कटहल (Jackfruit) की खेती में अब पारंपरिक किस्मों के अलावा कई रंगीन और अत्यधिक उत्पादक (उन्नत) किस्में बाजार में धूम मचा रही हैं. पहले जहां कटहल का पेड़ फल देने में 5 से 6 साल का समय लेता था, वहीं आज की वैज्ञानिक और ग्राफ्टेड (कलमी) उन्नत किस्में मात्र 1 से 3 साल में फल देना शुरू कर देती हैं. व्यावसायिक खेती और घरेलू बागबानी के लिए यह बेहद फायदेमंद सौदा साबित हो रहा है.

रंगीन कटहल अपनी खूबसूरती और बेजोड़ मिठास के कारण सामान्य कटहल से दोगुनी कीमत पर बिकते हैं. इन किस्मों को प्रोसैसिंग के लिए उत्तम माना जाता है. इस वजह से रंगीन किस्में जैम, जैली, स्क्वैश और वैक्यूमफ्राइड चिप्स बनाने के लिए उद्योगों द्वारा हाथोंहाथ खरीदी जाती हैं.

इस में स्वर्णपूर्ति किस्म सब्जी और पके फल दोनों के लिए एक बेहतरीन उन्नत किस्म है, जिस के फल मध्यम आकार के होते हैं.

सिंगापुरी या सीलोन जैक किस्म बहुत ही तेजी से बढ़ने वाली और शुरुआती फल देने वाली किस्म है. रोपाई के 3 साल के भीतर ही इस में फल आने लगते हैं.

आल सीजन या बारहमासी कटहल  किस्म साल के 7 से 8 महीने लगातार फल देती रहती है. विशेषकर दीवाली से ले कर जूनजुलाई तक इस में लगातार हार्वैस्टिंग चलती है, जो सब्जी के लिए सब से उत्तम मानी जाती है.

भारत में कटहल की कई उन्नत और अधिक पैदावार देने वाली किस्में उगाई जाती हैं, जो अपने स्वाद, गूदे की बनावट और जल्दी फल देने के लिए जानी जाती हैं.

पलुर-1 : यह किस्म, जिसे तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित किया गया है, एक चर्चित किस्म है. इस के फल एक समान, चमकदार पीले रंग के और कम दूध (लैटेक्स) वाले होते हैं. यह साल में 2 बार फल देती है और इस के फल जमीन के पास तनों पर लगते हैं.

गुलाबी कटहल : इस किस्म के कटहल के अंदर का गूदा हलके गुलाबी रंग का होता है और इस में गुलाब जैसी खुशबू आती है.

हजार कटहल : यह अत्यधिक मात्रा में फल देने की क्षमता के लिए जानी जाती है, जिस के एक ही पेड़ पर गुच्छों में बहुत सारे फल लगते हैं.

मट्टम वरिक्का : मध्यम आकार और बेहतरीन स्वाद वाले कड़क गूदे के लिए प्रसिद्ध.

हनी जैक : बहुत ही मीठे और मुलायम गूदे वाली किस्म.

रंगीन व्यावसायिक किस्में

हाल के सालों में वैज्ञानिकों नें कई ऐसी किस्में ईजाद की हैं जो आम कटहल की किस्मों की तुलना में अलग हैं. इस नए कटहल के अंदर का गूदा पारंपरिक पीले या सफेद रंग के बजाय आकर्षक लाल, तांबे जैसे या गुलाबी रंग का होता है जिसे वैज्ञानिकों नें को सिद्दू और शंकरा नाम दिया है.

आईआईएचआर, बैंगलुरु के वैज्ञानिकों को द्वारा विकसित इस किस्म के कटहल की उपज अन्य किस्मों से कहीं ज्यादा होती है. सब से बड़ी बात की इस नए किस्म के एक कटहल का वजन लगभग 25 से 32 किलोग्राम तक होता है.

इस किस्म को वैज्ञानिकों द्वारा बैंगलुरु के बाहरी इलाके हेसरघट्टा में किसान नागराज के खेत से चिन्हित किया है. कटहल की इस नई किस्म ने अपने असाधारण स्वाद, पोषण मूल्य और जैम, स्क्वैश और फ्रूट बार जैसे उत्पाद बनाने की क्षमता के कारण आईआईएचआर वैज्ञानिकों का ध्यान अपनी और आकर्षित किया है.

