Mentha Farming-

भारत में मेंथा की 5 प्रजातियां मेंथाल मिंट, पिपर मिंट, बरगामाट मिंट, गार्डेन मिंट और स्पियरमिंट की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. एक जानकारी के मुताबिक पूरी दुनिया का करीब 73 फीसदी मेंथा उत्पादन भारत में किया जाता है, जिस में सब से ज्यादा हिस्सेदारी उत्तर प्रदेश की है.

मेंथा प्रजातियों के हरे साग से जल आसवन विधि द्वारा खुशबूदार तेल निकाला जाता है, जिस में करीब 70 से 80 फीसदी मेंथाल पाया जाता है. आइए जानें मेंथा की खेती के बारे में.

कैसी होनी चाहिए मिट्टी : मेंथा की खेती के लिए अच्छी जल निकास वाली बलुई दोमट मिट्टी जिस का पीएच मान 6 से 7.5  हो अच्छी होती है.

उन्नत प्रजातियां : समय और देर से रोपाई के लिए कोशी एक अच्छी प्रजाति है. इस के अलावा हिमालयन, कुशल, सक्षम समेत अन्य प्रजातियां भी हैं. बेहतर होगा कि रोपाई करने से पहले अपने क्षेत्र की माकूल प्रजाति के बारे में नजदीकी विशेषज्ञ से जरूर जानकारी हासिल कर लें.

रोपाई का समय और विधि : जब नर्सरी 7 से 8 सेंटीमीटर की हो जाए तो फरवरी से मार्च महीने में तैयार खेत में रोपाई इस तरह करें कि पौधे से पौधे की दूरी 15 सेंटीमीटर और लाइन से लाइन की दूरी 50 से 60 सेंटीमीटर हो. रोपाई के ठीक बाद हलकी सिंचाई जरूर कर देनी चाहिए.

खेत की तैयारी: इस के लिए 2 से 3 बार मिट्टी पलटने वाले कल्टीवेटर से जुताई कर के मिट्टी भुरभुरी और समतल बना लेनी चाहिए.

खाद व उर्वरक : रोपाई से 4 से 6 हफ्ते पहले 10-15 टन खूब सड़ी हुई गोबर की खाद अच्छी तरह खेत में प्रति हेक्टेयर मिलाएं. रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल मिट्टी जांच के बाद मिली जानकारी के हिसाब से करें. अच्छी उपज के लिए 150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस, 40 किलोग्राम पोटाश और 20 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर इस्तेमाल करना चाहिए. यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि नाइट्रोजन को कुल 3 बार में देना है. पहली बार खेत की तैयारी के समय, दूसरी बार 35 से 40 दिनों पर और तीसरी बार 50 से 60 दिनों बाद.

सिंचाई : मेंथा में सिंचाई का खास खयाल रखना चाहिए, क्योंकि अगर दीमक लगी जमीन है तो सिंचाई के अभाव में दीमक सक्रिय हो जाती है, दूसरी बात नमी कम होने की दशा में फसल ढंग से बढ़ नहीं पाती है, जबकि ज्यादा पानी की दश में तेल का फीसदी घट जाता है.

पहली सिंचाई रोपाई के तुरंत बाद जरूर करनी चाहिए. उस के बाद 15 से 20 दिनों बाद या जरूरत के मुताबिक सिंचाई करते रहना चाहिए. हर कटाई के बाद सिंचाई जरूर करनी चाहिए, मगर कटाई करने के 10 से 15 दिन पहले सिंचाई बंद कर देनी चाहिए. ऐसा करने से तेल का फीसदी नहीं घटता है.

खास कीट : मेंथा में लगने वाले कीटों में दीमक और बालदार सूंड़ी ही खास हैं.

दीमक : बलुई मिट्टी में दीमक मेंथा की जड़ों को कुतर देती है, जिस से पौधा सूखने लगता है. इस की रोकथाम के लिए कार्बोफ्यूरान ग्रेन्यूल 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से रोपाई के समय इस्तेमाल करनी चाहिए. यदि खड़ी फसल में दीमक का हमला दिखाई पड़े तो क्लोरोपायरीफास 4 से 5 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से सिंचाई के पानी के साथ इस्तेमाल करनी चाहिए.

बालदार सूंड़ी : ये सूंडि़यां फसल की पत्तियों को खाने लगती हैं, जिस से फसल में तेल की मात्रा कम हो जाती है. रोकथाम के लिए विशेषज्ञ से सलाह ले कर किसी अच्छे असरकारक कीटनाशी का छिड़काव करना चाहिए.

खास रोग : इस में लगने वाले खास रोग निम्न हैं:

जड़ गलन: इस बीमारी के प्रकोप से पौधों की जड़ें काली पड़ जाती हैं व जड़ों पर गुलाबी रंग के धब्बे दिखाई देते हैं. रोपाई से पहले सकर्स को 2 ग्राम कार्बेंडाजिम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर 15 से 20 मिनट तक डुबो कर रखें. उस के बाद छाया में 15 से 20 मिनट तक सुखाने के बाद रोपाई करें.

पर्णदाग : इस रोग में पत्तियों के ऊपर गहरे भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं, नतीजतन बाद में पत्तियां पीली पड़ कर गिर जाती हैं, जिस से पैदावार पर बुरा असर पड़ता है. इस रोग की रोकथाम के लिए मैंकोजेब 75 फीसदी घुलनशील की 2 किलोग्राम मात्रा 600 से 800 लीटर पानी में  घोल कर छिड़काव करना चाहिए.

कटाई: पहली कटाई रोपाई के 100 से 150 दिनों के बाद करनी चाहिए. दूसरी कटाई पहली कटाई के 60 से 70 दिनों के बाद करनी चाहिए. कटाई करते समय आसामान साफ और चमकती धूप हो तो बेहतर होगा. कटाई के बाद फसल को 2 से 3 घंटे तक खुली धूप में छोड़ दें. इस के बाद फसल को छाया में हलका सुखा कर जल्दी से आसवन विधि द्वारा तेल निकालें.

आसवन : हाईड्रोडिस्टीलेशन विधि द्वारा आसवन किया जाता है. मेंथाल मिंट के शाक से वाष्प आसवन या जल आसवन से तेल हासिल होता है. आसवन पूरा होने में 3 से 4 घंटे का समय लग सकता है.

उपज : मोटे अनुमान के अनुसार 1 हेक्टेयर खेत की फसल से 2 कटाई में करीब 200 से 250 लीटर तेल आसानी से हासिल हो जाता है. Mentha Farming

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