Onion : प्याज की फसल में लगने वाले कीटों की रोकथाम

Onion : तमाम फसलों की तरह प्याज (Onion) की फसल भी कीड़ों की मार से बच नहीं पाती. कीटों का हमला प्याज (Onion) की खेती करने वाले किसानों की हालत खराब कर देता है, लिहाजा इन से बचाव के लिए बेहद सतर्क रहना जरूरी है.

आज भारत में सब्जी व मसाले की प्रमुख फसल है. इसे स्वतंत्र रूप से और अन्य सब्जियों के साथ मिला कर खाया जाता है. भारत दुनिया में प्याज (Onion) का दूसरा सब से बड़ा उत्पादक है.

प्याज (Onion) में कार्बोहाइड्रेट के साथसाथ सल्फर, कैल्शियम, प्रोटीन व विटामिन सी पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं. अन्य फसलों की तरह प्याज में भी विभिन्न  कीट व बीमारियों का प्रकोप होता है, जो इस के उत्पादन व गुणवत्ता को प्रभावित  करते हैं. यदि कीट व बीमारियों को प्रबंधित कर लिया जाए, तो प्याज के उत्पादन व गुणवत्ता में वृद्धि की जा सकती है.

भारत में उगाई जाने वाली सब्जियों में प्याज (Onion) सब से अधिक महत्त्वपूर्ण और लोकप्रिय है. भारत में प्याज की खेती लगभग 4-8 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में की जाती है. जिस का कुल उत्पादन लगभग 55 लाख टन है.

हाल के सालों में वैज्ञानिक अपने शोध से जहां एक तरफ प्याज (Onion) में नवीनतम तकनीक और संकर किस्मों को विकसित कर के उत्पादन में लगे हैं, वहीं किसान नवीनतम कृषि पद्धति अपना कर अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने की कोशिश करते हैं, जिस के लिए वे अधिक उर्वरक, रसायन और सघन पद्धति इस्तेमाल कर रहे हैं. नतीजतन कीट और रोगों का प्रकोप बढ़ रहा है.

प्रमुख कीट

प्याज का मैगट : इस कीट के प्रौढ़ घरेलू मक्खी जैसे छोटे आकार के लगभग 6 मिलीमीटर लंबे होते हैं. इन की टांगें पतली व लंबी, पंख पारदर्शी बड़े और शरीर पर छोटेछोटे रोम होते हैं. इन के मैगट लगभग 8 मिलीमीटर लंबे व सफेद होते हैं. ये अगले हिस्से में पतले और पीछे चौड़े होते हैं.

ये कीट जमीन में प्यूपावस्था में शीत निष्क्रिय रहते हैं. बसंत के मौसम में इन से निकलने वाली मक्खियां  पत्तियों या पौधों की जड़ों के आसपास जमीन में अंडे देती हैं, जो 2-7 दिनों में फूट जाते हैं. अंडों से निकलने वाले मैगट पत्तियों से होते हुए जमीन में जा कर पौधों के कंदों के कोमल तंतुओं को खाते हैं. ये मैगट 14-21 दिनों में कंदों से बाहर आ कर प्यूपा में बदल जाते हैं.

प्यूपा से 14-21 दिनों में वयस्क निकल कर अपना जीवनचक्र शुरू कर देते हैं. इस कीट की तीसरी पीढ़ी प्याज (Onion) की कटाई के एकदम पहले हमला करती है, जिस से भंडारण के दौराना सड़न उत्पन्न हो जाती है.

इस कीट के मैगट पौधों के तनों व कंदों में घुस कर नुकसान पहुंचाते हैं. इस से पौधे पीले पड़ कर सूखने लगते हैं. बड़े कंदों पर 8-10 मैगट एकसाथ घुस कर उसे खोखला कर देते हैं, जिस से उन पर अन्य हानिकारक सूक्ष्म जीवों के असर से मृदुगलन पैदा हो जाता है. इस कीट के प्रकोप से खेत में नष्ट हुए कंद भंडारण के दौरान सड़ने लगते हैं, जिस से अन्य स्वस्थ कंद भी प्रभावित होते हैं.

प्रबंधन : शुरुआती अवस्था में प्रभावित खेत पर काटाप हाइड्रोक्लोराइड 4 जी की 10 किलोग्राम मात्रा को प्रति हेक्टेयर की दर से बिखेर कर सिंचाई कर दें.

* बढ़ते हुए पौधों पर मिथोमिल 40 एसपी की 1 किलोग्राम या ट्रायजोफास 40 ईसी की 750 मिलीलीटर मात्रा को 500-600 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने पर नए निकले हुए मैगट मर जाते हैं. कीट के जीवनचक्र के मुताबिक 2 या 3 बार छिड़काव करने से फसल को काफी हद तक बचाया जा सकता है.

रसाद कीट : इस कीट के वयस्क पतले, कोमल व लगभग 1 मिलीमीटर लंबे होते हैं. नर पंखहीन होते हैं, जबकि मादा में झालरदार पंख होते हैं. इन के पिछले हिस्से में लंबे बाल पाए जाते हैं. इन का रंग हलका पीलाभूरा होता है. यह कीट प्याज (Onion) व लहसुन पर नवंबर से मई तक रहता है. यह जून में कपास व गरमियों की अन्य फसलों में चला जाता है. सितंबरअक्तूबर में यह सरसों पर रहता है. इस प्रकार यह साल भर सक्रिय रहता है.

इस कीट की मादा 14-30 दिनों के अपने जीवनकाल में 50-60 सफेद अंडे पत्तियों की बाहरी त्वचा में गड्ढे बना कर देती है. अंडों से 5-10 दिनों में छोटेछोटे अर्भक यानी बच्चे निकल कर पत्तियों के मुलायम भागों से रस चूसना शुरू कर देते हैं.

ये अर्भक पत्तियों व फलों पर रहते हैं और 4-6 दिनों में बड़े हो जाते हैं. 3-7 दिनों बाद ये पंखदार वयस्क बन जाते हैं. इस कीट का पूरा जीवनचक्र गरमियों में 15 दिनों व जाड़ों में 22-45 दिनों में पूरा हो जाता है. इस के 1 साल में 8-10 जीवनचक्र होते हैं.

इस कीट के वयस्क व बच्चे दोनों ही पौधों की पत्तियों को खुरच कर व उन का रस चूस कर नुकसान पहुंचाते हैं, जो बाद में पीलेसफेद रंग के निशान में परिवर्तित हो जाते हैं, जिस से पत्तियां चमकीली सफेद दिखाई देने लगती हैं. ऐसी पत्तियां बाद में ऐंठ कर व मुड़ कर सूख जाती हैं.

प्रबंधन : प्याज व लहसुन की कीटरोधी प्रजातियां उगानी चाहिए.

* कीट के अधिक प्रकोप की दशा में 150 मिलीलीटर इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल को 500-600 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

तंबाकू की इल्ली : इस के पतंगे भूरे रंग के होते हैं. इन का ऊपरी पंख कत्थई रंग का होता है, उस पर सफेद लहरदार धारियां पाई जाती हैं. पिछले पंख सफेद रंग के होते हैं. पूर्ण विकसित इल्ली का शरीर कोमल व रंग पीलापन लिए हुए भूरा होता है. यह लगभग 40-50 मिलीमीटर लंबी होती है.

शरीर पर कहींकहीं रोम पाए जाते हैं. इल्ली की पीठ पर दोनों ओर 1-1 पीली धारी पाई जाती है. 1-1 पीली धारी शरीर के निचले भाग में भी दोनों ओर होती है. इस कीट की मादा पत्तियों की निचली सतह पर 250-300 अंडे समूहों में देती है. ये अंडे भूरे बालों से ढके रहते हैं और अंडों से 3-5 दिनों में पीलापन लिए गहरेभूरे रंग की इल्लियां निकलती हैं. बड़ी होने पर ये पूरे खेत में फैल जाती हैं.

इल्लियां खेत से उतर कर भूमि में 2.5 से 3.0 सेंटीमीटर नीचे ककून में प्यूपा बनाती हैं. गरमी में प्यूपावस्था 7-9 दिनों व सर्दी में 29-30 दिनों की होती है. इस कीट की साल भर में 8 पीढि़यां होती हैं.

इस कीट की इल्लियां प्याज (Onion) व लहसुन की पत्तियों को खा कर नुकसान पहुंचाती हैं. पौधों की छोटी अवस्था में इस का प्रकोप होने पर पूरा पौधा मर जाता है. कभीकभी यह कीट 50-60 फीसदी तक नुकसान पहुंचाता है. बड़े पौधों में प्रकोप होने पर उस की पत्तियों की तादाद में कमी हो जाती है, जिस से कंद छोटे रह जाते हैं और उपज में भी कमी हो जाती है.

प्रबंधन : पहले बोई गई फसल के कटने के बाद खेत की अच्छी तरह से मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई करनी चाहिए.

* कीट के अंड समूह को पत्ती सहित तोड़ कर नष्ट कर देना चाहिए.

* समूह में पाई जाने वाली इल्लियों को भी पत्ती सहित तोड़ कर नष्ट कर देना चाहिए.

* प्रकाश प्रपंच का प्रयोग कर के वयस्क कीटों को पकड़ कर नष्ट कर देना चाहिए.

* अधिक प्रकोप की दशा में इंडोक्साकार्ब 14.5 एसपी की 500 मिलीलीटर मात्रा या लैम्डा सायहेलोथ्रिन 50 ईसी की 300 मिलीलीटर मात्रा को 500-600 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

चने का कटुवा कीट : इस कीट का वयस्क भूरा व भारी शरीर वाला होता है. इस के अगले पंख हलके भूरे रंग के होते हैं, जिन पर बहुत सी लहरदार रेखाएं व गुर्दे के आकार के धब्बे होते हैं. पिछले पंख सफेद व पंखों की शिराएं काली होती हैं. इस कीट की सूंड़ी हलका पीलापन लिए हुए सलेटी रंग की होती है और छूने में चिकनी व लगभग 40 मिलीमीटर लंबी होती है.

मैदानी भागों में मादा अक्तूबर महीने से पत्तियों की निचली सतह, तनों व गीली मिट्टी में अंडे देना शुरू कर देती है. यह एक स्थान पर 30 व अपने जीवनकाल में लगभग 300 अंडे देती है. अंडे करीब 30 दिनों में फूट जाते हैं.

इल्लियां अंडों से निकल कर पौधों की जड़ों व ऊपरी भागों को खाना शुरू कर देती हैं और लगभग 3-7 दिनों में पूरी तरह विकसित हो जाती है. इस के बाद जमीन के अंदर जाती हैं और मिट्टी में ककून के अंदर वयस्क कीट निकल आते हैं. इस कीट की इल्लियां प्याज (Onion) व लहसुन की पत्तियों को काट कर पौधों को नुकसान पहुंचाती हैं. ये दिन के समय खेत में ढेलों में छिपी रहती हैं और रात में नुकसान पहुंचाती हैं. इल्लियां जितना खाती हैं, उस से ज्यादा काटकाट कर नष्ट करती हैं.

प्रबंधन : खेत में जगहजगह छोटेछोटे गड्ढे बना कर इल्लियों को उन में जमा कर के नष्ट कर देना चाहिए.

* प्रकाश प्रपंच लगा कर वयस्क कीटों को आकर्षित कर के नष्ट कर देना चाहिए.

* खेत में जगहजगह बेकार पत्तियों के ढेर लगा कर इल्लियों को उन के नीचे जमा कर के नष्ट कर देना चाहिए.

* मिथाइल पैराथियान 5 फीसदी का 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बुरकाव करना चाहिए.

* ज्यादा प्रकोप होने की दशा में अल्कामेथ्रिन 10 ईसी की 250 मिलीलीटर मात्रा को 500-600 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

मूंगफली का कर्ण कीट: यह कीट अपने खास आकार के कारण आसानी से पहचाना जा सकता है. यह पौधों की जड़ों के पास घास या पत्तों के नीचे दरारों में छिपा रहता है. इस कीट की मादा 21 से 139 तक अंडे देती है, जो 7-10 दिनों में फूट जाते हैं. कीट 5 अवस्थाओं के बाद विकसित हो जाते हैं. इस का जीवनचक्र 61 दिनों का होता है.

इस कीट के बच्चे व वयस्क दोनों ही अपने कुतरने व चुभाने वाले मुखांगों से पत्तियों व पौधे के कोमल भागों को नुकसान पहुंचाते हैं. यह प्याज (Onion) व लहसुन का मामूली कीट है, पर कभीकभी काफी नुकसान पहुंचाता है.

प्रबंधन : खेत में पौधों की रोपाई से पहले 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से मिथाइल पैराथियान 2 फीसदी धूल डालने से इस कीट के प्रकोप को कम किया जा सकता है.