इस नई किस्म की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि यह किस्म बिना सीजन के भी यानी की अगस्त से अक्टूबर के महीने में भी अच्छी पैदावार देने की क्षमता है. यह दुर्लभ विशेषता कटहल की वांछनीयता और बाजार क्षमता को बढ़ाने में मददगार है.

सिंदूर केरल कृषि विश्वविद्यालय द्वारा लोकप्रिय बनाई गई इस किस्म का गूदा गहरा नारंगीलाल होता है. इस के फल का वजन लगभग 11-12 किलोग्राम होता है और यह बहुत मीठी होती है.

पीली रुद्राक्षी किस्म के कटहल के पेड़ का आकार पिरामिडनुमा होता है. पेड़ के सभी हिस्से फल देने में सक्षम हैं. आप कम वर्षा वाले क्षेत्रों में 4 साल और अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में 6 साल में फल उगा सकते हैं. यह किस्म के फल पेड़ पर फल गुच्छों में होते हैं. यह किस्म जल्दी फल देती है और अधिक दिनों तक उपज दे सकती है.

इस की मार्च से अगस्त तक कटाई की जा सकती है. बरसात के मौसम में भी फलों में पानी की मात्रा अधिक नहीं होती. फलों में मोम कम होता है और 1.5 से 2 किलो के छोटे फल लगते हैं.

फलों का गूदा (गुच्छे) गहरे पीले रंग का होता है. प्रति किलोग्राम 20 गुच्छे होते हैं. इस का गूदा मोटा होता है. प्रत्येक पेड़ प्रति वर्ष 300 फल देने में सक्षम हैं. प्रति एकड़ 180 क्विंटल उपज प्राप्त की जा सकती है. गूदे बहुत मीठे होते हैं. आप को 70फीसदी गूदे मिल सकते हैं और बीज छोटे आकार के होते हैं.

नारंगी रुद्राक्षी किस्म के पेड़ का आकार भी पिरामिडनुमा होता है. पेड़ के सभी हिस्सों पर फल लग सकते हैं. कम वर्षा वाले क्षेत्रों में 4 साल में फल तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं.

अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में यह सितंबर से मई के महीने में तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं. फलों में अखाद्य पदार्थ कम होता है. प्रत्येक फल का वजन 15 किलो होता है. फलों के गूदे नारंगी रंग के होते हैं. प्रति किलोग्राम में 10 से 12 गूदे होते हैं. प्रत्येक पेड़ से प्रति वर्ष 25 से 35 फल मिल सकते हैं. इस की उपज क्षमता 250 क्विंटल प्रति एकड़ है.

लाल रुद्राक्षी किस्म का पेड़ पिरामिड आकार में बढ़ता है और पेड़ के सभी हिस्सों में आकर्षक फल पाए जाते हैं. पेड़ पर फल गुच्छों में होते हैं. यह मईजून के महीने में कटाई के लिए तैयार हो जाता है. फल गूदे से भरे होते हैं और आकार में छोटे होते हैं. प्रत्येक फल का वजन 3 किलोग्राम होता है. फलों का छिलका बहुत चिकना होता है. फलों के गुच्छे लाल रंग के आकर्षक होते हैं. प्रति किलोग्राम 15 से 16 गूदे होते हैं. प्रत्येक पेड़ पर प्रतिवर्ष 100 से 125 फल लगते हैं. इस की उपज क्षमता 120 क्विंटल प्रति एकड़ है. गूदे बहुत मीठे होते हैं.

लालआरटीबी किस्म का पेड़ का आकार पिरामिड जैसा होता है. पेड़ के सभी हिस्सों पर आकर्षक फल लगते हैं. यह मार्च से जून तक कटाई के लिए तैयार हो जाता है. फलों में मोम कम होता है. इस किस्म के फलों में बरसात के मौसम में भी पानी की मात्रा कम होती है.

फलों का आकार बड़ा होता है और प्रत्येक फल का वजन 10 से 15 किलोग्राम होता है. फल के गुच्छे लाल रंग के होते हैं और प्रति किलोग्राम 20 से 30 गुच्छे होते हैं. गूदा थोड़ा सख्त और बहुत मीठा होता है.

प्रत्येक पेड़ पर प्रतिवर्ष 50 से 75 फल लगते हैं. इस की उपज क्षमता 200 क्विंटल प्रति एकड़ है. फल अच्छी गुणवत्ता के होते हैं. लंबे समय तक संग्रहीत किया जा सकता है.

