Sugarcane Farming : गन्ने की खेती से ठगे जाते किसान

Sugarcane Farming : गन्नाकिसान हर मोर्चे पर ठगे जाते हैं. गन्ने से जुड़ी सब से बड़ी मजबूरी यह है कि गेहूं व धान आदि खेती की दूसरी उपजों की तरह गन्ने को खेत से काटने के बाद रोक कर नहीं रखा जा सकता. कटाई के बाद गन्ने को जल्द से जल्द चीनीमिलों में पहुंचाना पड़ता है, नहीं तो वह सूखने लगता है. इसी जल्दबाजी के कारण गन्ना खरीद सेंटरों पर खूब धांधली होती है.

क्या है उपाय?

किसान खेती (Sugarcane Farming) के पुराने तरीकों पर चलना छोड़ कर नए तौरतरीके अपनाएं, गन्ने की प्रोसेसिंग करें, गन्ने से बनने वाली वस्तुओं के लिए अपने कारखाने लगाएं, ताकि खेती से होने वाली आमदनी में बढ़ोतरी हो सके, लेकिन इस के लिए किसानों को अपनी सोच बदल कर कारोबारी बनना होगा व तकनीक सीखनी होगी.

प्रोसेसिंग से कमाई

केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी संस्थान, एफटीआरआई मैसूर के वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक निकाली है, जिस से कोल्ड ड्रिंक की तरह गन्नारस को बोतलबंद किया जा सकता है. भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के वैज्ञानिकों ने गन्ने के रस से पैक्ड गुड़, क्यूब्स, तरल गुड़ का सिरप व औरगैनिक शक्कर बनाने के किफायती तरीके निकाले हैं. केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल ने चाकलेट जैसी गुड़ व मूंगफली की न्यूट्रीबार बनाने की तकनीक खोजी है. किसान इन्हें अपना कर गन्ने से ज्यादा कमाई कर सकते हैं.

तकनीक नई

नई तकनीकों से गन्ने की खोई जैसे कचरे का भी बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है. मसलन 200 चीनी मिलों में गन्ने की खोई से चलने वाले कोजनरेशन प्लांट लगा कर 3500 मेगावाट बिजली बनाई जा रही है. अब 529 चीनीमिलों से 16000 मेगावाट बिजली बनाने का मकसद तय किया गया है. बिजली के अलावा गन्ने की खोई से गत्ता, लुग्दी, कागज और वर्मी कंपोस्ट खाद आदि बना कर कमाई की जा सकती है.

Drip Irrigation Technique: तकनीक से पाएं गन्ने की बंपर पैदावार

गन्ना भारत की प्रमुख नकदी फसलों में से एक है और इसका उत्पादन लाखों किसानों की आजीविका का आधार है. यह फसल न केवल चीनी उद्योग के लिए खास है, बल्कि देश के ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के अवसर भी प्रदान करती है. गन्ने की खेती में पानी की अत्यधिक जरूरत होती है, लेकिन जलवायु परिवर्तन, कम वर्षा, गन्ना किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुकी है. ऐसे में गन्ने की खेती करना किसानों के लिए मुश्किल होता जा रहा है.

लेकिन अब तरक्की के दौर में कम पानी में खेती करने की अनेक उन्नत तकनीकें कृषि क्षेत्र में आ गई हैं. जरूरत है इन्हें समझने और अपनाने की. हम बताने जा रहे हैं यहां एक ऐसी सिंचाई तकनीक के बारे में, जिसको अपनाने से कम पानी में भी मिलेगी गन्ने से भरपूर पैदावार.

बूंद-बूंद सिंचाई पद्धति

गन्ने की खेती में जल प्रबंधन को बेहतर बनाने, उत्पादकता बढ़ाने और संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने में ड्रिप इरिगेशन एक आधुनिक सिंचाई तकनीक है. इस तकनीक में बंद-बूंद पानी का इस्तेमाल होता है. ऐसे में यह तकनीक किसी संजीवनी से कम नहीं है.

क्या है ड्रिप इरिगेशन तकनीक

ड्रिप इरिगेशन एक उन्नत सिंचाई तकनीक है, जिसमें पानी को सीधे पौधों की जड़ों तक बूंद-बूंद करके पहुंचाया जाता है. यह प्रणाली विशेष रूप से उन फसलों के लिए उपयुक्त है जिनकी पानी की आवश्यकता नियंत्रित और सटीक रूप से पूरी की जा सकती है.

गन्ने जैसी फसलों में, जहां पानी की खपत अधिक होती है, ड्रिप इरिगेशन विधि से पानी का सही उपयोग किया जाता है और जल की बरबादी नहीं होती. इस प्रणाली में मुख्य रूप से पाइप, नलिकाएं और ड्रिपर का उपयोग होता है, जो खेत के प्रत्येक पौधे की जड़ों तक पानी पहुंचाते हैं. इस तकनीक में पानी को नियंत्रित कर सिंचाई की जाती है. इस में पानी की बरबादी बिलकुल नहीं होती.

गन्ने में ड्रिप इरिगेशन से क्या है फायदा

गन्ने की खेती में ड्रिप इरिगेशन के कई फायदे हैं, जो न केवल पर्यावरणीय दृष्टिकोण से खास हैं, बल्कि किसानों की आर्थिक स्थिति को भी मजबूत करते हैं. पानी की बूंद-बूंद का इस्तेमाल सिंचाई में होता हैऔर पानी की बरबादी नहीं होती.

पानी की हर बूंद का होता है इस्तेमाल

सामान्यतौर पर गन्ने की फसल को अधिक पानी की आवश्यकता होती है, और पारंपरिक तरीके से सिंचाई करने पर पानी की बहुत बरबादी होती है, जबकि ड्रिप सिंचाई में पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है, जिससे पानी का व्यर्थ बहाव कम होता है और पानी की बचत होती है. इससे गन्ना किसानों को पानी की कमी से बचने में मदद मिलती है, विशेषकर ऐसे क्षेत्रों में जहां सिंचाई के लिए सीमित जल संसाधन हैं या कम पानी है.

मिलती है अधिक उपज

जब गन्ने को नियमित रूप से, लेकिन नियंत्रित तरीके से पानी मिलता है, तो इसकी जड़ें स्वस्थ रहती हैं और पौधों की बढ़वार में मदद मिलती है. इसके परिणामस्वरूप, उपज में बढ़त होती है और गन्ने की गुणवत्ता भी बेहतर होती है.

इस तकनीक में नहीं पनपते खरपतवार

ड्रिप इरिगेशन तकनीक से सिंचाई करने पर पानी केवल पौधों की जड़ों तक सीधा पहुंचता है, जिससे खेत के अन्य हिस्सों तक पानी नहीं फैलता और खरपतवारों को पनपने का मौका ही नहीं मिलता. अगर कहीं कुछ खरपतवार उगते भी हैं तो उनको बड़ी ही सरलता से नष्ट किया जा सकता है.

किसान की बचत ही बचत

पारंपरिक सिंचाई विधियों में समय और श्रम की अधिक आवश्यकता होती है, जबकि ड्रिप इरिगेशन में एक बार सिस्टम स्थापित हो जाने के बाद, सिंचाई प्रक्रिया स्वचालित और नियंत्रित होती है. इससे किसानों की मेहनत और समय की बचत होती है. पानी की भी बचत होती है.

मिट्टी में होता है सुधार

पारंपरिक सिंचाई में पानी की अधिकता से उपजाऊ मिट्टी की ऊपरी सतह बह सकती है, जबकि ड्रिप इरिगेशन से मिट्टी की संरचना बनी रहती है और जल प्रवाह संतुलित होता है. इससे मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी नहीं होती और भूमि का स्वास्थ्य बेहतर रहता है.

कैसे करें तैयारी :

सबसे पहले, खेत की समतलता का ध्यान रखा जाता है. यदि खेती की जमीन में कोई असमानताएं हैं, जमीन समतल नहीं है तो उसे ठीक किया जाता है, ताकि पानी का बहाव एकसमान हो. खेत में नालियां भी बनाई जाती हैं, ताकि पानी का बहाव सही दिशा में हो सके.

पाइपलाइन और ड्रिपलाइन को बिछाना

ड्रिप इरिगेशन में पाइपलाइन और ड्रिपलाइन की सही स्थापना खास होती है. इन पाइपलाइनों में पानी का प्रवाह नियंत्रित किया जाता है. ड्रिपलाइन को खेत में हर पौधे के पास रखा जाता है, ताकि पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंच सके.

फिल्टर और पंप सिस्टम हो उत्तम

पानी की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए फिल्टर का उपयोग किया जाता है, जिससे पौधों तक पानी पहुंचने में कोई अवरोध न हो. पंप सिस्टम का चयन भी खास है, क्योंकि यह पानी की आपूर्ति की गति और दबाव को नियंत्रित करता है.

Drip Irrigation Technique

नियंत्रण और मॉनिटरिंग जरूरी

ड्रिप इरिगेशन सिस्टम को खेत में लगाने के बाद इसकी नियमित रूप से परीक्षण और मॉनिटरिंग करना आवश्यक होता है. किसानों को यह सुनिश्चित करना होता है कि सिस्टम में कोई गड़बड़ी न हो और पानी का प्रवाह सही ढंग से हो रहा हो.

ड्रिप इरिगेशन प्रणाली में सब्सिडी का उठाएं लाभ

ड्रिप इरिगेशन प्रणाली की स्थापना की शुरुआत में कुछ निवेश की आवश्यकता होती है, जैसे पाइपलाइनों, पंप और फिल्टर की लागत आदि, जो आपको कुछ महंगा लग सकता है, लेकिन यह सिस्टम एक बार लगाने के बाद लंबे समय तक इस्तेमाल किया जाता है और सरकार द्वारा इसे लगाने पर सब्सिडी का लाभ भी दिया जाता है, इसलिए यह घाटे का सौदा नहीं होता. दीर्घकालिक लाभ इस निवेश को उचित ठहराते हैं. इस प्रणाली से जल, उर्वरक, ऊर्जा और श्रम की बचत होती है, जिससे कुल उत्पादन लागत में कमी आती है और किसानों की आय में वृद्धि होती है.

