Farming Machine : मशीन से करें अरवी की धुलाई

Farming Machine : अरवी की खुदाई करने के बाद उस पर काफी मिट्टी लगी होती है, जिस की हाथों से धुलाई करना एक मुश्किल काम है और उस में समय भी ज्यादा लगता है. साथ ही मजदूरी भी ज्यादा लगती है. यही काम अगर मशीन से करें तो कम समय में ज्यादा काम निबटाया जा सकता है.

अरवी की धुलाई करने के लिए हरियाणा के महावीर जांगड़ा ने मशीन बनाई है, जो 2 साइजों में है. पहला साइज 12 फुट लंबाई में और दूसरा साइज 14 फुट लंबाई में है. इस मशीन में 10 हार्स पावर का डीजल इंजन भी लगा होता है.

इस मशीन से 1 घंटे में 40 से 50 क्विंटल तक अरवी की धुलाई की जा सकती है और इस मशीन में एक बार पानी भरने के बाद उस पानी को 4-5 दिनों तक इस्तेमाल में लिया जा सकता है, इसलिए पानी की भी खपत कम होती है.

अरवी के अलावा इस मशीन से गाजर, अदरक व हलदी जैसी अन्य फसलों की भी धुलाई की जाती है. यह मशीन अकसर अन्य मशीन निर्माताओं के पास उपलब्ध नहीं होती है, इसलिए यह मशीन अपनेआप में खास हो जाती है.

इस धुलाई मशीन से किसान अपने काम तो पूरे करता ही है, साथ ही आसपास के किसानों का भी काम कर के अच्छी कमाई कर सकता है. मशीन को किराए पर दे कर भी आमदनी बढ़ाई जा सकती है.

इस मशीन के बारे में यदि आप ज्यादा कुछ जानना चाहते हैं, तो अमन विश्वकर्मा इंजीनियरिंग वर्क्स के फोन नंबरों पर 09896822103, 09813048612, 01693-248612, 09813900312 पर बात कर सकते हैं.

Hybrid Tomato : संकर (हाइब्रिड) टमाटर की खेती

Hybrid Tomato : अति खूबसूरत चटक लाल रंग के गोलमटोल टमाटर देख कर सब्जी प्रेमियों की आंखों की चमक बढ़ जाती है. दैनिक जीवन में टमाटर की बहुत ज्यादा अहमियत होती है. हर सब्जी और सलाद में टमाटर का बढ़चढ़ कर योगदान होता है. बाजार में मिलने वाली टोमैटो सास या टोमैटो कैचप के दीवाने भी खूब होते हैं.

घर पर बनने वाली तरहतरह की टमाटर की चटनियां भी लाजवाब होती हैं. ज्यादातर तरकारियां बगैर टमाटर के फीकी महसूस होती हैं, इसीलिए मार्केट में टमाटर की प्यूरी भी खूब बिकती है. ताजे टमाटर मौजूद न होने की हालत में टमाटर की प्यूरी से काम चल जाता है.

टमाटर के इस्तेमालों को देखते हुए इस की खेती की अहमियत बहुत ज्यादा बढ़ जाती है. किसान लोग बड़े पैमाने पर टमाटर की खेती कर के खूब मुनाफा कमा सकते हैं, तो घरेलू तौर पर भी टमाटर के पौधे लगाना फायदेमंद रहता है. आजकल संकर टमाटरों का चलन काफी बढ़ गया है, लिहाजा संकर टमाटरों की खेती कामयाबी की कुंजी बन गई है.

माकूल आबोहवा

संकर टमाटर की खेती के लिए 21 डिगरी सेंटीग्रेड औसत तापमान सही रहता है. टमाटर की खेती के लिए पाला घातक होता है, लिहाजा इस के लिए पाले रहित मौसम होना जरूरी है. थोड़े गरम व हलकी धूप वाले मौसम में टमाटरों का सही विकास होता है. ऐसे मौसम में टमाटर सही तरीके से पक कर गहरे लाल हो जाते हैं और पैदावार भी अच्छी होती है.

नर्सरी की तैयारी और बोआई

टमाटर की नर्सरी के लिए 5-6 मीटर लंबी और 2 फुट चौड़ी क्यारियां ठीक होती हैं. क्यारियों की ऊंचाई भी करीब 20-25 सेंटीमीटर होनी चाहिए. क्यारी तैयार करते वक्त उस में से कंकड़पत्थर वगैरह निकाल देने चाहिए. क्यारी में पर्याप्त मात्रा में अच्छी तरह से सड़ी गोबर की खाद व बालू मिला कर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए.

क्यारी को फाइटोलान, डायथेन एम 45 की 2 ग्राम मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर भिगोएं. इस के बाद क्यारी की पूरी लंबाई में 10-15 सेंटीमीटर के फासले पर लाइनें बनाएं, इन्हीं लाइनों में बीजों की बोआई करें.

बीजों को जमीन में जरा सा दबा कर बालू व भूसे से ढक दें और फुहारे से हलकी सिंचाई करें. अंकुरण होने तक रोजाना 2 बार क्यारी की सिंचाई करें. अंकुरण होने के बाद क्यारी से भूसा हटा दें. पौधों में 4-6 पत्तियां निकलने पर थाईमेट का इस्तेमाल करें. इस के बाद पौधों पर मेटासिस्टाक्स/ थायोडान की 2 मिलीलीटर मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें.

इस के अलावा डाइथेन एम 45 की 2 ग्राम मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर उस से भी छिड़काव करें.

बोआई का समय

उत्तरी भारत में जूनजुलाई में सर्दी के मौसम के लिए, नवंबर में गरमी की फसल के लिए और मार्च में बरसात की फसल के लिए  टमाटर की बोआई का माकूल समय होता है. महाराष्ट्र और मध्य भारत में मईजून, अगस्तसितंबर और दिसंबरजनवरी में टमाटर की बोआई की जाती है. पूर्व और दक्षिण भारत में पूरे साल टमाटर की खेती की जा सकती है.

बोआई का अंतर व बीज दर

टमाटर की खेती के लिए 100-120 ग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करने चाहिए. बोआई करते वक्त लाइन से लाइन की दूरी 75 सेंटीमीटर रखनी चाहिए और पौधे से पौधे की दूरी 60 सेंटीमीटर होनी चाहिए.

