Farmer Felicitation: कृषि विज्ञान केंद्र लखनऊ ने किया किसानों को सम्मानित

Farmer Felicitation: कृषि विज्ञान केंद्र लखनऊ किसान दिवस पर तहसील मलिहाबाद के ब्लॉक माल के ग्राम सरसंडा में किसान सम्मान दिवस के अवसर पर भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया. जिसमें किसान दिवस मनाने के साथसाथ किसानों को भी सम्मानित (Farmer Felicitation) किया गया.

कौन थे अतिथि

कार्यक्रम का उद्घाटन निदेशक डॉक्टर दिनेश सिंह भारतीय गन्ना अनुसंधान परिषद लखनऊ द्वारा किया गया और कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि वैज्ञानिक डॉ मनीष मिश्र केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान लखनऊ मौजूद रहे. कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि मंत्री का लाइव कार्यक्रम भी प्रसारित किया गया. साथ स्वच्छता पखवाडा होने पर किसानों को स्वच्छता अभियान की शपथ ग्रहण कराई गई.

Farmer Felicitation

कृषि तकनीक अपनाने से अधिक लाभ

समारोह को संबोधित करते हुए डॉक्टर दिनेश सिंह ने कहा कि, किसानों की मेहनत और उन्नत कृषि तकनीकों के प्रयोग से देश की खाद्य सुरक्षा मजबूत हुई है. चौधरी चरण सिंह ने किसानों के हितों के लिए कई महत्वपूर्ण नीतियां और सुधार लागू किए थे.

दिनेश सिंह ने किसानों को मौसम के अनुसार फसल चक्र अपनाने, जैविक खेती, ड्रिप इरिगेशन जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग करने और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए प्रेरित किया. इस आयोजन का मकसद किसानों की समस्याओं को समझना और कृषि क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देना था.

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महिला किसान बन रहीं आत्मनिर्भर

कृषि विज्ञान केंद्र लखनऊ के वैज्ञानिक डॉ. अखिलेश कुमार दुबे ने कहा कि, महिला किसान भी कृषि क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं. महिला किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए केंद्र द्वारा कई प्रशिक्षण और योजनाएं भी चलाई जा रही हैं. उन्होंने महिला किसानों को स्वरोजगार, सब्जी उत्पादन, मशरूम की खेती तथा पशुपालन से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया.

Farmer Felicitation

किसानों को मिला सम्मान

इस कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों के योगदान को सम्मानित करना भी था. इस अवसर पर महिला किसानों के साथ आम उत्पादक किसान व tafari फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड लतीफपुर मलिहाबाद लखनऊ के निदेशक अतुल कृष्ण अवस्थी, उत्कृष्ट फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड के निदेशक सतीश सिंह, राजकुमार सिंह अमलौली,आशीष द्विवेदी, मनीष रावत आदि को आम उत्पादन व विपणन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए सम्मानित (Farmer Felicitation) किया गया.

Irrigation Technique: ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ सिंचाई की खास तकनीक

Irrigation Technique : दुनिया-भर में दिनों-दिन पानी की कमी होती जा रही है. ऐसे में भारत भी इससे अछूता नहीं है. खासकर पारंपरिक तरीके से की गई खेती में पानी की अधिक बरबादी होती है. परंतु अब तकनीक का दौर है तो खेती की सिंचाई के तौर-तरीके भी बदल रहे हैं. सरकार भी सिंचाई की अनेक आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा देने के लिए अनेक योजनाएं चलाती है. ऐसी ही एक खास योजना ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ है. जानिए इस योजना के बारे में क्या है इसमें खास और किसान कैसे इस तकनीक का लाभ लें.

पानी की बचत और ज्यादा उत्पादन

इस सिंचाई पद्धति (Irrigation Technique) को अपनाकर किसान 40 से 50 फीसदी तक पानी की बचत कर सकते हैं, साथ ही 30 से 40 फीसदी तक उत्पादन में भी बढ़ोतरी होती है. खेती में सरकार की ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ माइकोइरीगेशन योजना के तहत ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली को प्रभावी ढंग से विभिन्न फसलों में अपनाने हेतु प्रोत्साहित किया जा रहा है.

बूंद-बूंद का इस्तेमाल

इस खास तकनीक को बूंद-बूंद सिंचाई और फव्वारा सिंचाई भी कहा जाता है. इस तकनीक में बूंद-बूंद पानी सिंचाई के काम आता है और पानी की बिलकुल बर्बादी नहीं होती, इसलिए जहां पानी की कमी है, वहां के लिए तो यह तकनीक बहुत ही फायदेमंद है.

क्या है ड्रिप इरीगेशन पद्धति

फसल के अनुसार सिंचाई तकनीक का करें इस्तेमाल. इसमें मिनी, पोर्टेबल, सेमी परमानेंट एवं रेनगन स्प्रिंकलर अलग-अलग सिंचाई के तरीके हैं, लेकिन सभी पानी की बचत के साथ-साथ अच्छी फसल उत्पादन देने में मदद करते हैं.

Irrigation Technique

कौन-सी फसलों में अपनाएं यह तकनीक

बागबानी / फल उद्यान फसलें – आम, अमरूद, आंवला, नीबू, बेल, बेर, अनार, अंगूर, आड़ू, लोकाट, आलूबुखारा, नाशपाती, पपीता एवं केला आदि.

सब्जियां – टमाटर, बैगन, भिंडी, मिर्च, शिमला मिर्च, गोभीवर्गीय, कद्दूवर्गीय एवं अन्य इसी तरह की खेती में कारगर.

सुगंधित एवं औषधीय फसलें – रजनीगंधा, ग्लेडियोलस, गुलाब और औषधीय एवं सुगंधित अन्य फसलों में भी.

अन्य फसलें – आलू, गन्ना और भी कई फसलों में इस योजना के तहत लाभ उठाकर सिंचाई की जा सकती है.

कैसे ले सकते हैं योजना का लाभ

‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ योजना का संचालन वेब बेस्ड UPMIP पोर्टल के माध्यम से किया जा रहा है. जो किसान इसका लाभ लेना चाहते हैं वे www.upmip.in पोर्टल पर पंजीकरण करवा सकते हैं और सूक्ष्म सिंचाई पद्धति (Irrigation Technique) का लाभ ले सकते हैं. इसके लिए 10 से 90 फीसदी तक अनुदान मिलता है, जो फसल के अनुसार अलग – अलग होता है.

आज के समय पानी खेती की सबसे बड़ी जरूरत है. अगर समय पर फसल को पानी नहीं मिला तो फसल बर्बाद होते समय नहीं लगता. ऐसे में सिंचाई योजनाओं को अपनाना किसानों के लिए फायदे की बात है.

Drip Irrigation Technique: तकनीक से पाएं गन्ने की बंपर पैदावार

गन्ना भारत की प्रमुख नकदी फसलों में से एक है और इसका उत्पादन लाखों किसानों की आजीविका का आधार है. यह फसल न केवल चीनी उद्योग के लिए खास है, बल्कि देश के ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के अवसर भी प्रदान करती है. गन्ने की खेती में पानी की अत्यधिक जरूरत होती है, लेकिन जलवायु परिवर्तन, कम वर्षा, गन्ना किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुकी है. ऐसे में गन्ने की खेती करना किसानों के लिए मुश्किल होता जा रहा है.

लेकिन अब तरक्की के दौर में कम पानी में खेती करने की अनेक उन्नत तकनीकें कृषि क्षेत्र में आ गई हैं. जरूरत है इन्हें समझने और अपनाने की. हम बताने जा रहे हैं यहां एक ऐसी सिंचाई तकनीक के बारे में, जिसको अपनाने से कम पानी में भी मिलेगी गन्ने से भरपूर पैदावार.

बूंद-बूंद सिंचाई पद्धति

गन्ने की खेती में जल प्रबंधन को बेहतर बनाने, उत्पादकता बढ़ाने और संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने में ड्रिप इरिगेशन एक आधुनिक सिंचाई तकनीक है. इस तकनीक में बंद-बूंद पानी का इस्तेमाल होता है. ऐसे में यह तकनीक किसी संजीवनी से कम नहीं है.

क्या है ड्रिप इरिगेशन तकनीक

ड्रिप इरिगेशन एक उन्नत सिंचाई तकनीक है, जिसमें पानी को सीधे पौधों की जड़ों तक बूंद-बूंद करके पहुंचाया जाता है. यह प्रणाली विशेष रूप से उन फसलों के लिए उपयुक्त है जिनकी पानी की आवश्यकता नियंत्रित और सटीक रूप से पूरी की जा सकती है.

गन्ने जैसी फसलों में, जहां पानी की खपत अधिक होती है, ड्रिप इरिगेशन विधि से पानी का सही उपयोग किया जाता है और जल की बरबादी नहीं होती. इस प्रणाली में मुख्य रूप से पाइप, नलिकाएं और ड्रिपर का उपयोग होता है, जो खेत के प्रत्येक पौधे की जड़ों तक पानी पहुंचाते हैं. इस तकनीक में पानी को नियंत्रित कर सिंचाई की जाती है. इस में पानी की बरबादी बिलकुल नहीं होती.

गन्ने में ड्रिप इरिगेशन से क्या है फायदा

गन्ने की खेती में ड्रिप इरिगेशन के कई फायदे हैं, जो न केवल पर्यावरणीय दृष्टिकोण से खास हैं, बल्कि किसानों की आर्थिक स्थिति को भी मजबूत करते हैं. पानी की बूंद-बूंद का इस्तेमाल सिंचाई में होता हैऔर पानी की बरबादी नहीं होती.

पानी की हर बूंद का होता है इस्तेमाल

सामान्यतौर पर गन्ने की फसल को अधिक पानी की आवश्यकता होती है, और पारंपरिक तरीके से सिंचाई करने पर पानी की बहुत बरबादी होती है, जबकि ड्रिप सिंचाई में पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है, जिससे पानी का व्यर्थ बहाव कम होता है और पानी की बचत होती है. इससे गन्ना किसानों को पानी की कमी से बचने में मदद मिलती है, विशेषकर ऐसे क्षेत्रों में जहां सिंचाई के लिए सीमित जल संसाधन हैं या कम पानी है.

मिलती है अधिक उपज

जब गन्ने को नियमित रूप से, लेकिन नियंत्रित तरीके से पानी मिलता है, तो इसकी जड़ें स्वस्थ रहती हैं और पौधों की बढ़वार में मदद मिलती है. इसके परिणामस्वरूप, उपज में बढ़त होती है और गन्ने की गुणवत्ता भी बेहतर होती है.

इस तकनीक में नहीं पनपते खरपतवार

ड्रिप इरिगेशन तकनीक से सिंचाई करने पर पानी केवल पौधों की जड़ों तक सीधा पहुंचता है, जिससे खेत के अन्य हिस्सों तक पानी नहीं फैलता और खरपतवारों को पनपने का मौका ही नहीं मिलता. अगर कहीं कुछ खरपतवार उगते भी हैं तो उनको बड़ी ही सरलता से नष्ट किया जा सकता है.

किसान की बचत ही बचत

पारंपरिक सिंचाई विधियों में समय और श्रम की अधिक आवश्यकता होती है, जबकि ड्रिप इरिगेशन में एक बार सिस्टम स्थापित हो जाने के बाद, सिंचाई प्रक्रिया स्वचालित और नियंत्रित होती है. इससे किसानों की मेहनत और समय की बचत होती है. पानी की भी बचत होती है.

मिट्टी में होता है सुधार

पारंपरिक सिंचाई में पानी की अधिकता से उपजाऊ मिट्टी की ऊपरी सतह बह सकती है, जबकि ड्रिप इरिगेशन से मिट्टी की संरचना बनी रहती है और जल प्रवाह संतुलित होता है. इससे मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी नहीं होती और भूमि का स्वास्थ्य बेहतर रहता है.

कैसे करें तैयारी :

सबसे पहले, खेत की समतलता का ध्यान रखा जाता है. यदि खेती की जमीन में कोई असमानताएं हैं, जमीन समतल नहीं है तो उसे ठीक किया जाता है, ताकि पानी का बहाव एकसमान हो. खेत में नालियां भी बनाई जाती हैं, ताकि पानी का बहाव सही दिशा में हो सके.

पाइपलाइन और ड्रिपलाइन को बिछाना

ड्रिप इरिगेशन में पाइपलाइन और ड्रिपलाइन की सही स्थापना खास होती है. इन पाइपलाइनों में पानी का प्रवाह नियंत्रित किया जाता है. ड्रिपलाइन को खेत में हर पौधे के पास रखा जाता है, ताकि पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंच सके.

फिल्टर और पंप सिस्टम हो उत्तम

पानी की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए फिल्टर का उपयोग किया जाता है, जिससे पौधों तक पानी पहुंचने में कोई अवरोध न हो. पंप सिस्टम का चयन भी खास है, क्योंकि यह पानी की आपूर्ति की गति और दबाव को नियंत्रित करता है.

Drip Irrigation Technique

नियंत्रण और मॉनिटरिंग जरूरी

ड्रिप इरिगेशन सिस्टम को खेत में लगाने के बाद इसकी नियमित रूप से परीक्षण और मॉनिटरिंग करना आवश्यक होता है. किसानों को यह सुनिश्चित करना होता है कि सिस्टम में कोई गड़बड़ी न हो और पानी का प्रवाह सही ढंग से हो रहा हो.

ड्रिप इरिगेशन प्रणाली में सब्सिडी का उठाएं लाभ

ड्रिप इरिगेशन प्रणाली की स्थापना की शुरुआत में कुछ निवेश की आवश्यकता होती है, जैसे पाइपलाइनों, पंप और फिल्टर की लागत आदि, जो आपको कुछ महंगा लग सकता है, लेकिन यह सिस्टम एक बार लगाने के बाद लंबे समय तक इस्तेमाल किया जाता है और सरकार द्वारा इसे लगाने पर सब्सिडी का लाभ भी दिया जाता है, इसलिए यह घाटे का सौदा नहीं होता. दीर्घकालिक लाभ इस निवेश को उचित ठहराते हैं. इस प्रणाली से जल, उर्वरक, ऊर्जा और श्रम की बचत होती है, जिससे कुल उत्पादन लागत में कमी आती है और किसानों की आय में वृद्धि होती है.

भारत सरकार और राज्य सरकारें भी ड्रिप इरिगेशन को बढ़ावा देने के लिए कई प्रकार की सब्सिडी और वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं, जिससे किसानों को इस प्रणाली को अपनाने में सहायता मिलती है.
गन्ने की खेती में ड्रिप इरिगेशन एक प्रभावी और लंबे समय तक साथ देने वाली तकनीक है. यह न केवल जल की बचत करती है, बल्कि फसल की गुणवत्ता और उपज में भी बढ़ोतरी होती है. इस प्रणाली को अपनाकर किसान अपनी फसल की उत्पादकता को बढ़ा सकते हैं.

हालांकि, इसको लगाने में शुरुआती खर्च अधिक हो सकता है, लेकिन इसके दीर्घकालिक लाभ किसान की आय में इजाफा और उत्पादन में सुधार लाते हैं. यदि इस सिस्टम को सही तरीके से स्थापित और संचालित किया जाए, तो ड्रिप इरिगेशन गन्ने की खेती को एक नई दिशा दे सकता है, जिससे कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव संभव है.

Fennel Cultivation : बढ़िया कमाई देती सौंफ की खेती

Fennel Cultivation : राजस्थान के जोधपुर जिले के बिलाड़ा क्षेत्र के एक प्रगतिशील किसान कुन्नाराम ने सौंफ की सफल खेती (Fennel Cultivation) कर के अच्छी कमाई की है. कुन्नाराम के पास 10 बीघा जमीन है और वे साल 1982 में 10वीं जमात पास करने के बाद से ही खेतीबारी के काम में जुट गए थे.

कुन्नाराम पिछले तकरीबन 5 साल से सौंफ की खेती (Fennel Cultivation) कर रहे हैं. उन्होंने सौंफ की खेती के लिए उन्नत बीज लिया और अच्छी तरह जुताई कर उस में 2 ट्रॉली प्रति बीघा की दर से गोबर की देशी खाद का इस्तेमाल किया.

कुन्नाराम सौंफ की बोआई जुलाई के आखिरी हफ्ते में करते हैं और जरूरत के मुताबिक फसल की सिंचाई करते हैं. उन्होंने सिंचाई के लिए ‘बूंदबूंद सिंचाई पद्धति’ अपनाई है.

कुन्नाराम सौंफ की फसल में रसायनों का इस्तेमाल बिलकुल नहीं करते हैं. वे सौंफ की पूरी खेती जैविक तरीके से ही करते रहे हैं. वे खेती के साथसाथ पशुपालन भी करते हैं, जिस से उन्हें अपने घर की ही देशी खाद भी मिल जाती है.

कुन्नाराम बताते हैं कि सौंफ की फसल के गुच्छों की कटाई वे 3 बार 7 से 10 दिन के अंतराल पर करते हैं और 3 बार गुच्छों की कटाई करने के बाद चौथी बार में पूरी फसल काट लेते हैं और उस में से सौंफ को अलग कर लेते हैं. इस तरह वे कुल 4 बार सौंफ के गुच्छों की कटाई करते हैं.

कटाई के बाद सौंफ के गुच्छों को छाया में रस्सी पर सूखने से सौंफ का हरापन बना रहता है. इस के बाद पक्के फर्श पर सौंफ को गुच्छों से अलग कर लिया जाता है.

सौंफ मसाला फसल है. इसे औषधीय फसल भी कहा जाता है. इसे मसाले के रूप में और सीधा भी खाने के काम में लिया जाता है.

इस साल कुन्नाराम ने कुल 10 बीघा में सौंफ की खेती (Fennel Cultivation) की, जिस का उत्पादन कुल 150 मन प्राप्त किया यानी एक बीघा में कुल 6 क्विंटल पैदावार हुई. बाजार में बिलाड़ा मंडी में इस बार उन्हें 13,000 रुपए प्रति क्विंटल का भाव मिला, तो एक बीघा में कुल 78,000 रुपए की पैदावार मिली. खेती के सभी खर्च निकाल कर कुल 35 से 50 हजार रुपए की शुद्ध आय प्रति बीघा मिली है. इस प्रकार उन्हें सौंफ की खेती से हर साल साढ़े 3 लाख से 4 लाख रुपए तक का कुल शुद्ध लाभ मिल जाता है. इस फसल को कृषि विभाग के अधिकारियों, वैज्ञानिकों और प्रगतिशील किसानों ने देखा और सराहा.

कुन्नाराम बताते हैं कि उन्होंने कृषि विभाग के प्रशिक्षणों में नवीन तकनीक को जानने ले लिए भाग लिया. पड़ोसी राज्य गुजरात में भी सौंफ की खेती और नवीनतम तकनीक अपनाई.

कुन्नाराम के पड़ोसी ओमप्रकाश और मांगीलाल ने उन से सीख ले कर सौंफ की अच्छी खेती की है. पिचियाक गांव के बुधाराम, मिश्रीलाल दगलाराम बताते हैं कि सौंफ की खेती (Fennel Cultivation) से उन्होंने भी 30,000 रुपए प्रति बीघा की दर से शुद्ध आय मिल जाती है.

बिलाड़ा क्षेत्र के कृषि अधिकारी भीखाराम बताते हैं कि सौंफ की खेती (Fennel Cultivation) किसानों की अच्छी कमाई दे रही है, इसलिए बिलाड़ा पंचायत समिति में सौंफ की खेती का रकबा बढ़ा है और सौंफ की खेती का कुल रकबा 800 हेक्टेयर तक पहुंच गया है. खरीफ में कपास, मूंग, तिल, ज्वार की खेती करते हैं और रबी में ज्यादातर किसान सौंफ और जीरा की फसल लेते हैं.

कुन्नाराम की जैविक खेती देख कर पड़ोसी गांव के किसानों ने भी इसे अपनाने की सोची. गांव रामपुरिया के किसान चुन्नीलाल बताते है कि सौंफ में बूंदबूंद सिंचाई से कालिया रोग (ब्लाइट) और गूंदिया वोग (गमोसिस) का नियंत्रण हो जाता है. इस प्रकार बिलाड़ा, पिचियाक, खारिया, जेलवा, भानी, उचियाडा रामपुरिचा गांवों में भी सौंफ की खेती (Fennel Cultivation) से किसानों की अच्छी कमाई हो जाती है.

अधिक जानकारी के लिए आप कुन्नाराम के मोबाइल नंबर 941366051 और लेखक के मोबाइल नंबर में 9414921262 पर संपर्क कर जानकारी ले सकते हैं.

Gummosis : नीबू वर्गीय पौधों में गमोसिस रोग

Gummosis : नीबू वर्गीय पौधों में गमोसिस (Gummosis) रोग अकसर हो जाता है. गमोसिस पौधों में कई तरह की वजहों से हो सकता है, जिन में तत्त्वों की कमी, फफूंदी, शाकाणुओं व विषाणुओं का प्रकोप मुख्य हैं. फाइटोफ्थोरा नाम के फफूंद से नीबू वर्गीय पौधों में गमोसिस (गोंदाति रोग) होता है, इसे भूरा सड़न, गमोसिस पद सड़न, कौलर रोट, जड़ सड़न, फल सड़न जैसे कई नामों से जाना जाता है. यह रोग महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, मैसूर, असम, पंजाब व राजस्थान के कई भागों में पाया जाता है. यदि समय पर रोग की रोकथाम न की जाए तो पौधा मर जाता है.

रोग के लक्षण : गमोसिस (Gummosis) खासतौर से तने व शाखाओं पर लगने वाली बीमारी है. रोग लगे पौधे के हिस्सों से गोंद का निकलना ही इस का मुख्य लक्षण है. सब से पहले रोग का असर पौधे के तने के निचले भाग पर जमीन से लगने वाले हिस्से के पास होता है, फिर चारों तरफ फैल कर नीचे जड़ व तने की तरफ बढ़ता है, जिस से छाल व लकड़ी दोनों ग्रसित होते हैं. बारिश के मौसम में गोंद पानी से धुल कर नीचे गिर जाता है और जमीन से मिल जाता है, इसलिए लक्षण साफ नहीं दिखाई पड़ते हैं. गरमी में रोग लगे हिस्से पर गोंद का इकट्ठा होना रोग के लक्षण को साफ दर्शाता है. रोग लगे तने व शाखाओं पर छिलका फट जाता है और सूख जाता है. इन फटी हुई धारियों में से गोंद निकलता है. यदि रोग का असर जमीन के अंदर जड़ पर होता है, तो रोग के लक्षण शुरू में दिखाई नहीं पड़ते, लेकिन जड़ गलने से जड़ों का काफी हिस्सा बेकार हो जाता है. मुख्य तने व जड़ों पर इस रोग के असर से पेड़ सूखने लगता है. पेड़ों के मरने से पहले उन के ऊपर काफी फूल आते हैं, लेकिन फल छोटे बनते हैं और पकने से पहले गिर जाते हैं. रोग लगे पेड़ों की पत्तियों पर तत्त्वों की कमी के लक्षण दिखाई पड़ते हैं. पत्तियों की नसें पीली पड़ जाती हैं और वे पकने से पहले गिर जाती हैं. रोग का असर बिना पके, पकने वाले व पके फलों पर भी पहुंच जाता है. फलों पर पानी के धब्बे से दिखाई पड़ते हैं. ऐसे रोग लगे फल मुलायम होते हैं व उन के ऊपर फफूंद लगी हुई दिखाई पड़ती है. कुछ दिनों बाद फल गिर जाते हैं व उन फलों पर भी फफूंद उगती रहती है.

रोग कैसे लगता व फैलता है

Gummosis रोग जमीन से पैदा होता है. पेड़ों के पास जमीन में फाइटोफ्थोरा नामक कवक की मौजूदगी में सही नमी, खुराक व तापमान मिलने पर रोग के बीजाणु संक्रमण करते हैं. यह कवक गिरे हुए फलों पर, शाखाओं पर, पत्तियों पर या फटे हुए पेड़ के हिस्सों पर भी ठिकाना पाता है. कवक के बीजाणु हवा द्वारा, बारिश की बूंदों द्वारा, सिंचाई के पानी द्वारा और कीटों द्वारा रोगी पेड़ों से स्वस्थ पेड़ों तक जाते हैं. भारी मिट्टी में ज्यादा नमी, भूमि का पीएच 5.4-7.4 और तापमान 24 डिगरी सेंटीग्रेड रोग पैदा होने के खास कारण हैं. ग्राफ्टिंग ज्यादा नीचे करने या जमीन के अधिक पास बड लगाने से भी रोग लग जाता है.

Gummosis

गमोसिस (Gummosis) रोग की रोकथाम

* नीबू वर्गीय पेड़ों का बाग लगाने के लिए जमीन का चुनाव ऐसी जगह पर करना चाहिए, जहां पानी इकट्ठा न रहता हो, जिस से जमीन में ज्यादा नमी न रह सके जोकि रोग का खास कारण है.

* रोगरोधी रूट स्टौक खट्टी का इस्तेमाल करना चाहिए.

* बड 30 से 40 सेंटीमीटर ऊंची लगानी चाहिए.

* सिंचाई करने की योजना इस प्रकार बनानी चाहिए कि एक पेड़ के नीचे से पानी दूसरे में न जाए. बूंदबूंद सिंचाई फायदेमंद होती है.

* हर साल पेड़ का मुख्य तना बोर्डो पेस्ट से करीब 70 सेंटीमीटर ऊंचाई तक पोतना चाहिए.

* बाग की सफाई बहुत जरूरी है.

* सभी रोग लगे फलों व पत्तियां (जोकि जमीन पर गिर जाते हैं) को इकट्ठा कर के नष्ट कर देना चाहिए.

* गरमी व बरसात के समय बाग में पेड़ों पर कापर फफूंदनाशी जैसे बोर्डो मिक्सचर 4:4:50 या कापर आक्सीक्लोराइड या ब्लाइटोक्स 50 (0.3 फीसदी) या रिडोमिल (0.2 फीसदी) का छिड़काव करते रहना चाहिए.

* खड़े पेड़ों से रोग को हटाना केवल तभी मुमकिन है, जबकि रोग की शुरुआत में ही पहचान हो जाए. यदि रोग पहली शाखाओं पर है, तो उन्हें काट कर नष्ट कर देना चाहिए. रोग की शुरुआती अवस्था में रोगी जड़ों को हटा दें व जमीन में जाइनेब 0.2 फीसदी या केप्टान या रिडोमिल 0.2 फीसदी घोल जड़ों के पास डालें.

* मोटी शाखाओं व मुख्य तने पर रोग लगे भाग को तेज धार वाले चाकू से हटा दें व घाव को पोटेशियम परमैगनेट (लाल दवा) के घोल से साफ करें, फिर बोर्डो पेस्ट या रिडोमिल एम जेड 0.2 फीसदी घाव पर लगाएं.

Shubhavari Chauhan : एक युवा किसान की प्रेरणादायक कहानी

Shubhavari Chauhan : भारत की कृषि परंपरा सदियों पुरानी है, लेकिन आधुनिक समय में इसे वैज्ञानिक और व्यावसायिक दृष्टिकोण के साथ अपनाने वाले किसान कम ही हैं, खासकर युवा और महिलाएं. ऐसे ही एक प्रेरणास्रोत का नाम है शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan). उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले की इस युवा महिला किसान ने न केवल कम उम्र में जैविक खेती को अपनाया, बल्कि गाय के घी और अन्य कृषि उत्पादों के माध्यम से देशविदेश में अपनी पहचान बनाई है.

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) का जन्म 4 अप्रैल, 2005 को उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के कोठड़ी गांव में हुआ था. उन का पालनपोषण एक शिक्षित एवं कृषि प्रेमी परिवार में हुआ. उन के पिता संजय चौहान कृषि के विशेषज्ञ हैं, जिन्होंने एम.एस.सी के बाद भी खेती को अपने जीवन का ध्येय बनाया. उन की माता ममता चौहान संस्कृत में स्नातकोत्तर हैं और परिवार में भारतीय संस्कृति व पारंपरिक ज्ञान का गहरा प्रभाव है.

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) की प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही विद्यालय से हुई. फिलहाल वह सहारनपुर के मुन्ना लाल गर्ल्स डिग्री कालेज से बी.ए. फाइनल ईयर की छात्र हैं. पढ़ाई के साथसाथ उन्होंने बचपन से ही खेतखलिहान और पशुपालन में गहरी रुचि ली.

कृषि में प्रवेश और नवाचार

शुभावरी चौहान(Shubhavari Chauhan) ने मात्र 10 साल की आयु में अपने पिता के साथ खेती करना शुरू किया था. शुरुआत गन्ने की पारंपरिक खेती से हुई, लेकिन जल्द ही उन्होंने रासायनिक खाद और कीटनाशकों से दूर रहते हुए जैविक खेती को अपनाने का निश्चय किया.

उन्होंने गन्ने की जैविक खेती के साथसाथ पारंपरिक कोल्हू से गुड़ और शक्कर बनाने का काम  शुरू किया. इस के लिए उन्होंने स्थानीय मजदूरों को रोजगार दिया और पुराने पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विपणन तकनीकों के साथ जोड़ा.

कुछ ही सालों में शुभावरी चौहान ने आम (दशहरी, लंगड़ा, मल्लिका) की. इस के साथ ही,  बागबानी में टमाटर, मिर्च, धनिया, हल्दी और अन्य सब्जियों की खेती को भी जैविक पद्धति से अपनाया. उन्होंने ड्रिप सिंचाई और वर्मी कंपोस्ट जैसी नवीन तकनीकों को अपना कर जल और मृदा संरक्षण में भी योगदान दिया.

Shubhavari Chauhan

पशुपालन और देसी गाय का घी

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) की सब से बड़ी पहचान ‘देसी गाय के घी’ के उत्पादन और निर्यात के क्षेत्र में बनी. उन्होंने 20–30 देशी नस्ल की गायें पाल रखी हैं, जिन्हें केवल जैविक चारा और आयुर्वेदिक उपचार दिया जाता है. उन के द्वारा उत्पादित ‘बिलौनी घी’ की मांग केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पेरिस, दुबई, लंदन और सिंगापुर तक फैली हुई है.

बिलौनी घी की कीमत 1800 से 2000 रुपए प्रति किलो तक होती है, और हर साल वे 70 से 80 किलो घी औनलाइन बेचती हैं. यह घी ‘शुद्धता’ और ‘स्वदेशी तकनीक’ के कारण ग्राहकों के बीच काफी लोकप्रिय है.

पर्यावरण और जल संरक्षण में योगदान

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) ने कृषि को केवल उत्पादन का माध्यम नहीं माना, बल्कि इसे एक सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के रूप में भी अपनाया. उन्होंने अपने खेतों में नीम, सहजन, कनेर जैसे पौधे लगाए जो वायु प्रदूषण को कम करने में सहायक हैं. जल संकट से निबटने के लिए उन्होंने अपने खेतों में छोटे बांध बनाए, वर्षा जल संचयन और ड्रिप सिंचाई के माध्यम से जल संरक्षण की दिशा में शुभावारी चौहान (Shubhavari Chauhan) ने महत्वपूर्ण काम किया है.

तकनीक और सोशल मीडिया का उपयोग

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) ने डिजिटल तकनीकों को भी अपनाया है. वह सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स जैसे इंस्टाग्राम और यूट्यूब के माध्यम से खेती के टिप्स, वीडियो ब्लौग, घी निर्माण प्रक्रिया, आम की पैकिंग आदि से जुड़े वीडियो पोस्ट करती हैं, उन के हजारों फौलोवर्स हैं, जो उन के काम से प्रेरणा लेते हैं. उन का एकमात्र उद्देश्य है “युवा किसानों को जोड़ो, मिट्टी से जोड़ो.”

सम्मान और पुरस्कार

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) को उन के उल्लेखनीय कार्यों के लिए कई राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय पुरस्कार प्राप्त हुए हैं. कुछ प्रमुख सम्मानों में शामिल हैं:

  • कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही द्वारा सम्मानित किया गया

– “बेस्ट यंग फार्मर अवार्ड” (2024) – फार्म एंड फूड पत्रिका द्वारा, लखनऊ में.

– “वानी पुरस्कार” (2024) – मृदा संरक्षण और जैविक खेती के लिए.

– किसान दिवस (2023) पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा राज्य स्तरीय किसान सम्मान.

– कृषि विज्ञान केंद्र और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR) से विशेष प्रशस्ति पत्र.

इन पुरस्कारों के साथसाथ वे कृषि संगोष्ठियों, वेबिनार और महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों में भी वक्ता के रूप में शामिल होती हैं.

Shubhavari Chauhan

आर्थिक प्रभाव और रोजगार

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) का सालाना टर्नओवर लगभग 25 लाख रुपए है. वह अपने गांव और आसपास के क्षेत्र में 25 से 30 लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार देती हैं. उन का यह मौडल “गांव में रहो, गांव को समृद्ध करो” – आज अन्य युवाओं के लिए उदाहरण बन चुका है.

उनका मानना है कि “अगर सही मार्गदर्शन और ईमानदारी से मेहनत की जाए तो खेती भी करोड़ों का व्यवसाय बन सकता है.”

भविष्य की योजनाएं

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) अब खेती को और बड़े स्तर पर ले जाने की तैयारी कर रही हैं. उन की योजनाएं हैं:

– औनलाइन ब्रांड बनाना – “Shubhavari Organic”

– डेयरी यूनिट का विस्तार

– फार्म टूरिज्म की शुरुआत – जहां लोग जैविक खेती, पशुपालन, घी निर्माण की प्रक्रिया को सीधे देख सकें.

– ग्राम महिला स्वावलंबन केंद्र – महिलाओं को स्वरोजगार और प्रशिक्षण देने हेतु.

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) की कहानी आज के युवाओं, विशेष रूप से लड़कियों के लिए एक प्रेरणा है. जहां अधिकांश युवा शहरी जीवन और नौकरी की ओर भागते हैं, वहीं शुभावरी चौहान ने गांव में रह कर ही अपनी पहचान बनाई है. उन्होंने यह साबित कर दिखाया कि यदि लगन और सच्ची मेहनत हो, तो खेती केवल आजीविका नहीं, बल्कि सम्मान और समृद्धि का मार्ग बन सकती है.

उन की यात्रा भारत की नई कृषि क्रांति का उदाहरण है जो ज्ञान, परंपरा, नवाचार और स्वदेशी सोच से प्रेरित है. शुभावरी चौहान न केवल एक किसान हैं, बल्कि एक आंदोलन की शुरुआत हैं.

Drip Irrigation : खेती में पानी बचाने की तकनीक : ड्रिप या टपक सिंचाई

Drip Irrigation : सारी दुनिया में अपनाई जा रही ड्रिप प्रणाली से हमारे किसानों का संबंध बहुत पुराना है. पहले गरमी के दिनों में हमारे घरों के आंगन की तुलसी के पौधे के ऊपर मिट्टी के घड़े की तली में बारीक छेद कर के उस में पानी भर कर टांग दिया जाता था. वैसे ड्रिप प्रणाली का किसानी में व्यापक प्रयोग 1960 के दशक में इजरायल में किया गया, जिसे बाद में आस्ट्रेलिया और अमेरिका ने बखूबी अपनाया. ड्रिप सिंचाई के जरीए आज अमेरिका में 10 लाख हेक्टेयर रकबे में खेती होती है, जिस के बाद भारत और फिर स्पेन और इजरायल का स्थान है.

ड्रिप यानी टपक सिंचाई, सिंचाई का वह तरीका है जिस में पानी धीरेधीरे बूंदबूंद कर के फसलों की जड़ों में कम मोटाई के प्लास्टिक के पाइप से दिया जाता है. इस तरीके में पानी का इस्तेमाल कम से कम होता है. सिंचाई का यह तरीका सूखे इलाकों के लिए बेहद उपयोगी होता है, जहां इस का इस्तेमाल फल के बगीचों की सिंचाई के लिए किया जाता है. टपक सिंचाई ने लवणीय जमीन पर फलों के बगीचों को कामयाब बनाया है. इस सिंचाई विधि में खाद को घोल के रूप में दिया जाता है. टपक सिंचाई उन इलाकों के लिए बहुत ही सही है, जहां पानी की कमी होती है.

पिछले 15 सालों से भारत में ड्रिप सिंचाई से साढ़े 3 लाख हेक्टेयर जमीन में सिंचाई हो रही है, जिस में सब से अधिक महाराष्ट्र में 94000 हेक्टेयर, कर्नाटक में 66000 हेक्टेयर और तमिलनाडु में 55000 हेक्टेयर की सिंचाई की जा रही है.

ड्रिप सिंचाई पर आधारित खेती को अपनाए जाने की कई वजहें हैं. भारत की कुल जमीन के रकबे का महज 45 फीसदी भाग ही अभी तक सिंचाई सुविधा के तहत आता है, जबकि खेती में पानी का इस्तेमाल कुल पानी के इस्तेमाल का 83 फीसदी है. घरेलू उपयोग, उद्योग और ऊर्जा यानी बिजली के सेक्टर में पानी की खपत बढ़ने से जाहिर है कि खेती के लिए पानी की मौजूदगी पर आने वाले समय में दबाव और बढ़ेगा. पानी के संकट का एक मुख्य कारण जमीन के पानी के स्तर का लगातार गिरते जाना भी है.

कोलंबो स्थित इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट के अनुसार साल 2025 तक विश्व की एकतिहाई आबादी पानी की कमी से जूझ रही होगी. विश्व में मौजूद इस्तेमाल लायक पानी का महज 4 फीसदी पानी भारत में है, जबकि भारत की आबादी दुनिया की आबादी का 16 फीसदी है. जाहिर है कि पानी का दबाव बढ़ता जा रहा है. ऐसे में जरूरी है कि खेती में भी पानी के इस्तेमाल को ले कर नई तकनीकों को आजमाया जाए. ड्रिप यानी टपक बूंद सिंचाई तकनीक में पानी की हर बूंद के ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल समेत कई लाभ हैं.

टपक सिंचाई के लिए मुफीद फसलें: ड्रिप या टपक सिंचाई कतार वाली फसलों, पेड़ व लता फसलों के मामले में बेहद मुनासिब होती है, जहां एक या उस से ज्यादा निकास को हर पौधे तक पहुंचाया जाता है. ड्रिप सिंचाई को आमतौर पर अधिक कीमत वाली फसलों के लिए अपनाया जाता है, क्योंकि इस सिंचाई के तरीके को अपनाने में खर्च ज्यादा आता है. टपक सिंचाई का इस्तेमाल आमतौर पर फार्म, व्यावसायिक हरित गृहों और घरों के बगीचों में किया जाता है.

ड्रिप सिंचाई लंबी दूरी वाली फसलों के लिए बेहद मुफीद होती है. सेब, अंगूर, संतरा, नीबू, केला, अमरूद, शहतूत, खजूर, अनार, नारियल, बेर, आम आदि फल वाली फसलों की सिंचाई ड्रिप सिंचाई विधि से की जा सकती है. इन के अलावा टमाटर, बैगन, खीरा, लौकी, कद्दू, फूलगोभी, बंदगोभी, भिंडी, आलू, प्याज वगैरह कई सब्जी फसलों की सिंचाई भी टपक सिंचाई विधि से की जा सकती है. अन्य फसलों जैसे कपास, गन्ना, मक्का, मूंगफली, गुलाब व रजनीगंधा वगैरह को ड्रिप सिंचाई विधि से सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है.

ड्रिप सिंचाई पर एक रिपोर्ट : कर्नाटक के गन्ना किसानों पर हुए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि वहां के 10.85 लाख हेक्टेयर रकबे में उगाए जाने वाले गन्ने के लिए बहाव प्रणाली वाली खेती में सिंचाई के लिए 330 टीएमसीएफटी पानी की जरूरत होगी, जबकि इतने ही रकबे में ड्रिप सिंचाई तकनीक से महज 144 टीएमसीएफटी पानी की जरूरत होती है. पानी की 186 टीएमसीएफटी मात्रा का ही नहीं, बल्कि इस की सिंचाई में लगने वाली बिजली में 450 करोड़ रुपए की बचत का अनुमान किया गया जो कुल मिला कर 1200 मेगावाट के बराबर होगी.

अब बात पैदावार की करें तो इतने ही रकबे में फ्लड सिंचाई के जरीए प्रति हेक्टेयर 35 टन की पैदावार होती है, जबकि ड्रिप सिंचाई के जरीए 68 टन तक की पैदावार हासिल की जा सकती है. अकेले गन्ने की पैदावार में लगभग 95 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है, जिस का बाजारी कीमतों पर प्रति एकड़ कुल लाभ 65 हजार रुपए से अधिक बैठता है.

Drip Irrigation

ड्रिप सिंचाई तकनीक के लाभ : ड्रिप सिंचाई तकनीक को सब्जियों,  फलों और तमाम फसलों में बड़ी सफलता के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है. इस तकनीक में पानी के स्टोरेज टैंक से एक खास दबाव पर 2-20 लीटर प्रति घंटे की दर से पानी को जमीन की सतह पर पाइपों के जाल से पौधों के पास बने छेदों से टपकते हुए पहुंचाया जाता है. इस प्रणाली में जमीन में नमी बनाए रखने में मदद मिलती है.

ड्रिप सिंचाई प्रणाली में पानी का बेहतर इस्तेमाल ही नहीं होता, बल्कि पानी की खपत में 45 फीसदी कमी आ जाती है. उर्वरकों और कीटनाशकों को ड्रिप प्रणाली में सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है. सिंचाई के पुराने तरीकों में पोषण उपयोग क्षमता 60 फीसदी से कम रहती है, जबकि ड्रिप प्रणाली में 90 फीसदी से ज्यादा है.

आम सिंचाई में पौधों को अधिक पानी मिलने से पानी के जमीन के भीतर रिसाव से 50 फीसदी तक उर्वरक घुल कर मिट्टी के निचले स्तरों में जा पहुंचते हैं, जबकि ड्रिप प्रणाली में रिसाव के जरीए उर्वरकों की हानि महज 10 फीसदी होती है. सब से खास बात यह है कि उर्वरकों के रिसाव से जमीन के अंदर का पानी खराब होता है. ड्रिप सिंचाई से उर्वरकों की खपत में 20 फीसदी की कमी के साथ पैदावार में 20-90 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है. ड्रिप सिंचाई से किसान अपनी फसल की लागत को कम करने के साथसाथ भूमिगत जल को भी गंदा होने से बचा सकते हैं.

ड्रिप सिंचाई से पौधों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को अपनी संख्या को बढ़ाने के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता है, जिस से पौधों की सुरक्षा बढ़ती है और कीटनाशकों की खपत कम हो जाती है. नाली प्रणाली से सिंचाई करने पर पानी के बहाव के साथ मिट्टी का कटाव होता है, जबकि ड्रिप प्रणाली में मिट्टी का कटाव नहीं होता है. इस से मिट्टी की उर्वरता और उस की परतों को कोई नुकसान नहीं होता है.

ड्रिप सिंचाई प्रणाली में सिंचाई के लिए खेतों की असमान सतह होना बाधक नहीं है, जबकि नाली सिंचाई में किसानों को खेत को समतल बनाने में खर्च करना पड़ता है. ड्रिप प्रणाली में सिंचाई में मेहनत कम लगती है. ड्रिप सिंचाई के दौरान भूमि सूखी होने के कारण फसलों की तोड़ाई में परेशानी नहीं होती है.

ड्रिप सिंचाई की सुविधा और ढांचे को तैयार करने के लिए केंद्र व विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा सब्सिडी दी जाती है.

Micro-Irrigation : ‘पर ड्रौप मोर क्रौप’ माइक्रोइरीगेशन योजना

Micro-Irrigation : आजकल किसानों के सामने खेती में सिंचाई एक बड़ी समस्या है. दिनोंदिन पानी का लैवल नीचे पहुंचता जा रहा है. ऐसे समय में हमें खेती में कम पानी से सिंचाई हो, ऐसी तकनीक की दरकार है. इसी संदर्भ में केंद्र सरकार द्वारा सिंचाई के लिए माइक्रोइरीगेशन (Micro-Irrigation) योजना ‘पर ड्रौप मोर क्रौप’ के नाम से योजना चलाई जा रही है. राष्ट्रीय कृषि विकास योजना भी इस योजना के अंतर्गत ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली को प्रभावी तरीके से अनेक फसलों में अपनाने पर जोर दे रहा है. इस सिंचाई पद्धति से 40 से 50 फीसदी तक पानी की बचत की जा सकती है.

हमारे देश में किसानों के विकास के लिए सरकार द्वारा अनेक कृषि योजनाएं चलाई जा रही हैं. चाहे बात खेत की बोआई की हो या खेत की सिंचाई की हो, फसल की निराईगुड़ाई की हो, फसल की छंटाई की हो, उस की गहाई की हो या खेत तैयार करने की हो, इन सब के बावजूद खेती के अनेक काम होते हैं, जिस के लिए अनेक आधुनिक तकनीकी पर आधारित कृषि यंत्र हैं, जिन के इस्तेमाल से न केवल फसल से अच्छी उपज मिलती है, बल्कि समय और मेहनत भी कम लगती है.

आजकल किसानों के सामने खादबीज के अलावा सिंचाई भी एक बड़ी समस्या है. दिनोंदिन पानी का लैवल नीचे पहुंचता जा रहा है. ऐसे समय में हमें खेती में कम पानी से सिंचाई हो, ऐसी तकनीकों की दरकार है.

इसी संदर्भ में केंद्र सरकार द्वारा सिंचाई के लिए माइक्रोइरीगेशन योजना ‘पर ड्रौप मोर क्रौप’ के नाम से योजना चलाई जा रही है. इसे सूक्ष्म सिंचाई तकनीक भी कहा जाता है.

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना भी इस योजना के अंतर्गत ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली को प्रभावी तरीके से अनेक फसलों में अपनाने पर जोर दे रहा है. इस सिंचाई पद्धति से 40 से 50 फीसदी तक पानी की बचत की जा सकती है और 35 से 40 फीसदी तक अधिक पैदावार भी हासिल की जा सकती है.

यूपीएमआईपी पोर्टल से करें रजिस्टर

वर्तमान में इस योजना का संचालन यूपीएमआईपी पोर्टल के जरीए किया जा रहा है. जो किसान इस योजना का लाभ लेना चाहता है, वह  पोर्टल पर रजिस्टर कर सूक्ष्म सिंचाई पद्धति लगा सकते हैं.

योजना प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए लाभार्थी किसानों के प्रक्षेत्रों (खेत) पर लगाई गई इस यूनिट का इंस्पैक्शन (जांच) थर्ड पार्टी द्वारा किया जाता है, जिस से सिंचाई यूनिट का बीमा भी किया जा सके.

ड्रिप सिंचाई पद्धति के लिए चुनी गईं फसलें

बागबानी फसल : फल उद्यान (फलों के बाग) : आम, अमरूद, आंवला, नीबू, बेल, बेर, अनार, अंगूर, आड़ू, लोकाट, आलूबुखारा, नाशपाती, पपीता, केला आदि.

सब्जी फसल : टमाटर, बैंगन, भिंडी, मिर्च, शिमला मिर्च, गोभीवर्गीय एवं कद्दूवर्गीय सब्जियां.

फूल और औषधीय फसल : खुशबूदार और औषधीय फसलों में अनेक तरह के फूलों की खेती जैसे ग्लैडियोलस, गुलाब, रजनीगंधा, सगंध पौधे और अनेक औषधीय फसलें आती हैं. इन फसलों के अलावा आलू, गन्ना और अनेक कृषि फसलें भी हैं, जो इस ड्रिप सिंचाई की योजना के अंतर्गत आती हैं.

स्प्रिंकलर सिंचाई पद्धति

इस में मुख्य रूप से मटर, आलू, गाजर, पत्तेदार सब्जियां और कृषि फसलों में माइक्रो, मिनी, पोर्टेबल, सैमी, परमानैंट एवं रेनगन स्प्रिंकलर का इस्तेमाल होता है.

सिंचाई यंत्र पर सब्सिडी का पैमाना

माइक्रोइरीगेशन योजना के तहत किसान को इस योजना का लाभ उस की श्रेणी के अनुसार मिलता है. इस के लिए राज्य सरकार और केंद्र सरकार अपनेअपने हिस्से की सब्सिडी किसान को देती है. शेष राशि जो लाभार्थी को उठानी होती है, वह काफी कम होती है. विस्तार से सारणी में जानकारी दी गई है.

जल संसाधनों (Water Resources) के अधिक दोहन को रोकना जरूरी

हिसार : चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में ‘वाटर एफिशिएंट क्राप कल्टीवार’ विषय पर चौथी उच्चस्तरीय समिति की बैठक का आयोजन हुआ. इस बैठक में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो बीआर कंबोज ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की, जबकि पंजाब विश्वविद्यालय लुधियाना के पूर्व कुलपति एवं समिति के चेयरमैन डा. बीएस ढिल्लो विशिष्ट अतिथि के तौर पर मौजूद रहे.

बैठक में पीडब्ल्यूआरडीए के तकनीकी सलाहकार व पंजाब के पूर्व कृषि निदेशक राजेश वशिष्ठ, कृषि महाविद्यालय पीएयू के पूर्व अधिष्ठाता डा. एसएस कुकल एवं भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान के पूर्व निदेशक डा. सीएल आचार्य भी उपस्थित रहे.

इस उच्चस्तरीय समिति का मुख्य उद्देश्य जल संसाधनों के अधिक दोहन को रोकना, खरीफ मौसम में कम पानी में उगाई जानी वाली किस्मों को प्रचलित करना व इन से संबंधित शोध की समीक्षा करना व अन्य संस्थानों के साथ शोध को बढावा देना है.

कुलपति प्रो. बीआर कंबोज ने अपने संबोधन में जल जैसे अमूल्य प्राकृतिक संसाधन के खेती में सदुपयोग करने व उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप कृषि योजना बना कर प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के महत्व के बारे में अपने विचार रखे.

उन्होंने खरीफ मौसम में कम पानी में उगाई जाने वाली व बेहतर उत्पादन देने वाली किस्मों को उगाने के लिए उन्नत सस्य क्रियाएं अपना कर जल संरक्षण करने पर जोर दिया. उन्होंने आगे यह भी कहा कि भावी पीढ़ी के उज्ज्वल भविष्य के लिए जल संसाधनों का संरक्षण बहुत जरूरी है. बायोसैंसर जैसी आधुनिक तकनीक का जल संसाधनों में बेहतर उपयोग किया जा सकता है. मक्का की फसल धान वाले खेतों में पानी बचाने के लिए एक बेहतर विकल्प साबित हो सकती है.

उन्होंने बताया कि मक्का का साइलेज 70-80 दिन में तैयार हो जाता है. साथ ही, चारे की कमी के दिनों में पशुओं के लिए यह बहुत उपयोगी होता है. इसी तरह गेहूं वाले क्षेत्रों में राया की फसल उगा कर पानी की बचत की जा सकती है. राया के बाद छोटी अवधि की फसल जैसे मूंग उगाई जा सकती है, जिस से मुनाफा बढ़ने के साथसाथ संसाधनों की बचत भी होगी.

डा. बीएस ढिल्लो ने बताया कि खरीफ के मौसम में धान की कम पानी में उगाई जाने वाली व धान की सीधी बिजाई के लिए उपयुक्त किस्मों के बारे में चर्चा की. साथ ही, खरीफ में उगाई जाने वाली दूसरी फसलें जैसे मूंग, अरहर, बाजरा व कपास की भी कम पानी में बेहतर पैदावार देने वाली किस्मों के बारे में जानकारी दी.

अनुसंधान निदेशक डा. राजबीर गर्ग ने बैठक में सभी का स्वागत करते हुए धानगेहूं फसल चक्र में पानी की बचत के लिए विभिन्न तकनीकों व पहलुओं पर अपने विचार रखे. उन्होंने कपास, धान, मक्का फसल की अधिक पैदावार व मुनाफा देने के साथसाथ कम पानी में उगाई जाने वाली किस्मों से संबंधित शोध को बढ़ावा देने संबंधी रणनीति के बारे में भी बताया.

डा. सीएल आचार्य ने बताया कि भूमिगत जल संसाधनों का अधिक दोहन हो रहा है, जिस के चलते पूरे देश में 151 जिले पानी की कमी से जूझ रहे हैं. साथ ही, भूमिगत पानी में पाए जाने वाले हानिकारक तत्व भी होते हैं. गत वर्ष हरियाणा, पंजाब व राजस्थान में क्रमश: 8.69, 16.98 व 11.25 बिलियन क्यूबिक मीटर भूमिगत पानी निकाला जा सकता था, जबकि 11.8, 27.8 व 16.74 बिलियन क्यूबिक मीटर भूमिगत पानी निकाला गया.

उन्होंने यह भी बताया कि आगे ऐसा समय भी आएगा, जब फ्लड सिंचाई बंद करनी होगी व अधिक दक्षता वाले सिंचाई के तरीके जैसे टपक व फव्वारा सिंचाई जैसी तकनीकों को अपनाना होगा. वहीं डा. एसएस कुकल ने बताया कि कम पानी में बेहतर पैदावार देने वाली नई किस्मों का परीक्षण अधिक से अधिक स्थानों पर करना जरूरी है, ताकि उन के नतीजे सत्यापित हो सकें. राजेश वशिष्ठ ने धन्यवाद प्रस्ताव पारित किया. बैठक का संचालन डा. एसएस यादव ने किया.

शिमला मिर्च की फसल से हो रहा लाखों रुपए का मुनाफा

एकीकृत बागबानी विकास मिशन (एमआईडीएच) बागबानी क्षेत्र के समग्र विकास के लिए केंद्र सरकार की एक प्रायोजित योजना है. इस योजना के तहत फलसब्जियां, जड़कंद वाली फसलें, मशरूम, मसाले, फूल, सुगंधित पौधे, नारियल, काजू, कोको और बांस जैसी बागबानी फसलों को बढ़ावा दिया जाता है.

इस योजना के अंतर्गत ड्रिप इरीगेशन सहप्लास्टिक मल्चिंग का उपयोग कर के सागर जिले के ग्राम खिरियाताज के रहने वाले करन पटेल ने शिमला मिर्च की खेती कर के लाखों रुपए का मुनाफा कमाया और खेती को लाभ का धंधा बना लिया है.

करन पटेल बताते हैं कि पहले हम गेहूं की खेती किया करते थे जिस से हमारी रोजीरोटी का ही गुजरबसर हो पाता था. न तो भविष्य के लिए कोई पैसा जमा कर पाते थे और न ही परिवार को कोई सुखसुविधा दे पाते थे. मेहनत के बराबर मुनाफा भी नहीं हो पाता था.

तब उद्यानिकी विभाग के लोगों ने मुझे ड्रिप इरीगेशन सहप्लास्टिक मल्चिंग खेती करने की सलाह दी और एकीकृत बागबानी विकास मिशन में मिलने वाले फायदों की जानकारी दी. तब मैं ने मल्चिंग और ड्रिप सिस्टम का इस्तेमाल कर शिमला मिर्च की खेती करना शुरू किया, जिस से मुझे मेहनत के मुकाबले खेती से लाखों रुपए का मुनाफा हुआ.

सागर जिले के प्रगतिशील किसान करन पटेल ग्राम खिरियाताज के रहने वाले हैं. उन्होंने बताया  कि उद्यानिकी की उच्च तकनीकी ड्रिप एवं मल्चिंग का उपयोग करते हुए उन के द्वारा शिमला मिर्च, पीकाडोर, टमाटर, आलू, मिर्च की खेती की जा रही है. इस वर्ष उन को टमाटर और शिमला मिर्च का दाम अधिक होने से प्रति एकड़ आय में अधिक मुनाफा हुआ है.

हाइड्रोपोनिक खेती को दें बढ़ावा

सागर जिला कलक्टर संदीप जीआर ने उद्यानिकी विभाग के अंतर्गत उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों को हाइड्रोपोनिक खेती व माइक्रोग्रीन्स की खेती को बढावा देने के लिए निर्देशित किया, जहां हाइड्रोपोनिक खेती में पौधों को मिट्टी के बजाय पानी आधारित पोषक घोल में उगाया जाता है, वहीं माइक्रोग्रीन्स छोटे पौधों की पत्तियां या तने होते हैं, जिन्हें 1 से 3 सप्ताह के बीच में काटा जाता है. ये पौधे विटामिन, मिनरल और एंटीऔक्सीडेंट से भरपूर होते हैं और इन्हें सलाद, सैंडविच, स्मूदी और अन्य व्यंजनों में उपयोग किया जा सकता है.

उपसंचालक, उद्यानिकी, पीएस बडोले ने कलक्टर संदीप जीआर को अवगत कराया कि किसान  करन पटेल को पीडीएमसी योजना के अंतर्गत ड्रिप और अटल भूजल योजना के अंतर्गत सब्जी क्षेत्र विस्तार, वर्मी बेड एवं शेडनेट हाउस का लाभ दिया गया है.