Kharif 2026: खरीफ 2026 के लिए नहीं है बीज की कमी

Kharif 2026. नई दिल्ली पूसा में राष्ट्रीय खरीफ कृषि सम्मेलन के दौरान केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि किसी भी फसल की सफलता की सबसे पहली शर्त गुणवत्तायुक्त बीज है और इस बार देश में खरीफ 2026 के लिए बीज की उपलब्धता पूरी तरह आश्वस्त करने वाली है. उन्होंने जानकारी दी कि खरीफ सीजन के लिए देश में लगभग 173 लाख क्विंटल बीज की आवश्यकता है, जबकि 192 लाख क्विंटल बीज उपलब्ध है यानी जरूरत से लगभग 11 प्रतिशत अधिक बीज उपलब्ध कराया गया है, ताकि समय रहते खरीफ बोआई से पहले किसानों तक बीज पहुंच जाए.

फार्मर आईडी से किसानों तक पहुंचेगा बीज और अन्य सुविधाएं

किसानों को योजनाओं का लाभ सरल और समय पर मिल सके इस के लिए फार्मर आईडी अभियान को तेजी से आगे बढ़ाया गया है. अब तक 9 करोड़, 76 लाख से अधिक फार्मर आईडी बनाई जा चुकी हैं. कृषि मंत्री ने कहा कि इससे किसानों को बार-बार अलगअलग कागज देने की जरूरत कम होगी और खादबीज और कृषि सहायता तथा अन्य सुविधाओं को समय पर उपलब्ध कराया जाएगा.

बंटाईदार किसानों को भी लाभ देने की तैयारी

कृषि मंत्री ने कहा कि बड़ी संख्या में ऐसे किसान हैं जो अपनी जमीन के मालिक नहीं हैं, बल्कि पट्टे या लीज पर जमीन लेकर खेती करते हैं. ऐसे किसानों या बंटाईदारों के लिए भी योजनाओं का लाभ सुनिश्चित करने को लेकर राज्यों के साथ गंभीर चर्चा हुई है, जिससे उन्हें भी योजनाओं का लाभ मिल सके.

देरी से भुगतान करने पर बीमा कंपनियों पर भी लगाम

फसल बीमा योजना पर कृषि मंत्री ने कहा कि योजना का दायरा बड़ा है, लेकिन कई बार प्रीमियम भुगतान में देरी और बीमा कंपनियों द्वारा दावों के निबटारे में विलंब को गंभीरता से लिया गया है. उन्होंने स्पष्ट किया कि आवश्यक औपचारिकताएं पूरी होने के बाद भी अगर बीमा कंपनी की तरफ से भुगतान में देरी होने पर 12 फीसदी ब्याज का प्रावधान लागू होगा, ताकि किसानों को लाभ समय पर मिल सके.

किसानों को समय पर मिले लाभ, नक्कालों पर शिंकजा

शिवराज सिंह चौहान ने राज्यों से यह भी कहा है कि केंद्र द्वारा जारी की गई विभिन्न कृषि योजनाओं की राशि समय पर खर्च होनी चाहिए, ताकि किसानों तक लाभ सही समय पर पहुंचे. उन्होंने घटिया और नकली कीटनाशकों को बड़ी समस्या बताते हुए कहा कि राज्यों को अधिक से अधिक सैंपलिंग करनी होगी, प्रयोगशालाओं को सक्षम बनाना होगा और एनएबीएल प्रमाणित लैब्स के विस्तार पर ध्यान देना होगा. नकली कृषि आदानों के खिलाफ व्यापक अभियान चलाने पर भी सहमति बनी है.

इसके अलावा कृषि मंत्री ने कहा :

-अरहर जैसी फसलों में कम अवधि वाली बेहतर किस्मों का होगा विकास.

-हर राज्य के लिए अलग कृषि रोडमैप तैयार किया जाएगा. इस रोडमैप में मिट्टी, जलवायु, पोषक तत्वों की स्थिति, उपयुक्त फसल, किस्म और उर्वरक उपयोग जैसी बातों को शामिल किया जाएगा, ताकि कृषि योजना अधिक वैज्ञानिक और क्षेत्र-विशिष्ट बन सके.

