फसल विविधीकरण, मूल्य वृद्धि और विपणन पर कार्यक्रम

उदयपुर: महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के संगठक, अनुसंधान निदेशालय के अधीनस्थ फसल विविधीकरण परियोजना के अंतर्गत 2 दिवसीय विस्तार अधिकारियों का प्रशिक्षण कार्यक्रम सहायक निदेशक, कृषि कार्यालय, बेगू, चित्तौड़गढ़ में संपन्न हुआ.

प्रशिक्षण कार्यक्रम में परियोजना अधिकारी डा. हरि सिंह ने परियोजना की जानकारी देते हुए फसल विविधीकारण एवं मूल्य संवर्धन के महत्व की जानकारी देते हुए बताया कि किसान किस प्रकार बाजार को देखते हुए अपनी फसलों का विविधीकरण व विपणन करेगा.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि शंकर लाल जाट, उपनिदेशक, उद्यान, चित्तौड़गढ़ ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए फसल विविधीकरण में मूल्य संवर्धन के महत्व को बताते हुए बताया कि मूल्य संवर्धन से किसानों की आय एवं रोजगार सृजन में वृद्धि होगी.

हरिकेश चैधरी, सहायक निदेशक कृषि, बेगू, चित्तौड़गढ़ ने प्रशिक्षणार्थियों को संबोधित करते हुए बताया कि फसल विविधीकरण से फसल की उत्पादकता, भूमि की उर्वराशक्ति बढ़ेगी एवं बाजार भाव भी ज्यादा मिलेगा.

मुकेश वर्मा, संयुक्त निदेशक, उद्यानिकी ने बताया कि बागबानी फसलों का फसल विविधीकरण में बड़ा महत्व है. बागबानी फसलों का मूल्य संवर्धन कर किसान दोगुनी आय एवं रोजगार प्राप्त कर सकता है.

जोगेंद्र सिंह, कृषि अधिकारी, उद्यान, चित्तौड़गढ़ ने बागबानी फसलों में जल प्रबंधन की तकनीकी जानकारी, उस में लगने वाले रोग एवं निदान पर विस्तार से बताया. डा. बुद्धि प्रकाश मीणा, पशु चिकित्साधिकारी, बेगू, चित्तौड़गढ़ ने पशुओं में नस्ल सुधार एवं पशुपालन प्रबंधन पर विस्तार से सरकारी योजनाओं का महत्व बताया.

कार्यक्रम में डा. हंसराज धाकड़, कृषि अधिकारी ने कृषि में सरकार की विभिन्न योजनाओं के बारे में जानकारी दी. कार्यक्रम में परियोजना से हेमंत कुमार लांबा, रामजी लाल बडसरा एवं एकलिंग सिंह उपस्थित थे. प्रशिक्षण कार्यक्रम में 40 कृषि पर्यवेक्षक एवं विस्तार अधिकारियों ने भाग लिया.

किसानों को लुभा नहीं सकी ‘आंकड़ों की खेती’

हमारे देश में बड़े कोरोना संकट के दौरान जिन करोड़ों किसानों ने रातदिन मेहनत कर के अन्न भंडारों को भर दिया था, उन को मोदी सरकार के इस बार के आम बजट ने बेहद निराश किया. संसद में भी इसे ले कर काफी चर्चा हुई और किसानों में भी.

बजट सत्र का पहला चरण 29 जनवरी से 13 फरवरी के बीच चला. लेकिन अब संसद की कृषि संबंधी स्थायी समिति  22 और 23 फरवरी के दौरान कृषि एवं किसान कल्याण, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग, मत्स्यपालन, डेरी एवं पशुपालन और खाद्य प्रसंस्करण के शीर्ष अधिकारियों को बजट की अनुदान मांगों पर तलब कर रही है. इस में भी बजट को ले कर काफी गंभीर चर्चा होगी और इस की रिपोर्ट बजट सत्र के दूसरे चरण में संसद में रखी जाएगी.

तीन कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब के किसानों ने जो आंदोलन शुरू किया था, उस का दायरा पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान होते हुए देश के तमाम हिस्सों में फैल चुका है. सरकारी स्तर पर आंदोलन को खत्म करने की सारी कोशिशें नाकाम रहीं.