वियतनाम पिंक कटहल कटहल की एक उन्नत विदेशी किस्म मानी जाती है, जो जल्दी फल देने और आकर्षक गुलाबी से तांबे जैसे रंग के गूदे के लिए जानी जाती है. ग्राफ्टेड पौधों में अनुकूल परिस्थितियों में लगभग 12 महीने में फल आने लगता है, जबकि सामान्य देशी कटहल को फल देने में कई वर्ष लग सकते हैं.

इस का गूदा मीठा, सुगंधित और नरम होता है. पौधे का आकार अपेक्षाकृत नियंत्रित रहने के कारण इसे खेत के साथसाथ बड़े गमले या ड्रम में भी उगाने की कोशिश की जाती है. हालांकि, फल आने का समय और उत्पादन मिट्टी, मौसम, पौधे की गुणवत्ता और देखभाल पर निर्भर करता है.

पौध रोपण की तैयारी

कटहल की बागबानी के लिए जीवांश युक्त दोमट मिट्टी सब से अच्छी होती है. यह सुनिश्चित करें कि जिस जगह पर पौध रोपण करने जा रहे हैं वह क्षेत्र खेत में जलभराव नहीं होना चाहिए, पानी का जमाव नहीं हो क्योंकि कटहल ज्यादा पानी नहीं सह सकती है. पौध रोपण के लिए खेत को तैयार करने के लिए एक गहरी जुताई करने के बाद पाटा चला कर भूमि को समतल कर लें.

समतल भूमि पर 10 से 12 मीटर की दूरी पर 1 मीटर व्यास एवं 1 मीटर गहराई के गड्ढे तैयार करें. इन सभी गड्ढो में 20 से 25 किलोग्राम गोबर की साड़ी खाद अथवा कंपोस्ट, 250 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 500 म्युरियेट औफ पोटाश, 1 किलोग्राम नीम की खली तथा दीमकरोधी रसायन को मिट्टी में अच्छी प्रकार मिला कर भर देना चाहिए.

जलवायु की बात किया जाए तो इस की बागबानी शुष्क तथा शीतोष्ण दोनों जलवायु में बागबानी सफलतापूर्वक किया जाता है. इस के साथ पहाड़ो तथा पठारों पर बागबानी किया जाता है. कटहल के पौधों की रोपाई की उपयुक्त समय जुलाई से सितंबर है.

पौध रोपण

यदि आप व्यावसायिक खेती शुरू करना चाहते हैं, तो हमेशा किसी सरकारी संस्थान या विश्वसनीय पंजीकृत नर्सरी से ही ग्राफ्टेड (कलमी) पौधे खरीदें. पौधे को गड्ढे में उतनी ही गहराई पर लगाएं जितनी गहराई में वह पौलीबैग या गमले में लगा हुआ था. पौधे के तने का निचला हिस्सा (जहां से जड़ें शुरू होती हैं) मिट्टी के अंदर ज्यादा गहरा नहीं दबना चाहिए, नहीं तो तना सड़ सकता है.

रोपण के दौरान पौधे को पौलीबैग से निकालते समय ध्यान रखें कि उस की जड़ों के पास की मिट्टी (पिंडी) टूटने न पाए और गड्ढे के बीचोंबीच पौधा सीधा खड़ा करें और चारों तरफ से खाद मिली मिट्टी डाल कर अच्छे से दबा दें. पौधा लगाने के तुरंत बाद तने के पास हलका थाला (घेरा) बना कर भरपूर पानी दें.

खाद और उर्वरक

जैसेजैसे कटहल का पेड़ बड़ा होता है, उस की पोषण जरूरत भी बढ़ती जाती है. 10 वर्ष से अधिक उम्र के परिपक्व पेड़ में करीब 80 से 100 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद के साथ संतुलित मात्रा में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटास उर्वरक देना चाहिए.

खाद और उर्वरक डालने का सब से उपयुक्त समय सामान्यत: मानसून यानी जूनजुलाई माना जाता है. सिंचाई वाले बागों में उर्वरक की मात्रा को 2 हिस्सों में बांट कर पहला हिस्सा जूनजुलाई और दूसरा सितंबरअक्तूबर में दिया जा सकता है.

