मध्य प्रदेश विधानसभा की कृषि विकास समिति के एक प्रतिनिधिमंडल ने विगत दिनों भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR-IARI), नई दिल्ली का दौरा किया. दौरे का उद्देश्य संस्थान में विकसित कृषि अनुसंधान, आधुनिक तकनीकों और टिकाऊ व जलवायु अनुकूल खेती को बढ़ावा देने की रणनीतियों की जानकारी हासिल करना था. इस दौरान मध्य प्रदेश की कृषि चुनौतियों और किसानों के लिए वैज्ञानिक तकनीकों के प्रभावी इस्तेमाल पर भी विस्तार से चर्चा हुई.
मध्य प्रदेश की जरूरतों के मुताबिक तकनीकों पर जोर
डा. श्रीनिवास राव ने टिकाऊ कृषि खाद्य प्रणाली को बढ़ावा देने के लिए संस्थान की उपलब्धियों और रणनीतियों की जानकारी दी. उन्होंने मध्य प्रदेश के सामने मौजूद प्रमुख कृषि मुद्दों और प्राथमिकताओं पर चर्चा करते हुए कहा कि आईसीएआर-आईएआरआई की तकनीक और विशेषज्ञता इन चुनौतियों से निबटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.
उन्होंने खासतौर पर अधिक उत्पादन देने वाली, जलवायु अनुकूल और पोषण से भरपूर बायोफोर्टिफाइड फसलों की किस्मों की जानकारी दी और मध्य प्रदेश के कृषि क्षेत्रों में इन के उपयोग की संभावनाओं पर प्रकाश डाला.
‘आत्मनिर्भर भारत’ के लिए पोषण सुरक्षा भी जरूरी
डा. श्रीनिवास राव ने कहा कि आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य केवल खाद्य सुरक्षा हासिल करने से पूरा नहीं होगा, बल्कि इस के लिए पोषण सुरक्षा पर भी बराबर ध्यान देना होगा. कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ ऐसी तकनीकों और फसल किस्मों को बढ़ावा देना जरूरी है, जो लोगों के पोषण स्तर को बेहतर बनाने में मदद करें.
उन्होंने मध्य प्रदेश में किसानों के लाभ के लिए आईसीएआर-आईएआरआई की ओर से चलाए जा रहे विभिन्न अभियानों और पहलों की भी जानकारी दी.
पराली प्रबंधन और कीटनाशकों के इस्तेमाल पर चर्चा
मध्य प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष एवं समिति के अध्यक्ष ठाकुर दास नागवंशी ने आईसीएआर-आईएआरआई द्वारा विकसित कृषि तकनीकों और नवाचारों की सराहना की. उन्होंने मध्य प्रदेश में फसल अवशेष प्रबंधन और कीटनाशकों के उचित इस्तेमाल को महत्वपूर्ण चुनौती बताया.
उन्होंने कहा कि समिति आईसीएआर-आईएआरआई द्वारा विकसित अनुसंधान और तकनीकी उपायों को समझना चाहती है, ताकि इनका उपयोग राज्य में किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए प्रभावी ढंग से किया जा सके.
25 दिन में पराली को खाद में बदलता है पूसा डीकंपोजर
वैज्ञानिकों ने प्रतिनिधिमंडल को पूसा डीकंपोजर के बारे में जानकारी दी. यह तकनीक फसल अवशेषों के प्राकृतिक अपघटन की प्रक्रिया को तेज करती है और खेत में मौजूद पराली को लगभग 20-25 दिनों में पोषक तत्वों से भरपूर जैविक खाद में बदलने में मदद करती है. इससे फसल अवशेषों को जलाने की समस्या को कम किया जा सकता है.
इस के अलावा विभिन्न राज्यों में फसल अवशेष जलाने की घटनाओं और उनके रुझानों की सैटेलाइट आधारित निगरानी के बारे में भी जानकारी दी गई. वैज्ञानिकों ने बताया कि इस तरह की निगरानी से पराली प्रबंधन के लिए प्रभावी नीतियां और उचित उपाय तैयार करने में मदद मिलती है.
उन्नत किस्मों से लेकर जल बचत तकनीक तक
आईसीएआर-आईएआरआई के वैज्ञानिकों ने प्रतिनिधिमंडल के सामने खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के लिए विकसित उन्नत फसल किस्मों, बागवानी फसलों की तकनीकों, पौध संरक्षण उपायों और जल उपयोग दक्षता बढ़ाने वाली तकनीकों का भी बताया.
संरक्षित खेती और एकीकृत कृषि प्रणाली का भी लिया जायजा
दौरे के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने आईसीएआर-आईएआरआई की विभिन्न शोध एवं प्रयोगशाला सुविधाओं का भी भ्रमण किया. प्रतिनिधिमंडल ने संरक्षण कृषि, एकीकृत कृषि प्रणाली, बायोमास यूनिट और सेंटर फौर प्रोटेक्टेड कल्टिवेशन टैक्नोलौजी से जुड़ी गतिविधियों को देखा. संबंधित वैज्ञानिकों ने प्रतिनिधिमंडल को इन क्षेत्रों में चल रहे अनुसंधान, तकनीकों और उन के व्यावहारिक उपयोग की जानकारी दी.
कृषि वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं के बीच बढ़ेगा संवाद
कार्यक्रम के समापन पर आईसीएआर-आईएआरआई के संयुक्त निदेशक (अनुसंधान) डा. सी. विश्वनाथन ने संबोधित किया. उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान और उस के किसानों तक प्रभावी हस्तांतरण के महत्व पर प्रकाश डाला.
आईसीएआर-आईएआरआई में विकसित जलवायु अनुकूल किस्मों, पराली प्रबंधन, पौध संरक्षण, जल बचत, बागबानी और पोषण आधारित कृषि तकनीकों का राज्य में प्रभावी उपयोग किसानों की उत्पादकता और आय बढ़ाने के साथसाथ टिकाऊ और पोषण संवेदनशील कृषि व्यवस्था विकसित करने में मददगार हो सकता है.





