भारत में चीनी के दाम (Sugar Price) बढ़ने के बीच यूरोप से भी चीनी उत्पादन को ले कर चिंता बढ़ाने वाली खबर आई है. फ्रांस में लंबे सूखे और तेज गरमी से चीनी चुकंदर की फसल को बड़ा नुकसान हुआ है. फ्रांस की प्रमुख चीनी कंपनी टेरीओस के मुताबिक इस बार चुकंदर की पैदावार 20 फीसदी से ज्यादा घट सकती है. इस का असर यूरोप के कुल चीनी उत्पादन पर भी पड़ सकता है.
भारत में चीनी के दाम में तेजी
सब से पहले भारत की बात करें तो अगस्त में चीनी के दाम में तेजी देखने को मिली है. 20 जुलाई को देश में चीनी की औसत खुदरा कीमत करीब 48 रुपए किलो थी, जो 20 अगस्त को बढ़ कर करीब 56 रुपये किलो हो गई. अगस्त के आखिर में कीमत करीब 65 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गई.
सरकार ने उठाए कदम
बढ़ती कीमतों को देखते हुए सरकार ने घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए कदम उठाए हैं. सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क मुक्त आयात की अनुमति दी है. इस का उद्देश्य बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना और कीमतों पर नियंत्रण रखना है.
अब यूरोप से आई चिंता की खबर
भारत में चीनी की कीमतों में तेजी के बीच यूरोप में भी चीनी उत्पादन को ले कर चिंता बढ़ गई है. फ्रांस की प्रमुख चीनी उत्पादक कंपनी टेरीओस एससीए ने बताया है कि इस साल उस के किसानों के खेतों में चुकंदर की पैदावार पिछले साल के मुकाबले 20 फीसदी से ज्यादा कम हो सकती है. कंपनी के अनुसार कुछ इलाकों में फसल का नुकसान 50 से 60 फीसदी तक हो सकता है. ये अनुमान खेतों के नमूनों के आधार पर लगाए गए हैं.
जानकारी के अनुसार जून के मध्य तक यहां का मौसम चुकंदर की फसल के लिए अच्छा था. खेतों में फसल ठीक बढ़ रही थी और अच्छी पैदावार की उम्मीद थी. लेकिन इस के बाद हालात तेजी से बदल गए. कई इलाकों में लंबे समय तक बारिश नहीं हुई. मिट्टी में नमी कम हो गई और लगातार गरमी की लहर यानी हीटवेव चलती रही. इस से चुकंदर की बढ़वार रुक गई और फसल कमजोर हो गई.
कंपनी के ताजा नमूनों के मुताबिक इस समय चुकंदर की पैदावार पिछले साल से 20 फीसदी से ज्यादा कम है. यह पिछले 5 साल के औसत से भी करीब 15 फीसदी नीचे है. कई इलाकों में ज्यादा नुकसान फ्रांस के सभी इलाकों में फसल को एकजैसा नुकसान नहीं हुआ है.
कई इलाकों में बारिश की कमी और तेज गरमी के कारण चुकंदर के पौधों को पर्याप्त नमी नहीं मिल सकी. इस से उत्पादन में बड़ी गिरावट की आशंका है.
38 साल में सबसे कम हो सकता है यूरोप का चीनी उत्पादन
फ्रांस में चुकंदर की कमजोर फसल का असर यूरोप के चीनी उत्पादन पर भी पड़ सकता है. टेरीओस का अनुमान है कि 2026-27 सीजन में यूरोप का चीनी उत्पादन 1988-89 के बाद यानी करीब 38 साल में सबसे निचले स्तर पर पहुंच सकता है.
अगर यह अनुमान सही साबित होता है तो यूरोप के चीनी बाजार में आपूर्ति कम हो सकती है. इस का असर अंतर्राष्ट्रीय चीनी बाजार और कीमतों पर भी देखने को मिल सकता है.
चीनी मिलें देर से शुरू होंगी
कमजोर फसल को देखते हुए टेरीओस ने अपनी चीनी मिलों के संचालन में भी बदलाव करने का फैसला किया है कंपनी अपने 8 चीनी संयंत्रों को देर से शुरू करेगी. इस का मकसद यह है कि चुकंदर की कटाई सही समय पर हो और उपलब्ध फसल से ज्यादा से ज्यादा चीनी निकाली जा सके.
इस साल कंपनी का चीनी उत्पादन अभियान औसतन करीब 100 दिन चलने की उम्मीद है. पिछले साल यह अवधि करीब 130 दिन थी. कुछ मिलों को पूरी क्षमता से नहीं चलाया जाएगा. ऐसा इसलिए किया जाएगा ताकि उपलब्ध चुकंदर की गुणवत्ता के हिसाब से उसका बेहतर इस्तेमाल हो सके.
पल्प की भी बढ़ी जरूरत
चीनी बनाने के बाद चुकंदर से निकलने वाले पल्प का इस्तेमाल भी किया जाता है. टेरीओस ने कहा है कि इस साल पल्प की उपलब्धता कम है. इसलिए कंपनी इस की आपूर्ति पर भी विशेष ध्यान देगी, ताकि अपने सदस्यों की जरूरत पूरी की जा सके.
भारत पर कितना पड़ेगा असर
यूरोप में चीनी उत्पादन घटने की खबर से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में चीनी की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है. लेकिन इस का भारत की कीमतों पर सीधा असर तुरंत पड़ना जरूरी नहीं है.
भारत में चीनी के दाम मुख्य रूप से घरेलू उत्पादन, बाजार में उपलब्ध स्टौक, मांग, सरकारी नीतियों और आयातनिर्यात के फैसलों से तय होते हैं. फिलहाल सरकार का जोर घरेलू बाजार में पर्याप्त चीनी उपलब्ध कराने पर है. दूसरी तरफ यूरोप में मौसम की मार से चुकंदर की फसल कमजोर हुई है. ऐसे में आने वाले महीनों में दुनिया के चीनी बाजार पर मौसम और उत्पादन दोनों की नजर रहेगी. Sugar Price





