Successful Farmer-
उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से में स्थित बस्ती जनपद धान, गेहूं और गन्ने की खेती के लिए अपनी विशिष्ट पहचान रखता है, लेकिन इस जिले की एक और खास पहचान है यहां उगाई जाने वाली आम की उत्कृष्ट और दुर्लभ किस्में. बस्ती न केवल पारंपरिक आम उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि आधुनिक फलोत्पादन और वैज्ञानिक बागबानी के क्षेत्र में भी तेजी से अपनी अलग पहचान बना रहा है.
इसी उद्देश्य से इजराइल सरकार के सहयोग से यहां इंडोइजराइल सैंटर औफ एक्सीलैंस फोर मैंगो की स्थापना की गई है, जहां आम की नवीनतम, उन्नत एवं सघन (हाई डैंसिटी) बागबानी के लिए गुणवत्तापूर्ण पौध तैयार की जाती हैं.
इसी बागबानी परंपरा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले युवा किसानों में बस्ती जनपद के बनकटी विकास खंड स्थित अमरडोभा गांव निवासी अवनीश कुमार सिंह का नाम आज विशेष रूप से लिया जा रहा है. उन्होंने लगभग 21 बीघा क्षेत्रफल में विकसित अपने आम के बाग में देशविदेश की लगभग 75 दुर्लभ, उन्नत और चर्चित किस्मों के करीब 400 पौधे रोपित किए हैं. उन का यह बाग आज केवल उत्पादन का केंद्र नहीं, बल्कि कृषि नवाचार, जैवविविधता संरक्षण और आधुनिक फलोत्पादन का जीवंत उदाहरण बन चुका है.
पिता के मार्गदर्शन
अवनीश कुमार सिंह बताते हैं कि अपने पिता रमेश सिंह ‘बब्बू’ के मार्गदर्शन में उन्होंने वर्ष 2022 में बंजर पड़ी जमीन को विकसित कर आम का बाग लगाने का निर्णय लिया. इस के लिए सब से पहले मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया गया. उन्होंने लगातार हरी खाद के रूप में ढैंचा की बोआई कराई तथा गोबर और अन्य देशी जैविक खादों का भरपूर उपयोग किया. जब भूमि पूरी तरह तैयार हो गई, तब भारत के विभिन्न राज्यों में उगाई जाने वाली दुर्लभ श्रेणी की आम की किस्मों के पौधे एकत्रित कर अपने खेत में लगाए.
रंगीन आमों की भरमार
उन की बगिया में ऐसी अनेक किस्में भी हैं, जिन के फल आकर्षक सुर्ख लाल, नारंगी अथवा मिश्रित रंगों के होते हैं. ये किस्में अपनी सुंदरता के साथसाथ स्वाद और पौष्टिकता के कारण भी लोगों को विशेष रूप से आकर्षित कर रही हैं. इन में प्रमुख रूप से पूसा लालिमा, पूसा श्रेष्ठ, पूसा प्रतिभा सहित अनेक उन्नत किस्में शामिल हैं, जो आज बाग में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति का ध्यान अपनी ओर खींच लेती हैं.
लोगों के लिए कई किस्में
आमतौर पर डायबिटीज से पीडि़त लोग आम खाने से परहेज करते हैं, लेकिन बाग में ऐसी कई किस्में मौजूद हैं, जिन्हें अपेक्षाकृत कम मिठास, संतुलित स्वाद तथा बेहतर पोषण गुणों के कारण विशेष महत्व दिया जाता है.
अवनीश कुमार सिंह बताते हैं कि उन की बगिया में पूसा अरुणिमा, पूसा पीतांबर, सेंसेशन, टौमी एटकिंस सहित 2 दर्जन से अधिक ऐसी किस्मों में इस वर्ष अच्छी फलत हुई है. ये किस्में अपने विशिष्ट स्वाद, आकर्षक रंग, बेहतर गुणवत्ता तथा संतुलित मिठास के कारण लोगों को खूब पसंद आ रही हैं.
फुटबौल से भी भारी आम
अवनीश कुमार सिंह की बगिया में केवल रंगबिरंगे और विदेशी आम ही लोगों को आकर्षित नहीं करते, बल्कि यहां कुछ ऐसी दुर्लभ किस्में भी हैं जिन के फलों का आकार और वजन हर किसी को आश्चर्यचकित कर देता है. पकने तक इन का वजन अगस्त माह में लगभग 5 किलोग्राम तक पहुंच जाता है. उन के बाग में ब्रुनई किंग, फोर केजी, किंग औफ चकापात, गजराज और हुस्नआरा जैसी किस्मों में इस प्रकार के विशाल फल लगे हैं. आकार, वजन और आकर्षक स्वरूप के कारण ये आम उनकी बगिया की सब से अधिक चर्चित पहचान बन चुके हैं.
