Spring Sugarcane : बसंत वाले गन्ने की वैज्ञानिक खेती

Spring Sugarcane: गन्ना एक नकदी फसल है, जिसे किसान अपनी खास फसल की तरह उगाते हैं. इस की बोआई शरदकाल (सितंबरअक्तूबर) और बसंतकाल (फरवरीमार्च) दोनों ही समयों में की जाती है. आज के समय में खेती एक व्यापार है. खेती से हर किसान एक तय समय में ही अधिक से अधिक फायदा कमाना चाहता है.

उत्तर प्रदेश में गन्ने की कम पैदावार के खास कारण हैं गन्ने की खड़ी फसल को महत्त्व न देना, कम पैदावार वाली किस्मों का इस्तेमाल करना, सही मात्रा में खाद का प्रयोग न होना और फसल की देखभाल सही तरह से न करना.

बसंत के मौसम में गन्ने की बोआई (Spring Sugarcane) के लिए सब से सही समय फरवरी के महीने का है, लेकिन भारत में 15-20 फीसदी किसान ही फरवरी में बोआई कर पाते हैं, क्योंकि ज्यादातर किसानों के खेतों का आकार छोटा होने के कारण रबी की फसलें खेत में लगी रहती हैं. ये फसलें मार्चअप्रैल में कटती हैं. रबी की फसलों की बोआई के समय जल्दी पकने वाली किस्मों को न लगाना, समय से बोआई न कर पाना भी गन्ने की पैदावार पर असर डालता है.

बसंत के समय का महत्त्व

* फसल और सहफसल मिलीजुली खेती प्रणाली में किसानों की कई तरह की जरूरतों को पूरा करती हैं, जैसे खाने के लिए दाल व पशुओं के लिए चारा.

* सहफसल के बीच के समय में होने वाली आमदनी से गन्ने की अच्छी देखभाल की जा सकती है.

* पूरे साल किसान के परिवार के सदस्यों खासतौर से स्त्रियों व बच्चों को काम मिलता रहता है.

* खरपतवारनाशी के प्रयोग से बचा जा सकता है, जिस से खर्च की बचत होती है.

* फसल के कचरे से जमीन की उत्पादन शक्ति कायम रखी जा सकती है.

बीजों का इलाज

गरम हवा से : खासतौर से मशीन द्वारा 54 सेंटीग्रेड गरम हवा से 2-3 घंटे में बीज उपचार.

गरम पानी से : खास मशीन से 50 सेंटीग्रेड तक गरम किए गए पानी में बीजों को 2-3 घंटे डुबो कर रखें.

रसायन से : फफूंदीनाशक रसायन ऐरीटान 6 फीसदी की 280 ग्राम या एगलाल 3 फीसदी की 560 ग्राम या 125 ग्राम बावस्टीन का घोल बना कर उस में 10-15 मिनट बीज डुबो कर रखें.

कीटनाशक क्लोरोपाइरीफास 20 फीसदी का 5 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से घोल बना कर बीजों का इलाज करना चाहिए.

एजोटोक्टर 2-2.5 किलोग्राम, पीएसवी 2.5 किलोग्राम, माइकोराइजा 5 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से 100-150 किलोग्राम सड़ी गोबर की खाद/केंचुए की खाद में मिला कर प्रति एकड़ की दर से इस्तेमाल करना चाहिए.

खाद

गन्ने के खेत में कोई भी खाद मिट्टी की जांच के मुताबिक डालना सही रहता है. जांच न होने की हालत में 150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस, 80 किलोग्राम पोटाश, 40-60 किलोग्राम गंधक और 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए.

नाइट्रोजन की एक तिहाई, फास्फोरस, पोटाश, गंधक व जिंक सल्फेट की पूरी मात्रा बोआई से पहले कूंड़ों में डालनी चाहिए. नाइट्रोजन की बाकी दोतिहाई मात्रा का आधा भाग अंकुरण के समय और आधा भाग 1/3 बढ़वार के समय जून तक बारिश से पहले इस्तेमाल करना चाहिए. हरी खाद इस्तेमाल करने से लगभग 25-30 किलोग्राम नाइट्रोजन की आपूर्ति हो जाती है.

