गृह वाटिका में लगे पौधों को रखे हरा भरा

आज हमारे चारों ओर बड़ेबड़े भवनों का निर्माण होता जा रहा है, तो उन्हीं बिल्डिंगों के आसपास छोटेबड़े लौन, फुलवारी, बालकौनियों, यहां तक कि छतों पर भी कुछ न कुछ उपाय कर के कुछ फूलों, फलों, सब्जियों, सजावटी लताओं के पौधों को भी लगाया जा रहा है.

कहींकहीं जिन के पास बड़े आवास हैं, वे लोग अपने आवास के चारों ओर की चारदीवारी के अंदर बची हुई जगहों को गृह वाटिका में बदल कर दैनिक उपयोग के लिए सब्जियों, फूलों और फलों को उगा रहे हैं.

यह हकीकत है कि हम कितने भी आधुनिक क्यों न हो जाएं, हमारा पौधों के प्रति लगाव या कहें कि आकर्षण कम नहीं हो सकता है. मनुष्य की आवश्यकता और पेड़पौधों के आसपास रहने की आदत ने ही बागबानी की शुरुआत की है.

आजकल छोटे या बड़े कार्यालयों के बरामदे में रखने वाले और कम धूप में उग सकने वाले पौधे आसानी से मिल जाएंगे. मगर जितना ये पौधे हमें देखने में अच्छे लगते हैं, उतनी ही उन की देखरेख करने की भी आवश्यकता होती है. किसी भी गृह वाटिका में पौधों की वृद्धि, उत्पादन व सुंदरता पूरी तरह से वाटिका के प्रबंधन पर निर्भर करती है.

यदि दैनिक आवश्यकतानुसार फूल, फल व सब्जियां प्राप्त करने के लिए गृह वाटिका को बनाया गया है, तो हमें इस का प्रबंधन इस तरह करना चाहिए, जिस से कि कम लागत व कम से कम समय लगा कर अधिकतम उत्पादन को प्राप्त कर सकें. साथ ही, वे सुंदर व स्वच्छ भी बनी रहें. सुनियोजित रूप से गृह वाटिका का प्रबंधन कर के हम उस को हमेशा हराभरा बनाए रख सकते हैं, जिस के लिए हमें निम्नलिखित सुझावों को अपनाने की आवश्यकता है :

मृदा का शुद्धीकरण

सब से पहले जो भी मृदा हम उपयोग के लिए ले रहे हैं, उस का शुद्धीकरण करने की आवश्यकता होती है, अन्यथा मृदा में रहने वाले अनेक प्रकार के हानिकारक कीट या कवक पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं. जैसा कि देखा गया है कि गमलों, क्यारियों और नर्सरी के पौधों में सब से खतरनाक कवकजनित रोग तना सड़ने लगता है, जो पौधों की बढ़वार पूरी तरह से रोक देता है और पौधे सूख कर नष्ट हो जाते हैं.

इस रोग से बचने के लिए कैप्टान या थिरम को 5 ग्राम प्रति लिटर पानी के घोल का प्रयोग कवकनाशी के रूप में किया जा सकता है. यदि दीमक आदि का प्रकोप है, तो 2 से 4 मिलीलिटर क्लोरोपायरीफास को एक लिटर पानी में घोल कर लगभग 5 सैंटीमीटर गहराई तक की मिट्टी को तरबतर कर देने से दीमक नष्ट हो जाते हैं और हमारी पौधशाला कीटों व रोगों से सुरक्षित रहती है.

ऐसे करें बीजों की बोआई

गृह वाटिका में फूलों को सीधे बीज बो कर या पौधों की रोपाई द्वारा लगाया जाता है. हमेशा सीजन के अनुसार उगाने के लिए चयनित बीजों को किसी विश्वसनीय दुकान से ही लेना चाहिए. कुछ सब्जियां जैसे मटर, गाजर, मूली, शलजम, पालक, मेथी, बाकला, आलू, अदरक, हलदी और कुछ फूल जैसे हाली हार्ट, स्वीट पी आदि को निर्धारित समय पर तय दूरी पर बीज बो कर उगाया जाता है.

टमाटर, बैगन, मिर्च, गांठ गोभी, प्याज, फूलगोभी, पत्तागोभी आदि सब्जियों और अधिकांश मौसमी फूलों के बीज को पहले पौधशाला में उगाया जाता है, जिन में से बाद में स्वस्थ पौधों को क्यारियों में रोपा जाता है. इसलिए हो सके, तो उन के बीजों का उपचार भी कर लें.

कुछ पौधे ऐसे भी होते हैं, जो बरसात में खरपतवार की तरह हमें यहांवहां देखने को मिल जाते हैं, जैसे मकोय, भूमिआंवला, दूधीघास, अश्वगंधा, शतावर, तुलसी, दवनामरुआ, नागदोन, शंखपुष्पी आदि. इन की देखभाल के लिए कोई विशेष प्रबंध भी नहीं करना पड़ता. इसी तरह फलदार पेड़ों में भी पहले बीज या कलम से पौध तैयार करते हैं. बाद में उसे रोपण विधि से क्यारियों या वांछित स्थानों पर लगा देते हैं.

पौध प्रतिरोपण एक ऐसा उद्यान कार्य है, जिस में यदि पूरी सावधानी नहीं बरती गई, तो कभीकभी रोपे गए सारे पौधे नष्ट हो जाते हैं. पौध लगाते समय हम सभी को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए :

* पौध लगाते समय यह जानकारी अवश्य रखनी चाहिए कि पौधे वांछित किस्म के ही हों.

* पौधे स्वस्थ व निरोगी होने चाहिए.

* उखाड़े गए पौधे की जड़ें ढक कर रखनी चाहिए. उखाड़ने के बाद उन की यथाशीघ्र रोपाई कर देनी चाहिए.

* पौधो को निर्धारित दूरी पर ही लगाया जाना चाहिए.

* पौध रोपाई करते समय कुछ पत्तियां तोड़ देनी चाहिए और यदि शाखाएं अधिक हों, तो कुछ शाखाएं भी तोड़ देनी चाहिए.

* रोपण सायंकाल के समय करना उत्तम रहता है. इस से पौधों को रात के ठंडे तापमान में स्थापित होने का समय मिल जाता है.

* लगाते समय पौधे की जड़ों के पास अधिक उर्वरक नहीं देना चाहिए और उर्वरकों को पानी में घोल कर मिट्टी में मिलाया जाना अधिक उपयोगी रहता है.

* रोपण के तुरंत बाद उस की जड़ों के आसपास की मिट्टी को अच्छी तरह से दबा देना चाहिए, ताकि जड़ क्षेत्र में हवा न रहे.

* रोपण के तुरंत बाद सिंचाई अवश्य करनी चाहिए, जिस से पौधों की जड़ें मिट्टी के संपर्क में आ जाएं और वे तुरंत भोजन प्राप्त करना आरंभ कर दें.

* पेड़ों के लिए गड्ढा आवश्यकता से अधिक गहरा नहीं बनाना चाहिए.

* रोपण के समय पौधा सीधा खड़ा रहना चाहिए और उस का पर्याप्त भाग मिट्टी में दबा रहना चाहिए.

गृह वाटिका में लगाए गए पौधों को सहारा देना

लता वाली फसलों जैसे लौकी, तोरई, खीरा, करेला, अंगूर को सहारा देने की आवश्यकता होती है, क्योंकि यदि उन्हें सहारा न दिया जाए, तो वे भूमि पर फैल जाती हैं और उन पर लगने वाली सब्जियां भूमि के संपर्क में आने के कारण पूर्णाकार तक पहुंचने से पहले ही सड़ने लगती हैं, खासकर लौकी, जो लता वाली सब्जियों में काफी लंबी होती है. इस में यह देखा गया है कि यदि पौधों को सुचारु ढंग से सहारा दिया जाए और फलों को लटकने का अवसर मिल जाए, तो वे फल लंबे, चिकने व सुंदर होते हैं. यदि इन पौधों को सहारा नहीं दिया जाता है, तो इन में जो फल लगते हैं, वे आकार में टेढ़ेमेढ़े होते हैं.

इसी तरह कुछ लता वाले पुष्प भी होते हैं, जैसे मनी प्लांट, अपराजिता, रंगून क्रीपर, माधवी लता आदि, जिन को सुचारु रूप से सहारा दिया जाना आवश्यक होता है. थोड़ा सा ही सहारा मिलने पर उन की बढ़वार भी सही होती है और फूलों की गुणवत्ता भी बनी रहती है. ज्यादातर इस तरह के पौधों को बागड़ के पास उगाया जाता है, जिस से कि यह बाद में बागड़ पर चढ़ जाए और अच्छी तरह से फैल जाए. डहेलिया, ग्लेडियोलस, गुलदाउदी आदि में फूलों को सीधा रखने के लिए भी सहारा देना जरूरी होता है.

सहारा देने के लिए लकड़ी व बांस की बल्लियां, तार, डंडे, दीवार आदि प्रयोग किए जा सकते हैं. जहां जैसी सामग्री उपलब्ध हो, उसी के अनुसार प्रयोग किया जा सकता है. फूलों के लिए सुंदर दिखने वाले सहारे इस्तेमाल करने चाहिए. बांस को छील कर चिकनी बनाई हुई रंगरोगन लगी फट्टियां उपयुक्त रहती हैं.

फौर्मल पौधों के लिए सरकंडे की लकडि़यां अच्छी रहती हैं. डहेलिया व ग्लेडियोलस के लिए एक मजबूत लकड़ी पर्याप्त रहती है, जिस से पौधे के निकट जड़ों को बचाते हुए मिट्टी में गाड़ देना चाहिए. गुलदाउदी के पौधों को चारों ओर से कई लकडि़यां लगा कर एक घेरा सा बना दिया जाता है.

गृह वाटिका में लगे पौधों की कटाइछंटाई

गृह वाटिका में कुछ बहुवर्षीय पौधे भी लगाए जाते हैं, जिन्हें समयसमय पर कटाईछंटाई की आवश्यकता होती है. शोभाकारी झाड़ियों, फलदार पेड़ों, फूलों (जैसे आम, नीबू, संतरा, अनार, अमरूद, कटहल, गुड़हल, गुलाब, मोंगरा आदि) और कुछ बहुवर्षीय सब्जियों (जैसे परवल, कुंदरू आदि) में कटाईछंटाई की आवश्यकता पड़ती है.

