Crop Disease : आलू फसल पर जब लगे झुलसा रोग, कैसे करें उचित प्रबंधन

आलू की फसल तैयार होने के कगार पर है, लेकिन इन दिनों फसल पर झुलसा रोग लगने का खतरा भी अधिक होता है, जो आपकी फसल की उपज में कमी लाने का खास कारण है. कैसे करें इस रोग से रोकथाम और कैसे पाएं आलू की भरपूर पैदावार, आइए जानते हैं : Crop Disease

झुलसा रोग के क्या हैं लक्षण

आलू की फसल में झुलसा रोग एक प्रमुख रोग है, जो प्रायः फसल की बढ़वार के समय में दिखाई देता है. इसके लक्षणों में पत्तियों पर भूरे या काले रंग के धब्बे बनना तथा पत्तियों का सूखकर झुलस जाना शामिल है. रोग के बढ़ने पर तना और कंद भी प्रभावित हो जाते हैं, जिससे उपज और गुणवत्ता में भारी कमी आती, पत्तियां सूखकर गिरने लगती हैं और तना और कंद भी प्रभावित हो जाते हैं.

कब अधिक होता है रोग का खतरा  

यह रोग अधिक नमी, लगातार बरसात और अनुकूल तापमान की स्थिति में तेजी से फैलता है और ऐसे मौसम में आलू की फसल में झुलसा रोग होने की संभावना बढ़ जाती है,  Crop Disease इसलिए समय पर प्रबंधन जरूरी है.

कैसे हो रोग की रोकथाम

इस रोग की रोकथाम के लिए रोग-प्रतिरोधी किस्मों को लगाना, संतुलित मात्रा में उर्वरक प्रबंधन, फसलचक्र अपनाना और खेत में उचित जल निकासी आवश्यक है. इसके अतिरिक्त, मैंकोजेब या मेटालेक्सिल युक्त फफूंदनाशकों का समय पर छिड़काव करें. यह रोग नियंत्रण में काफी प्रभावी होता है.

क्या होता है फसल पर असर

झुलसा रोग होने के कारण आलू कंदों का आकार छोटा रह जाता है और भंडारण क्षमता भी घट जाती है. इसकेनियंत्रण के लिए रोग-प्रतिरोधी किस्मों का चयन, Crop Disease संतुलित उर्वरक प्रयोग, उचित फसलचक्र अपनाना और खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था आवश्यक है.

आलू की पूरे साल मांग रहती है, इसलिए आलू से अच्छी उपज लेने के बाद उसे लंबे समय तक भंडारित किया जा सकता है और जब बाजार में अच्छा भाव मिले उस समय उसकी बिक्री कर अच्छा लाभ भी लिया जा सकता है.

Fruits in Crisis : बिना पके ही टपक रहे फल

बागबानी में आजकल एक नया खतरा मंडरा रहा है. फल बिना पके ही पेड़ से का साथ छोड़ रहे हैं. फलों के राजा आम के अलावा संतरा, अमरूद जैसे फल बगैर तैयार हुए, Fruits in Crisis  बिना पके ही पेड़ों से टपक रहे हैं. इससे फल उत्पादकों को लाखों रुपए का नुकसान हो रहा है.

क्यों हो रहा है यह बदलाव

वैज्ञानिकों के मुताबिक इंसानों की तरह पौधों में भी हार्मोन होते हैं और पौधों की वृद्धि तथा उत्पादन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है, जो फूल आने से लेकर फल विकास तक हर प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं और जब पेड़ तनाव में होता है तो यह हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं. Fruits in Crisis ऐसे में पेड़ अपने अस्तित्व को प्राथमिकता देता है और फल गिरना शुरू हो जाता है.

शोध में पाया गया है कि तनाव के कारण कार्बोहाइड्रेट की आपूर्ति बाधित हो जाती है जो फल के विकास के लिए बहुत जरूरी है और मेटाबॉलिज्म क्रिया में बाधा उत्पन्न हो जाने के कारण बिना पके ही फल पेड़ से टपकने लगते हैं.

जलवायु परिवर्तन भी कारण

वैज्ञानिकों का दावा है कि जलवायु संकट इतना गंभीर है कि कई बार सिर्फ 0.1 फीसदी फल ही पूरी तरह परिपक्व हो पाते हैं.

बागवानों का है कहना

सीतापुर के किसान बागबान अखिल का कहना है कि जलवायु और पर्यावरण की प्रतिकूलता से आम के पेड़ों से फल डंठल छोड़ देते हैं और तापमान में बदलाव से बोर कमजोर हो जाता है, जिससे फल नहीं लगते हैं. कई बार फल लगते हैं, लेकिन सूखकर गिरने लग जाते हैं.