Fake Pesticides : किसानों से खिलवाड़, नकली कीटनाशकों का बढ़ता बाजार

Fake Pesticides : खेती में आजकल कीटनाशकों, खरपतवार नाशकों और जैविक खाद का प्रयोग तेजी से बढ़ रहा है. जिस तरीके से अच्छे उत्पादों का प्रचलन बढ़ रहा है उसी तेजी से नकली कीटनाशकों, नकली खरपतवार नाशकों और बिना गुणवत्ता वाले जैविक कीटनाशकों, जैविक खादों का प्रचलन भी लगभग 30 से 40 फीसदी हमारे भारत में ग्रो कर रहा है.

नकली कीटनाशकों से मिट्टी और स्वास्थ्य पर खतरा

इन नकली कीटनाशकों की वजह से किसानों को हर साल भारी नुकसान उठाना पड़ता है. किसान के साथ-साथ हमारी मृदा पर भी इस के दुष्परिणाम देखने को मिलते हैं. इस नकली कीटनाशक का प्रचलन बढ़ने से हमारे स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ रहा है, क्योंकि इसमें अच्छे परिणाम के लिए कई गुना डोज को बढ़ाया जाता है, जिससे किसान को अच्छे परिणाम मिल सकें.

तारीख नई, माल पुराना: बाजार में एक्सपायरी खेल

इस नकली कीटनाशक का प्रचलन बढ़ने का एक बड़ा कारण यह है कि बड़ी मल्टीनैशनल कंपनियां अपने पुराने स्टॉक को, जो लगभग 2 से 3 माह बाद एक्सपायरी में होता है, व्यापारियों को सस्ते दामों में भारीभरकम छूट पर बिल कर देती हैं. इसमें व्यापारी को 40 से 50 फीसदी डाउन पेमेंट बिल करती है और वही मैटेरियल बाजार में बिकता है. कहीं रीपैक होकर, कहीं डेट बदलकर बाजार में माल बेचा जाता है.

यही सस्ता और रीपैक किया गया माल असली और नए उत्पादों की बिक्री को प्रभावित करता है, क्योंकि नया माल महंगा होता है और पुराना सस्ता, जिससे नया माल बाजार से वापस लौट जाता है.

नियर एक्सपायरी उत्पादों पर नियंत्रण की जरूरत

इस स्थिति को देखते हुए आवश्यक है कि कंपनियों को एक्सपायरी से काफी पहले तक ही माल बेचने की अनुमति दी जाए और जो उत्पाद एक्सपायरी के बहुत करीब हों, उन्हें बाजार में उतारने पर रोक लगे. यदि ऐसा किया जाए तो डुप्लीकेसी पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है, क्योंकि कंपनियां ऐसे उत्पादों पर भारी छूट नहीं दे पाएंगी.

साथ ही यह भी सामने आया है कि बड़े स्टॉकिस्ट हजारों लीटर माल खरीदकर अपने नाम से रीपैक कर बाजार में बेचते हैं, जिससे नकली उत्पादों का प्रसार और तेज हो जाता है.

कीटनाशक कंपनियों और बाजार पर निगरानी की कमी

एफआईसीसीआई जैसी संस्थाएं कीटनाशक कंपनियों और सरकारी संस्थाओं के बीच समन्वय का कार्य करती हैं और जागरूकता भी फैलाती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर निगरानी की कमी स्पष्ट दिखाई देती है. उदाहरण के तौर पर, खरपतवारनाशक का सीजन जुलाई में शुरू होता है, जबकि अप्रैल और मई में ही बड़ी मात्रा में ऐसा माल बाजार में उतार दिया जाता है जिसकी एक्सपायरी मई-जून में होती है, जबकि उसकी बिक्री जुलाई में होती है.

बाजार में कई कंपनियां हैं और बड़े स्टॉकिस्ट भारी मात्रा में एक्सपायरी के करीब का माल खरीदते हैं, लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं होती. इसके विपरीत छोटे स्तर पर काम करने वाले लोगों पर जल्दी कार्रवाई हो जाती है, जबकि बड़े स्तर पर हो रहे इस व्यापार को नजरअंदाज कर दिया जाता है. यदि बड़े स्टॉकिस्टों पर सख्ती से कार्रवाई की जाए तो नकली कीटनाशकों की बिक्री में तुरंत कमी लाई जा सकती है.

3,000 करोड़ का नकली बाजार: सख्त कार्रवाई की मांग

बाजार में लगभग 3,000 से 3,200 करोड़ रुपए का नकली कीटनाशक बिक रहा है. इस पर सख्त कार्रवाई की जरूरत है, ठीक उसी तरह जैसे नोटबंदी के दौरान सख्ती दिखाई गई थी. किसान आज भी यह समझ नहीं पाता कि कौन सा उत्पाद असली है और कौन सा नकली, वह सिर्फ सस्ता विकल्प चुनने के लिए मजबूर होता है.

छोटे व्यापारियों का योगदान और उनकी अनदेखी

हमारे कृषि मंत्री महोदय प्रतिदिन किसानों के लिए अच्छे उत्पादों की बात करते हैं, जो सराहनीय है. लेकिन यह भी सच्चाई है कि हरित क्रांति में छोटे व्यापारियों का भी बड़ा योगदान रहा है. उन्होंने किसानों को व्यक्तिगत स्तर पर जाकर उत्पादों की जानकारी दी, खेतों का निरीक्षण किया और समस्याओं का समाधान बताया.

आज भी कई ईमानदार व्यापारी हैं जो किसानों का नुकसान नहीं चाहते, लेकिन पूरे व्यापार वर्ग को एक ही नजर से देखना उचित नहीं है.

सरकारी उत्पादों की गुणवत्ता पर उठते सवाल

आज किसान खुद यह कहता है कि कई बार सरकारी उत्पादों में गुणवत्ता की कमी होती है. बाजार में एक ही तकनीक वाले उत्पाद अलग-अलग कंपनियों द्वारा अलग-अलग कीमतों पर बेचे जाते हैं, जिससे गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं.

‘सुविधा शुल्क’ और सैंपल पास करने का खेल

बाजार में यह भी देखने को मिलता है कि कुछ कंपनियां अधिकारियों से सांठगांठ कर ‘सुविधा शुल्क’ देकर अपने फेल सैंपल को भी पास करवा लेती हैं. इससे खराब गुणवत्ता वाले उत्पाद भी बाजार में पहुंच जाते हैं और किसानों को नुकसान होता है.

कीमत और गुणवत्ता का अंतर: बड़ा सवाल

बाजार में एक ही प्रकार का पाउडर 15 रुपए से लेकर 40 रुपए प्रति किलो तक बिकता है, जबकि दोनों पर जीएसटी समान लगता है. सस्ते उत्पाद की एमआरपी अधिक और महंगे उत्पाद की एमआरपी कम होने का अंतर यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं गुणवत्ता और मार्जिन का खेल चल रहा है.

जहां अच्छी गुणवत्ता वाले उत्पाद पर व्यापारी को कम मार्जिन मिलता है, वहीं कम गुणवत्ता वाले उत्पाद पर अधिक मार्जिन मिलता है, जिससे गलत उत्पादों को बढ़ावा मिलता है.

कार्रवाई में असमानता: व्यापारी बनाम कंपनियां

मौजूदा स्थिति में यदि किसी उत्पाद का सैंपल फेल होता है तो छोटे व्यापारी पर तुरंत कार्रवाई होती है, जबकि निर्माण करने वाली कंपनियों पर शायद ही कोई सख्त कदम उठाया जाता है.

इस संदर्भ में हाल ही में 27 अप्रैल को व्यापारियों द्वारा सांकेतिक हड़ताल भी की गई, जो काफी हद तक सफल रही. यह मांग उठी कि यदि व्यापारी के पास बिल नहीं है तो उस पर कार्रवाई हो, लेकिन यदि जीएसटी बिल मौजूद है तो जिम्मेदारी कंपनी की तय की जाए.

(यह लेखक का अपना तजुर्बा और उनके अपने विचार हैं)

असली और नकली के फेर में किसान

फसलों को कीटपतंगों के हमलों से बचाने के लिए किसानों को कई तरह के कीटनाशकों की जरूरत होती है और इस के लिए वे दुकानदार के कहे मुताबिक कीटनाशक खरीदते हैं.

देश में ऐसे बहुत कम दुकानदार हैं जिन के पास डिगरी या डिप्लोमा हो. इसी वजह से अकसर किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है, क्योंकि किस फसल के कीट के लिए कौन सी दवा ज्यादा कारगर होगी और कितनी मात्रा में, इस की जानकारी ज्यादातर दुकानदारों को नहीं होती. किसानों को इस की भी जानकारी नहीं होती कि कौन सी खाद असली है या नकली.

किसानों के सामने जो सब से बड़ी दिक्कत है, वह है कैमिकल खाद और कीटनाशक की. कौन सी खाद या कीटनाशक असली है या नकली, वे इस की पहचान नहीं कर पाते.

हैरानी की बात यह है कि जब हम ने भोपाल के कुछ दुकानदारों से इस बारे में जानकारी जाननी चाही तो उन का जवाब गोलमोल था. मतलब, उन्होंने माना कि आमतौर पर उन्हें भी इस के बारे में कोई खास पहचान नहीं होती, इसलिए उन के पास जो सब से ज्यादा बिकने वाली दवा होती है, उसी को किसानों को देने की कोशिश करते हैं.

इस में एक बात और गौर करने वाली है कि असली की पहचान ज्यादा बिकने और महंगे होने से है, क्योंकि नकली उत्पाद असली के मुकाबले काफी कम कीमत पर दुकानों में मिल जाते हैं, जिन के इस्तेमाल से किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है. साथ ही, मिट्टी की उर्वराशक्ति कमजोर हो जाती है इसलिए बड़े ब्रांड को देख कर खरीदारी करें. साथ ही, कुछ ऐसे तरीके भी हैं, जिन से असली और नकली की पहचान की जा सकती है.

नकली और मिलावटी कीटनाशकों की वजह से देश में हर साल करोड़ों रुपए की फसलें तबाह हो जाती हैं. इस से किसानों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है. किसान कर्ज ले कर फसलें उगाते हैं, फसलों को हानिकारक कीटों से बचाने के लिए वे कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन नकली और मिलावटी कीटनाशक कीटों पर प्रभावी नहीं होते. इस वजह से कीट और पौधों पर लगने वाली बीमारियां फसल को नुकसान पहुंचाती हैं. उत्पादन कम होता है या कई बार पूरी फसल ही खराब हो जाती है.

एक अनुमान के मुताबिक, देश में हर साल औसतन 3,000 करोड़ रुपए के नकली कीटनाशक बेचे जाते हैं, जबकि कीटनाशकों का कुल बाजार 7,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का है. यहां हर साल तकरीबन 80,000 टन कीटनाशक बनाए जाते हैं.

इंडियन काउंसिल औफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (आईसीएआर) की मानें तो देश में इस्तेमाल होने वाले कुल कीटनाशकों में से तकरीबन 40 फीसदी हिस्सा नकली है.

काबिलेगौर है कि बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में नकली कीटनाशक बनाने का करोबार बड़े पैमाने पर होता है. नामीगिरामी कंपनियों के लेबल का ये लोग इस्तेमाल करते हैं. अधिकारियों की मिलीभगत के चलते इन कारोबारियों के खिलाफ कोई सख्त कार्यवाही नहीं हो पाती है.

किसानों को असली और नकली कीटनाशकों और उर्वरकों की पहचान नहीं होती इसलिए वे दुकानदार पर भरोसा कर के कीटनाशक खरीद लेते हैं.

ऐसा नहीं है कि सभी दुकानदार नकली कीटनाशक बेचते हैं. जिन दुकानदारों को बाजार में अपनी साख बनाए रखनी है, वे सीधे कंपनी से माल खरीदते हैं. ऐसे दुकानदारों की भी कमी नहीं है, जो किसी बिचौलिए से माल खरीदते हैं.

दरअसल, बिचौलिए ज्यादा मुनाफा कमाने के चक्कर में दुकानदारों को असली की जगह नकली कीटनाशक बेचते हैं. नकली कीटनाशकों की पैकिंग भी हूबहू नामीगिरामी कंपनियों की तरह ही होती है.

यूरिया से किसान करें तोबा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ में कहा था, ‘हम यूरिया से धरती मां को गंभीर नुकसान पहुंचा रहे हैं. लेकिन किसान तो धरती मां का पुत्र है. वह अपनी मां को नुकसान कैसे पहुंचा सकता है? किसान एक संकल्प लें कि वे आजादी के 75 साल पूरा होने पर यानी साल 2022 तक यूरिया का इस्तेमाल आधा कर देंगे.’

फर्टिलाइजर एसोसिएशन औफ इंडिया (एफएआई) का अनुमान है कि देश में अगले एक दशक में कैमिकल उर्वरक की खपत 20 फीसदी ज्यादा हो जाएगी. 2024-25 तक नाइट्रोजन की मात्रा 2 करोड़ टन तक हो जाएगी. वहीं फास्फोरस की खपत 93 लाख टन और पोटाश की खपत 42 लाख टन तक पहुंच जाएगी.

भारत में हर साल 3 करोड़ टन यूरिया की खपत होती है, जबकि हरित क्रांति से पहले यह लैवल 10 लाख टन हर साल था. साथ ही, इस का आयात पिछले कुछ सालों के 90 लाख टन के मुकाबले साल 2017 में घट कर 60 लाख टन रह गया.

यह आयात पर निर्भरता में कमी को दिखाता है. भारत में किसान औसतन एक हेक्टेयर खेती पर 158 किलोग्राम उर्वरक का इस्तेमाल करते हैं, जबकि चीन, बंगलादेश और वियतनाम में यह क्रमश: 420 किलोग्राम, 278 किलोग्राम और 270 किलोग्राम है.

मुश्किल है डगर

प्रोफैसर अशोक गुलाटी कहते हैं, ‘‘खाद्य मांग में जोर के चलते साल 2022 तक इस टारगेट को हासिल कर पाना मुश्किल है, जब तक कोई बड़ा चमत्कार नहीं हो जाता.’’

वे आगे कहते हैं, ‘‘अगर यूरिया की खपत में 50 फीसदी की कमी करनी है तो अगले 3 साल में इस का आयात शून्य हो जाना चाहिए.’’

अशोक गुलाटी कहते हैं कि मैं ऐसा होते हुए नहीं देख रहा. उर्वरक वितरण में तस्करी और दूसरे उद्योगों में वितरण वगैरह लूपहोल को बंद करने से थोड़ाबहुत फायदा मिल सकता है लेकिन अगले 5 से 10 साल में भारत में कुल यूरिया की खपत बढ़ेगी.

इसी तरह से किसान कुछ सावधानी बरत कर उर्वरक की पहचान कर सकते हैं, जिस से उन के खूनपसीने की कमाई पर पानी न फिरे. हमारी सलाह है कि उन्हें छोटीमोटी दुकानों से इस तरह की चीजें खरीदने से परहेज करना ही मुनासिब रहेगा, क्योंकि छोटे दुकानदार कम ग्राहकों से ज्यादा फायदा वसूलना चाहते हैं.

साथ ही, किसानों को समय के साथ यूरिया के इस्तेमाल पर भी निर्भरता कम करनी चाहिए, क्योंकि देश में सब से ज्यादा यूरिया खाद का ही इस्तेमाल किया जाता है. इस से मिट्टी भी खराब न होगी और किसानों का पैसा भी बचेगा.

ऐसे पहचानें असली और नकली का फर्क

डीएपी की पहचान

* दाने कठोर और भूरे, काले और बादामी रंग के होते हैं. * आप खाद के कुछ दानों को हाथ में ले कर तंबाकू की तरह उस में चूना मिला कर मलें, अगर उस में तेज गंध निकले, जिसे सूंघना मुश्किल हो जाए तो समझें कि डीएपी असली है. * डीएपी के कुछ दाने धीमी आंच पर तवे पर गरम करें. अगर ये दाने फूल जाते हैं तो समझ लें कि असली हैं.

पोटाश की पहचान

* असली पोटाश सफेद पिसा नमक और लाल मिर्च जैसा मिश्रण के कण जैसा होता है. * पोटाश के कुछ दानों को नम करने पर आपस में नहीं चिपकें, यही इस की असली होने की पहचान है. * पानी में घुलने पर इस का लाल भाग पानी के ऊपर तैरता रहता है.

यूरिया की पहचान

* सफेद चमकदार लगभग समान आकार के कड़े दाने का होना. * पानी में पूरी तरह से घुल जाना. * घोल को छूने पर ठंडा मालूम होना. * यूरिया को तवे पर गरम करेंगे तो यह पिघल जाएगा. * आंच तेज करने से पूरी तरह दाने गायब हो जाएं तो समझें कि यही असली यूरिया है.

सुपर फास्फेट

* दाने सख्त और रंग भूरा, काला, बादामी रहेगा. * दानों को गरम करने पर भी न फूलें तो समझ लें कि यही असली है. * गरम करने पर डीएपी के दाने फूल जाते हैं, जबकि सुपर फास्फेट के दाने नहीं फूलते.

जिंक सल्फेट की पहचान

* इस के दाने हलके सफेद, पीले और भूरे बारीक कण जैसे होते हैं. * जिंक सल्फेट में प्रमुख रूप से मैग्नीशियम सल्फेट की मिलावट की जाती है. इस से असली जिंक की पहचान कर पाना काफी मुश्किल है. * डीएपी के घोल में जिंक सल्फेट का घोल मिलाने पर थक्केदार घना अवशेष बन जाता है, जबकि डीएपी के घोल में मैग्नीशियम सल्फेट का घोल मिलाने पर ऐसा नहीं होता है. * जिंक सल्फेट के घोल में पतला कास्टिक का घोल मिलाएं तो सफेद मटमैला मांड़ जैसा घोल बनता है. अगर इस में गाढ़ा कास्टिक का घोल मिला दें तो इस का घोल पूरी तरह से घुल जाता है.

* जिंक सल्फेट की जगह मैग्नीशियम सल्फेट का इस्तेमाल किया जाए तो यह सही तरह से नहीं घुलता है.

उपभोक्ता फोरम (Consumer Forum) किसानों के लिए उम्मीद की किरण

आप ने अकसर दुकानों में यह लिखा देखा होगा कि फैशन के दौर में गारंटी की इच्छा न करें, क्योंकि आज के दौर में नकली चीजों की भरमार हर जगह और हर वस्तुओं में है. इस से देश के किसान भी अछूते नहीं हैं.

पहली समस्या किसानों के सामने यह होती है कि वे लोग बहुत ही कम पढ़ेलिखे होते हैं. इस बात का फायदा दुकानदार, बीज, कैमिकल, कीटनाशक या खाद में कम नामतौल या फिर नकली सामान दे कर उठाते हैं. किसानों को जब इस की जानकारी मिलती है तब तक काफी देर हो चुकी होती है.

दुकानदार यह जानता है कि किसान हम से ज्यादा उलझ नहीं सकता और इसी तरह से साल दर साल किसान ठगे जा रहे हैं.

किसान कभी नकली बीज के नाम पर तो कभी कीटनाशक के नाम पर ठगा जाता है. लेकिन मुआवजे के नाम पर अकसर किसानों को कुछ नहीं मिलता है. लेकिन एक ऐसी संस्था है, जहां शिकायत कर के किसान अपने नुकसान की भरपाई कर सकता है और वह है उपभोक्ता फोरम.

इस संस्था में कोई भी किसान अपनी शिकायत दर्ज करा कर अपना हक पा सकता है. देश में गिनती के ही किसान हैं, जो ऐसे समय में उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटाते हैं.

देश में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत ‘उपभोक्ता फोरम’ में केवल उपभोक्ता ही शिकायत कर सकता है.

अनपढ़ता की वजह से किसान हमेशा से ही ठगे जाते रहे हैं. जब वे संबंधित लोगों से शिकायत करते हैं, तब उन्हें डराधमका कर चुप करा दिया जाता है. किसान अपनी मेहनत की कमाई नकली खादबीज के नाम पर गलती से लुटा देता है.

आज का किसान किसी बीमा कंपनी, बैंक या सेवा प्रदाता से पीडि़त होता है. वह इन की जिला स्तर पर उपभोक्ता फोरम में शिकायत कर सकता है. बस जरूरत इस बात की होती है कि किसान के पास कोई न कोई पुख्ता सुबूत जरूर हो. जैसे कि अगर बीज खराब निकल गया है तो किसान उस बीज की लैबोरेटरी में जांच करा ले, जिस से उस कंपनी के खिलाफ उस के पास पुख्ता सुबूत हों.

किसान पहले तो अपने लैवल पर भी उपभोक्ता फोरम में शिकायत कर सकता है. अगर इस में कोई परेशानी आती हो, तब वह वकील की मदद से भी शिकायत दर्ज करा सकता है.

किसानों को चाहिए कि वह जब भी बीज, खाद या कोई उपकरण खरीदे तो उन्हें इस की पक्की रसीद जरूर लेनी चाहिए, क्योंकि अकसर देखा जाता है कि किसान बिना किसी ठोस सुबूत के आते हैं. ऐसे में किसानों के सामने थोड़ीबहुत मुश्किलें जरूर आती हैं, मगर कोई भी किसान या किसानों का समूह उपभोक्ता फोरम के जरीए अपनी शिकायत दर्ज कर सकता है.

कुछ समय पहले बीटी कपास के बीज को विकसित करने वाली एक बड़ी बीज कंपनी ने किसानों से इस बात का दावा किया था कि बीटी कौटन कीटों के हमलों से बेअसर रहेगी, इसलिए आप इस की बोआई करें तो ज्यादा फायदा होगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इस बीटी कौटन में गुलाबी कीट यानी पिंक बालवर्म की वजह से महाराष्ट्र के तकरीबन 41 लाख कपास किसानों की फसलें चौपट हो गई थीं.

महाराष्ट्र सरकार ने बीज कंपनियों और बीजों की बिक्री करने वालों पर कार्यवाही की, मगर किसानों को अब तक कोई मुआवजा नहीं मिल सका है. दूसरी ओर महाराष्ट्र सरकार ने भी किसानों को प्रति हेक्टेयर 30,000 रुपए देने का आश्वासन दिया था.

ऐसे करें शिकायत

अगर किसी किसान को शिकायत करनी है तो पहले अफसर को सूचना दें और फिर उपभोक्ता फोरम में लिखित में शिकायत दें. किसान खुद अपने स्तर पर भी शिकायत कर सकता है और अगर वह ज्यादा जानकार नहीं है तो वकील की मदद भी ले सकता है.

किसान की शिकायत सही होने पर उसे पूरा मुआवजा संबंधित व्यक्ति या संस्था से दिलाया जाता है. शिकायत करने के लिए किसान के पास ऐसी पक्की रसीद या कागज होना चाहिए, जो उस की शिकायत का समर्थन करे.

शिकायत की 3 कौपी जमा होती हैं. इन में से एक कौपी उपभोक्ता फोरम के पास तो दूसरी कौपी विक्रेता के पास. तीसरी कौपी खुद किसान के लिए होती है. शिकायत के साथ पोस्टल और्डर या डिमांड ड्राफ्ट के जरीए फीस जमा करनी होती है.

अगर रसीद न हो तो…

किसान के पास खरीद की रसीद न होने की स्थिति में किसान एक शपथपत्र भी दे सकता है. किसान ने उक्त व्यक्ति या कंपनी से बीज खरीदा था और उस की सही सिंचाई और उर्वरक के इस्तेमाल के बावजूद फसल बरबाद हो गई. किसान का यह शपथपत्र मान्य होगा.

उपभोक्ता फोरम में किसान

मीडिया रिपोर्ट की मानें तो साल 2014 में छत्तीसगढ़ के रायपुर की आरंग तहसील के गांव परसदा के किसान नारद लाल साहू ने एग्री गोल्ड फूड्स ऐंड फार्म प्रोडक्ट कंपनी से वृही नाम का हाईब्रिड धान का बीज खरीदा था. कंपनी ने प्रति एकड़ 35 क्विंटल धान का भरोसा दिया था, मगर खराब बीज की वजह से फसल नहीं हुई.