खाद की मात्रा

खेत तैयार करते वक्त 15-20 टन अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. पौधों की रोपाई से पहले 50 किलोग्राम नाइट्रोजन, 100 किलोग्राम फास्फोरस और 100 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में मिलाएं. रोपाई के 20 दिनों बाद 50 किलोग्राम नाइट्रोजन का इस्तेमाल करें. इसी क्रम में पहली तोड़ाई के बाद भी 50 किलोग्राम नाइट्रोजन का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें.

Hybrid Tomato

टमाटर के खास कीट

तेला/माहो/चुरदे : ये कीट टमाटर की फसल को काफी नुकसान पहुंचाते हैं. बचाव के लिए 1 लीटर पानी में 2 मिलीलीटर आक्सीडेमेटान मिथाइल मिला कर छिड़काव करें.

सफेद मक्खी : यह भी टमाटर की फसल के लिए घातक होती है. इस से बचाव के लिए ट्रायजोफास की 2 मिलीलीटर मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें.

फलछेदक व तनाछेदक : कीड़े लगे फलों व डालियों को तोड़ कर नष्ट कर दें, क्योंकि ये कीड़े बहुत तेजी से बढ़ कर अन्य फलों और पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं. इस के अलावा क्विनालफास/एंडोसल्फान की 3 मिलीलीटर मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें. 3 ग्राम कार्बेराइल का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करने से भी फलछेदक व तनाछेदक कीटों पर काबू पाया जा सकता है.

अश विव्हील : यह कीड़ा भी टमाटर की फसल को काफी नुकसान पहुंचाता है. इस का हमला होने पर बचाव के लिए बोआई के 15 दिनों बाद कार्बेफुरान 3 जी की 20 किलोग्राम मात्रा का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें.

मकड़ी : मकड़ी भी टमाटर की फसल की दुश्मन होती है. बचाव के लिए 2.7 मिलीलीटर डायकोफाल का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें या सल्फर की 3 ग्राम मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें.

जड़गांठ की कृमियां : ये भी काफी घातक होती हैं. बचाव के लिए कार्बोफुरान 3जी की 20 किलोग्राम मात्रा का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें या 12.5 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से फोरेट 10 जी का इस्तेमाल करें.

टमाटर की खास बीमारियां

ब्लाइट : इस रोग से टमाटर की फसल को काफी नुकसान पहुंचता है. रोकथाम के लिए मैंकोजेब की 3 ग्राम मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें.

फुजारियन मुरझान : यह भी एक घातक रोग है. रोकथाम के लिए फसलों को बदलबदल कर खेती करें.

वायरल विकार : इस से बचाव के लिए वायरस वाहक पर नियंत्रण करना चाहिए.

संकर टमाटर की खास प्रजातियां

माही 401 (एमएचटीएम 401) : इस प्रजाति का पौधा लंबा होता है. इस में रोपाई के 80-85 दिनों बाद तैयार फल मिलने लगते हैं. अंडाकार आकार के इस टमाटर का औसत वजन करीब 75-85 ग्राम तक होता है. इस प्रजाति के टमाटर ठोस व उम्दा दर्जे के होते हैं. इन्हें दूर के बाजारों में भी भेजा जा सकता है.

माही गोट्या (एस 41) : इस प्रजाति के पौधे बढ़ कर ढाई से 3 फुट तक ऊंचे हो जाते हैं. इस प्रजाति के पौधों से रोपाई के 70-75 दिनों बाद तैयार फल मिलने लगते हैं. इस के फल गहरे लाल रंग के और अंडाकार आकार के होते हैं. फलों का औसत वजन 75-80 ग्राम होता है. देश के सभी इलाकों में उगाया जाने वाला यह टमाटर बाजार के लिहाज से उम्दा होता है.

माही अरविंद (एमएचटीएम 207) : इस प्रजाति के पौधे 75 से 80 सेंटीमीटर तक ऊंचे होते हैं. इन पौधों से रोपाई के 75-80 दिनों बाद तैयार फल मिलने लगते हैं. इस प्रजाति का फल अंडाकार और कसा हुआ लाल रंग का होता है. फलों का औसत वजन 80 से 90 ग्राम तक होता है. इसे भी भारत के किसी भी इलाके में उगाया जा सकता है.

कुल मिला कर संकर टमाटर की खेती किसानों के लिए बेहद फायदेमंद साबित होती है. इन उम्दा टमाटरों को सभी जगहों पर अच्छे दामों पर बेच कर भरपूर कमाई की जा सकती है.

Agricultural Machinery : जुताई व बोआई यंत्र – कम लागत, अधिक उत्पादन

Agricultural Machinery : किसान अपनी रबी की फसल ले चुके हैं. अब खरीफ फसलों की तैयारी पर काम चल रहा है. कुछ किसान तो अपने खेतों में फसल बो चुके हैं. किसान अपने बीज को बोआई यंत्र से बो सकते हैं, क्योंकि यंत्रों से बिजाई करने से बीज बरबाद नहीं होते हैं.

पावर टिलर चालित जुताई व बोआई यंत्र

यह यंत्र खेत की तैयारी के साथसाथ बोआई भी करता है इस से खाद भी साथ ही डाल सकते हैं.

इस यंत्र को 10 से 12 हार्स पावर के टिलर के साथ जोड़ कर चलाया जाता है. इस यंत्र की अनुमानित कीमत 15000 रुपए से 18000 रुपए है.

इस यंत्र से गेहूं, सोयाबीन, चना, ज्वार, मक्का की बोआई कर सकते हैं.

इस यंत्र को खरीदने के लिए आप कृषि अभियांत्रिकी संस्थान के फोन नं. 0755-2521133, 2521139, 2521142 पर संपर्क कर सकते हैं.

जांगड़ा की बिजाई मशीन

सब्जियों की बोआई हेतु महावीर जांगड़ा की यह बिजाई मशीन खासी लोकप्रिय है. खेत तैयार करने के बाद इस मशीन से बिजाई करने पर बीज उचित मात्रा में लगते हैं. साथ ही यह मशीन खुद मेंड़ बनाती है और बिजाई करती है. यह मशीन 2 मौडल में उपलब्ध है :

* 2 बेड वाली बिजाई मशीन :  यह मशीन 8 लाइन में बिजाई करती है और इसे 35 से 40 हार्स पावर के ट्रैक्टर से चलाया जाता है. इस बिजाई मशीन की कीमत लगभग 52000 रुपए है.

