झाड़ू घास एक ऐसी नकदी फसल है (Cash Crop), जो आज किसानों के लिए आय का नया साधन बनती जा रही है. विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह खेती काफी उपयोगी साबित हो सकती है, क्योंकि इसे बंजर, परती और कम उपजाऊ भूमि में भी आसानी से उगाया जा सकता है.

हमारे दैनिक जीवन में झाड़ू का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है. घर, दुकान, विद्यालय, अस्पताल, कार्यालय या होटल हर जगह सफाई के लिए झाड़ू की आवश्यकता होती है. पहले के समय में लोग खजूर, ताड़, या फसलों के सूखे डंठलों से बनी झाड़ू का उपयोग करते थे. उस समय अधिकांश घर मिट्टी, फूस और खपरैल के होते थे और उन के फर्श भी मिट्टी के बने होते थे.

गांवों में महिलाएं गोबर और मिट्टी से घर लीपती थीं, जिस से स्वच्छता के साथसाथ एक विशेष सुगंध भी वातावरण में फैलती थी. लेकिन जैसेजैसे समय बदला, पक्के मकानों, टाइल्स और मार्बल के फर्श का उपयोग बढ़ गया. आधुनिक घरों में पुराने प्रकार की झाड़ू उतनी उपयोगी नहीं रही, क्योंकि वे टाइल्स और संगमरमर की सफाई ठीक से नहीं कर पाती थीं. ऐसे में मुलायम और हलके फूल झाड़ू की मांग तेजी से बढ़ी. आज लगभग हर घर में जिस फूल झाड़ू का उपयोग होता है, वह झाड़ू घास से तैयार किया जाता है.

झाड़ू घास को टाइगर घास, ब्रूम ग्रास और फूल झाड़ू घास जैसे नामों से जाना जाता है. इस का वैज्ञानिक नाम थिसैनोलेना मैक्सिमा है. यह एक बारहमासी घास है यानी इसे एक बार लगाने के बाद कई वर्षों तक उत्पादन लिया जा सकता है. इस की लंबी और मुलायम बालियां झाड़ू बनाने के लिए सब से उपयुक्त मानी जाती हैं.

भारत में इस की खेती मुख्य रूप से पूर्वोत्तर राज्यों जैसे असम, मेघालय, त्रिपुरा और सिक्किम में होती है. असम का कार्बी आंगलोंग जिला पूरे भारत में झाड़ू घास उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है. यहां हजारों किसान इस फसल की खेती कर के अपनी आय बढ़ा रहे हैं.

झाड़ू घास की लोकप्रियता का सब से बड़ा कारण इस की कम लागत और अधिक लाभ है. यह ऐसी फसल है जिसे कम उपजाऊ भूमि, पहाड़ी ढलानों, बंजर क्षेत्रों और परती खेतों में भी आसानी से उगाया जा सकता है. जिन खेतों में दूसरी फसलें अच्छी तरह नहीं उग पातीं, वहां भी झाड़ू घास सफलतापूर्वक उत्पादन देती है.

इस के लिए अधिक सिंचाई, रासायनिक खाद या कीटनाशकों की जरूरत नहीं होती. यही कारण है कि छोटे किसान भी इस की खेती आसानी से कर सकते हैं.

उन्नत किस्में

भारत में झाड़ू बनाने के लिए मुख्य रूप से थिसानोलेना मैक्सिमा प्रजाति की खेती की जाती है, वहीं दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में झाड़ू घास की अन्य प्रजातियां भी पाई जाती हैं. कुछ सब से आम किस्मों में शामिल हैं :

एंड्रोपोगोन वर्जिनिकस : यह प्रजाति उत्तरी और मध्य अमेरिका की मूल निवासी है और कुछ क्षेत्रों में इस का उपयोग झाड़ू बनाने के लिए किया जाता है.

एंड्रोपोगोन गेरार्डी : इसे भारतीय घास के नाम से भी जाना जाता है. यह प्रजाति उत्तरी अमेरिका की मूल निवासी है और इस का उपयोग झाड़ू बनाने और चारे के लिए किया जाता है.

सोरघम हेलेपेंस : यह प्रजाति, जिसे आमतौर पर जौनसन घास के नाम से जाना जाता है, एक बारहमासी घास है जिस का उपयोग कुछ क्षेत्रों में झाड़ू बनाने के लिए किया जा सकता है.

झाड़ू घास की प्रत्येक प्रजाति की अपनी अनूठी विशेषताएं होती हैं, जैसे रेशे की लंबाई, मजबूती व रंग. हालांकि थिसानोलेना मैक्सिमा को आमतौर पर इस की बेहतर विशेषताओं के कारण झाड़ू बनाने के लिए सब से उपयुक्त माना जाता है.