किसान ने उक्त कंपनी से शिकायत की और कंपनी ने शिकायत को स्वीकार भी किया, मगर किसान नारद लाल को मुआवजा नहीं दिया. तब किसान ने जिला उपभोक्ता फोरम में शिकायत की और उपभोक्ता फोरम की अदालत ने किसान को 60,000 रुपए का मुआवजा दिलाया.

साल 2017 में उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के निवासी कमला देवी के पति भइयालाल की साल 2006 में ट्रेन हादसे में मौत हो गई थी. भइयालाल का किसान बीमा योजना के तहत एक लाख रुपए का बीमा हुआ था और सरकार की ओर से बीमा की धनराशि भी जमा की गई, मगर बीमा कंपनी आईसीआईसीआई लौंबार्ड इंश्योरैंस बीमा धनराशि का भुगतान नहीं कर रही थी.

इस के बाद उन की पत्नी कमला देवी ने उपभोक्ता फोरम में शिकायत की और अंत में फोरम ने बीमा कंपनी से किसान की बीवी को 12 फीसदी ब्याज के साथ एक लाख रुपए और मुकदमे पर खर्च हुई धनराशि का भुगतान करने का फैसला सुनाया.

इसी तरह मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के सोहागपुर ब्लौक के शोभापुर के बाशिंदे किसान आशुतोष उत्तम जैन ने साल 2012-14 में फसल का नुकसान होने पर कम बीमा राशि मिलने पर उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज कराई थी.

यह शिकायत उपभोक्ता संरक्षण समिति की ओर से किसान ने उपभोक्ता फोरम में दाखिल की. इस पर किसान ने बताया कि बकाया राशि 2 साल पहले मिलनी थी, मगर अब तक नहीं मिली है. इसलिए किसान को ब्याज के साथ राशि दी जाए.

इस मामले पर उपभोक्ता फोरम ने भारतीय स्टैट बैंक पर 20,000 रुपए का जुर्माना लगाया. इस के अलावा बैंक को परिवादी को 7,000 रुपए मानसिक प्रताड़ना के और वाद व्यय के 3,000 रुपए भी चुकाने का आदेश दिया गया.

किसान उपभोक्ता फोरम के जरीए ऐसे नुकसान का मुआवजा हासिल कर सकता है. किसान सिर्फ जिला स्तर पर ही नहीं, बल्कि राज्य स्तर पर और राष्ट्रीय स्तर पर भी शिकायत कर सकता है.

मोबाइल ऐप पर एसएमएस से जांचें मामला : उपभोक्ताओं के लिए राष्ट्रीय उपभोक्ता फोरम ने एसएमएस और मोबाइल ऐप के जरीए मामले की जांच की सुविधा दी है. इस के तहत उपभोक्ता वेबसाइट पर क्लिक कर केश इन्क्वायरी विकल्प पर जा कर एसएमएस की पूरी जानकारी हासिल कर सकता है, वहीं मोबाइल ऐप से जानकारी के लिए किसान को ऐप को डाउनलोड करना होगा, जिस से वह अपने मामले की संख्या से जानकारी ले सकता है.

इस तरह से किसान को अपनी मेहनत का पैसा मिल जाता है. इसे ठगने के लिए दुकानदार या बीमा कंपनियां बैठी रहती हैं. काफी समय से बीज भंडार वाले किसानों को हाईब्रिड बीज के नाम पर चूना लगा रहे हैं, क्योंकि बहुत कम किसान ही उन की शिकायत करते हैं.

इस से ज्यादा बीमा कंपनी के एजेंट किसानों के अशिक्षित होने का फायदा उठा कर उन से पैसे तो ऐंठ लेते हैं, लेकिन जब फसल खराब हो जाती है तब उन्हें दफ्तर के चक्कर काटने को मजबूर करते हैं. उपभोक्ता फोरम की मदद से कई किसानों को उन का हक मिला है. इस से उत्साहित हो कर किसान अब उपभोक्ता फोरम की चौखट पर जाने लगे हैं.