Farmer Story : जैविक खेती से भंवर ने कमाया नाम

Farmer Story: आज के दौर में उम्दा किस्म की फसल सफलतापूर्वक उगाना किसी चुनौती से कम नहीं है, क्योंकि रासायनिक खादों ने फसलों को सेहत के लिहाज से जहरीला बना दिया है. जैविक खेती ही इस मुश्किल का सब से अच्छा हल है.

राजस्थान के जोधपुर जिले के किसान भंवरलाल ने जैविक खेती में नए प्रयोगों से बहुत नाम कमाया है और फसलों का उत्पादन बढ़ा कर कमाई भी की है. भंवरलाल के पास 125 बीघे जमीन है, जिस में 75 बीघे सिंचाई वाली है. साल 1962 में मैट्रिक पास करने के बाद भंवरलाल मास्टर बन गए. 3 साल तक नौकरी करने के बाद वे नौकरी छोड़ कर खेती के काम में लग गए.

भंवरलाल खरीफ में बाजरा, तिल व मूंग की फसल उगाते हैं और रबी में जीरा, सौंफ, मेथी, धनिया, राई व चारा फसलें (रिजका) उगाते हैं. उन के घर में गायें हैं, जिन से खेती के लिए जैविक खाद गोबर के रूप में मिल जाती है. वे गायों को इस तरह रखते हैं कि उन का मूत्र भी एक नाली में बह कर इकट्ठा हो जाए.

जैविक खेती के तहत उन्होंने गौमूत्र इकट्ठा कर के एक ड्रम में भर कर उसे सिंचाई के पानी के साथ मिला कर देना शुरू किया. इस से फसलों के कीटरोग के अंश खत्म हो गए और फसल की पैदावार भी बढ़ी. जैविक खाद के साथ गौमूत्र देने से फसल की गुणवत्ता भी अच्छी रही और अनाज स्वादिष्ठ भी होने लगा.

गोबर की खाद व गौमूत्र जमीन में देने से फसलों में सिंचाई भी कम करनी पड़ी. इस से पानी की बचत हुई और गैरजरूरी रासायनिक खाद व दवाओं का खर्च भी बचा. इस के साथ दीमक से बचाव भी हो गया.

जैविक खेती में नवाचारों में छाछ इकट्ठा कर के खट्टा होने पर नीबू की फसल व अन्य फसलों पर छिड़कने से पत्तों का सिकुड़न रोग खत्म हो गया और पत्तों में पीलेपन की बीमारी नहीं रही. नीबू, आक व धतूरे के पत्तों और निंबोली को ड्रम में भर कर उस की 10 किलोग्राम मात्रा में 100 लीटर पानी डाल कर उस से छिड़काव करने से सौंफ, जीरा व धनिया में कीटों व दूसरे रोगों से छुटकारा पाया.

जैविक खेती में गोबर की जैविक खाद का बहुत महत्त्व है. इस में घर के पशुओं का गोबर काम आ जाता है. कभीकभी बाहर से भी गोबर खरीदना पड़ता है, जिसे वे गड्ढे में सड़ा देते हैं और फिर जरूरत के मुताबिक फसलों में इस्तेमाल करते हैं. भंवरलाल का कहना है कि यूरिया से बढ़वार तो जरूर होती है, परंतु फसलों में ताकत नहीं होती और खेती टिकाऊ नहीं रहती है.

भंवरलाल के मुताबिक निंबौली को इकट्ठा कर के पीस कर व छान कर फसल पर छिड़काव करने से कीटों व रोगों में कमी होती है. इस से हवा भी साफ रहती है.

भंवरलाल लगातार जैविक खेती में आगे बढ़ रहे हैं. उन्हें जहां भी नई जानकारी मिलती है, वे उसे समझ कर अपनाते हैं. भंवरलाल बताते हैं कि जैविक खेती में देशी खाद की करामात होती है. सभी किसान भाई जैविक खेती की तरफ बढ़ें, तो फसल में जहर कम हो सकता है. इस से खर्चा कम होगा, स्वास्थ्य सुधरेगा व खेती में सिंचाई कम होगी. जैविक खेती ही टिकाऊ खेती है. भंवरलाल ने जैविक खेती में तमाम प्रयोग किए हैं.

Modern Farming: आधुनिक खेती अपना कर पाई तरक्की की राह

Modern Farming: उत्तर प्रदेश के जिला महाराजगंज से 15 किलोमीटर दूर गांव अंजना के एक किसान ने खेती की बहुत कम जमीन पर कुछ ऐसा किया कि उन के हालात में तो सुधार आया ही, साथ ही उन्होंने आसपास के सैकड़ों परिवारों को रोजगार के अवसर भी मुहैया किए.

कृषि में स्नातक नागेंद्र पांडेय ने जब पढ़ाई पूरी कर के नौकरी की तलाश शुरू की तो उन्हें यह नहीं पता था कि वे पूर्वांचल के जिलों में खेती की मिसाल बन जाएंगे.

नागेंद्र पांडेय ने अपनी कृषि की शिक्षा का इस्तेमाल अपनी खेती में करने की ठानी. उन्होंने महसूस किया कि अकसर छोटी जोत के किसान खाद व रसायनों की किल्लत से परेशान होते हैं और महंगी खादों का इस्तेमाल करने से भी उन को खास उत्पादन व लाभ नहीं मिल पाता है.

20 केंचुओं से शुरू किया कारोबार

फिर क्या था किसान नागेंद्र पांडेय ने यह तय कर लिया कि वे अपनी थोड़ी सी जमीन में जैविक खादों को तैयार करेंगे और बाकी बची जमीन में जैविक खेती (Modern Farming) करेंगे. उन्होंने इस के लिए सब से पहले वर्मी कंपोस्ट तैयार करने की सोची. उन्होंने वर्मी खाद तैयार करने में इस्तेमाल किए जाने वाले केंचुओं की प्रजातियों के लिए कृषि व उद्यान महकमे से संपर्क किया, लेकिन उन्हें विभाग से केंचुए नहीं मिल पाए. इस के बाद वे गोरखपुर जिले के कैंपियरगंज से सिर्फ 20 केंचुओं का  इंतजाम कर पाए.

वे आइसीनिया फोरिडा प्रजाति के उन 20 केंचुओं को घर ले कर आए और पशुओं को चारा खिलाने वाली नाद में वर्मी कंपोस्ट में प्रयोग होने वाले गोबर व पत्तियों के बीच डाला. यह केंचुओं की नियमित देखभाल का ही नतीजा था कि 45 दिनों बाद 2 किलोग्राम केंचुए तैयार हो चुके थे.

नागेंद्र पांडेय ने साल 2001 में किसी की मदद के बगैर ही 1 वर्मीपिट बनवाया और फिर शुरू हुआ उन के जीवन में बदलाव का एक नया अध्याय.

बड़े वर्मी खाद के उत्पादक :

नागेंद्र पांडेय द्वारा 20 केंचुओं से शुरू किया गया वर्मी खाद उत्पादन इस समय पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिलों के किसानों के लिए मिसाल बन चुका है. उन्होंने वर्मी खाद व वर्मी के केंचुओं को किसानों को बेच कर जहां एक तरफ  जैविक खेती (Modern Farming) को बढ़ावा देने का काम किया है, वहीं इसी वर्मी कंपोस्ट की यूनिटों के सहारे उन्होंने सैकड़ों परिवारों को रोजगार दे रखा है.

मिलती है गुणवत्तायुक्त खाद

नागेंद्र के यहां तैयार होने वाली वर्मी खाद में किसी तरह की मिलावट नहीं की जाती है. वे समयसमय पर खाद की गुणवत्ता की जांच के लिए लैब टेस्ट कराते रहते हैं, इसलिए उन की खाद से पौधों की बढ़वार व उपज दोनों अच्छी होती है.

नागेंद्र पांडेय के वर्मीपिट पर रोज सैकड़ों महिलाएं काम करने आती हैं. वे वर्मी कंपोस्ट की पलटाई व पैकेजिंग वगैरह करती हैं.

शहतूत की नर्सरी से हो रहे मालामाल :

वर्मी कंपोस्ट के अलावा नागेंद्र पांडेय द्वारा 1 एकड़ में शहतूत की नर्सरी हर साल तैयार की जाती है, जिस से 10 लाख 50 हजार पौधे प्राप्त होते हैं. एस 1 (64) नाम की प्रजाति न केवल सामान्य प्रजातियों से ज्यादा पत्तियों का उत्पादन देती है, बल्कि इसे रेशमकीटपालन के लिए सब से मुफीद माना जा सकता है.

वाटर हार्वेस्टिंग का नायाब तरीका :

किसान नागेंद्र पांडेय ने खेतों की सिंचाई में इस्तेमाल होने वाले पानी व बारिश के पानी के लिए एक तालाब खुदवा रखा है, जिस में सीधा पाइप लगा कर खेत को जोड़ा गया है. वहां से फालतू पानी पाइप के रास्ते गड्ढे में जमा हो जाता है, जिस का इस्तेमाल वे वर्मी पिट की नमी बनाने व खेतों की सिंचाई के लिए करते हैं.

वर्मी वास की रहती है मांग

नागेंद्र पांडेय ने ‘साश्वत’ नाम से जैविक खेती को बढ़ावा देने वाला एक समूह बना रखा है, जिस के जरीए वे अपनी विद्या का प्रचारप्रसार भी करते हैं. वे केंचुओं से वर्मी वास बनाते हैं, जिस में मटके में गोबर मिला कर उसे ऊपर टांग कर पानी डाल दिया जाता है. इस में केंचुओं के हार्मोन मिल कर बूंदबूंद बाहर आते हैं, जो फसलों में छिड़काव के काम आते हैं.

किसान नागेंद्र ने जैविक खेती की दिशा में जो कोशिशें की हैं, वे दूसरे किसानों के लिए मिसाल हैं. उन्होंने न केवल जैविक खेती को बढ़ावा दिया है, बल्कि कई परिवारों को रोजगार भी मुहैया कराने में अहम किरदार निभाया है.

Fake Fertilizers : असली और मिलावटी खाद की सही पहचान

Fake Fertilizers: खेती की सफलता काफी हद तक सही खाद पर निर्भर करती है. यदि खाद शुद्ध और संतुलित हो, तो फसल अच्छी होती है; लेकिन यदि खाद मिलावटी या नकली हो, तो किसान को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है. आज के समय में बाजार में नकली खाद (Fake Fertilizers) की समस्या तेजी से बढ़ रही है, जिससे किसान आर्थिक और उत्पादन दोनों स्तर पर प्रभावित हो रहे हैं.

क्यों बढ़ रही है नकली खाद की समस्या?

खाद की मांग अधिक और आपूर्ति कम होने की स्थिति में कुछ लोग अवैध रूप से मिलावटी खाद (Fake Fertilizers) बेचने लगते हैं. कई बार महंगे ब्रांड के नाम पर घटिया या मिश्रित सामग्री पैक कर दी जाती है. किसान असली और नकली खाद (Fake Fertilizers) के बीच अंतर नहीं समझ पाते और ठगी का शिकार हो जाते हैं.

इसके परिणामस्वरूप:
• फसल की वृद्धि रुक जाती है
• उत्पादन कम हो जाता है
• मिट्टी की गुणवत्ता खराब हो सकती है
• किसान को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है

असली और नकली खाद की पहचान कैसे करें?

नीचे कुछ सामान्य खादों की पहचान के सरल तरीके दिए गए हैं. इन उपायों से किसान प्राथमिक स्तर पर जांच कर सकते हैं.

