Rice and Wheat: चावल और गेहूं में आत्मनिर्भर हुआ भारत

Rice and Wheat: आज भारत चावल और गेहूं दोनों का निर्यात कर रहा है और चावल के उत्पादन में 15 करोड़ टन के साथ चीन को पीछे छोड़कर विश्व में नंबर एक हो चुका है. अब तैयारी है कम पानी में खेती कैसे की जाए?

विश्व में नंबर एक बना भारत

किसी समय देश में खाद्यान की भारी कमी थी और हमें विदेशों से अनाज मंगवाना पड़ता था. लेकिन अब हमारे गोदाम खाद्यान से भरे पड़े हैं, विदेशों को भी हम गेंहू चावल निर्यात कर रहे हैं. इसके पीछे सरकार का पहला लक्ष्य गेहूं और चावल में आत्मनिर्भर बनना था, जिसे हासिल कर आज भारत चावल और गेहूं दोनों का निर्यात कर रहा है और चावल के उत्पादन में 15 करोड़ टन के साथ चीन को पीछे छोड़कर विश्व में नंबर एक हो चुका है.

लेकिन धान की खेती में पानी की खपत बहुत अधिक है, इसलिए अब कम समय और कम पानी में होने वाली खेती जरुरी है, ताकि भारत आने वाले समय में भी हमेशा आगे रहे.

डीएसआर को बढ़ावा

धान की खेती में डीएसआर तकनीक को बढ़ावा दिया जा रहा है. इस तकनीक में धान की कुछ खास किस्मों के जरिए डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) तकनीक से खेती की जाती है. इस तरीके से खेती करने से खेत में स्थायी रूप से पानी भरने की जरूरत नहीं रहती और कम पानी में भी धान की खेती से अच्छी पैदावार मिलती है.

कम पानी वाली अन्य फसलों को प्रोत्साहन राशि

फसल विविधीकरण कार्यक्रम के तहत देश के अनेक राज्यों में दलहन, तिलहन, मोटे की खेती और कृषिवानिकी जैसी वैकल्पिक फसलों को प्रोत्साहित किया जा रहा है. सरकारी योजनाओं राज्य सरकारों के माध्यम से दलहन के लिए 9,000 रुपए प्रति हेक्टेयर, मक्का व जौ के लिए 7,500 रुपए, हाईब्रिड मक्का के लिए 11,500 रुपए और मोटे अनाजों की खेती के लिए 7,500 रुपए प्रति हेक्टेयर तक प्रोत्साहन राशि दी जा रही है.

एमएसपी पर दलहन खरीद

सरकार द्वारा दलहन की एमएसपी पर खरीद की जा रही है, जिससे किसानों को अच्छे दाम मिल रहे हैं.

सिंचाई तकनीक के लिए अनुदान

खेती में कम पानी में अच्छी खेती की जा सके, इसके लिए भी सरकार द्वारा ड्रिप सिंचाई तकनीक, फव्वारा सिचाई तकनीक अपनाने के लिए कुसुम योजना चलाई जा रही है. सोलर इनर्जी से बिजली बचत के साथ भी सिंचाई तकनीक का लाभ किसानों को दिया जा रहा है.

जलवायु परिवर्तन के समय पानी खास मुद्दा है, ऐसे में काम पानी में अच्छी पैदावार लेने के लिए नई तकनीक अपनाना जरूरी है, जिससे देश के साथ-साथ किसान का भी विकास होगा.

New Rice Varieties : बाढ़ और रोगों की चुनौती में खरी उतरीं नई धान किस्में

New Rice Varieties : हाल ही में आई बाढ़ के बाद BAU के खेतों में आयोजित फील्ड निरीक्षण के दौरान कुलपति डा. डीआर सिंह ने धान की नई किस्मों (New Rice Varieties) सबौर श्री सब-1, सबौर कतरनी धान-1 और सबौर विभूति धान के प्रदर्शन का जायजा लिया. उन के साथ निदेशक अनुसंधान डा. एके सिंह, निदेशक (बीज और फार्म) डा. फैजा अहमद और धान अनुसंधान दल के अन्य वैज्ञानिक उपस्थित थे.

सबौर श्री सब-1 (BRR0266/IET32122)

मार्कर असिस्टेड ब्रीडिंग के माध्यम से विकसित इस किस्म ने 14 दिनों तक जलमग्न रहने के बावजूद 30–35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की उपज दी, जबकि सामान्य परिस्थितियों में यह 50–55 क्विंटल तक उपज देती है. 140–145 दिनों में परिपक्व होने वाली यह किस्म बिहार के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिए आदर्श है.

सबौर कतरनी धान-1 (BRR0215)

पारंपरिक कतरनी धान किस्म अकसर बारिश और गिरने से नष्ट हो जाती है. यह उन्नत किस्म केवल 110–115 सैंटीमीटर ऊंची है, जिस से इस के गिरने की संभावना कम होती है. साथ ही, यह भागलपुर की GI टैग वाली कतरनी किस्म की सुगंध और गुणवत्ता को भी बरकरार रखती है. इस की उपज 42–45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है और यह 135–140 दिनों में तैयार हो जाती है.

सबौर विभूति धान

इस बार की बाढ़ में 7–8 दिन जलमग्न रहने के बावजूद इस किस्म को केवल 5–10 फीसदी क्षति हुई. इस में बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट (BLB) के खिलाफ 3 प्रतिरोधी जीन मौजूद हैं, साथ ही यह ब्लास्ट रोग को भी सहन करती है. महसूरी-प्रकार की यह अर्धबौनी किस्म 135–140 दिनों में परिपक्व होती है और औसतन 55–60 क्विंटल की उपज देती है. अनुकूल परिस्थितियों में यह 85 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज दे सकती है.

New Rice Varieties

कुलपति डा. डीआर सिंह ने कहा, “हालिया बाढ़ और रोगों की बढ़ती घटनाएं दर्शाती हैं कि ऐसी किस्में समय की मांग हैं. BAU की ये धान किस्में किसानों को जलवायु संकट और रोगों के दबाव से सुरक्षा प्रदान करते हुए उन की आमदनी सुनिश्चित करती हैं.”

डॉ. एके सिंह, निदेशक अनुसंधान ने कहा, “सबौर श्री सब-1, कतरनी धान-1 और विभूति धान वैज्ञानिक अनुसंधान और फील्ड परीक्षण का परिणाम हैं. हाल की आपदाओं में इन की सफलता यह प्रमाणित करती है कि ये किस्में बिहार के किसानों के लिए वरदान हैं.”

बिहार के लिए महत्त्व

बिहार में 30 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में धान की खेती होती है, लेकिन हर साल बाढ़, जलमग्नता और BLB जैसी बीमारियां किसानों की उपज और आय पर असर डालती हैं. BAU सबौर द्वारा विकसित ये उन्नत किस्में न केवल इन समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करती हैं, बल्कि जलवायु के प्रति संवेदनशील कृषि के लिए भी आशा की नई किरण हैं.

इन उपलब्धियों के साथ, BAU सबौर एक बार फिर किसानों की आवश्यकताओं के अनुरूप, नवाचारी और टिकाऊ कृषि समाधान प्रदान करने वाले अग्रणी राष्ट्रीय संस्थान के रूप में अपनी भूमिका को सिद्ध करता है.

