Jaggery Peda : गुड़ का स्वाद अलग अंदाज

Jaggery Peda : लजीज मिठाई खाने के शौकीन लोगों के लिए चीनी की मिठास किसी दुश्मन की तरह दिखती है. इस की वजह उन की डायबिटीज के प्रति बढ़ती चिंता होती है. ऐसे में मिठाई बनाने वालों ने चीनी को मिठाई से दूर करने के उपाय करने शुरू कर दिए हैं. उन की कोशिश यह रहती है कि वे ऐसी मिठाई तैयार करें, जिस में चीनी की मिठास न हो. इस के लिए वे नैचुरल मिठास बढ़ाने वाली चीजों का प्रयोग मिठाइयों में करने लगे हैं.

गुड़ पेड़ा (Jaggery Peda) एक ऐसी ही मिठाई है. इसे तैयार करने के लिए सब से पहले मैदे से तैयार होने वाले नमकपारे तैयार किए जाते हैं. इन को गुड़ में डाल कर पाग दिया जाता है. जब ये ठीक से आपस में मिल जाते हैं, तो इन को छोटेछोटे मनचाहे पीस के रूप में काट लिया जाता है.

नमकपारे या खुरमे राजस्थान में बहुत इस्तेमाल किए जाते हैं. खासकर मारवाड़ी लोग इन को खूब पसंद करते हैं. गुड़ के साथ मिला कर इन को नए अंदाज गुड़ पेड़ा के रूप में पेश किया गया है.

गुड़ पेड़ा (Jaggery Peda) तैयार करने वाले लखनऊ के हर्षल गुप्ता कहते हैं, ‘गुड़ पेड़ा सेहत के लिए अच्छा होता है. इस को लंबे समय तक रखा जा सकता है. इस को रखने के लिए किसी दूसरी तरह के साधन की जरूरत नहीं होती. इस को हवा से बचा कर रखना होता है. सीलने पर यह कुरकुरा नहीं रह पाता है.’

हर्षल गुप्ता देशी मिठाइयों को नए अंदाज में पेश करने की योजना पर काम कर रहे हैं. वे कहते हैं, ‘मिठाइयों के शौकीन केवल चीनी के डर से अपने शौक को पूरा करने से डरते हैं. ऐसे में हमारा यह प्रयास है कि हम हर मिठाई को नेचुरल स्वीट्स के साथ तैयार करें, जिस से डायबिटीज का खतरा कम हो जाए और लोगों को अपने वजन की चिंता में मिठाइयों से दूर न जाना पड़े. विदेशों में रहने वाले भारतीय ऐसी पुरानी मिठाइयों के नए अंदाज को खूब पसंद करते हैं.’

Jaggery Peda

कैसे तैयार करें गुड़ पेड़ा

गुड़ पेड़ा (Jaggery Peda) तैयार करने के लिए सब से पहले नमकपारे तैयार करने होंगे. नमकपारे तैयार करने के लिए 2 कप मैदा, चौथाई चम्मच नमक, 1 छोटा चम्मच अजवाइन, मोयन के लिए 4 बड़े चम्मच घी और नमकपारे तलने के लिए पर्याप्त घी की जरूरत होती है.

बनाने की विधि : सब से पहले एक बरतन में मैदा, घी, नमक और अजवाइन को डाल कर आपस में मिलाएं. इस को आटे की तरह गूंध लें और गीले कपड़े से ढक कर रख दें. कुछ समय बाद इस को 5 बराबर हिस्सों में बांट लें. इन की लोई बना कर 6-7 इंच व्यास वाली पूडि़यां बेलें. अब इन को चौकोर आकार में काटें और घी में फ्राई कर के अलग रख लें. इस तरह से नमकपारे तैयार हो जाते हैं.

तैयार नमकपारों के वजन का आधा गुड़ लें. इस को गरम करें और किसी बरतन में घी लगा कर उस में डाल दें. घी लगाने से गुड़ बरतन में चिपकेगा नहीं. अब इस में पहले से तैयार नमकपारे डाल दें. नमकपारे के ऊपर गुड़ की 2 बार मोटीमोटी परत चढ़ा दें.

जब तैयार सामग्री ठंडी हो जाए, तो चाकू की सहायता से चौकोर टुकड़ों में काट लें. तैयार गुड़ पेड़ों को ऐसी जगह रखें, जहां सीलन न पहुंच पाती हो. इन्हें लंबे समय तक रखा जा सकता है.