हालांकि आम बजट किसान असंतोष को दूर करने का बेहतरीन मौका था, लेकिन सरकार इस में भी सफल नहीं हो सकी. देश के सभी प्रमुख किसान संगठनों ने इस बजट को बेहद निराशाजनक माना है.

संसद के बजट सत्र के पहले चरण में किसान असंतोष के साथ खेती की अनदेखी और निराशाजनक खास चर्चा में रहा.

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव और बजट पर सामान्य चर्चा में कई सांसदों ने कृषि और ग्रामीण विकास मद में धन आवंटन को असंतोषजनक माना. चंद योजनाओं को छोड़ दें, तो कृषि और संबद्ध क्षेत्र का आवंटन निराशाजनक रहा. सब्सिडी में कमी के साथ सरकार ने कृषि ऋण का लक्ष्य 16.5 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचा दिया है.

घाटे की खेती कर रहे किसानों को इस से आंशिक राहत भले ही मिले, लेकिन कर्ज के दलदल से बाहर आने का कोई रास्ता उन को नहीं दिखता है. इस नाते कृषि और ग्रामीण भारत के कायाकल्प का दावा फिलहाल इस बजट से दूरदूर तक पूरा होता नहीं दिख रहा है.

साल 2014 के बाद मोदी सरकार ने कृषि मंत्रालय का नाम बदल कर कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय करने के साथ साल 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिए लंबे लक्ष्य तय किए. पीएम किसान, किसान मानधन, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई परियोजना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, जैविक खेती, मृदा स्वास्थ्य कार्ड से ले कर जैविक खेती जैसी कई पहल की.

दूसरी हरित क्रांति और प्रोटीन क्रांति के दावे के साथ वंचित क्षेत्रों के विकास और उचित भंडारण व्यवस्था से ले कर एमएसपी के बाबत स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने का भी दावा किया गया.

बीज से बाजार तक कई अहम घोषणाएं हुईं और किसानों की आय बढ़ाने के लिए बड़े निवेश और 10,000 नए किसान उत्पादक संगठन यानी एफपीओ की स्थापना का लक्ष्य रखा गया. लेकिन ये सारे काम आधेअधूरे मन से हुए. खुद कृषि संबंधी स्थायी समिति ने अहम योजनाओं में आवंटन और प्रगति को असंतोषजनक माना है.

आंकड़ों के लिहाज से देखें, तो साल 2009 से 2014 तक यूपीए ने कृषि बजट में 1,21,082 करोड़ रुपए खर्च किए, जबकि मोदी सरकार के पांच सालों में 2014-19 के दौरान 2,11,694 करोड़ रुपए हो गए. लेकिन कृषि संकट के दौर में जब और मदद की दरकार थी, तो कृषि और ग्रामीण विकास बजट कम हो गया.

कृषि और संबद्ध गतिविधियों के लिए बजट आवंटन 2021-22 में 1,48,301 करोड़ रुपए कर दिया गया, जबकि इस मद में 2020-21 में 1,54,775 करोड़ रुपए का प्रावधान था.

इसे संशोधित अनुमान में घटा कर 1,45,355 करोड़ रुपए कर दिया गया. ग्रामीण विकास मद में भी अहम योजनाओं में कटौती कर दी गई. सब से बड़ी योजना मनरेगा का संशोधित बजट अनुमान 2020-21 में 1,11,500 करोड़ रुपए था, जिसे 2021-22 के बजट में घटा कर 73,000 करोड़ रुपए कर दिया गया.

राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम, जिस का संशोधित अनुमान वर्ष 2020-21 में 42,617 करोड़ रुपए था, उसे 2021-22 में घटा कर 9,200 करोड़ रुपए कर दिया गया.

मनरेगा योजना कोरोना संकट में वरदान बन कर उभरी थी, लेकिन सरकार ने जो आवंटन किया है, उस से लगता है कि गांव में रोजगार की अब दिक्कत नहीं रही.

खेती के उपयोग में आने वाली वस्तुओं की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. श्रम लागत, बीज, उर्वरक, कीटनाशकों, रसायनों से ले कर पेट्रोल और डीजल तक महंगे हुए हैं. ऐसे में खेती का बजट कम होने से इन की चुनौती और बढ़ी है.

