Fake Pesticides : खेती में आजकल कीटनाशकों, खरपतवार नाशकों और जैविक खाद का प्रयोग तेजी से बढ़ रहा है. जिस तरीके से अच्छे उत्पादों का प्रचलन बढ़ रहा है उसी तेजी से नकली कीटनाशकों, नकली खरपतवार नाशकों और बिना गुणवत्ता वाले जैविक कीटनाशकों, जैविक खादों का प्रचलन भी लगभग 30 से 40 फीसदी हमारे भारत में ग्रो कर रहा है.
नकली कीटनाशकों से मिट्टी और स्वास्थ्य पर खतरा
इन नकली कीटनाशकों की वजह से किसानों को हर साल भारी नुकसान उठाना पड़ता है. किसान के साथ-साथ हमारी मृदा पर भी इस के दुष्परिणाम देखने को मिलते हैं. इस नकली कीटनाशक का प्रचलन बढ़ने से हमारे स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ रहा है, क्योंकि इसमें अच्छे परिणाम के लिए कई गुना डोज को बढ़ाया जाता है, जिससे किसान को अच्छे परिणाम मिल सकें.
तारीख नई, माल पुराना: बाजार में एक्सपायरी खेल
इस नकली कीटनाशक का प्रचलन बढ़ने का एक बड़ा कारण यह है कि बड़ी मल्टीनैशनल कंपनियां अपने पुराने स्टॉक को, जो लगभग 2 से 3 माह बाद एक्सपायरी में होता है, व्यापारियों को सस्ते दामों में भारीभरकम छूट पर बिल कर देती हैं. इसमें व्यापारी को 40 से 50 फीसदी डाउन पेमेंट बिल करती है और वही मैटेरियल बाजार में बिकता है. कहीं रीपैक होकर, कहीं डेट बदलकर बाजार में माल बेचा जाता है.
यही सस्ता और रीपैक किया गया माल असली और नए उत्पादों की बिक्री को प्रभावित करता है, क्योंकि नया माल महंगा होता है और पुराना सस्ता, जिससे नया माल बाजार से वापस लौट जाता है.
नियर एक्सपायरी उत्पादों पर नियंत्रण की जरूरत
इस स्थिति को देखते हुए आवश्यक है कि कंपनियों को एक्सपायरी से काफी पहले तक ही माल बेचने की अनुमति दी जाए और जो उत्पाद एक्सपायरी के बहुत करीब हों, उन्हें बाजार में उतारने पर रोक लगे. यदि ऐसा किया जाए तो डुप्लीकेसी पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है, क्योंकि कंपनियां ऐसे उत्पादों पर भारी छूट नहीं दे पाएंगी.
साथ ही यह भी सामने आया है कि बड़े स्टॉकिस्ट हजारों लीटर माल खरीदकर अपने नाम से रीपैक कर बाजार में बेचते हैं, जिससे नकली उत्पादों का प्रसार और तेज हो जाता है.
कीटनाशक कंपनियों और बाजार पर निगरानी की कमी
एफआईसीसीआई जैसी संस्थाएं कीटनाशक कंपनियों और सरकारी संस्थाओं के बीच समन्वय का कार्य करती हैं और जागरूकता भी फैलाती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर निगरानी की कमी स्पष्ट दिखाई देती है. उदाहरण के तौर पर, खरपतवारनाशक का सीजन जुलाई में शुरू होता है, जबकि अप्रैल और मई में ही बड़ी मात्रा में ऐसा माल बाजार में उतार दिया जाता है जिसकी एक्सपायरी मई-जून में होती है, जबकि उसकी बिक्री जुलाई में होती है.
बाजार में कई कंपनियां हैं और बड़े स्टॉकिस्ट भारी मात्रा में एक्सपायरी के करीब का माल खरीदते हैं, लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं होती. इसके विपरीत छोटे स्तर पर काम करने वाले लोगों पर जल्दी कार्रवाई हो जाती है, जबकि बड़े स्तर पर हो रहे इस व्यापार को नजरअंदाज कर दिया जाता है. यदि बड़े स्टॉकिस्टों पर सख्ती से कार्रवाई की जाए तो नकली कीटनाशकों की बिक्री में तुरंत कमी लाई जा सकती है.
