Potato Seeds-
भारत के कुल आलू उत्पादन का 10 फीसदी हिस्सा पहाड़ी इलाकों में होता है. उत्तरपश्चिम के पहाड़ी इलाकों में आलू मुख्य नकदी फसल है. आलू की खेती करने से किसानों को लाभ के साथसाथ बिना जमीन वाले किसानों को रोजगार भी मिलता?है. ऊंची पहाडि़यों की जलवायु नमी वाली, आर्द्र और कम तापमान के कारण आलू की फसल पर एफिड या माहू और बैक्टीरिया से होने वाली बीमारियों का हमला नहीं होता है, अगर होता भी है तो बहुत ही कम मात्रा में. इसी कारण ऊंचे पहाड़ी इलाकों के स्वस्थ बीज से कर्नाटक, गुजरात, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल व पंजाब में आलू की फसल उगाई जाती है.
वैरायटी व बीज
उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों के लिए पछेता झुलसा को सहन कर सकने वाली आलू की किस्में कुफरी ज्योति, कुफरी गिरिराज, कुफरी शैलजा, कुफरी हिमालिनी, कुफरी हिमसोना अच्छी हैं.
अच्छी तरह से अंकुरित 40-50 ग्राम वजन वाले बीज कंद का इस्तेमाल करें, क्योंकि इन से बीज आकार के कंद ज्यादा पैदा होते हैं.
बीजाई का समय :
आमतौर पर पहाड़ी इलाकों में आलू की बीजाई अप्रैल महीने के दूसरे व तीसरे हफ्ते में करें. अगेती बीजाई से मिले कंदों में चिटकने की समस्या पाई जाती है.
उर्वरक व खाद :
बीजाई के समय प्रति हेक्टेयर 15-30 टन गोबर की खाद नालियों में डालें. 30 हेक्टेयर गोबर की खाद से आलू की फसल के लिए फास्फोरस व पोटेशियम की मात्रा की भरपाई हो जाती है. अगर खेत में 15 टन गोबर की खाद डाली गई है तो आलू की फसल के लिए पोटेशियम व फास्फोरस की आधी मात्रा खाद के साथ इस्तेमाल करें. गोबर की खाद का इस्तेमाल बर्फ गिरने के बाद खेत को तैयार करते समय करें.
मेंड़ों में प्रति हेक्टेयर 1.2 क्विंटल नाइट्रोजन, 4 क्विंटल कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट, एक क्विंटल फास्फोरस, 6.25 क्विंटल सिंगल सुपर फास्फेट व एक क्विंटल पोटाश का इस्तेमाल करें. नाइट्रोजन का इस्तेमाल पहली बार सौ किलोग्राम बीजाई के समय जबकि बाकी 20 किलोग्राम मिट्टी चढ़ाते समय करना ज्यादा लाभदायक होता है. बीजाई से पहले उर्वरकों को मिट्टी से ढक दें ताकि बीज व आलू का सीधा संपर्क उर्वरकों के साथ न हो सके.
बीजाई :
ढलानों के विपरीत 60×60 सेंटीमीटर की दूरी पर नालियां बनाएं. गोबर की खाद व उर्वरकों को नालियों में डाल कर 20-25 सेंटीमीटर की दूरी पर कृषि यंत्र ‘खिलने’ से बीज कंदों की बीजाई करें. बीजाई के बाद बीज कंदों को मिट्टी से 10-15 सेंटीमीटर मेंड़ बना कर ढक दें.
पलवार बिछाना :
बीजाई के बाद मेंड़ को चीड़ की पत्तियों, धान के पुआल या गेहूं की तूड़ी से ढक दें, ताकि मिट्टी में नमी बनी रहे और अंकुर जल्दी निकल सकें.
निराईगुड़ाई :
बीजाई के बाद मिट्टी
चढ़ाएं. बीजाई के 40-50 दिनों के अंदर निराईगुड़ाई व मिट्टी चढ़ाने के काम पूरा कर लें. ऐसा करने पर फसल बढ़ने की अंतिम अवस्था के दौरान फसल में ज्यादा छेड़छाड़ नहीं करनी पड़ेगी. मिट्टी चढ़ाते समय नाइट्रोजन की बाकी मात्रा का भी इस्तेमाल करें.
पौध सुरक्षा
कीट व सूत्रकृमि :
पहाड़ों में आलू की फसल को सफेद सूंड़ी नुकसान पहुंचाती है. लगातार कई सालों के शुष्क मौसम के कारण कटुआ कीट व पत्ती भक्षक कीट भी फसल को नुकसान पहुंचाते हैं.