किसानों की रासायनिक खाद मद में सब्सिडी घटा दी गई. इस मद में 2021-22 में 79,530 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है, जबकि 2020-21 का संशोधित अनुमान 1,33,947 करोड़ रुपए रहा. पेट्रोलियम पदार्थों पर दी जाने वाली सब्सिडी का भी कम होने का असर कृषि क्षेत्र पर दिखेगा.

खुद खाद्य सब्सिडी मद में 2021-22 में 2,42,836 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया, जबकि इस मद में 2020-21 में 4,22,618 करोड़ रुपए का संशोधित अनुमान था. इस का असर गरीबों पर पड़ना तय है.

इस समय कृषि क्षेत्र में केवल प्रधानमंत्री किसान योजना ही ऐसी है, जिस को कहा जा सकता है कि यह एक मददगार योजना है. लेकिन सीमित मायनों में यह चुनावी लाभ के लिए आरंभ की गई थी. इस मद में 2019-20 में 48,714 करोड़ रुपए का बजट आवंटन था, जो जिस का संशोधित अनुमान 2020-21 में 65,000 करोड़ रहा. इतना ही आवंटन 2021-22 में किया गया है और अगर पश्चिम बंगाल भी इस योजना में शामिल हो जाता है, तो पैसा कम पड़ेगा.

राज्यसभा में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने माना कि आरंभ में योजना में 14.5 करोड़ किसानों का आकलन किया गया था, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद 10 करोड़, 75 हजार किसान ही रजिस्टर्ड हो सके हैं. ऐसे में 65 हजार करोड़ रुपए में काम चलेगा.

इस बजट में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का आवंटन बढ़ा कर 16,000 करोड़ रुपए किया गया. यह योजना अभी किसानों को रिझा नहीं पा रही है, वहीं किसानों को मिलने वाले छोटी अवधि के कर्जों की ब्याज सब्सिडी के लिए 19,468 करोड़ रुपए का प्रावधान है.

कृषि शिक्षा और अनुसंधान के लिए बजट 2021-22 में मामूली बढ़ा कर 8,514 करोड़ रुपए पर लाया गया है, वहीं खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए आरंभ की गई प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना का बजट 700 करोड़ रुपए तक सीमित है. इस पर 2019-20 में 819 करोड़ रुपए का वास्तविक खर्चा हुआ था.

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इस बजट में 2018-19 में घोषित 22,000 ग्रामीण हाटों के विकास की कोई दिशा नहीं है, जो छोटे किसानों के लिए सब से मददगार बन सकती थी. 29 जनवरी, 2021 को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अपने अभिभाषण में 10 करोड़ छोटे और सीमांत किसानों पर ही अपने भाषण का फोकस रखा था.

सरकार की मंशा है कि आजादी के 75वें साल में किसानों की आमदनी दोगुनी हो जाए. लेकिन आमदनी बढ़ाने के लिए नीति निर्माताओं को जिन रास्तों पर संसाधन देना था, वह नहीं दिया गया है.

प्रधानमंत्री की एक बहुप्रचारित योजना 10 हजार किसान उत्पादक संगठनों या एफपीओ के गठन की रही है. इस से छोटे किसानों के जीवन को बदलने के लिए काफी उम्मीद जताई गई थी. लेकिन इस मद में इस साल 700 करोड़ रुपए का प्रावधान रखा गया है. 2020-21 में 500 करोड़ रुपए का प्रावधान हुआ था, जिसे घटा कर 250 करोड़ रुपए कर दिया गया.

हकीकत यह है कि उत्पादकता बढ़ाने और खेती की लागत घटाने के साथ कई पक्षों पर अभी बहुत काम करने की जरूरत है. किसानों ने रिकौर्ड अन्न उत्पादन कर पुराने कीर्तिमानों को तोड़ा है. लेकिन अगर हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के किसान सड़क पर हैं, तो इस हकीकत को समझना होगा कि खेती किस चुनौती से जूझ रही है. खुद भाजपा ने साल 2019 में अपने संकल्पपत्र में जो वायदा किया था, वह इस बजट में नजर नहीं आता.

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी सकल घरेलू उत्पाद के प्रथम अग्रिम अनुमान के मुताबिक, कोरोना संकट के बावजूद कृषि और संबद्ध क्षेत्र का जीवीए में हिस्सा 19.9 फीसदी तक पहुंच गया है. 2020-21 में इस क्षेत्र में वृद्धि का अनुमान 3.4 फीसदी है, वहीं 2011-12 के आधार मूल्य पर 2014-15 में यह 0.2 फीसदी, 2015-16 में 0.6 फीसदी, 2016-17 में 6.3 फीसदी, 2017-18 में 5 फीसदी, 2018-19 में 2.7 फीसदी रही थी.

इस बात को दरकिनार नहीं किया जा सकता है कि कृषि, उद्योग और सेवाएं अर्थव्यवस्था के सब से अहम क्षेत्र हैं और आपस में जुड़े हैं. वे एकदूसरे को प्रभावित करते हैं. इस नाते केवल आंकड़ों की बाजीगरी से कृषि क्षेत्र की चुनौतियों से पार पाना आसान नहीं दिखता है.

संसद की कृषि संबंधी स्थायी समिति की हाल ही में एक रिपोर्ट में कई अहम मसलों को उठाया गया है. समिति ने माना है कि बजट में कटौती की गई और प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना में अपेक्षित किसान जोड़े नहीं जा सके.

पूर्वोत्तर भारत में पंचायती और सरकारी भूमि पर खेती करने वाले और बंटाई पर खेती करने वालों को इस के दायरे में नहीं लाया जा सका, वहीं पूर्वोत्तर जैविक खेती मिशन के दायरे में 71,492 हेक्टेयर भूमि लाई जा सकी, जबकि लक्ष्य एक लाख हेक्टेयर का था.

प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना के तहत वृद्ध किसानों को 3 हजार रुपए तक पेंशन योजना के दायरे में कुल 20.35 लाख किसान शामिल होने को समिति ने निराशाजनक माना.

जैविक खेती में नजीर बना किसान

देश में घटता रकबा आने वाले दिनों में किसानों के पेट भरने लायक आमदनी देने में सक्षम नहीं दिखाई देता. ऐसे में किसानों को चाहिए कि वह समय की मांग के अनुसार खेती में कुछ ऐसा करें, जिस से न केवल उन का पेट भर सके, बल्कि परिवार के खर्च को भी निकाल सके.

ऐसे में उत्तर प्रदेश के जिला महाराजगंज मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर गांव अंजना के एक किसान ने बहुत ही कम जमीन पर खेती में कुछ ऐसा किया कि उन के हालात में सुधार आया, बल्कि उन्होंने आसपास के सैकड़ों परिवार को रोजगार के अवसर भी उपलब्ध कराए.

कृषि विषय में स्नातक नागेंद्र पांडेय ने जब पढ़ाई पूरी कर नौकरी की तलाश शुरू की, तो उन्हें यह नहीं पता था कि वह पूर्वांचल के जिलों में खेती की नजीर बन जाएंगे.

नागेंद्र पांडेय ने 20 वर्ष पूर्व नौकरी की तलाश करतेकरते यह मान लिया था कि उन्हें अब नौकरी नहीं मिलेगी. ऐसे में उन के पास एक ही चारा बचा था कि अपने पुरखों की थोड़ी जमीन पर गांव में ही रह कर खेती करें, लेकिन उन्हें यह नहीं सूझ रहा था कि वे खेती में ऐसा क्या करें, जिस से उन के परिवार का भरणपोषण अच्छे से हो पाए. उन्होंने अपनी कृषि की शिक्षा का प्रयोग अपने खेत में करने की ठानी. उन्होंने देखा कि अकसर छोटी जोत के किसान खाद व रसायनों की किल्लत से दोचार हो रहे हैं. इस के बावजूद महंगी खाद का प्रयोग करने से भी किसानों को अपेक्षित उत्पादन व लाभ नहीं मिल पा रहा है.

फिर क्या था, किसान नागेंद्र पांडेय ने यह निश्चय कर लिया कि वह अपनी थोड़ी जमीन में जैविक खादों को तैयार करेगें और बाकी बची जमीन में जैविक खेती करेंगे. उन्होंने इस के लिए सब से पहले वर्मी कंपोस्ट तैयार करने की सोची, इस के लिए उन्होंने वर्मी खाद तैयार करने के लिए प्रयोग आने वाले केंचुओं की प्रजातियों के लिए कृषि व उद्यान महकमे से संपर्क किया, लेकिन उन्हें विभाग से केंचुए नहीं मिल पाए.

इस के बाद वे गोरखपुर जिले के कैम्पियरगंज से मात्र 20 की संख्या में केंचुओं की व्यवस्था कर पाए. वे उन 20 केंचुओं की आइसीनिया फोरिडा प्रजाति को घर ले कर आए और उन्होंने 20 केंचुओं को पशुओं के चारा खिलाने वाली नाद में वर्मी कंपोस्ट में प्रयोग होने वाले गोबर व पत्तियों के बीच डाला. केंचुओं की नियमित देखभाल का ही परिणाम रहा कि 20 केंचुओं से उन के पास 45 दिनों बाद 2 किलोग्राम केंचुए तैयार हो चुके थे.

नागेंद्र पांडेय ने वर्ष 2001 में बिना किसी सहयोग के ही एक वर्मी पिट बनवाया और फिर शुरू हुआ इन के जीवन में बदलाव का एक नया अध्याय.

पूर्वी उत्तर प्रदेश के सब से बड़े वर्मी खाद के उत्पादक

Organic Farmingनागेंद्र पांडेय द्वारा 20 केंचुओं से शुरू किया गया वर्मी खाद उत्पादन का प्रयास इस समय पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिलों के किसानों के लिए मौडल स्थापित कर चुका है. बिना किसी सरकारी सहायता के महाराजगंज व गोरखपुर जिले में 3 बड़ीबड़ी यूनिट स्थापित कर चुके उन्होंने वर्मी खाद व वर्मी के केंचुओं को किसानो को बेच कर जहां एक तरफ जैविक खेती को बढ़ावा देने का काम किया है, वहीं इसी वर्मी कंपोस्ट के यूनिट के सहारे उन्होंने प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से सैकड़ों परिवारों को रोजगार दे रखा है.

नागेंद्र पांडेय ने अपने गांव में पहले उधार के पैसे से 120 वर्मी के गड्ढे तैयार कर उस पर टीनशेड डलवा कर व्यावसायिक स्तर पर काम शुरू किया, जिस में प्रति माह 750 क्विंटल खाद तैयार होती थी, जिस की पैकेजिंग व मार्केटिंग का काम भी यहीं से होता था. वर्तमान में वह 450 वर्मी बेड के जरीए हर साल लगभग 1,000 मीट्रिक टन वर्मी कंपोस्ट की खाद तैयार कर बाहर के राज्यों को भेजते हैं. इस के लिए उन के वर्मी कंपोस्ट यूनिट पर यहां प्रतिदिन बाहर से गाड़ियां भी आती हैं. उन के द्वारा बोरी 200 रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से किसानों के बीच बेची जाती है. इस के अलावा वे किसानों को निःशुल्क केंचुआ भी उपलब्ध कराते हैं. बाहर के लोग इन के यहां से 800 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से केंचुआ ले जाते हैं.

वे अपने यहां तैयार होने वाली वर्मी खाद की गुणवत्ता का विशेष खयाल रखते हैं. वे वर्मी कंपोस्ट बनाने के लिए किसानों से गोबर खरीद कर उसे वर्मी कंपोस्ट बनाने में प्रयोग करते हैं. इन के यहां तैयार होने वाली वर्मी खाद में किसी तरह की मिलावट नहीं की जाती है. वे समयसमय पर खाद की गुणवत्ता की जांच के लिए लैब टेस्ट कराते रहते हैं. इन के यहां तैयार होने वाले वर्मी खाद में सामान्य से अधिक नाइट्रोजन 1.8 फीसदी, फास्फोरस 2.5 फीसदी व पोटाश 3.23 फीसदी पाया गया है. इसलिए इस खाद से पौधों की बढ़वार व उपज दोनों अच्छी होती है. वे सामान्य तौर पर बेची जाने वाली वर्मी खाद की अपेक्षा अपने यहां की वर्मी खाद को बहुत ही कम रेट पर किसानों को उपलब्ध कराते हैं. जहां सामान्य रूप से बाजार में वर्मी कंपोस्ट 15 से 20 रुपया किलोग्राम बिक रहा है, वहीं इन के द्वारा तैयार खाद मात्र 7 रुपए प्रति किलोग्राम ही किसानों को उपलब्ध है.

