Betel Leaf Farming-

पान एक नकदी फसल है और भारत पान उत्पादन में सब से आगे है.  पान की फसल से हमारे देश को हर साल तकरीबन 700 करोड़ की आमदनी होती है और आसाम, पश्चिमी बंगाल, ओडि़शा, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और केरल में तकरीबन 20 लाख परिवारों की रोजीरोटी इसी पर टिकी है. भारत के कुल पान उत्पाद का दोतिहाई हिस्सा पश्चिमी बंगाल से आता है. यहां हम पान की खेती के बारे में बता रहे हैं:

जमीन:

पानी निकासी वाली ढालू व उपजाऊ जमीन, जिस में खनिज व कार्बनिक पदार्थ मौजूद हों, पान की खेती के लिए अच्छी मानी जाती है. लाल मुरम, कछारी, कंकड़ीली और बलुई मिट्टी में पान की खेती अच्छी तरह से होती है, क्योंकि इन में पानी का निकास अच्छी तरह से होता है. इसलिए बरेठा ऊंचे स्थानों पर या ढालू जमीन पर बनाया जाता है. बरेठा बनाने से पहले अपै्रल महीने के आखिरी हफ्ते में खेत की गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से कर मध्य जून तक खुली धूप में छोड़ देते हैं. इस से सूत्रकृमि व मिट्टी में पलने वाले परजीवियों की संख्या में कमी आ जाती है.

बरेठा बनाना:

पान की खेती ढाई मीटर ऊंचे, बांसबल्ली या खड़फूस के बने बरेठा में की जाती है. 15 जून के बाद बरेठा बना कर उसे पतले खर या पुआल से छा दिया जाता है. पानी का निकास ठीक करने के लिए बरेठा को लंबाई में पूर्व से पश्चिम और चौड़ाई में उत्तर से दक्षिण की ओर बनाया जाता है. इस के लिए लंबाई में बांस या मजबूत लकड़ी जिसे कुरवा कहते हैं, को ढाई मीटर पर लाइन से गाड़ दिया जाता है.

लाइन का अंतर 60-70 सेंटीमीटर रखा जाता है. इन्हीं बांस के सहारे ऊपर से बांस को फाड़ कर बनाई कमर्चियों को बांध कर मंडप बनाया जाता है. मंडप के ऊपर पतला सूखा हुआ खर या पुआल को छाया जाता है जिस से धूप व छाया एकसमान मिल सके. एक हेक्टेयर रकबे में 225-275 लाइनें बनती हैं. बांसों के सहारे लाइन में भुरभुरी मिट्टी बनाई जाती है जिसे अतरा कहा जाता है.

पान की बेल का ही इस्तेमाल बीज के रूप में किया जाता है. बेल के ऊपरी एक मीटर भाग को रोपाई के लिए इस्तेमाल किया जाता है. एक हेक्टेयर के लिए एक लाख 20 हजार पत्ती सहित 1-3 गांठ वाली बेलों की जरूरत होती है. नए लगाए गए बरेजा की देखभाल करनी चाहिए. यदि कहीं बेल मर गई तो उस की जगह नई बेल लगा दें.

पान की उन्नत किस्में:

भारत में मगही, बंगला, कलकत्तिया, मीठा, कपूरी, देशी और सांची किस्मों की खेती की जाती है.

पान लगाने का तरीका:

पान की रोपनी फरवरी के आखिरी हफ्ते से मार्च के मध्य तक और जून के तीसरे हफ्ते से अगस्त तक की जाती है. दक्षिणी बिहार में मई महीने के अंत में पान की रोपनी की जाती है. सपरे को हलकी सिंचाई कर जमीन को गीला कर के पान की बेल का रोपण करते हैं. रोपण करने के बाद सूखे हुए पुआल को साफ पानी से गीला कर पान की बेलों को सपरे में ढक दिया जाता है. बाद में हलकी सिंचाई करें, जिस से पान की पत्तियों पर गीलापन या नमी बनी रहे.