हरदोई के बागबान राम किशोर कहते हैं कि पहले आम के बार में कीड़े लग रहे थे. उचित प्रबंधन के बाद भी आम का संरक्षण कठिन होता जा रहा है.

दुलौहेडा ग्राम के ग्राम प्रधान बाल किशोर ने बताया कि कुछ वर्षों से जलवायु परिवर्तन के कारण या कोई अन्य हार्मोनल परिवर्तन के कारण आम की फसल के अलावा नीबू के पेड़ों पर भी बिना मौसम फल टपकने की समस्या देखी गई है.

इसके अलावा पेड़ में पोषण की कमी भी कभी-कभी फल टपकने का कारण होता है, इसलिए इसका समाधान भी जरूरी है.

कैसे हो समाधान

किसी भी पौधों के संतुलित पोषण के लिए 17 पोषण तत्वों की आवश्यकता पड़ती है. लेकिन जब इनमें कमी होती है तो पौधों की मेटाबॉलिक क्रिया प्रभावित हो जाती है, जिसके कारण पौधों के संतुलित विकास में रुकावट आती है.

बोरोन और जिंक की कमी से भी कभी-कभी पौधों से बिना पके फल टपकने लगते हैं, इसलिए फल वाले वृक्षों पर विशेष ध्यान रखने की जरूरत है. Fruits in Crisis  हार्मोन तथा पोषण तत्वों को समय पर फल वाले पौधों को उपलब्ध करा देंगे तो बागबान इस समस्या से काफी हद तक बच सकते हैं.

जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहे बदलाव में सभी को सतर्क रहना है और इसके बचाव के लिए हर संभव कदम प्रत्येक नागरिक को उठाना है.

Vegetable Preservation कम लागत में कैसे करें फल-सब्जियों का रखरखाव

कम लागत में फल और सब्जियों के रखरखाव के आसान तरीके जानें. रासायनिक परिरक्षण, किण्वन विधि और घरेलू उपायों से फलों-सब्जियों को लंबे समय तक सुरक्षित रखें.Vegetable Preservation

मौसम में मिलने वाली सस्ती सब्जियां, फल और गृहवाटिका से प्राप्त ताजे उत्पाद जल्दी खराब हो जाते हैं. इन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए डब्बाबंदी, फ्रीजिंग, निर्जलीकरण और शीत भंडारण जैसे तरीके अपनाए जाते हैं,Vegetable Preservation लेकिन ये तरीके महंगे और आम लोगों की पहुंच से बाहर होते हैं.

ऐसे में जरूरी है कि सरल, सस्ते और घरेलू उपायों को अपनाकर फलों और सब्जियों का सुरक्षित रखरखाव किया जाए.

कम लागत में फल-सब्जियों के रखरखाव के लाभ

• परिरक्षण से फलों व सब्जियों के पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं
• किसानों को मौसम में उपज औने-पौने दामों पर बेचने की मजबूरी नहीं रहती
• आम उपभोक्ताओं को भी उचित कीमत पर फल-सब्जियां मिलती हैं
• साधारण तरीकों से परिरक्षित उत्पादों को ऑफ-सीजन में भी उपयोग किया जा सकता है

फलों और सब्जियों के रखरखाव के आसान तरीके

फलों और सब्जियों को सुरक्षित रखने के लिए निम्न घरेलू और सस्ते उपाय अपनाए जा सकते हैं:
• रासायनिक घोल द्वारा परिरक्षण
• किण्वन विधि
• अचार, चटनी, जैम, शरबत और स्क्वैश बनाना
• धूप में सुखाना

रासायनिक परिरक्षण विधि

फल-सब्जियों के परिरक्षण के लिए कुछ साधारण खाद्य रसायन बाजार में आसानी से उपलब्ध होते हैं और ये अधिक महंगे भी नहीं होते.

उपयोगी रसायन Vegetable Preservation

• नमक
• ग्लेशियल एसिटिक एसिड
• पोटैशियम मेटाबाइसल्फाइट
• सोडियम बेंजोएट
इन रसायनों की मदद से फलों और सब्जियों को कांच या चीनी मिट्टी के जार में सुरक्षित रखा जा सकता है.

इस विधि के फायदे

• सरल और कम खर्चीली विधि
• डब्बाबंदी की तुलना में फल-सब्जियों की प्राकृतिक बनावट सुरक्षित रहती है
• मटर जैसी सब्जियों में बनावटी रंग डालने की जरूरत नहीं
• सल्फर डाइऑक्साइड (पोटैशियम मेटाबाइसल्फाइट से प्राप्त)
विटामिन और पोषक तत्वों की रक्षा करता है
• सामान्य तापमान पर फल-सब्जियां 6 महीने तक सुरक्षित
• 1–3 डिग्री सेल्सियस पर 1 साल से अधिक समय तक भंडारण संभव

किण्वन द्वारा सब्जियों का परिरक्षण

किण्वन एक प्राकृतिक और सुरक्षित विधि है, जिससे सब्जियों को लंबे समय तक खराब होने से बचाया जा सकता है. इस प्रक्रिया में सब्जियों की प्राकृतिक शर्करा, लैक्टिक अम्ल में बदल जाती है, जो उन्हें सुरक्षित रखती है.

किण्वन के लिए सब्जियों का चयन

• सब्जियां ताजी हों
• सड़ी-गली या ज्यादा पकी न हों
• साफ पानी से अच्छी तरह धोएं
• काटने के लिए केवल स्टील के चाकू का उपयोग करें

उपयुक्त सब्जियां

• पत्तागोभी (बंदगोभी)
• गाजर
• मूली
• शलजम
• मटर
• फूलगोभी
• अधपके टमाटर
• सेम
• फलों में अधपका पपीता

किण्वन की विधि

• सब्जियों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें
• 2–3% नमक और 1–1.5% राई मिलाएं
• सभी सामग्री को अच्छी तरह मिलाकर कांच के जार में गर्दन तक भरें
• जार को पहले अच्छी तरह धोकर सुखा लें
• रोज एक बार जार को हल्का हिलाएं
• जार को छायादार और ठंडी जगह पर रखें

भंडारण अवधि

• सामान्य तापमान पर: 1.5–2 महीने
• 4–5 डिग्री सेल्सियस पर: 4–5 महीने तक सुरक्षित

फलों का रस व गूदा बनाकर संरक्षण

ताजे फल जल्दी खराब हो जाते हैं, इसलिए उन्हें रस या गूदे के रूप में सुरक्षित किया जा सकता है.
इनका उपयोग बाद में स्क्वैश, शरबत, जैम, चटनी बनाने में किया जा सकता है. इस तरीके से पूरे साल अलग-अलग फलों के स्वाद का आनंद लिया जा सकता है.

Brinjal: अब बैगन खाने से नहीं होगी एलर्जी

Vegetables : बैगन (Brinjal) एक ऐसी भारतीय सब्जी जो हमेशा अपने लाजवाब स्वाद के लिए जानी जाती है. किसी को बैगन (Brinjal) का भरता पसंद है, तो किसी को भरवां बैगन (Brinjal) पसंद है.खास कर बिहार में तो बैगन (Brinjal) की खासी मांग है, क्योंकि वहां का एक खास व्यंजन है, लिट्टी चोखा. जिस का स्वाद बैगन के बिना अधूरा है.

पिछले दोनों बिहार कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की टीम ने 7 साल के शोध के बाद इस नए किस्म के बैगन (Brinjal) की खोज की है, जिस का नाम ‘सबौर कृष्णकली’ रखा गया है. बैगन की इस प्रजाति का बड़ा ही सुंदर नाम है. जैसा नाम से ही पता चलता है कि यह कोई बड़ी ही गुणकारी और स्वादिष्ट चीज होगी. जी हां, यहां ऐसी ही है. बैगन (Brinjal) की इस ‘कृष्णकली’ वैरायटी में नुकसान पहुंचाने वाले बीटी के लक्षण नहीं हैं.

इस के अलावा बैगन (Brinjal) को सड़ाने वाली फिमोसिस बीमारी भी इस में कम होती है. इस की खास बात यह है कि बीजों की संख्या कम होने के कारण बैगन (Brinjal) से एलर्जी वाले व्यक्ति भी इस का सेवन कर सकते हैं. हम लोगों की ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा बीज वाले बैगन को अकसर बिजारे बैगन भी कह देते हैं, जिसे लोग कम पसंद करते हैं. लेकिन ये वैरायटी सभी को पसंद आएगी, क्योंकि इस में गुण ही ऐसे हैं.

‘सबौर कृष्णकली’ बैगन न सिर्फ स्वाद और गुणवत्ता में बेहतर है बल्कि, इस की उत्पादकता भी अब तक प्रचलित बैगन की प्रजातियों से काफी अधिक है.

मिलेगी अधिक उपज

अगर इस की खेती वैज्ञानिक तरीके से की जाए तो इस की उत्पादकता 430 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होगी. आमतौर पर सामान्य किस्म के बैगन की उत्पादकता 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर ही होती है. इस किस्म की खासियत यह है कि इस के 170 से 180 ग्राम साइज के फल में बीजों की अधिकतम संख्या 50 से 60 ही होती है. वहीं दूसरी प्रजाति के बैगनों में 200 से 500 की संख्या तक बीज होते हैं.

वैज्ञानिकों के अनुसार बैगन से आमतौर पर कई लोगों को एलर्जी होती है. क्योंकि कुछ लोगों को यह एलर्जी बैगन के बीजों के कारण ही होती है. ऐसे में यह कम बीज वाला बैगन उन के लिए भी उपयुक्त होगा, जिन को बैगन खाने से एलर्जी होती है.

इस की खेती सामान्य बैगन की तरह खरीफ से ठंड के मौसम तक यानी 8 महीने तक की जा सकती है. ‘कृष्णकली बैगन’ स्वाद में मजेदार और अधिक पैदावार देने वाली फसल के साथ ही गुणवत्ता के साथ एक बार लगाने पर लंबे समय तक उपज भी देती है.

Crop Diversification : फसल विविधीकरण खेती से ज्यादा मुनाफा

Crop Diversification : आज कल दिनोदिन खेती के तौरतरीकों में बदलाव आ रहा है. किसान कम समय में अधिक मुनाफा लेना चाहते हैं. फसल विविधीकरण ऐसी ही एक तकनीक है जो कम समय में अधिक मुनाफा दे सकती है. इन दिनों किसान परंपरागत खेती से अलग फसल विविधीकरण खेती की ओर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं. विशेषज्ञों का भी मानना है कि किसान फसल विविधीकरण खेती को अपना कर अपनी आय बढ़ा सकते हैं.

अब फसल विविधीकरण के फायदों को देखते हुए सरकार भी 2 हेक्टेयर या उस से कम जमीन वाले छोटे किसानों को इसे अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है. ताकि, कम रकबे वाले किसान भी कम जमीन में ही अलगअलग फसल लगा कर अधिक पैदावार ले कर अपनी आमदनी बढ़ा सकें.

क्या है फसल विविधीकरण?

फसल विविधीकरण खेती की एक ऐसी तकनीक है, जिस में विभिन्न तरह की फसल अथवा एक ही फसल की अनेक किस्में लगा कर खेती की जाती है. इस पद्धति में किसान कुछ अंतराल के बाद एक फसल को किसी अन्य फसल से बदल कर फसल विविधता के चक्र को बनाए रखने का काम करते हैं. सरल शब्दों में कहा जाए तो खेती की इस खास विधि से किसान एक ही खेत में अलगअलग फसलों की खेती कर सकते हैं.

फसल विविधीकरण से बढ़ेगी आमदनी

एक ही खेत में एक साथ कई फसलों को बोने से पानी, श्रम और पैसों की बचत तो होती ही है. साथ ही, एक ही खेत में कम जगह में ही अलगअलग फसलों से अच्छी पैदावार भी मिल जाती है.

फसल विविधीकरण से बढ़ती है मिट्टी की उर्वरता क्षमता

फसल विविधीकरण तकनीक से खेती करना किसानों के लिए मुनाफे का सौदा है. क्योंकि, यह तकनीक मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में भी कारगर है. एक ही खेत में लगातार हर साल एक ही फसल बोने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है. इसलिए फसल बदलबदल कर खेती करने से मिट्टी के उपजाऊपन में सुधार होता है. ऐसे में मिट्टी की सेहत को सुधारने के लिए फसल विविधीकरण अपना कर कम लागत में अधिक उत्पादन लिया जा सकता है. अगर मिट्टी की सेहत सुधरती है, तो इस से खेत जल्दी बंजर नहीं होंगे और उस भूमि पर लंबे समय तक खेती की जा सकेगी और फसल से पैदावार भी अधिक मिलेगी.

इस के साथ ही, फसल विविधीकरण खेती से पर्यावरण में सुधार के साथ पानी की भी बचत होती है. इसलिए कम जोत वाले किसानों के लिए यह एक मुनाफा देने वाली तकनीक है और किसान कम जगह में भी अच्छा मुनाफा ले सकते हैं.

Awards : उन्नत खेती करने वालों को मिला ‘फार्म एन फूड अवार्ड’

Awards : उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थ नगर जिले के बांसी में 25 जून 2024 को किसान सम्मान समारोह का आयोजन किया गया, जिस में उन्नत खेती करने वाले किसानों को ‘फार्म एन फूड अवार्ड’ से सम्मानित किया गया.

इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जिला परियोजना निदेशक प्रदीप पांडेय व विशिष्ठ अतिथि उप कृषि निदेशक डा. राजीव कुमार थे.

समारोह के मुख्य अतिथि प्रदीप पांडेय ने कहा कि जिले में किसानों के प्रति ऐसा कार्यक्रम सुखद अनुभूति पैदा कर रहा है. आने वाले समय में इस तरह के आयोजन समयसमय पर होते रहने चाहिए. इन से किसानों में नया जोश और नई क्रांति का संचार होगा.