धान फसल को कीट व रोगों से बचाकर, लें अधिक उपज

धान फसल : इस समय खरीफ फसलों पर बहुत ही ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है. विशेष कर धान की फसल पर. धान की फसल में खैरा रोग लगने की संभावना इस समय ज्यादा रहती है. खैरा रोग जिंक की कमी के कारण होता है. इस रोग में पत्तियां पीली पड़ जाती हैं, जिस पर बाद में कत्थई रंग के धब्बे बन जाते हैं. इस के प्रबंधन के लिए 2 किलोग्राम जिंक सल्फेट, 8 किलोग्राम यूरिया को 400 लिटर पानी में घोल कर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें.

इसी तरह बदलते मौसम में जीवाणु झुलसा रोग की संभावना भी बढ़ने लगती है, इस रोग में पत्तियां नोक या किनारे से एकदम सूखने लगती है. सूखे हुए किनारे अनियमित और टेढ़ेमेढ़े हो जाते हैं. इस के नियंत्रण हेतु 6 ग्राम स्ट्रैप्टोमाइसिन सल्फेट 90 फीसदी और टेट्रासाइक्लिन हाइड्रोक्लोराइड 10 फीसदी को 200 ग्राम कौपर औक्सीक्लोराइड 50 फीसदी डब्ल्यूपी के साथ 200-300 लिटर पानी में घोल कर प्रति एकड़ की दर से मौसम साफ रहने पर छिड़काव करें. ध्यान रहे यह बीमारी लगने पर फसल में यूरिया का प्रयोग न करें. कभीकभी झोका यानी झुलसा बीमारी भी धान की फसल को क्षति पहुंचाती है, इस रोग में पत्तियों पर आंख के आकार की आकृति के धब्बे बनते हैं, जो मध्य में राख के रंग के और किनारे गहरे कत्थई रंग के होते हैं. पत्तियों के अतिरिक्त बालियों, डंठलों पुष्प शाखाओं और गाठों पर भी काले भूरे धब्बे बनते हैं.

इस के प्रबंधन के लिए कार्बेंडाजिम 50 फीसदी डब्ल्यूपी 200 ग्राम को 200-300 लिटर पानी (पौधे की अवस्थानुसार) में घोल कर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें. जहां पानी की कमी हो वहां दीमक कीट द्वारा नुकसान किया जा सकता है. यह एक सामाजिक कीट है जो कालोनी बना कर रहते हैं. एक कालोनी में 90 फीसदी  श्रमिक, 2-3 फीसदी सैनिक, एक रानी और एक राजा होते हैं. श्रमिक पीलापन लिए हुए सफेद रंग के पंखहीन होते हैं, जो उग रहे बीज, पौधों की जड़ों को खाकर फसल को नुकसान पहुंचाते हैं.

धान फसल

इस के प्रबंधन के लिए एक एकड़ में क्लोरपाइरीफौस 20 ईसी 1 लिटर को सिंचाई के पानी के साथ प्रयोग करें. तना छेदक कीट की भी निगरानी करते रहना चाहिए, इस कीट की मादा पत्तियों पर समूह में अंडे देती हैं. अंडो से सूड़ियां निकल कर तनों में घुसकर मुख्य गोभ को नुकसान पहुंचाती है, जिस के कारण बढ़वार की स्थिति में मृतगोभ और बालियां आने पर सफेद बाली दिखाई पड़ती है.

इस के प्रबंधन के लिए 25 फैरोमोन ट्रैप प्रति एकड़ में 30-30 मीटर की दूरी पर लगाएं. प्रकाश प्रपंच का प्रयोग करें. रोपाई के 30 दिन बाद (ट्राइकोकार्ड ) ट्राईकोग्रामा जैपोनिकम 50 हजार प्रति एकड़ प्रति सप्ताह की दर से 2-6 सप्ताह तक धान की फसल में छोड़ें. यह एक प्रकार का छोटा कीट है ,जिस के अंडे प्रयोगशाला में तैयार किए जाते हैं, जिसे कार्ड पर चिपका दिया जाता है. इसे पौधों की पत्तियों पर जगहजगह स्टेपलर से लगा देते है, जिस से कीट निकल कर तना छेदक के अंडों को नुकसान पहुंचाते हैं. इन सभी उपायों के अलावा धान की अधिक उपज लेने के लिए समयसमय पर खेत की निगरानी करते रहें और कीट व बीमारियों की पहचान कर उन का प्रबंधन करें.

Rice Planter : बड़े काम का धान रोपने का यंत्र

Rice Planter: आमतौर पर धान की खेती करने के लिए धान पौध की रोपाई परंपरागत तरीकों से की जाती है. हाथ से रोपाई करने का काम बहुत थकाने वाला होता है. धान की रोपाई में कई घंटों तक झुक कर रोपाई करनी होती है, जिस से बहुत परेशानी होती है. दूसरी तरफ आजकल मजदूरों की भी काफी कमी है. इन सब परेशानियों से बचने के लिए अब ज्यादातर किसान धान की रोपाई हाथ की जगह मशीनों से कर रहे हैं.

धान की रोपाई के लिए कई तरह के रोपाई यंत्र बाजार में मौजूद हैं. इन में हाथ से ले कर पैट्रोलडीजल से चलने वाले प्लांटर तक मौजूद हैं, जो 4, 6 और 8 कतारों में धान की रोपाई करते हैं. इन से रोपाई करने पर समय की बचत होती है और लागत भी कम आती है. रोपाई यंत्र एक निश्चित दूरी पर पौधों की रोपाई करता है, जिस से पैदावार अच्छी मिलती है.

धान रोपाई की सेल्फ प्रोपैल्ड

मशीन (चीनी डिजाइन)

आज के समय में किसानों में यह यंत्र खास पसंद किया जा रहा है. यह 8 कतारों में धान की बोआई करता है. यह धान की पौध को उठा कर बोआई करता है. इस में 3 एचपी का डीजल इंजन लगा होता है.

इस से कतार से कतार की दूरी 10-12 सेंटीमीटर रखी जा सकती है. साथ ही, मशीन के हैंडल को दाएंबाएं भी घुमाया जा सकता है व पौध रोपने के लिए यंत्र की गहराई को भी बढ़ायाघटाया जा सकता है.

1 दिन में यह 1 हेक्टेयर खेत में धान की रोपाई कर सकता है. इस की कीमत करीब 1,25,000 रुपए के आसपास है.

जापानी पैडी प्लांटर

इस जापानी पैडी प्लांटर से मात्र 1 लीटर पैट्रोल से महज डेढ़ घंटे में 1 एकड़ खेत में धान की रोपाई की जा सकेगी. इस मशीन की खासीयत यह है कि अकेला किसान ही इस मशीन को चला सकता है.

मध्य प्रदेश सरकार ने पैडी प्लांटर मशीन के जरीए धान की रोपाई करने को बढ़ावा देने के लिए खास योजना भी बनाई है. मध्य प्रदेश के कृषि विभाग द्वारा इस मशीन का डेमो भी दिया जा रहा है.

मध्य प्रदेश के कृषि विभाग से मिली जानकारी के अनुसार अभी पैडी प्लांटर की कीमत 2 लाख, 50 हजार रुपए है. सरकार किसानोें को 1 लाख, 44 हजार रुपए तक की अधिकतम सब्सिडी देगी. किसानों को महज 1 लाख, 06 हजार रुपए ही देने होंगे.

पैडी प्लांटर से संबंधित अधिक जानकारी के लिए कुबोटा स्वप्निल से उन के मोबाइल नंबर पर 08754569228 पर बात कर सकते हैं.

महेंद्रा एंड महेंद्रा का पैडी प्लांटर

कृषि यंत्रों को बनाने वाली इस कंपनी की भी धान रोपाई की स्वचालित मशीन मौजूद है. यह मशीन 1 घंटे में 1 एकड़ खेत में धान की रोपाई करती है, जिस में 2 लीटर पैट्रोल की खपत होती है. इस मशीन को चलाने के लिए 2 व्यक्तियों की जरूरत होती है.