बोआई

बोआई की समतल विधि में कूड़ों की गहराई 7-10 सेंटीमीटर रखते हैं.

बोआई की अंतरालित प्रतिरोपण तकनीकी (एसटीपी) : गन्ना अनुसंधान संस्थान लखनऊ द्वारा विकसित इस तकनीकी में 30 हजार 1 आंख वाले गन्ने के टुकड़ों को 50 वर्गमीटर नर्सरी क्षेत्रफल में रोपित किया जाता है.

खरपतवारों की रोकथाम : बसंत वाले गन्ने (Spring Sugarcane) में खरपतवारों द्वारा नुकसान का खतरा 60-120 दिनों तक रहता है.

फसलचक्र अपनाएं

* लोबिया, सनई व ढैंचा जैसी फसलें लगाएं.

* बोआई के 30, 60 व 90 दिनों पर गुड़ाई कर के खेत को खरपतवारों से बचाया जा सकता है.

पताई बिछाना : गन्ने की लाइनों के बीच खाली जगहों पर 7-10 सेंटीमीटर मोटी परत बिछाना खरपतवार नियंत्रण व नमी संरक्षण में काफी मददगार होता है. सूखी पत्तियों को कीटनाशक से उपचारित कर के बिछाने से दीमक आर्मी कीट खत्म हो जाते हैं.

सिंचाई

भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान लखनऊ द्वारा किए गए परीक्षणों के आधार पर बताया गया है कि सिंचाई का भरपूर इंतजाम होने पर मार्च, अप्रैल, मई व जून में खेत की सिंचाई जरूर करनी चाहिए.

इस के बाद जरूरत के हिसाब से और सिंचाई की जा सकती है. आमतौर पर जलभराव विधि, एकांतर नाली विधि, फुहारा (स्प्रिंकलर) विधि और बूंदबूंद विधि द्वारा सिंचाई करते हैं.

Sugarcane : गन्ने की फसल के कीड़ों की पहचान व बचाव के तरीके

Sugarcane:  हिंदुस्तान की सब से खास फसल गन्ने का दायरा बहुत बड़ा है. मूल रूप से गुड़चीनी से जुड़ी इस फसल के साथ झंझट भी तमाम होते हैं. किसानों और चीनीमिलों के मालिकों के बीच होने वाले बवाल से तो सभी वाकिफ रहते हैं, मगर अपने खेतों में भी गन्ना (Sugarcane) बोने वाले किसान चैन से नहीं जी पाते. तमाम तरह के कीड़े किसानों का जीना हराम कर देते हैं. यहां उन्हीं कीड़ों के बारे में तफसील से बताया जा रहा है.

गन्ना (Sugarcane) भारत की पुरानी फसलों में से एक है. हमारी कुल  घरेलू पैदावार का लगभग 2 फीसदी भाग चीनी उद्योग का है. भारत की चीनी वाली फसलों में गन्ना (Sugarcane) खास है. देश की माली हालत को मजबूत करने और करोड़ों किसानों को पैसे से मजबूत करने में गन्ने की खेती और चीनी व गुड़ उद्योगों का खास योगदान है. इस से देश के करोड़ों किसानों व मजदूरों को रोजगार मिल रहा है.

खास कीड़े

गन्ना (Sugarcane) जितनी अहम फसल है, उतनी ही ज्यादा दिक्कतें उस के साथ जुड़ी हुई हैं. गन्ने के दाम व किसानों के भुगतान का मसला हमेशा सुर्खियों में रहता हे. इस से हअ कर गन्ने (Sugarcane) में लगने वाले तमाम कीड़े भी किसानों का चैन छीन लेते हैं. यहां पेश है गन्ने में लगने वाले तमाम कीड़ों की जानकारी :

दीमक

दीमक गन्ने की फसल के बढ़ने की दो स्थितियों में हमला करती है. दीमक का पहला हमला गन्ने की बोआई के बाद होता है. गन्ने (Sugarcane) के कटे सिरों व टुकड़ों पर निकली आंखों पर दीमक हमला कर के नुकसान पहुंचाती है. इस की वजह से अंकुरण कम होता है, जड़ों को बहुत नुकसान होता है और पौधों की संख्या में कमी आने से पौधों की पत्तियां पीली पड़ कर सूख जाती हैं. ये कीट जमीन के पास वाले गन्ने (Sugarcane) के नीचे पोरियों का पिथ खा जाते हैं व पिथ के स्थान पर मिट्टी भर जाने के कारण फसल की पैदावार में भारी कमी आती है. दीमक का दूसरा हमला बरसात के बाद सितंबरअक्तूबर के महीनों में होता है.

रोकथाम

* 1 किलोग्राम बिवेरिया और 1 किलोग्राम मेटारिजयम को करीब 25 किलोग्राम गोबर की सड़ी हुई खाद में अच्छी तरह मिला कर छाया में 10 दिनों के लिए छोड़ दें. दीमक लगे खेत में उस के बाद प्रति एकड़ बोआई से पहले इस को छिड़कें.

* सिंचाई के समय इंजन से निकले हुए तेल की 2-3 लीटर मात्रा का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें.

* दीमक का ज्यादा असर होने पर क्लोरोपाइरीफास 20 ईसी की 3-4 लीटर मात्रा को बालू में मिला कर प्रति हेक्टेयर इस्तेमाल करें.

* गन्ने की कांची को बोआई से पहले इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यूएस 0.1 फीसदी से उपचारित कर लेना चाहिए.

सफेद गिडार

इस कीड़े की सूंड़ी जमीन के अंदर रहती है और गन्ने (Sugarcane) के जिंदा पौधों की जड़ों को खाती है. सूंड़ी द्वारा जड़ को काट देने से पूरा पौधा पीला पड़ कर सूखने लगता है. ऐसे सूंड़ी लगे पौधे उखाड़ने पर आसानी से मिट्टी के बाहर आ जाते हैं. मादा कीट संभोग के 3-4 दिनों बाद गीली मिट्टी में 10 सेंटीमीटर गहराई में अंडे देना शुरू करती है. 1 मादा करीब 10-20 अंडे देती है. अंडों से 7 से 13 दिनों के बाद छोटी सूंडि़यां निकलती हैं. इस कीट की दूसरी व तीसरी स्थिति की सूंडि़यां पौधों की बड़ी जड़ों को काटती हैं. ये जुलाई से अक्तूबर तक पौधों की जड़ों को खाती हैं.

रोकथाम

* गिडार के असर वाले पौधों पर इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल या कार्बारिल 50 डब्ल्यूपी की 0.2 फीसदी या क्विनालफास 25 ईसी की 0.05 फीसदी मात्रा का छिड़काव करें.

* मई के आखिर में जैसे ही पहली बरसात हो जाए और कीड़े निकलना शुरू हो जाएं, तो प्रकाश प्रपंच लगा देना चाहिए.

* सुबहसुबह खेत की गहरी जुताई कर के छोड़ दें ताकि पक्षी कीड़ों को खा सकें.

* खेत की जुताई ऐसे यंत्रों से न करें, जिन में जुताई के साथसाथ पाटा लगता हो या पाटा लगाने वाले यंत्र में 4-5 इंच की कीलें लगी होनी चाहिए ताकि कीलें सूंडि़यों को काट सकें.

* जीवाणु बेसिलस पोपिली द्वारा कीटों को खत्म किया जा सकता है. गन्ने की बोआई से पहले ब्युवेरिया ब्रोंगनियार्टी की 1.0 किलोग्राम मात्रा और मेटारायजियम एनासोप्ली की भी 1.0 किलोग्राम मात्रा को करीब 50 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद में अच्छी तरह मिला कर छाया में 10 दिनों के लिए छोड़ दें फिर उसे कीड़े लगे खेत में प्रति एकड़ बोआई से पहले इस्तेमाल करें.

* सूत्रकृमि के पाउडर से बनाए गए घोल को 2.5-5×109 आईजे प्रति हेक्टेयर की दर से गन्ने (Sugarcane) की सिंचाई के साथ कीड़ों के प्रकोप से पहले खेत में छिड़काव करने से इस कीड़े पर काबू पाया जा सकता है.

* कीटनाशी रसायन क्लोरोपायरीफास 10 ईसी, क्विनालफास 25 ईसी व इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल द्वारा गन्ने (Sugarcane) के बीजों का उपचार कर के कीड़ों पर काबू पाया जा सकता है.

* गन्ना (Sugarcane) बोने से पहले दानेदार कीटनाशी रसायन फोरेट 10 जी की 25 किलोग्राम मात्रा से प्रति हेक्टेयर की दर से जमीन का उपचार कर के कीड़ों पर काबू पाया जा सकता है.

जड़ बेधक

इस कीट की मादा रात में पत्तियों के निचले भाग पर और तनों पर हलके पीले रंग के चपटे अंडे देती है. अंडे झुंड में अलगअलग होते हैं. करीब 4-5 दिनों में अंडे फूटते हैं. सूंड़ी पौधे के जमीन के अंदर वाले हिस्से पर हमला कर के घुसती है. जब पौधे छोटे होते हैं यह उसी समय नुकसान पहुंचाती है. इस से पौधा सूख जाता है. अगर पौधे को खींचा जाए तो नीचे से पूरा पौधा टूट जाता है. यही इस की पहचान है.

अगोला चोटीबेधक

इस कीट का पतंगा सफेद रंग का होता है. इस के पतंगे रात में हमला करते हैं और दिन में छिपे रहते हैं. मादा पतंगा नीचे की तरफ अंडे देती है. अंडे पीले या बादामी बालों से ढके रहते हैं. एक मादा पूरे जीवन में करीब 500 अंडे देती है. अंडा फूटने के बाद सूंड़ी पहले पत्ती में मोटे सिरे पर छेद कर के उसे खाती है, जिस से पौधे की बढ़वार रुक जाती है. फिर सूंड़ी अगोला झुंड के बीच हमला करती है. अगोला के बीच में मृत गोभ यानी डेड हर्ट बन जाता है. मृत गोभ को तोड़ा जाए तो उस से बदबू आती है.

जुलाई के महीने में तीसरी पीढ़ी द्वारा हमला होने पर पौध की बढ़वार रुक जाती है और बराबर से छोटीछोटी शाखाएं निकलती हैं, जिन्हें ‘बंची टाप’ कहते हैं. ‘बंची टाप’ तीसरीचौथी पीढ़ी में पाई जाती हैं, जिन की वजह से पौधों की बढ़वार रुक जाती है और पैदावार कम मिलती है. इस कीट का हमला मार्च से शुरू हो कर नवंबर तक रहता है. इस की तीसरी पीढ़ी सब से अधिक नुकसान पहुंचाती है.

तनाबेधक

इस प्रजाति का वयस्क कीड़ा भूरे रंग का होता है. मादा कीट पहलीदूसरी और तीसरी पत्ती की निचली सतह में रात के समय अंडे देती है. जून में बारिश इस के लिए फायदेमंद होती है. जून के आखिरी हफ्ते से मादा कीट अंडे देना शुरू कर देती है. करीब 6-7 दिनों में अंडे फूटने लगते हैं. इस कीड़े की सूंड़ी जमीन की सतह के सहारे से गन्ने (Sugarcane) के पौधे में छेद कर के तने के अंदर मुलायम तंतुओं को खाते हुए नीचे से ऊपर तक सुरंग बनाती है, जिस की वजह से बीच की कलिकाएं सूख जाती हैं और ‘डेड हर्ट’ बन जाता है, जो कि खींचने से आसानी से निकल आता है.

फसल पर इस कीट की मौजूदगी पौधों के छेदों और ‘डेड हर्ट’ की बदबू से मालूम पड़ जाती है. इस का ज्यादा प्रकोप होने पर काफी ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता है.

प्ररोहबेधक

यह कीड़ा मार्च से नवंबर तक सक्रिय रहता है. यह पतंगा रात में ज्यादा सक्रिय रहता है. इस की मादा सफेद अंडे गुच्छों में देती है. 6-9 दिनों में अंडे फूटते हैं. 3-4 हफ्ते में सूंड़ी पूरी तरह विकसित हो कर तने के अंदर प्यूपा बनाती है. साल में इस की 4-5 पीढि़यां पाई जाती हैं. इस की सूंड़ी पौधे के निचले भाग पर तने में छेद करती है. इस के हमले से पत्तियों को नुकसान पहुंचता है, जिस से पूरा पौधा सूख जाता है.

पोरीबेधक

इस की मादा रात में अंडे देती है और लगातार 7-8 दिनों तक अंडे देती रहती है. यह पत्तियों के जोड़ व गहरी शिराओं में अंडे देती है. 6-7 दिनों में अंडे फूटते हैं. इस का प्यूपा अधिकतर आधी सूखी पत्तियों पर रेशम के धागों द्वारा बनाए गए कोकून में पाया जाता है. यह कीड़ा अगस्त के पहले हफ्ते में दिखाई देता है. इस से सब से ज्यादा नुकसान सितंबर के आखिर में होता है. जिस पौधे पर हमला होता है, उस की पत्तियां पीली पड़ जाती हैं. सूंड़ी के घुसने की जगह के ऊपर कीटमल भी पाया जाता है. सूंड़ी छाल को काट कर एक पोरी से दूसरी पोरी में घुस जाती है. सूंड़ी के शिकार हुए पौधों की पत्तियां व आधे भाग की कोमल पोरियां पीली पड़ कर सूख जाती हैं.

गुरदासपुरबेधक

यह गन्ने (Sugarcane) को बहुत नुकसान पहुंचाने वाला कीड़ा है. यह सब से ज्यादा नुकसान जुलाईअगस्त में पहुंचाता है. मादा कीट शाम को गन्ने की पत्तियों की निचली सतह पर झुंडों में अंडे देती है शुरू में अंडे का रंग पीला या सफेद होता है, जो बाद में भूरे रंग का हो जाता है. अंडे से निकली सूंडि़यां दूसरी या तीसरी पोरी में झुंड में ऊपर से नीचे की ओर घुसती हैं. करीब 1 हफ्ते बाद ये सूंडि़यां अंदर के मुलायम भाग को खाते हुए लगातार बढ़ती रहती हैं. शुरू में गन्ने (Sugarcane) की निचली पत्तियां ही सूखती हैं और कुछ दिनों बाद पूरी मध्य कलिका ही सूख कर ‘डेड हर्ट’ बनाती है, जो जरा सा खींचने से निकल जाता है. जिस पौधे पर अगोलाबेधक कीट का हमला होता है, उस पौधे पर इस कीट का हमला भी होता है. लेकिन जिन पौधों पर इस का पहले हमला हो चुका हो, उन पर अगोलाबेधक कीट का हमला नहीं होता है.

बेधक कीटों की रोकथाम

* गरमी के दिनों में 2-3 बार गहरी जुताई करनी चाहिए.

* ट्राइकोकार्ड (ट्राइकोकार्ड कीलोनिस/जेपोनिकम) अंड परजीवी के 75000-1,00,000 प्यूपे प्रति हेक्टेयर की दर से 10 दिनों के अंतराल में छोड़ने चाहिए.

* कोटेशिया फलेवीपस (गिडार पारजीवी) के वयस्क को 2000 प्यूपा प्रति हेक्टेयर की दर से 30 दिनों के अंतराल पर छोड़ना चाहिए.

* जरूरत पड़ने पर क्लोरोपाइरीफास 20 ईसी की 4-5 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई के 30-40 दिनों बाद सिंचाई से पहले इस्तेमाल करें.

* शूट बोरर के लिए ग्रन्यूलोसीस वाइरस का छिड़काव करना चाहिए.

* गन्ने (Sugarcane) में बोरर कीटों के लिए कोराजन का 0.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए.

* बीटी 1.0 किलोग्राम मात्रा को 900-1000 लीटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से 15 दिनों के अंतर पर 3 बार छिड़काव करें.

* प्रकाश प्रपंच व फिरोमोन ट्रैप (5-6 फिरोमोन ट्रैप प्रति हेक्टेयर की दर से) का इंतजाम करें.

* नीम उत्पादित कीट रोग विष जैसे एनकेई या नीम कोल्ड की 5 फीसदी मात्रा का इस्तेमाल करें.

* अधिक असर होने पर फिपरोनिल 5 एससी (रिजंट) या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल की 1 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर, क्विनालफास 25 ईसी की 2 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर, इंडोसल्फान 35 ईसी की 2 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर, सायपरमेथ्रिन 10 ईसी की 1 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर पानी की दर से 20 दिनों के अंतर पर 2-4 बार छिड़कें.

पाइरिला या फड़का

वयस्क कीड़ा भूरे रंग के पंख और नुकीली चोंच वाली गन्ने (Sugarcane) की सूखी पत्तियों जैसा होता है. इस की मादा गरमियों में पत्तियों की निचली सतह और सर्दियों में पत्तियों के अन्य हिस्सों पर अंडे देती है. अंडे गुच्छों में सफेद, रोएंदार बालों से ढके रहते हैं. 8-10 दिनों में इस से अर्भक (निम्फ) निकलते हैं. शुरू में इन का रंग मटमैला सफेद होता है. अर्भक काल 4-6 हफ्ते का होता है. पाइरिला को किसान फड़के के नाम से भी जानते हैं. ऐसा देखा गया है कि इस कीट का प्रकोप 1 साल छोड़ कर तीसरे साल अधिक होता है. मादा कीट के शिशु व प्रौढ़ दोनों ही पत्तियों का रस चूसते हैं, जिस से पत्तियां पीली व कमजोर पड़ जाती हैं. इस कीट द्वारा पत्तियों पर एक तरह का चिपचिपा पदार्थ छोड़ा जाता है, जिस पर काले रंग की फफूंद उग जाती है. इस फफूंद से पत्तियों की प्रकाश संश्लेषण की क्रिया प्रभावित होती है, जिस से गन्ने (Sugarcane) की बढ़वार रुक जाती है और पैदावार में कमी आती है. पाइरिला का हमला अप्रैल महीने से शुरू होता है और जुलाई से नवंबर तक अधिक होता है. वातावरण में नमी बदलने पर इस का असर बढ़ जाता है.

रोकथाम

* पत्तियों को निम्फ निकलने से पहले अंडों सहित तोड़ कर नष्ट कर देना चाहिए और कम हमले वाली फसल से परजीवी वाली पत्तियां तोड़ कर अधिक पायरिला प्रभावित खेतों में लगाएं.

* प्रकाश ट्रैप अपनाएं. रात में खेत में बिजली के बल्ब, पैट्रोमैक्स या लालटेन जलाएं और उन के नीचे मिट्टी का तेल या इंडोसल्फान दवा पानी में घोल कर किसी परात या टब में रख दें.

* कीटनाशक दवाओं का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल न करें. इपीरिकेनिया, टैट्टासिटकस, लेडीबर्ड बीटल, चींटी व मकड़ी और पाइरिला के अंडों के कुदरती दुश्मनों की हिफाजत करनी चाहिए.