विशिष्ठ अतिथि डा. राजीव कुमार ने कहा कि किसान देश की सवा अरब आबादी के पेट भरने का जिम्मा अपने कंधे पर ले कर चल रहे हैं. ऐसे में उन का सम्मान करना बहुत जरूरी है. उन्होंने कृषि से संबंधित अनेक जानकारियां भी किसानों को दीं.

Awards

कार्यक्रम में कृषि वैज्ञानिक डा. एसके तोमर, डा. एके पांडेय, एसके मिश्रा और कार्यक्रम संयोजक मंगेश दुबे के अलावा पूर्व विधायक ईश्वर चंद्र शुक्ला, श्रीधर मिश्र, मृत्युंजय मिश्र व सचिंद्र शुक्ला आदि भी मौजूद थे.

दिल्ली प्रेस पत्र प्रकाशन समूह की नामीगिरामी कृषि पत्रिका ‘फार्म एन फूड’ एक लंबे अरसे से किसानों के हितों के लिए काम कर रही है. इस पत्रिका के जरीए देश के मशूहर कृषि वैज्ञानिक किसानों को खेती की नई से नई जानकारियां मुहैया कराते रहते हैं.

अपने जानकारी भरे लेखों के जरीए कृषि वैज्ञानिक किसानों की कदमकदम पर मदद करते हैं. इस के अलावा वे किसानों के तमाम सवालों के जवाब भी ‘फार्म एन फूड’ के जरीए देते हैं. पत्रिका द्वारा किसानों को दिए जाने वाले अवार्ड काफी मशहूर हो रहे हैं.

Onion : गरमी का कवच है प्याज

Onion : प्याज काटते वक्त अकसर आंखों में आंसू आ जाते हैं, मगर आंखें भर देने वाला प्याज गुणों से भी भरपूर होता है. इस में पाए जाने वाले औषधीय तत्त्व सेहत के लिहाज से लाजवाब होते हैं. गरमी के जालिम मौसम में कच्चे प्याज का असर किसी अमृत से कम नहीं होता.

प्याज को सही मानों में गरमी का कवच कहा जा सकता है. यह हमारे शरीर को गरमी के मौसम में ठंडक पहुंचाता है. इस की असरदार तासीर गरमी की तमाम तकलीफों को दूर करने की कूवत रखती है, खासतौर पर मईजून की भयंकर लू के खिलाफ प्याज का कवच बेहद कारगर साबित होता है. खाने में रोजाना कच्चा प्याज शामिल करने से लू लगने का खतरा जड़ से गायब हो जाता है.

वैसे तो तमाम लोग सलाद में कच्चा प्याज शौक से खाते हैं, पर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें कच्चा प्याज खाने से परहेज होता है. दरअसल, ऐसे लोग चाह कर भी कच्चा प्याज नहीं खा पाते. कच्चा प्याज खाने से ऐसे लोगों का जी कच्चाकच्चा सा होने लगता है.

ऐसे नाजुक मिजाज लोग कच्चे प्याज की महक को झेल नहीं पाते. इस में दिक्कत वाली कोई बात नहीं है. ऐसे लोगों के लिए प्याज का लाभ उठाने का दूसरा रास्ता हाजिर है. साबुत प्याज को छिलके सहित थोड़ा सा बेक कर लें. इस के बाद उसे छील कर सलाद के रूप में खाएं. बेक किए गए प्याज का स्वाद काफी अच्छा लगता है.

वैसे प्याज की गंध से हैरानपरेशान होने वाले लोग ज्यादा नहीं होते, लिहाजा यह मसला बहुत कम सामने आता है. आमतौर पर तो खूबियों से भरपूर प्याज को लोग बहुत ही शौक से खाते हैं. एक गोपाल मामा थे. उन का लंच और डिनर देख कर लोग दंग रह जाते थे, क्योंकि दोनों वक्त वे 5-5 प्याज 2-2 टुकड़ों में कर के अपनी प्लेट में रखते थे और दालचावल सब्जीरोटी के साथ सारा प्याज जायका लेले कर चट कर जाते थे. यकीनन गोपाल मामा की सेहत बहुत अच्छी थी और कभी किसी ने उन्हें बीमार पड़ते नहीं देखा.

हकीकत तो यह है कि बगैर प्याज के लजीज नमकीन पकवानों की कल्पना भी नहीं की जाती. मटनचिकन व फिश से जुड़े तमाम पकवानों में भरपूर मात्रा में प्याज का इस्तेमाल किया जाता है. उम्दा किस्म की सभी सब्जियों में प्याज डाला जाता है.

हर तरह के सलाद में जरूरी तौर पर प्याज शामिल रहता है. इसी तरह भीगे मौसम में बनने वाले पकौड़ों में भी प्याज अव्वल नंबर पर पसंद किया जाता है. जब प्याज 100 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बिकता है, तब भी प्याज के कायल उस के बगैर रह नहीं पाते और किसी नशेड़ची की तरह अपनी गाढ़ी कमाई महंगे प्याज पर लुटाते हैं.

