फलासिया के किसान करेंगे उन्नत कृषि यंत्रों का उपयोग

नई दिल्ली : महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रोद्योगिकी विश्वविध्यालय के फार्म मशीनरी विभाग में कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा संचालित कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र में श्रम विज्ञान एवं सुरक्षा पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना द्वारा फलासिया की ग्राम पंचायत पानरवा, में कृषि कार्यों में सुरक्षा पर एकदिवसीय प्रशिक्षण का आयोजन किया गया.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल से परियोजना समन्वयक डा. सुखबीर सिंह द्वारा परियोजना की तरफ से क्षेत्र की 40 महिला किसानों को उन्नत कृषि यंत्र भी प्रदान किए गए.

डा. सुखबीर सिंह ने बताया कि खेती में किसानों की रुचि जगाने के लिए कृषि कार्यों को सुगम एवं आरामदायक बनाने के लिए उन्नत एवं श्रम साध्य कृषि यंत्रों को अपनाना अति आवश्यक है. कृषि कार्यों के दौरान उड़ने वाले धूलकणों, रसायनों से बचने के लिए स्प्रे सेफ्टी किट का उपयोग करना बहुत जरूरी है. अरावली के इस सुंदर पहाड़ी क्षेत्र में किसानों के छोटेछोटे खेत हैं, जिन में बड़े कृषि यंत्रों का उपयोग संभव नहीं है. इसलिए यहां के किसानों को एकदूसरे से जुड़ कर खेती करनी होगी.

खेती में उपलब्ध हैं अनेक छोटे कृषि यंत्र

फार्म मशीनरी विभाग के विभागाध्यक्ष एवं परियोजना प्रभारी डा. सांवल सिंह मीना ने बताया कि परियोजना के उदयपुर केंद्र द्वारा विकसित प्रताप व्हील हो एक ऐसा यंत्र है, जिस से किसान बहुत ही आसान तरीके से फसलों से खरपतवार निकाल सकते हैं. इस यंत्र की सहायता से किसान निराई का काम भी कर सकते हैं.

परियोजना के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित सोलर मक्का थ्रैशर भी छोटे किसानों के लिए बहुत लाभदायक है, क्योंकि इस मशीन द्वारा भुट्टे से छिलका एवं दाना निकालने के दोनों काम एकसाथ हो जाते हैं. परियोजना की तरफ से अनुसूचित जाति के 40 किसानों को प्रताप व्हील हो, स्प्रे सुरक्षा किट एवं उन्नत दरांत के साथसाथ 20 किसानों को नेपसैक स्प्रयेर प्रदान किए गए.

फार्म मशीनरी विभाग से डा. सीपी दोशी ने किसानों को खेती के दौरान तेज धूप से बचने के लिए परियोजना द्वारा बनाई गई सोलर टोपी की जानकारी देते हुए बताया कि इस टोपी में सोलर से चलने वाला एक पंखा लगा हुआ है, जिस से किसान तेज धूप में भी आराम से खेती के काम कर सकते हैं.

तनिक सहायक रेखा धाकड़ ने महिला किसानों को स्प्रे सुरक्षा किट को पहना कर बताया कि कैसे यह किट स्प्रे काम के दौरान कीटनाशकों को सांस एवं आंख में जाने से रोकता है.

कार्यक्रम में कृषि विभाग, फलासिया के प्रभारी कृषि अधिकारी शिवदयाल मीना ने किसानों को सरकार द्वारा कृषि यंत्रों पर चलाई जा रही विभिन्न अनुदान योजनाओं के बारे में बताते हुए कहा कि सरकार यंत्रीकरण को बढ़ाने के प्रयास कर रही है. वास्तव में कृषि में लागत कम करने के लिए यंत्रीकरण बहुत ही आवश्यक है.

प्रशिक्षण के दौरान फार्म मशीनरी विभाग से डा. नवीन कुमार सी., नरेंद्र कुमार यादव और भरत कुमार ने भी किसानों को आधुनिक तकनीकी के बारे में बताया एवं परियोजना में विकसित मक्का थ्रैशर को प्रदर्शित किया गया. उन्नत कृषि यंत्र पा कर किसानों के चेहरे खिल उठे और कहने लगे कि अब हम भी खेत में आधुनिक किसान बन कर काम करेंगे.

आलू की खेती और बोआई मशीन (Planting Machine)

हमारे देश में आलू की अच्छीखासी पैदावार होती है. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार व गुजरात जैसे राज्य आलू की खेती करने में आगे हैं. उत्तर प्रदेश राज्य में सब से ज्यादा आलू की खेती की जाती है. कई बार आलू की खेती से किसान अच्छाखासा मुनाफा कमाते हैं, लेकिन कभीकभी यही ज्यादा पैदावार किसानों के लिए घाटे का सौदा भी बन जाती है. किसानों को चाहिए कि वे आलू की खेती करने के लिए अपने इलाके के हिसाब से बेहतर बीज का चुनाव करें और फसल समय पर बोएं. आलू की अधिकता होने पर प्रोसेसिंग की जानकारी ले कर आलू के उत्पाद बनाने की कोशिश करें. अगेती फसल बोने पर भी किसानों को मंडी से अच्छे दाम मिल जाते हैं.

उत्तर प्रदेश की जलवायु के हिसाब से आलू की तकरीबन 35 किस्में हैं, जिन में कुछ खास किस्मों के बीजों की जानकारी और फसल तैयार होने की जानकारी बाक्स में दी गई है.

खेत की तैयारी : फसल से अच्छी पैदावार लेने के लिए जमीन समतल और पानी के अच्छे निकास वाली होनी चाहिए. आलू की खेती के लिए अधिक उर्वरायुक्त बलुई दोमट व दोमट मिट्टी ठीक रहती है. खेत की 2-3 बार जुताई करें और पाटा चला कर खेत को समतल करें.

बोआई का समय : आलू की अगेती बोआई के लिए 15 सितंबर से मध्य अक्तूबर तक का समय ठीक होता है. बोने के 70-80 दिनों बाद आलू खोदने लायक हो जाते हैं. सामान्य फसल की बोआई के लिए मध्य अक्तूबर से 15 नवंबर तक का समय सही रहता है.

बोआई करने से पहले बीजोपचार जरूर करें. इस से जड़ वाली बीमारियों से छुटकारा मिलता है. इस के लिए बोरिक एसिड 3 फीसदी का घोल यानी 30 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाएं.

उर्वरकों का इस्तेमाल : आलू की फसल के लिए 150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 100 किलोग्राम फास्फोरस और 80 किलोग्राम पोटाश की जरूरत प्रति हेक्टेयर होती है. अच्छी पैदावार के लिए गोबर की खाद भी डालें. यदि आप ने फसल बोने से पहले मिट्टी की जांच कराई हो और उस में जस्ता व लोहा जैसे सूक्ष्म तत्त्वों की कमी हो, तो 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट और 50 किलोग्राम फेरस सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से उर्वरकों के साथ बोआई से पहले खेत में डालें.

बोआई मशीन (Planting Machine)

बीजों की मात्रा : बोआई के लिए आलू के रोगरहित बीज भरोसे की जगह से खरीदें. वैसे सरकारी संस्थानों, राज्य बीज निगमों या बीज उत्पादन एजेंसियों से ही बीज खरीदना चाहिए. आमतौर पर 1 हेक्टेयर फसल बोने के लिए 30 से 35 क्विंटल बीजों की जरूरत होती है.

बोआई : आलू की बोआई करने के लिए मेंड़ से मेंड़ की दूरी 50-60 सेंटीमीटर रखें और पौधे से पौधे की दूरी 15 से 20 सेंटीमीटर रखें. कई बार आलू के आकार के हिसाब से यह दूरी कम या ज्यादा भी की जाती है. आमतौर पर आलू को 8 से 10 सेंटीमीटर की गहराई पर खुरपी की सहायता से बोया जाता है, ताकि अंकुरण के लिए मिट्टी में सही नमी बनी रहे. इस के अलावा आलू बोने की मशीन पोटैटो प्लांटर से भी आलू को बोया जाता है.

पोटैटो प्लांटर से आलू की बोआई : मोगा पौटेटो प्लांटर के बारे में अमनदीप सिंह ने बताया कि मोगा इंजीनियरिंग वर्क्स के पोटैटो प्लांटर मैन्यूअल और आटोमैटिक दोनों तरह के बाजार में मौजूद हैं. पोटैटो प्लांटर 2, 3 व 4 लाइनों में आलू की बोआई करता है, लेकिन सामान्यतया 85 फीसदी लोग 2 लाइनों में बोआई करने वाले पोटैटो प्लांटर को अधिक पसंद करते हैं.

बोआई मशीन (Planting Machine)

2 लाइनों में बोआई करने वाले मैन्यूअल पोटैटो प्लांटर की कीमत तकरीबन 38000 3 लाइनों में बोआई करने वाले प्लांटर की कीमत तकरीबन 48000 और 4 लाइनों में बोआई करने वाले प्लांटर की कीमत तकरीबन 58000 रुपए होती है.

आटोमैटिक पोटैटो प्लांटर की कीमत तकरीबन 1 लाख, 20 हजार रुपए है, जिस की रोजाना आलू बोआई करने की कूवत 35 बीघे से 50 बीघे तक है. इस के अलावा 2 से 4 लाइनों तक में बोआई करने वाले आटौमेटिक प्लांटर भी मौजूद हैं.

आलू बोने की इस मशीन के बारे में आप अमनदीप सिंह से उन के मोबाइल नंबर 08285325047 पर बात कर के अधिक जानकारी ले सकते हैं.

खरपतवार नियंत्रण और मिट्टी

चढ़ाना : आलू बिजाई के 20 से 25 दिनों बाद जब पौधे 8 से 10 सेंटीमीटर ऊंचाई के हो जाएं, तो लाइनों के बीच स्प्रिंग टाइन कल्टीवेटर या खुरपी से खरपतवार निकालने का काम करें.

इसी दौरान नाइट्रोजन की शेष मात्रा डाल कर खुरपी या ट्रैक्टर चालित रिजर से मिट्टी चढ़ा दें.

मैदानी इलाकों में आलू की फसल में खरपतवार का प्रकोप बिजाई के 4 से 6 हफ्ते बाद ज्यादा होता है यानी इस विधि से फसल को खरपतवार से मुक्त रखा जा सकता है. खरपतवारों के रासायनिक नियंत्रण के लिए फ्यूक्लोरेलिन, मैट्रीव्यूजीन, पैराक्लोट और प्रोपिनल खरपतवारनाशी रसायनों को 1000 लीटर पानी में घोल कर आवश्यकतानुसार दी गई विधियों को अपना कर छिड़काव करें.

उपज : जल्दी तैयार होने वाली किस्मों की पैदावार कुछ कम होती है, जबकि लंबी अवधि वाली किस्में ज्यादा उपज देती है. सामान्य किस्मों के मुकाबले संकर किस्मों से ज्यादा पैदावार (600 से 800 क्विंटल प्रति हेक्टेयर) मिलती है.

सिंचाई : फसल की पहली सिंचाई बोआई के 15-20 दिनों के अंदर कर लेनी चाहिए. सिंचाई करते समय ध्यान रखें कि मेंड़ें पानी में आधे से अधिक नहीं डूबनी चाहिए.

इस के बाद तकरीबन 15 दिनों के अंतराल पर दोबारा सिंचाई करें. आलू की फसल में तकरीबन 8 से 10 बार सिंचाई की जरूरत होती है. आलू तैयार होने पर जब उस की खुदाई करनी हो तो तकरीबन 10 दिन पहले ही उस की सिंचाई बंद कर दें.

फसल सुरक्षा : आलू की फसल को अनेक रोग व कीटों से बचाने के लिए बीमारी के हिसाब से दवाओं का इस्तेमाल करें. आलू में अनेक तरह की बीमारयिं जैसे अगेती झुलसा और पछेती झुलसा होने पर पौधे की पत्तियों पर गोल आकार के भूरे धब्बे बनने शुरू हो जाते हैं.

इन की रोकथाम के लिए 2 से ढाई किलोग्राम डाइथेन जेड 78 या डाइथेन एम 45 का 1000 लीटर पानी में घोल बना कर फसल पर छिड़काव करें. जरूरत पड़े तो 15 दिनों बाद फिर यह क्रिया अपनाएं.

आलू की दूसरी बीमारी है आलू का कोढ़ (कौमन स्कैब) इस रोग से फसल की पैदावार में तो कमी नहीं आती, लेकिन आलू भद्दे हो जाते हैं, जिस से बाजार में उन का सही दाम नहीं मिल पाता. आलू के कंदों के छिलकों पर लाल या भूरे रंग के छोटेछोटे धब्बे बन जाते हैं. इस बीमारी से बचाव के लिए बीजोपचार सब से अच्छा तरीका है.

बोआई मशीन (Planting Machine)

कीट नियंत्रण

एपीलेक्ना विटिल : इस कीट की सूंड़ी व वयस्क दोनों ही पत्तियां खाते हैं, जिस से पत्तियों में केवल नसें बचती हैं. यह कीट पीले रंग के होते हैं. इन की रोकथाम के लिए इंडोसल्फान 35 ईसी 1.25 लीटर या कार्बरिल 5 फीसदी घुलनशील चूर्ण की 2 किलोग्राम मात्रा 800 लीटर पानी में मिला कर छिड़काव करें.

कटवर्म  : यह जमीन के अंदर रहने वाला कीट है, इस की सूंड़ी रात के समय छोटेछोटे पौधों के तनों को काट देती है. इस की रोकथाम के लिए एल्ड्रिन 5 फीसदी चूर्ण अंतिम जुताई के समय मिट्टी में मिला दें.

आलू का माहूं : यह हरे रंग का कीट होता है, जो विषाणु फैलाता है. बचाव के लिए डाइमेथेएट 30 ईसी की 1 लीटर मात्रा 600 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.

सफेद लट या गुबरेला : यह कीट जमीन के अंदर फसल को नष्ट कर देता है. फोरेट 10 जी या काबोफ्यूराल 3 जी 15 किलोग्राम बोआई से पहले इस्तेमाल करें.

खुदाई : अगेती फसल से ज्यादा कीमत हासिल करने के लिए बिजाई के 60-70 दिनों के बाद खुदाई की जा सकती है. मुख्य फसल की खुदाई तापमान 20-30 डिगरी सेंटीग्रेड तक पहुंचने से पहले कर लें, ताकि फसल ज्यादा तापमान पर मृदुगलन और काला गलन जैसे रोगों से ग्रसित न होने पाए.

मशीनों (Machines) की जरूरत, इस्तेमाल व रखरखाव

भारत में बहुत से क्षेत्र ऐसे हैं, जहां कृषि से जुड़े विभिन्न यंत्र व मशीनें बनाई जाती हैं या फिर दूसरी जगह से ला कर बेची जाती हैं. किसानों की कोशिश हमेशा यही होनी चाहिए कि यंत्र किसी नजदीकी कारखाने से जांचपरख कर खरीदें, ताकि टूटफूट होने पर जल्दी से मरम्मत कराई जा सके. इस से फसल के काम प्रभावित हुए बिना समय पर पूरा कर सकते हैं.

इस के अलावा कृषि यंत्र खरीदने के बाद उन के उपयोग करने के तरीके समझ लेने चाहिए, ताकि कृषि यंत्र से आप आसानी से काम ले सकें. मशीनों के उपयोग के बाद उन का रखरखाव भी ठीक तरह से करना चाहिए, अन्यथा कृषि यंत्र खराब हो सकते हैं या उन की कार्यक्षमता पर असर पड़ सकता है.

यंत्रों के उपयोग में सावधानियां

* अगर आप के पास पोटैटो प्लांटर है, तो बिजाई के समय प्लांटर की सैटिंग इस तरह करें, ताकि बीज कम से कम 4-5 इंच मिट्टी में गहरा चला जाए. इस से आलू हरा नहीं होगा. बिजाई के समय हर 2-3 घंटे बाद मेंड़ खोद कर 8-10 आलुओं की गहराई और आपस की दूरी मापें और जरूरत हो, तो मशीन को दोबारा सैट करें.

* गुड़ाई के काम में आलू बिजाई के बाद 21-25 दिनों से ज्यादा देरी न करें.

* हमेशा साफ पानी में दवा घोलें, ताकि स्प्रे मशीन की नोजल बंद न हो और सही फव्वारे से सभी पत्तियां दवा से तर हो जाएं.

* कीटनाशक दवाओं का उपयोग फसल को बचाने के लिए किया जाता है. परंतु इस से पहले जरूरी है अपनेआप को इन से बचाना, इसलिए छिड़काव करते समय आंखों पर चश्मा, हाथों में दस्ताने व नाक पर मास्क अवश्य लगाएं और हवा की दिशा में स्प्रे करते हुए आगे बढ़ें.

* गुड़ाई, मिट्टी चढ़ाई और ट्रैक्टर से दवाओं का छिड़काव करते समय कम चौड़े (9-10 इंच) टायरों का प्रयोग करें. इस से मेंड़ टूटने से फसल को नुकसान नहीं पहुंचता है.

* खुदाई से 14-15 दिन पहले लताएं काट दें. इस से आलू का छिलका पक जाता है और खुदाई के समय मशीनों से आलू कम छिलता है. ज्यादा नमी वाले खेतों में छिलका आमतौर पर कच्चा रह जाता है. ऐसे में आलू की खुदाई सावधानी से करें.

* डिगर ब्लेड की गहराई चैक कर के इस तरह से सैट करें कि न तो यह आलुओं को काटे और न ही अधिक गहरा चले. ज्यादा गहराई करने से अधिक मिट्टी जाल के ऊपर आने के कारण आलू ठीक से बाहर नहीं निकलते और मिट्टी में ही दबे रह जाते हैं.

* ट्रैक्टर की स्पीड कम या ज्यादा कर के ऐसे सैट करें, ताकि ज्यादा आलू छन कर मिट्टी के बाहर निकल आएं. अगर मिट्टी बहुत हलकी और भुरभुरी हो और जल्दी छनने से आलू डिगर के लोहे के जाल में लगने से छिलता है, तो ऊपरी लिंक लंबी कर के आलू के नुकसान को कम करें. ट्रैक्टर की स्पीड बढ़ा कर जाल के ऊपर ज्यादा मिट्टी आने से भी आलू का नुकसान कम किया जा सकता है.

* खुदाई के तुरंत बाद आलू उठाना शुरू न करें. 3-4 घंटे सूखने दें. इस से आलू के साथ मिट्टी कम आती है.

* श्रमिकों को विशेष ट्रेनिंग दें, ताकि आलू उठाते समय और बालटी/बोरी/ट्रे में भरते समय व ढेर बनाते समय आलुओं को पटकने से कम से कम नुकसान हो.

* सभी मशीनों को सावधानी और सुरक्षापूर्वक चलाएं, क्योंकि जिंदगी बहुत अनमोल है.

कृषि यंत्र का रखरखाव

* मशीनों में तेल व ग्रीस समयसमय पर डालते रहें. इस से घिसाव कम होता है और मशीन अपनी पूरी क्षमता से अधिक समय तक काम करती है.

* चलते समय अगर यंत्र में से कोई अलग तरह की आवाज सुनाई दे, तो तुरंत काम रोक कर मुआयना करें और जरूरत हो तो मरम्मत करवाएं.

* मशीनों की टूटफूट की साथ ही साथ रिपेयर करते जाएं, अन्यथा मशीन और आलू दोनों का नुकसान बढ़ सकता है.

* भंडारण से पहले यंत्रों को जंगरोधी रोगन या तेल लगा कर किसी ऐसी जगह पर रखें, जहां आसपास उर्वरक न हों. ये लोहे को नुकसान पहुंचाते हैं.

फसल के डंठल और जड़ें खेत में मिलाए मोबाइल श्रेडर

फसल कटाई के बाद फसलों की जड़ें खेत में रह जाती हैं, जिन्हें खेत में मिलाना या उखाड़ना मुश्किल काम होता है. इस काम में काफी मेहनत और खर्चा भी होता है. इस फसल अवशेषों का प्रबंधन कृषि यंत्रों से किया जाए तो किसान के लिए यह काम आसान हो जाता है.

‘शक्तिमान’ के नाम से कृषि यंत्र बनाने वाली तीर्थ एग्रो टैक्नोलौजी कंपनी का कहना है कि हाथ से खेत में फसल के डंठल का सफाया करने के लिए प्रति एकड़ 4 एकड़ जनशक्ति की जरूरत पड़ती है. खेत की फसल के डंठल को बाहर खींचने, काटने, जमा करने और सुखाने व जलाने का काम बड़ा ही मुश्किल और समय लेने वाला होता है. साथ ही, यह तरीका ईंधन संसाधनों को बरबाद करने वाला भी है.

इस काम को आसान बनाने वाला कृषि यंत्र मोबाइल श्रेडर है. इस यंत्र से कटे हुए डंठल, फसल अवशेष खेत में फैला कर मिला सकते हैं. इस के अलावा ट्रौली में भी इकट्ठा कर सकते हैं. ईंधन के रूप में भी यह इस्तेमाल कर सकते हैं.

इस मोबाइल श्रेडर से इन कृषि अवशेषों से पेपर पल्प व लकड़ी को औद्योगिक इकाइयों में भी उपयोग में लाया जा सकता है.

यह मोबाइल श्रेडर यंत्र फसल की जड़ों को बारीक काट कर खेत में फैलाने में सक्षम है. नष्ट किए गए फसल अवशेषों से खेत में ही जैविक खाद बनाई जा सकती है, जिस से खेत की मिट्टी में भी सुधार होता है. मिट्टी में नमी बनी रहती है और खेत में घासफूस, खरपतवार की भी रोकथाम होती है.

इस मोबाइल श्रेडर यंत्र को 40 हौर्सपावर या अधिक हौर्सपावर वाले टै्रक्टर के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है, जो एक घंटे में एक एकड़ खेत को कवर कर सकता है.

अधिक जानकारी के लिए किसान फोन नंबर 91-2827661637 पर संपर्क कर सकते हैं.

बागानों में निराईगुड़ाई के लिए इस्तेमाल करें कल्टीवेटर

बागानों में फलदार पेड़ों के नीचे खरपतवार को हटाने की समस्या बनी रहती है, जिस के लिए किसानों को अधिक मेहनत करनी पड़ती है. इस पर ज्यादा मेहनत और रकम भी खर्च होती है. हाथ के औजारों से खरपतवार सही तरीके से हट भी नहीं पाती. यही वजह है कि वहां फिर से खरपतवार पैदा होने का डर बना रहता है. इस तरीके से खरपतवार हटाने में जमीन भी उपजाऊ नहीं बन पाती है. अगर इस के स्थान पर इंटरकल्टीवेटर का उपयोग किया जाए, तो यह ज्यादासुविधाजनक और सस्ता होने के साथ जमीन ज्यादा उपजाऊ बन सकती है.

एग्रीकल्चरर इंटरकल्टीवेटर डीजल या पैट्रोल से चलता है. इसे हाथ से चला कर किसान फलदार पेड़ों के नीचे उगी खरपतवार को पूरी तरह हटा देता है. साथ ही, जमीन को भी उपजाऊ बना देता है. इस की वजह से पेड़ों को पर्याप्त पोषण मिलने की वजह से उन में ज्यादा फल लगते हैं, जिस से किसान की आमदनी बढ़ जाती है.

इंटरकल्टीवेटर में लगे रोटर खरपतवार को काट कर जमीन में मिला देते हैं, जो पेड़ों के लिए खाद का काम करती है. इस कल्टीवेटर को आसानी से इधरउधर घुमा कर पेड़ के नीचे और आसपास उगी खरपतवार पूरी तरह टुकड़ेटुकड़े हो कर मिट्टी में मिल जाती है. जब पानी दिया जाता है, तो खरपतवार के टुकड़े उपजाऊ खाद में बदल जाते हैं. इंटरकल्टीवेटर से खरपतवार साफ करना भी ज्यादा सुविधाजनक होने के साथ सस्ता भी है. एक पेड़ के नीचे से मजदूरों द्वारा खरपतवार हटाने में तकरीबन 30-40 रूपए का खर्चा आता है, जबकि इंटरकल्टीवेटर से खरपतवार हटाने में 10 रुपए से भी कम का खर्चा होता है.

पेड़ों के नीचे के अलावा इन के बीच में बनी जमीन को भी इंटरकल्टीवेटर उपजाऊ बना देता है, क्योंकि कल्टीवेटर में लगे रोटर जमीन को खोद कर उसे इस तरह मिला देते हैं कि जमीन के गुणकारी तत्त्व मिट्टी में बने रहते हैं.

भरतपुर की लुपिन फाउंडेशन संस्था ने वैर पंचायत समिति क्षेत्र के नयावास और गोठरा गांव के 16 किसानों को एग्रीकल्चरर इंटरकल्टीवेटर अनुदान पर मुहैया कराए हैं.

वैसे, इंटरकल्टीवेटर ज्यादामंहगा भी नहीं आता. भारत में निर्मित कंपनियां किसानों को तकरीबन 35,000 रुपए में मुहैया करा रही हैं, जिस में घंटेभर में तकरीबन 1लिटर डीजल की खपत होती है. इस का सब से ज्यादा इस्तेमाल लीची, अनार, अमरूद, नीबू वगैरह बागानों में किया जाता है, क्योंकि इन फलदार पौधों के तने काफी नीचे तक फैल जाते हैं. इन पेड़ों के नीचे उगी खरपतवार को हटाने में काफी परेशानी होती है.

गोठरा गांव के बागान मालिक भगवान सिंह ने बताया कि इंटरकल्टीवेटर हासिल हो जाने के बाद उसे पेड़ों के नीचे निराईगुड़ाई करने में आसानी हुई है और उत्पादन भी तकरीबन 25 फीसदी तक बढ़ गया है. इसी तरह  गोठरा के मान सिंह तो खरपतवार से काफी परेशान था, जिसे इंटरकल्टीवेटर मिलने के बाद वह एक दिन में ही पूरे बागान के पेड़ों के नीचे पैदा हुई खरपतवार को हटाने में सक्षम हो गया है. इस के अलावा वह आसपास की जमीन को भी इंटरकल्टीवेटर के माध्यम से खुदाई कर उपजाऊ बना रहा है.

जांच परख कर लें कृषि यंत्र

अब खेती में बोआई से कटाई तक हर कदम पर मशीनें काम आती हैं. इन के इस्तेमाल से वक्त, पैसा और मेहनत बचती है, पैदावार व कमाई बढ़ती है. खेती की मशीनें किसानों की तरक्की में मददगार साबित हुई हैं.
पहले किसान हल, बैल, कुदाल, हंसिया, खुरपी व फावड़े से खेती करते थे, जिन से काम कम होता था. धीरेधीरे खेती के तौरतरीके बदले. सुधरे हुए औजार और मशीनों का चलन बढ़ा. इन से खेती के मशक्कत भरे काम आसान हुए. लेकिन बड़ी मशीनें खरीदना सब के लिए आसान नहीं है.
बहुत से किसानों को खेती की मशीनें खरीदने के लिए तगड़े सूद पर कर्ज लेना पड़ता है. ऐसे में सम झदारी से काम लेना जरूरी है. अगर सोचसम झ कर कदम न उठाएं तो कई बार मशीनें फायदे की जगह नुकसान का सबब बन जाती हैं.
बहुत से किसानों ने बैंक से कर्ज ले कर ट्रैक्टर खरीदे और उस की किस्त चुकाने में अपनी जमीन गंवा बैठे. अपनी शान दिखाने के लिए फुजूल का दिखावा व दूसरों की देखादेखी कभी न करें. अपनी जेब व जरूरत के मुताबिक फैसला करें कि कब, कहां से कौन सी मशीन खरीदनी है.
बाजार में बहुत सी कंपनियों की मशीनें मौजूद हैं. कंपनियां किसान मेलों वगैरह में अपने स्टौल लगाती हैं, अपने इश्तिहार देती हैं. तसल्ली से पहले पूरी जानकारी करें, ताकि वाजिब दाम में सब से बेहतर मशीन खरीद सकें.
मशीन का मौडल, कूवत, कीमत व खासीयत पता करें. हमेशा किसी अच्छी साख वाली दुकान या कंपनी की एजेंसी से ही मशीन खरीदें, ताकि धोखाधड़ी की गुंजाइश न रहे.
सस्ती लोकल मशीनें हलकी होने के चलते जल्दी खराब होती हैं या वे अचानक कभी भी बीच में धोखा दे जाती हैं और काम रुक जाता है. उन में टूटफूट व मरम्मत का खर्च भी ज्यादा होता है.
आईएसआई या आईएसओ जैसे क्वालिटी निशान लगी मशीनों को तरजीह दें. खरीद के वक्त मशीन के नटबोल्ट और बौडी चैक करें. हो सके तो उसे चला कर देखें और खासकर भीतरी हिस्सों पर नजर डाल लें.
इस्तेमाल की हिदायतों का मैनुअल, तारीख, दस्तखत व मोहर लगा गारंटी कार्ड व पक्की रसीद जरूर लें और उसे संभाल कर रखें.
Machines
मशीनों की सही देखभाल
ज्यादातर किसान खेती में काम आने वाली मशीनों की खास परवाह नहीं करते और वे उन को ठीक से इस्तेमाल भी नहीं करते. धूलकीचड़ में सनी मशीनें यों ही खुले में खड़ी रहती हैं.
खुले में बारिश व धूप की मार सहती रहती हैं. उन्हें धो, पोंछ व सुखा कर, साफसुथरी पौलीथिन से ढक कर किसी छायादार जगह पर रखें. खराबी होने पर किसी अच्छे मेकैनिक को दिखाया जाए, तो मशीनें वक्त पर धोखा नहीं देतीं.
खेती में काम आने वाली मशीनों की सही देखभाल करना कोई महंगा या मुश्किल काम नहीं है. अगर किसान चाहें तो वे इसे आसानी से कर सकते हैं. पड़ोसी देश चीन के किसान इस मामले में बहुत आगे हैं. वे अपनी मशीनों का मोल पहचानते हैं. उन को जान से ज्यादा संभाल कर रखते हैं और ज्यादा फायदा उठाते हैं.
महंगाई के दौर में किसान अगर मशीनों की खरीद, उन के इस्तेमाल व रखरखाव में पूरी सावधानी बरतें, तो वे मशीनों से अपना काम करने के अलावा किराए पर चला कर और फायदा उठा सकते हैं.

सुपर सीडर मशीन : पराली की समस्या से मिले नजात और लाभ

सुपर सीडर के इस्तेमाल से धान की कटाई के बाद खेत में फैले हुए धान के अवशेष को जलाने की जरूरत नहीं होती है. साथ ही, धान की पराली जमीन में ही कुतर कर बिजाई करने से अगली फसल का विकास होता है, जमीन की सेहत भी बेहतर होती है और खाद संबंधी खर्च भी घटता है.

धान की कटाई के तुरंत बाद गेहूं की बोआई करने के लिए उपयोग में आने वाला सुपर सीडर एक यंत्र है. पराली को खेतों से बिना निकाले यह यंत्र गेहूं की सीधी बोआई (बिजाई) करने के काम में लाया जाता है.

हर साल ठंड का महीना शुरू होने के साथ ही उत्तर भारत में प्रदूषण काफी बढ़ जाता है. इस की एक वजह पराली जलाने की समस्या है.

हमारे देश में किसान फसलों के बचे भागों यानी अवशेषों को कचरा समझ कर खेत में ही जला देते हैं. इस कचरे को पराली कहा जाता है. इसे खेत में जलाने से न केवल प्रदूषण फैलता है, बल्कि खेत को भी काफी नुकसान होता है. ऐसा करने से खेत के लाभदायी सूक्ष्मजीव मर जाते हैं और खेत की मिट्टी इन बचे भागों में पाए जाने वाले महत्त्वपूर्ण पोषक तत्त्वों से वंचित रह जाती है.

किसानों का तर्क है कि धान के बाद उन्हें खेत में गेहूं बोना होता है और धान की पराली का कोई समाधान न होने के कारण उन्हें इसे जलाना पड़ता है. पराली जलाने पर कानूनी रोक लगाने के बावजूद, सही विकल्प न होने की वजह से पराली जलाया जाना कम नहीं हुआ है.

Super Seeder
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पराली की समस्या का समाधान

इस समस्या से नजात पाने के लिए सुपर सीडर मशीन वरदान की तरह है. इस मशीन के इस्तेमाल से धान की कटाई के बाद खेत में फैले हुए धान के अवशेष को जलाने की जरूरत नहीं होती है.

सुपर सीडर के साथ धान की पराली जमीन में ही कुतर कर बिजाई करने से अगली फसल का विकास होता है. जमीन की सेहत भी बेहतर होती है और खाद संबंधी खर्च भी घटता है.

इस प्रकार सुपर सीडर मशीन से बोआई पर खर्च कम लगेगा और उत्पादन भी बढ़ेगा. धान की सीधी बिजाई एवं गेहूं की सुपर सीडर से बोआई करने पर कम समय एवं कम व्यय के साथसाथ अधिक उत्पादन एवं पर्यावरण प्रदूषण और जल का संचयन भी आसानी से किया जा सकता है.

सुपर सीडर प्रैस व्हील्स के साथ बोआई और भूमि की तैयारी के संयुक्त अनुप्रयोग के लिए सब से अच्छा आविष्कार है. यह प्रैस व्हील्स के साथ सीड प्लांटर और रोटरी टिलर का कौम्बिनेशन है. सुपर सीडर का काम विभिन्न प्रकार के बीज जैसे सोयाबीन, गेहूं, धान आदि को बोना है. इस के अलावा इस का उपयोग कपास, केला, धान, गन्ना, मक्का आदि की जड़ों और ठूंठ को हटाने के लिए किया जाता है.

सुपर सीडर पराली जलाने पर रोक लगा कर खेती की मौजूदा जरूरतों को पूरा कर सकते हैं. इस यंत्र में बीज की किस्मों को बदलने और बीज को कम करने के लिए एक सीधी मीटरिंग प्रणाली है.

सुपर सीडर मशीन एकसाथ खेत की  बोआई, मल्चिंग और उर्वरक का छिड़काव आदि प्रदान करती है. सुपर सीडर एक अच्छा उपाय है, जो जुताई, बोआई और बीजों को ढंकने के कामों को करती है. इस से किसानों की काम करने की क्षमता और आमदनी के अवसर एक ही बार में बढ़ जाते हैं. यह मशीन धान के ठूंठों को हटाने, उन्हें मिट्टी में मिलाने, जमीन तैयार करने और बीज बोने का अल्टीमेट सौल्यूशन है.

सुपर सीडर मशीन कैसे काम करती है

सुपर सीडर मशीन धान के ठूंठों को हटा कर मिट्टी में मिलाने का काम करती है. सभी किस्मों के बीज बोते हुए जमीन तैयार करती है.

सुपर सीडर मशीन में धान के अवशेषों को कुतरने के लिए एक रोटर और गेहूं बोने के लिए एक जीरो टिल ड्रिल है.

अवशेष प्रबंधन रोटर पर फ्लेल टाइप के सीधे ब्लेड लगे होते हैं, जो बोआई के समय पुआल या ढीले पुआल को काट/दबा/हटा सकते हैं. फिर यह मिट्टी में बीज के उचित स्थान के लिए प्रत्येक टाइन को रोटर के एक चक्कर में 2 बार साफ करता है. साथ ही, बीज वाली कतारों के बीच अवशेषों को यथासंभव सतह पर धकेलते हैं.

यह मशीन कार्यशक्ति के हिसाब से 35 से 65 हौर्सपावर के ट्रैक्टर से चलाई जा सकती है. इस में बोआई के समय फसलों की दूरी और गहराई भी सुनिश्चित की जा सकती है.

ये पीटीओ संचालित सर्वश्रेष्ठ सुपर सीडर मशीनें उपयुक्त काम कर सकती हैं, सभी निम्न से उच्च एचपी ट्रैक्टर 0.3-0.4 हेक्टेयर प्रति घंटा से अधिक की दूरी तय कर सकते हैं.

सुपर सीडर की खासियत है कि एक बार की जुताई में ही बोआई हो जाती है. पराली की हरित खाद बनने से खेत में कार्बन तत्त्व बढ़ जाता है और इस से अच्छी फसल होती है. इस विधि से बोआई करने पर तकरीबन 5 फीसदी उत्पादन बढ़ सकता है और 50 फीसदी बोआई लागत कम होती है.

पहले बोआई के लिए 4 बार जुताई की जाती थी. ज्यादा श्रम शक्ति भी लगती थी. सुपर सीडर यंत्र से 10 से 12 इंच तक की ऊंची धान की पराली को एक ही बार में जोत कर गेहूं की बोआई की जा सकती है, जबकि किसान धान काटने के बाद 5-6 दिन जुताई कराने के बाद गेहूं की बोआई करते हैं. इस से गेहूं की बोआई में ज्यादा लागत आती है, जबकि सुपर सीडर यंत्र से बोआई करने पर लागत में भारी कमी आती है.

सुपर सीडर मशीन की विशेषताएं

* सुपर सीडर मशीनें सब से कुशल और विश्वसनीय फार्म इक्विपमेंट हैं, जो कृषि उत्पादकता बढ़ाने में मदद करती हैं. वे किफायती, कुशल हैं और उच्च कृषि उपज में मदद करते हैं.

सुपर सीडर मशीनों की कुछ विशेषताएं इस तरह से हैं :

* ट्रैक्टर से चलने वाली सुपर सीडर मशीन बीज बोने में मददगार साबित हुई है. यह धान के ठूंठों को हटा कर, मल्चिंग के लिए मिट्टी में मिला कर और उचित गहराई और दूरी पर बीज बो कर मिट्टी तैयार करता है.

* मीटरिंग डिवाइस को मजबूत और बेहतर प्रदर्शन के लिए कच्चा लोहा और एल्यूमीनियम के साथ निर्मित किया जाता है.

* मौडर्न सुपर सीडर में जेएलएफ-टाइप के ब्लेड होते हैं, जो मिट्टी और अवशेषों को प्रभावी ढंग से मिलाने की अनुमति देते हैं.

* ट्रैक्टर सुपर सीडर इंप्लीमैंट का एक स्पैशल डिजाइन और बिल्ट क्वालिटी है, जो कठोर मिट्टी की स्थिति में भी प्रभावी प्रदर्शन करता है.

* यह एक पैमाइश तंत्र के साथ आता है, जो किसी भी बीज की बरबादी के बिना बीज की बोआई को आसान और तेज बनाता है.

* इस मशीन से एक बार की जुताई में ही बोआई हो जाती है.

* मशीन की मदद से पराली की हरित खाद बनाई जाती है, जिस से खेत में कार्बन तत्त्व बढ़ जाता है और फसल अच्छी होती है.

* इस विधि से बोआई करने पर फसल का तकरीबन 5 फीसदी उत्पादन बढ़ कर मिलता है.

* बोआई की लागत तकरीबन 50 फीसदी से भी कम होती है.

* श्रम शक्ति कम लगती है.

* इस मशीन से 10 से 12 इंच तक की ऊंची धान की पराली को एक ही बार में जोत कर गेहूं की बोआई कर सकते हैं.

* किसान धान काटने के बाद 5-6 दिन जुताई कराने के बाद गेहूं की बोआई कर सकते हैं.

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सुपर सीडर मशीन के लाभ

सुपर सीडर एक मल्टीपर्पज फार्म इंप्लीमैंट है, जो निम्नलिखित तरीकों से मदद करता है :

* यह गेहूं, सोयाबीन, या घास के विभिन्न प्रकार के बीजों को लगाने में मदद करता है.

* धान के पुआल की खेती में यह मदद करता है. गन्ना, धान, मक्का, केला आदि फसलों की जड़ों और ठूंठ को यह हटाता है.

* यह चावल के भूसे को काटने और उठाने में मदद करता है. जमीन में गेहूं बोता है और बोआई क्षेत्र में पलवार को फैलाने में मदद करता है.

* यह अवशेषों को जलाने से रोकने और पर्यावरण की रक्षा करने का एक अद्वितीय समाधान है.

* सुपर सीडर मशीन को चलाना और संभालना आसान है. यह कल्टीवेशन, मल्चिंग, बोआई और उर्वरक को एकसाथ फैलाने के कार्यों को करता है. वे टाइन और डिस्क मौडल में उपलब्ध हैं.

* रबी फसल जैसे गेहूं की परंपरागत तरीके से बोआई के बजाय सुपर सीडर से बोआई में लागत कम आती है. वैसे, धान की कटाई के उपरांत रबी फसल की बोनी के लिए 15 दिन का समय लगता है.

* इस तकनीक से बोआई करने पर सिंचाई की पानी में भी बचत होती है और खेतों में खरपतवार कम होते हैं.

* सुपर सीडर पर्यावरण के अनुकूल है, क्योंकि यह पानी बचाने में मदद करता है और मिट्टी और जमीन को अधिकतम लाभ प्रदान करता है. यह धान के अवशेषों के साथ मल्चिंग में मदद करता है. आवश्यकता के आधार पर इस का उपयोग जुताई के लिए भी किया जा सकता है. इन मशीनों के लिए कम निवेश की आवश्यकता होती है और किसानों के महत्त्वपूर्ण पैसे की बचत होती है.

सुपर सीडर अल्टीमेट मौडर्न फार्मिंग सौल्यूशन है, जो फसल अवशेषों को जलने से रोकता है. चूंकि यह एक बार में जुताई, बोआई और सीडबेड कवरिंग के तीन कार्यों को करता है, इसलिए किसानों को अलगअलग मशीनों में निवेश करने की आवश्यकता नहीं होती है. इस से उन के पैसे की बचत होती है और उन की उत्पादन क्षमता में इजाफा होता है.

सिंचाई की बचत

सीधी बिजाई/बोआई से धान में तकरीबन 30 फीसदी तक पानी की बचत होती है, जबकि गेहूं की फसल में एक सिंचाई की बचत होती है. इस मशीन के उपयोग से किसानों की परंपरागत कृषि पद्धतियों की अपेक्षा लगभग 3 से 5 फीसदी अधिक अनाज की उपज होती है.

इस तकनीक में जहां एक ओर खेत तैयार करने में लगे समय, पैसे और ईंधन की बचत होती है, तो वहीं दूसरी ओर यह पर्यावरण हितैषी भी है.

उत्पादन में बढ़ोतरी

धान की लंबी अवधि वाली प्रजातियों की कटाई के बाद नहर सिंचित क्षेत्रों में नमी अधिक होने के कारण जुताई एवं बोआई द्वारा खेत तैयार करने में देरी होती है, जिस से उत्पादन भी कम होता है. धान की फसल की कटाई के बाद खड़ी ठूंठ में बिना जुताई के पंक्तियों से बोआई करने से लागत कम लगती है. साथ ही, डेढ़ गुना अधिक उत्पादन प्राप्त होता है.

परती खेतों में बोआई करने से सिंचाई के पानी की बचत होगी और खरपतवार कम होंगे. कतार में बोते समय बीज एक निश्चित अंतराल की गहराई पर गिरता है. एक एकड़ के लिए 40 किलोग्राम गेहूं के बीज और 50 किलोग्राम डीएपी की जरूरत होती है.

फरवरी महीने में जब गरम हवा चलती है, तो सिंचाई करने पर फसल नहीं गिरती. इतना ही नहीं, लाइन में आसानी से फसल बोई जा सकती है. लागत में 4,000 रुपए प्रति हेक्टेयर की कमी कर के बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है. साथ ही, गेहूं की बोआई कम समय और कम खर्च के साथसाथ अधिक उत्पादन मिलता है.