Weed Management-

फसलों के साथ उगने वाले खरपतवारों की अधिकता कई हालात व फसल संबंधी कारकों पर निर्भर करती है, जिन में कुछ मुख्य हैं. मिट्टी में नमी का स्तर, मिट्टी और हवा का तापमान, मिट्टी की तैयारी, उर्वरकों का इस्तेमाल, खरपतवार रोकथाम की विधि, फसल लेने की विधि, फसल चक्र का कार्यक्रम वगैरह.

खरपतवारों पर सही तरह से रोक के लिए इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए खरपतवार के जीवन चक्र के बारे में अध्ययन बेहद जरूरी है. सदियों से खरपतवारों की रोकथाम के लिए जुताई, निराई या हाथ से उखाड़ने की तकनीकें काम में लाई जा रही हैं, जिन में समय के साथ मेहनत भी ज्यादा लगती है.

आजकल एक ऐसी तकनीक का विकास कृषि वैज्ञानिकों द्वारा किया जा रहा है, जो हर तरह से किसानों व पर्यावरण के लिए लाभदायक साबित हो रही है. इस में कम लागत के साथ जीवजंतुओं व वनस्पतियों पर बुरा असर कम पड़ता है व आसानी से खरपतवारों की रोकथाम हो जाती है. इस प्रबंधन का नाम समन्वित खरपतवार प्रबंधन दिया गया है.

समन्वित खरपतवार प्रबंधन का मतलब खरपतवार रोकथाम की तमाम तकनीकों का आपस में तालमेल के साथ इस्तेमाल करना है, जिस से नुकसान को कम से कम कर के उसे आर्थिक रूप से तर्कसंगत बनाया जा सके. यानी खरपतवार प्रबंधन का मतलब फसल और खरपतवार के बीच इस तरह का संतुलन कायम करना है, जिस से उपज आर्थिक नजरिए से कम न हो व पर्यावरणीय सुरक्षा बनी रही.

समन्वित खरपतवार प्रबंधन में कई विधियों को शामिल किया गया है, जो आज के उत्पादन के तौरतरीकों में ठीक हैं व जिन्हें किसानों द्वारा अपनाया जाना बेहद सरल है. इस प्रबंधन को अनेक चरणों में अपनाया जा सकता है, जिस से यह प्रणाली बेहद कारगर व सरल हो सकती है.

समन्वित खरपतवार प्रबंधन के लिए अपनाए जाने वाले चरण इस तरह हैं:

शिक्षा का प्रचार : समन्वित खरपतवार नियंत्रण के लिए शिक्षा व प्रसार का काफी अहम स्थान है, क्योंकि इसी के द्वारा अन्य पहलुओं को हस्तांतरित किया जा सकता है.

समन्वित खरपतवार प्रबंधन में किनकिन विधियों का इस्तेमाल कबकब किया जाए, इस की जानकारी किसानों को होनी चाहिए. इस के लिए नई तकनीक जो अनुसंधान द्वारा वैज्ञानिक तैयार करते हैं, उस की जानकारी लोगों को होनी चाहिए, जिस से वे उस का उचित प्रसार किसानों में कर सकें.

उचित जुताई प्रणाली :

आज सब से अहम है कि खेती में जो बदलाव हो रहे हैं, उन की जानकारी किसानों तक पहुंचे और किसान उन बदलावों को अपनाएं. इस में मिट्टी के पोषक तत्त्वों का ज्यादा से ज्यादा बचाव हो और ज्यादा से ज्यादा पैदावार मिल सके. इस के लिए जुताई की ऐसी तकनीक पर बल दिया जा रहा है, जिस से मिट्टी की संरचना को महफूज रखा जा सके और खरपतवारों के कचरे को खत्म किया जा सके. इस से खरपतवारों को जल्दी से समाप्त करने व केमिकलों के कम इस्तेमाल करने में मदद मिलती है.

खरपतवार की निगरानी :

सफल व अच्छी पैदावार के लिए खरपतवार रोकथाम की वैकल्पिक विधियों को अपनानाजरूरी है. इस के लिए जरूरी है कि फसल में खरपतवार की नियमित निगरानी की जाए.

फसलों में खरपतवारों की बढ़वार की अवस्था क्रांतिक अवस्था कही जाती है, जो सालाना फसलों में 15-20 दिन व द्विवार्षिक फसलों में 30-120 दिन की होती है. अगर इन को खत्म कर दिया जाए तो फसल खरपतवार से मुक्त हो जाती है. कुछ प्रमुख फसलों में ये अवस्थाएं अलगअलग होती हैं. गेहूं की बोआई के 21-30 दिन के भीतर, धान की बोआई के 30 दिन के भीतर व गन्ना की बोआई के 30 से 120 दिन के भीतर खरपतवार को नष्ट करना चाहिए.

रोकथाम

अन्य तकनीक :

सालाना फसल चक्र के दौरान कभीकभी ऐसा मौका आता है, जब खेत में कोई फसल नहीं होती.

ऐसे में खेतों में खरपतवारों को पनपने का अवसर मिलता है. इसलिए ऐसे मौके का बेहतर इस्तेमाल करते हुए कोई फसल उगानी चाहिए.

ऐसी फसलों को खड़ी फसल में या फसल कटने के बाद सुविधानुसार बोना चाहिए. ऐसा करने से साल में एक बार या बारबार उगने वाले खरपतवार काबू में रहते हैं.

खास विधियों को अपनाना :

इस में ऐसी फसलों का चयन किया जाता है, जिन्हें कतारों में बोया जा सके व 2 कतारों के बीच ही खरपतवारनाशकों का इस्तेमाल किया जा सके.

इस से कतारों के मध्य उगने वाले खरपतवारों को आराम से रोका जा सकता है.

जैविक तकनीक :

केमिकलों के बुरे असर को देखते हुए वैज्ञानिकों ने खरपतवार रोकथाम के लिए इस विधि को अपनाने पर जोर दिया है.

इस विधि में खरपतवार को खत्म करने वाले कीड़ेमकोड़े व कवक वगैरह को बढ़ावा दिया जाता है.

खरपतवारों की रोकथाम करने वाले कीटपतंगे, जैसे डिप्टेरा, कोलियोप्टो, हेमीप्टो, लेपिडोप्टेरा, पक्षी जैसे हंस, बतख, घोंघे और रोगजनक प्राणी जैसे वायरस, फफूंद व जीवाणु वगैरह हैं.

परंपरागत विधि :

इस विधि का इस्तेमाल चारागाहों में किया जाता है. इस विधि की अवधि लंबी होती है. इस में एक बार खरपतवारनाशक कीट को खरपतवारों में डाल कर कुछ समय के लिए छोड़ दिया जाता है. वह लगातार प्रजनन करता है व खरपतवार को रोकता रहता है.

जैव खरपतवारनाशक :

इस का इस्तेमाल ज्यादातर फसलों में किया जाता है. इस विधि में असरदार जीव उसी स्थान पर असरदार होते हैं, जहां इन का इस्तेमाल किया जाता है.

इस प्रकार जरूरत के मुताबिक तरीकों का इस्तेमाल कर के खरपतवारों का खात्मा किया जा सकता है.  Weed Management

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