आरसी एग्रो का पैडी प्लांटर

इस कंपनी में काम करने वाले आशीष गुप्ता ने बताया कि उन के पास इस धान रोपाई यंत्र के 2 मौडल मौजूद हैं.

पहला मौडल 6 लाइनों में धान की रोपाई करता है. रोपाई करते समय पौधे से पौधे की दूरी घटाईबढ़ाई जा सकती है, जो अधिकतम 12 इंच तक कर सकते हैं. इस मौडल में 4 स्पीड गियर हैं. इस मशीन में 6.5 हार्सपावर का डीजल इंजन लगा होता है. मशीन से काम करने के लिए 3 लोगों की जरूरत होती है. एक मशीन को चलाता है और उस के सहयोगी रोपाई की देखभाल के लिए साथ रहते हैं. तीनों के लिए प्लांटर पर बैठने की जगह भी होती है. मशीन की कीमत 1 लाख, 60 हजार रुपए से ले कर 1 लाख, 80 हजार रुपए तक है.

दूसरा मौडल 8 लाइनों में रोपाई करता है. इस मौडल में भी पौधे से पौधे की दूरी घटाईबढ़ाई जा सकती है. इस मशीन की कीमत 1 लाख, 85 हजार रुपए है. मशीन में हाइड्रोलिक सिस्टम होने के कारण कीमत में उतारचढ़ाव होता है.

आरसी एग्रो कंपनी पारंपरिक खेती को आधुनिक खेती की ओर अग्रसर करने की दिशा में काम कर रही है. यह कंपनी किसानों के लिए कंबाइन हार्वेस्टर, हैंड हार्वेस्टर व बेलर (बंडल बनाने की मशीन) जैसे कृषि यंत्र बनाती है. अधिक जानकारी के लिए किसान कंपनी के फोन नंबरों 91-7714062177, 2582431 व मोबाइल नंबर 9425513061 पर बात कर सकते हैं या कंपनी के कर्मचारी आशीष गुप्ता से उन के मोबाइल नंबर 09827162692 पर संपर्क कर सकते हैं.

Paddy : सही समय पर करें काम अच्छा पैदा हो धान

Paddy : सही तकनीक का इस्तेमाल कर के किसान न केवल इस तरह की समस्याओं से बच सकते हैं, बल्कि ज्यादा उपज भी ले सकते हैं.

यहां हम बासमती धान की खेती कलैंडर पर रोशनी डाल रहे हैं, ताकि किसान अपने कामों को समय पर अंजाम दें और अच्छी उपज पाएं.

1 से 15 जून

बीज भरोसेमंद जगह से ही खरीदें. बीजोपचार जरूर करें. 5 किलो बीज के लिए 5 ग्राम एमीसान व एक ग्राम स्ट्रैप्टोसायक्लीन का 10 लिटर पानी में घोल बनाएं. 24 घंटे तक बीज को उस में डुबोएं. टब एल्यूमिनियम का न हो. थोड़ा बीज का नमूना और थैला सुरक्षित रखें.

16 से 30 जून

अगर पौध पीली पड़ती दिखाई दे तो 3 फीसदी फेरस सल्फेट का छिड़काव करें. पौध उखाड़ने के एक हफ्ते पहले एक बार किसी फफूंदीनाशक का छिड़काव करें. पौधशाला में सिंचाई शाम के समय में करें.

1 से 15 जुलाई

जिन किसानों की धान की पौध 20-25 दिन की हो गई हो, वे सिंचाई करें और सावधानी से पौध उखाड़ कर उस की रोपाई करें. रोपाई के समय 4-5 सैंटीमीटर से ज्यादा पानी न रखें. एक वर्गमीटर में 25-30 पौधे लगाएं. रोपाई 15 जुलाई से पहले खत्म कर लें. पूसा बासमती-1509 की रोपाई 15 जुलाई के बाद ही करें.

16 से 31 जुलाई

सिंचाई व खरपतवार का ध्यान रखें. नाइट्रोजन की पहली खुराक का बुरकाव करें. जहां पौध मर गए हैं, वहां नई पौध लगा दें. खेत की मेंड़ को साफ रखें. अच्छा रहेगा कि फफूंदीनाशक का छिड़काव मेंड़ पर भी कर दें.

1 से 15 अगस्त

इस समय धान की फसल पर तना छेदक, पत्ती मोड़क, हरा तेला, सफेद पीठ वाला तेला कीट का हमला हो सकता है इसलिए किसान खेत की लगातार जांच करें. फैरोमौन प्रपंच यानी ट्रैप फसल के बीचोंबीच लगा सकते हैं ताकि पीला तना छेदक नर पतंगे खत्म हो जाएं. कीटों के पाए जाने पर ट्राइकोग्रामा कार्ड 1-3 प्रति एकड़ की दर से लगा सकते हैं. दवा का छिड़काव तभी करें, जब उन की तादाद ज्यादा हो.

16 से 31 अगस्त

खरपतवार की समय से पहले रोकथाम करें और नाइट्रोजन की बाकी बची मात्रा डालें. मेंड़ को साफ रखें व एक बार फिर किसी फफूंदीनाशक का छिड़काव करें.

इस दौरान धान में पत्ती लपेटक कीट का हमला देखा जाता है. अगर हमला ज्यादा हो तो कार्बोफ्यूरान 3जी/6 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से बुरकाव करें.

1 से 30 सितंबर

धान में पत्ती लपेटक कीट की जांच करें. इस समय धान की फसल को चौपट करने वाले ब्राउन प्लांट होपर यानी भूरा फुदका का हमला शुरू हो सकता है.

किसान खेत के अंदर जा कर पौधों के तनों के निचले भाग पर मच्छर जैसे कीट की जांच करें.

धान में ब्लास्टर यानी बदरा बीमारी का हमला होने की निगरानी भी हर 2-3 दिन के अंतर पर करें. शुरू में पत्तियों पर सूई की नोक के बराबर गोल तांबे के रंग के धब्बे बनना इस बीमारी की निशानी है. 2-3 दिन के अंदर ये धब्बे लंबाई में बढ़ कर आंख के आकार के हो जाते हैं.

अगर इस कीट की समय पर रोकथाम न की जाए तो बाली के नीचे के हिस्से पर इस का असर पड़ता है. इसे आम भाषा में गरदन तोड़ कहते हैं.

इस की रोकथाम के लिए बाविस्टीन 2 ग्राम प्रति लिटर की दर से 3 बार छिड़काव करें. पहली बार रोपाई के 30-40 दिन बाद, दूसरा छिड़काव पहले छिड़काव से 20-25 दिन बाद और तीसरा, दूसरे छिड़काव से 20-25 दिन बाद करने से बीमारियों की रोकथाम की जा सकेगी. जैसे ही बीमारी का लक्षण दिखाई दे, तुरंत छिड़काव करें.

इस समय धान में आभासी कंड यानी हलदी बीमारी आने की काफी संभावना है. इस बीमारी के आने से धान के दाने फूल जाते हैं और पीले रंग के हो जाते हैं. इस की रोकथाम के लिए ब्लाइटौक्स-50 की 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर मात्रा को पानी में मिला कर 10 दिन के अंतर पर 2 बार बालियां आने से पहले छिड़काव करें. खेत में पानी जमा न होने दें.

इसी समय ब्राउन प्लांट होपर यानी भूरा फुदका का हमला शुरू हो सकता है. किसान खेत की नियमित निगरानी करते रहें और कीटों की ज्यादा तादाद होने पर मोनोक्रोटोफास 2 एमएल प्रति लिटर पानी की दर से जहां कीट हो, वहां छिड़काव करें.

1 से 30 अक्तूबर

दाना पकने पर खेत में दूसरी किस्मों के पौधे दिखाई दें तो उन्हें निकाल दें. अगर फसल में दूसरी जाति के दाने होते हैं तो भाव कम कर दिया जाता है.

पछेते धान में इस मौसम में एक सिंचाई जरूर करें. मौसम को ध्यान में रखते हुए किसानों को यह सलाह है कि धान की पकने वाली फसल को कटाई से 2 हफ्ते पहले सिंचाई लगाना बंद कर दें. फसल कटाई के बाद फसल को 2-3 दिन खेत में सुखा कर गहाई कर लें. उस के बाद दानों को अच्छी तरह से सुखा कर ही मंडी ले जाएं या स्टोर करें.

धान (Paddy) की कटाई और भंडारण

दुनिया में भारत धान की पैदावार करने में चीन के बाद दूसरा सब से बड़ा देश है. देश में लगभग 50 फीसदी से ज्यादा  लोग चावल का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन धान की कटाई से ले कर उस का सही ढंग से रखरखाव करने तक लगभग 10 फीसदी धान का नुकसान किसानों को होता है. इस की सब से बड़ी वजह किसानों को सही जानकारी न होना है.

फसल की कटाई और इस के बाद होने वाले नुकसान को कम करने की जरूरत आज के समय में पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बेहद जरूरी है. आमतौर पर देखा जाता है कि कटाई, मड़ाई, सुखाना और फिर फसल को रखने के दौरान नुकसान ज्यादा होता है. इस नुकसान से बचने के लिए वैज्ञानिक तरीके अपनाना जरूरी है. इन्हीं कुछ तरीकों के बारे में हम आप को बता रहे हैं, जिस से आप की मेहनत की कमाई बेकार न जाए.

धान की कटाई

धान की कटाई किसान खुद करते हैं या फिर मजदूरी दे कर फसल को कटवाते हैं. इस के अलावा अब कई तरह की मशीनें भी लोगों के पास आ गई हैं, जिन से फसल कटवाना आसान हो गया है. मशीनों से समय भी काफी कम लगता है.  रीपर, कंबाइन व हारवेस्टर आदि ऐसी ही मशीनें हैं. मजदूरों से फसल की कटाई कराने में इसलिए ज्यादा समय लगता है, क्योंकि मजदूर धान की कटाई पारंपरिक तरीके यानी हंसियां से करते हैं. इस में समय ज्यादा लगता है, लेकिन फायदा ज्यादा होता है.

हंसिया से कटाई में फसल का काफी कम नुकसान होता है और धान का पुआल भी किसानों को मिल जाता है, जो पशुओं को खिलाने के काम आता है. इस के अलावा ईंधन और रसायन निर्माण में पुआल का इस्तेमाल किया जाता है. साथ ही पुआल बेच कर किसान अपनी आय भी बढ़ा सकते हैं. लेकिन हंसिया से कटाई कराने में काफी समय लगता है, जिस से कटाई का खर्च ज्यादा आता है.

मशीनों में रीपर और ट्रैक्टर चालित कंबाइनर का इस्तेमाल धान की कटाई में किया जाता है. मशीन धान काट कर लाइन में लगा देती है, जिसे बाद में इकट्ठा करने में आसानी रहती है. कंबाइनर से धान की कटाई जमीन से काफी ऊपर से की जाती है और कटाई के साथसाथ मड़ाई और औसाई भी हो जाती है. कटाई की कंबाइनर मशीनें कई तरह की आती हैं, कुछ सस्ती और कुछ महंगी भी. कंबाइनर से धान की कटाई में पुआल का नुकसान होता है और काफी धान टूट भी जाता है.

धान टूटने से किसानों को उस की सही कीमत नहीं मिल पाती, जिस से बाजार कीमत से कम में धान बेचना किसानों की मजबूरी बन जाती है, लेकिन कंबाइनर से कटाई काफी जल्दी होती है, जिस से समय की बचत होती है साथ ही लागत भी कम आती है.

कटाई के समय निम्न बातों का ध्यान रखें :

*             फसल की कटाई उचित नमी और सही समय पर ही करनी चाहिए. धान की कटाई के लिए 20-22 फीसदी नमी सही रहती है. इस से ज्यादा नमी होने पर चावल कम मिलता है और कच्चे, टूटे और कम गुणवत्ता के दाने ज्यादा मात्रा में होते हैं. कम नमी पर कटाई करने से मिलिंग के दौरान धान टूट कर गिरने लगता है.

* फसल की कटाई देर से करने पर फसल जमीन पर गिर सकती है, जिस से चूहों, चिडि़यों और कीटों से फसल को नुकसान हो सकता है.

* यदि खेत में पानी भरा हो तो कटाई से 7-10 दिन पहले पानी निकाल देना चाहिए, जिस से कटाई आसानी से हो सके.

* कटाई के समय धान की सभी बालियों को एक दिशा में रखना चाहिए ताकि मड़ाई में दिक्कत न हो.

* कटाई के बाद धान को बारिश और ओस से बचाना चाहिए.

* धान को कटाई के बाद ज्यादा सुखाने से बचना चाहिए.

* धान की किस्मों के अनुसार कटाई करवानी चाहिए, जैसे अगेती किस्में 110-115 दिनों बाद, मध्यम किस्में 120-130 दिनों बाद और देर से पकने वाली किस्में लगभग 130 दिनों के बाद काटने लायक हो जाती हैं.

Paddyधान की मड़ाई

धान की बालियों यानी पुआल से बीजों को अलग करना मड़ाई कहलाता है. मड़ाई का काम मजदूरों, पशुओं और मशीनों से भी किया जाता है. मड़ाई का काम फसल कटाई के बाद जितनी जल्दी हो सके कर लेना चाहिए. मजदूरों द्वारा मड़ाई लकड़ी या लोहे के पाइप से की जाती है. 2-3 बार लकड़ी या लोहे से कूटने से धान के बीज पौधों से अलग हो जाते हैं. मड़ाई के लिए तारों से बने ड्रम का भी इस्तेमाल होता है. धान के पौधों को ड्रम पर इस तरह रखा जाता है कि बालियां तार को छूती रहें और ड्रम को पैर से घुमाया जाता है.

इस तरीके से मजदूरों की मड़ाई क्षमता बढ़ जाती है. मड़ाई का काम बैलों से भी किया जाता है. धान की बालियों को जमीन पर फैलाया जाता है और इस के ऊपर बैलों को घुमाया जाता है. उन के पैर के दबाव से धान पौधों से अलग हो जाता है.

इस के अलावा थ्रेसर से भी धान की मड़ाई की जाती है. मड़ाई में किसी वजह से देरी हो रही हो, तो धान का बंडल बना कर सूखी और छायादार जगह पर रखना चाहिए.

ओसाई

मड़ाई के बाद धान के बीजों के साथ भूसा, धूल के कण, बदरा और पुआल के टुकड़े रह जाते हैं. इसे हटाने के लिए धान की ओसाई की जाती है. ओसाई का काम उस समय भी किया जाता है, जब हवा चल रही हो. यदि हवा बंद हो जाए, तब 2 लोग चादर को तेजी के साथ झलते हैं, जिस से हवा निकलती है और ओसाई हो जाती है. आजकल बाजार में ओसाई के लिए बिना बिजली के बड़े पंखे आते हैं, जिन्हें हाथों से चलाया जाता है और ओसाई हो जाती है.

धान की सुखाई

धान की कटाई 20-22 फीसदी नमी पर की जाती है, लेकिन इतनी नमी में धान को रखा नहीं जा सकता है और न ही मिलिंग की जा सकती है. इसलिए धान की नमी कम करना बहुत जरूरी है. इस के लिए धान को पहले धूप में रख कर सुखाया जाता है. इस के लिए घर की छतों के फर्श, चटाई, तिरपाल, प्लास्टिक शीट आदि पर फैला कर कई दिनों तक धान के बीजों को सुखाया जाता है. धान को ज्यादा तेज धूप में नहीं सुखाना चाहिए. सुखाने के लिए सीमेंट के फर्श और तिरपाल का इस्तेमाल करना चाहिए.

कटाई के बाद जितनी जल्दी हो सके धान को सुखा लेना जरूरी है.

सुखाते समय धान को पक्षियों, चूहों और कीटपतंगों से बचाना चाहिए, क्योंकि इस से काफी नुकसान हो जाता है.

Paddy

धान का भंडारण

घर में पूरे साल धान मौजूद रहे, इस के लिए जरूरी है कि उसे रखने के लिए घर में अच्छी व्यवस्था हो. भंडारण के पहले धान में नमी की मात्रा देख लेनी चाहिए. यदि आप को अधिक समय के लिए भंडारण करना है, तो नमी की मात्रा 12 फीसदी और कम समय के लिए 14 फीसदी होनी चाहिए.

भंडारण से पहले या बाद में धान का कीटों से बचाव करना भी जरूरी है. भंडारण लिए कई तरह के ड्रम या कोठी इस्तेमाल किए जाते हैं. ये मिट्टी, लकड़ी, बांस, जूट की बोरियों, ईंटों व कपड़े आदि से बनाए जाते हैं, लेकिन इस तकनीक से ज्यादा समय तक भंडारण करना संभव नहीं है, क्योंकि इन में हवा जाने की कोई जगह नहीं होती.

ज्यादा समय तक भंडारण के लिए पूसा कोठी, धात्विक बिन व साइलो आदि का इस्तेमाल किया जा सकता है. फसल खराब न हो, इस के लिए समयसमय पर ऐसा बंदोबस्त करना चाहिए, जिस से कि हवा जाती रहे वरना धान खराब हो सकता है.

सितंबर (September) महीने के खास काम

जिन किसानों ने धान की खेती की है, वे फसल में नाइट्रोजन की दूसरी व अंतिम टौप ड्रैसिंग बाली बनने की प्रारंभिक अवस्था यानी रोपाई के 50-55 दिन बाद कर दें. वहीं अधिक उपज वाली धान की प्रजातियों में प्रति हेक्टेयर 30 किलोग्राम नाइट्रोजन यानी 65 किलोग्राम यूरिया और सुगंधित प्रजातियों में प्रति हेक्टेयर 15 किलोग्राम नाइट्रोजन यानी 33 किलोग्राम यूरिया का प्रयोग करें.

धान में बालियां फूटने और फूल निकलने के दौरान यह सुनिश्चित करें कि खेत में पर्याप्त नमी हो. धान की फसल को भूरा फुदका से बचाने के लिए खेत से पानी निकाल दें. इस कीट का प्रकोप पाए जाने पर नीम औयल 1.5 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें.

सरसों की अगेती किस्मों, जो कि खरीफ और रबी के मध्य में बोई जाती हैं, की बोआई 15 से 30 सितंबर (September) के बीच अवश्य कर दें. साथ ही, बीजजनित रोगों से बचाव और सुरक्षा के लिए प्रमाणित बीज ही बोएं.

बीजशोधन के लिए थीरम व कारवैक्सिन का मिश्रण 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के अनुसार उपचारित करें. मैंकोजेब या बावस्टीन का 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से भी उपचारित किया जा सकता है.

सरसों की फसल में खरपतवार नियंत्रण के लिए बोआई से पहले 2.2 लिटर प्रति हेक्टेयर फ्लूक्लोरोलिन का 600-800 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें.

यदि बोआई से पहले खरपतवार नियंत्रण नहीं किया गया है, तो 3.3 लिटर पेंडीमिथेलीन (30 ईसी ) को 600-800 लिटर पानी में घोल कर बोआई के 1-2 दिन बाद छिड़काव करें.

सरसों की अगेती किस्मों पूसा सरसों-25, पूसा सरसों-26, पूसा सरसों-27, पूसा सरसों- 28, पूसा अगर्णी, पूसा तारक व पूसा महक की बोआई की जा सकती है.

रबी के सीजन में गेहूं की खेती करने वाले किसान आलू की अगेती किस्मों की बोआई सितंबर (September) महीने में कर के ज्यादा फायदा ले सकते हैं. इन किस्मों में कुफरी बादशाह, कुफरी सूर्या, कुफरी चंद्रमुखी, कुफरी अलंकार, कुफरी पुखराज, कुफरी ख्याति, कुफरी अशोका, कुफरी जवाहर आदि शामिल हैं. इन के पकने की अवधि 80 से 100 दिन है.

आलू की खेती करने वाले किसान इस माह पछेती गेहूं की खेती कर सकते हैं. आलू की बोआई 25 सितंबर (September)  से शुरू की जा सकती है.

मटर की अगेती किस्मों की खेती कर किसान अतिरिक्त लाभ ले सकते हैं, क्योंकि ये किस्में 50 से ले कर 60 दिनों में तैयार हो जाती हैं. इसलिए इस के बाद दूसरी फसल आसानी से ली जा सकती है.

अगर किसान मटर की अगेती खेती करना चाहते हैं, तो इस की बोआई 15 सितंबर (September) से 15 अक्तूबर के बीच कर सकते हैं. किसान भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित की गई मटर की आजाद मटर-3, काशी नंदिनी, काशी मुक्ति, काशी उदय और काशी की अगेती  बोआई कर सकते हैं.

टमाटर, विशेषकर संकर प्रजातियों व गांठगोभी के बीज की बोआई नर्सरी में करें. इस के अलावा सब्जियों की खेती करने वाले किसान फूलगोभी की पूसा सुक्ति, पूसा पौषिजा प्रजातियों की नर्सरी डालने के साथ ही मध्यवर्गीय फूलगोभी जैसे इंप्रूव्ड जापानी, पूसा दीपाली, पूसा कार्तिक की रोपाई के लिए पूरा महीना ही मुफीद है, वहीं पत्तागोभी की किस्मों में  गोल्डन एकर, पूसा कैबेज हाइब्रिड-1 की नर्सरी डाली जा सकती है.

पत्तागोभी की अगेती किस्में जैसे-पूसा हाइब्रिड-2 और गोल्डन एकर की बोआई 15 सितंबर (September)  तक व पछेती किस्में जैसे पूसा ड्रमहेड, संकर क्विस्टो की बोआई 15 सितंबर (September)  के बाद शुरू की जा सकती है.

शिमला मिर्च की रोपाई पौध के 30 दिन के होने पर 50-60-40 सैंटीमीटर की दूरी पर करें. मूली की एशियाई किस्मों जैसे जापानी ह्वाइट, पूसा चेतकी, हिसार मूली नंबर 1, कल्याणपुर-1 की बोआई इसी माह में शुरू की जा सकती है.

मेथी की अगेती फसल लेने के लिए मध्य सितंबर (September) से बोआई शुरू की जा सकती है. इस के लिए प्रति हेक्टेयर 25-30 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होगी.

अगर बरसात कम या समाप्त हो गई हो, तो हरी पत्ती के लिए धनिया की प्रजाति पंत हरीतिमा, आजाद धनिया-1 की इस माह बोआई कर सकते हैं.

पालक की उन्नत किस्म पूसा भारती की बोआई इस माह की जा सकती है.

गाजर की पूसा वृष्टि किस्म की बोआई इसी माह में शुरू करें. इस के अलावा जिन सब्जियों की खेती की जा सकती है, उस में शलगम, सौंफ के बीज, सलाद, ब्रोकोली को भी शामिल किया जा सकता है.

सितंबर (September)  माह में तैयार बैगन, मिर्च, खीरा व भिंडी की फसल लेने वाले किसान फसल की जरूरत के मुताबिक निराईगुड़ाई व सिंचाई करें और तैयार फलों को तोड़ कर बाजार में भेजें.

जिन किसानों ने मक्के की फसल ले रखी है, वह अधिक बरसात होने पर अतिरिक्त जलनिकासी की पुख्ता व्यवस्था करें. फसल में नरमंजरी निकलने की अवस्था में और दाने की दूधियावस्था सिंचाई की दृष्टि से बहुत ही महत्त्वपूर्ण है. यदि पिछले दिनों में बरसात न हुई हो या नमी की कमी हो, तो सिंचाई अवश्य करें.

ज्वार की खेती करने वाले किसान अच्छी उपज हासिल करने के लिए बरसात नहीं होने या नमी की कमी होने पर बाली निकलने के समय व दाना भरते समय सिंचाई जरूर करें, वहीं बाजरा की उन्नत और संकर प्रजातियों में 87-108 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से यूरिया की टौप ड्रैसिंग बोने के 25-30 दिन बाद करें.

जिन किसानों ने मूंग और उड़द की खेती की है, वे बरसात न होने पर कलियां बनते समय पर्याप्त नमी बनाए रखने के लिए सिंचाई करें.

अगर मूंग और उड़द की फसल में फली छेदक कीट की सूंडि़यों का प्रकोप है, तो उस की रोकथाम के लिए निंबौली का 5 फीसदी 1.25 लिटर मात्रा का प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

सोयाबीन की फसल लेने वाले किसान सितंबर (September)  माह में बरसात न होने पर फूल व फली बनते समय सिंचाई जरूर करें.

सूरजमुखी की खेती करने वाले किसान यह ध्यान दें कि सूरजमुखी के फूल में नर भाग पहले पकने के कारण परपरागण का काम मधुमक्खियों द्वारा होता है, इसलिए खेत या मेंड़ों पर बक्सों में मधुमक्खीपालन किया जाए. अधिक बीज बनने से उपज में बढ़वार होगी और अतिरिक्त आय भी होगी.

फलों की बागबानी से जुड़े किसान सितंबर (September) में वयस्क आम के पौधों में उर्वरक की 500 ग्राम नाइट्रोजन, 250 ग्राम फास्फोरस, 500 ग्राम पोटाश को प्रति पौधे की दर से डालें.

आम में एंथ्रेक्नोज रोग से बचाव के लिए कौपर औक्सीक्लोराइड 50 फीसदी घुलनशील चूर्ण की 3 ग्राम मात्रा एक लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें.

आंवले में फल सड़न रोग की रोकथाम के लिए कौपर औक्सीक्लोराइड 3 ग्राम प्रति लिटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें, वहीं नीबूवर्गीय फलों में यदि डाईक, स्केब व सूटी मोल्ड बीमारी का प्रकोप पाए जाने पर कौपर औक्सीक्लोराइड 3 ग्राम प्रति लिटर पानी की दर से छिड़काव करें.

केले और पपीते की खेती करने वाले किसान पौधों की रोपाई का काम इस महीने जरूर पूरा कर लें. जिन लोगों ने केले के पौधों को पहले ही रोप दिया है, वे केले में प्रति पौधा 55 ग्राम यूरिया पौधे से 50 सैंटीमीटर दूर घेरे में प्रयोग कर हलकी गुड़ाई कर के जमीन में मिला दें, वहीं इस माह के शुरू में अमरूद की बरसाती फसल को तोड़ कर बाजार भेजें.

स्ट्राबेरी के पौधों की रोपाई 10 सितंबर (September) से शुरू की जा सकती है. अगर उस समय तापमान अधिक हो, तो 20 सितंबर (September)  के बाद रोपाई करें.

रोपण करते समय यह ध्यान रहे कि पौधे स्वस्थ यानी कीट व रोगों से रहित होने चाहिए. इस की उन्नतशील किस्में चांडलर, फैस्टिवल, विंटर डौन, फ्लोरिना, कैमा रोजा, ओसो ग्रांड, ओफरा, स्वीट चार्ली, गुरिल्ला, टियोगा, सीस्कैप, डाना, टोरे, सेल्वा, बेलवी, फर्न, पजारो हैं.

फूलों की खेती में रुचि रखने वाले किसान रजनीगंधा के स्पाइक की कटाईछंटाई का काम इस माह पूरा करें.

जो लोग ग्लैडियोलस की खेती करना चाहते हैं, वे रोपाई की तैयारी पूरी कर लें. इस के लिए प्रति वर्गमीटर 10 किलोग्राम गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद को 200 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट व 200 ग्राम म्यूरेट औफ पोटाश के साथ मिला कर रोपाई के 15 दिन पहले अच्छी तरह मिला दें.

गेंदे की शरद ऋतु वाली किस्मों की रोपाई इसी माह में शुरू कर दें. इस की नर्सरी डालने का उचित समय 10-15 सितंबर (September)  है.

इस के अलावा किसान इसी माह मशरूम उत्पादन से जुड़ी तैयारियां शुरू कर दें. उस में काम आने वाले उपकरण, कंपोस्ट आदि के लिए आवश्यक सामग्री जुटाना समय से काम शुरू किए जाने में मददगार होगा.

सितंबर (September)

अगर आप पशुपालक हैं, तो पशुओं को जानलेवा खुरपका व मुंहपका रोग से बचाव के लिए उन का टीकाकरण कराएं. अगर आप का पशु इस रोग से ग्रसित हो गया है, तो पशुओं के घाव को पोटैशियम परमैग्नेट से धोएं और बीमार पशु को तत्काल स्वस्थ पशुओं से दूर रखें. उन का दानापानी भी अलग दें. साथ ही, बीमार पशु को बांध कर रखें और उन्हें घूमनेफिरने न दें.

यह सुनिश्चित करें कि पशु को सूखे स्थान पर ही बांधा जाए. उसे  कीचड़, गीली मिट्टी व गंदगी से दूर रखें. जहां पशु की लार गिरती है, वहां पर कपड़े धोने का सोडा व चूने का छिड़काव करें. पशुओं के नवजात बच्चों को खीस यानी पैदा होने के बाद उस की मां का गाढ़ा दूध जरूर पिलाएं.

जो लोग मुरगीपालन के व्यवसाय से जुड़े हैं, वे सुनिश्चित करें कि दाने में सीप का चूरा अवश्य मिलाया जा रहा हो. इस से मुरगियों में कैल्शियम की मात्रा बढ़ती है. इस के अलावा मुरगियों के पेट के कीड़ों को मारने वाली दवा दें. पोल्ट्री फार्म में कम से कम 14-16 घंटे रोशनी बनी रहे. पोल्ट्री फार्म के बिछावन, जिसे डीप लिटर कहते हैं, को नियमित रूप से उलटतेपलटते रहें.

जो लोग मछलीपालन के व्यवसाय से जुड़े हैं, वे तालाब में पानी की पर्याप्त मात्रा बनाए रखने के लिए उस की गहराई कम से कम 1 मीटर तक जरूर रखें. गोबर की खाद व अकार्बनिक खादों का तालाबों में प्राकृतिक भोजन की उर्वरता बढ़ाने के लिए प्रयोग करें. साथ ही, तालाब में प्राकृतिक भोजन की जांच करें और जरूरत के मुताबिक पूरक आहार संचित मछलियों को प्रतिदिन देते रहें. इस के अलावा मछलीपालक समयसमय पर जाल डाल कर तालाब में पल रही मछलियों की बढ़वार की जांच करते रहें.

फसल बदली तो संजीव की होने लगी लाखों की कमाई

ग्वालियर : संजीव पहले धान की पारंपरिक खेती करते थे. जीतोड़ मेहनत के बावजूद उन्हें अपनी खेती से उतनी आमदनी नहीं हो पाती थी, जितनी वे उम्मीद रखते थे. ऊपर से यदि मानसून दगा दे जाए, तो उत्पादन और घट जाता है. संजीव ने फसल में बदलाव क्या किया, उन की जिंदगी ही बदल गई. प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना ने उन के जीवन में सुखद बदलाव लाने में अहम भूमिका निभाई है.

ग्वालियर जिले के भितरवार विकासखंड के ग्राम गोहिंदा के रहने वाले प्रगतिशील किसान संजीव बताते हैं कि धान की फसल में लागत ज्यादा और आमदनी कम होती थी. जब तमाम प्रयासों के बावजूद आशा के मुताबिक आमदनी नहीं बढ़ी, तब हम ने उद्यानिकी फसल की ओर कदम बढ़ाए. इस के लिए हम ने उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों से तकनीकी मदद ली. उन की सलाह पर हम ने “प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना” के तहत ड्रिप विथ मल्चिंग पद्धति से बैगन उत्पादन शुरू किया.

संजीव बताते हैं कि एक हेक्टेयर रकबे में हम ने इस पद्धति से बैगन की खेती शुरू की. इस पर लगभग एक लाख, 55 हजार रुपए की लागत आई, जिस में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत 70,000 रुपए का अनुदान भी मिला.

संजीव का कहना है कि जब हम अपने एक हेक्टेयर खेत में धान उगाते थे, तब एक लाख रुपए की लागत आती थी और हमें लगभग एक लाख, 92 हजार रुपए की आय होती थी. इस में अगर हम अपनी मेहनत जोड़ लें, तो आमदनी न के बराबर होती. अब हमें उसी एक हेक्टेयर रकबे में ड्रिप विथ मल्चिंग पद्धति से बैगन की खेती करने पर लागत निकाल कर 5 लाख रुपए की शुद्ध आमदनी हो रही है.

वे बताते हैं कि धान का उत्पादन 55 क्विंटल प्रति हेक्टेयर था, वहीं बैगन का उत्पादन 700 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो रहा है. ड्रिप विथ मल्चिंग पद्धति से बैगन उत्पादन में 2 लाख रुपए प्रति हेक्टेयर का खर्चा आता है और 7 लाख रुपए की आय होती है. इस प्रकार हमें 5 लाख रुपए की आमदनी एक हेक्टेयर रकबे से होने लगी है.

आमदनी बढ़ने से संजीव के चेहरे पर आई खुशी देखते ही बनती है. वे कहते हैं कि प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना ने हमजैसे जरूरतमंद किसानों का जीवन संवार दिया है.

समय हो कम तो ड्रम सीडर (Drum Seeder) से करें धान की सीधे बोआई

धान की खेती आमतौर पर धान की पौध की रोपाई कर के की जाती है, लेकिन इस काम के लिए कुशल मजदूरों की कमी के चलते धान की रोपाई में अधिक खर्चा व समय भी अधिक लगता है. सही समय पर मजदूर नहीं मिलना भी एक बड़ी समस्या है. मजदूर मिलते भी हैं, तो अधिक मजदूरी की मांग होती है, जिस से धान की खेती की लागत बढ़ जाती है. ऐसी स्थिति आने  पर अब किसान खेत में धान की छिटकवां विधि से सीधे बोआई करने लगे हैं या बीज की बोआई के लिए ड्रम सीडर जैसे कृषि यंत्रों का भी सहारा लेने लगे हैं.

धान की इस तरह छिटकवां विधि से बोआई करने पर खेत में जमे हुए धान के पौधे एकसमान नहीं उगते या पौधों के बीच कहीं अधिक दूरी तो कहीं कम दूरी पर पौधे उगते हैं. पौधों के उगने की इस असमानता की वजह से धान की खेती से अच्छी उपज  नहीं मिल पाती है.

इस समस्या का समाधान तैयार किए गए  खेत में धान की ड्रम सीडर यंत्र  से सीधे बोआई  की जा सकती है.  ड्रम सीडर कृषि यंत्र से धान की  सीधी बोआई करने के लिए खेत एकसमान और समतल होना चाहिए. खेत की मिट्टी की सही मल्चिंग भी होनी चाहिए. इस तरह की बोआई के लिए खेत में अधिक पानी नहीं भरा जाता.

ड्रम सीडर द्वारा लेव किए खेत में धान की सीधी बोआई तकनीक में कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए :

ड्रम सीडर से धान बोने का समय : 

ड्रम सीडर द्वारा धान बीज को अंकुरित कर के बोया जाता है. धान की सीधी बोआई मानसून आने से  लगभग एक सप्ताह पहले कर लेनी चाहिए, जिस से मानसूनी बरसात होने से पहले ही धान अंकुरित हो कर खेत में पौधा बन जाए, अन्यथा  बरसात शुरू होने के बाद खेत में अधिक जलभराव होने पर धान का पौधा नहीं पनप पाएगा या बीज सड़गल जाएगा.

खेत का समतल होना जरूरी और पानी न भरा हो :

एकसार खेत  न होने पर धान के बीज का जमाव एकसमान नहीं हो पाता. खेत से पानी की निकासी  भी सही होनी चाहिए, क्योंकि खेत में अधिक वर्षा का पानी भरा होने पर अंकुरित पौधों के मरने की संभावना कहीं ज्यादा हो जाती है.

ड्रम सीडर से बोआई के समय रखें ध्यान :

ड्रम सीडर यंत्र से धान की बोआई के समय खेत में दोढाई इंच से अधिक पानी न भरा हो, तैयार खेत में केवल इतना ही पानी हो, जिस से ड्रम सीडर यंत्र को खेत में आसानी से चलाया जा सके.

तैयार खेत में 5-6 घंटे के भीतर ही ड्रम सीडर द्वारा धान की सीधी बोआई कर देनी चाहिए. इस से अधिक देरी होने पर धान की खेत की मिट्टी कड़ी होने लगती है, जिस से धान बीज रोपण के समय कठिनाई और धान के पौधों की शुरुआती बढ़वार में कमी आ सकती है, जिस से उपज में कमी हो सकती है.

प्रजातियां : 

धान की जल्दी तैयार होने वाली प्रजातियों में नरेंद्र-97, मालवीय धान-2 (एचयूआर-3022) आदि हैं. मध्यम व देर से पकने वाली प्रजातियों में नरेंद्र-359, सूरज-52 आदि हैं.

खरपतवार की रोकथाम :

ड्रम सीडर द्वारा धान की सीधी बोआई तकनीक में खरपतवार प्रबंधन भी आसान हो जाता है. कतार में बोआई होने के कारण मजदूरों द्वारा खुरपी से निराई आसानी से हो सकती है या उपयुक्त निराईगुड़ाई यंत्र का भी इस्तेमाल किया जा सकता है. पहली निराई बोआई के लगभग 20 दिन बाद, दूसरी निराई 40 दिन के बाद करनी चाहिए. साथ ही, खेत का मुआयना करें, जब लगे कि खरपतवार पनप रहे हैं, तो उन को हटाने का काम करें.