झुग्गीझोंपड़ी में रहने वाले लोग भी और चाहे कुछ न खाएं पर मोटीमोटी रोटियों के साथ प्याज खाने से नहीं चूकते. भले ही उन्हें कच्चे प्याज के औषधीय गुणों की जानकारी नहीं होती, पर वे उसे जानेअनजाने में खाते छक कर हैं. अलबत्ता जब प्याज बहुत महंगा हो जाता है, तब उन्हें उसे न खा पाने का बहुत ही ज्यादा मलाल रहता है.

औषधीय गुण

लहसुन की तरह ही प्याज में औषधीय गुण बेहिसाब होते हैं. पुराने जमाने में प्याज का इस्तेमाल प्लेग और कालरा जैसी खतरनाक बीमारियों के इलाज में किया जाता था. यह इलाज खासा कारगर साबित होता था. इतिहास के मुताबिक रोमन सम्राट नेरो सर्दी के मौसम में ठंड से बचाव के लिए प्याज का सेवन करते थे. प्याज की अहमियत से जुड़े ऐसे और भी वाकए इतिहास में दर्ज हैं.

गांवों में आज भी प्याज का तरहतरह से इस्तेमाल किया जाता है. गांव के लोग आमतौर पर डाक्टरी इलाज कम पसंद करते हैं, लिहाजा प्याज जैसी चीजें उन्हें काफी रास आती हैं. खांसी व सर्दीजुकाम जैसी तकलीफों में प्याज को काफी कारगर माना जाता है. वैद्य लोग लू व अस्थमा जैसी तकलीफों के इलाज में भी प्याज का बाकायदा इस्तेमाल करते हैं. गांवों में प्याज को लू के खिलाफ बेहद कारगर माना जाता है. लू से बचने के लिए गांव के लोग अपनी जेब में साबुत प्याज ले कर घर से बाहर निकलते हैं. अगर लू लग जाती है, तो प्याज और पोदीने का अर्क बतौर दवा बेहद कारगर साबित होता है.

वैज्ञानिकों के मुताबिक कच्चा प्याज खाना ज्यादा फायदेमंद होता है. भले ही इस का जायका कुछ तीखा होता है, पर इस का असर कमाल का होता है. कच्चे प्याज में आर्गेनिक सल्फर कंपाउंड और एक किस्म का तेल होता है. ये चीजें सेहत के लिहाज से फायदेमंद होती हैं. ये खूबियां पके प्याज में खत्म हो जाती हैं.

न्यूट्रीशनिस्ट कविता देवगन के मुताबिक आंत की सेहत के लिए प्रोबायोटिक जरूरी है. मगर प्रोबायोटिक को पचाने के लिए प्रीबायोटिक की जरूरत होती है और प्रीबायोटिक का काम करते हैं प्याज, लहसुन, राई और जौ. इसीलिए प्याज की अहमियत और बढ़ जाती है. प्याज में क्रोमियम भी होता है, जो ब्लडशुगर को नियमित करता है और डायबिटीज से हिफाजत करता है. इस में पाया जाने वाला बायोटिन त्वचा, बाल, लीवर व नर्वस सिस्टम के लिए जरूरी होता है. बायोटिन आंखों के लिए भी जरूरी है. लिहाजा ज्यादा से ज्यादा कच्चा प्याज खाना चाहिए. अगर कच्चा प्याज खाना हो, तो उसे काटने के बाद फौरन खा लेना चाहिए, क्योंकि कुछ देर रखा रहने से उस का असर कम हो जाता है.

Sandwich :जम्मू का कल्हाड़ी कुल्चा: पनीर ब्रेड सैंडविच

Sandwich : जम्मू कश्मीर देश का सब से मशहूर पर्यटन क्षेत्र है. पूरी दुनिया के लोग यहां घूमने आते हैं. जम्मू में वैसे तो खाने की बहुत सी चीजें मिलती हैं, पर कल्हाड़ी कुल्चा यहां की सब से खास खाने की डिश है. इसे यहां का स्ट्रीट फूड भी कह सकते हैं. जम्मू से श्रीनगर और पटनी टौप जाने के रास्ते में पड़ने वाली खाने की दुकानों में सब से ज्यादा कल्हाड़ी कुल्चा बिकता है. जब ब्रेड और पाव का चलन कम था, तो यह 2 रोटियों यानी कुल्चों के बीच रख कर तैयार किया जाता था.