* 3 बेड वाली बिजाई मशीन :  यह मशीन 12 लाइनों में बिजाई करती है और इसे 50 हार्स पावर के ट्रैक्टर से चलाया जाता है. इस की कीमत लगभग 72000 रुपए है.

इस मशीन से बोई जाने वाली खास फसलें :

* फूलगोभी, पत्तागोभी, सरसों, राई, शलगम.

* गाजर, मूली, धनिया, पालक, मेथी, हरा प्याज, मूंग, जीरा, टमाटर.

* भिंडी, मटर, मक्का, चना, कपास, टिंडा, तोरी, फ्रांसबीन, घीया, तरबूज.

जो भी किसान इस मशीन को लेना चाहें वे महावीर जांगड़ा से उन के फोन नंबर 09896822103, 9813048612 पर संपर्क कर सकते हैं.

Kala Namak Rice : कालानमक धान की उन्नत किस्मों की खेती

Kala Namak Rice : कालानमक धान अपनी महक व गुणवत्ता की वजह से काफी महंगा होता है. इसीलिए कम पैदावार के बावजूद किसानों द्वारा इस की खेती की जाती है. कालानमक धान की पुरानी प्रजातियों में ज्यादा समय में कम पैदावार होती थी. इन के पौधे लंबे होने की वजह से अकसर गिर जाते थे और इन्हें पानी की भी ज्यादा जरूरत होती थी. इन्हीं वजहों से इस की खेती के रकबे में काफी कमी आ गई.

इन समस्याओं को देखते हुए भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने शोध कर के कालानमक 101, कालानमक 102 व कालानमक 103 नाम की बौनी सुगंधित व अधिक उपज देने वाली प्रजातियां विकसित की हैं. ये प्रजातियां न केवल अधिक उपज देंगी, बल्कि कम समय में तैयार भी हो जाएंगी. कालानमक की इन प्रजातियों में कुपोषण को दूर करने वाले तमाम सूक्ष्म पोषक तत्त्व मौजूद हैं, जो कुपोषण को दूर करने में बेहद कारगर सिद्ध होंगे. इन प्रजातियों में निम्नलिखित खूबियां पाई गई हैं:

* इन में आयरन 29.09 फीसदी व जिंक 31.01 फीसदी पाया जाता है, जो पहले से मौजूद खुशबूदार प्रजातियों से ज्यादा है.

* कालानमक की इन प्रजातियों में कुपोषण से लड़ने की कूवत ज्यादा होती है.

* इन का चावल सफेद व खुशबूदार होता है.

* इन की पैदावार कालानमक की पुरानी किस्मों से डेढ़ गुना ज्यादा है. इन में 20 अक्तूबर के करीब बाली आती है और नवंबर के अंत तक फसल पक कर तैयार हो जाती है. इस तरह ये पुराने कालानमक की प्रजातियों से 2 हफ्ते तक का कम समय लेती हैं.

* इन के पौधों की ऊंचाई 100 से 110 सेंटीमीटर होती है और बालियां 20-25 सेंटीमीटर तक लंबी होती हैं.

* इन्हें किसी भी साधारण कुटाई मशीन से कुटाई कर के चावल निकाला जा सकता है.

* इस चावल का औसत बाजार भाव 55-60 रुपए प्रति किलोग्राम है और इस में कुपोषण से लड़ने की कूवत होती है.

जमीन का चयन : कालानमक की इन प्रजातियों की खेती उन सभी प्रकार की जमीनों में की जा सकती है, जहां सिंचाई के साधन मौजूद हों. वैसे इन प्रजातियों के लिए दोमट, मटियार व काली मिट्टी ज्यादा मुफीद मानी जाती है.

बीज दर व नर्सरी : कालानमक की इन उन्नत प्रजातियों की 1 हेक्टेयर खेत में रोपाई के लिए 25-30 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है. इन प्रजातियों की नर्सरी को अन्य प्रजातियों के मुकाबले देर से यानी जून के आखिरी हफ्ते से जुलाई के दूसरे हफ्ते तक डालना अच्छा रहता है. 1 हेक्टेयर रकबे के लिए 800 से 1000 वर्गमीटर में नर्सरी डालना सही होता है. नर्सरी की बोआई से पहले तैयार किए गए खेत में 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम फास्फोरस व 50 किलोग्राम पोटाश की मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से डाली जाती है. अगर नर्सरी में जिंक या लोहे की कमी दिखाई पड़े तो 0.5 फीसदी जिंक सल्फेट व 0.2 फीसदी फेरस सल्फेट के घोल का छिड़काव करना अच्छा होता है.

Kala Dhan

प्रजातियां : भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान (फिलीपींस) द्वारा विकसित की गई कालानमक की बौनी व अधिक उत्पादन देने वाली प्रजातियों में कालानमक 101, कालानमक 102 व कालानमक 103 को सब से ज्यादा मुफीद माना गया है. इन प्रजातियों में सब से अच्छा नतीजा कालानमक 101 का रहा है. ये तीनों प्रजातियां खुशबू से भरपूर होती हैं.

बीज शोधन : कालानमक की इन प्रजातियों को रोगों व कीड़ों से बचाने के लिए बीजों को शोधित किया जाना जरूरी होता है. जिस खेत में जीवाणु झुलसा या जीवाणु धारी रोग की समस्या पाई जाती है, वहां 25 किलोग्राम बीजों के लिए 4 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन को पानी में मिला कर उस में बीजों को रात भर भिगो देना चाहिए. दूसरे दिन नर्सरी में डालने से पहले भिगोए गए बीजों को छाया में सुखा लेना चाहिए. अगर पौधों में झुलसा की समस्या नहीं आती हो तो 25 किलोग्राम बीजों को रात भर पानी में भिगोने के बाद दूसरे दिन पानी से छान लें. इस के बाद 75 ग्राम थीरम या 50 ग्राम कार्बेंडाजिम को 8-10 लीटर पानी में घोल कर बीजों में मिला दें. इस के बाद भिगोए गए बीजों को छाया में अंकुरित कर के नर्सरी में डालें.