सब से महंगा आम
अवनीश कुमार सिंह की बगिया में दुनिया की सब से चर्चित और महंगी आम की किस्मों में शामिल मियाजाकी ने भी इस वर्ष शानदार फलत दी है. यह दुर्लभ किस्म मूल रूप से जापान के मियाजाकी क्षेत्र में विकसित की गई है और अपने गहरे लाल रंग, आकर्षक अंडाकार आकार तथा उत्कृष्ट स्वाद के कारण पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है. जापान में इसे ‘टायो नो तमागो’ (सूरज का अंडा) के नाम से भी जाना जाता है.
अवनीश कुमार सिंह बताते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इस आम की कीमत भारतीय मुद्रा के अनुसार लगभग ढाई लाख रुपए प्रति किलोग्राम तक पहुंच जाती है. यही कारण है कि इसे दुनिया के सब से महंगे फलों में गिना जाता है.
जहां सामान्य आम पकने पर पीले अथवा हरे दिखाई देते हैं, वहीं मियाजाकी पूरी तरह पकने पर गहरे लाल अथवा बैगनीलाल रंग का हो जाता है. इस का गूदा पूरी तरह रेशारहित, अत्यंत मुलायम, रसदार और मलाईदार होता है. एक मियाजाकी आम का औसत वजन लगभग 350 से 500 ग्राम तक होता है.
राज्यपाल भी कर चुकी हैं सराहना
उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने बस्ती भ्रमण के दौरान उन के बाग का अवलोकन किया और बाग में लगाए गए विभिन्न किस्मों के पौधों, उन की वैज्ञानिक तरीके से की जा रही देखभाल तथा बागबानी के प्रति अवनीश की लगन की सराहना करते हुए उन्हें आगे भी इसी प्रकार कार्य करते रहने के लिए प्रोत्साहित किया. बाद में उन्होंने अवनीश कुमार सिंह को लखनऊ स्थित राजभवन में भोजन पर भी आमंत्रित किया. इस अवसर पर अवनीश ने उन्हें अपने बाग में तैयार विभिन्न दुर्लभ किस्मों के आम भेंट किए. किसी युवा किसान के लिए यह सम्मान उन के कार्य की गुणवत्ता और समाज में उस की स्वीकार्यता का महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाता है.
कई लोगों को मिली सीख
अवनीश कुमारसिंह बताते हैं कि उन की बागबानी से प्रेरणा ले कर क्षेत्र के अनेक किसानों ने अपनी खाली अथवा बंजर पड़ी जमीन पर आम के बाग लगाने शुरू कर दिए हैं.
पूर्व ब्लौक प्रमुख रमेश सिंह बताते हैं कि वर्ष 2022 में उन्होंने आम के पौध रोपित कर अपने बेटे अवनीश को उन की देखभाल की जिम्मेदारी सौंपी थी. आज उन्हीं पौधों ने एक विशाल और प्रेरणादायी बाग का रूप ले लिया है. इस बागबानी से अच्छी आमदनी तो हो ही रही है, साथ ही पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान मिल रहा है.
एक पेड़ से इतना मुनाफा
वे बताते हैं कि उन के बाग में कई ऐसी दुर्लभ और प्रीमियम किस्में हैं, जिन की बाजार में अलग पहचान है. कुछ विशेष किस्मों के आम 500 से 1000 रुपए प्रति फल तक बिक जाते हैं, जबकि रंगीन और विदेशी किस्मों के आम सामान्यत: 300 से 600 रुपए प्रति किलोग्राम तक आसानी से बिक जाते हैं. अपनी गुणवत्ता, आकर्षक रंग, सीमित उपलब्धता और विशिष्ट स्वाद के कारण इन की बाजार में अच्छी मांग बनी रहती है.
अवनीश कुमार सिंह कहते हैं कि उन का सब से बड़ा उद्देश्य अधिक से अधिक किसानों को बागबानी से जोड़ना है. वे चाहते हैं कि किसान वैज्ञानिक तरीके से फलोत्पादन करें, समय पर उचित तकनीक अपनाएं और पारंपरिक खेती के साथ आधुनिक बागबानी को भी अपना कर अपनी आय बढ़ाएं. इसी उद्देश्य से वे अपने बाग में आने वाले किसानों को पौध चयन, रोपण, सिंचाई, पोषण प्रबंधन, छंटाई, रोग नियंत्रण तथा बाजार प्रबंधन तक की जानकारी भी देते हैं.
वे बताते हैं कि यदि कोई किसान केवल एक एकड़ भूमि में भी योजनाबद्ध तरीके से आम का बाग लगा कर मल्टीलेयर फार्मिंग अपनाए, तो वह पारंपरिक धानगेहूं की खेती की तुलना में कहीं अधिक लाभ कमा सकता है.
