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लंपी रोग ने देशभर में पशुपालकों को काफी नुकसान पहुंचाया है. इस बीमारी का असर सभी गायों पर एक जैसा नहीं होता. कुछ पशु जल्दी ठीक हो जाते हैं, जबकि कुछ में बीमारी गंभीर हो जाती है. अब वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि ऐसा क्यों होता है.
करनाल स्थित राष्ट्रीय पशु आनुवांशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीएजीआर) के वैज्ञानिकों ने देसी गायों के DNA में कुछ ऐसे आनुवंशिक संकेत खोजे हैं, जिनका संबंध लंपी के असर से हो सकता है.
आखिर DNA में क्या खोजा गया?
सरल भाषा में समझें तो वैज्ञानिकों ने यह पता लगाने की कोशिश की कि जिन गायों पर लंपी का असर कम हुआ और जो जल्दी ठीक हुईं, उनके DNA में कौन-से खास लक्षण मौजूद थे. इसके लिए संक्रमित और स्वस्थ पशुओं के आनुवंशिक गुणों की तुलना की गई.
इस अध्ययन में गिर, साहीवाल और थारपारकर जैसी देसी नस्लों के पशुओं को भी शामिल किया गया.
इससे किसानों को क्या फायदा होगा?
अभी इसका सीधा फायदा पशुपालकों को नहीं मिलने जा रहा है. लेकिन आने वाले समय में पशुपालकों को इसका लाभ मिलना तय है.
मिलेगा लाभ:
आने वाले समय में आनुवंशिक संकेतों की भूमिका सही साबित होती है, तो वैज्ञानिक और पशुपालक ऐसे पशुओं की पहचान कर सकेंगे जिनमें लंपी से लड़ने की प्राकृतिक क्षमता बेहतर हो सकती है.
इसके बाद ऐसे पशुओं को प्रजनन कार्यक्रमों में शामिल कर उनकी अगली पीढ़ी तैयार करने की कोशिश की जाएगी. लंबे समय में इससे लंपी के कारण होने वाली बीमारी, दूध में कमी और पशुपालकों के आर्थिक नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है.
साहीवाल में मिले 160 संभावित संकेत:
साहीवाल गायों पर किए गए एक अलग अध्ययन में भी लंपी रोग के असर से जुड़े 160 संभावित आनुवंशिक संकेत मिले हैं. हालांकि, अभी यह पक्का नहीं कहा जा सकता कि ये सभी संकेत सीधे तौर पर लंपी से बचाव के लिए जिम्मेदार हैं. इनकी भूमिका की पुष्टि के लिए आगे और शोध की जरूरत है.
अभी क्या समझना जरूरी है?
वैज्ञानिकों ने लंपी से पूरी तरह बचाने वाला कोई DNA या जीन नहीं खोजा है. अभी केवल ऐसे आनुवंशिक संकेत मिले हैं, जिनका बीमारी के असर से संबंध हो सकता है. आगे के शोध से ही यह साफ होगा कि इनका इस्तेमाल लंपी से बेहतर मुकाबला करने वाले पशुओं के चयन में कितना उपयोगी होगा.
लंपी रोग कितना खतरनाक ?
लंपी बीमारी पशुओं के लिए गंभीर और नुकसानदायक हो सकती है, खासकर जब समय पर इलाज और देखभाल न मिले. इससे पशु को तेज बुखार, शरीर पर दर्दनाक गांठें, कमजोरी और दूध उत्पादन में भारी कमी हो सकती है. गंभीर मामलों में घावों में संक्रमण, लंबे समय तक कमजोरी और कभी-कभी पशु की मौत भी हो सकती है. बीमारी तेजी से फैलने के कारण एक संक्रमित पशु से दूसरे पशु तक संक्रमण पहुंचने का खतरा रहता है. हालांकि, हर संक्रमित पशु की मौत नहीं होती और सही देखभाल, उपचार तथा रोकथाम से अधिकांश पशु ठीक हो सकते हैं. Indian Cow