ज्यादातर पर्णपाती पौधों में कटाईछंटाई दिसंबर से मार्च माह तक की जाती है और सदाबहार पौधों में जूनजुलाई व फरवरीमार्च, दोनों मौसमों में की जाती है. गुलाब में कटाईछंटाई अक्तूबर माह के पहले सप्ताह में की जाती है. रोगग्रस्त, सूखी और अनावश्यक शाखाओं को देखते ही निकाल देना चाहिए. ऐसी शाखाओं को काटने के लिए तेज चाकू या सिकेटियर का प्रयोग किया जाना चाहिए.

गृह वाटिका के पौधों की सुरक्षा

गृह वाटिका की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है, जितनी कि उसे बनाना. अवांछित पशुपक्षियों के अलावा राहगीरों और छोटे बच्चों से भी गृह वाटिका के पौधों का बचाव करना पड़ता है.

यदि घर के चारों ओर पक्की चारदीवारी नहीं है, तो कांटेदार तार या उपयुक्त पौधों की बाढ़ की रोक लगा देनी चाहिए. बाढ़ कंटीले तारों के अलावा कुछ पेड़पौधों से भी की जाती है, जो कि देखने में सुंदर और फूल वाली भी होती हैं.

छोटी बाड़ के लिए नागदोन, कनेर, करौंदा आदि का प्रयोग किया जा सकता है. नागदोन के पौधे गहरे हरे, हलके हरे रंगों में आते हैं. कुछ पौधे थोड़ा हरापन लिए सफेद पत्ती के होते हैं, जो देखने में भी बहुत आकर्षक लगते हैं. इस का प्रयोग बवासीर, पेट की कृमि (कीड़े) को दूर करने के लिए भी किया जाता है.

इस बाड़ के बाहर की तरफ और बड़े कंटीले पौधे लगाए जा सकते हैं जैसे कि बौगैन्वेलिया. यह विभिन्न रंगों में तो आता ही है, कंटीला भी होता है. इसे लगाने से 3 काम होते हैं, एक तो बगीचा सुंदर लगता है, रोजाना फूल भी मिल जाते हैं और कंटीली बाड़ भी बनी रहती है.

बौगैन्वेलिया कई रंगों वाली पाई जाती है और काफी जगह को घेरती है और घनी भी होती है. यह यदि बेल की तरह चढ़ा दी जाए, तो 2-3 मंजिल तक भी फैल जाती है यदि यह काटछांट कर के रखी जाए, तो बाड़ की तरह भी काम करती है.

इसी तरह फल के मौसम में तोते आदि पक्षियों को भगाने के लिए किसी पेड़ से टिन आदि बांध कर घर के भीतर से ही उसे बीचबीच में हिला कर, ध्वनि उत्पन्न करने की व्यवस्था करनी चाहिए, जिस से इस प्रकार के नुकसान पहुंचाने वाले पक्षियों से बचा जा सके. यदि आवश्यक हो, तो जालीदार नैट का भी उपयोग किया जा सकता है, जिस से पक्षियों के आने की संभावना न के बराबर हो जाती है.

अपने प्रतिदिन के कार्यों में से यदि थोड़ा सा समय निकाल कर हम सभी अपनी गृह वाटिका में दे सकें, उस की उचित देखभाल करें, तो आप को खुशी के साथसाथ एक स्वस्थ वातावरण, रंगबिरंगे फूल, ताजा सब्जियां और मौसमी फल भी प्राप्त किए जा सकते हैं. सुनियोजित रूप से गृह वाटिका का प्रबंधन कर के हम उस को हमेशा हराभरा बनाए रख सकते हैं.

सेहतमंद बथुआ

सागों का सरदार बथुआ है. इसे सेहत के लिहाज से सब से अच्छा आहार माना जाता है. बथुआ को अंगरेजी में लैंब्स क्वार्टर्स कहते हैं. इस का वैज्ञानिक नाम चैनोपोडियम एल्बम है.

साग और रायता बना कर बथुआ पुराने समय से ही खाया जाता रहा है, लेकिन क्या आप को पता है कि दुनिया की सब से पुरानी महल बनाने की किताब शिल्प शास्त्र में लिखा है कि हमारे बुजुर्ग अपने घरों को हरा रंग करने के लिए पलस्तर में बथुआ मिलाते थे?

हमारी बुजुर्ग औरतें सिर से जू व फांस यानी डैंड्रफ साफ करने के लिए बथुए के पानी से बाल धोया करती थीं.

बथुआ विटामिन बी1, बी2, बी3, बी5, बी6, बी9 और विटामिन सी से भरपूर है. साथ ही, इस में कैल्शियम, लोहा, मैग्नीशियम, मैगनीज, फास्फोरस, पोटैशियम, सोडियम, जिंक आदि मिनरल्स होते हैं.

Bathua

100 ग्राम कच्चा बथुआ यानी इस के पत्तों में 7.3 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 4.2 ग्राम प्रोटीन व 4 ग्राम पोषक रेशे होते हैं.

बथुआ में जिंक होता है, जो शुक्रवर्धक होता है. बथुआ कब्ज दूर करता है. अगर पेट साफ रहेगा, तो कोई भी बीमारी शरीर में लगेगी ही नहीं. साथ ही, ताकत और स्फूर्ति बनी रहेगी.