अवनीश कुमार सिंह केवल आम की बागवानी तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि उन्होंने अपने बाग में आम के साथसाथ सेब, बेर, आड़ू, नाशपाती, चीकू, अंजीर सहित अनेक फलदार पौधे भी लगाए हैं. इस से उन की आय के स्रोत विविध हुए हैं और पूरे वर्ष बाग से किसी न किसी रूप में उत्पादन एवं आमदनी बनी रहती है. उन का मानना है कि विविधीकृत बागबानी ही भविष्य की टिकाऊ और लाभकारी कृषि का आधार बनेगी.
एग्री टूरिज्म की नई पहचान पर जोर
अवनीश कुमार सिंह का कहना है कि उन का प्रयास अपने गांव को ऐसा जीवंत ग्रामीण पर्यटन केंद्र बनाने का है, जहां आगंतुक केवल आम खरीदने न आएं, बल्कि ग्रामीण भारत की वास्तविक संस्कृति, कृषि परंपरा और प्राकृतिक जीवनशैली को भी करीब से जान सकें. उन का मानना है कि कृषि केवल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और प्रकृति से जुड़ा जीवन दर्शन भी है.
यही नहीं, पर्यटकों को ग्रामीण परिवेश में तैयार होने वाले पारंपरिक एवं देशी व्यंजनों का स्वाद चखने का अवसर भी मिलेगा. मिट्टी के चूल्हे पर बने भोजन, मौसमी सब्जियों, देशी अनाज तथा पारंपरिक खानपान के माध्यम से ग्रामीण जीवन की आत्मीयता से उन का परिचय कराया जाएगा.
अवनीश कुमार सिंह आगे बताते हैं कि एग्री टूरिज्म को और अधिक आकर्षक बनाने के लिए कई अन्य गतिविधियों पर भी कार्य किया जा रहा है. इन में तालाब में मछली पकड़ने का अनुभव, गाय और भैंस का दूध दुहना, पशुपालन की दैनिक गतिविधियों को सम झना, गोबर से उपले बनाना, खेतों की सिंचाई, जैविक खाद तैयार करना तथा ग्रामीण जीवन की अनेक पारंपरिक गतिविधियों में सहभागिता शामिल होगी. ग्रामीण युवाओं को रोजगार मिलेगा, महिलाओं के लिए भी स्वरोजगार के अवसर विकसित होंगे और सतत पर्यटन का प्रेरणादायी उदाहरण बन सकता है.
कृषि पर्यटन का हिस्सा बनेंगी गिर गाय
अवनीश कुमार सिंह बताते हैं कि भविष्य में एग्री टूरिज्म का महत्वपूर्ण आकर्षण उन की यही गौशाला भी होगी. गांव आने वाले पर्यटक केवल फलों और बागों का ही आनंद नहीं लेंगे, बल्कि देशी गायों की देखभाल, दुग्ध उत्पादन, चारा प्रबंधन और पारंपरिक पशुपालन प्रणाली को भी नजदीक से सम झ सकेंगे.
गिर गाय भारत की सर्वश्रेष्ठ देशी दुधारू नस्लों में गिनी जाती है. इस का मूल उद्गम गुजरात के गिर वन क्षेत्र से माना जाता है. यह नस्ल अपने उत्कृष्ठ ए-2 दूध, अधिक दुग्ध उत्पादन क्षमता तथा गरम एवं प्रतिकूल जलवायु में भी बेहतर अनुकूलन के लिए प्रसिद्ध है.
सामान्यत: एक ब्यांत में लगभग 2000 से 2100 लीटर तक दूध देने की क्षमता रखने वाली गिर गाय उचित देखभाल एवं संतुलित पोषण मिलने पर प्रतिदिन 10 से 15 लीटर अथवा उस से अधिक दूध भी दे सकती है.
अवनीश कुमार सिंह का मानना है कि भविष्य की कृषि केवल खेतों तक सीमित नहीं रहेगी. फलोत्पादन, पशुपालन, कृषि पर्यटन, पौध उत्पादन, जैविक खेती और ग्रामीण उद्यमिता इन सभी को एकसाथ जोड़ कर ही किसानों की आय में वास्तविक वृद्धि संभव है. इसी सोच के साथ वे अपने फार्म को एक
समग्र कृषि मौडल के रूप में विकसित कर रहे हैं, जहां खेती केवल आजीविका नहीं, बल्कि सीखने, प्रकृति से जुड़ने और ग्रामीण भारत की समृद्ध परंपरा को सम झने का माध्यम भी बने.
आज अवनीश कुमार सिंह जैसे युवा किसान यह सिद्ध कर रहे हैं कि यदि मेहनत, नवाचार, दूरदृष्टि और अपनी मिट्टी से जुड़ाव का भाव साथ हो, तो बंजर जमीन भी नई संभावनाओं का इतिहास लिख सकती है.