गुड़ पेड़ों (Jaggery Peda) का आकार सामान्य पेड़ों जैसा नहीं होता. इन का जायका भी अलग होता है. गुड़ और नमकपारे का मिलाजुला स्वाद अलग कुरकुरा मजा देता है. देशी घी से तैयार इस पेड़े की कीमत करीब 400 रुपए प्रति किलोग्राम होती है. गुड़ पेड़े को तैयार कर के नई मिठाई के रूप में बेचा जा सकता है.

Revdi : रेवड़ी स्वाद से बढ़ा कारोबार

Revdi : लखनऊ की गुलाब रेवड़ी (Revdi) दूरदूर तक मशहूर है और अब तो फेरी में बिकने वाली रेवड़ी बड़ीबड़ी मिठाई की दुकानों की शान बन गई है. जाड़ों के दिनों में यह बहुत बिकती है. गुड़, शक्कर व तिल से बनने वाली रेवड़ी सेहत के लिए बहुत अच्छी होती है.

तिल व गुड़ शरीर में जाड़ों में होने वाली तेल की कमी को भी पूरा करते हैं. इन से शरीर में जाड़े से बचाने वाली उर्जा बनती है. यही वजह है कि जाड़ों में गुड़ और तिल से तैयार होने वाली रेवड़ी (Revdi) सभी को पसंद आती है. पहले यह छोटे कारोबारियों के द्वारा बनाई और बेची जाती थी. अब समय बदला तो यही रेवड़ी पूरे विश्व के बाजार पर छा गई है. ज्यादा समय तक चलने वाली मिठाई होने के कारण लोग इस को खूब पंसद करते हैं.

रेवड़ी (Revdi) की अब आनलाइन शापिंग भी होने लगी है. विदेशों में रह रहे लोग इस को पंसद कर रहे हैं और देश में रहने वाले लोग अपने दोस्तों व रिश्तेदारों को उपहार में रेवड़ी देने लगे हैं. अपने देश की माटी की खुशबू लिए रेवड़ी सात समुद्र पार भी खूब पंसद की जा रही है.

यही वजह है कि अब यह रेवड़ी (Revdi) देश के हर बड़े शहर में मिलने लगी है. दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे महानगरों से लगे छोटेछोटे शहरों में रेवड़ी और गजक बनाने का काम जोरशोर से अक्तूबर से मार्च महीने के बीच होने लगता है.

लखनऊ की गुलाब रेवड़ी

एक समय तक लखनऊ की गुलाब रेवड़ी पूरे देश में मशहूर थी. अब लखनऊ में रेवड़ी की तमाम तरह की किस्में बनने लगी हैं. ये सभी तिल, गुड़ और चीनी से बनती हैं. मधुरिमा स्वीट्स में अलगअलग तरह की रेवडि़यां बनती हैं, जो स्वाद, खुशबू और आकार में अलगअलग होती हैं.

अब रेवडि़यां कारपोरेट लुक वाली पैकिंग में आ गई हैं, जिन को देशविदेश में भेजा जा सकता है. इस के लिए पैकिंग से ले कर इन्हें बनाने के तौरतरीकों में बदलाव किया गया. बाजार और मांग के हिसाब से हुए ये बदलाव लोगों को इतने पंसद आए कि हर जगह रेवड़ी हाथोंहाथ बिकने लगी.

मधुरिमा स्वीट्स के मालिक मनीष गुप्ता कहते हैं कि रेवड़ी अब कारपोरेट स्वीट बन गई है. दीवाली, नए साल और होली के अवसर पर इस को उपहार में दिया जाने लगा है. अब इस की अच्छी क्वालिटी के साथ ही साथ अलगअलग तरह की रेवडि़यां बनाने का काम भी शुरू किया गया है.

रेवड़ी (Revdi) की सब से खास बात इस का कुरकुरापन होता है. इस को बनाए रखने के लिए अलग किस्म की पैकिंग की गई. लखनऊ के अलावा यह कारोबार उत्तर प्रदेश के मेरठ, हरियाणा के रोहतक और राजस्थान के जयपुर व अलवर जैसे शहरों में भी बड़े पैमाने पर होने लगा है. अपने खास स्वाद के कारण जयपुर और मेरठ की रेवडि़यां भी खूब पसंद की जा रही हैं.

रेवड़ी बनाएं घर में

रेवड़ी बनाने के लिए भी तिल, गुड़ व चीनी का इस्तेमाल किया जाता है.