मटर का पर्ण सुरंग कीट : इस कीट की वयस्क मक्खी 2-3 मिलीमीटर लंबी चमकीले गहरे रंग की होती है. इस के बीच का ऊपरी भाग हलके काले रंग का होता है. विकसित मैगट 3 मिलीमीटर लंबा और 0.75 मिलीमीटर चौड़ा होता है. यह कीट दिसंबर से ले कर मई तक सक्रिय रहता है. मादा मक्खी पत्तियों के तंतुओं में तिकोने आकार के छेद बना कर हर छेद में 1 अंडा देती है.

ये अंडे 3-4 दिनों में फूट जाते हैं और उन से मैगट निकल कर पत्तियों की कोशिकाओं से भोजन प्राप्त करने लगते हैं. इस प्रकार नुकसान करते हुए मैगट 5-12 दिनों में पूरी तरह विकसित  हो कर प्यूपा में बदल जाते हैं. प्यूपा से मौसम के अनुसार 7-15 दिनों में वयस्क कीट निकल कर दोबारा जीवनचक्र शुरू कर देते हैं. 1 साल में इस कीट की 4-5 पीढि़यां पाई जाती हैं.

इस कीट के मैगट पत्तियों के ऊपरी सिरे की ओर से सुरंग बना कर उस के हरे ऊतकों को खा कर नुकसान पहुंचाते हैं. नतीजतन पत्तियां सूख जाती हैं. बाद में इस कीट का प्रकोप  पत्तियों के निचले भाग पर होता है. इस से पत्तियां टेड़ी दिखाई देने लगती हैं. ज्यादा प्रकोप होने से पौधों की बढ़वार पर असर पड़ता है और पौधे छोटे रह जाते हैं.

प्रबंधन : प्रभावित पत्तियों की चोटी को काट कर नष्ट कर देना चाहिए.

* सूखी हुई जमीन पर इस का प्रकोप अधिक होता है, लिहाजा समय से पानी देना चाहिए.

* लैम्डा सायहेलोथ्रिन 5 ईसी की 300 मिलीलीटर या फेंथोएट 50 ईसी, की 1.0 लीटर मात्रा को 500-600 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

Cinnamon : औषधीय फसल दालचीनी की खेती

Cinnamon : दालचीनी के पेड़ का पत्ता ही तेजपत्र या तेजपात कहा जाता है. तेजपात व दालचीनी का बहुतायत से इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए इन्हें विदेशों से भी मंगाना पड़ता है.

भारतीय किसान दालचीनी (Cinnamon) की खेती कर के काफी पैसा कमा सकते हैं और देश की पूंजी विदेश जाने से बचा कर देश की सेवा कर सकते हैं. दक्षिण भारत के किसान इस के उत्पादन की ओर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं.

श्रीलंका और मलय प्रायद्वीप दालचीनी (Cinnamon) की खेती के लिए बहुत मशहूर हैं. ये छोटे देश दालचीनी आयात से अच्छीखासी विदेशी मुद्रा कमा लेते हैं. भारत में भी दालचीनी का आयात श्रीलंका से किया जाता है. वहां की दालचीनी को सेहत के लिए काफी अच्छा माना जाता है. वहां दालचीनी की आर्गेनिक (जैविक) खेती जैसे प्रयोग भी किए जा रहे हैं.

भारत के हिमाचल प्रदेश में भी इस की खेती की जाती है. ध्यान दिए जाने पर वहां भी बहुत सफलता पाई जा सकती है. पूसा के वैज्ञानिक डा. जानकीराम का कहना है कि केरल, नार्थ ईस्ट व अंडमान में स्पाइस क्राप की काफी खेती की जा रही है. मगर कुछ जगहों को छोड़ कर आमतौर पर इस का उत्पादन साइड क्राप की तरह किया जाता है. इस को मुख्य फसल की तरह अपनाने पर किसानों को काफी लाभ मिल सकता है.

अब तमिलनाडु, केरल व कर्नाटक में किसान बड़े पैमाने पर इस की खेती कर रहे हैं. इस से उन्हें काफी लाभ मिल रहा है.

दालचीनी का इस्तेमाल : मसाले के रूप में इस का नियमित इस्तेमाल किया जाता है. इस के पत्तों से तेल निकाला जाता है, जिसे यूजिनोल के कारण काफी उपयोगी माना जाता है. दालचीनी (Cinnamon) के बीजों व मूल से भी तेल निकाला जाता है.

गरम मिजाज वालों और गर्भवती औरतों के लिए दालचीनी का इस्तेमाल किया जाना ठीक नहीं रहता है. गरम मिजाज वालों को इस के इस्तेमाल से सिरदर्द हो सकता है. इसी तरह गर्भवती औरतों के लिए यह गर्भनाशी साबित हो सकती है.

दालचीनी के गुण : यह यकृत की सफाई व भोजन के पाचन में काफी उपयोगी है, इसलिए इसे ओजक कहा जाता है. यह दिल को उत्तेजित करती है. इसे शहद के साथ इस्तेमाल करने से कोलेस्ट्राल कम होता है. यह मुंह की बदबू दूर करती है. इस के पत्तों के मंजन से दांत साफ व चमकीले होते हैं. यह दांत का दर्द भी कम करती है. यह हिचकी रोकने में भी मदद करती है. यह वायु, कफ व शरीर के जहर नष्ट करती है. यह बैठे गले को ठीक कर देती है.

रंग को साफ करने में भी इस की भूमिका कारगर है. दालचीनी ( (Cinnamon)) के अर्क का लेपन दिमाग के लिए बेहद उपयोगी है. इसे पाचन सुधारने और गैस खत्म करने में बहुत उपयोगी माना गया है.

औषधीय उपयोग : मोतीझरा, कान का बहरापन, आंखों की फड़कन, चर्मरोगों व संक्रामक रोगों में दालचीनी के इस्तेमाल से आराम मिलता है.

दालचीनी (Cinnamon) के काढ़े से रक्तस्राव रोकने में बहुत लाभ होता है. फेफड़ों व गर्भाशय के रक्तस्राव को रोकने में भी दालचीनी कारगर होती है. वैसे यह किसी भी तरह के रक्तस्राव को रोकने में उपयोगी है. प्रसव पीड़ा के कारण मांसपेशियों में कमजोरी को दूर करने में भी यह उपयोगी है.

दालचीनी का तेल : यह काफी महंगा मिलता है. चर्मरोग में इस की मालिश से बहुत लाभ होता है. पेट पर इस की मालिश से आंतों का खिंचाव दूर होता है. प्रसव के कारण पेट पर बने निशान भी तेल की मालिश से काफी कम किए जा सकते हैं.

यूरोप, उत्तरी अमेरिका व थाइलैंड वगैरह देशों में भारत इस का निर्यात काफी मात्रा में करता है. अन्य कई देशों में भी इस के निर्यात के रास्ते खुले हुए हैं.

कीट प्रकोप : दालचीनी में केंकर का प्रकोप ज्यादा होता है. इस्टोप्सेमाइसिन 100 पीटीएम के घोल के छिड़काव से इस कीट को नष्ट किया जा सकता है. वैसे पौधों के आसपास हाइजीन रख कर भी इस कीट से दालचीनी के पेड़ को बचाया जा सकता है. बारिश के मौसम में दालचीनी में लीफ माइंट का प्रकोप भी होता है. इसे क्यूनालफास के .05 फीसदी घोल का छिड़काव कर के खत्म किया जा सकता है. पत्तीधब्बा व झुलसा रोग होने पर बोडोमिक्सचर के छिड़काव से फसल को बचाया जा सकता है.

दालचीनी (Cinnamon) का पेड़ सदाहरित माना जाता है. इस के पेड़ 20-25 फुट ऊंचे होते हैं. इस की पत्तियों से बहुत तेज महक आती है, इसलिए उन्हें तेजपात या तेजपत्र कहा जाता है. इस की व्यावसायिक व अच्छी खेती के लिए हाई ह्यूमिडिटी अच्छी रहती है.

दालचीनी की दुनियाभर में काफी मांग है. छोटे देश भी इस में आत्मनिर्भर बनने में रुचि दिखा रहे हैं. श्रीलंका तो इस की खेती में आगे है ही, वियतनाम ने भी इस की खेती में काफी रुचि दिखाई है. वहां इस की खेती शुरू हो चुकी है और इस के काफी अच्छे नतीजे मिल रहे हैं.

Fennel Cultivation : बढ़िया कमाई देती सौंफ की खेती

Fennel Cultivation : राजस्थान के जोधपुर जिले के बिलाड़ा क्षेत्र के एक प्रगतिशील किसान कुन्नाराम ने सौंफ की सफल खेती (Fennel Cultivation) कर के अच्छी कमाई की है. कुन्नाराम के पास 10 बीघा जमीन है और वे साल 1982 में 10वीं जमात पास करने के बाद से ही खेतीबारी के काम में जुट गए थे.

कुन्नाराम पिछले तकरीबन 5 साल से सौंफ की खेती (Fennel Cultivation) कर रहे हैं. उन्होंने सौंफ की खेती के लिए उन्नत बीज लिया और अच्छी तरह जुताई कर उस में 2 ट्रॉली प्रति बीघा की दर से गोबर की देशी खाद का इस्तेमाल किया.

कुन्नाराम सौंफ की बोआई जुलाई के आखिरी हफ्ते में करते हैं और जरूरत के मुताबिक फसल की सिंचाई करते हैं. उन्होंने सिंचाई के लिए ‘बूंदबूंद सिंचाई पद्धति’ अपनाई है.

कुन्नाराम सौंफ की फसल में रसायनों का इस्तेमाल बिलकुल नहीं करते हैं. वे सौंफ की पूरी खेती जैविक तरीके से ही करते रहे हैं. वे खेती के साथसाथ पशुपालन भी करते हैं, जिस से उन्हें अपने घर की ही देशी खाद भी मिल जाती है.

कुन्नाराम बताते हैं कि सौंफ की फसल के गुच्छों की कटाई वे 3 बार 7 से 10 दिन के अंतराल पर करते हैं और 3 बार गुच्छों की कटाई करने के बाद चौथी बार में पूरी फसल काट लेते हैं और उस में से सौंफ को अलग कर लेते हैं. इस तरह वे कुल 4 बार सौंफ के गुच्छों की कटाई करते हैं.

कटाई के बाद सौंफ के गुच्छों को छाया में रस्सी पर सूखने से सौंफ का हरापन बना रहता है. इस के बाद पक्के फर्श पर सौंफ को गुच्छों से अलग कर लिया जाता है.

सौंफ मसाला फसल है. इसे औषधीय फसल भी कहा जाता है. इसे मसाले के रूप में और सीधा भी खाने के काम में लिया जाता है.

इस साल कुन्नाराम ने कुल 10 बीघा में सौंफ की खेती (Fennel Cultivation) की, जिस का उत्पादन कुल 150 मन प्राप्त किया यानी एक बीघा में कुल 6 क्विंटल पैदावार हुई. बाजार में बिलाड़ा मंडी में इस बार उन्हें 13,000 रुपए प्रति क्विंटल का भाव मिला, तो एक बीघा में कुल 78,000 रुपए की पैदावार मिली. खेती के सभी खर्च निकाल कर कुल 35 से 50 हजार रुपए की शुद्ध आय प्रति बीघा मिली है. इस प्रकार उन्हें सौंफ की खेती से हर साल साढ़े 3 लाख से 4 लाख रुपए तक का कुल शुद्ध लाभ मिल जाता है. इस फसल को कृषि विभाग के अधिकारियों, वैज्ञानिकों और प्रगतिशील किसानों ने देखा और सराहा.

कुन्नाराम बताते हैं कि उन्होंने कृषि विभाग के प्रशिक्षणों में नवीन तकनीक को जानने ले लिए भाग लिया. पड़ोसी राज्य गुजरात में भी सौंफ की खेती और नवीनतम तकनीक अपनाई.

कुन्नाराम के पड़ोसी ओमप्रकाश और मांगीलाल ने उन से सीख ले कर सौंफ की अच्छी खेती की है. पिचियाक गांव के बुधाराम, मिश्रीलाल दगलाराम बताते हैं कि सौंफ की खेती (Fennel Cultivation) से उन्होंने भी 30,000 रुपए प्रति बीघा की दर से शुद्ध आय मिल जाती है.

बिलाड़ा क्षेत्र के कृषि अधिकारी भीखाराम बताते हैं कि सौंफ की खेती (Fennel Cultivation) किसानों की अच्छी कमाई दे रही है, इसलिए बिलाड़ा पंचायत समिति में सौंफ की खेती का रकबा बढ़ा है और सौंफ की खेती का कुल रकबा 800 हेक्टेयर तक पहुंच गया है. खरीफ में कपास, मूंग, तिल, ज्वार की खेती करते हैं और रबी में ज्यादातर किसान सौंफ और जीरा की फसल लेते हैं.

कुन्नाराम की जैविक खेती देख कर पड़ोसी गांव के किसानों ने भी इसे अपनाने की सोची. गांव रामपुरिया के किसान चुन्नीलाल बताते है कि सौंफ में बूंदबूंद सिंचाई से कालिया रोग (ब्लाइट) और गूंदिया वोग (गमोसिस) का नियंत्रण हो जाता है. इस प्रकार बिलाड़ा, पिचियाक, खारिया, जेलवा, भानी, उचियाडा रामपुरिचा गांवों में भी सौंफ की खेती (Fennel Cultivation) से किसानों की अच्छी कमाई हो जाती है.

अधिक जानकारी के लिए आप कुन्नाराम के मोबाइल नंबर 941366051 और लेखक के मोबाइल नंबर में 9414921262 पर संपर्क कर जानकारी ले सकते हैं.

fenugreek : मेथी की वैज्ञानिक खेती

fenugreek : पालक के बाद मेथी दूसरी पत्तेदार या भाजी वाली फसल है, जिस की खेती पूरे देश में की जाती है. मेथी की गिनती मसालेदार फसलों में होती है और इस का इस्तेमाल दवाएं बनाने में भी होता है. मेथी गुणों से भरपूर होती है. इसलिए इस की मांग साल भर बनी रहती है. मेथी में प्रोटीन काफी मात्रा में पाया जाता है. इस में सूक्ष्म तत्त्व भी मौजूद होते हैं. यह विटामिन सी के अलावा विटामिन के का भी अच्छा जरीया है.

आयुर्वेद में मेथी का गुणगान जम कर किया जाता है. यह बात नाशक है और कफ हटाती है. गर्भवती औरतें इस का सेवन करें, तो गर्भाशय ठीक रहता है और दूध भी ठीकठाक बनता है.

मेथी सर्दियों की खास फसल है. अब तो इस के तरहतरह व्यंजन भी बनने लगे हैं. मेथी के लड्डू सेहत बनाने वाले होते हैं, जो अब मिठाई की दुकानों पर भी मिलने लगे हैं. कई बीमारियों और जाड़ों में मेथी खाने की सलाह दी जाती है.

आइए जानें कि कैसे मेथी की वैज्ञानिक तरीके से खेती कर के ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है.

मिट्टी और जलवायु

मेथी की खेती के लिए कम तापमान और औसत बारिश वाले इलाके सही होते हैं. यह पाले को दूसरी फसलों के मुकाबले ज्यादा बरदाश्त कर लेती है, इसलिए पंजाब, राजस्थान, दिल्ली सहित तमाम उत्तरी सूबों में इस की खेती कामयाबी से की जाती है. दक्षिण भारत में भी इसे सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है, लेकिन ज्यादा बारिश वाले इलाकों में इस की खेती नहीं की जा सकती. दक्षिण भारत में यह खरीफ की, जबकि उत्तरी भारत में रबी की फसल है.

वैसे तो मेथी की खेती सभी तरह की मिट्टियों में की जा सकती है, लेकिन चिकनी मिट्टी इस की खेती के लिए ज्यादा मुफीद होती है जिस का पीएच मान 6-7 के बीच होता है. जहां पानी के निकास के बेहतर इंतजाम होते हैं, वहां इस की पैदावार ज्यादा मिलती है.

बोआई

सितंबर से ले कर मार्च तक के महीने मेथी की बोआई के लिए ठीक रहते हैं. पहाड़ी इलाकों में इसे जुलाई से ले कर अगस्त तक बोया जा सकता है.

मेथी की खेती में इन खास बातों का हमेशा ध्यान रखना चाहिए:

* 1 हेक्टेयर के लिए औसत बीज दर 20 किलोग्राम होती है.

* अगर भाजी के लिए फसल उगाई जा रही है, तो इसे 8-10 दिनों के अंतर से बोना चाहिए, जिस से भाजी हर समय मिलती रहे. इस के लिए खेत को 8-10 हिस्सों या छोटीछोटी क्यारियों में बांट लेना चाहिए. क्यारियों की मेंड़ पर मूली लगा कर और पैसा कमाया जा सकता है.

* अगर केवल बीज के लिए फसल बोई जा रही है, तो बोआई नवंबर के आखिर तक कर लेनी चाहिए. इस के लिए बीज दर 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर ठीक रहती है.

* ज्यादा पैदावार लेने के लिए लाइन से लाइन की दूरी 20 से 30 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर रखी जानी चाहिए.

* मेथी की बोआई छिटकवां विधि से भी की जा सकती है.

खाद और उर्वरक

मेथी अपने आप में एक खाद वाली फसल है, इसलिए इस के लिए ज्यादा खाद व उर्वरक इस्तेमाल नहीं करने पड़ते. लेग्यूमिनेसी यानी दलहनी कुल की होने के कारण यह वायुमंडल से नाइट्रोजन इकट्ठा कर लेती है. लेकिन पत्तियां और बीज ज्यादा तादाद में हासिल करने के लिए खाद व उर्वरक निम्नलिखित तादाद में देने चाहिए.

* खेत तैयार करते 150 क्विंटल गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से डालें.

* 20 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश बोआई के वक्त प्रति हेक्टेयर की दर से डालें.

* मैगनीज और जिंक देने से मेथी की पैदावार बढ़ती है, लिहाजा कृषि वैज्ञानिकों से राय ले कर इन का इस्तेमाल भी करें.

* बोआई के बाद 20 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की दर से देने पर पैदावार ज्यादा मिलती है.

सिंचाई

मेथी की अच्छी बढ़वार के लिए 4 बार सिंचाई करना ठीक रहता है. अगर खेती भाजी के लिए की जा रही है, तो हर कटाई के बाद सिंचाई करनी चाहिए. लेकिन बीज के लिए फसल ली जा रही है, तो बोआई के 1 महीने बाद और फूल बनते समय सिंचाई जरूर करनी चाहिए. फलियां भरते वक्त भी 1 सिंचाई करने से बीजों की तादाद बढ़ती है.

खरपतवारों की रोकथाम

ज्यादा पैदावार के लिए जरूरी है कि खरपतवारों को पनपने न दिया जाए. मेथी की फसल शुरुआत में धीमी गति से बढ़ती है, इसलिए इस समय में खेत से खतरपतवार निकाल देने चाहिए वरना वे मेथी के पौधों से ज्यादा बढ़ कर पैदावार घटा देते हैं. 1 महीने के बाद मेथी की फसल तेजी से बढ़ती है, इसलिए इस के बाद खरपतवार ज्यादा नहीं फैल पाते. अगर बोआई से पहले फ्लूक्लोरेलीन नाम की दवा 1 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में मिला दी जाए तो खरपतवार ज्यादा नहीं होते.

रोग और कीट

पत्ता रोग : यह बीमारी मेथी में आमतौर पर हर जगह पाई जाती है, जो सर्कोस्पोरा ट्रेवरसियान नाम की फफूंद की वजह से होती है. इस की मार से छोटेछोटे गोल भूरे रंग के धब्बे पत्ती पर बन जाते हैं. शुरुआत में ये हलके और अलगअलग दिखाई देते हैं, पर बड़े हो जाने पर बहुत से धब्बे मिल कर एक धब्बा बना लेते हैं.

इस बीमारी की रोकथाम के लिए लक्षण दिखते ही ब्लाइटाक्स 50 नाम की दवा का 0.3 फीसदी का घोल बना कर छिड़कना चाहिए. छिड़काव से पहले पत्तियों की कटाई कर के उन्हें 8-10 दिनों बाद इस्तेमाल करना ठीक रहता है.

पाउडरी सिड्यू : एरीसाइफी नाम की फफूंद से होने वाले इस रोग में पत्तियों के ऊपर चूर्ण जैसी परत जमी दिखाई देती है. अगर वक्त रहते इसे काबू न किया जाए, तो फसल की बढ़वार रुक जाती है और दाम भी अच्छे नहीं मिलते.

इस की रोकथाम के लिए घुलने वाली गंधक का 0.2 फीसदी घोल बना कर छिड़कना कारगर साबित होता है. इस के अलावा कैरोथेन नाम की दवा का 0.1 फीसदी वाला घोल छिड़कना चाहिए. रोग का असर कम न हो तो दवा को 15-20 दिनों बाद फिर छिड़कना चाहिए.

डाउनी मिल्ड्यू : यह रोग भी फफूंद से फैलता है, जिस के शुरुआती लक्षण पत्तियों की निचली परत पर दिखते हैं. इस से पौधों की बढ़वार रुक जाती है और फलियां पीली हो कर झड़ने लगती हैं.

इस की रोकथाम के लिए रिडोमिल दवा का 0.2 फीसदी का घोल छिड़कना चाहिए. अगर पहली बार में पूरा असर न दिखे तो फिर 10-15 दिनों बाद छिड़काव करना चाहिए.

जड़ गलन : मेथी में होने वाली यह बीमारी भी आम है और बेहद नुकसानदेह है, जिस में पहले पत्तियों का सूखना शुरु होता है और फिर धीरेधीरे पूरा पौधा सूख जाता है. अगर पौधा बड़ा हो गया हो तो ये लक्षण भी देर से दिखते हैं. इस से बचने के लिए बीजों को ट्राइकोडर्मा नाम की दवा से उपचारित कर के बोना चाहिए, 1 किलोग्राम बीज के लिए दवा की 4 ग्राम मात्रा ठीक रहती है. अगर मेथी हर साल उगाई जानी है, तो खेत की गरमियों में जुताई करने से भी फायदा होता है.

एफिड या माहू : मेथी में लगने वाले कीड़ों में एफिड खास है, जो अधिकतर बीज के लिए बोई गई फसल पर लगता है. एफिड छोटेछोटे कीट होते हैं, जो पत्तियों, फलियों और पौधे के दूसरे हिस्सों को कुतर कर कमजोर बना देते हैं.

एफिड से बचने के लिए डाइमेथोएट नाम की दवा 25 ईसी को 4 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़कना चाहिए.

कटाई और पैदावार

पत्ती यानी भाजी वाली फसल की पहली कटाई बोआई के 3 हफ्ते बाद की जाती है. तब तक पौधों की ऊंचाई करीब 25-30 सेंटीमीटर तक हो जाती है. हमारे देश में मेथी की कटाई के अलगअलग तरीके चलन में है. कहींकहीं पूरा पौधा ही जड़ सहित उखाड़ कर गुच्छे बना कर बेचा जाता है, तो कहींकहीं डालियों को काट कर बेचा जाता है. कसूरी मेथी की कटाई देर से की जाती है.

अगर मेथी की कटाई ज्यादा की जाए तो जाहिर है कि उस का बीज कम मिलता है, इसलिए मेथी की कटाई तभी करनी चाहिए, जब बाजार में भाव अच्छा हो.

अगर 1 बार कटाई के बाद बीज लिया जाए, तो औसत पैदावार 6-8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर मिलती है और 4-5 कटाइयां की जाएं तो यही पैदावार घट कर 1 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रह जाती है.

भाजी या हरी पत्तियों की पैदावार 70-80 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक मिलती है. नवंबर और मार्चअप्रैल में भाजी महंगी बिकती है, इसलिए जल्द या देर से ली जाने वाली किस्में बोई जानी चाहिए.

मेथी की पत्तियों को सुखा कर गरमियों में बेचने से भी 100 रुपए प्रति किलोग्राम तक दाम मिल जाते हैं. अगर वैज्ञानिक तरीके से मेथी की खेती की जाए, तो 1 हेक्टेयर से करीब 50000 रुपए कमाए जा सकते हैं.

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मेथी की उन्नत किस्में

मेथी की आमतौर पर उगाई जाने वाली खास किस्में निम्नलिखित हैं :

कसूरी मेथी : यह किस्म भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद दिल्ली द्वारा विकसित की गई है. इस की पत्तियां छोटी और हंसिए के आकार की होती हैं. इस में 2-3 बार कटाई की जा सकती है. इस किस्म की यह खूबी है कि इस में फूल देर से आते हैं और पीले रंग के होते हैं, जिन में खास किस्म की महक भी होती है. बोआई से ले कर बीज बनने तक यह किस्म लगभग 5 महीने लेती है. इस की औसत पैदावार 65 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

लाम सिलेक्शन : दक्षिणी राज्यों में इस किस्म को बीज लेने के मकसद से उगाया जाता है. इस का पौधा औसत ऊंचाई वाला, लेकिन झाड़ीदार होता है. इस में शाखाएं ज्यादा निकलती हैं.

पूसा अर्ली बंचिंग : मेथी की इस जल्द पकने वाली किस्म को भी आईसीएआर द्वारा विकसित किया गया है. इस के फूल गुच्छों में आते हैं. इस में 2-3 बार कटाई की जा सकती है. इस की फलियां 6-8 सेंटीमीटर लंबी होती हैं. इस किस्म का बीज 4 महीने में तैयार हो जाता है.

यूएम 112 : यह मेथी की उन गिनीचुनी किस्मों में से एक है, जो सीधी बढ़ती है. इस के पौधे औसत से लंबे होते हैं. भाजी और बीज दोनों के लिहाज से यह किस्म उम्दा होती है.

कश्मीरी : मेथी की कश्मीरी किस्म की ज्यादातर खूबियां हालांकि पूसा अर्ली बंचिंग किस्म से मिलतीजुलती हैं, लेकिन यह 15 दिन देर से पकने वाली किस्म है, जो ठंड ज्यादा बरदाश्त कर लेती है. इस के फूल सफेद रंग के होते हैं और फलियों की लंबाई 6-8 सेंटीमीटर होती है. पहाड़ी इलाकों के लिए यह एक अच्छी किस्म है.

हिसार सुवर्णा : चौधरी चरणसिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार द्वारा विकसित की गई यह किस्म पत्तियों और दानों दोनों के लिए अच्छी होती है. इस की औसत उपज 16 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. सर्कोस्पोरा पर्र्ण धब्बा रोग इस में नहीं लगता है. हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के लिए यह एक बेहतर किस्म है.

इन किस्मों के अलावा मेथी की उन्नतशील किस्में आरएमटी 1, आरएमटी 143 और 365, हिसार माधवी, हिसार सोनाली और प्रभा भी अच्छी उपज देती हैं.

Fenugreek : मसाला व औषधीय फसल मेथी

Fenugreek : दुनिया में मसाला उत्पादन व उसे दूसरे देशों में भेजने के हिसाब से भारत सब से आगे है. इसलिए भारत को मसालों का घर भी कहा जाता है. मसाले हमारी खाने की चीजों को स्वादिष्ठ तो बनाते ही हैं, साथ ही हमें इस से विदेशी मुद्रा भी मिलती है. मेथी मसाले की एक खास फसल है. इस की हरी पत्तियों में प्रोटीन, विटामिन सी व खनिज तत्त्व पाए जाते हैं. इस के बीज मसाले व दवा के रूप में काम आते हैं.

भारत में इस की खेती राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश और पंजाब में की जाती है. भारत में मेथी का सब से ज्यादा उत्पादन होता है. इस का इस्तेमाल औषधि के रूप में भी किया जाता है.

भूमि व जलवायु : मेथी को अच्छे जल निकास व सही जीवांश वाली सभी प्रकार की जमीन में उगाया जा सकता है, लेकिन दोमट मिट्टी इस के लिए सब से अच्छी रहती है. यह ठंडे मौसम की फसल है. यह पाले व लवणीयता को भी कुछ हद तक सहन कर सकती है. मेथी की शुरुआती बढ़त के लिए कम नमी वाली जलवायु व कम तापमान सही रहता है, लेकिन पकने के समय गरम व सूखा मौसम ज्यादा फायदेमंद होता है. फूल व फल बनते समय अगर आकाश में बादल छाए रहते हों तो फसल पर कीड़े व बीमारियां लग सकती हैं.

मेथी की अच्छी किस्में

आरएमटी 305 : यह एक बहुफसलीय किस्म है, जिस का औसत बीज भारी होता है. फलियां लंबी और ज्यादा दानों वाली होती हैं. दाने सुडौल, चमकीले पीले होते हैं. इस किस्म में छाछ्या रोग कम लगता है. पकने का समय 120 से 130 दिन है. औसत उपज 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

आरएमटी 1 : यह किस्म पूरे राजस्थान के लिए सही है. इस के पौधे आधे सीधे व मुख्य तना नीचे की ओर गुलाबीपन लिए होता है. इस किस्म पर बीमारियों व कीटों का हमला कम होता है. पकने का समय 140 से 150 दिन है. इस की औसत उपज 14 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

हरी पत्तियों के लिए

पूसा कसूरी : यह छोटे दाने वाली मेथी होती है. इस की खेती हरी पत्तियों के लिए की जाती है. कुल 5 से 7 बार पत्तियों की कटाई की जा सकती है. इस की औसत उपज 5 से 7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

खेत की तैयारी : भारी मिट्टी में खेत की 3 से 4  व हलकी मिट्टी में 2 से 3 जुताई कर के पाटा लगा देना चाहिए और खरपतवार निकाल देने चाहिए.

खाद व उर्वरक : प्रति हेक्टेयर 10 से 15 टन अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद खेत तैयार करते समय डालें. इस के अलावा 40 किलोग्राम नाइट्रोजन व 40 किलोग्राम फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई से पहले खेत में डालें.

बोआई व बीज की मात्रा : इस की बोआई अक्तूबर के आखिरी हफ्ते से नवंबर के पहले हफ्ते तक की जाती है. बोआई में देरी करने से फसल के पकने के समय तापमान ज्यादा हो जाता है, जिस से फसल जल्दी पक जाती है और उपज में कमी आती है व पछेती फसल में कीटों व बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है.

इस के लिए 20 से 25 किलोग्राम बीज की प्रति हेक्टेयर जरूरत पड़ती है. बीजों को 30 सेंटीमीटर की दूरी पर कतारों में 5 सेंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए. बीजों को राइजोबिया कल्चर से उपचारित के कर बोने से फसल अच्छी होती है.

सिंचाई व निराईगुड़ाई : मेथी की खेती रबी में सिंचित फसल के रूप में की जाती है. सिंचाई कितनी बार करनी है यह मिट्टी व बारिश पर निर्भर करता है.

वैसे रेतीली दोमट मिट्टी में अच्छी उपज के लिए करीब 8 सिंचाई करने की जरूरत पड़ती है, लेकिन ऐसी अच्छी भूमि पर जिस में पानी की मात्रा ज्यादा हो 4 से  5 सिंचाई काफी हैं. फलियां व बीजों के विकास के समय पानी की कमी नहीं होनी चाहिए. बीज बोने के बाद हलकी सिंचाई करें.

उस के बाद जरूरत के हिसाब से 15 से 20 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें. बोआई के 30 दिनों बाद निराईगुड़ाई कर के पौधों की छंटाई कर देनी चाहिए व कतारों में बोई फसल से गैर जरूरी पौधों को हटा कर पौधों के बीच की दूरी 10 सेंटीमीटर रखें.

जरूरत हो तो 50 दिनों बाद दूसरी निराईगुड़ाई करें. पौधों की बढ़त की शुरुआती अवस्था में निराईगुड़ाई करने से मिट्टी में हवा लगती है और खरपतवार रोकने में मदद मिलती है.

मेथी में खरपतवार नियंत्रण

मेथी के उगने के 25 व 50 दिनों बाद 2 बार निराईगुड़ाई कर के पूरी तरह से खेत से खरपतवार हटाया जा सकता है. इस के अलावा मेथी की बोआई से पहले 0.75 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर फ्लूक्लोरेलिन को 600 लीटर पानी में मिला कर छिड़काव करें. उस के बाद मेथी की बोआई करें. पेंडीमेथालीन 0.75 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर को 600 लीटर पानी में घोल कर के मेथी की बोआई के बाद मगर उगने से पहले छिड़काव कर के खेत से खरपतवार को हटाया जा सकता है.

ध्यान रखें कि फ्लूक्लोरेलिन के छिड़काव के बाद खेत को खुला नहीं छोड़ें वरना इस का वाष्पीकरण हो जाता है और पेंडीमेथालीन के छिड़काव के समय खेत में नमी होना बहुत जरूरी है.

Fenugreekकीट व उन की रोकथाम

फसल पर नाशीकीटों का प्रकोप कम होता है, लेकिन कभीकभार  एफिड (माहू), जैसिड (तेला), पत्ती भक्षक लटें, सफेद मक्खी, थ्रिप्स, माइटस, फली छेदक व दीमक का आक्रमण पाया जाता है. सब से ज्यादा नुकसान ऐफिड से होता है.

माहू का हमला मौसम में ज्यादा नमी व आसमान में बादल रहने पर होता है. यह कीट पौधों के मुलायम भागों से रस चूस कर नुकसान पहुंचाता है. दाने कम व कम गुणवत्ता के बनते हैं. इन कीटों पर भी ऐफिड के लिए बताए गए उपचार के तरीके अपनाएं, जिन में जैविक तरीका ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करें.

आक्रमण बढ़ता दिखने पर नीम से बने रसायनों जैसे निंबोली अर्क 5 फीसदी या तेल 0.03 फीसदी का 1 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें.

रोग व उन की रोकथाम

छाछिया : यह रोग ‘इरीसाईफी पोलीगोनी’ नामक कवक से होता है. रोग के प्रकोप से पौधों की पत्तियों पर सफेद चूर्ण दिखाई देने लगता है, जो पूरे पौधे पर फैल जाता है. इस से पौधे को नुकसान होता है.

इलाज : गंधक चूर्ण की 20 से 25 किलोग्राम मात्रा का प्रति हेक्टेयर भुरकाव करें या केराथेन एलसी 0.1 फीसदी घोल का छिड़काव करें. जरूरत के हिसाब से 10 से 15 दिनों बाद दोहराएं. रोगरोधी मेथी हिसार माधवी बोएं.

तुलासिता (डाउनी मिल्ड्यू) : यह रोग ‘पेरेनोस्पोरा स्पी’ नाम के कवक से होता है. इस रोग से पत्तियों की ऊपरी सतह पर पीले धब्बे दिखाई देते हैं व नीचे की सतह पर फफूंद दिखाई देती है. जब यह रोग बढ़ जाता है तो पत्तियां झड़ जाती हैं.

इलाज : फसल में ज्यादा सिंचाई न करें. इस रोग की शुरुआत में फसल पर मेंकोजेब 0.2 फीसदी या रिडोमिल 0.1 फीसदी घोल का छिड़काव करें. जरूरत के हिसाब से 15 दिनों बाद दोहराएं. रोगरोधी मेथी हिसार मुकता एचएम 346 बोएं.

जड़गलन : मेथी की फसल में जड़गलन रोग का प्रकोप भी बहुत होता है, जो बीजोपचार कर के, फसलचक्र अपना कर और ट्राइकोडर्मा विरिडी मित्र फफूंद 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद में मिला कर बोआई से पहले जमीन में दे कर कम किया जा सकता है.

कटाई व उपज : जब पौधों की पत्तियां झड़ने लगें व पौधे पीले रंग के हो जाएं, तो पौधों को उखाड़ कर या हंसिया से काट कर खेत में छोटीछोटी ढेरियों में रखें. सूखने के बाद कूट कर या थ्रेसर से दाने अलग कर लें. साफ दानों को सुखाने के बाद बोरियों में भरें. खेती पर ध्यान देने से 15 से 20 क्विंटल बीजों की प्रति हेक्टेयर पैदावार हो सकती है.

Turmeric : हलदी की खेती

Turmeric: हलदी न केवल मसाले की तरह खाने में इस्तेमाल की जाती है, बल्कि इसे सौंदर्य प्रसाधनों व औषधियों में भी इस्तेमाल किया जाता है. हलदी (Turmeric) को एक अच्छा एंटीबायोटिक माना गया है, जो शरीर में रोगों से लड़ने की कूवत को बढ़ाने में मदद करता है. हलदी (Turmeric) में सब से ज्यादा स्टार्च पाया जाता है. इस में 13.01 फीसदी पानी, 6.03 फीसदी प्रोटीन, 5.01 फीसदी वसा, 69.04 फीसदी कार्बोहइड्रेड, 2.06 फीसदी रेशा और 3.05 फीसदी खनिज लवण की मात्रा पाई जाती है.

भारत हलदी (Turmeric) का सब से बड़ा उत्पादक देश है. भारत से दूसरे देशों को हलदी (Turmeric) भेजी जाती है. नकदी फसल मानी जाने वाली हलदी (Turmeric) की खेती कर के किसान कम लागत और कम मेहनत में ज्यादा मुनाफा कमा सकते हैं. इस की खेती के लिए नम व शुष्क जलवायु की जरूरत होती है. हलदी (Turmeric) की फसल अकसर छायादार फसलों के साथ बोई जाती है. इस से हलदी (Turmeric) के पीलेपन में बढ़ोतरी होती है और फसल का उत्पादन ज्यादा होता है.

हलदी (Turmeric) की खेती के लिए सब से सही मिट्टी जीवाश्म युक्त रेतीली व दोमट मटियार मानी गई है. जहां पानी की निकासी का इंतजाम हो, वहां हलदी (Turmeric) की खेती करना सही होता है. अगर पानी की निकासी का ठीक इंतजाम न हो, तो हलदी (Turmeric) की खेती मेंड़ बना कर की जाती है.

हलदी (Turmeric) की खास प्रजातियां : वरिष्ठ उद्यान विशेषज्ञ डा. दिनेश कुमार यादव का कहना है कि देश के अलगअलग क्षेत्रों के लिए हलदी (Turmeric) की कई प्रजातियां सही मानी गई हैं. हलदी (Turmeric) की कुछ खास प्रजातियां सभी जगहों पर लगाई जा सकती हैं. ऐसी ही कुछ प्रजातियां हैं नरेंद्र हलदी 1, नरेंद्र हलदी 2, नरेंद्र हलदी 3, रश्मि व राजेंद्र सोनिया. खास इलाकों के लिए सीओ 1 प्रजाति उम्दा मानी गई है. यह प्रजाति 285 दिनों में पक कर तैयार होती है और इस से लगभग 6 टन प्रति हेक्टेयर की उपज मिलती है. इस के अलावा सुगंधा सुवर्णा, सुरोमा, सुगना, कृष्णा, रेखानूरी व पीसीटी 8 सिलांग वगैरह भी अच्छी किस्में मानी गई?हैं.

खेत की तैयारी व रोपाई : हलदी (Turmeric) की फसल लेने के लिए सब से पहले मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करनी चाहिए. उस के बाद 1 जुताई कल्टीवेटर से कर के पाटा लगा देना चाहिए और फिर 5-7 मीटर लंबी व 2-3 मीटर चौड़ी क्यारियां बना कर खेत को बांट लेना चाहिए.

क्यारियां बनाते समय यह जरूर ध्यान रखें कि उन से पानी निकलने का सही इंतजाम हो. हलदी (Turmeric) की बोआई के लिए सब से सही समय मई महीने से ले कर जुलाई महीने तक का माना गया है. 1 हेक्टेयर ख्ेत के लिए 12 से 14 क्विंटल हलदी (Turmeric) के कंदों की जरूरत पड़ती है. तैयार की गई क्यारियों में लाइन से लाइन की दूरी 30 से 45 सेंटीमीटर व कंदों की आपसी दूरी 25 सेंटीमीटर व कंदों की गहराई 4-5 सेंटीमीटर रख कर रोपाई की जाती है.

खाद व उर्वरक की मात्रा : हलदी (Turmeric) की बोआई के समय ही 100 से 120 क्विंटल सड़ी गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में मिला देनी चाहिए. इस के साथ ही 50 किलोग्राम नीम की खली व 120 किलोग्राम अरंडी की खली का मिश्रण बना कर मिट्टी में मिला देना चाहिए. बोआई के समय ही 100 से 120 किलोग्राम नाइट्रोजन की आधी मात्रा व 60 से 80 किलोग्राम फास्फोरस व 80 से 100 किलोग्राम पोटाश मिट्टी में मिलाने से फसल उत्पादन अच्छा मिलता है. नाइट्रोजन की बची आधी मात्रा बोआई के 60 दिनों बाद डालनी चाहिए.

सिंचाई व खरपतवार नियंत्रण : हलदी (Turmeric) की फसल को ज्यादा नमी की जरूरत पड़ती है. बोआई से बारिश शुरू होने तक 4 से 5 बार फसल की सिंचाई करना जरूरी होता है. बारिश का मौसम शुरू होने के बाद 20 से 25 दिनों के अंतर पर फसल की सिंचाई करते रहना चाहिए.

नवंबर में हलदी (Turmeric) के कंद का विकास और मोटाई शुरू हो जाती है, इस दौरान फसल के अगलबगल मिट्टी चढ़ा कर सिंचाई करनी चाहिए, क्योंकि खेतों में पानी भरने से फसल के कंदों को नुकसान पहुंचता है. सिंचाई के साथसाथ खरपतवार नियंत्रण किया जाना भी बहुत जरूरी हो जाता है, क्योंकि नमी बने रहने से खरपतवार उग आते हैं. इसीलिए पूरी फसल के दौरान कम से कम 3 बार निराईगुड़ाई का काम किया जाना चाहिए. फसल रोपने के 3 महीने बाद पहली निराईगुड़ाई व 30-30 दिनों के अंतराल पर दूसरी व तीसरी निराईगुड़ाई करनी चाहिए.

कीटों व बीमारियों की रोकथाम : कृषि विज्ञान केंद्र बंजरिया बस्ती में कीट नियंत्रण के विशेषज्ञ डा. प्रेमशंकर का कहना है कि हलदी (Turmeric) में वैसे तो कीट अधिक नुकसान नहीं पहुंचाते हैं फिर भी कुछ कीटों का प्रकोप देखा गया है.

तनाबेधक कीट पौधे के कल्लों का रस चूस लेते हैं जिस से पौधे सूखने लगते हैं. इसी तरह थ्रिप्स नाम के कीट पत्तियों का रस चूस कर पौधों को सुखा देते हैं. इन कीटों की रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफास की 1 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर पानी में मिला कर या कार्बोसल्फाम की 1 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर पानी में मिला कर फसल पर छिड़काव करना चाहिए. 1 हेक्टेयर फसल के लिए 1 लीटर कीटनाशक का इस्तेमाल किया जाता है.

हलदी  (Turmeric) में खासतौर पर पर्णचित्ती रोग का प्रकोप देखा गया है, जो टैफरीना मैक्यूलेस नामक फफूंद के कारण होता है. इस रोग के प्रकोप से फसल की पत्तियों के ऊपरी सिरों पर लाल व भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं और पत्तियां सूखने लगती हैं. इस की रोकथाम के लिए मैंकोजेब 63 फीसदी डब्ल्यूपी या कार्बेंडाजिम 12 फीसदी डब्ल्यूपी की 750 ग्राम की मात्रा का प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए.

खुदाई व भंडारण : हलदी (Turmeric) की अगेती फसल की खुदाई बोआई के 7 महीने बाद व पछेती फसल की खुदाई 9 महीने बाद की जाती है. मई व जून में बोई गई फसल फरवरी में खोदे जाने लायक हो जाती है. इस समय हलदी (Turmeric) की फसल में घनकंद यानी गांठें अच्छी तरह से बड़ी हो जाती हैं और पत्तियां पीली पड़ जाती हैं. खुदाई से पहले ही पौधों को काट लेना चाहिए. उस के बाद हलकी सिंचाई कर के कुदाल से इस की खुदाई करनी चाहिए.

1 हेक्टेयर रकबे में बोई गई फसल से 150 से 200 क्विंटल कच्ची हलदी (Turmeric) की उपज मिलती है, जबकि असिंचित इलाकों में यह उपज 80 से 120 क्विंटल होती है. हलदी को सुखाने के बाद यह मात्रा कुल उपज की महज 15 से 25 फीसदी ही बचती है. हलदी (Turmeric) सुखाने से पहले उसे किसी बडे़ बर्तन में रख कर उबाला जाता है. उबालते समय जब हलदी की गांठें नम पड़ने लगें, तो हलदी (Turmeric) को आंच से उतार कर कड़ी धूप में सुखा लेना चाहिए. इस के बाद किसी हवादार जगह पर बोरों में भर कर इस का भंडारण करना चाहिए.

Cumin : जीरा फसल सही देखभाल से अच्छे दाम

Cumin : अकसर इस्तेमाल किया जाने वाला जीरा (Cumin) बीज मसाले वाली एक खास फसल है. इस का इस्तेमाल मसाले के अलावा दवा बनाने के लिए भी किया जाता है. इस के बीजों में 2.5 से 4.5 फीसदी तेल पाया जाता है. इस तेल का तत्त्व क्यूमिनोल है, जिस के कारण जीरे (Cumin) के बीजों में खुशबू होती है. बाहर भेजे जाने वाले जीरे (Cumin) में कोई गंदगी किसी किस्म की मिलावट नहीं होनी चाहिए जीरा या किसी भी खाने की चीज में मिलावट होने से कई प्रकार की बीमारियां हो सकती हैं.

जीरे की फसल में कटाई के बाद उस के भंडारण के समय अकसर छोटेछोटे जीवों का प्रकोप हो जाता है. इन छोटे कीड़ों में कवक (मोल्ड) व जीवाणु मुख्य होते हैं, जो रासायनिक क्रिया द्वारा जहर पैदा करते हैं. जो फफूंद जहर बनाते हैं, उन्हें  विष फफूंद कहते हैं. ये विष फफूंद मसालों की खुशबू को खत्म कर देते हैं और उन के द्वारा बनाए हुए फफूंद विष सेहत के लिए नुकसानदायक होते हैं और कैंसर भी पैदा कर सकते हैं.

भारत से अमेरिका, ब्रिटेन, जरमनी, यूरोप, जापान व कनाडा वगैरह देशों को जीरा भेजा जाता है. इन देशों में खाने के सामान को ले कर काफी कड़े नियम हैं. इसलिए जीरा व दूसरी खाने की वस्तुएं साफसुथरे ढंग से तैयार की गई होनी चाहिए. अमेरिकन मसाला व्यापार संगठन ने साफसफाई की एक सीमा तय कर दी है. अगर जीरे के नमूने में मरे हुए कीटपतंगे, जानवरों का मलमूत्र या अन्य गंदी चीजें मिली हों तो अमेरिका के नियमों पर वह खरा नहीं उतरता.

Cumin

यदि जीरे में पाई गई कमियां दूर नहीं हो पातीं, तो भेजा हुआ माल या तो फेंक दिया जाता है या फिर भेजे जाने वाले देश को वापस कर दिया जाता है, जिस से बहुत नुकसान होता है. इसलिए जीरा फसल में कटाईसफाई व भंडारण सही ढंग से करना चाहिए.

जीरा फसल की कटाई समय पर करें. कटाई के समय जीरा फसल के बीजों को मिलावटी पदार्थ से बचाना चाहिए. खयाल रखें कि इस में चूहों, जानवरों और चिडि़यों के बाल, मूलमूत्र, पंख वगैरह न हों. सभी मिलावटी पदार्थों का ध्यान रखना चाहिए, जिस से एफ्लाटाक्सिन विष फफूंद नहीं पनपे. जीरे में सालमोनेला व ईकोली की मौजूदगी नहीं होनी चाहिए.

कटाई के बाद जीरा फसल की सफाई के लिए पक्के फर्श का इस्तेमाल करें या प्लास्टिक की शीट, त्रिपाल पर रखें. बरसात की संभावना होने पर खलिहान को त्रिपाल से ढक कर रखें, जिस से जीरा भीगे नहीं. भंडारण या रखरखाव के समय सही नमी का इंतजाम करें और जीरे को साफसूखी बोरियों में भरें.

कटाई के बाद भंडारण के दौरान ध्यान रखें कि वहां चूहे या परिंदे न घुसने पाएं. रेत व अन्य कचरे की मिलावट से जीरे को बचाएं. भंडारगृह में मसाला भरी बोरियों को सीधे फर्श पर न रखें. बोरियों को दीवार से सटा कर भी न रखें, क्योंकि इस से नमी का खतरा रहता है और नमी से विष फफूंद पनपते हैं.

इस प्रकार जीरे की फसल की कटाई, सफाई, ग्रेडिंग व भंडारण में सावधानियां बरत कर किसान  मुनाफा कमा सकते हैं.

सौंफ (Fennel) की उन्नत खेती

मसालों में सौंफ एक खास फसल है. इस के पत्ते, तने, फूल और बीज सुगंधित होते हैं.

सौंफ का इस्तेमाल मसाले के तौर पर कई खाद्य पदार्थों जैसे सूप, चटनी, पेस्ट्री, ब्रेडरोल, अचार वगैरह में स्वाद, खुशबू और दवा के रूप में भी किया जाता है. देश में सौंफ की खेती खासकर राजस्थान, गुजरात और उत्तर प्रदेश में की जाती है. राजस्थान में इस की खेती मुख्य रूप से सिरोही, नागौर, जोधपुर, टोंक, पाली, दौसा और जालौर जिलों में की जाती है.

वातावरण : सूखा और ठंडा मौसम इस की अच्छी बढ़वार व उपज के लिए बेहतर रहता है. यह जाड़े के मौसम में बोई जाने वाली फसल है. सौंफ की अच्छी बढ़वार के लिए 15-20 डिगरी सेल्सियस तापमान सही रहता है. तापमान बढ़ने से इस के पौधों में समय से पहले फूल आने और दाने अधपके रहने से पैदावार पर बुरा असर पड़ता है.

सौंफ की फसल में खासतौर पर फूल आने के दौरान ज्यादा नमी और बादल छाए रहने से कीड़ों व रोगों का हमला बढ़ जाता है. फूल आते समय पाला पड़ना इस की फसल के लिए हानिकारक है.

जमीन: जिस मिट्टी में भरपूर मात्रा में जैविक पदार्थ मौजूद हों, उस में सौंफ की खेती की जा सकती है. इस की अच्छी पैदावार के लिए उर्वरक और अच्छे जल निकास वाली बलुईदोमट जमीन ज्यादा सही रहती है. इस की खेती के लिए मिट्टी का पीएच मान 6.5 से 8.0 के बीच होना चाहिए.

खेत की तैयारी: सौंफ की खेती के लिए खेत तैयार करने के लिए सब  पहले मिट्टी पलटने वाले हल से एक गहरी जुताई करें. बाद की 2-3 जुताई देशी हल या हैरो से करने के बाद पाटा चला कर मिट्टी भुरभुरी व खेत को समतल कर लें. खरपतवार व कंकड़पत्थर को खेत से बाहर कर दें. समतल खेत में सुविधानुसार क्यारियां बना लें.

उन्नत किस्में

जीएफ 11: यह प्रजाति सिंचित खेती के लिए बेहतरीन है. इस में सभी छत्रक तकरीबन साथ आते हैं और यह पछेती गरमी को सहने वाली किस्म है. इस में वाष्पशील तेल की मात्रा 1.8 फीसदी होती है. यह 200-230 (पौधा रोपाई विधि) दिनों में पक जाती है.

इस की औसत उपज कूवत 24 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

एएफ 1 : यह किस्म जल्दी बोआई और रबी के मौसम के लिए अच्छी है. इस प्रजाति के पौधे सीधे और छत्रक बड़ा होता है. इस में वाष्पशील तेल की मात्रा 1.6 फीसदी होती है. इस किस्म की औसत उपज कूवत 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. यह किस्म अल्टरनेरिया और रेमुलेरिया ब्लाइट के प्रतिरोधक है.

आरएफ 101 : यह प्रजाति दोमट और काली कपास वाली जमीन के लिए बेहतरीन है. यह 150 से 160 दिनों में पक जाती है. इस के पौधे सीधे व मध्यम ऊंचाई वाले होते हैं. इस की औसत उपज कूवत 15 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. इस में वाष्पशील तेल की मात्रा 1.2 फीसदी होती है. इस किस्म में रोगों की प्रतिरोधक कूवत ज्यादा और कीड़े भी कम लगते हैं.

आरएफ 143 : इस किस्म के पौधे सीधे व ऊंचाई में 116-118 सेंटीमीटर होते हैं, जिन पर 7-8 शाखाएं निकलती हैं. छत्रक (अंबल) घना होता है और प्रति पौधा अंबलों की संख्या 23-62 होती है. एक अंबल में 283 तक बीज होते हैं. इस में वाष्पशील तेल की मात्रा 1.87 फीसदी होती है. इस की फसल 140-150 दिनों में पक जाती है. इस की औसत उपज कूवत 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

आरएफ 125 : यह शीघ्र पकने वाली किस्म है. इस के पौधे कम ऊंचाई वाले होते हैं. इस का छत्रक घना, लंबा, सुडौल व आकर्षक दानोंयुक्त होता है. इस किस्म में अल्टरनेरिया झुलसा के प्रति प्रतिरोधकता ज्यादा होती है और तेलिया कीट भी कम लगते हैं. यह प्रजाति 110 से 130 दिनों में पक जाती है. इस की औसत उपज कूवत 17 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. वाष्पशील तेल की मात्रा 1.9 फीसदी होती है.

आरएफ 205 : यह प्रजाति राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और बिहार के लिए बेहतरीन है. इस के पौधे सीधे व मध्यम लंबाई वाले होते हैं. इस की फसल 140 से 150 दिनों में पक जाती है. इस की औसत उपज कूवत 16 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. यह किस्म रेमूलेरिया ब्लाइट के प्रति प्रतिरोधक होती है और इस में तेला और दूसरे कीटों का प्रकोप भी कम होता है. इस के बीज लंबे, सुंदर और सुडौल होते हैं, जिन में वाष्पशील तेल की मात्रा 2.48 फीसदी होती है.

सौंफ (Fennel)

बीज दर और बीजोपचार : बीज से सौंफ की बोआई करने पर 8-10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज लगता है. नर्सरी में सौंफ की पौध तैयार करने के लिए 1 हेक्टेयर खेत के लिए 2.5 से 4 किलोग्राम बीज ही काफी होता है. सौंफ को रोगों से बचाने के लिए ट्राइकोडर्मा मित्र फफूंद 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए.

बोआई का समय: लंबी अवधि की फसल होने की वजह से सौंफ की रबी की शुरुआत में ही बोआई करना फायदेमंद रहता है. अच्छी पैदावार लेने के लिए समय पर बोआई करनी चाहिए. पौधशाला में पौध तैयार कर के सौंफ की रोपाई की जा सकती है. अक्तूबर का पहला हफ्ता सौंफ की बोआई के लिए सही रहता है. नर्सरी विधि से बोने पर सौंफ की नर्सरी में बोआई जुलाईअगस्त में की जाती है और 45 से 60 दिनों बाद पौधों की रोपाई कर दी जाती है.

बोआई की विधि

बीज से सीधी बोआई : बीज से बोआई करने पर क्यारियों में बीजों को छिटक कर या 45 सेंटीमीटर दूर लाइनों में बोते हैं. कतार विधि में हुक की सहायता से 45 सेंटीमीटर की दूरी पर लाइनें खींच कर 2 सेंटीमीटर गहराई पर उपचारित बीजों की बोआई 15-20 सेंटीमीटर की दूरी पर करते हैं, जिन का अंकुरण 7 से 11 दिनों के बाद शुरू हो जाता है. पहली निराईगुड़ाई के समय लाइनों से फालतू पौधों को निकाल कर पौधों के बीच की दूरी 20 सेंटीमीटर कर देनी चाहिए.

नर्सरी

रोपाई विधि: इस विधि से बोआई करने के लिए पहले नर्सरी में पौध तैयार की जाती है. जूनजुलाई में 1 हेक्टेयर क्षेत्र के लिए 100 वर्गमीटर जमीन में 3×2 मीटर आकार की क्यारियां बना कर नर्सरी तैयार कर लेनी चाहिए. क्यारियों में 15-20 टोकरी गोबर की सड़ी हुई खाद या कंपोस्ट मिला देनी चाहिए. इस के अलावा 2 किलोग्राम डीएपी व 500 ग्राम यूरिया मिला देना चाहिए. 20 सेंटीमीटर दूरी पर लाइनें बना कर बीजों की बोआई करनी चाहिए. समयसमय पर जरूरत के मुताबिक पानी देना चाहिए. 40-50 दिनों में पौध तैयार हो जाती है. पौधे से पौधे की दूरी 20 सेंटीमीटर रखनी चाहिए.

खाद और उर्वरक : खेत की मिट्टी की जांच कर के खाद और उर्वरक सही मात्रा में देने चाहिए. सौंफ की अच्छी पैदावार के लिए 10-15 टन अच्छी सड़ी गोबर की खाद या कंपोस्ट प्रति हेक्टेयर की दर से सौंफ बोने या रोपने के 3-4 हफ्ते पहले खेत में अच्छी तरह मिला देना चाहिए. इस के अलावा सामान्य उर्वरता वाली जमीन में 90 किलोग्राम नाइट्रोजन और 40 किलोग्राम फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की दर से देनी चाहिए.

नाइट्रोजन की 30 किलोग्राम और फास्फोरस की पूरी मात्रा खेत की अंतिम जुताई के साथ देनी चाहिए. नाइट्रोजन की शेष मात्रा को 2 भागों में बांट कर 30 किलोग्राम बोआई के 45 दिनों बाद और शेष 30 किलोग्राम फूल आते समय सिंचाई के साथ देनी चाहिए.

सिंचाई: सौंफ लंबे समय की फसल होने से इस में सिंचाई की जरूरत अन्य बीजीय मसाला फसलों की तुलना में ज्यादा होती है. बोआई के एकदम बाद इस की सिंचाई करनी चाहिए ताकि जिस में बीज जम जाएं. सिंचाई करते समय ध्यान रखना चाहिए कि पानी का बहाव तेज न हो वरना बीज बह कर किनारों पर इकट्ठा हो जाएंगे. दूसरी सिंचाई बोआई के 7-8 दिनों बाद करनी चाहिए, ताकि बीजों का अंकुरण पूरा हो जाए. इस के बाद सर्दियों में 15-20 दिनों के बीच सिंचाई करनी चाहिए. फूल आने के बाद और दाना बनते समय फसल को पानी की कमी नहीं होनी चाहिए.

निराईगुड़ाई और खरपतवार प्रबंधन : फसल की सही बढ़वार और ज्यादा पैदावार के लिए सौंफ के पौधे जब 8-10 सेंटीमीटर के हो जाएं तब गुड़ाई कर के जहां पौधे ज्यादा हों वहां से कमजोर पौधों को निकाल कर पौधे से पौधे की दूरी 20 सेंटीमीटर कर दें.

फूल आते समय पौधे के तने के पास मिट्टी चढ़ा दें, ताकि तेज हवाओं से पौधे न गिरें. सौंफ की खेती की शुरुआती बढ़वार कम और पौधे के बीच ज्यादा दूरी होने के कारण शुरुआती अवस्था में खरपतवारों की दिक्कत ज्यादा रहती है.

सौंफ (Fennel)

रोग व कीड़ों की रोकथाम

तना और जड़ गलन : तने का नीचे से मुलायम होना और जड़ों का गलना इस रोग का खास लक्षण है. पौधे में काले रंग के स्क्लेरोशिया दिखाई देते हैं. इस रोग से पौधे की बढ़वार वाली पत्तियां पीली पड़ कर मुरझा जाती हैं और जड़ गलने से पूरा पौधा सूख जाता है. इस की रोकथाम के लिए फसलचक्र अपनाएं और बीजों को ट्राइकोडर्मा मित्र फफूंद 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज से बीजोपचार करें और बोआई से पहले जमीन में ट्राइकोडर्मा मित्र फफूंद 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज से बीजोपचार करें. बोआई से पहले जमीन में ट्राइकोडर्मा की ढाई किलोग्राम मात्रा 100 किलोग्राम गोबर की खाद में 15 दिन नमीयुक्त रखने के बाद जमीन में मिलाएं.

छाछया (पाउडरी मिल्ड्यू) : यह एक फफूंदजनित रोग है, जिस की शुरुआत पत्तियों व टहनियों पर सफेद चूर्ण के रूप में होती है, जो बाद में पूरे पौधे पर फैल जाता है.

इस रोग की रोकथाम के वास्ते लक्षण दिखाई देते ही गंधक चूर्ण 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर का बुरकाव करें या घुलनशील गंधक की 2.5 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें. जरूरत पड़ने पर इसे 15 दिन बाद दोहराएं.

झुलसा (ब्लाइट) : इस रोग की शुरुआत बोआई के 60 से 70 दिनों बाद नीचे पत्तियों पर गहरे भूरे रंग के रूप में होती है. धीरेधीरे ये धब्बे पूरे पौधे पर फैल जाते हैं और फूलकलियां सब पीली पड़ कर सूख जाने से पैदावार में गिरावट आती है.

इस रोग की रोकथाम के लिए रोग के लक्षण दिखाई देते ही कापर आक्सीक्लोराइड के 0.3 फीसदी घोल का छिड़काव करें. जरूरत के मुताबिक 15 दिनों बाद इसे दोहराएं. सौंफ की ज्यादा सिंचाई न करें. वैसे ड्रिप विधि द्वारा सिंचाई करने से रोग कम होता है.

गोंदिया : यह रोग पुष्प छत्रकों पर चिपचिपे गोंद के रूप में दिखाई देता है, जिस से पुष्प छत्रक सिकुड़ कर सूखने लगते हैं और फसल की पैदावार में भारी नुकसान होता है. इस की रोकथाम के लिए रोगमुक्त बीज इस्तेमाल करें, दीर्घकालीन फसलचक्र अपनाएं. पोषक तत्त्व प्रबंधन और संतुलित सिंचाई का इस्तेमाल कर के इसे कम किया जा सकता है.

मोयला : इस कीड़े के आक्रमण से काफी नुकसान होता है. यह हरेपीले रंग का सूक्ष्म कोमल शरीर वाला कीड़ा है. इसे चेपा, माहू, कालिया मच्छर हानि पहुंचाता है. इस का असर फसल में फूल आने के समय शुरू होता है और दाना पकते समय तक रहता है.

शुरू में इन कीड़ों का प्रकोप गुच्छों में कुछ पौधों पर ही होता है, जो पूरी फसल में फैल जाता है. रोकथाम के लिए खेत में 12 पीले चिपचिपे ट्रेप प्रति हेक्टेयर लगाएं. नीम बीज सत (एनएसकेई) 5 फीसदी या नीम तेल 2 फीसदी या डाइमिथियोट 20 ईसी 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के घोल या वर्टिसीलियम लेकैनी (जैव कीटनाशी) का छिड़काव कर के भी इसे रोका जा सकता है.

पाले से बचाव : पाला पड़ने से सौंफ काफी प्रभावित होती है. फूल आने के दौरान पाले से सौंफ को भारी नुकसान हो सकता है. जब पाला पड़ने की आशंका हो उस दौरान सिंचाई करनी चाहिए. आधी रात के बाद खेत में घुआं कर के फसल को पाले से बचाया जा सकता है. पौधों में फूल आने के बाद गंधक अम्ल 0.1 फीसदी का घोल बना कर छिड़काव कर के पौधों को पाले से बचाया जा सकता है.

कटाई : सौंफ के सभी छत्रक एकसाथ नहीं पकते, इसलिए जब पूरा दाना विकसित हो जाए और हरापन लिए हो, तब उन छत्रकों की तोड़ाई कर के उन्हें छायादार और हवादार स्थान पर सुखाना चाहिए. इस तरह 7 दिनों के बीच 4 बार छत्रकों की तोड़ाई करें.

इन्हें सुखाते समय बारबार पलटते रहें, वरना इन में फफूंद लगने की आशंका रहती है. अच्छे किस्म की चबाने के काम आने वाली लखनवी सौंफ पैदा करने के लिए जब दाने पूरी तरह विकसित दानों की तुलना में आधे हों और नाखून से कट जाएं तब छत्रकों की कटाई कर के साफ जगह पर छाया में फैला कर सुखाने चाहिए. बोआई के लिए बीज हासिल करने के लिए मुख्य छत्रकों के दाने जब पूरी तरह पक कर पीले पड़ने लगें तभी उन्हें काटना चाहिए.

उपज : सौंफ की उन्नत विधियों से खेती करने पर पूरी तरह विकसित और हरे दाने वाली सौंफ की 20 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज हासिल की जा सकती है. साधारणतया 7 से 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर महीन किस्म की सौंफ की पैदावार ली जा सकती है.

लहसुन (Garlic) की आधुनिक खेती

लहसुन कंद वाली मसाला फसल है. मध्य प्रदेश में लहसुन का रकबा 60000 हेक्टेयर है और उत्पादन 270 हजार टन है. लहसुन की खेती मंदसौर, नीमच, रतलाम, धार, व उज्जैन के साथसाथ प्रदेश के सभी जिलों में की जा सकती है. आजकल इस का प्रसंस्करण कर के पाउडर, पेस्ट व चिप्स तैयार करने की तमाम इकाइयां मध्य प्रदेश में कार्यरत हैं, जो प्रसंस्करण किए गए उत्पादों को दूसरे देशों में बेच कर अच्छा मुनाफा कमा रही है.

जलवायु : लहसुन को ठंडी जलवायु की जरूरत होती है. वैसे तो लहसुन के लिए गरमी और सर्दी दोनों ही मौसम मुनासिब होते हैं, लेकिन ज्यादा गरम और लंबे दिन इस के कंद बनने के लिए सही नहीं रहते हैं. छोटे दिन इस के कंद बनने के लिए अच्छे माने जाते हैं. इस की सफल खेती के लिए 29 से 35 डिगरी सेल्सियस तापमान मुनासिब होता है.

खेत की तैयारी : इस के लिए जल निकास वाली दोमट मिट्टी बढि़या रहती है. भारी मिट्टी में इस के कंदों की सही बढ़ोतरी नहीं हो पाती है. मिट्टी का पीएच मान 6.5 से 7.5 ठीक रहता है. 2-3 बार जुताई कर के खेत को अच्छी तरह बराबर कर के क्यारियां व सिंचाई की नालियां बना लेनी चाहिए.

अन्य किस्में : नासिक लहसुन, अगेती कुआरी, हिसार स्थानीय, जामनगर लहसुन, पूना लहसुन, मदुराई पर्वतीय व मैदानी लहसुन, वीएलजी 7 आदि स्थानीय किस्में हैं.

लहसुन (Garlic)

बोआई का समय : लहसुन की बोआई का सही समय अक्तूबर से नवंबर के बीच होता है.

बीज व बोआई : लहसुन की बोआई के लिए 5 से 6 क्विंटल कलियों बीजों की प्रति हेक्टेयर जरूरत होती है. बोआई से पहले कलियों को मैंकोजेब और कार्बांडाजिम दवा के घोल से उपचारित करना चाहिए. लहसुन की बोआई कूंड़ों में बिखेर कर या डिबलिंग तरीके से की जाती है. कलियों को 5 से 7 सेंटीमीटर की गहराई में गाड़ कर ऊपर से हलकी मिट्टी से ढक देना चाहिए. बोते समय कलियों के पतले हिस्से को ऊपर ही रखते हैं. बोते समय बीज से बीज की दूरी 8 सेंटीमीटर व कतार से कतार की दूरी 15 सेंटीमीटर रखना ठीक होता है. बड़े क्षेत्र में फसल को बोने के लिए गार्लिक प्लांटर का भी इस्तेमाल किया जा सकता है.

खाद व उर्वरक : सामान्यतौर पर प्रति हेक्टेयर 20 से 25 टन पकी गोबर या कंपोस्ट या 5 से 8 टन वर्मी कंपोस्ट, 100 किलोग्राम नाइट्रोजन 50 किलोग्राम फास्फोरस व 50 किलोग्राम पोटाश की जरूरत होती है. इस के लिए 175 किलोग्राम यूरिया, 109 किलोग्राम डाई अमोनियम फास्फेट व 83 किलोग्राम म्यूरेट औफ पोटाश की जरूरत होती है. गोबर की खाद, डीएपी व पोटाश की पूरी मात्रा और यूरिया की आधी मात्रा खेत की आखिरी तैयारी के समय खेत में मिला देनी चाहिए. बची हुई यूरिया की मात्रा को खड़ी फसल में 30 से 40 दिनों बाद छिड़काव के साथ देना चाहिए. सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की मात्रा का इस्तेमाल करने से उपज में बढ़ोत्तरी हाती है. 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर 3 साल में 1 बार इस्तेमाल करना चाहिए.

सिंचाई व जल निकास : बोआई के तुरंत बाद हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए. वानस्पतिक बढ़ोतरी के समय 7 से 8 दिनों के अंतर पर और फसल पकने के समय 10 से 15 दिनों के अंतर पर सिंचाई करते रहना चाहिए पर खेत में पानी नहीं भरने देना चाहिए.

निराईगुड़ाई व खरपतवार नियंत्रण : जड़ों में हवा की सही मात्रा के लिए खुरपी या कुदाली द्वारा बोने के 25 से 30 दिनों बाद पहली निराईगुड़ाई व 45 से 50 दिनों बाद दूसरी निराईगुड़ाई करनी चाहिए.

लहसुन (Garlic)खुदाई व लहसुन का सुखाना : जिस समय पौधों की पत्तियां पीली पड़ जाएं और सूखने लग जाएं तो सिंचाई बंद कर के खुदाई करनी चाहिए. इस के बाद गांठों को 3 से 4 दिनों तक छाया में सुखा लेते हैं. फिर 2 सेंटीमीटर छोड़ कर पत्तियों को कंदों से अलग कर लेते हैं. कंदों को भंडारण में पतली तह में रखते हैं. ध्यान रखें कि फर्श पर नमी न हो.

बढ़ोतरी नियामक का प्रयोग : लहसुन की उपज ज्यादा हो इसलिए 0.05 मिलीलीटर प्लैनोफिक्स या 500 मिग्रा साइकोसिल या 0.05 मिलीलीटर इथेफान प्रति लीटर पानी में घोल बना कर बोआई के 60 से 90 दिनों बाद छिड़काव करना सही रहता है.

कंद की खुदाई से 2 हफ्ते पहले 3 ग्राम मैलिक हाइड्रोजाइड प्रति लीटर पानी में छिड़काव करने से भंडारण के समय अंकुरण नहीं होता है व कंद 10 महीने तक बिना नुकसान के रखे जा सकते हैं.

भंडारण : अच्छी तरह से सुखाए गए लहसुन को उन की छंटाई कर के हवादार घरों में रख सकते हैं. 5 से 6 महीने भंडारण से 15 से 20 फीसदी तक का नुकसान मुख्य रूप से सूखने से होता है. पत्तियां सहित बंडल बना कर रखने से कम नुकसान होता है.

औषधीय गुण : भोजन को पचाने व सोखने में लहसुन काफी फायदेमंद है. यह रक्त कोलेस्ट्राल के गाढ़ेपन को कम करता है. इस का इस्तेमाल करने से कई बीमारियों जैसे गठिया, तपेदिक, कमजोरी, कफ व लाल आंखें हो जाना आदि से छुटकारा पाया जा सकता है.

कीटनाशी प्रभाव : लहसुन के रस में कीटनाशी गुण के कारण 10 मिलीलीटर अर्क प्रति लीटर पानी में घोल कर इस्तेमाल करने से मच्छर व घरेलू मक्खी की रोकथाम की जा सकती है.

जीवाणुनाशी प्रभाव : स्टेफाइलोकोकस आरियस नामक जीवाणु की रोकथाम लहसुन के इस्तेमाल से की जा सकती है. खाद्य पदार्थो में 2 फीसदी से ज्यादा लहसुन की मात्रा जहर पैदा करने वाले जीवाणु क्लोस्ट्रीडियम परिफ्रंजेंस से रक्षा करती है. इस के अलावा इस में अन्य कई प्रकार के हानिकाक जीवाणुओं से बचाने की कूवत होती है.

खास कीट

माहूं (माईजस परसिकी) : इस के निम्फ व वयस्क पौधे से रस चूसते हैं, जिस से पत्तियां किनारों से मुड़ जाती हैं. कीट की पंख वाली जाति लहसुन में वाइरस जनित रोग भी फैलाती है. ये चिपचिपा मधुरस पदार्थ अपने शरीर के बाहर निकालते हैं, जिस से पत्तियों के ऊपर काली फफूंद पनपती देखी जा सकती है, जिस से पौधों की भोजन बनाने की क्रिया पर असर पड़ता है.

रोकथाम : माहूं का प्रकोप होने पर पीले चिपचिपे ट्रैप का इस्तेमाल करें, जिस से माहूं ट्रैप पर चिपक कर मर जाएं. परभक्षी काक्सीनेलिड्स या सिरफिड या क्राइसोपरला कार्निया को एकत्र कर 50000-100000 अंडे या सूंड़ी प्रति हेक्टेयर की दर से छोडे़ं. जरूरतानुसार डाइमेथोएट 30 ईसी या मेटासिसटाक्स 25 ईसी 1.25-2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

लहसुन का मैगट : मैगट पौधे के तने व शल्ककंद में घुस कर नुकसान पहुंचाते हैं. बड़े शल्ककंदों में 8 से 10 मैगट एकसाथ घुस कर उसे खोखला बना देते हैं.

रोकथाम : शुरुआत में रोगी खेत पर काटाप हाइड्रोक्लोराइड 4जी की 10 किलोग्राम मात्रा को प्रति हेक्टेयर की दर से भूमि में बिखेर कर सिंचाई कर दें. बढ़ते हुए पौधों पर मिथोमिल 40 एसपी की 1.0 किलोग्राम या ट्रायजोफास 40 ईसी की 750 मिलीलीटर मात्रा को 500-600 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने पर नए निकले हुए मैगट मर जाते हैं.

थ्रिप्स : इस कीट का हमला तापमान के बढ़ने के साथसाथ होता है व  मार्च महीने में इस का हमला जयादा दिखाई देता है. यह पत्तियों से रस चूसता है, जिस से पत्तियां कमजोर हो जाती हैं और रोगी जगह पर सफेद चकत्ते पड़ जाते हैं, जिस के कारण पत्तियां मुड़ जाती हैं.

रोकथाम : लहसुन की कीट रोधी प्रजातियां उगानी चाहिए. कीट के ज्यादा प्रकोप की दशा में 150 मिलीलीटर इमिडाक्लोपिड 17.8 एसएल को 500-600 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

माइट्स : इस कीट के प्रकोप से पत्ती का असर वाला भाग पीला हो जाता है और पत्तियां मुड़ी हुई निकलती हैं. वयस्क और शिशु कीट दोनों ही नई पत्तियों का रस चूस कर फसल को नुकसान पहुंचाते हैं. रोग के शुरू में सब से पहले पौधों की निचली पत्तियां तैलीय हो जाती हैं और बाद में पूरा पौधा तैलीय हो जाता है. रोगी पत्तियां छोटी हो जाती हैं और चमड़े की तरह दिखाई देती हैं. पत्तियां निचली तरफ से तांबे जैसी रंगत की दिखाई देती हैं. माइट का ज्यादा हमला होने से रोगी पत्तियां सूख कर गिर जाती हैं और पूरा पौधा मुरझा कर सूख जाता है.

रोकथाम : रोगी पौधों को कंद व जड़ सहित उखाड़ कर नष्ट कर दें. घुलनशील गंधक 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर या कैराथीन 500 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से इस्तेमाल करें. मैटासिस्टाक्स का छिड़काव भी लाभदायक होता है.