परिवारों को मिला रोजगार

किसान नागेंद्र पांडेय के वर्मी पिट यूनिट में दर्जनों महिलायें काम करती हैं, जो वर्मी कंपोस्ट की पलटाई, पैकेजिंग इत्यादि का काम करती हैं. यहां इन्हें प्रतिदिन तय मजदूरी दी जाती है.

यहां काम करने वाली दुर्गावती का कहना है कि मनरेगा में नियमित रूप से काम नहीं मिल पाता है, लेकिन यहां हमें प्रतिदिन काम मिलना निश्चित है, वहीं यहा 5 सालों से काम करने वाली ज्ञानमती का कहना है कि अकसर मेरे पति की कमाई परिवार का खर्चा नहीं चला पाती थी, लेकिन अब मैं अपने गांव में ही रोजगार पाने में सफल रही हूं. वहीं बसंती के बच्चों की पढ़ाई का खर्चा यहां काम कर के निकलता है.

कुछ इसी तरह सिंघारी, सावित्री व कलावती जैसी तमाम औरतें भी यहां नियमित रूप से काम कर के अपने घर के खर्चे में पतियों को सहयोग कर रही हैं. इस के अलावा यहां तैयार खादों को बेचने वाले किसानों व गोबर की सप्लाई देने वाले किसानों की कमाई भी नागेंद्र पांडेय की बदौलत ही बढ़ी है.

जैविक खेती को मिला बढ़ावा

महाराजगंज जिले में नागेंद्र पांडेय के प्रयासों से जैविक खेती को बढ़ावा भी मिल रहा है, क्योंकि यहां की खादों को खेतों में डालने के बाद किसानों के खेतों में फसल की उपज में लगातार इजाफा देखने को मिला है. ऐसे में जहां किसान को नुकसान कम हो रहा है, वहीं लागत में कमी आने से मुनाफे में भी बढ़ोतरी हो गई है.

प्रयासों को मिली पहचान

नागेंद्र पांडेय द्वारा किए जा रहे प्रयासों को अब उन्हें उचित मुकाम मिलना शुरू हो गया है. गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ ने अपने गौशाला के गोबर निस्तारण के लिए गोरखनाथ मंदिर व चिकित्सालय के पास खाली पड़ी जमीन पर वर्मी कंपोस्ट यूनिट लगाने का काम किया. इस के अलावा नेपाल बार्डर के नजदीक भी इन्होंने 25,000 टन खाद तैयार करने का एक यूनिट लगाया है. अब आसपास के जिले के किसान भी इन के यहां जानकारी के लिए आने लगे हैं.

वाटर हार्वेस्टिंग का नायाब तरीका

Water Harvestingकिसान नागेंद्र पांडेय ने खेतों की सिंचाई में प्रयोग आने वाले पानी व वर्षा के पानी के लिए एक तालाब खुदवा रखा है, जिस में खेत से सीधा पाइप लगा कर जोडा गया है. वहां से अतिरिक्त पानी पाइप के रास्ते गड्ढे में इकट्ठा हो जाता है. जिस का प्रयोग वे दोबारा वर्मी पिट की नमी बनाने व खेतों की सिंचाई के लिए करते हैं.

करते हैं आधुनिक खेती

नागेंद्र पांडेय धान को श्रीविधि रोपाई कर के अधिक आमदनी प्राप्त करते हैं, वहीं गेहूं की बोआई सीड ड्रिल से कर के लागत में कमी भी लाने में सफल रहे हैं. वे अपने खेतों में वर्मी खाद व वर्मी वास का ही इस्तेमाल करते हैं.

वर्मी वास की रहती है मांग

नागेंद्र पांडेय ने ‘साश्वत’ नाम से जैविक खेती को बढ़ावा देने वाला एक ग्रुप यानी समूह बनाया है. इस के जरीए वे अपनी कृषि शिक्षा का प्रचारप्रसार भी कर रहे हैं. वे केंचुओं से वर्मी वास बनाते हैं, जिस में मटके में गोबर मिला कर उसे ऊपर टांग कर पानी डाल दिया जाता है, जिस में इन केंचुओं के हार्मोंस मिल कर बूंदबूंद बाहर आता है, जो फसलों में छिड़काव के काम आता है.