चीनी और गुड़ की चाशनी को मिला कर खूंटी में गरमगरम लटका कर खींचा जाता है. जब इस में से सफेदसफेद तार निकलने लगे तो गरमगरम हालत में ही मनचाहे आकार में काट कर छोटीछोटी रेवडि़यां तैयार की जाती हैं. इन को मशीन से दबा कर ऊपर से तिल चिपका दिए जाते हैं. रेवड़ी बनाने में सब से अधिक सावधानी चाशनी को तैयार करने में बरतनी होती है. सभी काम गरमगरम हालत में करना पड़ता है. चाशनी के ठंडा पड़ते ही रेवड़ी नहीं बन पाती है.

Jaggery : बेहद गुणी होता है गुड़

Jaggery : आमतौर पर मिठास के लिए लोग चीनी यानी शक्कर की ओर भागते हैं. कोई भी मिठाई या मीठी चीज बनाने के लिए ज्यादातर शक्कर को ही तरजीह दी जाती है. मगर वैज्ञानिकों व डाक्टरों के मुताबिक चीनी सेहत के लिए ज्यादा मुनासिब नहीं होती. इसीलिए खानपान के विशेषज्ञ मिठास के लिए हमेशा गुड़ के इस्तेमाल पर जोर देते हैं. इस मामले में गांवों में रहने वाले लोग ज्यादा समझदार होते हैं, वे ज्यादातर मीठी चीजें बनाने के लिए गुड़ का ही इस्तेमाल करते हैं. गांव के लोग तो चाय भी चीनी की बजाय गुड़ से बनाना पसंद करते हैं.

इस हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता कि गुड़ बेहद गुणकारी होता है. अपनी गरम तासीर और सोंधे मीठे जायके के लिए जाना जाने वाला गुड़ आयरन से भरपूर होता है.

बुंदेलखंड जैसे इलाकों में गुड़ को गोलगोल बड़े लड्डुओं के आकार में बना कर बेचा जाता है, तो तमाम इलाकों में इसे 10 और 5 किलोग्राम के बड़ेबड़े आकारों में ढाल कर मार्केट में पेश किया जाता है. साधारण चौकोर बट्टियों या गोल भेलियों के आकार में भी गुड़ बाजार में मौजूद रहता है. आजकल तो तमाम बड़ी कंपनियां हाईजीनिक तरीके से (यानी बगैर हाथ के इस्तेमाल के) मशीनों के जरीए पैक कर के गुड़ पेश कर रही हैं. हाईजीन यानी सफाई का खास खयाल रखने वालों के लिए यह महंगा गुड़ अच्छा रहता है.

बहरहाल, कुछ कत्थई और पीला सा नजर आने वाला गुड़ किसी भी आकार और प्रकार में मिले, मगर होता है गुणों से भरपूर. सेहत के लिहाज से इस के फायदे बेशुमार हैं. आइए डालते हैं एक नजर गुड़ के खास फायदों पर:

* गुड़ का सब से ज्यादा इस्तेमाल सर्दीजुकाम की तकलीफ होने पर किया जाता है. इस की गरम तासीर सर्दीजुकाम में बहुत राहत पहुंचाती है. इसे पानी में डालने के बाद अच्छी तरह खौला कर पीने पर यह दवा जैसा असर करता है. गुड़ का पानी पीना अच्छा न लगे तो गुड़ की चाय अदरक डाल कर बनाएं. यह जायकेदार चाय सर्दीजुकाम में बहुत राहत पहुंचाती है गुड़ की चाय में दूध हमेशा चाय आंच से उतारने के कुछ देर बाद डालना चाहिए. ऐसा करने से दूध फटता नहीं है.

* गुड़ का रोजाना इस्तेमाल करने वालों का हाजमा हमेशा दुरुस्त रहता है. दरअसल गुड़ शरीर में मौजूद पाचन संबंधी एंजाइमों की क्रियाशीलता बढ़ा देता है. यह आंतों को सही तरीके से काम करने में मदद पहुंचाता है. जब आतें सही तरीके से काम करती हैं, तो कब्ज की तकलीफ नहीं होती है, यानी पेट कायदे से साफ हो जाता है.

* गुड़ के रोजाना इस्तेमाल से शरीर में खून की कमी की शिकायत नहीं होती है,क्योंकि इस में भरपूर मात्रा में आयरन मौजूद होता है. इस के नियमित इस्तेमाल से खून में हिमोग्लोबिन की मात्रा भी सही बनी रहती है, जो कि अच्छी सेहत के लिए बहुत जरूरी है.

