Mushroom : ढींगरी मशरूम से रोजगार

Mushroom : मशरूम उत्पादन भारत में पिछले कुछ दशकों से एक अच्छा रोजगार साबित हो रहा है और भारत की बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए उन के पोषण हेतु मशरूम की खेती एक अच्छा विकल्प है. इसलिए भारत सरकार भी इस की खेती के लिए प्रोत्साहन दे रही है.

मशरूम उत्पादन के लिए भूमि की आवश्यकता नहीं होती. इसे घर के अंदर अथवा झोंपड़ी आदि में अंधेरे में ही उगाया जा सकता है. इस में लागत कम और आर्थिक लाभ ज्यादा है. मशरूम की खेती एक पूर्णकालिक अथवा आंशिक लाभकारी स्वरोजगार है. इस में प्रशिक्षण और उत्पादन दोनों से ही लाभ प्राप्त किया जा सकता है.

यह गृहणियों के लिए एक लाभकारी रोजगार बन सकता है, जिस से वे घर के अन्य कार्यों के साथ ही इस का उत्पादन भी कर सकती हैं और धन कमा सकती हैं.

मशरूम में खनिज लवण और अन्य पोषक तत्त्व भी पाए जाते हैं. यह मोटापा नहीं बढ़ाती है. मशरूम खाने से विटामिन डी भी प्राप्त होता है, क्योंकि इस में एर्गोस्टेरौल पाया जाता है, जो विटामिन डी के उत्पादन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इस में सोडियम पोटेशियम का अनुपात अधिक होने के कारण

उच्च रक्तचाप वाले लोगों के लिए बहुत फायदेमंद साबित होता है. इस में फास्फोरस भी पाया जाता है, जो हड्डियों को मजबूत करता है.

मशरूम की कुछ ही प्रजातियां खाने योग्य हैं, अन्य प्रजाति जहरीली या खाने योग्य नहीं हैं. भारत में ज्यादातर ढींगरी, मिल्की (दूधिया) पुआल मशरूम मौजूद हैं. भारत में औषधीय गुणों वाली मशरूम को भी उगाया जाता है.

उगाने की विधि

ढींगरी मशरूम की कई प्रजातियां भारत में उगाई जाती हैं, जिन को सालभर उगाया जा सकता है, किंतु इस की मुख्य खेती सितंबर के अंत या अक्तूबर के महीने में जब तापमान 22 से 28 डिगरी सैंटीग्रेड के बीच हो और फरवरी से अप्रैल तक भी की जा सकती है. इसे सैलूलोज युक्त पदार्थ जैसे गेहूं, धान, बाजरा, जौ, मक्का आदि किसी भी एक का भूसा अथवा सूखी पत्तियां जैसे वृक्षों की पत्तियां, गन्ने की पत्तियां और लकड़ी के बुरादे आदि पर उगाया जा सकता है.

भूसे को स्वच्छ पानी में रातभर भिगोया जाता है जिस में र्फौमलिन और बाविस्टनि नामक 2 रसायन एक निश्चित अनुपात में मिलाए जाते हैं, जिस से यह भूसा रोगाणु मुक्त हो जाता है. अगली सुबह भूसे से अतिरिक्त पानी निकाल दिया जाता है और इसे एक साफ फर्श पर फैला दिया जाता है और जब नमी 60 फीसदी रह जाती है तब इस में बीज मिला दिया जाता है. मशरूम के बीज को स्पौन कहते हैं.

भूसे को उपचारित या रोगाणु मुक्त करने की एक अन्य विधि भी है जिस में भूसे को गरम पानी में 2 से 3 घंटे उबाला जाता है. इस विधि को जैविक विधि भी कहते हैं. मशरूम के बीज को 4 से ले कर 6 फीसदी तक परत अथवा मिक्स विधि से भूसे में मिलाया जाता है.

यदि तापमान कम होता है तो इस स्पौन की मात्रा 6 से बढ़ा कर 10 फीसदी तक की जा सकती है. इस तरह बीज भूसे में मिला कर पौलीथिन में भर कर इस पौलीथिन का मुंह बांध दिया जाता है और इस में 10 से 15 छेद कर दिए जाते हैं. अब इस पौलीथिन को उठा कर एक अंधेरे कमरे में अथवा छायादार स्थान पर रख दिया जाता है. इन को कमरे बरामदे, झोंपड़ी आदि में रखा जा सकता है.

इन पौलीथिन को हैंगिग विधि अथवा रैक पर भी रखा जा सकता है. रैक न मिलने पर इन बैग को कमरे के फर्श पर भी रखा जा सकता है, किंतु फर्श अच्छी तरह से साफ होना चाहिए. कमरे का तापमान 22 से 28 डिगरी के बीच होना चाहिए और इस में आर्द्रता 80 से 85 फीसदी होनी चाहिए. साथ ही इस कमरे में अंधेरा भी रहना चाहिए. यह स्थिति 8 से 15 दिन तक रखनी चाहिए.

Mushroom

इस समय अवधि में मशरूम का कवक जाल पूरे भूसे में फैल जाता है और भूसा देखने में सफेद रंग में बदल जाता है. जब भूसे की यह स्थिति आ जाए तब पौलीथिन को हटा देना चाहिए अथवा पौलीथिन को यदि नहीं हटाया जाता है तब भी मशरूम किए गए छिद्रों से बाहर निकलने लगती है.

जब मशरूम छोटीछोटी (जिसे पिनहैड बोलते हैं) अवस्था में आ जाए तब उस पर हलका पानी का स्पे्र करना चाहिए, ताकि नमी बनी रहे. स्प्रे करने के बाद कमरे में आपेक्षिक आर्द्रता 80 से 90 फीसदी तक चली जाती है.

जब मशरूम निकलने लगे तो एक बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि कमरे में ताजी हवा और हलकी रोशनी दोनों उपलब्ध हों. जरूरत पड़ने पर कमरे में 2 से 4 घंटे ट्यूबलाइट जला देनी चाहिए.

मशरूम की पहली फसल पिनहैड अवस्था के 8 दिन बाद तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है. उस की तुड़ाई के बाद यदि पौलीथिन हटा दी गई थी तब बैग को किसी ब्रश या अन्य साधन की सहायता से हलका रगड़ना अथवा खुरचना चाहिए. इस के बाद बैग को उठा कर फिर से अंधेरे कमरे में रखना चाहिए और फिर से पिनहैड अवस्था आने के बाद बैग पर पानी का स्प्रे करना चाहिए. इस से दूसरी फसल मिल जाती है.

दूसरी फसल की तुड़ाई के बाद फिर से यह प्रक्रिया अपनानी चाहिए. जिस से तीसरी फसल मिलती है. किंतु यह फसल पहली और दूसरी की अपेक्षा बहुत कम होती है.

आमतौर पर एक थैले से यदि इस थैली का वजन 3 किलोग्राम है तो इस में 1 से 1 किलो 200 ग्राम तक मशरूम प्राप्त की जा सकती है. यदि हम 1 किलो सूखे भूसे से उपज का अनुमान देखें तो यह 600 से 900 ग्राम तक हो सकता है.

करें मशरूम (Mushroom) के स्पान का कारोबार

मशरूम का बीज यानी स्पान फफूंद का एक जाल होता है, जो अपने आधार यानी भूसे वगैरह पर उगता है और मशरूम पैदा करने के लिए तैयार किया जाता है. बोलचाल की भाषा में यह एक ऐसा माध्यम है जो कि मशरूम कवक जाल से घिरा होता है और मशरूम उत्पादन के लिए बीज का काम करता है.

वैसे तो मशरूम की पौध नहीं होती है, फिर भी इस की फसल तैयार करने या कह सकते हैं कि बीज तैयार करने की कई तकनीकें हैं यानी स्पान उत्पादन कई तरह से किया जा सकता है.

एक बीजाणु तकनीक

एक बीजाणु से बीज तैयार करने के लिए ये काम किए जाते हैं:

अच्छे बंद मशरूम का चुनाव करना, साफ रुई से धूल हटाना, 70 फीसदी अल्कोहल से इसे साफ करना और मशरूम के तने के निचले हिस्से को तेज धारदार चाकू से काटना.

उपचारित पेट्रीप्लेट में तार की मदद से तैयार किए गए स्टैंड पर मशरूम खड़ी अवस्था में रख देते हैं. इसे एक गोल मुंह वाले बीकर से ढक दिया जाता है.

इस मशरूम वाली पेट्रीप्लेट को 30 मिनट तक सामान्य तापमान पर रखने के बाद, लेमिनारफलो चैंबर के अंदर रख कर पेट्रीप्लेट से मशरूम फलकायन (स्टैंड सहित) व बीकर को हटाया जाता है. पेट्रीप्लेट को दोबारा दूसरी पेट्रीप्लेट से ढक दिया जाता है.

इस से इकट्ठा बीजाणुओं की संख्या को धीरेधीरे कम किया जाता है जब तक बीजाणुओं की गिनती 10 से 20 फीसदी मिलीलीटर तक नहीं पहुंच जाती है. इस के बाद इसे पिघले हुए सादे माध्यम के साथ पेट्रीप्लेट में उड़ेला जाता है.

पेट्रीप्लेटों को 3-4 दिनों तक बीओडी इनक्यूबेटर में तकरीबन 32 डिगरी सैल्सियस तापमान पर गरम किया जाता है. एकल बीजाणु का चयन बीजाणुओं की बढ़वार को सूक्ष्मदर्शी द्वारा देख कर किया जाता है.

एकल बीजाणु संवर्धन का चयन कर के इसे माल्ट एक्सट्रेक्ट यानी एमईए माध्यम पर फैलाया जाता है और 7 से 10 दिनों तक बीओडी इनक्यूबेटर में गरम किया जाता है.

बहुबीजाणु तकनीक

इस तकनीक में स्पोर प्रिंट से स्पोर उठाने के लिए निवेशन छड़ का छल्ला इस्तेमाल किया जाता है.

छल्ला, जिस में हजारों की तादाद में बीजाणु होते हैं, को पेट्रीप्लेट, जिस में माल्ट एक्सट्रेक्ट या कोई दूसरा कवक माध्यम होता है, के ऊपरी धरातल पर स्पर्श करा दिया जाता है. इन पेट्रीप्लेटों को 4-5 दिनों के लिए बीओडी इनक्यूबेटर में 32 डिगरी सैल्सियस तापमान पर गरम किया जाता है.

फफूंद बढ़ाने की तकनीक

फफूंद उगाने वाली जगह और हाथों को कीटाणुनाशक से और बंद मशरूम को 70 फीसदी एल्कोहल से साफ करना चाहिए.

उपचारित की हुई अंडाकार मशरूम को तेजधार और उपचारित चाकू से 2 बराबर भागों में काट दिया जाता है.

इन कटे टुकड़ों के उस स्थान से, जहां तना व छत्रक एकदूसरे से जुड़े होते हैं, ऊतक के छोटेछोटे टुकड़े निकालते हैं और इन टुकड़ों को माल्ट एक्सट्रेक्ट अगर की प्लेट पर रखा जाता है.

इन प्लेटों को 4-5 दिनों तक 32 डिगरी सेल्सियस तापमान पर बीओडी इनक्यूबेटर या कमरे में सामान्य तापमान पर गरम किया जाता है.

कवक जाल फैले इस माध्यम से छोटेछोटे टुकड़े काट कर इन्हें दूसरे माल्ट एस्सट्रेक्ट अगर पर रख दिया जाता है. इस के बाद इन्हें इनक्यूबेटर में 32 डिगरी सेल्सियस तापमान पर 4-5 दिनों के लिए गरम किया जाता है.

इन तकनीकों को सीधे स्पान माध्यम में इस्तेमाल किया जाता है.

मशरूम (Mushroom)माध्यम तैयार करना

बीज तैयार करने के आधार में बहुत से ऐसे माध्यम हैं, जिन पर मशरूम का बीज बनाया जाता है. ऐसे माध्यमों को तैयार करने की विधियां इस तरह हैं:

पीडीए माध्यम : इसे आलू ग्लूकोज अगर कहते हैं. इस के लिए  200 ग्राम आलुओं को धोने, छीलने व काटने के बाद 1000 मिलीलीटर पानी में खाने लायक नरम होने तक उबाला जाता है.

इसे साफ कपड़े से छान लिया जाता है और इस छने पानी को एक सिलेंडर में इकट्ठा किया जाता है. इस में ताजा उबाला पानी मिला कर 1000 मिलीलीटर तक बना लिया जाता है.

बाद में इस में 20 ग्राम शर्करा और 20 ग्राम अगर मिलाया जाता है और अगर के पूरी तरह से घुल जाने तक उबाला जाता है.

इस माध्यम को 10 मिलीलीटर क्षमता वाली परखनली या ढाई सौ मिलीलीटर क्षमता के फ्लास्क में रख दिया जाता है और पानी न सोखने वाली रुई से उन के मुंह को बंद कर दिया जाता है.

इस के बाद इन्हें 121 डिगरी सेल्सियस तापमान पर उपचारित किया जाता है.

गरम टैस्ट ट्यूब को टेढ़ा रखा जाता है और इन्हें अगले 24 घंटों तक ठंडा होने के लिए रखा जाता है.

माल्ट एक्सटे्रेक्ट अगर माध्यम : जौ का अर्क 35 ग्राम, अगर 20 ग्राम, पेप्टोन 5 ग्राम होना चाहिए.

इन चीजों को 1000 मिलीलीटर गरम पानी में मिलाना चाहिए. अब इसे लगातार एक समान आंच पर रख कर अगर के पूरी तरह घुलने तक हिलाएं.

इस माध्यम को परखनली या फ्लास्कों में डाला जाता है और पानी नहीं सोखने वाली रुई से उन के मुंह को बंद कर दिया जाता है.

अब इन्हें 121 डिगरी सेल्सियस तापमान पर उपचारित किया जाता है.

गरम परखनलियों को तिरछा रखा जाता है या माध्यम को उपचारित पेट्रीप्लेटों में डाल दिया जाता है. अब इन्हें कमरे में सामान्य तापमान पर ठंडा किया जाता है.

स्पान माध्यम

बहुत से पदार्थ अकेले या सभी को मिला कर स्पान माध्यम तैयार किया जाता है. धान का पुआल, ज्वार, गेहूं व राई के दाने, कपास, इस्तेमाल की हुई चाय की पत्तियां वगैरह इस के लिए इस्तेमाल की जाती हैं.

अनाज स्पान : इस में गेहूं, ज्वार, राई का इस्तेमाल किया जाता है. 100 किलोग्राम दानों को सब से पहले 150 लीटर पानी में 20-30 मिनट तब उबाला जाता है. इन उबले हुए दानों को छलनी पर फैला कर 12 से 16 घंटों तक छाया में सुखाया जाता है.

सूखे हुए दानों में 2 किलोग्राम चाक पाउडर व 2 किलोग्राम जिप्सम को अच्छी तरह मिला लें. दानों को ग्लूकोज की बोतलों में दोतिहाई हिस्से तक या फिर 100 गेज मोटे पौलीप्रोपेलीन के लिफाफों में भर दिया जाता है.

लिफाफों में भी दाने दोतिहाई भाग तक ही भरने चाहिए. अब इन के मुंह को पानी न सोखने वाली रुई के ढक्कन से बंद कर दिया जाता है. ढक्कन न ज्यादा ढीला और न ही ज्यादा कसा हुआ होना चाहिए.

स्पान माध्यम से भरी हुई ग्लूकोज की बोतलों या पौलीप्रोपेलीन के लिफाफों को 126 डिगरी सेल्सियस तापमान पर उपचारित किया जाता है. अब इन्हें लेमिनार फ्लो में ताजा हवा में ठंडा होने के लिए रख दिया जाता है.

कवक जाल संवर्धन को निवेशन छड़ की सहायता से इन बोतलों में डाल दिया जाता है. बोतलों को 2 हफ्ते के लिए गरम किया जाता है. अब स्पान इस्तेमाल के लिए तैयार है.

पुआल स्पान : सब से पहले धान के पुआल को 2-4 घंटे तक पानी में भिगोया जाता है, फिर इसे साफ किया जाता है और ढाई से 5 सेंटीमीटर तक लंबे टुकड़ों में काटा जाता है.

इस में चाक पाउडर 2 फीसदी व चावल का चोकर 2 फीसदी की दर से मिलाया जाता है और इसे चौड़े मुंह वाली ग्लूकोज की बोतल या पौलीप्रोपेलीन के 100 गेज मोटाई वाले लिफाफों में भर दिया जाता है. बोतलों व लिफाफों के मुंह को रुई के ढक्कन से बंद कर दिया जाता है.

स्पान माध्यम से भरी बोतल या लिफाफों को 126 डिगरी सेल्सियस तापमान पर उपचारित किया जाता है या 22 पीएसआई दबाव पर 2 घंटे के लिए रखा जाता है.

स्पान माध्यम को ठंडा करने के बाद लेमिनार फ्लो चैंबर में रख कर निवेशन छड़ की सहायता से कवक जाल संवर्धन इन में डाला जाता है.

बोतलों या लिफाफों को 2 हफ्ते के लिए गरम करते हैं.

चायपत्ती का स्पान : इस्तेमाल की हुई चाय की पत्ती को इकट्ठा कर के धोया जाता है, ताकि इस में कोई मलवा वगैरह न रहे. फिर निथारा जाता है. इस में 2 फीसदी की दर से चाक पाउडर मिला दें.

इस के बाद सामग्री को बोतलों या पौलीप्रोपेलीन के लिफाफों में भरा जाता है. बाकी के काम अनाज स्पान व पुआल स्पान बनाने की तरह ही किए जाते हैं.

इस तरह कपास के कचरे से स्पान माध्यम तैयार किया जाता है.

खादभूसी स्पान : घोड़े की लीद व कमल के बीज का छिलका समान मात्रा में मिलाए जाते हैं. इस मिश्रण को पानी में भिगोया जाता है. खाद की ढेरी 1 मीटर ऊंचाई तक पिरामिड के आकार में बनाई जाती है. फिर इसे 4-5 दिनों के लिए छोड़ दिया जाता है. ढेरी को तोड़ा जाता है और जरूरत पड़ने पर पानी मिला कर फिर से ढेर बना दें.

मिश्रण को ग्लूकोज की बोतलों या एल्यूमिनियम के हवाबंद डब्बों में भर कर उपचारित किया जाता है.

मिश्रण ठंडा होने के बाद ही इस में मशरूम के कवक जाल को डाला जाता है और खाद को 2 हफ्ते के लिए गरम करते हैं या जब तक कि स्पान तैयार न हो जाए.

मशरूम (Mushroom)

बीज तैयार करते समय बरतें कुछ सावधानियां

*             माध्यम जैसे धान की पुआल या बेकार कपास वगैरह को इतना ज्यादा भी न भिगोएं कि पानी बोतलों या बैगों के तल पर इकट्ठा हो जाए. ऐसे में कवक जाल सही तरह से नहीं फैलेगा.

*             बोतलों या बैगों को इतना कस कर बंद नहीं करना चाहिए कि हवा बाहर न आ सके और भाप अच्छी तरह से अंदर न घुसे.

*             केवल साफ रुई से बने ढक्कनों, डाटों का ही इस्तेमाल करना चाहिए.

*             ढक्कन या डाट के नीचे स्तर व माध्यम के बीच कम से कम 3-4 सेंटीमीटर खाली जगह होनी चाहिए.

*             मेज व सामग्री को उपचारित करना चाहिए.

*             हाथों को साबुन से साफ करना चाहिए.

*             केवल शुद्ध स्पान का ही इस्तेमाल करना चाहिए.

*             कवक डालने के बाद बोतलों व बैगों के मुंह को एल्यूमिनियम फाइल से ढकना चाहिए.

स्पान का स्टोरेज

पुआल मशरूम की बढ़वार के लिए ज्यादातर तापमान 30-35 डिगरी सेल्सियस होना चाहिए. अगर तापमान 45 डिगरी सेल्सियस से बढ़ाया जाए या 15 डिगरी सेल्सियस तक घटाया जाए तो कवक जाल में इजाफा नहीं होता है. इस की ज्यादातर प्रजातियां 15 डिगरी तापमान पर जीवित रह सकती हैं.

स्पान माध्यम में वाल्वेरिएला वाल्वेसिया का कवक जाल पूरी तरह फैलने के बाद यह इस्तेमाल के लिए तैयार होता है. अगर इस का इस्तेमाल नहीं करना हो तो इसे इनक्यूबेटर से निकाल लिया जाता है और कम तापमान पर भंडारण किया जाता है ताकि बीज मर न पाए.

15-20 डिगरी सेल्सियस तापमान पर कवक जाल की बढ़वार रुक जाती है और कवक जाल को कोई नुकसान भी नहीं पहुंचता. इसे लंबे समय तक भंडारण किया जा सकता है.

‘मशरूम उत्पादन तकनीक’ पर ट्रेनिंग के अवसर का लाभ उठाएं

बस्ती : औद्यानिक प्रयोग एवं प्रशिक्षण केंद्र, बस्ती द्वारा बेरोजगार नौजवानों, युवतियों, किसानों और बागबानों को गांव स्तर पर स्वरोजगार सृजन के उद्देश्य से केंद्र के मशरूम अनुभाग द्वारा मशरूम उत्पादन प्रशिक्षण कार्यक्रम ‘‘मशरूम उत्पादन तकनीक’’ विषय पर 3 दिवसीय प्रशिक्षण का आयोजन आगामी महीनों की विभिन्न तारीखों में किया जाना है, जिस में बस्ती, महराजगंज, सिद्धार्थनगर, संतकबीरनगर, देवरिया, कुशीनगर, गोंडा, बलरामपुर, श्रावस्ती, बहराइच, बाराबंकी, अयोध्या, सुल्तानपुर, रायबरेली, प्रयागराज, वाराणसी, मिर्जापुर, सोनभद्र, बलिया, गाजीपुर, मऊ, आजमगढ, जौनपुर, प्रतापगढ, कौशांबी, चंदौली, अंबेडकरनगर, गोरखपुर जिलों के लोग प्रतिभाग कर सकते हैं.

औद्यानिक प्रयोग एवं प्रशिक्षण केंद्र, बस्ती के संयुक्त निदेशक, उद्यान, वीरेंद्र सिंह यादव ने बताया कि 3 दिवसीय प्रशिक्षण में भाग लेने के इच्छुक नौजवान, युवती, किसान और बागबान अपने जिले के जिला उद्यान अधिकारी से संपर्क कर प्रशिक्षण के लिए अपना नाम केंद्र को भिजवा सकते हैं.

उन्होंने बताया कि औद्यानिक प्रयोग एवं प्रशिक्षण केंद्र, बस्ती में स्थित मशरूम अनुभाग की मंशा है कि गांव स्तर पर मशरूम के जरीए रोजगार उपलब्ध कराए जाएं, जिस से कि उन के शहरों की ओर बढ रहे पलायन को रोका जा सके.

इसी उद्देश्य के तहत आम लोगों को मशरूम उत्पादन तकनीक का प्रशिक्षण औद्यानिक प्रयोग एवं प्रशिक्षण केंद्र, बस्ती में स्थित मशरूम अनुभाग द्वारा आगामी महीनों के विभिन्न तिथियों में किया जा रहा है, क्योंकि यह भूमिहीन व गरीब किसानों की आमदनी का जरीया है, इसे अपना कर वे स्वरोजगार सृजन कर सकते हैं.

संयुक्त निदेशक, उद्यान, वीरेंद्र सिंह यादव ने बताया कि प्रशिक्षण के दौरान मशरूम की खेती से ले कर कंपोस्ट बनाने, प्रोसैसिंग और मशरूम के विभिन्न उत्पादों का निर्माण कर आमदनी बढ़ाने के सभी पहलुओं पर जानकारी दी जाएगी.

मशरूम अनुभाग प्रभारी विवेक वर्मा ने बताया कि साल 2024-25 में केंद्र के मशरूम अनुभाग द्वारा मशरूम उत्पादन प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन साल 2024 में 19 नवंबर से 21 नवंबर, 17 दिसंबर से 19 दिसंबर प्रस्तावित है, जबकि साल 2025 में 7 जनवरी से 9 जनवरी व 20 फरवरी से 22 फरवरी में प्रस्तावित है.

उन्होंने आगे बताया कि दूरदराज के प्रशिक्षणार्थियों के लिए कृषक छात्रावास में एकसाथ 50 किसानों के ठहरने की निःशुल्क व्यवस्था है, परंतु भोजन/बोर्डिंग एवं जलपान की व्यवस्था प्रशिक्षणार्थियों को स्वयं करनी होती है. प्रत्येक प्रशिक्षण सत्र के लिए प्रति प्रशिक्षणार्थी 50 रुपए पंजीकरण शुल्क जमा करना होगा.

रेगिस्तानी खुंबी (Desert Mushroom) अब प्रयोगशाला में उगेगी

उदयपुर : भारत में कृषि विकास हेतु सरकारी संस्था भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली ने मशरूम अनुसंधान के लिए मशरूम निदेशालय चंबाघाट, सोलन (हिमाचल प्रदेश) में संस्थान खोल रखा है. इस के अंतर्गत विभिन्न राज्यों में जंगली खाद्य एवं औषधीय मशरूम के संग्रहण, संवर्धन एवं प्रयोगशाला में उगाने के लिए अनुसंधान हेतु अखिल भारतीय समन्वित मशरूम अनुसंधान परियोजना चलाई जा रही है.

इस के अंतर्ग़त राजस्थान में भी महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के राजस्थान कृषि महाविधालय के पादप रोग विज्ञान विभाग में अखिल भारतीय समन्वित मशरूम अनुसंधान परियोजना संचालित है.

परियोजना के प्रभारी व एसोसिएट प्रोफैसर डा. नारायण लाल मीना ने बताया कि इस वर्ष सरकार के उद्देश्य के अनुसार जून से अगस्त माह तक राजस्थान के विभिन्न जंगलों, वन्य जीव अभ्यारणों और पश्चिम राजस्थान के रेगिस्तान में देसूरी की नाल, पाली जोधपुर, पोकरण, जैसलमेर, तनोट, पाकिस्तान बार्डर, फलोदी, सिवाना, आहोर, बालोतरा, झालोर, सिरोही, सादड़ी, कुंभलगढ़, गोगुंदा एवं रोड साइड एरिया औफ उदयपुर का सर्वे मशरूम की विभिन्न प्रजातियों का पता लगाने एवं संग्रहण करने के लिए अनुसंधान टीम ने किया.

सर्वे के दौरान विभिन्न जेनरा के कुल 100 मशरूम स्पीशीज का संग्रहण किया गया और मशरूम प्रयोगशाला, उदयपुर में विभिन्न मशरूमों का संवर्धन का काम कर दिया गया है. इन में विशेषकर रेगिस्तानी पौष्टिक मशरूम जैसे फेलोरानिया इन्कुइनान्स, पौडाएक्सिस पिस्टीलारिस, टेलोस्टोमा स्पीशीज, ब्लू ओएस्टर ,जंगली दूधछाता, ब्राउन ओएस्टर, सफेद ओएस्टर, ट्राईकोलोमा सल्फुरियम एवं एगेरिकस प्रजाति प्रमुख रूप से है, क्योंकि रेगिस्तानी खुंबी फेलोरानिया इन्कुइनान्स, पौडाएक्सिस पिस्टीलारिस, टेलोस्टोमा स्पीशीज को प्रयोगशाला में अभी तक उगाया नहीं जा सका है.

इस के लिए अनुसंधान टीम के डा. एनएल मीना, अविनाश कुमार नागदा और किसान सिंह राजपूत ने कृत्रिम रूप से उगाने का प्रयास तेज कर दिया है. इन मशरूमों का पौष्टिक एवं औषधीय महत्व अधिक होता है. इस के चलते पश्चिम राजस्थान के व्यक्ति प्रथम वर्षा के उपरांत रेतीले टीलों पर उगी मशरूम संग्रहित कर के बाजार में 400-500 रुपए प्रति किलोग्राम में बेच कर आमदानी प्राप्त करते हैं और व्यक्ति बड़े चाव से खुंबी की सब्जी बना कर खाते हैं और शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्वों की आपूर्ति करते हैं व अपनी सेहत को दुरुस्त रखते हैं.  अनुसंधान में सफलता से पश्चिम राजस्थान के अलावा पूरे देश में मशरूम उत्पादन की क्रांति आ जाएगी.

ढिंगरी और दूधछाता मशरूम (Mushroom) पर ट्रेनिंग

उदयपुर : 8 अगस्त, 2024. अखिल भारतीय समन्वित मशरूम अनुसंधान परियोजना, अनुसंधान निदेशालय, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के तत्वावधान में अनुसूचित जाति उपयोजना (एससीएसपी) के अंतर्गत ग्राम पंचायत कोचला, पंचायत समिति झाड़ोल (फ.) में एकदिवसीय मशरूम प्रशिक्षण का आयोजन किया गया. मशरूम प्रशिक्षण में पंचायत समिति झाड़ोल (फ.) आसपास के गांवों के किसानों एवं महिलाओं ने प्रशिक्षण में भाग लिया.

प्रशिक्षण में परियोजना प्रभारी डा. एनएल मीना ने मशरूम के महत्वपूर्ण गुणों, ढिंगरी व दूधछाता मशरूम की खेती के बारे में विस्तार से व्याख्यान दिया. ग्राम पंचायत, कोचला व कंथारिया के सरपंच भगवतीलाल व ख्यालीलाल ने मशरूम की खेती की तकनीकी को अपना कर ज्यादा से ज्यादा आमदनी करने पर जोर दिया. अविनाश कुमार नागदा एवं किशन सिंह राजपूत ने प्रशिक्षण में भाग लेने वाले प्रशिक्षणार्थियों को मशरूम की प्रायोगिक जानकारी दी गई और प्रशिक्षण के अंत में अनुसूचित जाति उपयोजना के कुल 30  प्रशिक्षणार्थियों को सामग्री बांटी गई.

कोटड़ा में मशरूम (Mushroom) प्रशिक्षण

उदयपुर : अखिल भारतीय समन्वित मशरूम अनुसंधान परियोजना, अनुसंधान निदेशालय, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के तत्वावधान में अनुसूचित जनजाति उपयोजना (टीएसपी) एवं अनुसूचित जाति उपयोजना (एससीएसपी) के अंतर्गत पंचायत समिति कोटड़ा के 10-15 गांवों के कुल 60 से 80 किसानों एवं महिलाओं ने एकदिवसीय, 2 मशरूम (Mushroom) प्रशिक्षणों में भाग लिया.

राजस्थान सरकार के कैबिनेट मंत्री बाबूलाल जी खराड़ी ने भी मशरूम प्रशिक्षण का अवलोकन किया और बताया कि  व्यक्तियों की सेहत एवं अतिरिक्त आमदनी बढ़ाने के लिए मशरूम की खेती को बढ़ाने के लिए अधिक से अधिक मशरूम प्रशिक्षणो को संपन्न करने पर जोर दिया.

प्रशिक्षण में परियोजना प्रभारी डा. नारायण लाल मीना ने किसानों, महिलाओं एवं बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य एवं किसानों की आय को दोगुना करने के लिए खेती के साथसाथ फसल के सहउत्पादों का उपयोग कर के अतिरिक्त आमदनी बढ़ाने के लिए मशरूम के पोषणीय, औषधीय महत्व, ढींगरी और दूधछाता मशरूम की खेती के बारे में विस्तार से जानकारी दी, जिस में किसानों एवं महिलाओं ने पहली बार मशरूम के प्रदर्शन देख कर मशरूम को उगा कर खाने की जिज्ञासा जाहिर की.

कमलेश चरपोटा, कृषि पर्येवेक्षक ने राजस्थान सरकार की अनुसूचित जाति एवं जनजाति की कृषि से संबंधित जनकल्याणकारी योजनाओं के बारे में जानकारी दी. अविनाश कुमार नागदा एवं किशन सिंह राजपूत ने प्रशिक्षण में भाग लेने वाले प्रशिक्षणार्थियों को मशरूम की प्रायोगिक जानकारी दी. प्रशिक्षण के अंत में अनुसूचित जनजाति एवं अनुसूचित जाति के कुल 60 प्रशिक्षणार्थियों को मशरूम की खेती से संबंधित सामग्री वितरित की गई.

अधिक आय के लिए अपनाएं मशरूम की खेती (Mushroom Cultivation )

उदयपुर: 9 मार्च 2024 को अखिल भारतीय समन्वित मशरूम परियोजना, राजस्थान कृषि महाविद्यालय, उदयपुर के तत्वावधान में अनुसूचित जनजाति उपयोजना (टीएसपी) के तहत ग्राम पंचायत मकड़ादेव में एकदिवसीय मशरूम प्रशिक्षण का आयोजन किया गया.

मशरूम प्रशिक्षण में गांव पानरवा, मानस, मकड़ादेव, सेलाणा और आसपास के गांव के किसानों एवं किसान महिलाओं ने हिस्सा लिया.

मशरूम एक ऐसा कृषि से जुड़ा रोजगार है, जिसे बिना खेतीबारी की जमीन के भी शुरू किया जा सकता है. इस काम को घर के कमरे से भी शुरू किया जा सकता है, जरूरत है उचित वातावरण की. महरूम की खेती के लिए प्रशिक्षण जरूरी है, जिस से आप इस काम को सफलता से कर सकें.

साप्रशिक्षण में परियोजना प्रभारी डा. एनएल मीना ने बच्चों व महिलाओं में मशरूम के उपयोग से कुपोषण को दूर भगाने और अधिक आय प्राप्त करने के लिए मशरूम तकनीकी को अपनाने का विस्तार से व्याख्यान दिया. वहीं पंचायत समिति झाड़ोल की सहायक विकास अधिकारी शांता भुदरा ने महिलाओं को स्वयं सहायता समूह के माध्यम से मशरूम की खेती को बढ़ावा दे कर अच्छी आय करने के लिए जोर दिया.

क्षेत्र के कृषि पर्यवेक्षक कमलेश चरपोटा ने प्राकृतिक खेती व राजस्थान सरकार की अनुसूचित जनजाति के किसानों के लिए विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के बारे में बताया.

अविनाश कुमार नागदा, किशन सिंह राजपूत और रवींद्र चौधरी ने प्रशिक्षण में भाग लेने वाले प्रशिक्षणार्थियों को मशरूम की प्रायोगिक जानकारी दी. प्रशिक्षण के अंत में अनुसूचित जनजाति उपयोजना के कुल 25 प्रशिक्षणार्थियों को सामग्री बांटी गई.

मशरूम की खेती से मिली नई राह

परंपरागत तरीके से खेती करना अब मुनाफे की गारंटी नहीं है. खेती में नवाचारों के माध्यम से किसान चाहें तो आमदनी बढ़ा सकते हैं. नोटबंदी की मार से बेरोजगारी बढ़ रही है और युवाओं को नौकरी का भरोसा नहीं रह गया है. ऐसे में पढ़ेलिखे नौजवानों का  रुझान खेती की तरफ ज्यादा हुआ है. खेतीकिसानी के कामों को प्रयोगधर्मी किसान नएनए तरीके से कर के छोटेछोटे रकबों में ही अच्छाखासा मुनाफा कमा रहे हैं.

मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के एक गांव सिंहपुर बड़ा के युवा किसान वैभव शर्मा ने परंपरागत खेती की जगह मशरूम की खेती कर के एक मिसाल कायम की है.

वैभव को हार्टीकल्चर से बीएससी की पढ़ाई पूरी करने के बाद ऐजूकेशनल टूर के दौरान हिमाचल प्रदेश के एक मशरूम ट्रेनिंग सैंटर को करीब से देखने का मौका मिला. वहां पर मशरूम की खेती से संबंधित आइडिया ने उन्हें काफी प्रभावित किया.

गांव लौट कर उन्होंने मशरूम की खेती की शुरुआत की और 3 साल की मेहनत ने उन्हें नरसिंहपुर जिले का पहला मशरूम उत्पादक किसान बना दिया.

अपने नवाचारी प्रयोग की बदौलत वैभव आज सीमित जमीन में ही मशरूम का उत्पादन कर लाखों रुपए कमा रहे हैं. पिछले 3 सालों में मशरूम की खेती कर के हर पहलू से वाकिफ होने के बाद उन्होंने व्यावसायिक तौर पर मशरूम की खेती के लिए अपने प्रयासों को बल देना शुरू कर दिया. आने वाले दिनों में वैभव आधुनिक मशीनरी की मदद से मशरूम की खेती के लिए प्लेटफार्म तैयार करने में जुटे हुए हैं.

जिला मुख्यालय से महज 8 किलोमीटर की दूर ग्राम सिंहपुर बड़ा के 28 साला युवा किसान वैभव शर्मा ने बताया कि शुरुआत में तो रायपुर से मशरूम के बीज ला कर खेती शुरू की, लेकिन बाद में खुद भी मशरूम के बीज तैयार करना सीख लिया. इस प्रोजैक्ट पर काम करते हुए उन्हें जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर के कृषि वैज्ञानिकों का काफी मागर्दशन  और  आर्थिक मदद भी मिली.

Mushroom
Mushroom

वैभव के बताए अनुसार उन्होंने पहले ‘आयसर’ किस्म की मशरूम का उत्पादन शुरू किया. इस के बाद इंडिया मार्ट के माध्यम से इस का विक्रय शुरू किया.

वैभव ने बताया कि पहले एक हजार वर्गफुट की जगह में उन्हें अधिकतम 15-20 किलोग्राम मशरूम प्रतिदिन मिलता है, जिस में उन्हें लगभग 40 रुपए प्रति किलोग्राम की लागत आती है. मशरूम को वे ताजा और सूखे दोनों रूपों में बेचते हैं.

उन्होंने बताया कि ताजा मशरूम का दाम 120 रुपए प्रति किलोग्राम और सूखे मशरूम के दाम 500 से 1,200 रुपए प्रति किलोग्राम तक मिल जाते हैं. ताजा मशरूम वे मुंबई भेजते थे, लौकडाउन में ट्रेनों के बंद होने से अब मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के मुलताई में प्रोसैसिंग यूनिट को भेजते हैं.

उन्होंने आगे बताया कि मशरूम की इस खेती से पिछले 3 सालों में उन का टर्नओवर इस साल लगभग 7 से 8 लाख रुपए तक पहुंच गया है. मशरूम उत्पादन के लिए 45 से 60 दिन की अवधि पर्याप्त होती है, इसलिए एक साल में 3 बार मशरूम का उत्पादन उन्हें मिल जाता है.

Mushroom
Mushroom

अपनी कामयाबी से उत्साहित युवा किसान वैभव बताते हैं कि उन्होंने इसे अब व्यावसायिक तौर पर शुरू करने का फैसला लिया है और इस के लिए वे इस साल कुछ मशीनरी भी लगा रहे हैं, जिस से उन्हें मशरूम की खेती के लिए समुचित वातावरण तैयार करने में काफी मदद मिलेगी और गांव के कुछ लोगों को रोजगार भी मिलेगा.

मशरूम के अलावा अचार, पापड़

वैभव ने बताया कि जब ताजा मशरूम बिकने के बाद बच जाता है, तो उसे सुखा लिया जाता है और इस सूखे हुए मशरूम से बड़ी, पापड़, मशरूम, अचार और मशरूम पाउडर भी तैयार कर लिया जाता है. इस के अलावा आने वाले दिनों में वे गांव में ही प्रोसैसिंग यूनिट लगाने की तैयारी भी कर रहे हैं.

वैभव मशरूम को इंडिया मार्ट के माध्यम से भी बेच कर आमदनी हासिल कर रहे हैं. वैभव द्वारा आसपास के गांवों के कुछ किसानों को मशरूम की खेती की ट्रेनिंग भी दी जा

रही है, जिस से कुछ किसान उन से प्रेरणा ले कर मशरूम उत्पादन के क्षेत्र में काम भी कर रहे हैं. इस से दूसरे किसानों को भी अतिरिक्त आमदनी हो जाती है.