अलग आमदनी

सपरे के किनारे चौलाई बोनी चाहिए. जब चौलाई की भाजी एक महीने की हो जाए तब इसे काट कर बेचने से अलग आमदनी हासिल कर सकते हैं. साथ ही भाजी लगाने से पान की पत्तियों के आसपास छाया व नमी बनी रहती है, जिस से पान की पत्तियों पर गरमियों में तापमान का असर नहीं होता.

रोपाई:

जहां बंगला किस्म की खेती की जाती है, वहां एक सपरा से दूसरे सपरा की दूरी एक मीटर होनी चाहिए. सपरा और नाली की चौड़ाई 50-50 सेंटीमीटर होनी चाहिए. एक सपरा से दूसरे सपरे की दूरी 80 सेंटीमीटर होती है. सपरा की चौड़ाई 50 और नाली की चौड़ाई 30 सेंटीमीटर होनी चाहिए. सपरा पर 2 कतारें 30 सेंटीमीटर की दूरी पर और पौधे से पौधे की दूरी 15 सेंटीमीटर होनी चाहिए.

खाद व उर्वरक:

पान की खेती जैविक तकनीक से करनी चाहिए, क्योंकि इस की पत्तियों को सीधे इस्तेमाल करते हैं, परंतु ज्यादा मात्रा में जैविक पदार्थ नहीं मिलने पर रासायनिक खादों का इस्तेमाल किया जाता है. पान की फसल में सरसों, अलसी, तिल, नीम करंज की खल्ली का इस्तेमाल किया जाता है.

सिंचाई:

पान का बरेठा सूखा नहीं रहना चाहिए. मार्च से जून तक महीने में 4 बार सिंचाई जरूर करनी चाहिए. जुलाई से सितंबर तक सिंचाई की जरूरत नहीं होती, जबकि अक्तूबर से फरवरी तक महीने में 2 बार सिंचाई करनी चाहिए.

पत्ती तोड़ना व भंडारण:

पत्तियां डंठल सहित तोड़ कर इकट्ठा करें. पत्तियों को आकार के मुताबिक छांट लें. डंठल 5-8 मिलीमीटर रखते हुए काट दें. बांस की टोकरी में नम धान पुआल या केले का पत्ता लगा कर पत्तियों को रखना चाहिए.

पान की पत्तियां नाहा द्वारा तोड़ी जाती हैं. तोड़ने का काम मजदूर द्वारा हाथ से किया जाता है. बारिश शुरू होने के पहले लगभग 70 सेंटीमीटर की ऊंचाई के पान तोड़ दिए जाते हैं जिस से बीमारी कम लगती है. अगस्त महीने से नीचे के पान तोड़ना शुरू कर दिया जाता है और 15 दिन या एक महीने के अंतर से पान की तुड़ाई की जा सकती है. जनवरीफरवरी में अंतिम तुड़ाई की जाती है. अगर पान अच्छा है और बीज लायक है तो मार्च महीने में बेलें तोड़ कर बाकी डंठल को जमीन में लिटा दिया जाता है और नई बेलें निकलने तक बहुत कम मात्रा में सिंचाई की जाती है.

पान के साथ उगाएं अन्य फसलें भी

पान के साथ परवल, कुंदरू, ककड़ी, मिर्च, रतालू, केला, शिमला मिर्च और पपीता की खेती आराम से की जा सकती है.

बीमारी और रोकथाम: पान अपनी पत्ती के लिए ही मशहूर है, इसलिए इस को बीमारी वगैरह से बचाने के लिए खास ध्यान देना चाहिए, क्योंकि केमिकल सीधे तौर पर पत्ती उत्पादन और क्वालिटी पर बुरा असर डालते हैं.

पान की खेती पूरी तरह कुदरती तरीके से बनाए गए बरेठा में की जाती है, चूंकि यह अपनी क्वालिटी के लिए ही मशहूर है, इसलिए इस की बीमारी व कीट की रोकथाम पर खास ध्यान देना चाहिए, क्योंकि ये नाशीजीव सीधे तौर पर इस के उत्पादन व क्वालिटी पर बुरा असर डालते हैं. पान का बरेजा कभी सूखा नहीं रहना चाहिए.

अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें...