Super Seeder : खेती की लागत करे कम, काम है दम

Super Seeder: आज किसान के सामने बड़ी चुनौती फसल अवशेष, खासकर पराली प्रबंधन की है. धान कटाई के बाद खेत में बची पराली को हटाने में समय, पैसा और मेहनत तीनों ज्यादा लगते हैं. इसी समस्या का आधुनिक समाधान है सुपर सीडर मशीन, जो किसानों को देती है इन सबका समाधान.

क्या है सुपर सीडर यंत्र

सुपर सीडर (Super Seeder) एक आधुनिक ट्रैक्टर (Tractor) चालित कृषि यंत्र है, जो पराली को हटाए बिना ही सीधे खेत में बीज बोने का काम करती है. यह मशीन पराली को काटकर मिट्टी में मिलाती है और उसी समय गेहूं जैसी फसल की बोआई भी कर देती है. इससे खेत में अधिक दिनों तक नमी बनी रहती है, जिससे कम पानी की जरूरत होती है साथ ही खेती में उर्वराशक्ति भी बढ़ती है. सुपर सीडर मशीन को चलाने के लिए आमतौर पर 45 HP से 65 HP क्षमता वाला ट्रैक्टर जरूरी होता है.

सुपर सीडर (Super Seeder) मशीन मुख्य रूप से गेहूं की बोआई के लिए सबसे ज्यादा उपयोगी मानी जाती है. इसके अलावा कुछ क्षेत्रों में जौ, चना सरसों की बोआई में भी इसका प्रयोग किया जाता है.

सुपर सीडर यंत्र कैसे करता है काम

    • रोटरी ब्लेड खेत में बची पराली को काटते हैं.
    • कटी हुई पराली मिट्टी में मिल जाती है जो बनती है खाद.
    • सीड ड्रिल बीज को सही गहराई में डालती है जिससे अंकुरण अच्छा होता है.
    • बोआई में समय की बचत.
    • मिट्टी की नमी बनी रहती है.
    • पराली जलाने से मिलता है छुटकारा, जिससे पर्यावरण खराब नहीं होता.
    • मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है.
    • खरपतवार कम उगते हैं.
    • गेहूं की उपज में 10–20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी.

सुपर सीडर यंत्र के इस्तेमाल में बरतें ये सावधानियां

    • सही समय पर करें इस्तेमाल मिलेगा ज्यादा फायदा.
    • धान कटाई के तुरंत बाद करें इस्तेमाल.
    • जब खेत में हल्की नमी हो तब करें बोआई का काम.
    • बहुत गीली या बहुत सूखी मिट्टी में न चलाएं.
    • गेहूं बोआई से पहले सबसे उपयुक्त.
    • सीडर यंत्र को ट्रैक्टर HP से कम क्षमता वाली मशीन न लगाएं. सुपर सीडर मशीन को चलाने के लिए आमतौर पर 45 से 65 HP क्षमता वाला ट्रैक्टर जरूरी होता है.
    • ब्लेड और बेयरिंग की नियमित जांच करें.
    • खेत में एक जैसी स्पीड रखें.

केंद्र और राज्य सरकारें पराली प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए सुपर सीडर मशीन पर 40 से 50 प्रतिशत तक सब्सिडी देती हैं. कुछ वर्ग के लिए यह छूट अधिक भी हो सकती है. इसके लिए अपने नजदीकी कृषि विभाग से जानकारी ले सकते हैं.

धान (Paddy) की कटाई और भंडारण

दुनिया में भारत धान की पैदावार करने में चीन के बाद दूसरा सब से बड़ा देश है. देश में लगभग 50 फीसदी से ज्यादा  लोग चावल का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन धान की कटाई से ले कर उस का सही ढंग से रखरखाव करने तक लगभग 10 फीसदी धान का नुकसान किसानों को होता है. इस की सब से बड़ी वजह किसानों को सही जानकारी न होना है.

फसल की कटाई और इस के बाद होने वाले नुकसान को कम करने की जरूरत आज के समय में पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बेहद जरूरी है. आमतौर पर देखा जाता है कि कटाई, मड़ाई, सुखाना और फिर फसल को रखने के दौरान नुकसान ज्यादा होता है. इस नुकसान से बचने के लिए वैज्ञानिक तरीके अपनाना जरूरी है. इन्हीं कुछ तरीकों के बारे में हम आप को बता रहे हैं, जिस से आप की मेहनत की कमाई बेकार न जाए.

धान की कटाई

धान की कटाई किसान खुद करते हैं या फिर मजदूरी दे कर फसल को कटवाते हैं. इस के अलावा अब कई तरह की मशीनें भी लोगों के पास आ गई हैं, जिन से फसल कटवाना आसान हो गया है. मशीनों से समय भी काफी कम लगता है.  रीपर, कंबाइन व हारवेस्टर आदि ऐसी ही मशीनें हैं. मजदूरों से फसल की कटाई कराने में इसलिए ज्यादा समय लगता है, क्योंकि मजदूर धान की कटाई पारंपरिक तरीके यानी हंसियां से करते हैं. इस में समय ज्यादा लगता है, लेकिन फायदा ज्यादा होता है.

हंसिया से कटाई में फसल का काफी कम नुकसान होता है और धान का पुआल भी किसानों को मिल जाता है, जो पशुओं को खिलाने के काम आता है. इस के अलावा ईंधन और रसायन निर्माण में पुआल का इस्तेमाल किया जाता है. साथ ही पुआल बेच कर किसान अपनी आय भी बढ़ा सकते हैं. लेकिन हंसिया से कटाई कराने में काफी समय लगता है, जिस से कटाई का खर्च ज्यादा आता है.

मशीनों में रीपर और ट्रैक्टर चालित कंबाइनर का इस्तेमाल धान की कटाई में किया जाता है. मशीन धान काट कर लाइन में लगा देती है, जिसे बाद में इकट्ठा करने में आसानी रहती है. कंबाइनर से धान की कटाई जमीन से काफी ऊपर से की जाती है और कटाई के साथसाथ मड़ाई और औसाई भी हो जाती है. कटाई की कंबाइनर मशीनें कई तरह की आती हैं, कुछ सस्ती और कुछ महंगी भी. कंबाइनर से धान की कटाई में पुआल का नुकसान होता है और काफी धान टूट भी जाता है.

धान टूटने से किसानों को उस की सही कीमत नहीं मिल पाती, जिस से बाजार कीमत से कम में धान बेचना किसानों की मजबूरी बन जाती है, लेकिन कंबाइनर से कटाई काफी जल्दी होती है, जिस से समय की बचत होती है साथ ही लागत भी कम आती है.

कटाई के समय निम्न बातों का ध्यान रखें :

*             फसल की कटाई उचित नमी और सही समय पर ही करनी चाहिए. धान की कटाई के लिए 20-22 फीसदी नमी सही रहती है. इस से ज्यादा नमी होने पर चावल कम मिलता है और कच्चे, टूटे और कम गुणवत्ता के दाने ज्यादा मात्रा में होते हैं. कम नमी पर कटाई करने से मिलिंग के दौरान धान टूट कर गिरने लगता है.

* फसल की कटाई देर से करने पर फसल जमीन पर गिर सकती है, जिस से चूहों, चिडि़यों और कीटों से फसल को नुकसान हो सकता है.

* यदि खेत में पानी भरा हो तो कटाई से 7-10 दिन पहले पानी निकाल देना चाहिए, जिस से कटाई आसानी से हो सके.

* कटाई के समय धान की सभी बालियों को एक दिशा में रखना चाहिए ताकि मड़ाई में दिक्कत न हो.

* कटाई के बाद धान को बारिश और ओस से बचाना चाहिए.

* धान को कटाई के बाद ज्यादा सुखाने से बचना चाहिए.

* धान की किस्मों के अनुसार कटाई करवानी चाहिए, जैसे अगेती किस्में 110-115 दिनों बाद, मध्यम किस्में 120-130 दिनों बाद और देर से पकने वाली किस्में लगभग 130 दिनों के बाद काटने लायक हो जाती हैं.

Paddyधान की मड़ाई

धान की बालियों यानी पुआल से बीजों को अलग करना मड़ाई कहलाता है. मड़ाई का काम मजदूरों, पशुओं और मशीनों से भी किया जाता है. मड़ाई का काम फसल कटाई के बाद जितनी जल्दी हो सके कर लेना चाहिए. मजदूरों द्वारा मड़ाई लकड़ी या लोहे के पाइप से की जाती है. 2-3 बार लकड़ी या लोहे से कूटने से धान के बीज पौधों से अलग हो जाते हैं. मड़ाई के लिए तारों से बने ड्रम का भी इस्तेमाल होता है. धान के पौधों को ड्रम पर इस तरह रखा जाता है कि बालियां तार को छूती रहें और ड्रम को पैर से घुमाया जाता है.

इस तरीके से मजदूरों की मड़ाई क्षमता बढ़ जाती है. मड़ाई का काम बैलों से भी किया जाता है. धान की बालियों को जमीन पर फैलाया जाता है और इस के ऊपर बैलों को घुमाया जाता है. उन के पैर के दबाव से धान पौधों से अलग हो जाता है.

इस के अलावा थ्रेसर से भी धान की मड़ाई की जाती है. मड़ाई में किसी वजह से देरी हो रही हो, तो धान का बंडल बना कर सूखी और छायादार जगह पर रखना चाहिए.

ओसाई

मड़ाई के बाद धान के बीजों के साथ भूसा, धूल के कण, बदरा और पुआल के टुकड़े रह जाते हैं. इसे हटाने के लिए धान की ओसाई की जाती है. ओसाई का काम उस समय भी किया जाता है, जब हवा चल रही हो. यदि हवा बंद हो जाए, तब 2 लोग चादर को तेजी के साथ झलते हैं, जिस से हवा निकलती है और ओसाई हो जाती है. आजकल बाजार में ओसाई के लिए बिना बिजली के बड़े पंखे आते हैं, जिन्हें हाथों से चलाया जाता है और ओसाई हो जाती है.

धान की सुखाई

धान की कटाई 20-22 फीसदी नमी पर की जाती है, लेकिन इतनी नमी में धान को रखा नहीं जा सकता है और न ही मिलिंग की जा सकती है. इसलिए धान की नमी कम करना बहुत जरूरी है. इस के लिए धान को पहले धूप में रख कर सुखाया जाता है. इस के लिए घर की छतों के फर्श, चटाई, तिरपाल, प्लास्टिक शीट आदि पर फैला कर कई दिनों तक धान के बीजों को सुखाया जाता है. धान को ज्यादा तेज धूप में नहीं सुखाना चाहिए. सुखाने के लिए सीमेंट के फर्श और तिरपाल का इस्तेमाल करना चाहिए.

कटाई के बाद जितनी जल्दी हो सके धान को सुखा लेना जरूरी है.

सुखाते समय धान को पक्षियों, चूहों और कीटपतंगों से बचाना चाहिए, क्योंकि इस से काफी नुकसान हो जाता है.

Paddy

धान का भंडारण

घर में पूरे साल धान मौजूद रहे, इस के लिए जरूरी है कि उसे रखने के लिए घर में अच्छी व्यवस्था हो. भंडारण के पहले धान में नमी की मात्रा देख लेनी चाहिए. यदि आप को अधिक समय के लिए भंडारण करना है, तो नमी की मात्रा 12 फीसदी और कम समय के लिए 14 फीसदी होनी चाहिए.

भंडारण से पहले या बाद में धान का कीटों से बचाव करना भी जरूरी है. भंडारण लिए कई तरह के ड्रम या कोठी इस्तेमाल किए जाते हैं. ये मिट्टी, लकड़ी, बांस, जूट की बोरियों, ईंटों व कपड़े आदि से बनाए जाते हैं, लेकिन इस तकनीक से ज्यादा समय तक भंडारण करना संभव नहीं है, क्योंकि इन में हवा जाने की कोई जगह नहीं होती.

ज्यादा समय तक भंडारण के लिए पूसा कोठी, धात्विक बिन व साइलो आदि का इस्तेमाल किया जा सकता है. फसल खराब न हो, इस के लिए समयसमय पर ऐसा बंदोबस्त करना चाहिए, जिस से कि हवा जाती रहे वरना धान खराब हो सकता है.

फसल अवशेष जलाया तो होगा जुर्माना

संत कबीर नगर : जिलाधिकारी महेंद्र सिंह तंवर के निर्देश के क्रम में अपर जिलाधिकारी जयप्रकाश की अध्यक्षता में पराली प्रबंधन/फसल अवशेष को खेतो में न जलाए जाने से संबंधित समीक्षा बैठक कलेक्ट्रेट सभागार में आयोजित हुई. इस अवसर पर मुख्य विकास अधिकारी जयकेश त्रिपाठी, अपर पुलिस अधीक्षक सुशील कुमार सिंह उपस्थित रहे.

उपनिदेशक, कृषि, डा. राकेश कुमार सिंह द्वारा बताया गया कि सर्वोच्च न्यायालय एवं राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा पराली एवं फसल अवशेष जलाए जाने पर रोक लगाई हुई है, जिस से कि प्रदूषण का रोकथाम की जा सके. जिले में धान की कटाई शुरू हो चुकी है, जिस में तहसील स्तरीय पर सचल दस्ते के द्वारा निगरानी की जाएगी एवं राजस्व व कृषि विभाग के क्षेत्रीय कार्मिकों के द्वारा पराली जलाए जाने की रोकथाम की जाएगी.

उन्होंने बताया कि यदि कोई किसान 2 एकड़ से कम भूमि पर पराली जलाता है, तो 2,500 रुपए, 2 से 5 एकड़ पर 5,000 एवं 5 एकड़ से अधिक भूमि पर 15,000 रुपए पर्यावरण क्षतिपूर्ति वसूल की जाएगी. इसी प्रकार यदि कोई कंबाइन हार्वेस्टर बिना एक्स्ट्रा मैनेजमेंट सिस्टम एवं पराली संकलन यंत्र के चलते हुए पाया जाएगा, तो ऐक्ट के अंतर्गत उसे सीज किए जाने की कार्रवाई की जाएगी.

उपनिदेशक, कृषि, डा. राकेश कुमार सिंह ने बताया कि जनपद में अब तक अनुदान पर वितरित 125 फार्म मशीनरी बैंक व कस्टम हायरिंग सैंटर एवं 164 पराली प्रबंधन के यंत्र के माध्यम से धान की पराली का प्रबंध किया जाएगा, जिस में उन्हें बारीक टुकड़ों में काट कर खेत में मिलाने से ले कर खेत से पराली को इकट्ठा कर गौशाला व सीबीजी प्लांट तक पहुंच जाने के निर्देश दिए गए. गत वर्ष कुल 32 पराली जलाए जाने की घटनाओं की पुष्टि हुई थी, जिस में 80,000 रुपए जुर्माने के रूप में वसूले थे.

अपर जिलाधिकारी ने उपकृषि निदेशक सहित समस्त संबंधित अधिकारियों व कर्मचारियों को निर्देशित किया है कि खेतों में फसल अवशेष को न जलाने हेतु जागरूक करें और फसल अवशेष को खेतों में जलाने से होने वाली हानियों को भी बताएं और इस का प्रचारप्रसार कराते रहें.

बैठक में उपजिलाधिकारी सदर शैलेश कुमार दूबे, उपजिलाधिकारी धनघटा रमेश चंद्र, उपजिलाधिकारी मेंहदावल उत्कर्ष श्रीवास्तव, समस्त तहसीलदार, जिला कृषि अधिकारी डा. सर्वेश कुमार यादव सहित संबंधित अधिकारी आदि उपस्थित रहे.

सब्सिडी पर खरीदें पराली प्रबंधन यंत्र

दमोह : किसान गेहूं, सोयाबीन, मक्का एवं धान आदि की फसल आने पर हार्वेस्टर चलने के बाद खेत में बचे हुए ठूंठ यानी फसल अवशेष (नरवाई) को जलाते हैं, जिस से पर्यावरण प्रदूषित होता है. मिट्टी के पोषक तत्व एवं लाभदायक जीवाणु भी नष्ट हो जाते हैं. इस के बचाव के लिए फसल के अवशेष (नरवाई) प्रबंधन करना अति आवश्यक है.

सहायक कृषि यंत्री, कृषि अभियांत्रिकी, दमोह ने बताया नरवाई प्रबंधन के लिए नवीन कृषि यंत्रों का प्रयोग करना लाभदायक है जैसे, रोटावेटर, मल्चर, श्रेडर के उपयोग से फसल अवशेष (डंठल) को मिट्टी में मिला देते हैं. सुपर सीडर यंत्र एक ऐसा नवीन कृषि यंत्र है, जिस में धान फसल की कटाई के बाद बिना खेत की तैयारी के रबी फसल की बोनी कर सकते हैं, जिस में समय एवं मेहनत कम लगती है. स्ट्रा रीपर यंत्र से गेहूं की हार्वेस्टर से कटाई करने के बाद खड़ी नरवाई में इस मशीन का उपयोग करने से पशुओं के लिए भूसा तैयार किया जाता है एवं नरवाई को जलाना नहीं पड़ता है.

उन्होंने आगे कहा कि इन यंत्रों के उपयोग से नरवाई प्रबंधन के साथसाथ मिट्टी की जलधारण क्षमता एवं जीवांश की मात्रा बढ़ जाती है. इस से मिट्टी की उपज बढ़ने के साथसाथ पशुओं के आहर की उपलब्धता हो जाती है. उपरोक्त सभी नरवाई प्रबंधन यंत्रों पर कृषि अभियांत्रिकी मध्य प्रदेश द्वारा अनुदान दिया जाता है. कृषि अभियांत्रिकी की वैबसाइट dbt.mpdage.org पर जा कर किसान अपना पंजीयन कर उपरोक्त यंत्रों के लिए आवेदन कर सकते हैं.

600 करोड़ की सब्सिडी

चंडीगढ़: हरियाणा के मुख्य सचिव संजीव कौशल ने कहा कि राज्य में धान की कटाई का 90 फीसदी काम पूरा हो चुका है और सरकार पराली जलाने से निबटने के लिए उपायों को बढ़ावा दे रही है.

केंद्रीय कैबिनेट सचिव द्वारा बुलाई गई बैठक के दौरान संजीव कौशल ने पराली जलाने पर अंकुश लगाने और आग की घटनाओं को सक्रिय रूप से कम करने के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे अथक प्रयासों पर बल दिया, ताकि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र यानी एनसीआर में वायु प्रदूषण को कम किया जा सके.

सरकार के प्रयासों की जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि हरियाणा में 36.5 लाख एकड़ में धान की खेती होती है, जिस में 18.36 लाख एकड़ में बासमती की खेती और लगभग 18.2 लाख एकड़ में गैरबासमती की खेती शामिल है.

संजीव कौशल ने कहा कि वायु गुणवत्ता सूचकांक बनाए रखने के लिए सरकार सतर्क है. पिछले वर्ष की तुलना में साल 2023 में पराली जलाने की घटनाओं में 38 फीसदी की कमी आई है और पिछले 2 सालों में 57 फीसदी की पर्याप्त कमी दर्ज की गई है.

संजीव कौशल ने आगे कहा कि आग पर काबू न पाने के लिए उपायुक्तों और स्टेशन हाउस अफसर को जिम्मेदार ठहराने के निर्देश जारी किए गए हैं. सरकार ने खेतों में आग के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ भी सख्त कार्यवाही करते हुए 1256 चालान जारी किए हैं. खेतों में आग से संबंधित 72 एफआईआर दर्ज कर 44 अपराधियों को पकड़ा है.

संजीव कौशल ने यह भी कहा कि राज्य सरकार ने गुरुग्राम और फरीदाबाद जिलों में बीएस-प्प्प् पेट्रोल और बीएस-प्ट डीजल एलएमवी (4 व्हीलर) पर तत्काल प्रभाव से 30 नवंबर तक या वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग द्वारा जीआरएपी स्टेज प्प्प् को रद्द किए जाने तक प्रतिबंध लगा दिया है. (आपातकालीन सेवाओं में तैनात वाहनों, पुलिस वाहनों और प्रवर्तन के लिए उपयोग किए जाने वाले सरकारी वाहनों को छोड़ कर).

इन जिलों में बीएस-प्प्प् पेट्रोल और बीएस- प्ट डीजल एलएमवी (4 व्हीलर) का उपयोग करते पाए जाने वाले उल्लंघनकर्ताओं पर मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 194 (1) के तहत केस दर्ज किया जाएगा.
एनसीआर जिलों में पंजीकृत वाहनों पर होलोग्राम आधारित रंगीन स्टिकर लगाने के संबंध में उन्होंने कहा कि 14 नवंबर, 2018 से 31 जनवरी, 2023 के बीच एनसीआर जिलों में लगभग 10 लाख वाहनों को कलर कोड किया गया है.

उन्होंने आगे जानकारी देते हुए कहा कि विभिन्न पराली प्रबंधन योजनाओं के लिए 600 करोड़ की सब्सिडी का प्रावधान किया गया है. इन उपकरणों का उद्देश्य बायोमास आधारित परियोजनाओं के लिए पराली को भूसे के लिए आपूर्ति सुनिश्चित करना है, जिस से पराली जलाने में कमी आएगी और पर्यावरण के प्रति जागरूक खेती को बढ़ावा मिलेगा.

धान की कटाई और रखरखाव

देश में लगभग 50 फीसदी से ज्यादा  लोग चावल का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन धान की कटाई से ले कर उस का सही ढंग से रखरखाव करने तक लगभग 10 फीसदी धान का नुकसान किसानों को होता है. इस की सब से बड़ी वजह किसानों को सही जानकारी न होना है.

फसल की कटाई और इस के बाद होने वाले नुकसान को कम करने की जरूरत आज के समय में पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बेहद जरूरी है.

आमतौर पर देखा जाता है कि कटाई, मड़ाई, सुखाना और फिर फसल को रखने के दौरान नुकसान ज्यादा होता है. इस नुकसान से बचने के लिए वैज्ञानिक तरीके अपनाना जरूरी है. इन्हीं कुछ तरीकों के बारे में हम आप को बता रहे हैं, जिस से आप की मेहनत की कमाई बेकार न जाए.

धान की कटाई

Farming Machines

 

 

 

 

 

 

 

धान की कटाई किसान खुद करते हैं या फिर मजदूरी दे कर फसल को कटवाते हैं. इस के अलावा अब कई तरह की मशीनें भी लोगों के पास आ गई हैं, जिन से फसल कटवाना और भी आसान हो गया है. मशीनों से काम करने पर समय भी काफी कम लगता है.  रीपर, कंबाइन व हारवेस्टर वगैरह ऐसी ही मशीनें हैं. मजदूरों से फसल की कटाई कराने में इसलिए ज्यादा समय लगता है, क्योंकि मजदूर धान की कटाई पारंपरिक तरीके यानी हंसिया से करते हैं. इस में ज्यादा समय लगता है, लेकिन फायदा भी ज्यादा होता है.

मशीनों में रीपर और ट्रैक्टर से चलने वाला यंत्र कंबाइन का इस्तेमाल धान की कटाई में किया जाता है. मशीन धान काट कर लाइन में लगा देती है, जिसे बाद में इकट्ठा करने में आसानी रहती है. कंबाइन यंत्र से धान की कटाई जमीन से काफी ऊपर से की जाती है और कटाई के साथसाथ मड़ाई और ओसाई भी हो जाती है. कटाई की कंबाइन मशीनें कई तरह की आती हैं, कुछ सस्ती और कुछ महंगी भी. कंबाइन से धान की कटाई में पुआल का नुकसान होता है और काफी धान टूट भी जाता है.

धान टूटने से किसानों को उस की सही कीमत नहीं मिल पाती, जिस से बाजार कीमत से कम में धान बेचना किसानों की मजबूरी बन जाती है, लेकिन कंबाइन यंत्र से कटाई काफी जल्दी होती है, जिस से समय की बचत होती है और लागत भी कम आती है.

धान की मड़ाई व ओसाई

धान कीबालियों यानी पुआल से बीजों को अलग करना मड़ाई कहलाता है. मड़ाई का काम मजदूरों, पशुओं और मशीनों से भी किया जाता है. मड़ाई का काम फसल कटाई के बाद जितनी जल्दी हो सके कर लेना चाहिए.

मड़ाई के लिए तारों से बने ड्रम का भी इस्तेमाल होता है. धान के पौधों को ड्रम पर इस तरह रखा जाता है कि बालियां तार को छूती रहें और ड्रम को पैर से घुमाया जाता है.

मड़ाई के बाद धान के बीजों के साथ भूसा, धूल के कण और पुआल के टुकड़े रह जाते हैं. इसे हटाने के लिए धान की ओसाई की जाती है. ओसाई का काम उस समय भी किया जाता है, जब हवा चल रही हो. यदि हवा बंद हो जाए, तब 2 लोग चादर को तेजी के साथ झलते हैं, जिस से हवा निकलती है और ओसाई हो जाती है.

धान की कटाई 20-22 फीसदी नमी रहने पर की जाती है, लेकिन इतनी नमी में धान को रखा नहीं जा सकता है. इसलिए धान की नमी कम करना बहुत जरूरी है. इस के लिए धान को  घर की छतों के फर्श, चटाई, तिरपाल, प्लास्टिक शीट वगैरह पर फैला कर कई दिनों तक धान के बीजों को सुखाया जाता है. धान को ज्यादा तेज धूप में नहीं सुखाना चाहिए. सुखाने के लिए सीमेंट के फर्श और तिरपाल का इस्तेमाल करना चाहिए.

धान का भंडारण

भंडारण के पहले धान में नमी की मात्रा देख लेनी चाहिए. यदि आप को अधिक समय के लिए भंडारण करना है, तो नमी की मात्रा 12 फीसदी और कम समय के लिए 14 फीसदी होनी चाहिए.

भंडारण से पहले या बाद में धान का कीटों से बचाव करना भी जरूरी है. भंडारण के लिए कई तरह के ड्रम या कोठी इस्तेमाल किए जाते हैं. ये मिट्टी, लकड़ी, बांस, जूट की बोरियों, ईंटों व कपड़े वगैरह से बनाए जाते हैं, लेकिन इस तकनीक से ज्यादा समय तक भंडारण करना संभव नहीं है, क्योंकि इन में हवा जाने की कोई जगह नहीं होती.

कटाई के समय इन बातों का रखें ध्यान

* धान की कटाई के लिए 20-22 फीसदी नमी सही रहती है. इस से ज्यादा नमी होने पर चावल कम मिलता है और कच्चे, टूटे और कम गुणवत्ता वाले दाने ज्यादा मात्रा में होते हैं. कम नमी होने पर कटाई करने से मिलिंग के दौरान धान टूट कर गिरने लगता है.

* यदि खेत में पानी भरा हो तो कटाई से 7-10 दिन पहले पानी निकाल देना चाहिए, जिस से कटाई आसानी से हो सके.

* कटाई के समय धान की सभी बालियों को एक दिशा में रखना चाहिए ताकि मड़ाई में दिक्कत न हो.

* कटाई के बाद धान को बारिश और ओस से बचाना चाहिए.

* धान की किस्मों के अनुसार कटाई करवानी चाहिए, जैसे अगेती किस्में 110-115 दिनों बाद, मध्यम किस्में 120-130 दिनों बाद और देर से पकने वाली किस्में लगभग 130 दिनों के बाद काटने लायक हो जाती हैं.

धान की सीधी बोआई

धान की सीधी बोआई एक प्राकृतिक संसाधन संरक्षण तकनीक है, जिस में उचित नमी पर यथासंभव खेत की कम जुताई कर के अथवा बिना जोते हुए भी खेतों में जरूरत के मुताबिक खरपतवारनाशी का प्रयोग कर जीरो टिल मशीन से सीधी बोआई की जाती है.

जिन किसानों ने अपने गेहूं की कटाई कंबाइन से की हो, वे बिना फसल अवशेष जलाए धान की सीधी बोआई हैप्पी सीडर या टर्बो सीडर से कर सकते हैं. इस तकनीक से लागत में बचत होती है और फसल समय से तैयार हो जाती है.

उपयुक्त क्षेत्र

* उन क्षेत्रों में, जहां सिंचाई के लिए पानी की कमी हो, जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़ वगैरह.

* वे राज्य, जहां जलभराव के हालात हों, उदाहरण के लिए, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, असम व पश्चिम बंगाल.

* उन राज्य में, जहां वर्षा आधारित खेती होती हो, जैसे ओडिशा, झारखंड, उत्तरपूर्वी राज्य.

सीधी बोआई के लाभ

* श्रमिकों की आवश्यकता में 30-40 प्रतिशत की कमी.

* पानी की 20-30 प्रतिशत बचत.

* उर्वरक उपभोग क्षमता में वृद्धि.

* समय से पहले (दिन 7-10) फसल तैयार, जिस से आगे बोई जाने वाली फसल की समय से बोआई.

* ऊर्जा की बचत (50-60 प्रतिशत डीजल).

* मीथेन उत्सर्जन में कमी, जिस से पर्यावरण सुरक्षा में इजाफा.

* उत्पादन लागत में 3,000-4,000 रुपए/प्रति हेक्टेयर की कमी.

बोआई का समय

सही समय पर फसल की बोआई एक बढि़या काम करती है, इसलिए सीधी बोआई वाले धान की फसल को मानसून आने के 10-15 दिन पहले बो देना चाहिए, जिस से फसल वर्षा शुरू होने तक 3-4 पंक्तियों वाली अवस्था में हो जाए. इस से पौधों की जड़ों की बढ़वार अच्छी होगी तथा ये खरपतवारों के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे.

प्रजातियों का चयन

सीधी बोआई के लिए ऐसी प्रजातियों का चयन करें, जो अच्छी बढ़वार के साथसाथ खरपतवारों से भी प्रतिस्पर्धा कर सकें. जैसे पूसा सुगंध 5, पूसा बासमती 1121, पीएचबी 71, नरेंद्र 97, एमटीयू 1010, एचयूआर 3022, आरएमडी (आर)-1, सहभागी धान, सीआर धान 40, सीआर धान 100, सीआर धान 101 आदि.

बोने की विधि

यदि जीरो कम फर्टिसीड ड्रिल से बोआई करते हैं, तो इस के लिए महीन दानों वाली प्रजातियों (बासमती) के लिए 15-20 किलोग्राम, मोटे दाने वाली प्रजाति के लिए 20-25 किलोग्राम और संकर प्रजातियों के लिए 8-10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज पर्याप्त रहता है. पंक्ति से पंक्ति की दूरी 20 सैंटीमीटर उपयुक्त रहती है. बीज को सही गहराई पर बोने से फसल का अंकुरण अच्छा होता है, इसलिए बीज को 2-3 सैंटीमीटर गहराई पर ही बोना चाहिए. बोआई से पहले बीजों को पानी में 8-10 घंटे (सीड प्राइमिंग) भिगो कर छायादार जगह पर सुखा लें, जिस से बीजों के जैव रसायनों में अनुकूल परिवर्तन होता है और अंकुरण में वृद्धि होती है.

बीजों को बोआई से पहले 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज को बाविस्टीन या थीरम से उपचारित जरूर करें, जिस से मृदा व बीजजनित रोगों में कमी पाई जाती है.

उर्वरक प्रबंध

100-150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम फास्फोरस, 40 किलोग्राम पोटाश व 25 किलोग्राम जिंक प्रति हेक्टेयर का प्रयोग करें.

नाइट्रोजन की एकतिहाई और फास्फोरस, पोटाश और जिंक की पूरी मात्रा बोआई के समय और शेष नाइट्रोजन की एकतिहाई मात्रा बोआई के 30 दिन बाद और शेष बची हुई मात्रा बोआई के 55 दिन बाद दें. यदि मृदा में लोह तत्त्व की कमी हो, तो आयरन सल्फेट (19) का 0.5 प्रतिशत घोल बना कर 10-15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें.

खरपतवार प्रबंधन

खरपतवारों की रोकथाम के लिए बोआई से एक हफ्ता पहले ग्लाईफोसेट नामक खरपतवारनाशी (1 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर सक्रिय तत्त्व) का प्रयोग करें. बोआई के 1-2 दिन के अंतराल पर पेंडिमिथेलिन (सक्रिय तत्त्व 1 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) और 20-25 दिन के अंतराल पर बिसपायरीबैक (नोमनी गोल्ड) की 25 ग्राम सक्रिय तत्त्व प्रति हेक्टेयर का छिड़काव करें.

कीट/सूत्रकृमि प्रबंधन

यदि फसल में सूत्रकृमि का प्रकोप हो, तब बोआई के 30-40 दिन के अंतराल में कार्बोफ्यूरान (सक्रिय तत्त्व 0.75 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) छिड़कें. तना छेदक की रोकथाम के लिए बोआई के 25-30 दिन बाद करटप हाइड्रोक्लोराइड का 1 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर सक्रिय तत्त्व का छिड़काव करना चाहिए.

धान की उन्नतशील प्रजातियां

शीघ्र पकने वाली प्रजातियां : नरेंद्र 80, नरेंद्र 97, पंत धान 12, शुष्क सम्राट, नरेंद्र लालमति, मालवीय धान-2, शियाट्स धान-5, मालवीय धान-2, मालवीय धान-917, को-51.

मध्यम देर से पकने वाली : नरेंद्र-359, पंत धान 4, सरजू-52, नरेंद्र धान-2064, नरेंद्र धान-2065, मालवीय धान-1, शियाट्स धान-1, शियाट्स धान-2, शियाट्स धान-4, मालवीय धान-36, पंत धान-10.

देर से पकने वाली प्रजातियां : महसूरी, शियाट्स धान-3.

सुगंधित धान की प्रजातियां : कस्तूरी टाइप-3, पूसा बासमती-1, बासमती-370, हरियाणा बासमती-1, मालवीय सुगंध, नरेंद्र सुगंध, वल्लभ बासमती-22, तरावड़ी बासमती, पूसा बासमती-1509.

ऊसर के लिए उपयुक्त प्रजातियां : ऊसर धान-1, सीएसआर-10, नरेंद्र ऊसर धान-2, ऊसर धान-3, सीएसआर-30, सीएसआर-36, सीएसआर-43, नरेंद्र ऊसर धान 2008, नरेंद्र ऊसर धान-2009.

निचले और जलभराव क्षेत्रों के लिए : सवर्णा (एमटीयू 7029), एनडीआर 8002, जलमग्न, मधुकर, जलप्रिया, जललहरी, एनडीजीआर 201, बाढ़ अवरोधी, सवर्णा सब-1, नरेंद्र मयंक, नरेंद्र जल पुष्प, नरेंद्र नारायणी.