* शरीर के जोड़ों में दर्द व तकलीफ होने पर गुड़ को गिलास भर दूध या अदरक के साथ खाने से बहुत आराम मिलता है.

* गुड़ के भरपूर इस्तेमाल से बदन की तमाम हड्डियां मजबूत होती हैं, नतीजतन आर्थराइटिस की शिकायत भी नहीं होती. इस के अलावा हड्डियों संबंधी तमाम छोटीमोटी तकलीफों से नजात मिल जाती है.

* गुड़ खून बढ़ाता ही नहीं, बल्कि खून साफ भी करता है. इस के रोजाना इस्तेमाल से खून साफ होता रहता है. खून साफ रहने से सेहत भी सही बनी रहती है.

* यह महज खून की सफाई ही नहीं करता, बल्कि अहम अंग लीवर कीभी सफाई करता है. गुड़ खाने से शरीर में मौजूद हानिकारक आक्सिंस बाहर निकल जाते हैं और लीवर की सफाई हो जाती है. लीवर शरीर का अहम अंग होता है और अच्छी सेहत के लिए इस का सहीसलामत रहना जरूरी है. गुड़ को लीवर का रक्षक कह सकते हैं.

* गुड़ में अच्छीखासी मात्रा में एंटीआक्सीडेंट्स व मिनरल पाए जाते हैं, जो अच्छी सेहत के लिए जरूरी होते हैं. इस में पाए जाने वाले सेलेनियम व जिंक जैसे मिनरल स्वस्थ शरीर के लिए बहुत जरूरी होते हैं.

* मोटे और वजनी लोगों के लिए भी गुड़ कारगर साबित होता है. ज्यादा वजन वालों को गुड़ का नियमित इस्तेमाल करना चाहिए. यह शरीर में पानी की मात्रा सही कर के वजन को काबू में रखता है.

* वैज्ञानिकों के मुताबिक गुड़ खाने से इनसान का मिजाज अच्छा हो जाता है, नतीजतन वह मन लगा कर कोई भी काम करता है.

* गुड़ खाने वालों को सिरदर्द जैसी तकलीफों से नजात मिल जाती है. माइग्रेन की तकलीफ में भी गुड़ कारगर किरदार निभाता है और राहत पहुंचाता है.

* रोजाना गुड़ खाने वालों की याददास्त बेहतर होती है और भूलने की शिकायत कम हो जाती है. इस के इस्तेमाल से दिमाग लंबे अरसे तक चौकस बना रहता है.

* गुड़ एक उम्दा काम्पलेक्स कार्बोहाइड्रेट होता है. इस के इस्तेमाल से शरीर लंबे अरसे के लिए मजबूत बना रहता है. यह शरीर को धीरेधीरे ऊर्जा पहुंचाता है. इस के इस्तेमाल से शुगर का लेवल जल्दी से नहीं बढ़ता है.

* गुड़ के इस्तेमाल से सांस से जुड़ी तकलीफें भी दूर होती हैं. अस्थमा या ब्रोनकाइटिस जैसी सांस संबंधी दिक्कतें गुड़ खाने वालों को कम होती हैं.

* गुड़ में तिल मिला कर बनाए गए लड्डू खाने से सांस संबंधी दिक्कतें नहीं होती हैं. बगैर लड्डू बनाए गुड़ व तिल खाने से भी फायदा होता है.

* मासिक धर्म के दौरान होने वाले दर्द और क्रैंप्स जैसी तकलीफों में भी गुड़ खाने से आराम मिलता है. गुड़ खाने से इनसान का मूड भी अच्छा हो जाता है.

* अगर गला बैठ जाए और आवाज ढंग से न निकले, तो पके हुए चावलों के साथ गुड़ मिला कर खाने से बहुत फायदा होता है और गला बहुत जल्दी ठीक हो जाता है. कुछ ही देर में आवाज ठीक से निकलने लगती है.

* गुड़ खाने से टाक्सिन दूर होते हैं, नतीजतन त्वचा खिल जाती है. इस के इस्तेमाल से कीलमुहासों से भी नजात मिल जाती है. गुड़ का इस्तेमाल एक्ने की दिक्कत भी दूर करता है.

* बच्चा होने के बाद औरत के पेट की सफाई व पोषण के लिहाज से भी गुड़ बेहद कारगर व फायदेमंद रहता है. इसीलिए डिलीवरी के बाद महिलाओं को गुड़ के सिठौरे (मेवे वाले खास लड्डू) वगैरह बना कर काफी समय तक खिलाए जाते हैं.