* इपीरिकेनिया मेलैलरेन्यूका परजीवी को ज्यादा परजीवी वाले खेतों से निकाल कर कम परजीवी वाले खेतों में लगाना चाहिए. इस के 100-120 अंडे समूह या 200-250 ककून को प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छोड़ना चाहिए. वातावरण में नमी वाली स्थिति में ही इस को खेत में छोड़ना चाहिए.

* बरसात के बाद निम्फ परजीवी इपीरिकेनिया मेलैलरेन्यूका और टैटास्टिकस पायरिली सक्रिय रहता है. इसलिए इस समय कीटनाशी का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

* मेटाराइजियम एनाआइसोप्ली की 10×2 बीजाणु प्रति मिलीलीटर की 1 किलोग्राम मात्रा का प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करना चाहिए.

सफेद मक्खी

इस का वयस्क कीड़ा बहुत छोटा यानी करीब 2.5 मिलीमीटर लंबा और 1 मिलीमीटर मोटा पीले रंग का होता है. इस की वयस्क व शिशु (बच्चा) दोनों अवस्थाएं नुकसान पहुंचाती हैं. मादा कीट गन्ने की पत्तियों की निचली सतह पर बीच की शिरा के पास सीधी लाइनों में अंडे देती है. हर अंडा .03 मिलीमीटर लंबा और पीले रंग का होता है. गरमियों में लगभग 7 दिनों और जाड़ों में लगभग 13-14 दिनों में अंडे फूटते हैं और बच्चे निकलते हैं.

आमतौर पर अधिकतर इस का हमला जुलाई से ले कर नवंबर तक होता है. बच्चे व वयस्क दोनों ही गन्ने (Sugarcane)  की पत्तियों का रस चूसते हैं, जिस से पत्तियों पर घाव बन जाते हैं और उन पर कवक का हमला हो जाता है. इस  हमले से गन्ने (Sugarcane) में श्वेत मक्खी सूक्रोज की मात्रा कम हो जाती है और चीनी की मात्रा में 30 फीसदी की कमी हो जाती है. इस का हमला होने पर करीब 50 फीसदी फसल खत्म हो जाती है.

रोकथाम

* इस कीट का हमला होने पर पेड़ी की फसल नहीं लेनी चाहिए.

* नाइट्रोजन की संतुलित मात्रा का प्रयोग करना चाहिए.

* कुदरती दुश्मन परजीवी अजोटस डेहेनसिस, अमिटस अलुरोबी, इक्सटीमेकोरस डेहेनसिस व इंकरसिया प्रजातियों का इस्तेमाल करना चाहिए.

* अगस्त व सितंबर के महीनों में पत्तियों की जांच कर के कीड़े लगी पत्तियों को इकट्ठा कर के नष्ट कर दें.

* इस कीट का अधिक हमला होने पर कीटनाशी रसायन क्लोरोपायरीफास 20 फीसदी ईसी 1.5 लीटर, इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल, मोनोक्रोटोफास 36 ईसी शील चूर्ण 1.5 लीटर मात्रा को 1000 से 1200 लीटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

Farming Tips : फरवरी महीने में करें खेती के ये काम

रबी की सबसे प्रमुख फसल गेहूं है, जो देश में बड़े पैमाने पर की जाती है और समय से बोई गई गेहूं की फसल में अच्छा फुटाव का समय है  Farming Tips .

सिंचाई का रखें ध्यान

गेहूं फसल में सिंचाई करते समय इस बात का ध्यान रखें कि ज्यादा तेज हवाएं न चल रही हों, अगर हवा चल रही हों तो उन के थमने का इंतजार करें और मौसम ठीक होने पर ही खेत की सिंचाई करें.

गन्ना बोआई की करें तैयारी

फरवरी के दूसरे पखवारे के बाद गन्ने की बोआई का सिलसिला शुरू किया जा सकता है. बोआई के लिए गन्ने की ज्यादा पैदावार देने वाली किस्मों का चुनाव करना चाहिए. किस्मों के चयन में अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों से मदद ली जा सकती है.