भारत सरकार और राज्य सरकारें भी ड्रिप इरिगेशन को बढ़ावा देने के लिए कई प्रकार की सब्सिडी और वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं, जिससे किसानों को इस प्रणाली को अपनाने में सहायता मिलती है.
गन्ने की खेती में ड्रिप इरिगेशन एक प्रभावी और लंबे समय तक साथ देने वाली तकनीक है. यह न केवल जल की बचत करती है, बल्कि फसल की गुणवत्ता और उपज में भी बढ़ोतरी होती है. इस प्रणाली को अपनाकर किसान अपनी फसल की उत्पादकता को बढ़ा सकते हैं.

हालांकि, इसको लगाने में शुरुआती खर्च अधिक हो सकता है, लेकिन इसके दीर्घकालिक लाभ किसान की आय में इजाफा और उत्पादन में सुधार लाते हैं. यदि इस सिस्टम को सही तरीके से स्थापित और संचालित किया जाए, तो ड्रिप इरिगेशन गन्ने की खेती को एक नई दिशा दे सकता है, जिससे कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव संभव है.

Sugarcane: गन्ने की वैज्ञानिक खेती

Sugarcane (गन्ना) भारत की पुरानी फसलों में से एक है. यह हमारे देश की प्रमुख नकदी फसलों में से एक है. चीनी उद्योग दूसरा सब से बड़ा कृषि आधारित उद्योग है, जो सिर्फ गन्ना (Sugarcane) उत्पादन पर निर्भर है. गन्ना (Sugarcane) सकल घरेलू उत्पाद के लिए 2 फीसदी योगदान कर के राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में खास भूमिका निभाता है.

उत्तर प्रदेश गन्ना (Sugarcane) उत्पादक राज्यों में देश भर में सब से आगे है. पूरे भारत के कुल गन्ने रकबे 36.61 लाख हेक्टयर का 53 फीसदी से भी अधिक रकबा अकेले उत्तर प्रदेश में है. वैसे प्रदेश की औसत गन्ना (Sugarcane) पैदावार करीब 61 टन प्रति हेक्टयर है, जो देश के अन्य राज्यों तमिलनाडु 106 टन, पश्चिमी बंगाल 74 टन, आंध्र प्रदेश व गुजराज 72 टन और कर्नाटक 67 टन प्रति हेक्टयर से काफी कम है.

संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन के एक अनुमान के मुताबिक संसार के कुल गन्ना (Sugarcane) उत्पादन का करीब 55 फीसदी हिस्सा तमाम कीड़ोंबीमारियों व खरपतवारों द्वारा नष्ट कर दिया जाता है. गन्ने की वैज्ञानिक विधि से खेती करने से उत्पादन में इजाफा किया जा सकता है.

मिट्टी व खेत की तैयारी : गन्ने के लिए दोमट जमीन सब से अच्छी है. वैसे भारी दोमट मिट्टी में भी गन्ने की अच्छी फसल हो सकती है. गन्ने की खेती के लिए पानी निकलने का सही इंतजाम होना चाहिए.

जिस मिट्टी में पानी रुकता हो वह गन्ने के लिए ठीक नहीं है. क्षारीय या अम्लीय जमीन भी गन्ने के लायक नहीं समझी जाती है. खेत को तैयार करने के लिए 1 बार मिट्टी पलटने वाले हल से जोत कर 3 बार हैरो से जुताई करनी चाहिए. देशी हल की 5 से 6 जुताइयां काफी होती हैं. बोआई के समय खेत में नमी होना जरूरी है.

जमीन का शोधन : दीमक लगी जमीन में कूड़ों में बीजों के ऊपर क्लोरोपाइरीफास दवा का इस्तेमाल करें. यदि बाद में भी दीमक का असर दिखाई दे, तो खड़ी फसल में सिंचाई के पानी के साथ बूंदबूंद विधि द्वारा क्लोरोपाइरीफास कीटनाशक का ही इस्तेमाल करें. हेप्टाक्लोर 20 ईसी दवा की 6.25 लीटर मात्रा 1000 लीटर पानी में मिला कर गन्नाबीज टुकड़ों पर कूड़ों में छिड़कने से दीमक व कंसुआ कीटों की रोकथाम होती है.

बीजोपचार : जमीन व बीजों में लगे रोगों से फसल को बचाने के लिए गन्ने के टुकड़ों को नम वायु उपचार विधि से उपचारित करने के बाद बोने से पहले फफूंदनाशक दवाओं जैसे एगलाल 1.23 किलोग्राम, एरीटान 625 ग्राम या बैंगलाल 625 ग्राम दवा के 250 लीटर पानी में बनाए घोल में डुबो कर उपचारित करें.

बोआई का समय :  जल्दी व असरदार आंख जमाव के लिए गरम, मगर नमी वाली जमीन जरूरी है. 25 से 30 डिगरी सेल्सियस तापमान में अक्तूबर में शरद कालीन गन्ना (Sugarcane) बोया जाता है. फरवरी से 15 मार्च तक बसंत कालीन गन्ना बोया जाता है.

उत्तर प्रदेश के बडे़ हिस्से जिस में पश्चिमी उत्तर प्रदेश खास है, गेहूं की कटाई के बाद गरमी कालीन गन्ना (Sugarcane) अप्रैल के आखिरी हफ्ते से जून के पहले हफ्ते तक बोया जाता है. ज्यादा तापमान (40 से 45 डिगरी सेल्सियस) और ज्यादा शर्करा युक्त बीज होने से जमाव बहुत कम हो जाता है.

बिजाई के नए तरीके मेंड़ें व नाली विधि से सूखे में

बिजाई : मेंड़ें व नालियां 90 सेंटीमीटर के फासले पर ट्रैक्टर चलित रेजर द्वारा बनाई जाती हैं. गन्ने की बिजाई हाथ द्वारा की जाती है. मेंड़ों को कस्सी द्वारा मिट्टी से ढकने के बाद हलकी सिंचाई कर दी जाती है. नमी पैदल चलने लायक होने पर एट्राजीन 2 किलोग्राम मात्रा 350 से 400 लीटर पानी में मिला कर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करना चाहिए. उस के बाद जरूरत के मुताबिक सिंचाई करते रहना चाहिए.

Sugarcane

ट्रेंच तरीके से 2 लाइनों मे बिजाई : ट्रैक्टर चालित ट्रैंच ओपनर द्वारा 150 सेंटीमीटर की दूरी पर 12 से 18 चौड़े ट्रैंच बना दिए जाते है. 2 बराबर लाइनों में 30:30-120 से 30:30 सेंटीमीटर या 30:30-90-30:30 सेंटीमीटर की दूरी पर बिजाई की जाती है. बीच की जगह पर अंत:फसल ली जानी चाहिए. मेंड़ व नाली विधि से ज्यादा उपज व मुनाफा होता है.

गड्ढा विधि : 60 सेंटीमीटर व्यास और 30 सेंटीमीटर गहराई वाले करीब 2700 गोल गड्ढे किसी ट्रैक्टर चलित गड्ढा मशीन द्वारा बनाए जाते हैं, जिन में आपस की दूरी 60 सेंटीमीटर होती है. बिजाई से पहले गड्ढों को हलकी मिट्टी और गोबर की खाद से 15 सेंटीमीटर तक भर दिया जाता है.

फिर 22 दो आंखों वाले बीजों के टुकडे़ उन में रख कर 5 सेंटीमीटर तक मिट्टी चढ़ा दी जाती है.

सिंचाई : गन्ने की फसल की पानी की जरूरत काफी ज्यादा है. पूर्वी उत्तर प्रदेश में करीब 4 से 5 और पश्चिमी इलाकों में 6 से 8 सिंचाइयों की जरूरत पड़ती है. सिंचाई सुविधा यदि सीमित हो तो गन्ने के जमाव, कल्लों के निकलने और पकने की अवस्थाओं में सिंचाई जरूर करें. उत्तर प्रदेश के किसान ज्यादातर जलभराव विधि अपनाते हैं, जो सिंचाई के पानी की बरबादी के साथसाथ खरपतवारों और पोशक तत्त्वों की कमी को ही बढ़ावा देती है.

एकांतर नाली विधि में 1 लाइन छोड़ कर हर दूसरी लाइन के बीच खाली जमीन पर 45 सेंटीमीटर चौड़ी और 15 सेंटीमीटर गहरी नाली बना कर पानी दिया जाता है. इस से 36 फीसदी पानी की बचत के साथसाथ उपज भी सामान्य से ज्यादा मिलती है.

पोषक तत्त्वों का इंतजाम : गन्ने की खेती में पोषक तत्त्वों की अहमियत बहुत ज्यादा है. इन की सही मात्रा की जानकारी के लिए मिट्टी की जांच कराना बहुत जरूरी होता है. आमतौर पर 120 से 150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 से 80 किलोग्राम फास्फोस्स व 60 किलोग्राम पोटाश सक्रिय तत्त्वों की सिफारिश की जाती है. स्थानीय हालात व मिट्टी के आधार पर दूसरे तत्त्वों का इस्तेमाल भी बहुत जरूरी है.

फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की एकतिहाई मात्रा बोआई के समय कूड़ों में गन्ने के बीजों के नीचे या बीज कूड़ के साथ खोले गए खाली कूंड़ में डालनी चाहिए. नाइट्रोजन की बची मात्रा 2 बार में सिंचाई सुविधा के मुताबिक बारिश शुरू होने से पहले डाल दें. जीवांश की कमी को दूर करने के लिए बोआई से पहले गोबर की खाद 5 से 10 टन प्रति हेक्टेयर (मौजूदगी के मुताबिक) डालें.

इस के अलावा हरी खाद फसलों को गन्ने के साथ अंत: फसली फसल के रूप में बो कर 45 से 60 दिनों की अवस्था में खेत में मिलाएं.  गन्ना पेडी में 25 से 30 फीसदी ज्यादा नाइट्रोजन व फास्फोरस और पोटाश की तय मात्रा जरूर डालें.

खरपतवारों की रोकथाम : गन्ने में मोथा, पत्थर चट्टा, वनचरी, कृष्णनील, बथुआ, जंगलगोभी, दूब घास, कांग्रेस घास व पारथेनियम घास जैसे तमाम खरपतवार उगते हैं. पिछले कुछ सालों से आइपोमिया प्रजाति की बेल का प्रकोप अधिकतर गन्ना (Sugarcane) इलाकों में फैला है. यह बेल गन्ने की मेंड़ों को पूरी तरह जकड़ कर गन्ने के फुटाब व बढ़वार पर बहुत खराब असर डालती है.

बोआई के ठीक बाद जमाव से पहले एट्राजीन या सोमाजिन दवा के 2 किलोग्राम सक्रिय तत्त्व को 700 से 800 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करने और 30 से 40 दिनों बाद 2 से 4 डी नामक रसायन के 1.5 किलोग्राम सक्रिय तत्त्व को 800 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करने से करीबकरीब सभी खरपतवार खत्म हो जाते हैं. एट्राजीन के बाद 25 से 30 दिनों पर 1 बार जुताई व गुड़ाई कर देने से भी खरपतवार खत्म होते हैं.

दूसरे जरूरी काम

गन्ने की कटाई व सिंचाई के फौरन बाद ठूठों की छंटाई जरूर करें. यदि गन्ने के 2 थानों के बीच 45 सेंटीमीटर या इस से ज्यादा जगह खाली हो तो 25 से 30 दिनों की तैयार की भराई 15 अप्रैल तक जरूर कर दें. पौधों को गिरने से बचाने के लिए मिट्टी चढ़ाएं व बंधाई करें.

मिट्टी चढ़ाना व फसल की बंधाई करना : बरसात शुरू होने से पहले यदि मिट्टी चढ़ा देते हैं, तो बाद में उगे खरपतवारों की रोकथाम के साथसाथ बारिश के पानी का ज्यादा संरक्षण व फसल का गिरना कम होता है.

ज्यादा बढ़वार वाली गन्ने की फसल को गिरने से बचाने के लिए जरूरत के मुताबिक 1 से 3 बंधाई भी जरूर करें. फसल गिरने से उपज में भारी कमी आती है और गन्ने की शक्कर में कमी होती है और जलकल्लों का ज्यादा जमाव होता है.

कटाई : जैसे ही हैंड रिप्रफैक्टोमीटर दस्ती आवर्तन मापी का बिंदु 18 पर पहुंचे तो गन्ने की कटाई शुरू कर देनी चाहिए. यंत्र न होने पर गन्ने की मिठास से भी गन्ने के पकने का पता लगाया जा सकता है.

नवंबर से जनवरी तक तापमान कम होने के कारण काटे गए गन्ने में फुटाव कम होता है, नतीजतन उस की पेडी अच्छी नहीं होती है. लिहाजा पेडी से ज्यादा उत्पादन लेने के लिए गन्ने की कटाई मध्य जनवरी से मार्च तक करनी चाहिए.

गन्ने की कटाई की सही विधि : मेंड़ें समतल कर के गन्ने की कटाई तेज धार वाले हथियार से जमीन की सतह से करनी चाहिए. ऐसा न करने पर अंकुर पेड़ के ऊपर निकलने के कारण पैदावार कम होगी. अगर समय से गन्ने की कटाई कर रहे हों, तो जलकल्लों को काट देना चाहिए और देर से अप्रैलमई में कटाई करने पर जलकल्लों को छोड़ना फायदेमंद रहता है.

उपज : गन्ने की वैज्ञानिक विधि से खेती करने पर 60 से 75 टन प्रति हेक्टेयर उपज ली जा सकती है.

गन्ने के रोग और रोकथाम

Sugarcane

लाल सड़न (कोलेटाट्राइकम फालकेटम) : तने को लंबाई में चीरने पर अंदर का गूदा लाल रंग का दिखाई देता है. रोगी गन्ने के गूदे से सिरके जैसी बदबू आती है. बाद में गन्ना (Sugarcane) खोखला हो कर सूख जाता है और वजन बहुत कम हो जाता है. खोखली पोरियों में फफूंदी लगने से कभीकभी भूरेलाल रंग की फफूंदी भी दिखायी देती है. गन्ना (Sugarcane) गांठ से आसानी से टूट जाता है.

रोकथाम

गन्ने के टुकड़ों को बोने से पहले कार्बेंडाजिम फफूंदीनाशक के 0.1 फीसदी घोल में 10 मिनट के लिए डुबो लेना चाहिए. गन्ने की पोरियों को वायुरुद्व कक्ष मे 54 डिगरी सेंटीग्रेड पर 8 घंटे तक रखने पर लाल सड़न रोग का कवक बेकार हो जाता है. रोगरोधी किस्में जैसे को 100, को 1336, को 62399, कोएस 510, बीओ 91 व बीओ 70 आदि का इस्तेमाल बोआई के लिए करें.

उकठा (सिफैलोस्पोरियम सेकेराई) : पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और मुरझा जाती हैं. रोगी गन्ने को लंबाई में चीर कर देखने पर मटियाला लाल दिखाई देता है. गन्ना (Sugarcane) सूख कर हलका और पिचक कर खोखला हो जाता है. रोगी पौधों से सड़ी हुई मछली जैसी गंध आती है. गन्ने के वजन व गुणवत्ता में कमी आ जाती है.

रोकथाम

फसलचक्र में 2 या 3 साल में कम से कम 1 बार हरी खाद के रुप में ढैंचा जरूर उगाएं. गन्ने के टुकड़ों को बोने से पहले एगालाल या ऐरीटान 0.25 फीसदी के घोल में 10 मिनट तक डुबोएं.

कुडुवा (अस्टीलगो सिटैमीनिया) : रोगी पौधों के सिरे से काले रंग के चाबुक के आकार का भाग का निकलता है. इसे एक चमकीली झिल्ली ढके रहती है, जिस में काले रंग का चूर्ण भरा होता है. यह चूर्ण फफूंद के बीजाणु होते हैं.

रोकथाम

रोगग्रस्त पौधों को उखाड़ कर खत्म कर दें. रोगी फसल की पेड़ी नहीं लेनी चाहिए.

रोगरोधी किस्में को 449, को 6806 आदि उगानी चाहिए.

मोजैक (विषाणु) : ग्रसित पौधों में पत्ती के हरे रंग के बीच में हरेपीले धब्बे पाए जाते हैं. शक्कर व गुड़ की मात्रा व गुणवत्ता पर इस का बुरा असर पड़ता है.

रोकथाम

माहूं इस रोग को फैलाता है. मेटासिस्टाक्स 30 ईसी या रोगोर 30 ईसी प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर इस्तेमाल करें.

पोक्हा बोइंग : रोग का लक्षण जूनजूलाई में दिखता है. रोगग्रस्त पौधों के गोब की ऊपरी पत्तियां आपस में उलझी हुई होती हैं, जो बाद की अवस्था में किनारे से कटती जाती हैं. गन्ने की गोब पतलीलंबी हो जाती है. छोटीछोटी 1-2 पत्तियां ही लगी होती हैं. अंत में गन्ने  की गोब की बढ़वार वाला  अगला भाग मर जाता है और सड़ने जैसी गंध आती है.

रोकथाम

इस की रोकथाम अवरोधी किस्मों की खेती द्वारा की जा सकती है. इस बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर कार्बेंडाजिम 1 ग्राम प्रति लीटर पानी या कापर आक्सीक्लोराइड 2 ग्राम प्रति लीटर पानी या मैंकोजेब 3 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से फसल पर छिड़काव कर के इस बीमारी के फैलाव को कम किया जा सकता है.

खास कीड़े और उन की रोकथाम

दीमक (ओडोंटोटर्मिस ओबेसेस) : ये कीड़े गन्ने की बोआई के बाद गन्ने के टुकड़ों के कटे सिरों व टुकड़ों पर मौजूद आंखों पर आक्रमण कर के हानि पहुंचाते हैं. ये जमीन के पास वाली पोरियों का गूदा खा जाते हैं.

रोकथाम

गन्ने के टुकड़ों को बोआई से पहले इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्लूएस से उपचारित कर लेना चाहिए. 1 किलोग्राम बिवेरिया व 1 किलोग्राम मेटारिजयम को प्रभावित खेत में प्रति एकड़ की दर से बोआई से पहले डालें. सिंचाई के समय इंजन से निकले हुए तेल की 2-3 लीटर मात्रा डालें. प्रकोप ज्यादा होने पर क्लेरोपाइरीफास 20 ईसी की 3-4 लीटर मात्रा को रेत में मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें.

व्हाइट ग्रब ( होलोट्राईकिया कोनसेनजिनिया) : इस की सूंड़ी जमीन के अंदर रहती है और गन्ने के जीवित पौधों की जड़ों को खाती है, सूंड़ी द्वारा जड़ को काट देने से पूरा पौधा पीला पड़ कर सूखने लगता है.

रोकथाम

बोआई से पहले ब्यूवेरिया ब्रोंगनियार्टी की 1.0 किलोग्राम व मेटारायजियम एनासोप्ली की 1.0 किलोग्राम मात्रा प्रभावित खेत में प्रति एकड़ की दर से बोआई से पहले डालें. कीटनाशी रसायन क्लोरपायरीफास 10 ईसी, क्विनालफास 25 ईसी व इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल द्वारा गन्ने के बीज उपचारित करें. गन्ना (Sugarcane) बोने से पहले दानेदार कीटनाशी रसायन फोरेट 10 जी की 25 किलोग्राम मात्रा से प्रति हेक्टेयर की दर से जमीन उपचारित करें. इस प्रकार गन्ने की वैज्ञानिक तरीके से खेती कर के भरपूर उपज ली जा सकती है.

गन्ना व राजमा की सहफसली खेती

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना मुख्य फसल के रूप में उगाया जाता है. नकदी फसल होने और तमाम चीनी मिलें होने की वजह से किसानों के बीच गन्ना बहुत ही लोकप्रिय फसल है. इस की खेती ज्यादातर एकल फसल के रूप में की जाती है. किसान गन्ने की फसल को नौलख व पेड़ी के रूप में 2-3 साल तक लेते रहते हैं. गन्ने के उत्पादन व उत्पादकता के लिहाज से उत्तर प्रदेश का जिला बिजनौर प्रदेश व देश में अग्रणी स्थान पर है. साल 2016-17 के अांकड़ों के मुताबिक गन्ने की औसत उत्पादकता 784.97 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है और इस का कुल रकबा 2,10,269 हेक्टेयर है, जिस में सहफसली खेती का रकबा करीब 16 हजार हेक्टेयर है.

गन्ना और राजमा सहफसली प्रौद्योगिकी

खेत का चुनाव व तैयारी : गन्ना और राजमा की खेती के लिए समतल जीवांशयुक्त बलुई दोमट मिट्टी का चुनाव करना चाहिए. गोबर की खाद को खेत में डाल कर 4-5 बार जुताई कर के मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिए.

बीज का चुनाव व बोआई : पंत अनुपमा, अर्का कोमल, करिश्मा, सेमिक्स और कंटेंडर आदि राजमा की उन्नत प्रजातियां हैं. राजमा के बीजों को कार्बेंडाजिम की 2 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें और गन्ने के बीजोपचार के लिए कार्बेंडाजिम की 200 ग्राम मात्रा को 100 लीटर पानी में घोल कर टुकड़ों को उस में 25-30 मिनट तक डुबोएं. गन्ना और राजमा की सहफसली खेती में राजमा के 80 किलोग्राम और गन्ने के 60 क्विंटल बीज प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करने चाहिए. बोआई 25 अक्तूबर से 15 नवंबर के मध्य कर लेनी चाहिए. गन्ने की 2 लाइनों के बीच राजमा की 2 लाइनों की मेंड़ों पर बोआई करें.

निराईगुड़ाई व सिंचाई : दोनों फसलों की बोआई सर्दी के मौसम में होने की वजह से खरपतवारों की समस्या कम रहती है. फिर भी खरपतवार निकालने के लिए फसल में 2-3 बार निराईगुड़ाई करें. पूरे फसलोत्पादन के दौरान जमीन को नम बनाए रखें, ताकि फसल को पाले से सुरक्षित रखा जा सके.

खाद व उर्वरक : खेत में 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की खाद मिलानी चाहिए. इस के अलावा 150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस, 80 किलोग्राम पोटाश और 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट उर्वरकों का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए.

फसल सुरक्षा : बोआई से पहले बीजोपचार जरूर करें. आमतौर पर फलियां बनते समय फली भेदक, पर्ण सुंरगक व कुछ चूषक कीटों का हमला हो जाता है. कभीकभी मोजैक रोग का संक्रमण भी हो जाता है.

कीटों व रोगों की रोकथाम

* नीम का तेल 1.5 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. इस के इस्तेमाल से फसल की सुरक्षा भी हो जाती है और इनसानों की सेहत पर भी बुरा असर नहीं पड़ता है.

* नीम का तेल न होने पर 2 लीटर क्यूनालफास 25 ईसी या 1.25 लीटर मोनोक्रोटोफास 36 एसएल या 2 किलोग्राम कार्बोरिल 50 डब्लूपी को 600-700 लीटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से

12-14 दिनों के अंतर पर छिड़काव करें.

उन्नत तकनीक से खेती करने पर राजमा फलियों की औसत उपज 50-60 क्विंटल प्रति एकड़ तक हासिल हो जाती है और करीब 40 हजार रुपए प्रति एकड़ अतिरिक्त आमदनी हो जाती है. इस के साथ ही गन्ने की उत्पादकता में भी इजाफा होता है. इस की खास वजह खेत में डाले गए खाद व उर्वरकों का अधिकतम इस्तेमाल है. खरपतवार प्रबंधन का लाभ भी दोनों फसलों द्वारा हासिल किया जाता है और सहफसल में अपनाए गए कीट व रोग प्रबंधन का लाभ मुख्य फसल को भी मिल जाता है.

Awards: गन्ने की खेती में नए कीर्तिमान बनाते गोल्ड मेडलिस्ट अचल कुमार मिश्रा

अचल कुमार मिश्रा एक स्मार्ट युवा किसान हैं और ग्राम मेडईपुर पुरवा, लखीमपुर खीरी के रहने वाले हैं. वे पढ़ाई के दौरान यूनिवर्सिटी में गोल्ड मेडलिस्ट भी रहे हैं. हाल ही में उन्हें दिल्ली प्रैस की पत्रिका ‘फार्म एन फूड द्वारा’ द्वारा गन्ने की खेती में अनेक कीर्तिमान स्थापित करने के लिए ‘बेस्ट फार्मर अवार्ड इन शुगरकेन फार्मिंग अवार्ड’ से लखनऊ में सम्मानित किया गया.

यह अवार्ड उन्हें दिनेश प्रताप सिंह, कृषि उद्यान मंत्री, उत्तर प्रदेश के द्वारा दिया गया. कृषि मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने भी उन के कार्यों की खुल कर तारीफ की.

अचल कुमार मिश्रा को जनपद में गन्ना खेती में सर्वाधिक उत्पादन लेने के लिए भी जाना जाता है. वे गन्ने की खेती में इंटरक्रापिंग और अनेक नवाचार अपनाते रहे हैं. इस के अलावा आप ने गन्ने की अनेक प्रजातियां भी विकसित की हैं.

 

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लखीमपुर खीरी के इस किसान ने कृषि में नित नए नवाचारों के लिए जिले में अपनी एक अलग पहचान बनाई है. अचल कुमार मिश्रा को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली से “नवोन्मेषी किसान” सम्मान भी मिल चुका है.

गन्ने के साथ करते हैं एकीकृत कृषि

अचल कुमार मिश्रा ने अपने खेतों में एक खूबसूरत फार्म बना रखा है, जहां वे गन्ने की नर्सरी के साथ मधुमक्खीपालन, कड़कनाथ मुरगीपालन, अजोला उत्पादन भी करते हैं. जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए वर्मी कंपोस्ट भी खुद बनाते हैं.

Achal Kumar Mishra

अचल कुमार मिश्रा एकीकृत खेती करते हैं. उन्होंने लखनऊ मुलाकात में बताया कि एकीकृत खेती करने में लगने वाली लागत कम हो जाती है और उत्पादन भी अधिक मिलता है. रासायनिक खेती को ले कर उन का कहना है कि आज के समय में ज्यादा उत्पादन के लिए कई किसान मनमाने ढ़ंग से रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करने लगे हैं, जिस से खेती में लागत बढ़ती है और किसान खेती को घाटे का सौदा कहने से नहीं चूकते.

उन्होंने बताया कि अगर हम रासायनिक उर्वरकों की जगह मुरगी की खाद, वर्मी कंपोस्ट और अजोला आदि का कृषि में सही तरीके से प्रयोग करें, तो खेती तो अच्छी होगी ही, साथ ही उपज का दाम भी अच्छा मिलेगा.

अचल कुमार का कहना है कि गन्ना एक लंबी अवधि में तैयार होने वाली फसल है, इसलिए हम इसे अधिक मुनाफेदार फसल बनाने के लिए गन्ने के साथ सहफसली खेती करते हैं जैसे गन्ने के साथ लहसुन, सरसों, ब्रोकली आदि को गन्ने के बीच में बो देते हैं और जब तक गन्ने की फसल तैयार होती है, तब तक दूसरी फसलें तैयार हो जाती हैं और हमें अतिरिक्त मुनाफा भी मिलने लगता है. इस से हमें सिर्फ गन्ने के उत्पादन का ही इंतजार नहीं करना पड़ता.

मुख्यमंत्री और प्रधान मंत्री ने भी किया सम्मानित

अचल मिश्रा को कृषि में नवाचार और विविधीकरण को ले कर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सम्मानित कर चुके हैं. इस के अलावा अचल कुमार मिश्रा को कृषि में उन के नवाचारों के लिए देश में अनेक बार सम्मानित किया जा चुका है.

गन्ने की उत्पादकता बढ़ाने के लिए बीज खुद तैयार करें

गन्ने की खेती में बीज गन्ने की अच्छी क्वालिटी यानी गुणवत्ता पैदावार बढ़ाने में काफी खास है.

किसान अच्छी गुणवत्ता के बीज का इस्तेमाल कर के गन्ने की अच्छी उपज हासिल कर सकते हैं. आमतौर पर जो गन्ना चीनी मिल में नहीं जाता है या आसपास जो भी बीज मिलता है, उसे ही किसान बीज के रूप में इस्तेमाल कर लेते हैं. लेकिन इस प्रकार के बीजों में कई तरह के दोष हो सकते हैं, जैसे 10 महीने से ज्यादा उम्र का गन्ना, बीज में दूसरी प्रजाति के गन्ने का मिला होना, कीट व रोग से ग्रसित गन्ना आदि. इसलिए हर गन्ना किसान को बोआई के लिए खुद बीज तैयार करना चाहिए.

उम्दा बीज की खासीयतें

* बीज गन्ने की आयु 8-10 महीने की होनी चाहिए.

* बीज गन्ने में पानी (नमी) 65 फीसदी से कम नहीं होना चाहिए.

* बीज गन्ना कीट व रोगमुक्त होना चाहिए.

* बीज गन्ने में ज्यादा ग्लूकोज होना चाहिए.

* बीज गन्ने के खेत में दूसरी प्रजाति के गन्ने की मिलावट नहीं होनी चाहिए.

* बीज गन्ने की आंख खराब नहीं होनी चाहिए.

* बीज गन्ने की कटाई सिंगल बड विधि द्वारा की जानी चाहिए और कटिंग्स तिरछी नहीं होनी चाहिए.

Sugarcane Seeds

बीज उत्पादन में ध्यान देने वाली बातें

* गन्ना उत्पादक किसान बोआई के लिए अच्छी प्रजातियों के गन्ना बीज नलकूप या ट्यूबवेल के पास के खेत में जरूरत के मुताबिक गन्ना बीज उत्पादन के लिए लगाएं.

* वर्तमान में अगेती प्रजाति को 0238 के गन्ने का क्षेत्रफल बढ़ रहा है. इस प्रजाति के अस्वीकार होने पर गन्ना किसानों और चीनी मिल मालिकों को भारी आर्थिक नुकसान हो सकता है. जरूरत इस बात की है कि को 0238 प्रजाति की गुणवत्ता, रोगरोधक कूवत, चीनी परता को लंबे अरसे तक बनाए रखा जाए और इस के साथसाथ इस के समान अन्य प्रजातियों को 0118, कोशा 08272 का भी विस्तार हो. जब तक हर किसान गन्ने का बीज अपने खेत में नहीं उगाएगा और गन्ना उगाने की ऐसी तकनीक का इस्तेमाल नहीं करेगा, जिस से कि कम मात्रा में अच्छी गुणवत्ता वाली प्रजातियों के बीज का तेजी से विस्तार हो, तब तक अच्छी चीनी हासिल करने और उत्पादकता बनाए रखने का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकेगा.

* गन्ने को बीज गन्ने में बदलने के लिए यह जरूरी है कि जिस खेत से गन्ना बीज ले जाना है, उस का वह हिस्सा बीज गन्ने के लिए चुनें, जो स्वस्थ हो, अच्छी पैदावार देने वाला हो और उस पर किसी रोग या कीट का हमला न हो. ऐसे इलाके को चुनने के बाद पानी रोकने के लिए मेंड़ बनाएं, जिस से इस में पानी लगाने के बाद पानी खेत के अन्य हिस्सों में न फैले. चुने गए क्षेत्र से बीज गन्ना हासिल करने से 1 हफ्ते पहले सिंचाई के जरीए 40 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर यूरिया के साथ इस्तेमाल करें और गन्ने का एक तिहाई भाग ही बीज गन्ने के रूप में इस्तेमाल करें, जिस से चुने हुए बीज गन्ने का जमाव अच्छा हो.

* चुने हुए खेत की पूरी तैयारी करने के बाद प्राथमिक पौधशाला से हासिल बीज गन्ना के सेट्स काटने से पहले चुने खेत में एक कोने पर बीज के इलाज के लिए जरूरत के मुताबिक एक गड्ढा तैयार करें और उस में पौलिथीन बिछा दें. गड्ढे में 1 फीसदी बाविस्टीन का घोल तैयार कर लें और इसी गड्ढे में बीज गन्ना सेट्स की कटाई शुरू करें, जिस से कटे सेट्स इस गड्ढे में जाते रहें और सेट्स का बीज उपचार अच्छी तरह से हो सके.

Sugarcane Seeds

सेट्स कटाई के दौरान यह जरूर देखें कि कोई बीज किसी रोग या कीड़े से प्रभावित न हो, ऐसे सेट्स को अलग कर लें.

* अच्छी क्वालिटी के बीजों की पैदावार के लिए जमीन उपचार, बोआई, सिंचाई, उर्वरक और फर्टीलाइजर और कीट रोग नियंत्रण सभी काम गन्ना उत्पादक तकनीक के मुताबिक ही करें. साथ ही रोगों और कीटों की रोकथाम के लिए पौधशाला पर खास ध्यान दें.

* बीजों का उपचार बाविस्टीन, कार्बंडाजिम, माइक्रोजिम व ट्राइकोडर्मा से करने से पहले 52-54 डिगरी सेंटीग्रेड गरम पानी में 2 घंटे तक करें, जिस से घासीप्ररोह, उकठा, कंडुआ व लालसड़न रोग की रोकथाम हो सके.

बोआई सिंगल बड द्वारा ट्रैंच विधि से आंख से आंख की दूरी 2 फुट और लाइन से लाइन की दूरी 4.5 फुट रख कर करें. ट्रैंच में मिट्टी का इस्तेमाल 2-3 सेंटीमीटर से ज्यादा न करें. बीजों को मिट्टी से ढकने के बाद जरूरत के मुताबिक हलकी सिंचाई करें.

* पोषक तत्त्वों का इस्तेमाल व कीड़ों व रोगों की रोकथाम दूसरी फसलों की तरह करें. इस तरह 0238 प्रजाति को काफी समय तक किसानों के हित में उपयोगी बनाए रखने में मदद मिलेगी.

* तैयार नर्सरी से बीजों की कटाई से पहले सिंचाई के साथसाथ 40 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की दर से दें. इस से बीजों की क्वालिटी अच्छी हो जाती है.

समय प्रबंधन से बदल सकती है गन्ना किसानों की हालत

परंपरागत खेती में किसान जहां गन्ना-पेड़ी-गेहूं, गन्ना-पेड़ी-गेहूं फसलचक्र अपना रहे हैं, उस में फौरन बदलाव की जरूरत है. इस फसलचक्र को अपनाने से किसान भाइयों को काफी नुकसान हो रहा है. गेहूं काट कर देरी से गन्ने की बोआई होती है, तो गन्ने की उपज बहुत कम (औसतन 375-400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर) हासिल होती है. साथ ही देरी से (जनवरी के अंत में) बोआई करने पर गेहूं की पैदावार औसतन 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हासिल होती है, जो काफी कम है.

वहीं दूसरी ओर ज्यादा पैदावार लेने के प्रयास में किसान भाई ज्यादा मात्रा में खादबीज का इस्तेमाल कर के उत्पादन लागत बढ़ा रहे हैं. इस से किसानों को दोहरी हानि का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे हालात में यह जरूरी है कि हम नए अंदाज में खेती करना शुरू करें, जिस के लिए जरूरी है कि हम सब से पहले अपने फसलचक्र में बदलाव करें.

जिस खेत में गन्ना बोना है, उस में रबी की फसल काटने के बाद किसान ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई कर के खेत का सौरीकरण करें. फिर उस में हरी खाद लेने के लिए ढैंचे की बोआई करें. अगस्त में ढैंचे को खेत में पलट कर रोटावेटर से अच्छी तरह मिला लें. इस के बाद सितंबर के पहले व दूसरे हफ्ते में गन्ने की बोआई करें (बरसात को देखते हुए गन्ने की बोआई करें). इस समय बोए गए गन्ने का जमाव अच्छा होता है और बढ़वार तेज गति से होती है. अच्छी तरह देखभाल किए गए गन्ने की अगले साल पेराई सत्र में औसतन 1,000-1,200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से उपज आसानी से हासिल की जा सकती है. यहां किसानों के मन में यह सवाल आना लाजिम है कि उन की खरीफ व रबी की 2 फसलों (धान व गेहूं) का नुकसान हो रहा है, लेकिन सचाई कुछ और है.

अब किसानों के मन में सवाल आता है कि उन्हें अपने घरेलू इस्तेमाल के लिए भी धान व गेहूं चाहिए. इस के लिए सुझाव है कि वे अपने खेत को इस तरह बांटें कि जरूरत के मुताबिक उन्हें धान, गेहूं व दूसरी फसलें भी मिल जाएं, उत्पादन लागत भी घटे और प्रति इकाई क्षेत्रफल से ज्यादा पैदावार भी मिले. तभी हम खेती को लाभकारी बना सकते हैं, वरना आप समझ गए होंगे कि ज्यादा उत्पादन लागत लगा कर भी हमें शुद्ध लाभ के रूप में मात्र 95,000 रुपए की आमदनी होती है, जबकि कम लागत से 1,80,000 रुपए की आमदनी हो सकती है.

गन्ना कटाई यंत्र गन्ना हार्वेस्टर (Sugarcane Harvester) और उस की उपयोगिता

गन्ने की फसल तैयार होने के बाद गन्ने की कटाई करना अधिक मेहनत वाला काम है. मजदूरों से कटाई करवाना या खुद करना दोनों में काफी समय भी लगता है. ऐसे में गन्ना फसल की कटाई के लिए मशीनें गन्ने को काट कर छीलने और गन्ने के तनों को काटने में मदद करती हैं. यह यंत्र किसानों का काफी समय और मेहनत बचाता है.

गन्ना कटाई में मशीनों का उपयोग करने से गन्ने की कटाई तेजी से की जा सकती है, जिस से गन्ने की उत्पादकता में वृद्धि होती है. साथ ही, ये मशीनें कटाई की सुरक्षा को भी बढ़ाती हैं, क्योंकि ये हाथ से काटने के जोखिम को कम करती हैं.

गन्ना हार्वेस्टर का उपयोग

गन्ना काटने वाले उपकरण को ‘गन्ना हार्वेस्टर’ कहा जाता है. यह एक मशीन होती है, जो गन्ने को काट कर उठाने में मदद करती है. गन्ने के खेतों में गन्ना हार्वेस्टर का उपयोग किया जाता है. यह यंत्र गन्ने के स्टाक से ले कर काटने तक कई काम करता है.

पहले समय में लोग गन्ने की कटाई को हाथ से करते थे, लेकिन इस में कठिनाई थी और समय भी बहुत लगता था. गन्ना काटने के लिए मूल रूप से 2 प्रमुख तरीके इस्तेमाल होते थे. एक तो हाथ से और दूसरा घरबाड़ी यानी ओक्स-ड्रिवेन क्रशर के द्वारा.

18वीं और 19वीं सदी में गन्ने की कटाई का काम कामगारों द्वारा किया जाता था. इस के बाद 20वीं सदी के आरंभ में मेकैनिकल गन्ना कटाई मशीनों का विकास हुआ. ये मशीनें पहले से ज्यादा क्षमतावान, तेज और खर्च में कमी करती थीं.

60 के दशक में गन्ना कटाई को ले कर काफी प्रगति हुई और अधिक उन्नत मशीनें तैयार की गईं. आज विभिन्न प्रकार की गन्ना कटाई की मशीनें उपलब्ध हैं, जो किसानों के काम को और भी आसान और फायदेमंद बनाती हैं. इन मशीनों में कंप्यूटराइजेशन और अन्य उन्नत तकनीकी का इस्तेमाल होता है, जो काम को और भी आसान बनाती है.

गन्ना हार्वेस्टर खासकर 2 तरह के आते हैं :

स्टेशनरी गन्ना हार्वेस्टर : यह हार्वेस्टर एक स्थायी या स्थैतिक होता है, जो गन्ने के खेतों में लगाया जाता है. इस में गन्ने को काटने वाले ब्लेड लगे होते हैं.

सैल्फप्रोपैल्ड गन्ना हार्वेस्टर : यह हार्वेस्टर अपनेआप को गन्ने के खेतों में स्थानांतरित कर सकता है. इस में चालक सीट और गन्ने को काटने और उन्हें इकट्ठा करने के लिए एक संबंधित सिस्टम लगा होता है.

गन्ना हार्वेस्टर का उपयोग गन्ने के खेतों में फसल काटने में बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है, जिस से किसानों को समय और मेहनत की बचत होती है. गन्ना कटाई मशीनों के कई फायदे हैं. मुख्य फायदे इस प्रकार हैं :

समय की बचत : गन्ना कटाई मशीनें किसानों को कम समय पर गन्ना कटाई करने की सुविधा देती हैं, जिस से समय की बचत होती है और उन्हें दूसरे कामों के लिए समय मिलता है.

कम मजदूरी : गन्ना कटाई मशीनें मजदूरों की तादाद को कम करती हैं, क्योंकि एक मशीन एक समय में बड़ी मात्रा में गन्ना काटती हैं.

उत्पादकता में वृद्धि : मशीनों के उपयोग से उत्पादकता में वृद्धि होती है, क्योंकि वे गन्ने को तेजी से और प्रभावी तरीके से काटती हैं और इकट्ठा करती हैं.

गुणवत्ता बनाए रखना : मशीनों का उपयोग कर के गन्ने की कटाई की जा सकती है. जब गन्ना पूरी तरह पक जाता है, जिस से उत्पाद की गुणवत्ता बनाए रखी जा सकती है.

भारत में सर्वश्रेष्ठ गन्ना हार्वेस्टर

भारत में अनेक कृषि यंत्र निर्माताओं के बाजार में कई तरह के गन्ना हार्वेस्टर उपलब्ध हैं, जो कटाई के काम को आसान बनाते हैं. भारत में उपलब्ध कुछ खास गन्ना हार्वेस्टर के बारे में जानकारी दी गई है :

शक्तिमान गन्ना हार्वेस्टर : शक्तिमान गन्ना हार्वेस्टर एक लोकप्रिय और प्रसिद्ध मशीन है, जो कटाई के दौरान बेहतरीन काम करती है. यह 6 सिलैंडर वाली मशीन के साथ 173 एचपी की है. शक्तिमान में वाटरकूल्ड डीजल इंजन है, जो बेहतरीन प्रदर्शन करता है. भारत में शक्तिमान हार्वेस्टर की कीमत आम किसानों के लिए बेहद सस्ती है.

न्यू हॉलैंड शुगरकेन हार्वेस्टर औस्टौफ्ट 4000 : भारत में यह एक आदर्श गन्ना हार्वेस्टर है. यह किसानों के लिए एक छोटी और हलकी मशीन है. गन्ना हार्वेस्टर में अच्छी गतिशीलता और सब से अच्छा बेसकट है, जिस के परिणामस्वरूप गन्ने का कम नुकसान और बेहतर उत्पादन होता है. कौंपैक्ट मशीनें आंशिक रूप से गीले खेतों में फसल काटने में सक्षम बनाती हैं. इस प्रकार विभिन्न स्थितियों के तहत फसल क्षमता को बढ़ाती हैं.

एमएस स्वराज : इस कंपनी के गन्ना हार्वेस्टर मौडल्स भारत में काफी लोकप्रिय हैं. ये विभिन्न क्षमताओं और फीचर्स के साथ उपलब्ध हैं.

जॉन डियर : जॉन डियर के गन्ना हार्वेस्टर भी बहुत प्रसिद्ध हैं और वे टैक्नोलौजी और क्षमता में ऐक्सीलैंस के लिए जाने जाते हैं.

ये कुछ प्रमुख ब्रांड हैं, लेकिन गन्ना हार्वेस्टर का चयन करते समय क्षेत्रीय आवश्यकताओं, बजट और उपयोग करने के अनुभव को ध्यान में रखना चाहिए.

अधिक मुनाफे के लिए उगाएं गन्ने के साथ अन्य फसलें

अब गन्ने की बोआई मशीनों से की जाती है. मशीनों से बोआई करने का सब से बड़ा फायदा यह है कि किसान गन्ने के साथ कोई और फसल भी बो सकते हैं. यहां गन्ने का ऊपरी भाग अच्छे बीज के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं, क्योंकि उस समय नीचे का गन्ना कटाई व छिलाई कर के चीनी मिल को भेजा जा सकता है.

उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और उत्तराखंड में गेहूं की कटाई के बाद गन्ना बोया जाता है. छोटी जोत होने के कारण गेहूं की कटाई के बाद गरमी में देर से गन्ने की बोआई होती है. इस समय ज्यादा तापमान होने के कारण गन्ने की फसल का सही से जमाव नहीं होता है और इस दौरान बोआई करने से फसल में कीट व खरपतवारों का हमला भी ज्यादा होता है इसलिए गन्ना और गेहूं की फसल साथ लेने से कई फायदे होते हैं.

शुरुआती दौर में गन्ने की बढ़वार कम होने व पत्तियां छोटी होने के कारण कम समय लेने वाली फसल जैसे लाही, सरसों, टमाटर, मटर, मसूर, आलू, प्याज, लहसुन, मूंग, लोबिया, मिर्च वगैरह के लिए सही समय मिल जाता है, जिस से उन में पोषक तत्त्वों, पानी, खाली जगह और धूप वगैरह का सही इस्तेमाल गन्ने की फसल के साथ मिल जाता है.

गन्ना बोआई करने का सही समय फरवरी के पहले हफ्ते से मार्च मध्य तक होता है. समय से बोआई होने के कारण गन्ने का जमाव, ब्यांत और बढ़वार के लिए पूरा समय और सही मौसम होता है, जिस से पौधों में पोषक तत्त्व, पानी और रोशनी के लिए आपस में खींचातानी नहीं रहती है और ऐसे समय पर बोई गई फसल में तेजी से बढ़वार होने के कारण कीटों और खरपतवारों द्वारा नुकसान भी कम होता है.

गेहूं की खड़ी फसल में फरवरी महीने में पहले से छोड़ी गई नाली में गन्ना बोआई होने से गन्ने का जमाव, ब्यांत और बढ़वार के लिए सही समय मिल जाता है. इस से गरमी में देर से गेहूं कटाई के बाद बोई गई गन्ना फसल की तुलना में ज्यादा उपज मिलती है.

गेहूं की कटाई के बाद गरमी में गन्ने की बोआई से ले कर कटाई तक होने वाली तमाम परेशानियों और ज्यादा लागत से बचा जा सकता है. गेहूं की कटाई के बाद गन्ने की लाइनों में खाद, उर्वरक डाल कर सिंचाई कर दें, जिस से गन्ने की बढ़वार काफी तेजी से होगी और पैदावार तकरीबन पेड़ी गन्ने के बराबर होगी. गेहूं कटाई के बाद देर से बोए गए गन्ने की पैदावार पेड़ी गन्ने के मुकाबले 30-40 फीसदी कम होती है. इस कमी की भरपाई नई तकनीकों से की जा सकती है.

गेहूं की कटाई के बाद दूसरी फसल जैसे मूंग, उड़द, लोबिया, मक्का, टमाटर, भिंडी, खीरा, गेंदा, प्याज, लहसुन वगैरह कोई भी फसल बैड पर ले सकते हैं.

इस तरह से छोटी जोत होने के कारण अकेली फसल लेने के बजाय कई फसलें ले कर ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है.

वसंतकालीन गन्ने की 2 लाइनों के बीच में दूसरी फसल उगाई जा सकती है. गन्ने की 2 लाइनों के बीच में खाली पड़ी जमीन में खरपतवार उग कर फसल के पोषक तत्त्व और खादपानी का इस्तेमाल कर पैदावार पर बुरा असर डालते हैं.

गन्ने की सहफसली खेती करने से लागत कम आती है. खेती में टिकाऊपन आता है. हरी खाद व दलहनी फसलों से नाइट्रोजन मिट्टी में स्टोर होती है, जिस का इस्तेमाल गन्ने की फसल में होता है और खाद पर कम खर्च आता है.

साथ ही, मिट्टी, पानी व दूसरी कुदरती चीजों की हिफाजत भी होती है और खरपतवारों से गन्ने की फसल का बचाव होता है.

सहफसल में बोआई के 4-5 हफ्ते बाद खुरपी से खरपतवार निकाल देना चाहिए. साथ वाली फसल कटने पर गन्ने की गुड़ाई जरूर करें.

सहफसल की कटाई के बाद गन्ने की फसल में जरूरत के मुताबिक पानी लगाएं. गन्ने में कल्ले फूटते समय खेत में नमी होनी चाहिए.

