Desi Cow Milk Production-
आमतौर पर माना जाता है कि भैंस के मुकाबले गाय और वह भी यदि देशी हो तो दूध कम देती है. हमारे समाज में गाय के नाम पर राजनीति, गौपूजा के नाम पर पाखंड, गोहत्या के नाम पर होहल्ला व लड़ाईझगड़े तो खूब होते हैं, लेकिन कोई यह नहीं देखता कि देशी गायों को सड़कों पर खुला छोड़ दिया जाता है और वे अपना पेट भरने के लिए प्लास्टिक, कूड़ाकचरा, कील व कांच आदि खाती फिरती हैं.
ठीक से देखभाल न होने की वजह से देशी गायें दूध कम व बच्चे कमजोर देती हैं. वे अकसर बीमार रहती हैं और बेवक्त मर जाती हैं. यदि उम्दा नस्ल की देशी गाय सही तरीके से पालें, पौष्टिक चारा, खली, मिनरल मिक्सचर व दवाएं आदि समय से दें तो उन से ज्यादा दूध लिया जा सकता है.
भारत सरकार के कृषि मंत्री खुद मानते हैं कि हमारे देश में देशी नस्ल की गायों को बचाने व बढ़ाने के लिए अब तक खास ध्यान नहीं दिया गया. लिहाजा देशी गायें अपने ही देश में लाचार हो गई हैं. अंधी होड़ में फंसे ज्यादातर पशुपालक नहीं देखते कि रोज 25-30 लीटर दूध देने वाली विदेशी गायें भारत में रह कर 10 लीटर दूध पर ही अटकी रहती हैं.
जर्सी गायें देशी के मुकाबले जल्दी दूध देना बंद कर देती हैं. उन के लिए ज्यादा चारा व पानी चाहिए होता है. इसलिए देशी गायों के मुकाबले जर्सी नस्ल की गायों के खानपान पर खर्च ज्यादा होता है. नतीजतन विदेशी गायों के रखरखाव व उन के दूध की लागत ज्यादा आती है और पशुपालकों को डेरी के काम में कमाई कम होती है.
देशी नस्लें
गिर, लालसिंधी, थारपारकर, राठी, साहिवाल, कंकरेज, ओनगोल, हरियाणा, मालवी, भगनाड़ी, नागौरी, निमाड़ी, पवांर, दज्जल, निलोर, गावलाव और वेचूर आदि 39 नस्लों की देशी गायें हमारे देश के कृषि मंत्रालय के रिकार्ड में दर्ज हैं. बहुत से किसान नहीं जानते कि इन में सिंधी, थारपारकर, राठी, साहिवाल व कंकरेज नस्लों की देशी गायें ज्यादा दूध देती हैं. गुजरात की मशहूर गिर नस्ल की गाय रोजाना 62 लीटर तक दूध देती है.
डेरी चलाने वाले माहिरों का मानना है कि भारत में भी देशी गायों को पालने में खर्च कम होता है, लेकिन यदि उन्हें पूरा व पौष्टिक खाना और सही माहौल मिले तो उन के दूध देने की कूवत बढ़ा कर दोगुनी की जा सकती है. अपने देश में देशी गायों के दूध में कमी के कई कारण हैं. मसलन ज्यादातर पशुपालक गायपालन का बुनियादी ढाचा बेहतर नहीं करते, चारा खराब व कम देते हैं और उम्दा नस्ल की गायें नहीं चुनते.
जर्सी गाय रोजाना 20-25 लीटर व होलस्टीन फ्रेजियन गाय रोजाना 30-40 लीटर तक दूध दे सकती हैं, लेकिन देशी गायों की दूध देने की कूवत को हमारे देश में ठीक तरह से परखा ही नहीं गया. उन की नस्लों, उन के चारे व रखरखाव आदि में सुधार न कर के हम ने उन्हें भुला दिया व अंजाम पर नजर डाले बिना ही विदेशी नस्लों की गायों को अपना लिया.