मशरूम उत्पादन पर प्रश्नोत्तरी

मशरूम क्या है?

मशरूम, जिसे क्षेत्रीय भाषाओं में कुकुरमुत्ता, भूमिकवक, खुंभ, खुंभी, गर्जना एवं धरती के फूल आदि कई नामों से जाना जाता है. आमतौर पर बरसात के दिनों में छतरीनुमा संरचनाएं सडे़गले कूडे़ के ढेरों पर या गोबर की खाद या लकड़ी पर देखने को मिलता है, वह भी एक तरह का मशरूम ही है.

हालांकि वे सभी मशरूम खाने लायक भी नहीं होते, क्योंकि वो साफसफाई वाली जगह नहीं उगते.
खाने के लिए मशरूम को घर में भी उगाया जा सकता है और बड़े पैमाने पर भी इस की खेती की जा सकती है, जिस के लिए बाकायदा तकनीकी प्रशिक्षण भी जरूरी है.

मशरूम की हमारे जीवन में क्या उपयोगिता है?

मशरूम का प्रयोग सब्‍जी, पकौड़ा, सूप, मुरब्बा, अचार आदि के रूप में किया जाता है. मशरूम खाने में स्वादिष्ठ, सुगंधित, मुलायम और पोषक तत्‍वों से भरपूर होती है. इस में वसा और शर्करा कम होने के कारण यह मोटापा, मधुमेह और रक्‍तचाप से पीड़ित व्‍यक्तियों के लिए आदर्श शाकाहारी आहार है.

मशरूम के प्रकार कितने होते हैं?

मशरूम की बहुत सी प्रजातियां हैं, परंतु व्‍यावसायिक रूप से मुख्यतः 3 प्रकार की मशरूम उगाई जाती है. बटन मशरूम, ढींगरी मशरूम और धान पुआल मशरूम. तीनों प्रकार की मशरूम को किसी भी हवादार कमरे या शेड में आसानी से उगाया जा सकता है.

ढींगरी मशरूम कैसे उगाते हैं?

ढींगरी मशरूम उगाने का सही समय अक्तूबर से मध्‍य अप्रैल के महीने हैं. आमतौर पर 1.5 किलोग्राम सूखा पुआल/भूसे या 6 किलोग्राम गीले पुआल/ भूसे से लगभग एक किलोग्राम ताजी मशरूम आसानी से प्राप्‍त होती है, जिस की कीमत 60-80 रुपए प्रति किलोग्राम है.

बटन मशरूम कैसे पैदा किया जाता है?

Mushroomबटन मशरूम की तैयारी मध्य अगस्त से करते हैं. एक क्विंटल तैयार किए गए कंपोस्ट से तकरीबन 15-20 किलोग्राम बटन मशरूम की उपज होती है. उत्पादन खर्च प्रति किलोग्राम 35-40 रुपए, बिक्री दर 100-150 रुपए, शुद्ध लाभ 65-100 रुपए प्रति किलोग्राम होता है.
ग्रामीण क्षेत्र में मशरूम उत्पादन करने की अपार संभावनाएं हैं. किसानों के पास मशरूम उत्पादन में उपयोग होने वाले अधिकतर संसाधन जैसे-भूसा, पुआल, कंपोस्ट, बेसन, बांस, रस्सी आदि उपलब्ध है. केवल मशरूम का स्पान (बीज) ही बाहर से मंगाना पड़ेगा. उस में प्रयोग होने वाले उर्वरक, फफूंदीनाशक स्थानीय बाजार में उपलब्ध है.

मशरूम उत्पादन पर तकनीकी जानकारी और प्रशिक्षण कहां से प्राप्त किया जा सकता है?

मशरूम की खेती करने का तरीका खाद्यान्न एवं बागबानी फसलों से बिलकुल अलग है. इसलिए इस की खेती की शुरुआत करने से पहले तकनीकी एवं व्यावहारिक जानकारी के लिए प्रशिक्षण लेना चाहिए. इस के लिए जनपद में स्थापित कृषि विज्ञान केंद्र, उद्यान विभाग, कृषि विश्वविद्यालय से संपर्क कर सकते हैं.

प्रो. (डा.) रवि प्रकाश मौर्य, निदेशक, प्रसार्ड ट्रस्ट मल्हनी, भाटपार रानी, देवरिया -274702 (उत्तर प्रदेश)

मशरूम उत्पादन : महिलाओं व युवाओं के लिए रोजगार

मशरूम की खेती अब पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो रही है. मशरूम की खेती सीधे आजीविका में सुधार कर सकती है. इस का आर्थिक पोषण और औषधीय योगदान बहुत है. यह ग्रामीण विकास, महिलाओं और युवाओं के अनुकूल पेशे का माध्यम बन सकता है.

उत्पादन तकनीक 

कंपोस्ट की तैयारी

कंपोस्ट कृत्रिम ढंग से बनाया गया वह माध्यम है, जिस से मशरूम की कायिक संरचना भोजन प्राप्त कर अपने फलनकाय के रूप में मशरूम पैदा करती है, अत: कंपोस्ट बनाने के पीछे मशरूम को उचित भोजन सामग्री उपलब्ध कराना निहित है. कंपोस्ट बनाने के लिए पक्के फर्श या विशेष कंपोस्टिंग शैड उपयोग में लाए जाते हैं. कंपोस्ट बनाने के लिए निम्नलिखित सामग्री प्रयोग में लाएं :

गेहूं का भूसा-1,000 किलोग्राम, अमोनियम सल्फेट व कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट-30 किलोग्राम, सुपर फास्फेट-10 किलोग्राम, पोटाश-10 किलोग्राम, यूरिया-10 किलोग्राम, जिप्सम-100 किलोग्राम, गेहूं का चोकर-50 किलोग्राम, फ्यूरोडान 500 ग्राम.

कंपोस्ट बनाना शुरू करने से 48 घंटे पहले भूसे की पतली तह पक्के फर्श पर बिछा कर उसे अच्छी तरह से पलट कर पानी के फव्वारे से तर कर दें.

आरंभ या शून्य

इस आरंभ में भूसे में नमी की मात्रा 75 फीसदी होनी चाहिए. इस नमीयुक्त भूसे में चोकर, कैल्शियम, यूरिया, म्यूरेट औफ पोटाश और सुपर फास्फेट अच्छी तरह मिला देते हैं. अब लकड़ी के पूर्व निर्मित तख्तों की मदद से भूसे का लगभग 1.5 मीटर चौड़ा, 1.25 मीटर ऊंचा किसी भी लंबाई का ढेर बनाएं.

ढेर बनाने के बाद लकड़ी के तख्तों को ढेर से अलग कर दें. 24 घंटे के भीतर ढेर का भीतरी तापमान 70-75 डिगरी सैंटीग्रेड तक होना चाहिए. इस ढेर की नमी बनाए रखने के लिए एक या 2 बार बाहरी सतह पर पानी का छिड़काव करें.