1. डीएपी (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) की पहचान
• इसके दाने पूरी तरह गोल नहीं होते.
• रंग हल्का भूरा या मटमैला हो सकता है.
• दानों को दबाने पर वे तुरंत चूरा नहीं बनते.
• पानी के संपर्क में आने पर धीरे-धीरे गलते हैं, लेकिन बिखरते नहीं.
• चूने के साथ मिलाने पर तेज गंध महसूस हो सकती है.

2. यूरिया की पहचान
• दाने सफेद और लगभग समान आकार के होते हैं.
• अधिक पाउडर दिखे तो मिलावट या पुरानापन हो सकता है.
• पानी में घुलने पर ठंडक का एहसास होता है.
• गर्म करने पर पहले पिघलता है और फिर वाष्प बनकर समाप्त हो जाता है.

3. जिंक सल्फेट की जांच
• थोड़ी मात्रा पानी में घोलें.
• यदि सही रासायनिक प्रतिक्रिया हो और घोल गाढ़ा हो जाए, तो खाद शुद्ध हो सकती है.

4. सिंगल सुपर फॉस्फेट (एसएसपी)
• हाथ में रगड़ने पर हल्का चिकनापन महसूस होता है.
• अत्यधिक खुरदरापन मिलावट का संकेत हो सकता है.

5. म्यूरेट ऑफ पोटाश (एमओपी)
• इसका रंग ईंट जैसा लाल या भूरा होता है.
• पानी में डालने पर दाने आपस में चिपकते नहीं.

नकली खाद से बचने के लिए जरूरी सावधानियां

-हमेशा पंजीकृत और विश्वसनीय विक्रेता से खरीदारी करें.

-खरीदते समय पक्का बिल अवश्य लें.

-पैकिंग पर कंपनी का नाम, बैच नंबर और निर्माण तिथि देखें

-खुली या बिना लेबल वाली खाद खरीदने से बचें

-किसी संदेह की स्थिति में कृषि विभाग से संपर्क करें.

नकली खाद (Fake Fertilizers) की समस्या केवल व्यक्तिगत नुकसान नहीं, बल्कि कृषि व्यवस्था के लिए भी खतरा है. जागरूकता ही इसका सबसे बड़ा समाधान है. यदि किसान खाद की सही पहचान करना सीख जाएं और सावधानी बरतें, तो इस समस्या को काफी हद तक रोका जा सकता है.

Bio Fertilizer: माइकोराइजा और ट्राइकोडर्मा क्या हैं?

Bio Fertilizer: खेती-किसानी में वैसे तो कई प्रकार की खाद और उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है लेकिन यदि आप समय पर अपनी फसल में माइकोराइजा एवं ट्राइकोडर्मा का प्रयोग करते हैं तो इससे आपकी फसल की वृद्धि भी अच्छी होगी और उत्पादन भी अच्छा प्राप्त किया जा सकेगा. अभी हाल ही में कई प्रगतिशील किसानों द्वारा इसका उपयोग करके अपने उत्पादन को काफी बढ़ा लिया है, इसलिए आप भी अपनी खेती-किसानी में माइकोराइजा और ट्राइकोडर्मा का उपयोग कर उत्पादन बढ़ा सकते हैं.

माइकोराइजा क्या है

यह शब्द 2 शब्दों से बना है-‘माइको’ (Fungus)+’राइजा ‘ (Root) यानी ‘फफूंद और जड़ की दोस्ती’. वैज्ञानिक इसे VAM (Vesicular Arbuscular Mycorrhiza) कहते हैं.

यह काम कैसे करता है

पौधे की जड़ें बहुत दूर तक नहीं जा सकतीं उनकी पहुंच सीमित होती है. माइकोराइजा फफूंद के धागे बाल से भी बारीक होते हैं. ये धागे पौधे की जड़ों से जुड़ते हैं और मिट्टी में मीलों दूर तक फैल जाते हैं. यह बिल्कुल एक ‘इंटरनेट नेटवर्क’ या ‘एक्सटेंशन वायर’ की तरह काम करता है.

फायदे (Benefits)

• मिट्टी में फॉस्फोरस (P) चलता नहीं है. माइकोराइजा के धागे दूर-दूर से बारीक सुराखों से फॉस्फोरस खींचकर पौधे की जड़ को देते हैं. यह पौधे का फॉस्फोरस अपटेक 50-60 फीसदी तक बढ़ा सकता है.

• पानी की कमी के समय जब जड़ें पानी तक नहीं पहुंच पातीं, तब माइकोराइजा के धागे गहराई से पानी सोखकर पौधे को जिंदा रखते हैं.

• जिंक और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स. यह जिंक, कॉपर और अन्य तत्त्वों को भी उपलब्ध कराता है.

• माइकोराइजा उन खेतों के लिए फायदेमंद है जहां पानी की कमी है या जहां किसान ने DAP डाल डालकर जमीन पत्थर कर दी है. यह जड़ों के विकास (Root Development) का सबसे अच्छा टॉनिक है.

ट्राइकोडर्मा (Trichoderma):

मिट्टी का ‘बॉडीगार्ड’ अगर माइकोराइजा ‘इंजीनियर’ है तो ट्राइकोडर्मा ‘सिपाही ‘या ‘डॉक्टर’ है. यह एक ऐसी फफूंद है जो दूसरी हानिकारक फफूंदों को खा जाती है.

यह काम कैसे करता है?

जैसे ही ट्राइकोडर्मा किसी दुश्मन फफूंद जैसे Fusarium – जो उकठा (Wilt) फैलाता है या Pythium – जो जड़ सड़न (Red rot) करता है, को देखता है, यह उसके चारों तरफ कुंडली मार लेता है और उसका रस चूसकर उसे मार देता है. यह बीज या जड़ के चारों तरफ अपनी एक परत बना लेता है, जिससे कोई बीमारी पास नहीं आ सकती.

उपयोग कैसे करें

बीज उपचार (Seed Treatment)

5 से 10 ग्राम ट्राइकोडर्मा पाउडर प्रति किलो बीज में मिलाएं. यह बीज के साथ ही उगता है और जन्म से ही पौधे की रक्षा करता है.

मिट्टी उपचार (Soil Application), सबसे असरदार

1-2 किलो ट्राइकोडर्मा को 100 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाएं. इसे बोरी से ढककर छांव में 5-7 दिनों के लिए रख दें. 7 दिनों में फफूंद उस पूरे ढेर में फैल जाएगी (सफेद/हरा रंग दिखेगा). अब आपके पास 100 किलो शक्तिशाली बायो-फंगीसाइड तैयार है. इसे बोआई से पहले खेत में बिखेर दें.

केमिकल हैं फंगीसाइड का दुश्मन
ट्राइकोडर्मा और माइकोराइजा (Bio Fertilizer) खुद एक फफूंद हैं. अगर किसान ने खेत में ‘साफ’ (Carbendazim+Mancozeb) या कोई अन्य फंगीसाइड डाला है, तो वह बीमारी को मारने के साथ-साथ इन मित्रों को भी मार देगा. बायो-फफूंद डालने के 15 दिनों पहले और 15 दिनों बाद तक खेत में कोई रासायनिक फंगीसाइड न डालें.

Fake Agrochemicals: नकली खाद और दवाओं से उजड़ते खेत

Fake Agrochemicals: देश में उर्वरकों की कमी होने पर उसे पूरा करने के लिए विदेशों से उर्वरक आयात किया जाता है. आत्मनिर्भर भारत की क्या यही तस्वीर है ? या सरकार के दावे खोखले हैं? अगली बार आप जब भी नाश्ता या भोजन करने बैठे तो एक बार गहराई से जरूर सोचिएगा कि क्या आपकी आने वाली पीढियां को भी यह नाश्ता, दोनों पहर का भोजन अबाध रूप से मिलने वाला है? हकीकत तो यही है कि भारतीय खेती इस समय एक साथ कई मोर्चों पर संकट से जूझ रही है.

नकली एग्रोकेमिकल्स (Fake Agrochemicals) का बढ़ता नेटवर्क, सरकार की खुलती कलई

पिछले कुछ दिनों में सामने आई खबरें यदि एक साथ रखी जाएं, तो तस्वीर और भी भयावह दिखती है. एक ओर गुजरात जैसे औद्योगिक रूप से अग्रणी राज्य में नकली और जहरीले एग्रोकेमिकल्स का संगठित नेटवर्क किसानों की फसलों, मिट्टी और भरोसे को नष्ट कर रहा है. दूसरी ओर, उर्वरकों के मामले में भारत की आयात निर्भरता खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी है. तीसरी ओर, अर्थव्यवस्था की तेज वृद्धि के बावजूद कृषि क्षेत्र की सुस्त रफ्तार ग्रामीण भारत की कमजोर हालत को उजागर कर रही है. यह केवल अलग-अलग समस्याएं नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई संरचनात्मक विफलताएं हैं.

गुजरात में हालिया छापों और एफआईआर ने यह साफ कर दिया है कि नकली एग्रोकेमिकल्स (Fake Agrochemicals) अब छोटे-मोटे अपराध नहीं रहे. राजकोट, अहमदाबाद और अंकलेश्वर जैसे केंद्रों से संचालित यह नेटवर्क बहुराज्यीय आपूर्ति शृंखलाओं के जरिये किसानों तक पहुंच रहा है.

करोड़ों का फर्जी कारोबार (Fake Agrochemicals) कर रहा खेत की मिट्टी खराब

प्रतिष्ठित ब्रांडों के नाम पर बिक रहे ये उत्पाद न केवल फसलें चौपट कर रहे हैं, बल्कि मिट्टी और पानी को भी दीर्घकालिक रूप से प्रदूषित कर रहे हैं. यूपीएल UPL Limited द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में यह स्वीकार किया गया कि नकली उत्पादों का दायरा लगातार फैल रहा है और इसका अनुमानित कारोबार एक हजार करोड़ रुपये से भी अधिक हो सकता है.

इस संकट का असर केवल गुजरात तक सीमित नहीं है. महाराष्ट्र सहित पड़ोसी राज्यों में इन नकली रसायनों की आपूर्ति ने व्यापक फसल क्षति की खबरें दी हैं.
अप्रैल से नवंबर 2025 के बीच यूरिया आयात में 120 प्रतिशत और डीएपी आयात में 54 प्रतिशत की वृद्धि यह बताती है कि घरेलू उत्पादन लगातार कमजोर हो रहा है. भारतीय फर्टिलाइजर संगठन (Fertiliser Association of India) के आंकड़े साफ कहते हैं कि यूरिया की 27 प्रतिशत और डीएपी की करीब 67 प्रतिशत मांग आयात से पूरी की गई.

चक्रजाल में फंसता किसान

रसायनों पर टिके रहने से मिट्टी मर रही है, लागत बढ़ रही है और किसान कर्ज में डूब रहा है. लेकिन अचानक बिना वैकल्पिक व्यवस्था के इससे निकलना भी जोखिम भरा लगता है.ही वह नीति जाल है, जिसमें भारतीय किसान फंसा हुआ है. इस जाल का असर राष्ट्रीय आय के आंकड़ों में भी दिखता है. राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के प्रथम अग्रिम अनुमानों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025–26 में जहां जीडीपी वृद्धि 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है, वहीं कृषि और संबद्ध क्षेत्रों की वृद्धि केवल 3.1 प्रतिशत रहेगी.

रसायनों के चक्रव्यूह से कैसे निकले किसान

नकली एग्रोकेमिकल्स (Fake Agrochemicals) के खिलाफ कड़ी कार्रवाई जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है किसानों को ऐसे विकल्प देना, जिनसे वे रसायनों के चक्र से बाहर निकल सकें. यदि 2047 तक भारत को सचमुच जहर-मुक्त और जैविक खेती की ओर ले जाना है, तो उर्वरकों में आत्मनिर्भरता सबसे पहला कदम होगा. जैविक खाद, हरी खाद और प्राकृतिक माइक्रोन्यूट्रिएंट्स का स्थानीय स्तर पर उत्पादन ही इस दिशा में ठोस रास्ता है.

नेचुरल ग्रीनहाउस है एक टिकाऊ मॉडल

इस संदर्भ में बस्तर के कोंडागांव में विकसित प्राकृतिक खेती का मॉडल एक व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करता है. मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म और रिसर्च सेंटर में विकसित “नेचुरल ग्रीनहाउस” पद्धति दिखाती है. पारंपरिक पॉलीहाउस पर जहां 40 लाख रुपये तक की लागत आती है, वहीं यह टिकाऊ मॉडल केवल एक से डेढ़ लाख रुपये में तैयार हो जाता है और इसमें रासायनिक खाद पर एक रुपया भी खर्च नहीं करना पड़ता. मिट्टी में नैसर्गिक नाइट्रोजन स्थिरीकरण की प्रक्रिया के चलते मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ जाती है, सूक्ष्मजीवों की संख्या कई गुना होती है और केंचुओं के जरिए प्राकृतिक वर्मी कंपोस्ट बनने लगता है. यह न केवल लागत घटाता है, बल्कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते ताप प्रभाव से खेतों को सुरक्षा भी देता है.

(लेखक कृषि तथा ग्रामीण मामलों के विशेषज्ञ एवं ‘अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा)’ के राष्ट्रीय संयोजक हैं)

Natural Farming: दुनिया भर को प्राकृतिक खेती की जरूरत

Natural Farming: प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा जैविक खेती पर 21 दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन 3 जनवरी से 23 जनवरी, 2026 तक किया जा रहा है.

प्राकृतिक खेती के लिए यह कदम हैं जरूरी

#उर्वरकों के प्रयोग को 25 प्रतिशत तथा पानी के उपयोग को 20 प्रतिशत तक कम करना होगा.

#नवीनीकरण ऊर्जा के उपयोग में 50 प्रतिशत वृद्धि तथा ग्रीन हाऊस उत्सर्जन को 45 प्रतिशत कम करना.

#करीब 26 मिलियन हैक्टेयर भूमि सुधार करना हमारे देश की आवश्यकता है.

#नई तकनीकों को किसानों तक पहुंचाना जरूरी.

इसके लिए प्राकृतिक खेती (Natural Farming) विषय को देश के कृषि पाठ्यक्रम में चलाने के साथ-साथ नई तकनीकों को आमजन और किसान तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है. वर्तमान काल में देश के कृषि वैज्ञानिकों के सामने यह एक मुख्य चुनौती है.

प्राकृतिक खेती आज की आवश्यकता

प्राकृतिक खेती (Natural Farming) आज की अंतर्राष्ट्रीय/विश्व स्तरीय जरूरत है और आज आज के किसानों की और समय की प्राथमिकता है. प्राकृतिक खेती पर अनुसंधान पिछले 5 वर्षों से किया जा रहा है. जापान में प्राकृतिक खेती प्राचीन समय से चल रही है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली पूरे भारत में स्नातक स्तर पर पाठ्यक्रम शुरू कर चुकी है.

डॉ. एस. के. शर्मा ने कहा कि 21वीं सदीं में सभी को सुरक्षित एवं पोषण मुक्त खाद्य की आवश्यकता है अतः प्रकृति तथा पारिस्थितिक कारकों के कृषि में समावेश करके ही पूरे कृषि तंत्र का ‘शुद्ध कृषि’ की तरफ बढ़ाया जा सकता है.

कम लागत में खाद्य-पोषण सुरक्षा को बढ़ावा

भारतीय परंपरागत कृषि पद्धति योजना के तहत देश में प्राकृतिक खेती (Natural Farming) को बढ़ावा दिया जा रहा है. इससे कम लागत के साथ-साथ खाद्य-पोषण सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा. जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों के तहत खेती को सुरक्षा प्रदान करने के लिए प्राकृतिक खेती के घटकों को आधुनिक खेती में समावेश करना आवश्यक है.

डॉ. अरविंद वर्मा, निदेशक अनुसंधान ने कहा कि :

#प्राकृतिक खेती से मृदा स्वास्थ्य को सुधारा जा सकता है.

#प्राकृतिक खेती के द्वारा लाभदायक कीटों को बढ़ावा मिलता है.

#जलवायु परिवर्तन के दौर में प्राकृतिक खेती द्वारा प्राकृतिक संसाधन का संरक्षण एवं पारिस्थितिक संतुलन को बढ़ावा मिलता है.

डॉ. अरविन्द वर्मा ने बताया इन कारणों से बढ़ रहा खतरा :

#पूरेे विश्व में ‘संसाधन खतरे’ (रिसोर्ज डेंजर) खासतौर पर मिट्टी की गुणवत्ता में कमी, पानी का घटता स्तर, जैव विविधता का घटता स्तर, हवा की बिगड़ती गुणवत्ता तथा पर्यावरण में बिगड़ता गुणवत्ता संतुलन के कारण हरित कृषि तकनीकों के प्रभाव टिकाऊ नहीं रहे हैं.

#बदलते जलवायु परिवर्तन के परिवेश एवं पारिस्थितिकी संतुलन के बिगड़ने से मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य तथा बढ़ती लागत को प्रभावित कर रहे हैं और अब वैज्ञानिक तथ्यों से यह स्पष्ट है कि भूमि की जैव क्षमता से अधिक शोषण करने से एवं केवल आधुनिक तकनीकों से खाद्य सुरक्षा एवं पोषण सुरक्षा नहीं प्राप्त की जा सकती है

लिहाजा, किसानों का मार्केट आधारित आदानों पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ स्थानीय संसाधनों का सामूहिक संसाधनों के प्रबंधन के साथ प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना चाहिए.

इस के अलावा आज खेती में बढ़ते रसायन के प्रयोग से खेती की मिट्टी में सुधर और स्वस्थ वातावरण के लिए प्राकर्तिक खेती अपनाना जरूरी है.

Green Manure: हरी खाद – स्वस्थ मिट्टी और अधिक मुनाफे की प्राकृतिक खेती

Green Manure: इस बात में शक की जरा सी भी गुंजाइश नहीं है कि हरी खाद (Green Manure) खेती के लिए अमृत का काम करती है. अगर किसान इसका ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करें तो फसलें बेहतरीन नतीजा देंगी और खाने वाले की सेहत शानदार हो जाएगी. लिहाजा यह जरूरी है कि हम कुदरती चीजों की हिफाजत करते हुए खेती करें तथा भूमि की जैविक कूवत बनाए रखें. इसके लिए हमारे खेतों में पर्याप्त मात्रा में कार्बनिक जैवांश का होना बहुत जरूरी है. इसके लिए हरी खाद (Green Manure) का इस्तेमाल बेहद कारगर है.

हरी खाद के प्रमुख फायदे

• हरी खाद के इस्तेमाल से खरपतवार कम होते हैं तथा मिट्टी का कटाव रुकता है.

• हरी खाद से मिट्टी की भौतिक, रासायनिक तथा जैविक दशाओं में माकूल असर पड़ने के साथ-साथ मिट्टी की भौतिक संरचना में भी सुधार होता है.

• हरी खाद के इस्तेमाल से पोषक तत्त्वों की मात्रा व उपलब्धता में इजाफा होता है.

• नीचे की मिट्टी के तत्त्व हरी खाद की गहरी जड़ों द्वारा ऊपर पत्तियों में आ जाते हैं तथा अगली फसल को मिल जाते हैं.

• यह कम समय में तैयार होने वाली सस्ती खाद है.

• इससे ऊसर सुधार में भी मदद मिलती है.

हरी खाद की प्रमुख फसलें

• खरीफ की दलहनी फसलें जैसे- ढैंचा, सनई, लोबिया, मूंग, उड़द, ग्वार वगैरह.

• खरीफ की अदलहनी फसलें जैसे- मक्का, ज्वार, बाजरा, घास वगैरह.

• रबी की दलहनी फसलें जैसे- मेथी, मटर, बरसीम, सैंजी, मसूर वगैरह.

• रबी की अदलहनी फसलें जैसे- सरसों, राई, शलजम, मूली, सूरजमुखी, जई वगैरह.

खरीफ और रबी में हरी खाद बोने का सही समय

खरीफ मौसम में हरी खादें बोने का समय मई-जून है. इसकी पलटाई फसल के 50-60 दिनों की होने पर मुख्य फसल की बोआई से करीब 15-20 दिन पहले की जाती है. रबी मौसम में हरी खाद की बोआई के लिए अक्तूबर महीने का पहला पखवाड़ा सही रहता है. हरी खाद को खेतों में दबाने और अगली फसल बोने के बीच में इतना अंतर होना चाहिए कि, हरी खाद से प्राप्त पोषक तत्त्व प्रति हेक्टेयर अधिक से अधिक मिट्टी में मिल जाएं.

हरी खाद के लिए उपयुक्त जलवायु

खरीफ में हरी खाद वाली फसलों के लिए गरम व नम जलवायु ठीक होती है. ऐसी जलवायु में हरी खाद की फसलें सफलता पूर्वक उगाई जा सकती हैं. ज्यादा बारिश वाले क्षेत्रों में हरी खाद की फसलों की बढ़वार अधिकतम होती है.

हरी खाद में खाद एवं उर्वरक प्रबंधन

हरी खाद वाली दलहनी फसलें खुद ही जड़ों द्वारा वातावरण से वायु मंडलीय नाइट्रोजन का यौगिकीकरण करती हैं, परंतु पौधों की वृद्धि की प्रारंभिक दशाओं में जब तक कि पौधों की जड़ों में मौजूद राइजोबियम जीवाणु सक्रिय नहीं होता तब तक पौधों को अतिरिक्त नाइट्रोजन की जरूरत होती है. इसके लिए 20-25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन बोआई के समय देना चाहिए.

हरी खाद को खेत में पलटने की सही अवस्था

हरी खाद को खेत में पलटना उस समय ज्यादा लाभदायक होता है, जिस समय फसल से अधिकतम हरा पदार्थ प्राप्त हो सके. यह पुष्पन से ठीक पहले की अवस्था होती है, जब पुष्पन शुरू होने वाला होता है और पत्तियां व टहनियां कोमल, लचीली, बिना रेशेवाली और ज्यादा पत्तियों वाली होती हैं.
फसल पलटने के लिए हरी खाद की खड़ी फसल को पाटा या हरी खाद टेंपलर चलाकर खेत में गिरा देते हैं. उसके बाद 20 किलोग्राम यूरिया या 400-500 किलोग्राम जिप्सम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़क देते हैं और खेत में पानी भर देते हैं.

हरी खाद का अपघटन कैसे होता है?

हरी खाद से प्राप्त हरे पदार्थ का अपघटन छोटे जीवाणुओं द्वारा होता है. ये जीवाणु पहले हरे पदार्थों को सड़ाकर अमोनीकरण करते हैं और अंत में उपलब्ध अवस्था (नाइट्रोजन) में बदल देते हैं. अगर पलटाई के समय कम नमी हो तो पूरा अपघटन नहीं होता और अधिक पानी होने पर पोषक तत्त्व नीचे चले जाते हैं. इसके अलावा अपघटन के लिए जीवाणुओं को अतिरिक्त ऊर्जा देने के लिए यूरिया (20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) देना चाहिए, इससे अपघटन तेजी से होता है.

हरी खाद को पलटने व मुख्य फसल लगाने के बीच कम से कम 15-20 दिनों का अंतर होना चाहिए, ताकि सूक्ष्म जीवाणुओं को हरी फसल के अपघटन, अमोनीकरण और नाइट्रीकरण का समय मिल सके.

Farmers First: किसान सर्वोपरी, उर्वरक विक्रेताओं का उनसे संपर्क जरूरी

Farmers First : उर्वरक विक्रेताओं को किसानों से सीधा संपर्क स्थापित कर विभिन्न प्रकार की नवीनतम एवं आधुनिक कृषि तकनीकियों को अपनाने के लिए करें प्रेरित और उन की आमदनी को बढ़ाने में निभाएं अपनी भूमिका.

किसान (Farmers) और उर्वरक विक्रेताओं का आपस में तालमेल बहुत जरूरी है, क्योंकि दोनों ही एक सिक्के के दो पहलू हैं, जिनका साथ चलना कृषि क्षेत्र और किसानों (Farmers) के लिए अत्यंत लाभदायक है. इसीलिए विगत दिनों प्रसार शिक्षा निदेशालय, उदयपुर द्वारा 15 दिवसीय खुदरा उर्वरक विक्रेता प्रशिक्षण आयोजित किया गया. इसमें क्या रहा ख़ास, जानिएं –

किसने क्या कहा

पूर्व निदेशक डॉ. आई. जे. माथुर, प्रसार शिक्षा निदेशालय, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर मुख्य अतिथि रहे. उन्होंने प्रशिक्षणार्थियों से कहा कि, वह पूरी लगन से अपने व्यवसाय के साथ-साथ किसानों (Farmers) को सही सुझाव देने का काम करें. उनकी हर समस्या का समाधान करने की कोशिश करें. डॉ. माथुर ने कस्टमाइज उर्वरक, संतुलित उर्वरक एवं समन्वित उर्वरक प्रबंधन के विभिन्न बिंदुओं पर प्रकाश डाला और नैनो फर्टिलाइजर एवं जल में घुलनशील उर्वरकों के महत्व पर चर्चा की.

किसान हैं सर्वोपरि

डॉ. आई. जे. माथुर ने कृषि के 6 प्रमुख आयामों जैसे मिट्टी, पानी, बीज, कृषि यंत्र, वातावरण एवं किसान के बारे में बताया और कहा कि, किसान (Farmer) सर्वोपरि हैं और उनको ध्यान में रखते हुए उर्वरक विक्रेताओं को अपनी तैयारी करनी चाहिए.

निदेशक प्रसार शिक्षा, उदयपुर ने क्या कहा
कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ. आर. एल. सोनी, निदेशक प्रसार शिक्षा, उदयपुर ने अपने उद्बोधन में प्रशिक्षणार्थियों को सफल व्यवसाय करने की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि, विक्रेताओं को किसानों के साथ अच्छे रिश्ते, मधुर व्यवहार रखना चाहिए. साथ ही सभी प्रकार के उत्पाद सही दाम पर किसानों को उपलब्ध करवाने की सलाह दी.

आधुनिक कृषि तकनीकियों को अपनाएं किसान

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि डॉ. एम.सी. गोयल, निदेशक आवसीय निर्देशन, कृषि विश्वविद्यालय, कोटा ने इस प्रशिक्षण को प्राप्त करने के उपरांत सभी उर्वरक विक्रेताओं को कहा कि आपको, किसानों को विभिन्न प्रकार की नवीनतम एवं आधुनिक कृषि तकनीकियों को अपनाने के लिए भी प्रेरित करना चाहिए और उनकी आमदनी को बढ़ाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए. साथ ही डॉ. गोयल ने 6 जे का सिद्धांत जल, जंगल, जमीन, जन, जीवन, जागरूकता की अवधारणा को विस्तृत रूप से साझा किया.

मृदा परीक्षण और जैविक खेती पर फोकस

इस प्रशिक्षण के समन्वयक एवं आचार्य डॉ. योगेश कनोजिया ने उर्वरकों के संतुलित उपयोग एवं मृदा परीक्षण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए मृदा स्वास्थ्य कार्ड, पोषक तत्व प्रबंधन, समन्वित पोषक तत्व के लाभ, जैविक खेती और उसके लाभ, कार्बनिक खेती आदि के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी.

प्रशिक्षण के समापन समारोह में खुदरा उर्वरक विक्रेता प्रशिक्षण में भाग लेने वाले सभी प्रशिक्षणार्थियों को प्रमाणपत्र प्रदान किए गए तथा इस प्रशिक्षण में राज्य के विभिन्न जिलों के कुल 45 प्रशिक्षणार्थियों ने भाग लिया जिन्हें सैद्धांतिक एवं प्रायोगिक जानकारियां विश्वविद्यालय के विभिन्न कृषि वैज्ञानिकों एवं राज्य सरकार के अधिकारियों द्वारा प्रदान की गईं.

Innovative Farmer Conclave : विकसित भारत, सशक्त किसान

Innovative Farmer Conclave: विकसित भारत, सशक्त किसान की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए, नवोन्मेषी किसान कॉनक्लेव 2025 (Innovative Farmer Conclave)  का आईसीएआर–आईएआरआई में सफल कार्यक्रम हुआ. 25 राज्यों के किसानों की भागीदारी रही और विकसित भारत के लिए किसान सशक्तिकरण पर जोर देते हुए किसान-नेतृत्व वाले नवाचार से विकसित भारत की परिकल्पना की गई. जानें कैसा रहा आयोजन और कृषि विशेषज्ञों ने क्या कहा-

किसान दिवस पर हुआ आयोजन

कृषि संस्थान में इस सम्मेलन (Innovative Farmer Conclave) का आयोजन चौधरी चरण सिंह की जयंती के अवसर पर किसानों के कल्याण हेतु उनके आजीवन योगदान को याद करते हुए किया गया.

मुख्य अतिथि, डॉ. राज एस. परोदा, संस्थापक अध्यक्ष, ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (TAAS), ने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए जैव कीटनाशकों को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि, जब कृषि को लाभकारी और सतत आजीविका के रूप में देखा जाएगा, तभी इस क्षेत्र के प्रति जनरुचि में वृद्धि होगी.

किसानों, वैज्ञानिकों और संस्थानों के बीच सामूहिक प्रयासों का आह्वान करते हुए कहा कि ‘विकसित भारत’ की परिकल्पना तभी साकार हो सकती है जब किसान सशक्त होंगे. उन्होंने प्रगति को गति देने के लिए किसान से किसान तक ज्ञान के प्रसार के महत्व को भी रेखांकित किया.

पूर्व प्रधानमंत्री, लाल बहादुर शास्त्री के प्रसिद्ध नारे ‘जय जवान, जय किसान’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जिस प्रकार सैनिक देश की सीमाओं की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार किसान देश को भूखमरी से बचाते हैं, जिससे वे राष्ट्रीय प्रगति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं.

निदेशक, ICAR-IARI ने क्या कहा

डॉ. सी. एच. श्रीनिवास राव, निदेशक, आईसीएआर–आईएआरआई, ने भारतीय किसानों की रचनात्मकता, जिजीविषा और व्यावहारिक ज्ञान की सराहना की. उन्होंने बताया कि, देश के 25 राज्यों से आए किसानों ने सम्मेलन में भाग लिया तथा अपनी नवोन्मेषी कृषि पद्धतियों, स्वदेशी तकनीकों एवं सफल कृषि मॉडलों का प्रदर्शन किया.

उन्होंने किसानों के समक्ष मौजूद जलवायु परिवर्तन, मौसम की अनिश्चितता एवं बाजार से जुड़ी चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए सभी राज्यों में किसान–वैज्ञानिक सहभागिता को सुदृढ़ करने के लिए भा.कृ.अनु.प.- भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की प्रतिबद्धता दोहराई. ‘विकसित भारत’ की परिकल्पना में किसान की केंद्रीय भूमिका है और कृषि की प्रगति केवल किसानों की सक्रिय भागीदारी से ही संभव है.

किसानों के उत्कृष्ट योगदान के लिए मिला सम्मान

कार्यक्रम (Innovative Farmer Conclave) के दौरान प्रकाशनों का विमोचन तथा प्रतिभागी किसानों को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रमाणपत्रों का वितरण कर किसानों को भी सम्मानित किया गया. इस सम्मेलन का समापन डॉ. आर. एन. पडारिया, संयुक्त निदेशक (विस्तार), भा.कृ.अनु.प.- भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ, जिसमें उन्होंने कार्यक्रम (Innovative Farmer Conclave) को सफल बनाने में किसानों, वैज्ञानिकों एवं आयोजकों के योगदान की सराहना की.

Farmer Felicitation: कृषि विज्ञान केंद्र लखनऊ ने किया किसानों को सम्मानित

Farmer Felicitation: कृषि विज्ञान केंद्र लखनऊ किसान दिवस पर तहसील मलिहाबाद के ब्लॉक माल के ग्राम सरसंडा में किसान सम्मान दिवस के अवसर पर भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया. जिसमें किसान दिवस मनाने के साथसाथ किसानों को भी सम्मानित (Farmer Felicitation) किया गया.

कौन थे अतिथि

कार्यक्रम का उद्घाटन निदेशक डॉक्टर दिनेश सिंह भारतीय गन्ना अनुसंधान परिषद लखनऊ द्वारा किया गया और कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि वैज्ञानिक डॉ मनीष मिश्र केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान लखनऊ मौजूद रहे. कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि मंत्री का लाइव कार्यक्रम भी प्रसारित किया गया. साथ स्वच्छता पखवाडा होने पर किसानों को स्वच्छता अभियान की शपथ ग्रहण कराई गई.

Farmer Felicitation

कृषि तकनीक अपनाने से अधिक लाभ

समारोह को संबोधित करते हुए डॉक्टर दिनेश सिंह ने कहा कि, किसानों की मेहनत और उन्नत कृषि तकनीकों के प्रयोग से देश की खाद्य सुरक्षा मजबूत हुई है. चौधरी चरण सिंह ने किसानों के हितों के लिए कई महत्वपूर्ण नीतियां और सुधार लागू किए थे.

दिनेश सिंह ने किसानों को मौसम के अनुसार फसल चक्र अपनाने, जैविक खेती, ड्रिप इरिगेशन जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग करने और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए प्रेरित किया. इस आयोजन का मकसद किसानों की समस्याओं को समझना और कृषि क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देना था.

Farmer Felicitation

महिला किसान बन रहीं आत्मनिर्भर

कृषि विज्ञान केंद्र लखनऊ के वैज्ञानिक डॉ. अखिलेश कुमार दुबे ने कहा कि, महिला किसान भी कृषि क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं. महिला किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए केंद्र द्वारा कई प्रशिक्षण और योजनाएं भी चलाई जा रही हैं. उन्होंने महिला किसानों को स्वरोजगार, सब्जी उत्पादन, मशरूम की खेती तथा पशुपालन से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया.

Farmer Felicitation

किसानों को मिला सम्मान

इस कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों के योगदान को सम्मानित करना भी था. इस अवसर पर महिला किसानों के साथ आम उत्पादक किसान व tafari फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड लतीफपुर मलिहाबाद लखनऊ के निदेशक अतुल कृष्ण अवस्थी, उत्कृष्ट फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड के निदेशक सतीश सिंह, राजकुमार सिंह अमलौली,आशीष द्विवेदी, मनीष रावत आदि को आम उत्पादन व विपणन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए सम्मानित (Farmer Felicitation) किया गया.