निराईगुड़ाई यंत्र :

आज हाथ से चलने वाले अनेक निराईगुड़ाई यंत्र बाजार में मौजूद हैं, जो सस्ते होने के साथसाथ अच्छा काम भी करते हैं. खेती में उन का इस्तेमाल आसानी से किया जा सकता है. इस के अलावा जरूरत हो तो खरपतवार की रोकथाम के लिए रासायनिक तरीके भी अपनाए जा सकते हैं.

ड्रम सीडर से धान की बोआई करने से लाभ :

ड्रम सीडर से बोआई करने पर  मजदूरों की लागत में कमी आती है, पानी की बचत होती है और धान फसल तैयार होने की अवधि में भी कमी आती है, जिस से अगली फसल  रबी में गेहूं की बोआई समय से हो सकती है.

फायदेमंद है ड्रम सीडर विधि :

किसी कारणवश समय पर धान की नर्सरी तैयार न हो पाए, तो ड्रम सीडर से धान की सीधे बोआई की जा सकती है. ड्रम सीडर से धान की बोआई कतार में होने के कारण खरपतवार नियंत्रण में आसानी होती है.

ड्रम सीडर मानवचालित यंत्र है. इसे चलाने के लिए किसी अन्य ऊर्जा स्रोत की जरूरत नहीं होती. कीमत में कम, रखरखाव आसान और इस्तेमाल करना भी आसान है. यही इस की खासियत है, जो किसान के काम को आसान करती है.

धान की सीधी बिजाई के लिए पूसा बासमती 1979 और पूसा बासमती 1985   

पूसा, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली में बासमती की रोबीनोवीड किस्में, पूसा बासमती 1979 और पूसा बासमती 1985 की बिक्री शुरू हो गई है. यह किस्में धान की सीधी बिजाई के लिए संस्थान द्वारा जारी की गई हैं.

इस अवसर पर पूसा संस्थान के निदेशक डा. अशोक कुमार सिंह ने कहा कि उत्तर पश्चिमी भारत में धान की खेती में मुख्य समस्याएं गिरता जलस्तर, धान की रोपाई में लगने वाले श्रमिकों की कमी और जलभराव के साथ रोपाई विधि के दौरान होने वाले ग्रीनहाउस गैस मीथेन का उत्सर्जन है. धान की सीधी बिजाई में इन सभी समस्याओं का हल है.

उन्होंने आगे कहा कि धान की सीधी बिजाई विधि में धान की पारंपरिक जलभराव विधि की तुलना में पानी के उपयोग में काफी कमी आती है, क्योंकि सीधी बोआई विधि में लगातार धान खेत में जलभराव की आवश्यकता नहीं होती. इस में केवल जरूरत के अनुसार ही कम पानी का इस्तेमाल होता है.

रिसर्च के मुताबिक, सीधी बिजाई विधि से लगभग 33 फीसदी पानी की बचत हो सकती है. इसलिए यह विधि खासकर पानी की कमी वाले क्षेत्रों के लिए अच्छा विकल्प है.

धान की सीधी बिजाई विधि में मुख्य समस्या खरपतवारों की है, जिसे हल करना जरूरी है, ताकि सीधी बिजाई विधि सफल हो सके. इस दिशा में भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली ने बासमती धान की 2 रोबिनोवीड किस्में पूसा बासमती 1979 और पूसा बासमती 1985 विकसित की हैं. खरपतवार भी इन किस्मों को नुकसान नहीं पहुंचा सकती. ये इमेजथापायर 10 फीसदी एसएल के प्रति सहिष्णु हैं और भारत में व्यावसायिक खेती के लिए विमोचित की गई हैं.

पूसा बासमती 1979 :

बासमती धान की यह किस्म पीबी 1121 की नजदीक वंश वाली है, जिस में इमेजथापायर 10 फीसदी एसएल के प्रति सहिष्णुता को संचालित करने वाले सभी उत्परिवर्तित एएचएएस एलील मौजूद होते हैं. इस की बीज से बीज तक परिपक्वता अवधि 130-133 दिन और औसत उपज 45.77 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

पूसा बासमती 1985 :

बासमती की यह किस्म पीबी 1509 की खरपतवारनाशी सहिष्णु आइसोजेनिक निकट वंशक्रम है, जिस में इमेजथापायर 10 फीसदी एसएल के प्रति सहिष्णुता को संचालित करने वाले सभी उत्परिवर्तित एएचएएस एलील मौजूद होते हैं. इस की बीज से बीज तक परिपक्वता अवधि 115-120 दिन और औसत उपज 52 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

इन किस्मों में धान की खेती में अच्छे बदलाव लाने की क्षमता है, जो धान की खेती की लागत को भी कम करेगी. साथ ही, यह किस्में न केवल निराईगुड़ाई से जुड़ी हुई मेहनत को घटाती हैं, बल्कि धान खेती की पारंपरिक विधियों के पर्यावरणीय प्रभावों को भी कम करती हैं.

डा. पीके सिंह, कृषि आयुक्त, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार ने इन किस्मों के लिए पूसा संस्थान के योगदान की सराहना की और कहा कि यह संस्थान अनेक उन्नत किस्मों के विकास का काम कर रहा है.

डा. डीके यादव, सहायक महानिदेशक (बीज), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने बताया कि बासमती धान की ये दोनों किस्में इस बासमती भौगोलिक सूचक क्षेत्र के किसानों के लिए खास साबित होंगी.

ध्यान देने वाली बात यह है कि देश के कुल बासमती धान निर्यात में पूसा संस्थान की बासमती किस्मों का हिस्सा 95 फीसदी है, जो 51,000 करोड़ रुपए बनता है.

डा. डीके यादव ने किसानों से आग्रह किया कि वे देश की खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए इन उन्नत किस्मों का प्रचारप्रसार करें. इस दिशा में सार्थक कदम उठाते हुए इन किस्मों के बीजों का सशुल्क वितरण मंच पर हरियाणा, पंजाब, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के 4 किसानों को किया गया. अन्य इच्छुक किसानों को यह बीज संस्थान की बीज उत्पादन इकाई में दिया गया.

हरियाणा के किसान प्रीतम सिंह ने धान की सीधी बिजाई (डीएसआर) विधि के साथ अपने साल 2009 से अब तक के अनुभव के बारे में विस्तार से बताया. वे 40-50 एकड़ में इस की खेती करते हुए 27 क्विंटल प्रति एकड़ की शानदार पैदावार हासिल कर रहे हैं. इन की सफलता की कहानी इस बात की गवाही देती है कि धान की सीधी बिजाई खेती की एक सक्षम विधि है, विशेषकर तब, जब उसे उचित प्रबंधन पद्धतियों और किस्मों के साथ अपनाया जाता है.

डा. टीके दास, जो सस्य विज्ञान में विशेषज्ञ प्रधान वैज्ञानिक हैं, उन्होंने धान की सीधी बिजाई विधि में इस्तेमाल होने वाले खरपतवारनाशियों की विस्तृत श्रंखलाएं के बारे में चर्चा की.

डा. सी. विश्वनाथन (संयुक्त निदेशक, अनुसंधान), डा. आरएन पड़ारिया (संयुक्त निदेशक, प्रसार), डा. गोपाल कृष्णन (अध्यक्ष, आनुवंशिकी संभाग), डा. ज्ञानेंद्र सिंह (प्रभारी, बीज उत्पादन इकाई), पूसा संस्थान के संभागाध्यक्ष और वैज्ञानिक, किसान, बीज कंपनियां और मीडिया भी इस अवसर पर मौजूद रहे.