खाद डालते समय तने से करीब

50 सैंटीमीटर दूरी पर चारों तरफ गोल घेरा (रिंग ट्रैंच) बना कर खाद और उर्वरक को मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें और इस के बाद हलकी सिंचाई करें. इस तरह पौधे को उस की उम्र और जरूरत के अनुसार पोषक तत्व मिलते रहते हैं, जिस से स्वस्थ बढ़वार, बेहतर फूलफल और अच्छी पैदावार में मदद मिलती है.

सिंचाई

पौध रोपण के शुरुआत में पौधो में पर्याप्त नमी बनाए रखने के लिए लगातार पानी देते रहना चाहिए. शुरुआत के कुछ वर्ष तक गरमी के मौसम में प्रति सप्ताह तथा सर्दी के मौसम में 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए. अगर पौधा बड़ा हो गया है तो गरमी के दिनों में प्रत्येक 15 दिन में तथा सर्दी के मौसम में 1 महीनें में सिंचाई की जरूरत पड़ती है. नवंबरदिसंबर माह में कटहल के पौधों में फूल लगता है इसलिए इन 2 माह में सिंचाई नहीं करें.

निराईगुड़ाई

कटहल के पौधों को निराईगुड़ाई कर के साफ रखना चाहिए. बड़े पेड़ों के बागों की वर्ष में 2 बार जुताई करनी चाहिए. कटहल के बाग में बरसात आदि पानी बिलकुल नहीं जमा होने देना चाहिए.

कीट और रोग

ऐसे तो कटहल के पेड़ में रोग तथा कीट का प्रकोप बहुत कम होता है लेकिन इस में लगने वाला प्रमुख रोग गलन है. यह रोग राइजोपस आर्टोकारपाई नामक कवक के कारण होता है. इस का प्रकोप फल की छोटी अवस्था में होता है. इस के कारण कटहल के फल सड़ कर गिरने लगते हैं.

इस बीमारी की रोकथाम के लिए डाइथेन एम-45 के 2 ग्राम प्रति लीटर में घोल कर 15 दिनों के अंतराल पर 2-3 छिड़काव करना चाहिए. कीटों में मिली बग एवं तना छेदक प्रमुख हैं.

कटहल की फसल में मिली बग नाम के कीट फलफूल एवं डंठलों का रस चूसते हैं जिस सें फल तथा फूल गिर जाता है. इस की रोकथाम के लिए मईजून में बगीचे की जुताई कर देनी चाहिए. इस के उपचार के लिए नीम आधारित स्प्रे पानी में घोल कर छिड़काव करें, जबकि तना छेदक कीट पेड़ के तने में छेद कर सुरंग बना देते हैं. इस से अंदर के जीवित भाग को खाते रहते हैं.

अगर इस कीट का प्रकोप बढ़ जाता है तो पेड़ की डालियां और तना सूख जाते हैं. इस के नियंत्रण के लिए पौधों के तना और डाली पर जहां छेद नजर आए उसे केरोसिन तेल में रुई भिगो कर भर दें और छेद के मुंह को मिट्टी से भरे दें.

उपज

कटहल की उन्नत किस्में, खासकर रंगीन, बारहमासी और थाई वैरायटी की खेती किसानों के लिए अच्छी आमदनी का जरीया बन सकती हैं. इन किस्मों से प्रति एकड़ लगभग 10 से 30 टन तक पैदावार प्राप्त की जा सकती है और बाजार भाव व उत्पादन लागत के आधार पर सालाना एक लाख से 15 लाख तक का मुनाफा संभव है.

पारंपरिक कटहल के पेड़ों से जहां 5वें-6वें वर्ष के बाद लगभग 8 से 12 टन प्रति एकड़ उपज मिलती है, वहीं उन्नत किस्मों में सघन खेती के जरीए उत्पादन बढ़ाया जा सकता है. एक एकड़ में अधिक संख्या में पौधे लगाने पर 10 साल पुराने एक पौधे से लगभग 1 से 1.5 क्विंटल तक फल मिल जाता है, जिस से कुल उपज 20 से 30 टन प्रति एकड़ तक पहुंच सकती है.

इन उन्नत किस्मों के पौधे रोपाई के 2 से 3 साल बाद शुरुआती उत्पादन देना शुरू कर सकते हैं. इस के अलावा कटहल से आटा, चिप्स और प्यूरी जैसे मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार कर बाजार में बेचने से किसानों की आमदनी बढ़ाने की अतिरिक्त संभावना भी बनती है.

अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें...