Yuva Kisan-
अगर देश का ऊर्जावान युवा वर्ग कृषि क्षेत्र में उद्यमिता की कमान संभाल ले, तो भारत के खेत केवल अनाज नहीं, बल्कि समृद्धि उगलेंगे. कृषि में युवाओं के समावेशन से न केवल बेरोजगारी का स्थाई समाधान होगा, बल्कि ग्रामीण भारत आत्मनिर्भर बनेगा.
इसी सपने को धरातल पर साकार कर रहे हैं उत्तर प्रदेश के अयोध्या जनपद के विकास खंड सोहावल के गांव रामदीन मगलसी के युवा किसान शोभाराम. तकरीबन 15 साल पहले शोभाराम भी आम किसानों की तरह पारंपरिक खेती करते थे, जिस से मौसम, कीटों और बाजार के उतारचढ़ाव के कारण उन्हें अकसर नुकसान उठाना पड़ता था. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और तय किया कि ‘अब खेती वैसे नहीं करूंगा, जैसे सब करते हैं, कुछ अलग करना होगा’. यही सोच उन के जीवन का टर्निंग पौइंट बनी.
शोभाराम के पास महज ढाई एकड़ खुद की जमीन है, लेकिन वह जमीन के इसी छोटे टुकड़े पर खेती की बहुफसली और मल्टी लेयर फार्मिंग तकनीकी का उपयोग कर रहे हैं, जिस से वे एक ही जमीन पर एकसाथ कईकई फसलें उगा कर 3 गुना तक मुनाफा कमा रहे हैं. इस के अलावा उन्होंनें डेढ़ एकड़ जमीन लीज पर ले रखी है, जिस में वे अपने नवचार आधारित खेती करते हैं.
बहुफसली और मल्टी लेयर फार्मिंग को बनाया जरीया
बहुफसली खेती के मामले में शोभाराम ने बताया कि इस में एक ही खेत में एक वर्ष के दौरान या एक ही मौसम में एक साथ 2 या 2 से अधिक फसलें उगाई जाती हैं. इस में मुख्य रूप से पौधे की क्षैतिज जगह का इस्तेमाल होता है. जैसे वे खेत के अलगअलग हिस्सों में या एक ही क्यारी में चना और सरसों की बोआई एकसाथ पंक्तियों में करते हैं.
इस में आमतौर पर ऐसी फसलें चुनी जाती हैं, जिन्हें लगभग समान धूप की आवश्यकता होती है. ये फसलें एक ही समय में या थोड़े अंतराल पर पक कर कटती हैं.
उन्होंने बताया कि वे बहुफसली तकनीकी के साथसाथ मल्टी लेयर फार्मिंग भी कर रहे हैं जो कृषि का एक बहुमंजिला यानी वर्टिकल तरीका है. इस में एक ही जमीन पर एक ही समय में विभिन्न ऊंचाइयों और जड़ों की गहराई वाली 3 से 6 फसलें ‘परतों’ में उगाते हैं.
इस में जगह का ऊर्ध्वाधर उपयोग करते हैं, जैसे सब से नीचे जमीन के अंदर आलू या हलदी, फिर जमीन की सतह पर पालक या धनिया, उस के ऊपर मध्यम ऊंचाई के पौधे टमाटर या मिर्च और सब से ऊपर जाली या मचान पर बेल वाली फसलें लौकी या करेला या फिर नेनुआ जैसी फसलें लगाई जाती हैं.
इस मल्टीलेयर फार्मिंग में ऐसी फसलें ली जाती हैं, जिन्हें अलगअलग मात्रा में धूप चाहिए होती है. ऊपर की मचान वाली परतें तेज धूप सोख लेती हैं, जबकि नीचे की परतों छाया पसंद करने वाले पौधों तक छन कर धूप पहुंचती है. इस में सभी परतें अलगअलग समय पर तैयार होती हैं.
लागत और मुनाफे का जादुई गणित
शोभाराम द्वारा की जा रही खेती के बहुफसली तकनीक में जहां जल प्रबंधन सामान्य और ड्रिप दोनों तरीके से होता है, वहीं मल्टी लेयर फार्मिंग में शोभाराम केवल ड्रिप इरिगेशन यानी टपक सिंचाई का उपयोग कर के पानी और खाद की भारी बचत करते हैं.