नागेंद्र पांडेय द्वारा स्थायी कृषि के किए जा रहे प्रयासों के बारे में जान कर गोरखपुर जिले के कमिश्नर, उपनिदेशक, कृषि, सीडीओ सहित तमाम लोग इन की यूनिट का भ्रमण कर चुके हैं और इन के प्रयासों की सराहना भी की.

नागेंद्र पांडेय की सफलता को ले कर सिद्धार्थनगर जिले के रहने वाले श्रीधर पांडेय का कहना है कि किसान नागेंद्र पांडेय ने जैविक खेती की दिशा में जो प्रयास किया है, वह दूसरे किसानों के लिए मिसाल बन गए हैं. उन्होंने न केवल जैविक खेती को बढ़ावा दिया है, बल्कि कई परिवारों को रोजगार का साधन भी मुहैया कराने में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. किसान नागेंद्र पांडेय के बारे में अधिक जानकारी या वर्मी कंपोस्ट तैयार करने की विधि की जानकारी के लिए आप उन के मोबाइल नंबर 9839198163 से संपर्क कर जानकारी ले सकते हैं.

खेती को व्यापार से जोड़ें किसान और रोजगार पैदा करें

हिसार : 11 अक्तूबर.
किसान देख कर तकनीक को जल्दी सीखता है, दुनिया के अंदर क्या चल रहा है, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लगातार आ रही नई तकनीकों को किसानों तक पहुंचाने के लिए भविष्य में इस किसान मेले का और भी विस्तार किया जाएगा, जिस में हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के साथ कृषि से जुड़े हर विभाग व निजी संस्थान एक पटल पर आ कर किसानों की आय बढ़ाने का काम करेंगे.

ये विचार हरियाणा के कृषि मंत्री जयप्रकाश दलाल ने कहे. कार्यक्रम की अध्यक्षता हकृवि के कुलपति प्रो. बीआर कंबोज ने की. मेले के दूसरे दिन ‘श्री अन्न एक सुपर फूड’ विषय पर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने विभिन्न सत्रों में उपस्थित किसानों को मोटे अनाज से बने व्यंजनों को थाली में शामिल करने के लिए प्रेरित किया.

कृषि मंत्री जेपी दलाल ने कहा कि मुझे खुशी है कि इस मेले के दौरान 47 सम्मानित किसानों को उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने राष्ट्रपति भवन में भोज के लिए न्योता दिया है. इस से साबित होता है कि यह सरकार किसानों की हितैषी है.

कृषि मंत्री जेपी दलाल ने मेले में उपस्थित किसानों की संख्या देख कर कहा कि यह किसान मेला बहुत महत्वपूर्ण कार्यक्रम है, जिसे हम भविष्य में और विस्तार देंगे, ताकि अधिक से अधिक किसानों को लाभ हो सके.

Farmersउन्होंने यह भी कहा कि किसानों की खेती को व्यापार से जोड़ना होगा, ताकि वे आत्मनिर्भर बनें और रोजगार पैदा करें.

वहीं हरियाणा ने झींगा उत्पादन में देश में अलग पहचान बनाई है. विश्वविद्यालय द्वारा बनाए गए उत्पादों पर किसानों को बहुत विश्वास है, जिस का उदाहरण इस मेले के दौरान लाभान्वित हुए किसान हैं. सरकार खेती को लाभान्वित बनाने के लिए किसानों के समूह बना कर उन्हें एफपीओ के माध्यम से सरकारी योजनाओं का लाभ लेते हुए नवीनतम तकनीक से जोड़ने का प्रयास कर रही है. इस कदम पर सरकार ने देश में 10 हजार एफपीओ बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है.

उन्होंने आगे कहा कि सरकार की तरफ से बाजरा, ज्वार व अन्य मिलेट्स पर भी अधिक ध्यान दिया जा रहा है, ताकि इन से बने पौष्टिक आहार के सेवन से किसानों व आमजन को स्वास्थ्य लाभ मिल सके. वर्तमान समय में तकनीकी के इस्तेमाल को देखते हुए कृषि विभाग ऐसा प्लेटफार्म देने का प्रयास करेगा, जिस से किसान सीधे तौर पर वैज्ञानिकों से जुड़ कर खेती में आने वाली समस्याओं का समाधान प्राप्त कर सकेगा.

किसानों के सवाल विश्वविद्यालय को करते हैं नए अनुसंधानों के लिए प्रेरित

Farmersकुलपति प्रो. बीआर कंबोज ने कहा कि जब से हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय बना है, तब से किसान मेले का आयोजन करवा रहा है. विश्वविद्यालय 6 लाख किसानों से मोबाइल एप के माध्यम से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है. इसी कड़ी में मौसम विज्ञान विभाग इन किसानों तक मौसम की पूर्वानुमान जानकारी लगातार पहुंचा रहा है, जिस से किसानों को सिंचाई, उर्वरक प्रबंधन, कीटनाशकों का छिड़काव व अन्य कृषि क्रियाएं समय पर करने से संबंधित निर्णय लेने में मदद मिल रही है.

इस विश्वविद्यालय की खास बात है कि जो काम होता है, वो सीधा किसानों तक पहुंचाया जाता है. उन्होंने किसानों की प्रश्नोत्तरी को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि किसानों के द्वारा पूछे गए नए सवाल हमारे लिए शोध के विषय हैं और उन की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए नए शोध किए जा रहे हैं.

उन्होंने मेले को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यहां हरियाणा सहित दिल्ली, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड आदि राज्यों से किसान पहुंचते हैं और मेले का लाभ उठाते हैं. सभी के साथ मिल कर विश्वविद्यालय का लक्ष्य किसानों के जीवन में सुधार लाना है.

मोटे अनाजों को बढ़ावा

उन्होंने मोटे अनाज का स्वास्थ्य में लाभ बताते हुए कहा कि मोटे अनाज के शोध कार्यों में विश्वविद्यालय अग्रसर है और सरकार ने बाजरे के आटे को भी जीएसटी से मुक्त किया हुआ है.

कुलपति डा. बीआर कंबोज ने बताया कि वर्ष 2023 को मोटे अनाजों के वर्ष के तौर पर मनाया जा रहा है. विश्वविद्यालय द्वारा तैयार की गई बायोफोर्टीफाइड किस्मों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि हाल ही में विश्वविद्यालय ने बाजरे की ऐसी किस्में विकसित की हैं, जो कि लौह तत्व व जिंक से भरपूर है व आमजन को विभिन्न बीमारियों व कुपोषण से नजात दिलाएगी. इस के अलावा मोटे अनाजों से विभिन्न मूल्य संवर्धित उत्पाद बनाने की तकनीक विकसित करने का काम हो रहा है.

नवाचार अपनाएं किसान

उन्होंने किसानों को नवाचार अपनाते हुए एकीकृत कृषि प्रणाली, जिस में कृषि के साथसाथ अन्य उद्यम जैसे मशरूम, मधुमक्खी, मशरूम, बागबानी, सब्जी उत्पादन, नकदी फसल, चारा फसल, पशुपालन, मुरगीपालन व मत्स्यपालन को शामिल कर के कृषि में जोखिम को कम करने व लाभदायक व्यवसाय बनाने की सलाह दी.

पशुपालन विभाग के चेयरमैन धर्मबीर मिर्जापुर ने भी सरकार द्वारा किसानों के हित में चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं के बारे में विस्तार से जानकारी किसानों को दी.

मेले में दूसरे दिन ‘मिलेट एक सुपर फूड और प्राकृतिक खेती’ विषय पर विभिन्न सत्र आयोजित किए गए, जिस में डा. हरिओम, डा. देवव्रत, डा. वीना सांगवान, डा. पम्मी और डा. उमेंद्र दत्त ने अपनेअपने विषयों पर जानकारी दी.

कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों व कृषि विभागों द्वारा लगाई गई स्टालों का मुख्य अतिथि सहित अन्य अधिकारियों ने अवलोकन भी किया.

कृषि एवं किसान कल्याण विभाग, हरियाणा के महानिदेशक डा. नरहरि बांगड़ ने धन्यवाद पारित किया. इस दौरान शमशेर सिंह खरकड़ा, विश्वविद्यालय के कुलसचिव डा. बलवान सिंह मंडल, मेला अधिकारी मीतू धनखड़ व अन्य अधिकारी मंच पर उपस्थित रहे.