जब बथुआ को मट्ठा, लस्सी या दही में मिला दिया जाता है, तो यह किसी भी मांसाहार से ज्यादा प्रोटीन वाला व किसी भी अन्य खाद्य पदार्थ से ज्यादा सुपाच्य व पौष्टिक आहार बन जाता है. साथ में बाजरे या मक्के की रोटी, मक्खन व गुड़ की डली हो, तो इसे खाने के लिए अमीर भी तरसते हैं.

जब हम बीमार होते हैं, तो आजकल डाक्टर सब से पहले विटामिन की गोली खाने की सलाह देते हैं. पेट से होने वाली महिलाओं को खासतौर पर विटामिन बी, सी व आयरन की गोली बताई जाती है. बथुआ में ये सबकुछ हैं.

कहने का मतलब तो यही है कि बथुआ पहलवानों से ले कर पेट से होने वाली महिलाओं तक, बच्चों से ले कर बड़ेबूढ़ों तक सब के लिए फायदेमंद है.

बथुआ का सेवन कम से कम मसाले डाल कर करें. स्वाद के लिए काला नमक मिलाएं और देशी गाय के घी से छौंक लगाएं.  बथुए का उबला हुआ पानी अच्छा लगता है और दही में बनाया हुआ रायता स्वादिष्ठ होता है.

कहने का मतलब है कि जब तक इस मौसम में बथुआ का साग मिलता रहे, हर रोज इस की सब्जी बना कर खाएं.

घरआँगन में सब्जियां

अच्छी सेहत के लिए खाने में रोजाना ताजा फलसब्जियां खानी चाहिए, पर तेजी से बढ़ती महंगाई की वजह से फल और सब्जियों के दाम भी आसमान छूने लगे हैं. इस के चलते हमारी खुराक में रोज फलसब्जियों की कमी होती जा रही है. बाजार में मिलने वाली सब्जियों व फलों में खतरनाक कैमिकलों व रंगों के इस्तेमाल की कहानी भी हमें आएदिन सुनने को मिलती है.

वैज्ञानिकों के मुताबिक, हमें पर्याप्त पोषण के लिए रोजाना 300 ग्राम सब्जियां खानी चाहिए, जबकि अभी हम महज 50 ग्राम सब्जियां ही ले पा रहे हैं. इस से बचने का सब से अच्छा उपाय है कि हम अपनी जरूरतों के मुताबिक कुछ फलसब्जियां खुद उगाएं. इस से न केवल सेहत सुधरेगी, बल्कि हमें बाजार के मुकाबले अच्छी और साफसुथरी फलसब्जियां भी खाने को मिलेंगी. तजरबों से यह बात साबित हो चुकी है कि पौधों के उगाने व उन की देखभाल करने से हमारा तनाव कम होता है और खुशी मिलती है.

बढ़ती हुई आबादी ने खेती की जमीन को काफी कम किया है. शहरों में तेजी से आबादी बढ़ी  है, जिस से लोगों के रहने की जगह में भी कमी होने लगी है. बहुमंजिला इमारतों व शहरी आवासों में फलसब्जियों को उगाने के लिए जरा भी जगह नहीं मिल पा रही है.

अब हमें गमलों, बालकनी, आंगन, बरामदा, लटकने वाली टोकरियों या घरों की छतों पर, जहां कहीं भी खुली धूप और हवा मिल सकती हो और पानी की सहूलियत हो, पौधे उगाने की तकनीक का सहारा लेना चाहिए. अगर आप ने थोड़ी सी भी सावधानी बरती, तो आसानी से कम जगह में पौधे उगा कर किचन गार्डन का आनंद उठा सकते हैं.

कैसी हो जगह : आप अपने घर या आसपास की कोई भी खाली जगह, जो खुली हो, का चुनाव कर सकते हैं. पौधों के लिए सुबह की धूप बहुत जरूरी होती है. साथ ही, उस जगह पर पानी देने और ज्यादा पानी को निकालने की सहूलियत होनी चाहिए. ऐसी जगहों में घर के आंगन, छत, बालकनी, खिड़कियों के किनारे वगैरह शामिल हो सकते हैं.

पौधे लगाने की तैयारी : अगर पौधों को छत पर सीधे लगाना है, तो मिट्टी की परत 25-30 सैंटीमीटर मोटी होनी चाहिए.

छत पर मिट्टी डालने से पहले नीचे पौलीथिन की मोटी तह बना कर चारों ओर ईंटों से दबा दें, ताकि पानी और सीलन से छत महफूज रहे. उपजाऊ मिट्टी में सड़ी गोबर की खाद व बालू मिला कर अच्छी तरह तह बना दें.

Home Gardenगमलों में पौधे लगाने के लिए : पौधों के आकार व फसल के मुताबिक ही गमलों के आकार का चुनाव किया जाना चाहिए. पपीते जैसे बड़े पौधों के लिए कम से कम 75 सैंटीमीटर ऊंचे और 45 सैंटीमीटर चौड़े ड्रम को इस्तेमाल में लाना चाहिए. टमाटर, मिर्च जैसे पौधों के लिए 30×45 सैंटीमीटर आकार वाले मिट्टी के गमले अच्छे होते हैं.

सीमेंट या प्लास्टिक के गमलों से बचना चाहिए. गमलों के अलावा लकड़ी या स्टील के चौड़े बौक्स, ड्रम, प्लास्टिक के बड़े डब्बे या जूट की छोटी बोरियों में मिट्टी भर कर भी पौधों को लगाया जा सकता है.