लहसुन (Garlic)

लहसुन के रोग

विगलन : इस रोग का असर कंदों पर खेतों में या भंडारगृह दोनों में हो सकता है. खेत में रोगी पौधा पीला हो जाता है और जड़ें सड़ने लगती हैं. कभीकभी रोग के लक्षण बाहर से नहीं दिखाई पड़ते हैं, लेकिन लहसुन की गर्दन के पास दबाने से कुछ शल्क मुलायम जान पड़ते हैं. बाद में ये शल्क भूरे रंग के हो जाते हैं. सूखे मौसम में शल्क धीरेधीरे सूख कर सिकुड़ जाते हैं, जिस की वजह से छिलका फट कर अलग हो जाता है.

रोकथाम : खेत को ट्राईकोडर्मा नामक जैव फफूंद की 2.5 किलोग्राम मात्रा से प्रति हेक्टेयर की दर से उपचारित करना चाहिए. गरमी के महीनों में खेत की अच्छी तरह जुताई कर के खुला छोड़ दें, जिस से कि कवक व अन्य रोग जनकों की मौत हो जाए. कंदों को बोआई से पहले 2.0 ग्राम कार्बेंडाजिम का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर उपचारित करें.

बैगनी धब्बा : इस रोग से लहसुन को काफी नुकसान होता है. इस रोग के लक्षण पत्तियों, कंदों पर उत्पन्न होते हैं, शुरू में छोटे धंसे हुए धब्बे बनते हैं, जो बाद में बड़े हो जाते हैं. धब्बे का बीच का भाग बैगनी रंग का हो जाता है. यदि आप उसे हाथों से छुएं तो काले रंग का चूर्ण हाथ में चिपका हुआ दिखाई देता है. रोगी पत्तियां झुलस कर गिर जाती हैं. रोगी पौधों से प्राप्त कंद सड़ने लगते हैं.

रोकथाम : 2-3 साल का सही फसलचक्र अपनाएं. रोग के लक्षण दिखाई देते ही मैंकोजेब की 2.0 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर 2 बार छिड़काव करें.

सफेद सड़न : इस बीमारी से कलियां सड़ने लगती हैं.

रोकथाम : जमीन को ट्राईकोडर्मा नामक जैव फफूंद की 2.5 किलोग्राम मात्रा से प्रति हेक्टेयर की दर से उपचारित करना चाहिए. गरमी के महीनों में खेत की अच्छी तरह जुताई कर के खुला छोड़ दें जिस से कि कवक व अन्य रोगजनकों की मौत हो जाए. कंदों को बोआई के पहले 2.0 ग्राम कार्बेंडाजिम का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर उपचारित करें.

कंद सड़न : इस बीमारी का हमला भंडारण में होता है.

रोकथाम : इस की रोकथाम के लिए कंद को 2 फीसदी बोरिक अम्ल से उपचारित कर के भंडारण करना चाहिए. बीज के लिए यदि कंद को रखना हो तो 0.1 फीसदी मरक्यूरिक क्लोराइड से उपचारित कर के रखें. खड़ी फसल में मैंकोजेब की 2.0 ग्राम मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें.

फुटान : नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों के ज्यादा इस्तेमाल से यह बीमारी फैलती है. इस के अलावा ज्यादा पानी या ज्यादा दूरी पर रोपाई की वजह से फुटान ज्यादा होती है. इस बीमारी से लहसुन कच्ची दशा में कई छोटेछोटे फुटान देता है, जिस से कलियों का भोजन पदार्थ वानस्पतिक बढ़वार में इस्तेमाल होता है.

रोकथाम : लहसुन की रोपाई कम दूरी पर करें और नाइट्रोजन व सिंचाई का इस्तेमाल ज्यादा न करें. ऐसे रोगी पौधों को देखते ही पौलीथीन की थैली से ढक कर सावधानीपूर्वक उखाड़ कर मिट्टी में दबा दें. बीजों को बोने से पहले विटावैक्स 2.5 ग्राम या टेबूकोनाजोल 1.0 ग्राम से प्रति किलोग्राम की दर से उपारित करें.

प्याज व लहसुन में पौध संरक्षण

हमारे यहां प्याज व लहसुन कंद समूह की मुख्य रूप से 2 ऐसी फसलें हैं, जिन का सब्जियों के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण स्थान है. देश में इन की खपत काफी है और विदेशी पैसा हासिल करने में इन का बहुत बड़ा योगदान है.

वैसे तो दुनिया में भारत प्याज और लहसुन की खेती में अग्रणी है, लेकिन इन की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता दूसरे कई देशों से कम है. इस के लिए दूसरे तमाम उपायों के साथ जरूरी है कि इन फसलों की रोगों व कीड़ों से सुरक्षा. फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले रोगों व कीड़ों की पहचान और उन की रोकथाम करने से काफी हद तक इन फसलों को बचाया जा सकता है.

मुख्य रोग झुलसा

लक्षण : यह रोग पत्तियों और डंठलों पर छोटेछोटे सफेद और हलके पीले धब्बों के रूप में पाया जाता है, जो बाद में एकदूसरे से मिल कर भूरे रंग के धब्बे में बदल जाते हैं व आखिर में ये धब्बे गहरे भूरे या काले रंग के हो जाते हैं.

धब्बे की जगह पर बीज का डंठल टूट कर गिर जाता है. पत्तियां धीरेधीरे सिरे की तरफ से सूखना शुरू करती हैं और आधार की तरफ बढ़ कर पूरी तरह सूख जाती हैं. अनुकूल मौसम मिलते ही यह रोग बड़ी तेजी से फैलता है और कभीकभी फसल को भारी नुकसान पहुंचाता है.

रोकथाम : साफसुथरी खेती फसल को निरोग रखती है. वहीं गरमी के महीने में गहरी जुताई और सौर उपचार काफी फायदेमंद रहता है.

दीर्घकालीन असंबंधित फसलों का फसलचक्र अपनाना चाहिए.

रोग के लक्षण दिखाई देते ही इंडोफिल एम-45 की 400 ग्राम या कौपर औक्सीक्लोराइड-50 की 500 ग्राम या प्रोपीकोनाजोल 20 फीसदी ईसी की 200 मिलीलिटर प्रति एकड़ के हिसाब से 200 लिटर पानी में घोल बना कर और किसी चिपकने वाले पदार्थ के साथ मिला कर 10-15 दिन के अंतराल पर छिड़कें.

बैगनी धब्बा

लक्षण : यह रोग पत्तियों, तनों, बीज स्तंभों व शल्क कंदों पर लगता है. रोगग्रस्त भागों पर छोटेछोटे सफेद धंसे हुए धब्बे बनते हैं, जिन का मध्य भाग बैगनी रंग का होता है.

ये धब्बे जल्दी ही बढ़ते हैं. इन धब्बों की सीमाएं लाल या बैगनी रंग की होती हैं, जिन के चारों ओर ऊपर व नीचे कुछ दूर तक एक पीला क्षेत्र पाया जाता है.

रोग की उग्र अवस्था में शल्क कंदों का विगलन कंद की गरदन से शुरू हो जाता है. रोगग्रस्त पौधों में बीज आमतौर पर नहीं बनते और अगर बीज बन भी गए तो वह सिकुड़े हुए होते हैं.

रोकथाम : इस रोग की रोकथाम भी झुलसा रोग की तरह ही की जाती है.

आधारीय विगलन

लक्षण : इस रोग के प्रकोप से पौधों की बढ़वार रुक जाती है और पत्तियां पीली पड़ जाती हैं. बाद में पत्तियां ऊपर से नीचे की तरफ सूखना शुरू होती हैं. कभीकभी पौधे की शुरू की अवस्था में इस रोग के कारण जड़ें गुलाबी या पीले रंग की हो जाती हैं और आकार में सिकुड़ कर आखिर में मर जाती हैं.

रोग की उग्र अवस्था में शल्क कंद छोटे रहते हैं और इस रोग का प्रभाव कंदों के ऊपर गोदामों में सड़न के रूप में देखा जाता है.

रोकथाम : आखिरी जुताई के समय रोगग्रस्त खेतों में फोरेट दानेदार कीटनाशी 4.0 किलोग्राम प्रति एकड़ मिट्टी में अच्छी तरह से मिलाएं.

दीर्घकालीन असंबंधित फसलों से 2-3 साल का फसलचक्र अपनाएं. कंद को खुले व हवादार गोदामों में रखना चाहिए.

विषाणु

लक्षण : इस रोग के कारण पत्तियों पर हलके पीले रंग की धारियां बनती हैं और पत्तियां मोटी व अंदर का भाग लहरदार हो जाता है. ऐसे हालात में धारियां आपस में मिल कर पूरी पत्ती को पीला कर देती हैं और बढ़वार रुक जाती है.

रोकथाम : चूंकि यह रोग कीड़ों से फैलता है, इसलिए फसलवर्धन काल में जब भी इस रोग के लक्षण दिखें, उसी समय मैटासिस्टौक्स या रोगोर नामक किसी एक दवा का एक मिलीलिटर दवा का प्रति लिटर पानी में मिला कर छिड़काव करें. जरूरत पड़ने पर दोबारा छिड़काव करें.

मुख्य कीड़े

इन फसलों को सब से ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाले 2 मुख्य कीड़े हैं, थ्रिप्स (चुरड़ा) व लहसुन मक्खी. इन कीड़ों का प्रकोप फरवरी महीने तक होता है.

थ्रिप्स : इस कीड़े के शिशु व प्रौढ़ दोनों ही पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं. प्रौढ़ काले रंग के बहुत ही छोटे, पतले व लंबे होते हैं, जबकि शिशु यानी बच्चे हलके भूरे व पीले रंग के होते हैं. जहां से पत्तियां निकलती हैं, उसी जगह ये कीड़े रहते हैं और नईनई कोमल पत्तियों का रस चूसते हैं.

इन के प्रकोप से पत्ते के सिरे ऊपर से सफेद व भूरे हो कर सूखने व मुड़ने लगते हैं. इस वजह से पौधों की बढ़वार रुक जाती है. ज्यादा प्रकोप होने पर पत्ते चोटी से चांदीनुमा हो कर सूख जाते हैं. बाद की अवस्था में इस कीड़े का प्रकोप होने पर शल्क कंद छोटे रहते हैं और आकृति में भी टूटेफूटे होते हैं. बीज की फसल पर इस कीड़े का बहुत ज्यादा असर पड़ता है.

रोकथाम : इस कीड़े की रोकथाम के लिए बारीबारी से किसी एक कीटनाशक को 200-250 लिटर पानी में घोल बना कर प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करें.

(क) 1. 75 मिलीलिटर फैनवैलरेट 20 ईसी

      1. 175 मिलीलिटर डैल्टामेथ्रिन 2.8 ईसी
      2. 60 मिलीलिटर साइपरमेथ्रिन 25 ईसी या 150 मिलीलिटर साइपरमेथ्रिन 10 ईसी

(ख) 1.300 मिलीलिटर मेलाथियान 50 ईसी

प्याज व लहसुन में चुरड़ा कीट की रोकथाम के लिए लहसुन का तेल 150 मिलीलिटर और इतनी ही मात्रा में टीपोल को 150 लिटर पानी में मिला कर प्रति एकड़ में 3 से 4 छिड़काव करें.

थ्रिप्स की रोकथाम के समय बरतें सावधानी

* एक ही कीटनाशी का बारबार इस्तेमाल न करें.

* छिड़काव की जरूरत मार्चअप्रैल महीने में पड़ती है, क्योंकि कीड़ा फरवरी से मई महीने तक नुकसान करता है, इसलिए कोई चिपकने वाला पदार्थ घोल में जरूर मिलाएं.

* छिड़काव के कम से कम 15 दिन बाद ही प्याज इस्तेमाल में लाएं.

Lahsunप्याज व लहसुन मक्खी

कभीकभी इस कीड़े का प्रकोप भी इन फसलों पर देखने में आता है. लहसुन की मक्खी घरों में पाई जाने वाली मक्खी से छोटी होती है. इस के शिशु (मैगट) व प्रौढ़ दोनों ही फसल को नुकसान पहुंचाते हैं.

मादा सफेद मक्खी मटमैले रंग की होती है, जो मिट्टी आमतौर पर बीज स्तंभों के पास मिट्टी में अंडे देती है. अंडों से नवजात मैगट स्तंभों के आधार पर खाते हुए फसल के भूमिगत तने वाले हिस्सों में आक्रमण करते हैं और बाद में कंदों को खाना शुरू कर देते हैं, जिस से पौधे सूख जाते हैं. बाद में इन्हीं कंदों पर आधारीय विगलन रोग का आक्रमण होता है, जिस से बल्ब सड़ने लगते हैं.

रोकथाम : आखिरी जुताई के समय खेत में फोरेट कीटनाशी 4.0 किलोग्राम प्रति एकड़ मिट्टी में अच्छी तरह से मिलाएं और बाद में थ्रिप्स में बताई गई कीटनाशियों का इस्तेमाल करें.