नर्सरी में बीजों को डालने के 21-25 दिनों के बाद अच्छी तरह से पलेवा किए गए खेत में इस की रोपाई करनी चाहिए. कालानमक की ये प्रजातियां बौनी होने की वजह से गिरती नहीं हैं. पौधों की रोपाई 3-4 सेंटीमीटर से ज्यादा गहराई पर नहीं करनी चाहिए, वरना कल्ले कम निकलते हैं और उपज कम हो जाती है. पौधों से पौधों की दूरी 2×10 सेंटीमीटर व एक स्थान पर पौधों की संख्या 2-3 रखनी चाहिए.

खाद व उर्वरक : इन प्रजातियों के लिए 1 हेक्टेयर खेत में 100-120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस व 60 किलोग्राम पोटाश की जरूरत होती है. खेत की जुताई के दौरान ही प्रति हेक्टेयर की दर से 10-15 टन गोबर की सड़ी खाद का इस्तेमाल करना उत्पादन के लिए अच्छा होता है. इसी दौरान 20-25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना अच्छा होता है.

सिंचाई : कालानमक की इन प्रजातियों को सही मात्रा में नमी की जरूरत होती है. कम बारिश की हालत में नियमित अंतरात पर सिंचाई करते रहें, ताकि खेत की नमी न सूखने पाए. वैसे कालानमक की इन प्रजातियों में 30-60 सेंटीमीटर अस्थायी पानी भी पैदावार के लिए अच्छा माना जाता है. खेत में ज्यादा पानी न लगने पाए इसलिए जलनिकासी का इंतजाम अच्छा होना चाहिए. रोपाई के 1 हफ्ते बाद कल्ले फूटने, बाली निकलने, फूल खिलने और दाना बनते समय खेत में सही मात्रा में पानी होना चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण : धान की फसल के लिए खरपतवार नियंत्रण बेहद जरूरी होता है, क्योंकि फसल में खरपतवार उग आने से पैदावार घट जाती है. धान की फसल पर रसायनों का असर कम करने के लिए खरपतवार नियंत्रण के लिए बिना रसायनों का प्रयोग किए ही यांत्रिक विधि से खरपतवार नियंत्रण किया जाना ज्यादा सही माना जाता है. इस के लिए खुरपी या पैडीवीयर का इस्तेमाल किया जा सकता है.

अगर रासायनिक विधि से खरपतवार का नियंत्रण करना है, तो चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के लिए ब्यूटाक्लोर 5 फीसदी ग्रेन्यूल, 30-40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर या बेंथ्योकार्ब 10 फीसदी ग्रेन्यूल 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. इस के अलावा विस्पाइरीबैक सोडियम या एनीलोफास का इस्तेमाल भी खरपतवार नियंत्रण के लिए रोपाई के 3-4 दिनों के अंदर करना चाहिए. अगर दानेदार रसायनों का इस्तेमाल किया जा रहा है, तो यह ध्यान रखना चाहिए कि खेत में काफी मात्रा में पानी भरा हो.

बीमारियां व कीट नियंत्रण : अगर धान की नर्सरी डालते समय बीजशोधन किया गया है, तो फसल में बीमारियों के लगने की संभावना नहीं होती है. धान की फसल में जिन कीटों का प्रकोप पाया जाता है, उन में दीमक, पत्ती लपेटक कीट, गंधीबग, बाली काटने वाला कीट, गोभगिडार, हरा फुदका, भूरा फुदका, सफेद पीठ वाला फुदका, हिस्पा व नरई कीट खास हैं, लेकिन कालानमक की इन प्रजातियों में इन कीटों का प्रकोप बहुत कम देखा गया है.

अगर ऊपर बताए गए कीटों का प्रकोप दिखाई पड़ता है, तो अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र के कीट रोग नियंत्रण विशेषज्ञ से संपर्क कर के कीटों पर काबू पाया जा सकता है.

उत्पादन : कालानमक की इन प्रजातियों की फसल की कटाई 85-90 फीसदी दानों के पक जाने के बाद की जाती है. काटी गई फसल की मड़ाई के लिए छायादार व हवादार जगह का चुनाव करें. इस से कुटाई के दौरान चावल के टूटने की संभावना नहीं होती है. कालानमक की इन प्रजातियों की औसत उपज 50-55 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पाई गई है. ज्यादा जानकारी के लिए किसान कृषि विज्ञान केंद्र बंजरिया, बस्ती के विषय वस्तु विशेषज्ञ, राघवेंद्र सिंह के मोबाइल नंबर 9415670596 या 9838070596 पर संपर्क कर सकते हैं.

Attention: …तो नहीं मिलेगी पी. एम. सम्मान. निधि

बस्ती: शासन ने एग्री स्टैक (डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रचर फौर एग्रीकल्चर) के अंतर्गत फार्मर रजिस्ट्री तैयार करने का निर्देष दे दिया है. इसके लिए दिसम्बर माह तक विशेष अभियान चलाया जा रहा है. फार्मर रजिस्ट्री के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर शिविर का आयोजन किया जा रहा है. फार्मर रजिस्ट्री के लिए चलाये जा रहे अभियान के क्रम में मुख्य विकास अधिकारी बस्ती द्वारा ग्रामपंचायत स्तर पर संचालित फार्मर रजिस्ट्री कैम्प तिलकपुर, विकास खंडकप्तानगंज, तहसील हर्रेया का निरीक्षण किया गया.

निरीक्षण के समय मुख्य विकास अधिकारी के साथ में अशोक कुमार गौतम, उप कृशि निदेशक, बस्ती, नायब तहसीलदार, हर्रैया एवं राजस्व, कृशि एवं पंचायत विभाग के क्षेत्रीय कर्मचारीगण उपस्थित रहे. मुख्य विकास अधिकारी द्वारा स्वयं भी फार्मर रजिस्ट्री कैम्प में उपस्थित कृषकों में से एक कृषक का एग्री स्टैक ऐप के माध्यम से फार्मर रजिस्ट्री किया गया.

उप कृषि निदेशक, बस्ती द्वारा कैम्प में उपस्थित कृषकों को फार्मर रजिस्ट्री कराये जाने के सम्बन्ध में पूरी जानकारी दी गयी एवं कृषक भाइयों से आह्वान किया गया कि वह कृषि विभाग के प्राविधिक सहायक ग्रुप-सी, बी.टी.एम, ए.टी.एम, पंचायत सहायक एवं लेखपाल अथवा कौमन सर्विस सेंटर से अथवा किसान भाई खुद भी सेल्फ मोड में एग्री स्टैक ऐप पर फार्मर रजिस्ट्री कर सकते है.

किसान भाईयों से अपील की गयी कि वह भी अपने अपने क्षेत्र में दुसरे किसान भाईयों को अधिक से अधिक फार्मर रजिस्ट्री कराने के बारे में बतायें क्योंकि जो किसान भाई फार्मर रजिस्ट्री नहीं करायेंगे उन्हें पी.एम. किसान की अगली किस्त प्राप्त नहीं होगी. इस लिए सभी किसान भाई अति शीघ्र फार्मर रजिस्ट्री करा लें.

मुख्य विकास अधिकारी द्वारा भी किसान भाईयों से फार्मर रजिस्ट्री कराने की अपील की गयी तथा क्षेत्रीय कर्मचारियों को भी निर्देशित किया गया कि वह अपने-अपने कार्य क्षेत्र में अधिक से अधिक फार्मर रजिस्ट्री कराना सुनिश्चित करें. निरीक्षण के समय लेखपाल द्वारा यह अवगत कराया गया कि एग्री स्टैक ऐप में तकनीकी खामियों की वजह से सहखातेदारों को फार्मर रजिस्ट्री कराने में समस्या आ रही है. उप कृषि निदेशक को निर्देशित किया गया है कि वह मुख्यालय से संम्पर्क कर तकनीकी खामियों से उनको अवगत कराकर, समस्या का समाधान करायें.

लाल भिंडी की खेती से किसान संजीव को मिली अलग पहचान

युवा किसान संजीव कुमार का कहना है कि लाल भिंडी की खेती से न सिर्फ फसल अच्छी मिलती है, बल्कि धरती की उर्वराशक्ति भी पहले से बेहतर हुई है. लाल भिंडी इम्यूनिटी बूस्टर के तौर पर काम करती है.

कृषि विज्ञान केंद्र, हरिहरपुर, वैशाली के प्रधान एवं वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डा. सुनीता कुशवाहा के निर्देशन पर उद्यान वैज्ञानिक स्वप्निल भारती की देखरेख में हाजीपुर नगर के चकवारा गांव निवासी राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित युवा किसान संजीव कुमार को लाल भिंडी का बीज परीक्षण के लिए उपलब्ध कराया गया था, जिसे उन्होंने अपने किचन गार्डन में लाल भिंडी का प्रयोग किया, जिस का नतीजा बेहद अच्छा रहा.

बोआई के 60 दिन बाद होती है तैयार फसल

लाल भिंडी की बोआई 15 फरवरी से 15 मार्च एवं 15 जून से 15 जुलाई तक की जाती है. इसे दोनों ही मौसमों में बोया जा सकता है. खरीफ रबी के लिए इस की बोआई का काम किया जा सकता है. उन्होंने बताया कि तैयार फसल को प्रत्येक 2 दिन पर तुड़ाई की जाती है. किसानों को लाल भिंडी की खेती के लिए ऊंची एवं जल निकास वाला खेत का चयन करना चाहिए. इस की खेती दोमट मिट्टी में करने से फसल बहुत ही अच्छी होती है. भिंडी की खेती लाइन से लाइन की दूरी 45 से 60 सैंटीमीटर पौधे से पौधे के बीच की दूरी 25 से 30 सैंटीमीटर पर बोआई करनी चाहिए.

गुणों से भरपूर लाल भिंडी

हाजीपुर नगर के चकवारा गांव के निवासी राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित युवा किसान संजीव कुमार का कहना है कि काशी लालिमा प्रजाति लाल भिंडी का प्रयोग वैशाली जिले की मिट्टी एवं आबोहवा में अच्छी फसल मिलती है. हरे रंग की भिंडी की अपेक्षा लाल भिंडी में आयरन, पोटैशियम, प्रोटीन, कैल्शियम और फाइबर पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है.

कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं संजीव कुमार

फार्म एन फूड एग्री अवार्ड 2023, ग्रास रूट इनोवेटिव अवार्ड 2019 ;राष्ट्रपति पुरस्कारद्ध एनआईएफ-गुजरात आईएलआरआई फेलो फार्मर अवार्ड – 2019, आईसीएआर आईएआरआई, नई दिल्ली ग्रास रूट इनोवेटिव अवार्ड-2018, धानुका इनोवेटिव अवार्ड-2020 ;बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर, भागलपुरद्ध, प्लांट जीरोम सेवियर अवार्ड -2017 ;धानुका एग्रो कैमिकल, मुंबईद्ध, पीपीवी और एफआरए-नई दिल्ली, जगजीवन राम इनोवेटिव अवार्ड-2017 आईसीएआर, नई दिल्ली, अभिनव किसान पुरस्कार 2014, सर्वोत्तम किसान पुरस्कार-2013, सर्वश्रेष्ठ किसान पुरस्कार-2013, गुजरात कृषि विभाग महिंद्रा इंडिया एग्री अवार्ड 2012, 2012 तक सर्वश्रेष्ठ किसान पुरस्कार वैशाली जिला प्रशासन, उद्यान रतन प्रोग्रेसिव फार्म अवार्ड 2013, प्रगतिशील किसान पुरस्कार 2010, आईसीएआर, आईएआरआई जी टीवी से पूसा, नई दिल्ली किसान पुरस्कार, राष्ट्रीय रजत पुरस्कार 2009, आईसीएआर-आईआईवीआर, वाराणसी से सम्मानित हो चुके हैं.

साढे़ 5 फुट की लौकी आकर्षण का केंद्र

हाल ही में बिहार सरस मेले में हाजीपुर वैशाली से आए संजीव कुमार द्वारा उगाई गई साढे़ 5 फुट की लौकी ने लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया. और्गैनिक तरीके से उगाई गई लौकी अपनेआप में खास है. वे इस तरह के काम करते हैं, जिस की वजह से उन्हें राष्ट्रपति ये भी सम्मानित किया जा चुका है.

कृषि एवं खाद्य प्रणाली पर कार्यशाला

हिसार: चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय और इन्वेस्ट इंडिया के संयुक्त तत्वावधान में एग्रीबिजनैस इंक्यूबेशन सैंटर (एबिक) में ‘कृषि एवं खाद्य प्रणाली में समावेशी व्यवसाय’ विषय पर कार्यशाला का आयोजन किया गया.

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बीआर कंबोज ने इस कार्यशाला की अध्यक्षता की. इस दौरान संयुक्त राष्ट्र की एशिया और प्रशांत क्षेत्रीय आर्थिक एवं सामाजिक आयोग (यूएनओ) के योजना अधिकारी इग्रनोसियो ब्लैंकों, आर्थिक मामलों के अधिकारी मार्ता पेरेज व परियोजना अधिकारी इशराक फजल मौजूद रहे. इस के अलावा हरियाणा सरकार में विदेशी सहकारिता विभाग के सलाहाकर पवन चौधरी, हैफेड के चेयरमैन कैलाश भगत एवं हरियाणा सरकार में इन्वेस्ट इंडिया एंजेसी के सीनियर असिस्टेंट वाइस प्रेसिडेंट शिवम भी उपस्थित रहे.

कुलपति प्रो. बीआर कंबोज ने अपने संबोधन में समावेशी व्यवसाय विषय पर काम कर रहे उद्यमियों व किसानों के लिए विश्वविद्यालय की ओर से उपलब्ध करवाई जा रही सुविधाओं पर विस्तारपूर्वक जानकारी दी.

उन्होंने आगे कहा कि एबिक सैंटर न केवल चयनित स्टार्टअप्स को तकनीकी सहायता प्रदान कर रहा है, बल्कि जरूरत के अनुसार उन्हें आर्थिक सहायता भी प्रदान करता है. एबिक युवा व किसानों को उन के उत्पाद की प्रोसैसिंग, मूल्य संवर्धन, पैकेजिंग, सर्विसिंग व ब्रांडिंग जैसे महत्वपूर्ण कामों के लिए सहायता प्रदान करता है, ताकि वे अपने व्यवसाय को उच्च स्तर पर स्थापित कर सकें.

Food Processingउन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय हर जिले में स्थापित कृषि विज्ञान केंद्र के माध्यम से ग्रामीण व शहरी महिलाओं, युवाओं व प्रदेश के किसानों को स्वावलंबी, समृद्ध और आर्थिक रूप से संपन्न बनाने की दिशा में निरंतर प्रयासरत है. साथ ही, उन्होंने कहा कि एचएयू प्रदेश के 6 लाख किसानों से सीधेतौर पर जुड़ा हुआ है.

हरियाणा एवं तेलंगाना को समावेशी व्यापार से जोड़ा जाएगा

संयुक्त राष्ट्र की एशिया और प्रशांत क्षेत्रीय आर्थिक एवं सामाजिक आयोग (यूएनओ) के आर्थिक मामलों के अधिकारी मार्ता पेरेज ने बताया कि यह संगठन हरियाणा व तेलगांना में हकृवि और इन्वेस्ट इंडिया के संयुक्त सहयोग से कृषि एवं खाद्य प्रणाली में समावेशी व्यवसाय विषय पर किसानों के हित और आमदनी बढ़ाने के लिए योजनाएं तैयार करेगा. इस योजना के तहत उपरोक्त दोनों प्रदेशों के किसानों के संसाधनों का खर्चा कम करने व उन को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने और उद्यमियों को समृद्ध बनाने के लिए प्रयास किए जाएंगे.

हैफेड के चेयरमैन कैलाश भगत ने कहा कि हकृवि द्वारा तैयार उन्नत फसल किस्मों के माध्यम से किसान लगातार पैदावार बढ़ा रहा है. साथ ही, हैफेड किसानों के बासमती चावल के निर्यात करने में हर संभव प्रयास कर रहा है.

हरियाणा सरकार के विदेशी सहकारिता विभाग के सलाहाकर पवन चौधरी ने कहा कि हरियाणा प्रदेश पूरे भारत में उद्यमियों को समस्त सुविधाएं मुहैया करवाने में अव्वल है.

उन्होंने पीएम कुसुम योजना, मेरी फसल-मेरा ब्यौरा, परिवार पहचानपत्र, किसान उत्पादक संगठन जैसी स्कीमों के बारे में संयुक्त राष्ट्र से आई टीम के सदस्यों को अवगत कराया. साथ ही, उन्होंने हरियाणा में स्थापित 4 फूड पार्क, 3,000 से ज्यादा फूड प्रोसैसिंग यूनिट, 5 कोल्ड चेन के कार्यों के बारे में भी जानकारी दी.

उन्होंने कहा कि हरियाणा प्रदेश स्ट्राबेरी एवं दुग्ध उत्पादन में भी अव्वल है. हरियाणा का विदेशी सहकारिता विभाग प्रदेश के उद्यमियों के उत्पादों को निर्यात करने पर निरंतर काम कर रहा है.

इस अवसर पर कुलपति के ओएसडी एवं एबिक के डायरेक्टर डा. अतुल ढींगड़ा, प्रिंसिपल इन्वेस्टीगेटर (आरकेवीवाई) डा. राजेश गेरा सहित इंटेलिकेप ग्रुप, एफपीओ, नाबार्ड व अन्य बैंकों के अधिकारी, एग्रोनेक्सट एवं एबिक सैंटर के सदस्य भी उपस्थित रहे.

बिचौलियों के बीच पिसते किसान

अदना सा प्याज केवल काटने पर ही आंसू बहाने पर मजबूर नहीं करता है, खरीदने पर भी ग्राहकों के आंसू निकाल देता है. कई सरकारें प्याज के बढ़ते दामों की भेंट चढ़ चुकी हैं. केंद्र की मोदी सरकार के समय प्याज की कीमतों ने पुराने सभी रिकौर्ड तोड़ दिए हैं. देश में पहली बार प्याज की कीमत ने सैंचुरी लगाई और 150 रुपए प्रति किलोग्राम से भी ज्यादा हो गई थी.

प्याज की बढ़ती कीमत पर कांग्रेस की संप्रग सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने वाली भाजपा अपने कार्यकाल में प्याज की बढ़ती कीमतों पर खामोश थी. लोकसभा में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने तो यहां तक कह दिया था, ‘मैं प्याज नहीं खाती हूं.’

वित्त मंत्री के इस बयान की निंदा भी हुई. मोदी सरकार ने प्याज की बढ़ती कीमतों को कम करने के लिए अफगानिस्तान से प्याज का आयात किया. इस के बाद भी प्याज की कीमतें 80 रुपए से ले कर 100 रुपए के बीच ही हैं.

प्याज की कीमतों ने पहले भी तमाम सरकारों का भविष्य तय किया है. साल 1998 में प्याज के बढ़ते दामों ने दिल्ली में सुषमा स्वराज और राजस्थान में भैरों सिंह शेखावत सरकार को विधानसभा चुनावों में हार का मुंह देखने को मजबूर कर दिया था. उस समय प्याज की कीमत 60 रुपए प्रति किलोग्राम ही बढ़ी थी.

जानेमाने अर्थशास्त्री और देश के पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह की सरकार के समय में प्याज की कीमत 80 रुपए के ऊपर तक चली गई थी.

प्याज के तेवर देख केंद्र सरकार ने इस की कीमतों को नीचे लाने का काम शुरू किया, पर तब तक खाने वाले आंसू बहाने लगे थे. ऐसे में 2014 के लोकसभा चुनाव में मनमोहन सिंह सरकार को हार का सामना करना पड़ा था.

ऐसा केवल प्याज के साथ ही नहीं होता है. अरहर, आलू, गन्ना जैसी तमाम पैदावारों के साथ भी ऐसा ही होता है. जब किसान के यहां पैदावार होती है, तब वह सस्ती रहती है, पर बिचौलियों के पास पहुंचते ही कीमतें ग्राहकों की पहुंच से बाहर होती जाती हैं. महंगी सब्जियों के बिकने के बाद भी किसानों को कोई फायदा नहीं मिल रहा है.

इस की वजह किसान के खेत से निकलने के बाद ग्राहक की रसोई तक पहुंचने के रास्ते में सब्जी कम से कम 3 हाथों से हो कर गुजरती है. इन 3 हाथों से हो कर गुजरने वाले रास्ते में ही सब्जी का भाव बढ़ता जाता है.

पहले किसान और ग्राहक के बीच केवल थोक कारोबारी होता था. तब इस से कीमतें इतनी नहीं बढ़ती थीं. अब बिचौलियों के बढ़ने से कीमतें तो बढ़ जाती हैं, पर इस का फायदा किसान को नहीं मिल पाता है और ग्राहक भी बेहाल रहता है.

Onionआलू, प्याज और लहसुन जैसी स्टोर कर रखी जाने वाली चीजों को किसान सीजन में सस्ते दामों पर बेच देते हैं. बिचौलिए इन चीजों को स्टोर कर के रख लेते हैं. इस के बाद बाजार में भाव चढ़ाने के लिए पहले सप्लाई कम की जाती है. जब ये सामान महंगे हो जाते हैं, तो सस्ते में खरीदे गए सामान महंगे दामों पर बाजार में बेचे जाते हैं.

गेहूं, चावल और दाल के साथ भी यही खेल खूब खेला जाता है. जिस समय धान और गेहूं की फसल कटती है, बाजार में इन चीजों के दाम घट जाते हैं, जिस से घटे दामों पर बिचौलिए किसानों से यह सामान खरीद लेते हैं. कुछ दिनों के बाद सस्ते में खरीदा गया यही सामान महंगे दामों पर बेच लिया जाता है. इस से किसान की मेहनत की कमाई को बिचौलिए मलाई समझ कर उड़ा रहे हैं.

किसानों के लिए परेशानी वाली बात यह होती है कि इन सरकारी खरीद केंद्रों पर किसानों के माल को सही तरीके से खरीदा ही नहीं जाता है, जिस से परेशान हो कर किसान धान और गेहूं बिचौलियों को बेचने पर मजबूर हो जाता है. बाद में यही बिचौलिए सरकारी नौकरों की मिलीभगत से अपना गेहूं और धान क्रय केंद्रों पर बेच लेते हैं. इस से सरकारी नौकरों और बिचौलियों दोनों का फायदा हो जाता है. साथ ही, सरकारी खरीद का टारगेट भी पूरा हो जाता है.

धान और गेहूं की ही तरह गन्ने का मूल्य भी राजनीति का शिकार हो गया है. बहुत सारी चीनी मिलें किसानों का पैसा सालोंसाल अपने पास रखे रहती हैं. किसानों को अपना गन्ना खुले बाजार में बेचने दिया जाए, तो गन्ने की अच्छी कीमत मिलने लगेगी.र इस का फायदा किसानों को नहीं मिला.

राजस्थान में मूंग और मूंगफली की ज्यादा खरीद करेगी सरकार

जयपुर: राज्य में अधिक से अधिक किसानों को समर्थन मूल्य पर खरीद का लाभ मिले, इस के लिए मूंग और मूंगफली की पंजीकरण क्षमता को 90 फीसदी से बढ़ाकर 100 फीसदी किया गया है.

प्रबंध निदेशक, राजफैड, संदेश नायक ने बताया कि जिन केंद्रों पर पंजीयन क्षमता पूरी हो चुकी है, वहां 20 फीसद अतिरिक्त पंजीयन सीमा बढ़ाई गई है. किसान बढ़ी हुई पंजीयन सीमा का लाभ प्राप्त कर सकेंगे.

उन्होंने आगे बताया कि किसान पंजीयन सीमा बढ़ाने पर मूंग के लिए 12,731 एवं मूंगफली के लिए 17,025 कुल 29,756 अतिरिक्त किसान पंजीयन करवा सकेंगे. दलहन व तिलहन खरीद की कुल सीमा भारत सरकार द्वारा स्वीकृत लक्ष्य तक सीमित रहेगी.

उन्होंने आगे यह भी बताया कि मूंग, उड़द, मूंगफली एवं सोयाबीन की समर्थन मूल्य पर जारी मूंगफली के लिए 9,443 किसानों द्वारा पंजीकरण करवाया गया है.

प्रबंध निदेशक संदेश नायक ने बताया कि अब तक 5,584 किसानों से 11,487 मीट्रिक टन मूंग और मूंगफली की खरीद की जा चुकी है, जिसकी राशि लगभग 98 करोड़ रुपए है. उड़द एवं सोयाबीन के बाजार भाव समर्थन मूल्य दर से अधिक होने के कारण किसानों द्वारा समर्थन मूल्य पर उक्त जिंस के विक्रय में रुचि नहीं ली जा रही है.

उन्होंने किसानों से आग्रह किया कि समर्थन मूल्य खरीद योजना का लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से ई-मित्र के माध्यम से आवश्यक दस्तावेज यथा गिरदावरी, बैंक की पासबुक, आधारकार्ड सहित शीघ्र पंजीयन करावें, ताकि किसानों को जिंस तुलाई हेतु पंजीयन की प्राथमिकता के क्रम में तुलाई दिनांक आवंटित की जा सके.

प्रबंध निदेशक संदेश नायक ने बताया कि किसान दलहन व तिलहन को सुखा कर और साफसुथरा कर अनुज्ञेय नमी की मात्रा के अनुरूप तुलाई केंद्रों पर लाएं. किसानों की समस्या के समाधान के लिए किसान हेल्पलाइन नंबर 18001806001 जारी किया है, जहां किसान अपनी समस्या का निराकरण कर सकते हैं.

किसानों के सपनों को उड़ान देते ड्रोन

खूंटी( झारखंड): जनजातीय गौरव दिवस के शुभ अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने झारखंड के खूंटी से विकसित भारत संकल्प यात्रा का उद्घाटन किया. सरकारी कल्याण कार्यक्रमों को मैदानी स्तर पर उतारने के लिए एक देशव्यापी पहल के रूप में शुरू होने वाली इस पहल ने अब एक अभिनव मोड़ ले लिया है, जो कृषि और संबद्ध गतिविधियों में ड्रोन प्रौद्योगिकी की परिवर्तनगामी शक्ति को दर्शाता है.

विकसित भारत संकल्प यात्रा की पहुंच 2.60 लाख से अधिक ग्राम पंचायतों और 4,000 से अधिक शहरी स्थानीय निकायों तक हो गई है. यह यात्रा एक विशाल आउटरीच कार्यक्रम, प्रगति और समावेशिता का प्रतीक बन गई है.

जैसेजैसे यात्रा गति पकड़ रही है, एक उल्लेखनीय पहलू जो ध्यान का केंद्र बन रहा है, वह है, कृषि परिदृश्य में ड्रोन का एकीकरण. इस पहल का उद्देश्य किसानों को अत्याधुनिक तकनीक से लैस करना, उन्हें उत्पादकता और सतत व्यवहारों को बढ़ाने के लिए उपकरण प्रदान करना है.

ड्रोन : शो के सितारे

लोग विकसित भारत संकल्प यात्रा की आईईसी वैन और ड्रोन के शो की उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हैं. ये दोनों शो के सितारे बन गए हैं. घनगरज के साथ उड़ने वाली मशीनें दर्शकों, विशेषकर किसानों को मंत्रमुग्ध कर रही हैं, क्योंकि पूरे अभियान के दौरान इन का प्रत्यक्ष प्रदर्शन किया जाता है. यह प्रदर्शन कृषि में क्रांति लाने में ड्रोन की क्षमता को दर्शाते हैं. ध्यान सिर्फ बढ़ी हुई दक्षता पर नहीं है, बल्कि किसानों को सूझबूझ के साथ निर्णय लेने के लिए ज्ञान और उपकरणों के साथ सशक्त बनाने पर है.

ड्रोन प्रदर्शनों को देश के कोनेकोने में स्थित किसान समुदाय, विशेषकर महिला किसानों से अत्यधिक प्रशंसा प्राप्त हो रही है. केरल से हिमाचल प्रदेश तक, गुजरात से त्रिपुरा तक, संदेश स्पष्ट था – ड्रोन कृषि में सकारात्मक बदलाव का प्रेरक हैं.

प्रत्यक्ष प्रदर्शन में उर्वरकों के संतुलित उपयोग को दर्शाया गया है, जिस में अतिरिक्त रासायनिक उर्वरकों से बचने के महत्व पर जोर दिया गया है. ड्रोन ने नैनो यूरिया, नैनो डीएपी (डाईअमोनियम फास्फेट), और अन्य सूक्ष्म पोषक उर्वरकों का छिड़काव किया, जो प्रौद्योगिकी द्वारा कृषि में लाई जाने वाली सटीकता और दक्षता को प्रदर्शित करता है. ड्रोन के माध्यम से कीटनाशक छिड़काव के प्रत्यक्ष प्रदर्शन ने प्रभावी कीट प्रबंधन में इस तकनीक की क्षमता को और उजागर किया.

तरल उर्वरकों और कीटनाशकों के हवाई छिड़काव का प्रत्यक्ष प्रदर्शन एक ऐसी विधि को बढ़ावा देता है, जो सीमित समय सीमा में अत्यधिक उर्वरक उपयोग को नियंत्रित करती है.

नारी शक्ति: ड्रोन की क्षमता को उजागर करना

महिलाओं के नेतृत्व में विकास सुनिश्चित करना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निरंतर प्रयास रहा है. इस दिशा में एक और कदम उठाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री महिला किसान ड्रोन केंद्र लौंच किया.

कोमलापति वेंकट रावनम्मा आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले में एक स्वयं सहायता समूह की सदस्य हैं. उन्होंने केवल 12 दिनों में कृषि उद्देश्यों के लिए ड्रोन उड़ाने का कौशल हासिल कर लिया और 30 नवंबर को वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपने अनुभवों को साझा किया.

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गांवों में कृषि उद्देश्यों के लिए ड्रोन को नियोजित करने के निहितार्थ के बारे में सवाल किया, तो उन्होंने बताया कि ड्रोन समय की बचत के साथसाथ पानी से संबंधित चुनौतियों का समाधान करने में भी मदद करता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि वेंकट जैसी महिलाएं उन लोगों के लिए मिसाल हैं, जो भारत की नारी शक्ति की क्षमता पर संदेह करते हैं.

उन्होंने यह भी कहा कि निकट भविष्य में कृषि में ड्रोन का उपयोग महिला नीति विकास का प्रतीक बन जाएगा. इस के अतिरिक्त उन्होंने विकसित भारत संकल्प यात्रा में महिलाओं की भागीदारी के महत्व पर जोर दिया.