मिट्टी डालने से पहले गमले या डब्बों में नीचे की सतह पर छेद बना कर पत्थर के टुकड़ों से ढक देना चाहिए. पौध लगाने से पहले हमें मिट्टी में सड़ी गोबर की खाद व बालू, मिट्टी के बराबर अनुपात में मिला कर भर लेना चाहिए. नीम की खली, पत्ती व जानवरों की खाद या वर्मी कंपोस्ट का भी इस्तेमाल किया जा सकता है.

पौधों का चुनाव : छत पर बगिया में पौधे लगाते समय मौसम, धूप व जगह वगैरह पर खासा ध्यान दिया जाना चाहिए. कम धूप वाली जगह या छायादार जगह पर पत्तीदार व जड़ वाली सब्जियां जैसे पालक, धनिया, पुदीना, मेथी, मूली वगैरह लगाई जा सकती है, जबकि फल देने वाले पौधे जैसे टमाटर, बैगन, मिर्च, शिमला मिर्च, सेम, स्ट्राबेरी, पपीता, केला, रसभरी और नीबू खुले व अच्छी धूप वाली जगह में लगाए जाने चाहिए. छत या गमलों के लिए फसलों की खास किस्मों का चुनाव करना चाहिए.

देखभाल : शुरू में पौधों को एकदूसरे के नजदीक लगाना चाहिए और बाद में घने पौधों में उचित दूरी बनाने के लिए बीच से कमजोर और बीमार पौधों को निकाल देना चाहिए.

बेल या फैलने वाले पौधों जैसे लौकी, तुरई, करेला, सेम वगैरह को सहारा दे कर ऊपर या दीवार पर चढ़ाना चाहिए. टमाटर, बैगन, मिर्च को भी सहारा दे कर ऊपर ले जाना चाहिए और पौधों को नीचे फैलने से रोकना चाहिए. समयसमय पर पौधों में हलका पानी देते रहना चाहिए.

छत पर व गमलों में पौधों का रंग पीला पड़ना एक आम समस्या है. अकसर धूप की कमी और पानी की अधिकता से पौधे पीले पड़ते हैं. अगर गमलों में उग रहे पौधों को पर्याप्त धूप न मिल रही हो, तो उन्हें दिन में खुली धूप में रखें. बाद में उन्हें अंदर करें.

पौधों की खुराक के लिए वर्मी कंपोस्ट, जैविक खाद, गोबर की खाद वगैरह को समयसमय पर पौधों में डालते रहें या फिर उसे मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें. अच्छे पोषण के लिए पानी में घुलने वाले एनपीके की उचित मात्रा भी दी जा सकती है.

देश को नई हरित क्रांति की दरकार

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा कि हरित क्रांति जैविक उत्पादों के लिए बाजार खोज कर दुनियाभर में पैसा भारत में लाएगी. उन्होंने यह भी कहा कि गुजरात के कच्छ जिले में 500 मल तरल उर्वरक की 2 लाख बोतल का प्रतिदिन उत्पादन होगा, जिस से आयातित उर्वरक पर निर्भरता कम होगी और 10,000 करोड़ रुपए की सब्सिडी भी बच सकेगी.

उन्होंने आगे कहा कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए आगामी 5 साल में देश में 3 लाख प्राथमिक कृषि क्रेडिट सोसाइटी बनाने का लक्ष्य भी रखा गया है. इस से किसानों को काफी लाभ मिल सकेगा. इस से धरती सुरक्षित रहेगी.

जमीन को उपजाऊ बनाए रखना किसानों के सामने सब से बड़ी आज जो चुनौती है, उस से भी आसानी से निबटा जा सकेगा. तरल उर्वरक जमीन में नहीं उतरता, पौधे पर ही रहता है. इस से पानी भी प्रदूषित नहीं होगा और जमीन भी सुरक्षित बनी रहेगी.

भारत में आज सतत कृषि विकास की मांग तेजी से आ रही है. हरित क्रांति के चलते देश में उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन रासायनिक खादों के इस्तेमाल से मिट्टी की गुणवत्ता कम होती गई. नतीजतन, आज देश में बंजर हो चुकी जमीन का फीसदी काफी बढ़ चुका है. भारत में हालात की गंभीरता को भांपते हुए पिछले कुछ सालों में सतत कृषि विकास की दिशा में गंभीर प्रयास किए गए हैं. इस से देश में जैविक और प्राकृतिक खेती का रकबा लगातार बढ़ रहा है. साथ ही कम जल से सिंचाई के तरीकों का इस्तेमाल भी दिनोंदिन बढ़ रहा है

एक ही कृषि प्रणाली के तहत कृषि के साथसाथ मधुमक्खीपालन, मत्स्यपालन, मुरगीपालन, रेशम कीटपालन आदि को बढ़ावा दिए जाने से एक तरफ पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित हो रही है, तो वहीं दूसरी तरफ किसानों की आर्थिक स्थिति बेहतर हो रही है. सूचना प्रौद्योगिकी के जरीए बेहतर भविष्यवाणी और पर्यावरण और मिट्टी की स्थिति की निगरानी से खेती को ज्यादा लाभदायक और टिकाऊ बनाया जा रहा है, जिस से उत्पादन और उत्पादकता बढ़ रही है

आज आईसीटी उपकरण किसानों को जल प्रबंधन किट और रोग नियंत्रण, मिट्टी परीक्षण और फसल कटाई के बाद की प्रबंधन तकनीक पर समय पर सटीक और प्रासंगिक जानकारी हासिल कर के अपनी कृषि क्षमता बढ़ाने में सक्षम बना रहे हैं.

भारत सरकार द्वारा कृषि उत्थान के उद्देश्य देश के विभिन्न हिस्सों में किसानों को जैविक खेती करने के लिए प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जा रहा है. इस का पहला लक्ष्य जैविक कृषि उत्पाद को बढ़ाना और दूसरा जैविक खेती से मृदा स्वास्थ्य को बेहतर बनाना है. भारत सरकार द्वारा चलाई जा रही मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के सुखद नतीजे अब सामने आने लगे हैं

मृदा जांच से यह पता चलने पर कि किस पोषक तत्त्व की कमी है, उस को अनुमान के आधार पर अब उर्वरकों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है और इस की वजह से पूर्व पर होने वाले खर्च में भी 8.10 फीसदी तक की कमी देखने को मिली है. इस के अतिरिक्त खेतों में सही उर्वरकों के इस्तेमाल से फसलों की उत्पादकता में भी 5.6 फीसदी की बढ़ोतरी देखने में आ रही है.

भारत सरकार द्वारा किसानों को उन के उत्पादों की उचित कीमत दिलाने और बिचौलियों की भूमिका को समाप्त करने के उद्देश्य से इलैक्ट्रौनिक कृषि बाजार की स्थापना की गई है, जो आज तकरीबन देश के हर हिस्से तक पहुंच बन चुके हैं.

सतत कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन भी बनाया गया है, जो कृषि को अधिक टिकाऊ व लाभदायक बनाने के लिए काम कर रहा है. उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के लिए बीज और पौधारोपण सामग्री पर उत्तर प्रदेश मिशन भी बनाया गया है, जिस का उद्देश्य प्रमाणित एवं गुणवत्तापूर्ण बीजों का उत्पादन करना, बीज प्रजनन प्रणाली को मजबूत करना, बीज उत्पादन में नई तकनीक और तौरतरीकों को बढ़ावा देना एवं परीक्षण करना शामिल है.

केंद्र सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र को उच्च प्राथमिकता दी जा रही है. कृषि एवं ग्रामीण विकास से जुड़ी तमाम नई योजनाएं भी इसी क्रम में अस्तित्व में आई हैं. इन योजनाओं के सफल कार्यान्वयन के सकारात्मक नतीजे भी अब सामने आ रहे हैं. आज देश खाद्यान्न, दूध, फलसब्जी, मछली, मुरगीपालन और पशुपालन के क्षेत्र में न सिर्फ आत्मनिर्भर है, बल्कि विविध प्रकार के कृषि उत्पादों का निर्यात भी कर रहा है. बहुत से कृषि उत्पादों का शीर्ष उत्पादक होने के कारण आज देश में अनाज का उचित भंडार मौजूद है.

इन योजनाओं की बदौलत किसानों की आमदनी में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. साथ ही, बहुमूल्य विदेशी मुद्रा की कमाई भी संभव हो सकी है. हम अपनी भावी पीढ़ी के हाथों में एक सुरक्षित भविष्य सौंपने की दिशा में भी अग्रसर हो सकेंगे, जो नई हरित क्रांति होगी. वह निश्चित रूप से भावी पीढ़ी के सुरक्षित भविष्य के लिए लाभकारी साबित होगी.

माइक्रोग्रींस उगा कर करें एंजोय

हम आप को माइक्रोग्रींस उगाने के बारे में बताएंगे. इसे खेती किसानी वाले भी कर सकते हैं, और हमारे जैसे आम उपभोक्ता भी उगा सकते हैं. इस के लिए आप को किसी बड़े खेत पर जाने की भी जरूरत नहीं है. आप इसे अपने घर के छोटी सी जगह पर भी उगा सकते हैं और इसे उगाने में व्यस्त रह कर एंजोय कर सकते हैं.

उगाना आसान:

माइक्रोग्रींस को उगाना बड़ा ही आसान है क्योंकि इसे लगाने से ले कर काटने तक के लिए बहुत ही कम समय की जरूरत होती है, मात्र एक से दो सप्ताह तक का समय ही इसे लगाने से ले कर उगाने और काटने के लिए चाहिए.

कम दिनों में ही माइक्रोग्रींस की फसल तैयार हो जाती है इसलिए थोड़े दिनों के अंतराल पर इसे कई बार उगाया जा सकता है.

माइक्रोग्रींस को उगाने के लिए खास तौर से खेत की भी जरूरत नहीं पड़ती है. मसलन इसे आप के किचन में भी पूरे साल तक उगाया जा सकता है, लेकिन शर्त यही है कि आप के किचन में सूर्य की रोशनी यानी धूप आती रहनी चाहिए.