अगर कीटनाशकों के इस्तेमाल के बाद भी कीटों का असर दिखाई दे तो कीटनाशकों का दोबारा इस्तेमाल करें.
बीमारी :
पहाड़ी इलाकों में बहुत सी फफूंद बीमारियां आलू की फसल को नुकसान पहुंचाती हैं. उन में से पिछेता झुलसा मुख्य है. फसल को नुकसान पहुंचाने वाले अन्य फफूंद सरकोस्पोरा ब्लाच, फोमा व अगेता झुलसा हैं. इन की रोकथाम के लिए मैंकोजेब 0.2 फीसदी का घोल या 5:5:50 बोर्डों मिश्रण का इस्तेमाल बरसात शुरू होते ही 8-10 दिनों के अंतर पर करें.
ध्यान रखें कि पत्तियों की निचली सतह फफूंदनाशक से पूरी तरह से भीग जाए. बरसात के दिनों में फफूंदनाशक घोल में चिपचिपा पदार्थ स्टिकर मिला दें ताकि दवा का असर ज्यादा देर तक बना रहे. अगर मैंकोजेब से पिछेता झुलसा की रोकथाम न हो तो रिडोमिल एमजेड-72 की ढाई किलोग्राम मात्रा इस्तेमाल करें.
कुमाऊं इलाके की पहाडि़यों में आलू की फसल को सब से ज्यादा नुकसान भूरा गलन बीमारी से होता है. यह बीमारी बीज व मिट्टी से पनपती है. इसलिए हमेशा केवल स्वस्थ व भूरा गलन से मुक्त बीज का इस्तेमाल करें. इस बीमारी को मक्का, गेहूं, कूटू, प्याज, लहसुन, बंदगोभी, फूलगोभी व लूपिन का फसल चक्र अपनाने से कम किया जा सकता है. भूरा गलन वाली मिट्टी में 3-5 साला फसल चक्र अपनाना चाहिए.
तना व डंठल काटना :
अगस्त महीने के दूसरे या तीसरे हफ्ते में जब फसल पकनी शुरू हो जाए तो फसल के डंठल काट दें. डंठल काटना जरूरी है ताकि माहू द्वारा फसल को नुकसान न हो सके. डंठलों को काटने के बाद बच गए ठूंठों की बढ़वार न होने पाए, क्योंकि कोमल व सरस पत्तियों पर माहू ज्यादा आते हैं. इसलिए काटे हुए डंठलों को गड्ढों में दबा दें. तना या डंठल खत्म करने के लिए एक हजार लीटर पानी में 2 लीटर ग्रमेक्सोन पैराक्वेट डाइक्लोराइड घोल कर धूप वाले दिन फसल पर छिड़कें.
फसल खुदाई :
डंठल काटने के 15 दिनों के बाद आलू का छिलका सख्त होने पर फसल की खुदाई करें. उपज को 3 हिस्सों बड़े (75 ग्राम से ज्यादा), मध्यम (35 से 75 ग्राम) और छोटे (35 ग्राम से कम) के हिसाब से छांट लें.
बीज उपचार :
जो बीज खुद इस्तेमाल करना है, उसे महफूज रखने के लिए बोरिक एसिड से उपचारित करें. छंटाई के बाद कंदों को पानी में धोएं. धुले बीज को एक फीसदी क्लोरोसिन घोल में डुबोएं. बाद में इन्हें खंगाल कर बोरिक एसिड के 3 फीसदी के घोल में 30 मिनट तक डुबो कर उपचारित करें. अगर आलू अच्छी तरह से धुले हों तो इस घोल का 20 बार इस्तेमाल किया जा सकता है. उपचारित आलुओं को सही ढंग से सुखाएं.
उपचारित बीजों को 75×45×15 सेंटीमीटर लंबी, चौड़ी व ऊंची प्लास्टिक ट्रे में या टोकरियों में या हवादार खुले कमरे में फैला कर रखें. बीजाई के 15 दिन पहले इन कंदों को रोशनी में रखें. यह ध्यान रखें कि भंडारण के दौरान फरवरीमार्च में बीज कंदों पर सर्दी के कारण बर्फ जमाव न होने पाए. इसलिए समयसमय पर आलुओं को पलटते रहें, हफ्ते में एक बार इन्हें फर्श पर फैलाएं ताकि आलुओं में हरापन एकसमान हो सके. Potato Seeds