शोभाराम ने बताया कि मल्टीलेयर फार्मिंग से उन की की लागत कम लगती है, जबकि मुनाफा 3 गुना तक हो रहा है. उन्होंने बताया कि लागत के गणित को हम ऐसे सम झ सकते हैं कि जब हम एकसाथ कई फसलें लेते हैं, तो फसलें एकदूसरे से ही पोषक तत्व ले लेती हैं. जमीन में जब खाली जगह नहीं रहती, तो खरपतवार यानी घासफूस भी नहीं निकलता, जिस से निराईगुड़ाई का खर्च बच जाता है.
इसी तरह मल्टीलेयर खेती में एक फसल में जितनी खाद और पानी डाला जाता है, उतने में ही चारों फसलें तैयार हो जाती हैं. इस तरीके से 70 फीसदी तक पानी की बचत होती है. इसी तरह बांस, तार और घास से जो मंडप (मचान) तैयार करते हैं, उस में एक बार में प्रति एकड़ करीब सवा लाख रुपए का खर्च आता है. लेकिन खास बात यह है कि यह सैटअप 5 साल तक लगातार चलता है यानी सालाना लागत महज 25,000 रुपए ही आती है.
शोभाराम ने बताया कि इस मौडल से एक एकड़ में एक साल में लगभग डेढ़ से 3 लाख रुपए बच जाते हैं. इस तरह वे अपने ढाई एकड़ के खेत से हर साल बाजार भाव के हिसाब से 4 से 5 लाख रुपए की शुद्ध बचत कर रहे हैं.
जैव उर्वरक, जैव कीटनाशक और मल्चिंग तकनीक
शोभाराम मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बनाए रखने के लिए पूरी तरह जीरो कैमिकल फार्मूला पर काम करते हैं. वे केवल गोबर की जैविक खाद और नमी बनाए रखने के लिए मल्चिंग तकनीक का प्रयोग करते हैं.
फसलों को कीटों से बचाने के लिए महंगे और जहरीले रसायनों के बजाय उन्होंने फैरोमोन ट्रैप और ग्लू ट्रैप जैसी सस्ती व असरदार तकनीकों का सहारा लिया है, जिस से उन की लागत बेहद कम हो गई है.
बकरीपालन से अतिरिक्त आमदनी
शोभाराम ने खेती के खर्चों को कम करने और हर महीने नकद आमदनी के लिए एकीकृत कृषि के तहत बकरीपालन को अपनाया है. उन्होंने बताया कि कोई भी युवा सिर्फ 50,000 की शुरुआती पूंजी से इस की शुरुआत कर सकता है. इस के लिए बरबरी नस्ल की 10 बकरियां और एक अच्छा ब्रीडर बकरा रखना सब से मुफीद होता है. यह नस्ल कम खर्च में तेजी से बढ़ती है.
शोभाराम बताते हैं कि इस छोटे से निवेश के 3 साल बाद बकरियों की संख्या बढ़ने पर किसान हर साल लगभग 70,000 से एक लाख रुपए तक की शुद्ध और नियमित कमाई बड़े आराम से कर सकता है. इस से न केवल अतिरिक्त नकदी मिलती है, बल्कि खेतों के लिए उच्च गुणवत्ता वाली लेंडी की खाद’ भी मुफ्त में उपलब्ध हो जाती है.
धान की खेती के साथ अनोखा प्रयोग
शोभाराम लीज पर ली गई जमीन में धान के खेती में किए गए एक बेमिसाल प्रयोग के लिए भी चर्चा में हैं. खरीफ सीजन में वे धान के पौधों के बीच 5 फुट चौड़ी मेंड़ बना कर उस में गेंदे के फूल की खेती करते हैं.
अयोध्या के बाजारों में गेंदे के फूल की भारी मांग है. जब तक धान की फसल कटाई के लिए तैयार होती है, तब तक गेंदे में शानदार फूल आने लगते हैं. इस तरकीब से वे औसतन 50,000 तक की अतिरिक्त कमाई कर लेते हैं.
इस के अलावा वे धान की फसल के बीच में ही केले के पौधे भी रोप देते हैं. जब तक धान की कटाई होती है, तब तक केला भी ऊपर आना शुरू हो जाता है.
धान की कटाई के बाद आलू और मिर्च का चक्र
शोभाराम का क्रौप रोटेशन बहुत सटीक है. 10 अक्तूबर तक धान और गेंदे की फसल की कटाई हर हाल में हो जाती है. इस के तुरंत बाद, जितने हिस्से में धान लगा था, उस हिस्से की जुताई कर वे वहां आलू और मिर्च की खेती शुरू कर देते हैं.