मौसम और जलवायु

झाड़ू घास गरम और नम जलवायु में अच्छी तरह बढ़ती है. इस के लिए 20 से 30 डिगरी सैल्सियस तापमान सब से उपयुक्त माना जाता है. जहां मध्यम से अधिक वर्षा होती है वहां इस की वृद्धि तेजी से होती है. हालांकि यह कम पानी वाली परिस्थितियों में भी जीवित रह सकती है.

मिट्टी और खेत की तैयारी

यह रेतीली दोमट, दोमट और हलकी चिकनी मिट्टी में अच्छी तरह उगती है. पथरीली और ढलान वाली भूमि में भी इस की खेती की जा सकती है. केवल एक बात का ध्यान रखना जरूरी है कि खेत में पानी जमा न हो, क्योंकि जलभराव होने पर पौधों की जड़ें सड़ सकती हैं.

खेती शुरू करने से पहले खेत की अच्छी तैयारी करना आवश्यक होता है. खेत की 2-3 बार जुताई कर के मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए. यदि खेत में गोबर की सड़ी खाद या कंपोस्ट खाद डाल दी जाए तो पौधों की बढ़वार बेहतर होती है.

बोआई का तरीका

इस की गांठों को अलग कर के अप्रैलमई में रोपना सब से अच्छा होता है. पुराने पौधों की जड़ों के पास बनी गांठों को अलग कर के सीधे खेत में लगाया जाता है. यह तरीका अधिक लोकप्रिय है, क्योंकि इस से पौधे जल्दी तैयार होते हैं और उत्पादन भी अच्छा मिलता है, जबकि बीज द्वारा नर्सरी तैयार करने के लिए 10 ग्राम बीज प्रति 2 मीटर गुना 1 मीटर की क्यारी में डाल कर नर्सरी तैयार की जाती है. नर्सरी में बीज डालने के बाद 4-6 सप्ताह बाद पौधे रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं. नर्सरी में तैयार पौधों को आमतौर पर 2 मीटर गुना 2 मीटर या 2.5 मीटर की दूरी पर लगाया जाता है.

रोपाई का समय

झाड़ू घास की रोपाई के लिए अप्रैल और मई का महीना सब से उपयुक्त माना जाता है. इस समय रोपाई करने पर मानसून की बारिश का लाभ मिलता है और पौधों की बढ़वार तेजी से होती है. पौधों को सामान्यत: 2 से ढाई मीटर की दूरी पर लगाया जाता है, ताकि उन्हें पर्याप्त जगह मिल सके. पर्याप्त दूरी रखने से पौधों में अधिक शाखाएं और लंबी बालियां विकसित होती हैं.

खाद, उर्वरक और सिंचाई

यह फसल जैविक खेती के लिए भी बहुत उपयुक्त मानी जाती है. इस में रासायनिक खाद और दवाओं का उपयोग बहुत कम करना पड़ता है. गोबर की खाद, वर्मी कंपोस्ट और जैविक खाद इस के लिए पर्याप्त होती हैं.

जैविक कचरे से बनी खाद का उपयोग करने से मिट्टी पोषक तत्त्वों से समृद्ध होती है, मिट्टी की संरचना में सुधार होता है और जल धारण क्षमता बढ़ती है.

झाड़ू घास की पंक्तियों के बीच फलीदार फसलों जैसी आवरण फसलों को लगाने से नाइट्रोजन स्थिरीकरण द्वारा मिट्टी की उर्वरता में सुधार करने में मदद मिल सकती है.

हानिकारक रसायनों पर निर्भरता कम करते हुए, कीटों को नियंत्रित करने के लिए प्राकृतिक शिकारी जीवों, लाभकारी कीटों और जैविक कीटनाशकों का उपयोग किया जा सकता है. पत्तियों या पुआल जैसी जैविक सामग्री से मल्चिंग करने से मिट्टी की नमी बनाए रखने, खरपतवारों से बचाव करने और मिट्टी के तापमान को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है.

सब्जी की फसलों के साथ झाड़ू घास की फसलें बारीबारी से उगाने से फसलचक्र में विविधता लाने और कीटों और बीमारियों के पनपने के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है. झाड़ू घास की दलहन या बाजरा के साथ अंतर्फसल खेती करने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ सकती है और अतिरिक्त आय प्राप्त हो सकती है.

जैविक खेती पद्धतियों को अपना कर, पूर्वोत्तर भारत के किसान उच्च गुणवत्ता वाली जैविक झाड़ू घास का उत्पादन कर सकते हैं और साथ ही अधिक टिकाऊ और लचीली कृषि प्रणाली में योगदान दे सकते हैं.