अब यह ब्रेड या पाव के साथ रख कर तैयार होता है. यह एक तरह से पनीर ब्रेड सैंडविच होता है. पनीर का इस्तेमाल होने से यह खाने में बहुत टेस्टी और पौष्टिक होता है. इसे खाने के बाद देर तक भूख नहीं लगती है. पर्यटकों द्वारा पसंद किए जाने की वजह से इस की बहुत सारी दुकानें यहां मिलती हैं. यह रोजगार का अच्छा साधन बन गया है.

कल्हाड़ी कुल्चा बनाने के लिए दूध, नीबू का रस, ब्रेड, चाट मसाला, मीठी चटनी और कटे हुए प्याज की जरूरत पड़ती है. इसे बनाने के लिए सब से पहले दूध को गरम कर के ठंडा होने के लिए रख दें. इस में नीबू का रस डाल दें, जिस से दूध पनीर की तरह जम जाएगा और उस का पानी अलग हो जाएगा. दूध को सफेद कपड़े में बांध लें और जब इस का पानी निकल जाए तो तैयार पनीर को नीबू के आकार में गोलगोल कई हिस्सों में बांट लें. इस के बाद हाथ से दबा कर रोटी जैसा बना लें. अब इसे ठंडा होने के लिए फ्रिज या बरफ में रख दें. जब यह पूरी तरह से ठंडा हो जाए तो इस का कल्हाड़ी कुल्चा तैयार किया जा सकता है. खाने के लिए देने से पहले ब्रेड या पाव के बीच में 1 पीस गोल आकार वाले पनीर को रखते हैं. इस के बाद ब्रेड या पाव को फ्राईपैन पर रख कर गरम करते हैं.

गरम होने से पनीर पिघल जाता है. अब ब्रेड के ऊपर चाट मसाला डाल दिया जाता है, जिस से ब्रेड का टेस्ट बढ़ जाता है. इस के साथ खाने के लिए कटे हुए प्याज को मीठी चटनी में डाल कर दिया जाता है. मीठी चटनी और प्याज के साथ कल्हाड़ी कुल्चा खाने में बहुत टेस्टी लगता है.

उधमपुर जिले के बंसा बाजार में कल्हाड़ी कुल्चा की दुकान चलाने वाले सोहनलाल शर्मा कहते हैं कि 4 लीटर दूध में पनीर के 16 पीस तैयार होते हैं. 2 ब्रेड स्लाइसों के बीच पनीर का 1 गोल पीस रख कर फ्राई किया जाता है. इस के ऊपर चटपटा नमक डाल कर खाने के लिए दिया जाता है. साथ में मीठी चटनी और कटे प्याज के टुकड़े कल्हाड़ी कुल्चा के स्वाद को और बढ़ा देते हैं. 1 प्लेट कल्हाड़ी कुल्चा का दाम 30 से 40 रुपए के बीच होता है. इसे स्नैक्स के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. कल्हाड़ी कुल्चा केवल जम्मू और आसपास के शहरों में ही मिलता है.

Agricultural Machinery : निराईगुड़ाई व जुताईबोआई कृषि यंत्र

Agricultural Machinery  : हमारे देश की खेती पशुओं पर निर्भर रही है, लेकिन अब किसान खेती के नएनए तौरतरीके अपना रहे हैं. पहले निराईगुड़ाई जैसे काम के लिए काफी मजदूर लगाने पड़ते थे. समय बदलने लगा और मजदूरों की जगह मशीनों ने ले ली. कृषि मशीन निर्माता व अनेक संस्थाएं खेती की मशीनें बनाने लगे, जिन से किसानों का काम आसान हुआ.

अभी हाल ही में हमारे अनेक पाठकों ने निराईगुड़ाई की मशीन के बारे में जानकारी मांगी. उसी के संदर्भ में कुछ खास जानकारी :

‘पूसा’ पहिए वाला हो वीडर

यह बहुत साधारण प्रकार का कम कीमत का यंत्र है. इस यंत्र में खड़े हो कर निराईगुड़ाई की जाती है. इस का वजन लगभग 8 किलोग्राम है व इसे आसानी से फोल्ड कर के कहीं भी ले जाया जा सकता है. इस यंत्र को खड़े हो कर आगेपीछे धकेल कर चलाया जाता है. निराईगुड़ाई के लिए लगे ब्लेड को गहराई के अनुसार ऊपरनीचे किया जा सकता है. पकड़ने में हैंडल को भी अपने हिसाब से एडजस्ट कर सकते हैं. यह कम खर्चीला यंत्र है.

‘पूसा’ चार पहिए वाला वीडर

एकसार खेत से कतार में बोई गई उस फसल से खरपतवार निकालने के लिए यह अच्छा यंत्र है, जिन पौधों की कतारों के बीच की दूरी 40 सेंटीमीटर से अधिक है, क्योंकि इस मशीन का फाल 30 सेंटीमीटर चौड़ा है. इस मशीन को पकड़ कर चलाने वाले हैंडल को भी अपनी सुविधा के हिसाब में एडजस्ट कर सकते हैं.