माइक्रोग्रींस : पौष्टिक और स्वादिष्ठ

आप दालों वाली फसलों यानी चना, मूंग, मसूर आदि के अंकुरित बीजों को जिन्हें स्प्राउट भी कहा जाता है, बहुत खोते होंगे, क्योंकि अंकुरित बीजों को बहुत पौष्टिक माना गया है लेकिन माइक्रोग्रींस इन की तुलना में जरा हट कर है. अंकुरित बीजों या स्प्राउट्स में जहां हम तना एवं बीज पत्रों को साथसाथ जड़ों को भी खा जाते हैं वहीं माइक्रोग्रींस में तने, पत्तियों और बीज पत्रों को तो हम खाने में उपयोग करते हैं, पर जड़ों को नहीं खाते.

केंद्रीय बागवानी एवं उपोष्ण संस्थान के निदेशक शैलेंद्र राजन के अनुसार आमतौर पर माइक्रोग्रींस को मिट्टी या उस से मिलतेजुलते चीजों पर उगाया जा सकता है. माइक्रोग्रींस के विकास के लिए सूर्य प्रकाश की जरूरत होती है. मूली और सरसों जैसी सामान्य सब्जियों के बीजों का उपयोग माइक्रोग्रींस के लिए किया जाता है.

हमारे घरों में मेथी, मटर, मसूर, मूंग और चने की दाल स्प्राउट्स की जगह माइक्रोग्रींस के रूप में उगा सकते हैं जो बहुत ही पौष्टिक और स्वादिष्ठ होंगे.

माइक्रोग्रींस उगाने के लिए आप अपने घर में उपलब्ध सामग्री का ही उपयोग कर सकते हैं. मसलन कोई भी डब्बा लें जिस में उसे 4 इंच तक मिट्टी की परत हो. अगर ट्रे हो तो बहुत अच्छा. मिट्टी की सतह पर बीज को फैला दें और उस के ऊपर फिर से मिट्टी की एक पतली परत फैला कर इसे हल्के हाथों से धीरेधीरे थपथपा कर यह निश्चिंत कर लें कि मिट्टी डब्बे या ट्रे में अच्छी तरह से बैठ गई है.

फिर मिट्टी के ऊपर बहुत सावधानी से धीरेधीरे पानी डाल देते हैं. इस से नमी बन जाएगी और दोतीन दिनों में बीज अंकुरित हो जाते हैं. फिर अंकुरित बीजों को ऐसी जगह रख दें जहां थोड़ी धूप आती हो. दिनभर में दो से तीन बार पानी का छिड़काव भी करते रहें. एक हफ्ते में ही माइक्रोग्रींस तैयार हो जाएंगे. आप इसे 2 से 3 इंच की ऊंचाई तक बढ़ने दे सकते हैं. इसे उगाना बहुत आसान है और अलगअलग व्यंजनों, पकवानों के साथसाथ सलाद और सैंडविच में भी आप इस का उपयोग कर सकते हैं. कैंची से इन की कटाई आप आराम से कर सकते हैं और डिब्बों या अन्य ट्रे का उपयोग आप दोबारा इसे उगाने में कर सकते हैं.

मिट्टी में रोगजनक सूक्ष्मजीव होते हैं. इन्हें मारने के लिए फसल काट लेने के बाद मिट्टी को तेज धूप में फैला देने चाहिए. लेकिन माइक्रोग्रींस को बिना मिट्टी के भी उगाया जा सकता है. इसे पानी में भी उगाया जा सकता है कई लोगों ने उगाया भी है. लेकिन पोषक तत्त्वों की कमी होती. इसलिए पोषक तत्त्वों के घोल का इस्तेमाल कर बेहतरीन क्वालिटी के माइक्रोग्रींस उगाए जा सकते हैं.

माइक्रोग्रींस को उगाने के लिए रोज 3 से 4 घंटे की धूप काफी है. अगर आप के घर में कोई ऐसी जगह हो जहां 3 से 4 घंटे धूप आती हो तो आप आसानी से माइक्रोग्रींस उगा सकते हैं. अगर ऐसी जगह नहीं है तो निराश मत होइए. आप फलोरोसेंट लाइट के इस्तेमाल से भी इसे आसानी से उगा सकते हें.

हालांकि घर के बाहर इसे उगाने में कोई परेशानी नहीं होती लेकिन चिलचिलाती धूप से इसे नुकसान भी होता है. इसलिए इस की सुरक्षा करना भी जरूरी हो जाता है.

माइक्रोग्रींस को आराम से कैंची से काटना चाहिए फिर धो लेने के बाद ही उपयोग करना चाहिए. अगर यह अधिक मात्रा में उग गया हो तो आप इसे फ्रिज में रख सकते हैं और 10 दिनों तक उपयोग कर सकते हैं. यह बहुत ही नाजुक होता है इसलिए इसे काट कर बाहर रखने से इस के सूख जाने का डर होता है.

माइक्रोग्रींस को उगाना वयस्कों के लिए ही नहीं बल्कि बच्चों के लिए भी आनंददायक खेल जैसा है. शहरों में जहां सीमित स्थान है, गृहवाटिका नहीं है वहां माइक्रोग्रींस को उगाना एक अच्छा विकल्प है. बहुत कम खर्च में और थोड़े से अनुभव से आप इसे उगाने की कला जान जाते हैं तो माइक्रोग्रींस को उगाना और खाना दोनों ही आप के लिए आनंद का विषय बन जाता है. आप का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी इस अनुभव से अच्छा बना रहता है.