पहली पलटाई

छठे दिन ढेर के बाहरी भाग को (15 सैंटीमीटर अंदर तक का) फर्श पर फैला दें, शेष भाग को दूसरी जगह फर्श पर फैला दें.

अब बाहरी भाग की कंपोस्ट को अंदर डाल कर व भीतरी भाग की कंपोस्ट को बाहर डाल कर लकड़ी के तख्तों की मदद से दोबारा ढेर बना कर तख्तों को अलग कर दें.

दूसरी पलटाई

10वें दिन बाहरी व भीतरी भाग को अलग कर के बाहरी भाग पर अच्छी तरह पानी का छिड़काव कर के ढेर को इस तरह बनाएं कि बाहरी भाग ढेर के भीतर व भीतरी भाग ढेर के बाहर पहुंच जाए.

तीसरी पलटाई

13वें दिन पहले की तरह पलटाई व ढेर का निर्माण करें व जिप्सम मिला दें.

चौथी पलटाई

16वें दिन पहले की तरह पलटाई व ढेर का निर्माण करें.

5वीं पलटाई

19वें दिन पहले की तरह पलटाई ढेर का निर्माण करें.

छठी पलटाई

22वें दिन पहले की तरह पलटाई का निर्माण करें व फ्यूरोडान मिला दें.

7वीं पलटाई

25वें दिन यदि कंपोस्ट अमोनिया गैस मुक्त है, तो कंपोस्ट बीजाई के लिए तैयार है, वरना 28वें दिन करें और बीजाई 30वें दिन करें.

बीजाई

बीजाई (स्पौनिंग) कंपोस्ट में स्पौन मिलाने के ढंग को कहते हैं. प्रति क्विंटल तैयार कंपोस्ट में 500 ग्राम से 750 ग्राम स्पौन (0.5-7.5 फीसदी की दर से) अच्छी प्रकार मिलाया जाता है. बीजाई की हुई कंपोस्ट को सैल्फ या पौलीथिन बैगों से हलका ढक कर रखना चाहिए. सैल्फ में 80-100 किलोग्राम/मीटर व बैग में 10-15 किलोग्राम कंपोस्ट भरते हैं.

बीजाई की हुई कंपोस्ट को निर्जीवीकृत अखबार द्वारा ढक देते हैं. अखबारों को इस्तेमाल में लाने से एक हफ्ते पहले फौर्मेलीन घोल से या वाष्प द्वारा 20 पौंड पर आधा घंटा निर्जीवीकरण कर लेना चाहिए.

यदि पौलीथिन बैग इस्तेमाल कर रहे हैं, तो बैग को ऊपर से मोड़ कर बंद कर दें. बीजाई के बाद फसल कक्ष का तापमान 22-23 डिगरी सैंटीग्रेड या अपेक्षित आर्द्रता 85-90 फीसदी बनाए रखना चाहिए. दिन में 2 बार हलके पानी का छिड़काव अखबार के ऊपर व फसल कक्ष की फर्श व दीवार पर करें.

बीजाई के 6-7 दिन बाद धागेनुमा फफूंदी की वृद्धि दिखाई देने लगती है, जो 12-15 दिन में कंपोस्ट की सतह को सफेद कर देते हैं. बिछे हुए अखबार के ऊपर फैली हुई फफूंदी को आवरण मृदा द्वारा ढक दिया जाता है.

आवरण मृदा (केसिंग मिट्टी)

आवरण मृदा का मतलब है, कंपोस्ट पर फैली हुई फफूंदी के ऊपर मृदा मिश्रण का स्तर बिछाना, जिस से नमी बनाए रखने व गैस के आदानप्रदान में कवक को मदद मिलती रहे.

आवरण मृदा बीमारियों और कीड़ों से मुक्त व इस का पीएच मान 7.5 से 7.8 होना चाहिए. अपने देश में निम्नलिखित सामग्री से आवरण मृदा तैयार की जाती है :

* गोबर की खाद (2 साल पुरानी) बगीचे की मिट्टी (2:1)

* गोबर की खाद (2 साल पुरानी)  स्पेंट कंपोस्ट (1:1)

आवरण मृदा का पाश्चुरीकरण

आवरण मृदा को फौर्मेलीन द्वारा शोधित किया जा सकता है. आवरण मृदा का मिश्रण पक्के फर्श पर ढेर के रूप में रख कर उस में 4 प्रतिशत फौर्मेलीन का घोल पानी में बना कर अच्छी तरह मिला लें. उस के बाद ढेर को पौलीथिन चादर को हटा कर आवरण मृदा को उलटपलट कर फौर्मेलीन की गंध उड़ने के लिए छोड़ देते हैं.

इस तरह 3-4 दिन तक आवरण मृदा को उलटतेपलटते रहते हैं व पूरी तरह से ढेर को फौर्मेलीन गंधरहित कर लेते हैं. आवरण मृदा का शोधन वाष्प द्वारा 65 डिगरी सैंटीग्रेड पर 6-8 घंटे करना ज्यादा उपयोगी है.

आवरण मृदा का प्रयोग

आवरण मृदा की 4 सैंटीमीटर मोटी सतह कवक जाल युक्त कंपोस्ट के ऊपर बिछा दी जाती है. आवरण मृदा बिछाने के बाद 2 फीसदी फौर्मेलीन घोल का छिड़काव इस पर करना चाहिए और फसल कक्ष का तापमान 15-18 डिगरी सैंटीग्रेड और आर्द्रता 80-85 फीसदी कर देना जरूरी है. साथ ही, समुचित वायु संचार का इस अवस्था में प्रबंधन करना जरूरी होता है.

आवरण मृदा के ऊपर से दिन में एक या 2 बार पानी का हलका छिड़काव करना चाहिए.

फसल की तुड़ाई

आवरण मृदा बिछान के 12 से 18 दिन बाद (मशरूम) निकलना शुरू हो जाता है और 50-60 दिन तक निरंतर निकलते रहते हैं.

दिन में एक अथवा दो बार मशरूम को टोपी खुलने के पहले (जिस की परिधि एक से डेढ़ इंच हो), उंगलियों के सहारे ऐंठ कर निकाल लेना चाहिए. इतना ही नहीं, मशरूम खुल जाने और छतरी बन जाने पर मशरूम की क्वालिटी और बाजार में इस की कीमत कम हो जाती है.

पैदावार

दीर्घ अवधि से बनाई गई प्रति 100 किलोग्राम कंपोस्ट से 14 से 16 किलोग्राम मशरूम व इतनी ही मात्रा में पाश्चुरीकरण कंपोस्ट से 18 से 22 किलोग्राम मशरूम की पैदावार हासिल हो जाती है.