खेत में समयसमय पर निराईगुड़ाई करने से खरपतवार नियंत्रित रहते हैं और पौधों की बढ़वार अच्छी होती है. शुरुआती दिनों में हलकी सिंचाई की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन बाद में पौधे वर्षा के पानी पर भी अच्छी तरह विकसित हो जाते हैं.

कीट और रोग नियंत्रण

खराब जल निकासी और अत्यधिक नमी के कारण जड़ सड़न हो सकती है, जो एक कवक रोग है और झाड़ू घास के पौधों को नुकसान पहुंचा सकता है. लीफ ब्लाइट एक और फफूंद रोग है जो ब्रूम ग्रास की पत्तियों को प्रभावित कर सकता है, जिस से प्रकाश संश्लेषण और पौधे का स्वास्थ्य कम हो जाता है.

हालांकि झाड़ू घास आमतौर पर अन्य फसलों की तुलना में कीटों के प्रति कम संवेदनशील होती है, फिर भी यह एफिड्स या वीविल्स जैसे कीड़ों से प्रभावित हो सकती है.

किसानों को हानिकारक रसायनों के उपयोग को कम करने और पर्यावरण की रक्षा करने के लिए जैविक कीट नियंत्रण विधियों को अपनाना चाहिए.

उपज और लाभ

झाड़ू घास की फसल लगभग 9 से 12 महीनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है. जब इस की बालियां लगभग एक से डेढ़ मीटर लंबी हो जाएं और पूरी तरह विकसित दिखने लगें, तब उन्हें काट लिया जाता है.

कटाई के बाद बालियों को 15 से 20 दिनों तक धूप में सुखाया जाता है, ताकि उन में नमी न रहे. अच्छी तरह सूखने के बाद इन्हें बांध कर बाजार में बेचने के लिए तैयार किया जाता है. सही तरीके से भंडारण करने पर यह लंबे समय तक सुरक्षित रहती है.

झाड़ू घास की कटाई आमतौर पर साल में 2 बार की जाती है, एक बार जनवरी में और फिर जून में. झाड़ू घास को परिपक्व होने में लगभग 9 से 12 महीने लगते हैं. यदि खेती सही ढंग से की जाए तो प्रति एकड़ 3 से 5 टन तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है.

बाजार में झाड़ू घास की कीमत गुणवत्ता और मांग के अनुसार अलगअलग होती है. भारत में एक एकड़ झाड़ू घास की खेती शुरू करने के लिए प्रारंभिक निवेश आमतौर पर 10,000 से 20,000 रुपए तक होता है. इस में भूमि तैयार करने, पौधों, उर्वरकों और श्रम की लागत शामिल होती है. कई क्षेत्रों में किसानों को 20 रुपए से ले कर 90 रुपए प्रति किलो तक मूल्य प्राप्त हो जाता है. पूर्वोत्तर भारत के अनेक किसान प्रति एकड़ 60 हजार से 90 हजार रुपए तक का वार्षिक लाभ कमा रहे हैं. यदि किसान स्वयं झाड़ू बना कर बेचें तो उन्हें और अधिक लाभ मिल सकता है. यही कारण है कि झाड़ू घास की खेती धीरेधीरे देश के अन्य हिस्सों में भी लोकप्रिय हो रही है.

बाजार की जानकारी और भंडारण सुविधाओं की कमी के कारण छोटे किसानों को उचित मूल्य नहीं मिल पाता. कई क्षेत्रों में परिवहन और विपणन की सुविधाएं भी कमजोर हैं, इसलिए किसानों को चाहिए कि वे समूह बना कर खेती करें, सहकारी समितियों से जुड़ें और सीधे व्यापारियों व बाजारों से संपर्क बढ़ाएं.

आज जब खेती में लागत बढ़ रही है और पारंपरिक फसलों से किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल रहा है, तब झाड़ू घास जैसी फसलें किसानों के लिए नई उम्मीद बन कर सामने आ रही हैं. कम लागत, कम जोखिम, बंजर भूमि में उत्पादन, पर्यावरण संरक्षण और बाजार में लगातार मांग होने के कारण यह खेती भविष्य में और अधिक लोकप्रिय हो सकती है.

यदि सरकार, कृषि विभाग और स्वयंसेवी संस्थाएं किसानों को प्रशिक्षण, अच्छी पौध, बाजार और भंडारण की सुविधा उपलब्ध कराएं तो झाड़ू घास ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है. यह केवल एक फसल नहीं, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने, रोजगार सृजन और पर्यावरण संरक्षण का मजबूत माध्यम बन सकती है.

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