जातियों को इस्तेमाल करना चाहिए और कीटों के लिए डीडीटी पाउडर का छिड़काव करना चाहिए.

ध्यान रहे कि रासायनिक दवाओं के इस्तेमाल के बाद 10-15 दिन तक फलों का प्रयोग न करें. साथ ही, उन्हें मंडी में ले जाएं. अगर फसल में बीमारी वाले पौधे हैं तो उन्हें खेत से निकाल कर नष्ट कर दें वरना दूसरे पौधे भी बीमारी की चपेट में आ सकते हैं.

अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें...