Animal free Dairy Products-

दूध, दही और पनीर का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में गाय या भैंस की तसवीर आती है. लेकिन अब तकनीक ने दूध बनाने का एक नया रास्ता खोज लिया है. इस में गाय से दूध निकालने की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि खास तकनीक की मदद से फैक्टरी में दूध के प्रोटीन तैयार किए जाते हैं और इन से दूध, दही, पनीर, चीज और आइसक्रीम जैसे उत्पाद बनाए जा सकते हैं.

बिना गाय के असली डेयरी जैसा उत्पाद

इजरायल की कंपनी रेमिल्क इसी तकनीक पर काम कर रही है. कंपनी इसे ‘रियल डेयरी, नो काउज’ यानी असली डेयरी जैसा उत्पाद, लेकिन बिना गाय के, कहती है.

बिना गाय के कैसे बनता है दूध?

सामान्य दूध गाय या भैंस से मिलता है. इस में पानी के अलावा प्रोटीन, वसा, कैल्शियम, लैक्टोस और कई दूसरे पोषक तत्व होते हैं. नई तकनीक में गाय से दूध लेने के बजाय दूध के जरूरी प्रोटीन तैयार किए जाते हैं. इस के लिए प्रिसिजन फर्मेंटेशन तकनीक का इस्तेमाल होता है.

आसान भाषा में समझें तो इस में यीस्ट जैसे सूक्ष्म जीवों का इस्तेमाल किया जाता है. इन्हें इस तरह तैयार किया जाता है कि वे गाय के दूध में पाए जाने वाले प्रोटीन और अन्य पोषक तत्वों से भरपूर हो यानी यहां गाय से दूध लेने के बजाय दूध बनाने वाले जरूरी प्रोटीन को फैक्टरी में तैयार किया जाता है.

स्वाद और बनावट भी दूध जैसी

इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें बनाए गए प्रोटीन पारंपरिक दूध के प्रोटीन के समान होते हैं, इसलिए इन से तैयार उत्पादों में दूध जैसी बनावट और कई मामलों में वैसा ही स्वाद लाने की कोशिश की जाती है.
इसी वजह से इस का इस्तेमाल केवल दूध बनाने में ही नहीं, बल्कि दही, चीज, पनीर, आइसक्रीम और दूसरे डेयरी उत्पादों में भी किया जा सकता है.

क्या होता है लैक्टोस

सामान्य दूध में लैक्टोस नाम की प्राकृतिक शुगर होती है. कुछ लोगों का शरीर लैक्टोस को ठीक से पचा नहीं पाता. ऐसे लोगों को दूध पीने के बाद गैस, पेट फूलने या दूसरी परेशानी हो सकती है. प्रिसिजन फर्मेंटेशन से तैयार इन उत्पादों में लैक्टोस को शामिल नहीं किया जाता, इसलिए इन्हें लैक्टोस फ्री बनाया जा सकता है.
इस के अलावा कंपनी के अनुसार, ऐसे उत्पादों में पारंपरिक दूध की तरह कोलैस्ट्रॉल भी नहीं होता. लेकिन यहां एक जरूरी बात है. लैक्टोस फ्री होने का मतलब यह नहीं है कि दूध से एलर्जी वाले लोग इसे पी सकते हैं. इस में दूध के प्रोटीन मौजूद रहते हैं, इसलिए दूध के प्रोटीन से एलर्जी वाले लोगों को इस से बचना पड़ सकता है.

इजरायल में बाजार तक पहुंच चुका है नया दूध

यह तकनीक अब केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है. रेमिल्क ने इजरायल की गैड डायरीज के साथ मिलकर ‘द न्यू मिल्क’ नाम से उत्पाद बाजार में उतारा है. कंपनी को अमेरिका में अपने दूध प्रोटीन के लिए एफडीए की ओर से ‘नो क्वैश्चंस लैटर’ मिल चुका है. सिंगापुर, इजरायल और कनाडा में भी कंपनी को अलगअलग स्तर पर नियामकीय मंजूरियां मिली हैं.
इस से पता चलता है कि गाय के बिना दूध प्रोटीन बनाने वाली तकनीक अब धीरेधीरे बाजार की ओर बढ़ रही है.
पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद होने का दावा दूध उत्पादन के लिए बड़ी संख्या में पशुओं को पालना पड़ता है. उन के लिए चारा, पानी और जमीन की जरूरत होती है. पशुपालन से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी होता है.

प्रिसिजन फर्मेंटेशन में दूध प्रोटीन बनाने के लिए गाय की जरूरत नहीं पड़ती. इस से जमीन, पानी और दूसरे संसाधनों की जरूरत कम हो सकती है.

रेमिल्क का दावा है कि उस की तकनीक पारंपरिक डेयरी की तुलना में करीब 1 प्रतिशत जमीन, 5 प्रतिशत पानी और लगभग 4 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का इस्तेमाल करती है. हालांकि इन आंकड़ों को कंपनी के अपने दावे के तौर पर देखना चाहिए. अलगअलग डेयरी फार्म और उत्पादन प्रणालियों में पर्यावरणीय प्रभाव अलग हो सकता है.

क्या यह सामान्य दूध से ज्यादा पौष्टिक है?

गाय के बिना तैयार होने का मतलब यह नहीं है कि यह सामान्य दूध से ज्यादा पौष्टिक है. रेमिल्क के अनुसार, उस के बनाए प्रोटीन गाय के दूध में पाए जाने वाले प्रोटीन के समान हैं. लेकिन तैयार उत्पाद में कैल्शियम, विटामिन, वसा और दूसरे पोषक तत्व कितनी मात्रा में होंगे, यह निर्माता द्वारा तैयार किए गए फार्मूले पर निर्भर करेगा.

नई तकनीक से तैयार उत्पादों में दूध के जरूरी प्रोटीन तो हो सकते हैं, लेकिन लैक्टोस नहीं होता. यही वजह है कि इस तकनीक को लैक्टोस इंटॉलरेंस वाले लोगों के लिए उपयोगी माना जा रहा है. लेकिन दूध के प्रोटीन से एलर्जी वाले लोगों के लिए स्थिति अलग है. उन्हें ऐसे उत्पादों का इस्तेमाल करने से पहले डाक्टर की सलाह लेना जरूरी हो सकता है.

भारत में क्या है इसका भविष्य?

भारत दुनिया के सब से बड़े दूध उत्पादक देशों में है. यहां करोड़ों किसान पशुपालन और दूध उत्पादन से जुड़े हैं. दूध ग्रामीण परिवारों की आमदनी का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है.
ऐसे में गाय के बिना दूध प्रोटीन बनाने वाली तकनीक भारत में आती है तो इस का असर केवल उपभोक्ताओं पर ही नहीं, बल्कि डेयरी उद्योग और किसानों पर भी पड़ सकता है.
अगर भविष्य में इस तकनीक से बने उत्पादों की लागत कम होती है, उन्हें भारत में जरूरी मंजूरी मिलती है और लोग इन्हें स्वीकार करते हैं, तो बाजार में इन की मांग बढ़ सकती है.

क्या पारंपरिक दूध की जगह ले लेगा नया दूध?

अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी. भारत में दूध सिर्फ एक खाद्य पदार्थ नहीं है, बल्कि यह लाखों किसानों की आजीविका से जुड़ा है, इसलिए पारंपरिक दूध का महत्व लंबे समय तक बना रहेगा. लेकिन आने वाले समय में डेयरी बाजार में एक नया विकल्प जरूर दिखाई दे सकता है. एक तरफ गायभैंस से मिलने वाला पारंपरिक दूध होगा और दूसरी तरफ प्रिसिजन फर्मेंटेशन से तैयार दूध होगा. Animal free Dairy Products

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