* रोजाना खाना खाने के बाद मिठाई के तौर पर थोड़ा सा गुड़ खाना स्वाद, सेहत व हाजमे के लिहाज से काफी कारगर होता है.

* गुड़ में तिल व मूंगफली मिला कर बनाए गए लड्डू या चिक्की (पट्टी) स्वाद व स्वास्थ्य के लिए उम्दा होते हैं.

* गुड़ व लाई (मुरमुरा) मिला कर बनाए गए लड्डू या पट्टी भी हलके नाश्ते के लिहाज से बेहतर होते हैं.

* गुड़ मिला कर बनाए गए बाजरे के पुए (तिल भी मिला सकते हैं) और गुड़, देशी घी व बाजरे की रोटी से बनाया गया मलीदा भी सेहत व स्वाद के लिहाज से लाजवाब होते हैं.

यानी कुल मिला कर गुड़ हमारे स्वाद व सेहत की कसौटी पर खरा सोना साबित होता है, लिहाजा इस का भरपूर इस्तेमाल करना चाहिए. अलबत्ता शुगर के मरीज इसे अपने डाक्टर से पूछ कर ही इस्तेमाल करें.

लखनऊ की गुलाब रेवड़ी (Gulab Rewari)

लखनऊ की गुलाब रेवड़ी देश भर में अपने स्वाद और खुशबू के लिए मशहूर है. इस गुलाब रेवड़ी का रंग तो गुलाबी नहीं होता, लेकिन इस की खुशबू में गुलाब महकता है.

कई बार तो खुशबू के लिए रेवड़ी के पैकेट में सूखे गुलाब की पत्तियों या फिर गुलाब के खाने वाले इत्र का इस्तेमाल किया जाता है.

गुलाब रेवड़ी के साथ अब दूसरे स्वाद और खुशबू वाली रेवडि़यां भी आ रही हैं. इन का आकार भी बदल गया है. रेवड़ी बनाने के कारोबार से ले कर बेचने तक का अलगअलग कारोबार कर के लोग कमाई कर रहे हैं.

फेरी में बिकने वाली लखनऊ की गुलाब रेवड़ी अब बड़ीबड़ी मिठाई की दुकानों की शान बन गई हैं. जाड़ों में यह काफी बिकती है. गुड़, शक्कर और तिल से बनने वाली रेवड़ी सेहत के लिए काफी उपयोगी है. यह शरीर में जाड़ों में होने वाली तेल की कमी को पूरा करती है. इस से शरीर को ऊर्जा मिलती है. यही वजह है कि जाड़ों में गुड़ और तिल से बनने वाली रेवड़ी सभी को पसंद आती है. रेवड़ी पहले छोटे कारोबारियों द्वारा बनाई और बेची जाती थी, लेकिन अब यह दुनिया भर के बाजारों में छा गई है.

रेवड़ी अब कारपोरेट स्वीट बन गई है. दीवाली, नया साल और होली के मौके पर इस को उपहार में दिया जाने लगा है. रेवड़ी की खासीयत इस का कुरकुरापन है. लखनऊ के अलावा रेवड़ी का यह कारोबार उत्तर प्रदेश के मेरठ, हरियाणा के रोहतक और राजस्थान के जयपुर और अलवर जैसे शहरों में भी बड़े पैमाने पर होने लगा है. अपने खास स्वाद के कारण जयपुर और मेरठ की रेवडि़यां भी खूब पसंद की जा रही हैं.

बनाएं घर पर रेवड़ी

गजक बनाने वाली सामग्री ही रेवड़ी बनाने में भी लगती है. रेवड़ी में भी तिल, गुड़, चीनी का इस्तेमाल होता है. गुड़ और चीनी को एकसाथ मिलाने से रेवड़ी में दोनों का स्वाद मिलता है. इस का दूसरा लाभ यह होता है कि रेवड़ी का रंग पूरी तरह से साफ हो जाता है. केवल गुड़ से तैयार रेवड़ी का रंग अच्छा नहीं दिखता है. चीनी और गुड़ की चाशनी को मिला कर खूंटी में गरमगरम लटका कर खींचा जाता है. जब इस में से सफेद तार निकलने लगे, तो गरमगरम मनचाहे आकार में इसे काट कर छोटीछोटी रेवड़ी तैयार की जाती हैं. चाशनी ठंडी होने पर यह नहीं बन पाती है. इसे मशीन से दबा कर ऊपर से तिल चिपका दिए जाते हैं. इसे बनाने में सब से ज्यादा सावधानी चाशनी तैयार कने में बरतनी पड़ती है.