जानकारी जरूरी है
हमारे देश में ज्यादातर पशुपालक अनपढ़ हैं. उन में जागरूकता व समझदारी नहीं है. उन्हें नहीं पता कि देशी गायों के दूध में ए 2 जैसे फायदेमंद व बेमिसाल कुदरती गुण होते हैं. फिर भी देशी गाय के दूध की वाजिब कीमत नहीं मिलती, क्योंकि उस का बाजार ही तैयार नहीं किया गया. गौशालाओं को बढ़ावा न देने से भी देशी गायों की हालत खराब है.
ब्राजील ने साल 1850 में गिर, कांकरेज व ओनगोल गायें भारत से मंगाई थीं. वहां इन नस्लों के सुधार पर ऐसा काम किया गया, जो पूरी दुनिया में मिसाल है.
देशीविदेशी गायों में अंतर
देशी गाय के दूध में फैट 6-7 फीसदी और विदेशी में सिर्फ 2-3 फीसदी होता है. इसी तरह देशी गायों की ब्यांत जीवन में 10-12 बार, लेकिन विदेशी की सिर्फ 4-5 बार ही होती है.
इस के अलावा एक अहम बात यह भी है कि देशी गाय की देखभाल करना आसान है. उस की डाक्टरी जांच महीने में 1 बार कराने से भी काम आसानी से चल जाता है, लेकिन विदेशी गाय नाजुक होने की वजह से उस की डाक्टरी जांच हर हफ्ते करानी होती है. दरअसल, हमारे देश की आबोहवा विदेशी नस्ल की गायों के माफिक नहीं है. इसलिए वे यहां आराम महसूस नहीं करतीं और देशी गायों से ज्यादा खर्चीली साबित होती हैं.
देशी गायों के लिए माहौल माकूल होने से वे कम बीमार होती हैं. उन में सर्दी व सूखे की मार सहने की कूवत होती है. उन के इलाज पर खर्च कम होता है. विदेशी गायों को यहां गरमी ज्यादा लगती है, लिहाजा उन पर खर्च ज्यादा होता है. गाय का मूत्र खेती में कीड़े मारने का देशी घोल बनाने के काम आता है.
माहिरों से मेल जरूरी
गायपालन से कमाई बढ़ाने के लिए नई, सही व पूरी जानकारी व माहिरों से तालमेल रख कर हर पहलू की गहराई में जाना जरूरी है. नए तरीके अपना कर बेहतर नतीजे हासिल करना जरूरी है.
डेरी चलाने के बेहतर तरीके नेशनल डेरी रिसर्च इंस्टीट्यूट, एनडीआरआई, करनाल से सीखे जा सकते हैं. जानवरों को होने वाली बीमारियों की रोकथाम, इलाज, दवाओं व बेहतर चारे आदि की जानकारी भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, आईवीआरआई, इज्जतनगर, बरेली से हासिल की जा सकती है. सरकारी स्कीमों की जानकारी कृषि मेलों व गोष्ठियों में हिस्सा ले कर या पशुपालन महकमे से हासिल की जा सकती है.
देशी गायों को बचाने, बढ़ाने, उन पर खोजबीन करने, उन की नस्ल सुधारने व उन की उत्पादकता बढ़ाने का सब से जरूरी काम मेरठ में चल रहे केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान ने किया है. वहां के माहिरों ने होलस्टीन फ्रेजियन व देशी नस्ल की साहीवाल गाय के मेल से फ्रीजवाल नाम की संकर गाय निकाली है, जो देश के 4 हिस्सों में लगभग 300 दिनों के दौरान 3600 लीटर तक दूध दे रही है.
इस के अलावा इस संस्थान में गिर व कंकरेज आदि देशी नस्लों के उन्नत साड़ों का सीमन भी महफूज रखा जाता है, जिसे पशुपालक वहां से ले सकते हैं. उम्दा नस्ल की गायों के बारे में ज्यादा जानकारी व नई तकनीक हासिल करने के लिए पशुपालक इस पते पर संपर्क कर सकते हैं:
निदेशक, केंद्रीय गोपशु अनुसंधान संस्थान, ग्रास फार्म रोड, मेरठ कैंट, पिन: 250001, उत्तर प्रदेश फोन: 0121-2657136 Desi Cow Milk Production