इस यंत्र का वजन लगभग 11-12 किलोग्राम है. इसे फोल्ड कर के आसानी से उठा कर कहीं भी ले जाया जा सकता है. यह भी पूसा कृषि संस्थान, नई दिल्ली द्वारा बनाया गया है.

उपरोक्त दोनों यंत्र कृषि अभियांत्रिकी संभाग, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान पूसा, नई दिल्ली द्वारा बनाए गए हैं. इन के लिए आप इस संस्थान से संपर्क कर सकते हैं.

पावर टिलर द्वारा चालित यंत्र

यह कतार में बोई गई सोयाबीन, चना, अरहर, ज्वार, मक्का, मूंग आदि फसलों में निराईगुड़ाई के लिए उपयोगी यंत्र है. इस यंत्र को 8-10 हार्सपावर के पावर टिलर में जोड़ कर चलाया जाता है. इस की अनुमानित कीमत 1800 रुपए है.

यह यंत्र केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल द्वारा निर्मित है. आप इन के फोन नं. 2521133, 0755-2521139 पर संपर्क कर सकते हैं.

छोटा पावर वीडर

पैट्रोल से चलने वाला यह छोटा पावर वीडर निराईगुड़ाई के लिए अच्छा यंत्र है. इस में 2 स्ट्रोक इंजन लगा होता है. इस से 3 से 4 इंच गहराई तक निराईगुड़ाई होती है. इस के लिए जमीन में ल गभग 25 फीसदी नमी होना जरूरी है. इस यंत्र की कीमत तकरीबन 16 हजार रुपए है.

इस के अलावा 5 हार्स पावर के डीजल इंजन के साथ लगा कर चलाने वाले कई और वीडर भी उपलब्ध हैं, जिन की शुरुआत 65 हजार रुपए से होती है और मशीन के कूवत के हिसाब से यह कीमत बढ़ती जाती है.

डीजल इंजन के साथ अनेक मशीनें जैसे लैवलर, स्प्रे पंप, रोटावेटर, सीड ड्रिल आदि को जोड़ कर खेती के काम किए जा सकते हैं.

अधिक जानकारी के लिए आप राघवेंद्र कुमार से उन के मोबाइल नंबर 09670632555 पर बात कर सकते हैं.

इस के अलावा बीसीएस इंडिया प्रा. लि. लुधियाना, पंजाब की कंपनी भी वीडर मशीन बना रही है, जिस का कृषि यंत्र निर्माताओं में अच्छा नाम है.

आप इन से भी इन के फोन नं. 08427800753 पर बात कर के तफसील से पूरी जानकारी ले सकते हैं.

Farming Machine : मशीन से करें अरवी की धुलाई

Farming Machine : अरवी की खुदाई करने के बाद उस पर काफी मिट्टी लगी होती है, जिस की हाथों से धुलाई करना एक मुश्किल काम है और उस में समय भी ज्यादा लगता है. साथ ही मजदूरी भी ज्यादा लगती है. यही काम अगर मशीन से करें तो कम समय में ज्यादा काम निबटाया जा सकता है.

अरवी की धुलाई करने के लिए हरियाणा के महावीर जांगड़ा ने मशीन बनाई है, जो 2 साइजों में है. पहला साइज 12 फुट लंबाई में और दूसरा साइज 14 फुट लंबाई में है. इस मशीन में 10 हार्स पावर का डीजल इंजन भी लगा होता है.

इस मशीन से 1 घंटे में 40 से 50 क्विंटल तक अरवी की धुलाई की जा सकती है और इस मशीन में एक बार पानी भरने के बाद उस पानी को 4-5 दिनों तक इस्तेमाल में लिया जा सकता है, इसलिए पानी की भी खपत कम होती है.

अरवी के अलावा इस मशीन से गाजर, अदरक व हलदी जैसी अन्य फसलों की भी धुलाई की जाती है. यह मशीन अकसर अन्य मशीन निर्माताओं के पास उपलब्ध नहीं होती है, इसलिए यह मशीन अपनेआप में खास हो जाती है.

इस धुलाई मशीन से किसान अपने काम तो पूरे करता ही है, साथ ही आसपास के किसानों का भी काम कर के अच्छी कमाई कर सकता है. मशीन को किराए पर दे कर भी आमदनी बढ़ाई जा सकती है.

इस मशीन के बारे में यदि आप ज्यादा कुछ जानना चाहते हैं, तो अमन विश्वकर्मा इंजीनियरिंग वर्क्स के फोन नंबरों पर 09896822103, 09813048612, 01693-248612, 09813900312 पर बात कर सकते हैं.