चौलाई से बनाएं मट्ठी और चटपटे सेव

भारतीय भोजन में हरी पत्तेदार सब्जियों का खासा महत्त्व है क्योंकि इन में लौह, विटामिन ‘ए’, ‘सी’ व अन्य पोषक तत्त्व सही मात्रा में पाए जाते हैं और वसा कम व रेशे की मात्रा ज्यादा पाई जाती है जो मनुष्य के अच्छे स्वास्थ्य के लिए अति आवश्यक है.

भोजन में रोजाना हरी पत्तेदार सब्जियों का प्रयोग करने से हम एनीमिया, रतौंधी, अंधापन आदि रोगों से छुटकारा पा सकते हैं. किशोरों, युवतियों, बढ़ते बच्चों व गर्भवती महिलाओं के लिए इन का प्रयोग अत्यंत लाभकारी है.

हरी पत्तेदार सब्जियां सस्ती व लगभग हर मौसम में आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं. इन में से कुछ खेतों में खरपतवार के रूप में उगती हैं जैसे देशी बथुआ, मरुआ, सिराई, चौलाई वगैरह और कुछ को घरों में भी उगाया जा सकता है जैसे धनिया, मेथी, पालक, सरसों वगैरह.

हरी पत्तेदार सब्जियों में नमी अधिक होने के कारण ये जल्दी खराब हो जाती हैं इसलिए इन के पत्तों को सुखा कर पाउडर बना कर रख सकते हैं जिसे समयसमय पर विभिन्न प्रकार के व्यंजनों में इस्तेमाल कर के हम अपने भोजन की पौष्टिकता को बढ़ा सकते हैं.

आजकल चौलाई का साग (हरे पत्तेदार सब्जी) बाजार में मौजूद भी है तो क्यों न इस का फायदा उठाया जाए.

चौलाई से बने कुछ पकवानों के बारे में हमें चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के खाद्य एवं पोषक विकास से डा. दर्शन पूनिया और डा. मंजू गुप्ता के जरीए जानकारी मिली.

चौलाई के पत्तों को सुखा कर पाउडर बना कर उस से विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाए जा सकते हैं. जैसे मट्ठी, सेव, बिस्कुट वगैरह. यहां हम चौलाई से मट्ठी और सेव बनाने के तरीके और वे कितनी सेहतमंद हैं, इस की जानकारी दे रहे हैं.

बनाएं चौलाई का पाउडर

चौलाई के पत्तों को तोड़ कर साफ पानी में अच्छी तरह धो लें. इन्हें बारीक काट कर अखबार या मलमल के कपड़े में ढक कर सुखा लें और सूखी हुई पत्तियों को पीस कर पाउडर बना लें और एयर टाइट डब्बे में बंद कर के रख लें. जब मन करे तब पौष्टिक व्यंजन बनाने के लिए पत्तियों का पाउडर इस्तेमाल करें.

पौष्टिक मट्ठी बनाने की आवश्यक सामग्री : मैदा 85 ग्राम, मोठ का आटा 10 ग्राम, चौलाई के पत्तों का पाउडर 5 ग्राम, घी 15 ग्राम और स्वाद के हिसाब से नमक.

बनाने की विधि : मैदा, मोठ का आटा और चौलाई के पत्तों के पाउडर को छान लें और अच्छी तरह मिला लें और हलका नमक मिला लें. इस मिश्रण में मोइन डाल कर सख्त आटा गूंध लें.

आटे की छोटीछोटी लोई बना कर मट्ठी के आकार में बेल लें. मट्ठी के बीच में एक काली मिर्च लगा कर पहले से गरम किए हुए तेल में सुनहरा भूरा होने तक तल लें.

पौष्टिकता से है भरपूर : प्रोटीन 9.19 ग्राम प्रति 100 ग्राम, लौह 5.28 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम, बीटा कैरोटीन 10.58 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम.

चौलाई के सेव

जरूरी सामग्री : बेसन 70 ग्राम, मोठ का आटा 25 ग्राम, चौलाई के पत्तों का पाउडर 5 ग्राम, घी 15 ग्राम मोइन के लिए, तेल तलने के लिए, नमकमिर्च स्वादानुसार.

बनाने की विधि : बेसन, मोठ का आटा, चौलाई के पत्तों का पाउडर, नमक और मिर्च को अच्छी तरह मिला लें. इस मिश्रण में मोइन डाल कर आटे की तरह नरम गूंध लें. कहाड़ी में तेल गरम करें. गूंधे हुए आटे को सेव बनाने वाली मशीन में डाल कर सीधा गरम तेल में सेव बना लें. सेव को हलका भूरा होने तक तलें और ठंडा होने पर डब्बे में बंद कर रख लें.

पौष्टिकता से है भरपूर : इस में प्रोटीन 15.75 ग्राम प्रति 100 ग्राम. लौह 7.25 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम, बीटा कैरोटीन 12.36 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम होता है.

ये बिलकुल देशी पकवान हैं. इन्हें आप अधिक मात्रा में बनाने के लिए दिए गए अनुपात के अनुसार सामग्री बढ़ा लें और बनाने के बाद ठंडा होने दें जिस से वे कुरकुरे हो जाएंगे. बाद में उन्हें एयर टाइट डब्बों में बंद कर रख दें और आप का जब मन करे तब खुद खाएं और मेहमानों को भी खिलाएं.