किस्मों का चुनाव

गन्ने के साथ सब्जी की खेती करने में किस्मों का चुनाव सब से अहम है. शरदकालीन गन्ने के साथ आलू की किस्म कुफरी बादशाह, कुफरी शक्तिमान व सी-3797 बोनी चाहिए.

इस के अलावा गन्ने के साथ लहसुन की पंत किस्म लोहित, मालवीय मटर-15, आजाद मटर 108-3 व आरकिल को लगाएं.

वहीं दूसरी ओर वसंतकालीन गन्ने के साथ भिंडी की किस्म पूसा सावनी, प्रभनी व क्रांति, शरदकालीन पेड़ी गन्ने के साथ प्याज की नासिक, पूसा रेड, पटना रेड व कल्यानपुर की फसल अच्छी होती है. गन्ने के संग धनिया की पंत धनिया-1, पंत हरितिमा, पंजाब मल्टीकट व शीतल की पैदावार ज्यादा मिलती है.

सही देखभाल व अच्छी तकनीक से 1 हेक्टेयर खेत से 700 क्विंटल गन्ना, 30 क्विंटल भिंडी, 150 क्विंटल प्याज, 15 क्विंटल लहसुन व 10 क्विंटल धनिए की पैदावार ली जा सकती है.

गन्ने का जमाव 35 दिनों में होता है. शुरू में गन्ने की बढ़वार भी धीमी होती है और 4-5 महीने तक गन्ना छोटा ही रहता है. गन्ने की 2 लाइनों के बीच की 2-3 फुट खाली जगह में खरपतवार पनप जाते हैं. इन 2 लाइनों के बीच खाली पड़ी जमीन पर सब्जियों की फसल आसानी से ली जा सकती है.

गन्ने के संग सब्जियों व मसाले की फसलें उगाना फायदेमंद रहता है, लेकिन सब से ज्यादा फायदा लहसुन की खेती में होता है. इस से गन्ने की पैदावार बढ़ती है, कीट व बीमारी भी कम लगती हैं.

शरदकालीन गन्ने के साथ आलू की कुफरी, चंद्रमुखी किस्म बो सकते हैं. जनवरी के पहले हफ्ते में आलू की खुदाई कर के उसी खेत में प्याज बो कर अकेले गन्ना बोने के मुकाबले में कहीं ज्यादा कमाई कर सकते हैं.

अंत:फसलों का फायदा

घटती जोत, खाद और उर्वरक, कीटनाशक, डीजल, सिंचाई वगैरह महंगी होने के कारण केवल गन्ने की अकेली फसल लेना फायदेमंद नहीं है. इस के साथ दूसरी फसलों को उसी लागत में साथसाथ लेने से फसलों की लागत कम होगी. एकसाथ कई फसलें लेना आज की जरूरत है, क्योंकि बढ़ती हुई आबादी और बढ़ते खर्चों को इसी तरह से पूरा किया जा सकता है.

छोटे, मझोले और सभी किसानों की समस्याओं को देखते हुए वैज्ञानिकों द्वारा ऐसी उन्नत विधियां ईजाद की गई हैं, जिन में गन्ने के साथ अत:फसलें ली जा सकती हैं. पुरानी लीक से हट कर नई विधियां अपना कर किसान कम जगह में ज्यादा से ज्यादा मुनाफा हासिल कर सकते हैं.

मशीनों द्वारा कम से कम समय में खेती के सभी काम किए जा रहे हैं. गन्ना और दूसरी फसलें जैसे असौजी गन्ना और 2 लाइन गेंदा, टमाटर, बैगन, भिंडी, पत्तागोभी, धनिया वगैरह या चारा मक्का, लोबिया वगैरह की कटाई जूनजुलाई महीने तक कर के बाद में गन्ने की लाइनों में मिट्टी चढ़ा कर अगस्त महीने में गन्ने की बंधाई कर सकते हैं.

1 या 2 साल वाले फसल चक्र के लिए नवंबर महीने में असौजी गन्ने की कटाई के बाद सहफसलों के रूप में सरसों, गेहूं, लाही, तोरिया, मसूर, आलू वगैरह की बोआई 2 नालियों के बीच बनी जगह पर दोबारा करें. इन फसलों की कटाई कम समय में फरवरी से मध्य अप्रैल तक होगी. इस के बाद सिंचाई कर के दूसरी कम समय की फसलें जैसे प्याज, लहसुन, मूंग, लोबिया, गेंदा वगैरह की बोआई करें.

गन्ने में रखें सही दूसरी

गन्ने की कुछ ऐसी किस्में हैं, जिन का जमाव और ब्यांत ज्यादा होता है. उन को पनपने व बढ़वार के लिए पोषक तत्त्वों के अलावा नमी की ज्यादा जरूरत होती है. झुंड में कम दूरी होने के कारण सही पोषण न मिलने से गन्ने की पोरियां पतली व छोटी रह जाती हैं. इस से खेत में चीनी मिल लायक गन्ने कम तादाद में और वजन में कम मिलते हैं. जिन गन्ना प्रजातियों का जमाव और ब्यांत कम होती है, उन के गन्ने मोटे और वजनी होते हैं.

अच्छी पैदावार का मतलब खेत में स्वस्थ गन्नों की तादाद, गन्ने की लंबाई और मोटाई से है. 1 हेक्टेयर खेत में कम से कम डेढ़ लाख झुंड होने चाहिए. हर झुंड में 7-8 गन्ने हों और 1 गन्ने का वजन 1 किलोग्राम होने यानी एक झुंड में लगभग 8-10 किलोग्राम वजन होने पर ही हजार से 15 सौ क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज मिल सकती है.

गन्ने की जो प्रजातियां जमाव व ब्यांत के हिसाब से अच्छी हैं, उन की बोआई के लिए लाइनों से लाइनों की दूरी 90-100 सैंटीमीटर रखनी चाहिए. कुछ वैरायटी जैसे कोशा-96268, 8432 का जमाव व ब्यांत कम है, को गेहूं की कटाई के बाद बोते समय लाइन से लाइन की दूरी 65-70 सेंटीमीटर रखें और बीज की मात्रा बढ़ाने पर जमाव, बढ़वार से अच्छी उपज मिलती है, लेकिन पेड़ी गन्ना फसल अच्छी नहीं होती है.

लाइन से लाइन की सही दूरी रखने से अंत:फसलें और हरी खाद की फसलें ली जा सकती हैं और खेत में खरपतवार को टिलर, कल्टीवेटर से निराईगुड़ाई कर के हटाएं और गन्ने की लाइनों में जड़ों के ऊपर मिट्टी अच्छी तरह से चढ़ाई जा सकती है ताकि बाद में निकलने वाले फुटाव, किल्ले वगैरह नहीं निकलेंगे और शुद्ध गन्ने ज्यादा वजनी होंगे.

कूंड़ से कूंड़ की सही दूरी होने के कारण गन्ने की फसल भी कम गिरेगी और पूरे गन्ने को सूरज की धूप सही मात्रा में मिलेगी. जिस के कारण पौधों में बढ़वार अच्छी होगी.

लाइन से लाइन की दूरी ज्यादा रखने पर जमीन में धूप और हवा आने से मिट्टी में जीवों की अच्छी बढ़वार होती है, जो फसल के लिए फायदेमंद है. 1 मीटर या इस से ज्यादा दूरी पर ज्यादा बोआई करने पर अच्छी पैदावार इसलिए मिलती है कि गन्ने के पौधों की पत्तियां आधे से 1 मीटर लंबाई तक फैलती हैं. पत्तियां पौधों का भोजन बनाती हैं इसलिए इन का खुल कर पनपना ज्यादा जरूरी है.

हमारे यहां गन्ने की पैदावार कम होने की खास वजह भी फसल में कम दूरी होना है. हमारे यहां गन्ना बोआई में लाइन से लाइन की दूरी 60-65 सैंटीमीटर रखी जाती है.

पछेती गन्ना बोआई के समय तापमान 35 डिगरी सैंटीग्रेड से ज्यादा होता है, जो जमाव के बजाय बढ़वार के लिए अच्छा होता है, लेकिन गन्ने के जमाव, ब्यांत के लिए सही नहीं होता.

पौधे की बढ़वार जमीन के उपजाऊपन और सूरज की रोशनी पर निर्भर करती है. कम दूरी होने पर पौधों की पत्तियां एकदूसरे के ऊपर चढ़ जाती हैं, जिस से सूरज की रोशनी पौधों की सभी पत्तियों तक नहीं पहुंच पाती है. धूप न मिलने से पत्तियां अपना खाना नहीं बना पातीं. पौधों का भोजन कम बनता है, तो पौधों का वजन भी कम बनता है.

अंत:फसलों में रखें खयाल

गन्ने के साथ सहफसल के तौर पर उगाई जाने वाली फसल में कई खास बातें होनी चाहिए, जैसे:

*   गन्ने के साथ वाली फसल कम समय यानी 2-3 महीने में तैयार होने वाली होनी चाहिए.

*   सहफसल गन्ने की फसल के साथ पोषक तत्त्वों के इस्तेमाल के लिए प्रतियोगिता न करती हो और उस का कोई गलत असर गन्ने की फसल पर नहीं होना चाहिए.

*   सहफसल कम फैलने वाली, सीधी बढ़ने वाली, कम शाखाओं वाली होनी चाहिए. साथ ही, पानी व पोषक तत्त्वों की मांग का समय गन्ने से अलग होना चाहिए.

*   बीज के लिए उगाई जाने वाली गन्ना फसल में सहफसलों को न उगाएं.

ट्रैंच विधि से बोएं गन्ना (Sugarcane)

गन्ने की फसल किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकती है अगर वे वैज्ञानिक तरीके से गन्ने की खेती करें.

देश के अनेक खेती के माहिर वैज्ञानिक किसानों के लिए लगातार काम कर रहे हैं. इस के तहत नई किस्म के बीजों पर शोध का काम चल रहा है. इस के नतीजे काफी चौंकाने वाले मिल रहे हैं.

गन्ने की खेती ज्यादातर उत्तर प्रदेश में की जाती है, लेकिन पिछले कुछ सालों से हो रहे घाटे के चलते गन्ने की फसल से किसानों का मोह भंग हो रहा है. खेती के माहिर विशेषज्ञ गन्ने की खेती ट्रैंच विधि से करने की सलाह दे रहे हैं. इस से किसानों का फायदा बढ़ सकता है.

खेती के माहिरों का मानना है कि अगर किसान ट्रैंच विधि से गन्ने को बोएं तो सामान्य विधि के मुकाबले 30-40 फीसदी ज्यादा उपज मिल सकती है.

इस विधि से बोआई शरद, वसंत व देर वसंत ऋतु में आसानी से की जा सकती है. अगर किसान इस विधि से फसल करते हैं तब उन्हें परंपरागत विधि से ज्यादा फायदा होगा.

ट्रैंच विधि है क्या

इस तकनीक में खेत तैयार करने के बाद ट्रैंच ओपनर से एक फुट चौड़ी और 25-30 सैंटीमीटर गहरी नाली बनाते हैं. एक नाली से दूसरी नाली के बीच की दूरी 120 सैंटीमीटर होनी चाहिए.

नाली बनाने के बाद सब से नीचे खाद डालते हैं. खाद की मात्रा एक हेक्टेयर में 180 किलोग्राम नाइट्रोजन, 80 किलोग्राम फास्फोरस, 60 किलोग्राम पोटाश और 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट होती है. बोआई के समय इस में नाइट्रोजन की कुल मात्रा का एकतिहाई इस्तेमाल करते हैं. बाकी फास्फोरस, पोटाश और जिंक सल्फेट डाल कर बोते हैं.

फसल तभी अच्छी होती है जब उसे समय पर बोया जाए. यहां सब से बड़ी परेशानी यही है कि उन्हें समय का खयाल ही नहीं रहता, जिस से लागत ज्यादा आने के साथ ही उत्पादन भी कम हो जाता है इसलिए किसी भी फसल की बोआई में समय बहुत अहम होता है.

अच्छा बीज ही चुनें

गन्ने के बीज के लिए ऐसे गन्ने को चुनें, जो एकदम सेहतमंद हों और तकरीबन 8 से 10 महीने के हों. ध्यान दें कि गन्ने के बीज में किसी तरह का रोग व कीट न लगा हो. इस के अलावा यह ध्यान रखना होगा कि बीज के लिए ऐसे गन्ने को चुनें जिस में सही मात्रा में पोषक तत्त्व हों. गन्ना खेत में गिरा हुआ नहीं होना चाहिए, क्योंकि इस तरह के गन्ने में रोग लगने का अंदेशा ज्यादा होता है. साथ ही, जो गन्ना आप बोने के लिए ले रहे हैं, वह बहुत पतला नहीं हो. इस से उत्पादन प्रभावित होता है.

बीज का उपचार

गन्ने को बोने से पहले बीज को उपचारित करना बहुत जरूरी है. इस की वजह यह है कि गन्ने के बीज में दीमक व दूसरे कीड़े नुकसान नहीं पहुंचा पाएंगे. बीज को उपचारित करने के लिए बाविस्टिन के 0.1 फीसदी घोल (112 ग्राम दवा को 112 लिटर पानी में मिला कर) में गन्ने के जो टुकड़े हों, उन्हें कम से कम 5 मिनट तक डुबोना चाहिए, उस के बाद बोना ज्यादा बेहतर रहेगा.

बीज की दर

प्रति हेक्टेयर गन्ने की बोआई के लिए तकरीबन 70-75 क्विंटल गन्ने की जरूरत होती है. नाली में 2 आंख यानी गन्ने की गांठ या पोर 10 गन्ने के टुकड़े प्रति मीटर की दर से डालने चाहिए.

परंपरागत तरीके में एक के बाद एक गन्ने के टुकड़े डालते जाते थे, जबकि ट्रैंच विधि में गन्ने के टुकड़े सीढ़ीनुमा तरीके से डालने चाहिए. इस से पैदावार ज्यादा होती है.

बोआई व जमीन का उपचार

नाली में 2 आंख यानी गन्ने की गांठ या पोर के उपचारित 10-12 गन्ने के टुकड़े प्रति मीटर की दर से सीढ़ीनुमा तरीके से इस तरह डालें कि उन की आंखें अगलबगल में हों. दीमक व अंकुर बेधक नियंत्रण के लिए गन्ने के टुकड़ों के ऊपर रीजैंट 20 किलोग्राम या फोरेट 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर का छिड़काव या क्लोरोपाइरीफास 5 लिटर प्रति हेक्टेयर को 1875 लिटर पानी के साथ गन्ने के टुकड़ों पर छिड़काव करना चाहिए.

गन्ने के टुकड़ों को ढकने में सावधानी बरतनी चाहिए, जिस से गन्ने के टुकड़ों के ऊपर 2-3 सैंटीमीटर से ज्यादा मिट्टी न पड़े. इस के उलट सामान्य बोआई में गन्ने के ऊपर ज्यादा मात्रा में मिट्टी के अंदर गन्ने के टुकड़ों को दबा देते थे, जिस से कम मात्रा में अंकुरण होता था.

गन्नों का जमाव

इस विधि से बोआई करने में किसानों को काफी फायदा होता है, क्योंकि ज्यादातर गन्ने के बीजों में अंकुरण आ जाता है. बोने के बाद एक हफ्ते में जमाव शुरू हो जाता है और एक माह में पूरा हो जाता है.

इस विधि से जमाव 80-90 फीसदी तक होता है जबकि सामान्य विधि से 40 से 50 फीसदी तक ही होता था. जमाव ज्यादा व समान रूप से होने और गन्ने के टुकड़ों को ७सीढ़ीनुमा तरीके से रखने में नाली में दोहरी लाइन की तरह जमाव दिखता है. इस वजह से कोई खाली जगह नहीं होती.

ऐसे करें सिंचाई

बोआई के समय खेत में नमी की मात्रा देख कर पहली सिंचाई बोने के तुरंत बाद करें. अगर खेत में नमी की दशा में बोआई की गई हो तो पहली सिंचाई 2-3 दिन पर भी कर सकते हैं. मिट्टी के मुताबिक गरमियों में सिंचाई करना जरूरी होता है. बरसात में 20 दिन तक बारिश न होने की दशा में सिंचाई जरूर करें.

किसानों को ट्रैंच विधि से सिंचाई करने में प्रति सिंचाई 60 फीसदी तक पानी की बचत होती है. इस की वजह यह है कि पूरे खेत में पानी नहीं भरना होता, बल्कि सिर्फ नालियों में ही सिंचाई करनी होती है. इस से किसानों को पूरे सीजन में तकरीबन 20 घंटे सिंचाई की बचत होती है.

खरपतवार पर नियंत्रण

नाली में गुड़ाई कर के खरपतवार नियंत्रण करना कठिन होता है, इसलिए मेट्रीब्यूजीन 725 ग्राम प्रति हेक्टेयर और 24डी सोडियम 1.25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर को 1000 लिटर पानी में जरूरत पड़ने पर 30 दिन के अंतराल पर 2 छिड़काव करने चाहिए.

अगर खेती छोटे रकबे में की जा रही हो तब किसान खरपतवार को परंपरागत तरीके से निकाल सकते हैं.

मिट्टी चढ़ाना

जून के आखिरी हफ्ते में बैलचालित ट्रैंच ओपनर से जड़ों पर मिट्टी चढ़ानी चाहिए. इस से नाली की जगह पर मेंड़ और मेंड़ की जगह पर नाली बन जाती है जो पानी निकालने का काम करती है.

गन्ना (sugarcane)

ट्रैंच विधि से फायदा

खेतीकिसानी के माहिर इस विधि को किसानों के लिए काफी अच्छा बता रहे हैं, क्योंकि इस विधि से खेती करने में पानी की 60 फीसदी तक बचत होती है. इस से किसानों की लागत कम हो जाती है. साथ ही, गन्ने की फसल के साथ दूसरी फसल भी बोई जा सकती है, ऐसा करने से किसानों की लागत पहले ही निकल आएगी.

* इस विधि से फसल का जमाव 80-90 फीसदी तक होता है, जबकि सामान्य विधि में 35-40 फीसदी तक ही होता है.

* प्रति सिंचाई 60 फीसदी पानी की बचत होती है.

* उर्वरकों की बरबादी नहीं होती है.

* गन्ना अपेक्षाकृत कम गिरता है.

* मिल योग्य गन्ने एकजैसे मोटे व लंबे होते हैं. इस वजह से परंपरागत विधि की तुलना में 35-40 फीसदी तक ज्यादा उपज व 0.5 इकाई ज्यादा चीनी हासिल होती है.

* सामान्य विधि की तुलना में इस विधि से पेड़ी गन्ने की पैदावार 20-25 फीसदी ज्यादा होती है.

* मिट्टी में लगने वाले कीड़े, ह्वाइट ग्रब और दीमक का हमला होता है.

* इस विधि से खराब गन्ने के कुप्रभाव को कम किया जा सकता है, क्योंकि पेड़ी के बाद जहां गन्ना नहीं होता, वहां पर गन्ने के कुप्रभाव को कम किया जा सकता है, क्योंकि पेड़ी के बाद गन्ने की बोआई फिर से की जा सकती है.

* उत्तर भारत में उपज की कूवत व वास्तविक उपज में 35-40 फीसदी तक का फर्क होता है, जिसे इस विधि को अपना कर आसानी से उपज की कूवत को पूरा किया जा सकता है.

* क्षेत्रफल को बढ़ाए बिना ही गन्ने का उत्पादन बढ़ाने में यह विधि किसानों के लिए ज्यादा फायदेमंद है.