वसंतकालीन गन्ने (Sugarcane) की बोआई उत्तर प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र में मध्य फरवरी से मार्च अंत तक, मध्य क्षेत्र में फरवरी मध्य से मार्च मध्य और पश्चिमी क्षेत्र में मार्च मध्य तक उपयुक्त मानी जाती है. इस समय तापमान अनुकूल रहने से अंकुरण बेहतर होता है और फसल मजबूत बढ़ती है. देरी से बोआई करने पर उपज प्रभावित हो सकती है.

उन्नत किस्में और बीज चयन

उत्तर प्रदेश गन्ना शोध संस्थान द्वारा अनुशंसित किस्में जैसे कोशा 17231, कोलख 14201, कोज 94141, कोज 862081 और कोशा 9232 वसंतकालीन खेती के लिए आदर्श हैं. ये किस्में रोग प्रतिरोधी, शीघ्र पकने वाली और उच्च उपज देने वाली होती हैं.

गन्ना आयुक्त द्वारा 8 जिलों (जैसे गोरखपुर, बस्ती, देवरिया आदि) में 3,241 क्विंटल बीज वितरित किए गए हैं, जो 1.40 रुपए प्रति आंख की दर से उपलब्ध हैं.

बोआई विधि और सहफसल

ट्रैंच विधि : 75 सैंटीमीटर दूरी पर 2 लाइनों में गन्ना बोएं, बीच में उड़द या मूंग जैसी दलहनी फसलें लगाएं. इस से भूमि उर्वरता बढ़ती है और अतिरिक्त आय होती है. प्रति हेक्टेयर 25-30 हजार मीटर बीज दर रखें.

इस के अलावा खेत की अच्छी जुताई, जैविक खाद (10-15 टन प्रति हेक्टेयर) का इस्तेमाल और बीज उपचार (कार्बेन्डाजिम) आवश्यक है.

लाभ और चुनौतियां

वसंतकालीन गन्ना 12-14 माह में तैयार हो जाता है, जो शीतकालीन फसल से 20-30 फीसदी अधिक चीनी देता है. सहफसल से दालों की घरेलू जरूरत पूरी होती है. चुनौतियां जैसे कीट (तना बेधक), रोग (लाल सड़न) से बचाव के लिए एकीकृत प्रबंधन अपनाएं. सरकारी योजनाओं से सब्सिडी उपलब्ध है.

किसान कृषि विज्ञान केंद्रों से संपर्क कर उन्नत तकनीक अपनाएं, ताकि वसंतकालीन गन्ने की खेती लाभकारी बने.

उत्तर प्रदेश में वसंतकालीन गन्ने की उन्नत किस्में उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद द्वारा अनुमोदित हैं, जो उच्च उपज, चीनी प्रतिशत और रोग प्रतिरोध के लिए चयनित हैं. ये किस्में फरवरीमार्च बोआई के लिए उपयुक्त हैं.

प्रमुख उन्नत किस्में

कोशा 08272 : शीघ्र पकने वाली, 105-107 टन प्रति हेक्टेयर उपज, आसान छिलाई, गुड़ के लिए उत्तम.

कोशा 13235 : 81-92 टन प्रति हेक्टेयर, अच्छा चीनी परता, तेज बढ़वार.

कोशा 18231 : नई स्वीकृत (2025), 90+टन प्रति हेक्टेयर, लाल सड़न प्रतिरोधी.

कोज 94141 : बसंतकालीन टौप, 400-600 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, उच्च उत्पादन.

कोज 862081 : उच्च उपज,400-600 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, विभिन्न मिट्टियों के लिए अनुकूल.

कोज 86600 : मध्यम व देर से पकने वाली, 400-600 प्रति क्विंटल, अच्छी बाजार मांग.

कोलख 14201 : जल्दी पकने वाली, सामान्य खेती के लिए स्वीकृत.

कोशा 17231 : उच्च चीनी, रोग प्रतिरोधी.

कोशा 13231 : जल्दी पकने वाली, पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए.

वसंतकालीन गन्ने में सहफसल (इंटरक्रौपिंग)

उत्तर प्रदेश में वसंतकालीन गन्ने में सहफसल (इंटरक्रौपिंग) से किसान 3-4 महीने में अतिरिक्त आय कमा सकते हैं, जो गन्ने की लागत वसूल कर देती हैं. ट्रैंच या नाली विधि से 2 गन्ना कतारों के बीच सहफसल लगाई जाती है.

अनुशंसित सहफसलें और आय

मक्का : 80,000 रुपए प्रति एकड़ अतिरिक्त शुद्ध लाभ (3-4 महीने में).

फ्रैंच बीन : 65,000 रुपए प्रति एकड़.

उड़द, मूंग, लोबिया : 35,000-40,000 रुपए प्रति एकड़, नाइट्रोजन फिक्सेशन से मिट्टी लाभ.

भिंडी, खीरा, लौकी, प्याज : 40,000-45,000 रुपए प्रति एकड़.

गन्ना+उड़द गन्ना+मूंग

गन्ना+लोबिया

विधि

ट्रैंच विधि : 75 सैंटीमीटर दूरी पर गन्ना की 2 लाइनें, बीच में सहफसल. पौध रोपण विधि से 4-5 फुट लाइन दूरी रखें. कटाई के बाद पौधे खेत में पलट दें (12-15 किलोग्राम नाइट्रोजन की बचत).

लाभ

आय वृद्धि : गन्ने के 12 महीने इंतजार के बीच कमाई.

टिकाऊ : मिट्टी उर्वरता, पर्यावरण संरक्षण.

उपज वृद्धि : गन्ना उत्पादन बेहतर.

इंटरक्रौपिंग से गन्ने की उपज पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिस में पैदावार में 8-10 फीसदी वृद्धि और गुणवत्ता में सुधार शामिल है. रिले इंटरक्रौपिंग जैसी तकनीकों से गन्ने की लंबाई, मोटाई बढ़ती है और कीट प्रकोप कम होता है.

रिले इंटरक्रौपिंग में गन्ने की कतारों के बीच उड़द, मूंग या लहसुनप्याज लगाने से गन्ने की पैदावार 8-10 फीसदी बढ़ जाती है. तेज गंध वाली फसलें (जैसे लहसुन) कीटों को भगाती हैं, जिस से रासायनिक दवाओं की जरूरत घटती है.

दलहनी फसलें नाइट्रोजन फिक्सेशन से मिट्टी उर्वरता बढ़ाती हैं, जो गन्ने को सीधा लाभ देती हैं.

कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं

वैज्ञानिकों के अनुसार, सही विधि (ट्रैंच/75 सैंटीमीटर दूरी) से इंटरक्रौपिंग गन्ने के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालती, बल्कि गुणवत्ता सुधारती है और मिट्टी संतुलन बना रहता है.

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