‘डैमो फार्म’ जो बन गया ‘किसान पाठशाला’
आज शोभाराम का खेत एक ‘डैमो फार्म’ में बदल गया है, जहां लोग सिर्फ फसल देखने नहीं, बल्कि इस आधुनिक विधा को सीखने आते हैं. इस में ज्यादातर युवा किसान होते हैं. शोभाराम ने सिर्फ फसलें नहीं बदलीं, बल्कि मल्चिंग, उन्नत बीज, संतुलित उर्वरक और आईपीएम जैसी तकनीकों को अपना कर अपने खेत को एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला बना दिया.
केले के पौधों में लगने वाली एक अत्यंत विनाशकारी फंगल बीमारी ‘पनामा विल्ट’ फ्यूजेरियम औक्सिस्पोरम के प्रकोप के कारण केले के पत्तों का रंग तेजी से पीला पड़ने लगता है और अंतत: पूरा का पूरा पौधा सूख कर नष्ट हो जाता है, जिस से किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता था.
शोभाराम ने सिर्फ फसलें ही नहीं बदलीं, बल्कि केले की फसल को तबाह करने वाली सब से खतरनाक और विनाशकारी बीमारी ‘पनामा विल्ट’ से वैज्ञानिक तरीके से निबटने का हुनर भी खुद सीखा और दूसरों को सिखाया है.
केले की फसल को इस घातक बीमारी से बचाने के केंद्रीय उपोष्ण बागबानी संस्थान के वैज्ञानिकों तत्कलीन निदेशक डा. टी. दामोदरन और उन की टीम ने शोभाराम के खेत पर लगी बीमारी पर गहरा शोध किया.
इस वैज्ञानिक टीम ने शोभाराम के खेत के व्यावहारिक अनुभवों और शोध के आधार पर ‘फ्यूजिकांट’ नामक एक विशेष दवा बनाने में बड़ी सफलता पाई.
यह दवा ‘पनामा विल्ट’ बीमारी को जड़ से नियंत्रित करने में पूरी तरह कामयाब रही है. यह ‘फ्यूजिकांट’ दवा पौधे की आंतरिक प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा कर उसे फंगस के संक्रमण से पूरी तरह सुरक्षित रखती है, जिस से किसानों की फसल बरबाद होने से बच जाती है.
शोभाराम सिर्फ किसान नहीं हैं, बल्कि एक प्रेरणा और मार्गदर्शक बन चुके हैं. उन के खेत पर ‘किसान पाठशाला’ लगती है, जहां आसपास के किसान नई तकनीक सीखते हैं.
50 से ज्यादा युवा किसान उन के इस मौडल को अपना कर अपनी जिंदगी बदल चुके हैं.
गांव के युवा, जो कभी रोजगार के लिए शहर भागने की सोचते थे, अब उन के खेत पर खड़े हो कर गर्व से कहते हैं, ‘अगर शोभाराम भैया कर सकते हैं, तो हम भी कर सकते हैं.’
मेहनत को मिल रहा है राष्ट्रीय सम्मान
शोभाराम की इस सफलता ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है. उन्हें खेती में मिली इस ऐतिहासिक सफलता के लिए कई बड़े पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है, जिस में ‘मिलेनियर फार्मर औफ इंडिया’ नाम के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय अवार्ड से उन्हें सम्मानित किया गया है.
इस के अलावा देश की शीर्ष संस्था आईसीएआर द्वारा बैस्ट फार्मर अवार्ड पुरस्कार प्रदान किया गया है. उन्हें ‘किसान कनैक्शन’ द्वारा श्रेष्ठ युवा किसान सम्मान से नवाजा जा चुका है.
शोभाराम को बकरी की बरबरी नस्ल के सफल पालन के लिए राज्य लैवल पर सरकार द्वारा पुरस्कृत भी किया जा चुका है. इस के अलावा कृषि, उद्यान, पशुपालन विभागों और देश के तमाम कृषि विश्वविद्यालयों सहित अनेक निजी और सरकारी संस्थानों द्वारा पुरस्कारों के रूप में उपलब्धियां लगातार उन की झोली में आ रही हैं. Yuva Kisan