3,000 करोड़ का नकली बाजार: सख्त कार्रवाई की मांग
बाजार में लगभग 3,000 से 3,200 करोड़ रुपए का नकली कीटनाशक बिक रहा है. इस पर सख्त कार्रवाई की जरूरत है, ठीक उसी तरह जैसे नोटबंदी के दौरान सख्ती दिखाई गई थी. किसान आज भी यह समझ नहीं पाता कि कौन सा उत्पाद असली है और कौन सा नकली, वह सिर्फ सस्ता विकल्प चुनने के लिए मजबूर होता है.
छोटे व्यापारियों का योगदान और उनकी अनदेखी
हमारे कृषि मंत्री महोदय प्रतिदिन किसानों के लिए अच्छे उत्पादों की बात करते हैं, जो सराहनीय है. लेकिन यह भी सच्चाई है कि हरित क्रांति में छोटे व्यापारियों का भी बड़ा योगदान रहा है. उन्होंने किसानों को व्यक्तिगत स्तर पर जाकर उत्पादों की जानकारी दी, खेतों का निरीक्षण किया और समस्याओं का समाधान बताया.
आज भी कई ईमानदार व्यापारी हैं जो किसानों का नुकसान नहीं चाहते, लेकिन पूरे व्यापार वर्ग को एक ही नजर से देखना उचित नहीं है.
सरकारी उत्पादों की गुणवत्ता पर उठते सवाल
आज किसान खुद यह कहता है कि कई बार सरकारी उत्पादों में गुणवत्ता की कमी होती है. बाजार में एक ही तकनीक वाले उत्पाद अलग-अलग कंपनियों द्वारा अलग-अलग कीमतों पर बेचे जाते हैं, जिससे गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं.
‘सुविधा शुल्क’ और सैंपल पास करने का खेल
बाजार में यह भी देखने को मिलता है कि कुछ कंपनियां अधिकारियों से सांठगांठ कर ‘सुविधा शुल्क’ देकर अपने फेल सैंपल को भी पास करवा लेती हैं. इससे खराब गुणवत्ता वाले उत्पाद भी बाजार में पहुंच जाते हैं और किसानों को नुकसान होता है.
कीमत और गुणवत्ता का अंतर: बड़ा सवाल
बाजार में एक ही प्रकार का पाउडर 15 रुपए से लेकर 40 रुपए प्रति किलो तक बिकता है, जबकि दोनों पर जीएसटी समान लगता है. सस्ते उत्पाद की एमआरपी अधिक और महंगे उत्पाद की एमआरपी कम होने का अंतर यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं गुणवत्ता और मार्जिन का खेल चल रहा है.
जहां अच्छी गुणवत्ता वाले उत्पाद पर व्यापारी को कम मार्जिन मिलता है, वहीं कम गुणवत्ता वाले उत्पाद पर अधिक मार्जिन मिलता है, जिससे गलत उत्पादों को बढ़ावा मिलता है.
कार्रवाई में असमानता: व्यापारी बनाम कंपनियां
मौजूदा स्थिति में यदि किसी उत्पाद का सैंपल फेल होता है तो छोटे व्यापारी पर तुरंत कार्रवाई होती है, जबकि निर्माण करने वाली कंपनियों पर शायद ही कोई सख्त कदम उठाया जाता है.
इस संदर्भ में हाल ही में 27 अप्रैल को व्यापारियों द्वारा सांकेतिक हड़ताल भी की गई, जो काफी हद तक सफल रही. यह मांग उठी कि यदि व्यापारी के पास बिल नहीं है तो उस पर कार्रवाई हो, लेकिन यदि जीएसटी बिल मौजूद है तो जिम्मेदारी कंपनी की तय की जाए.
(यह लेखक का अपना तजुर्बा और उनके अपने विचार हैं)