गन्ना बोआई से पहले करें ये काम

गन्ने का जो बीज इस्तेमाल करें, वह बीमारी से रहित और उन्नत किस्म का होना चाहिए. बोआई से पहले बीजों को उपचारित कर लेना चाहिए. बोआई के लिए 3 पोरी व 3 आंख वाले गन्ने के स्वस्थ टुकड़े बेहतर होते हैं.

दलहनी फसलों में करें कीट रोग प्रबंधन

एन दिनों मटर की फसल पूरे शबाब पर होती है. उस की देखभाल भी जरूरी है. मटर की फसल में चूर्णिल आसिता रोग के कारण पत्तियों और फलियों पर सफेद चूर्ण सा फैल जाता है. रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखाई देते ही उस का उचित निदान करें और कृषि माहिरों की राय ले कर दवा का छिड़काव करें.

लोबिया, राजमा जैसी फसलों की बोआई के लिए यह उचित समय है, इसलिए जो किसान इन की खेती करना चाहते हैं तो वे इस काम को समय से निबटा लें. Farming Tips

सब्जी की खेती के लिए करें ये काम

भिंडी की खेती साल में 2 बार की जा सकती है. इस समय ग्रीष्मकालीन भिंडी की खेती के लिए बोआई का सही समय है. इस के अलावा इस महीने बैगन की रोपाई भी की जाती है. बैगन के पौधों की रोपाई करने के बाद पौधों की हलकी सिंचाई करें.

मैंथा और मिर्च की करें बोआई

फरवरी महीने में ही मैंथा और मिर्च की खेती के लिए भी उचित समय है. मिर्च की खेती के लिए इस समय पौध रोपाई की जा सकती है.

मिर्च की उन्नत किस्म काशी अनमोल, काशी विश्वनाथ, जवाहर मिर्च-283, जवाहर मिर्च-218, अर्का सुफल और संकर किस्म काशी अर्ली, काशी सुर्ख या काशी हरिता शामिल हैं, जो ज्यादा उपज देती हैं.

भिंडी की उन्नत किस्मों के लिए पूसा ए-4, परभनी क्रांति, पंजाब-7, अर्का अभय, अर्का अनामिका, वर्षा उपहार, हिसार उन्नत, काशी प्रगति आदि का चुनाव करें.

टमाटर की खेती की करें तैयारी

टमाटर की खेती भी वर्ष में 2 बार की जाती है. शीत ऋतु के लिए इस की बोआई जनवरी से फरवरी माह तक की जाती है.

अच्छी उपज के लिए
टमाटर की उन्नत किस्मों में देशी किस्म-पूसा रूबी, पूसा-120, पूसा शीतल, पूसा गौरव, अर्का सौरभ, अर्का विकास, सोनाली और संकर किस्मों में पूसा हाइब्रिड-1, पूसा हाइब्रिड -2, पूसा हाइब्रिड -4, अविनाश-2, रश्मि और निजी क्षेत्र से शक्तिमान, रैड गोल्ड, 501, 2535 उत्सव, अविनाश, चमत्कार, यूएस 440 आदि का चुनाव करें.

तिलहनी फसल सूरजमुखी

सूरजमुखी की फसल 15 फरवरी तक लगाई जा सकती है. इस की फसल की बोआई करते समय इस के बीजों की पक्षियों से रक्षा करना बेहद जरूरी है. इस की संकर किस्में बीएसएस-1,केबीएसए 1, ज्वालामुखी, एमएसएफएच-19, सूर्या आदि शामिल हैं. इस की बोआई करने से पूर्व खेत में भरपूर नमी न होने पर पलेवा लगा कर जुताई करनी चाहिए. 2-3 बार जुताई कर के खेत को भुरभुरा बना लेना चाहिए या रोटावेटर का इस्तेमाल करना चाहिए.

बागबान दें ध्यान

जिन लोगों ने आम का बाग लगा रखा है, वे अपने आम के बागबगीचे का ध्यान रखें. इन दिनों आम में चूर्णिल आसिता रोग लगने का काफी अंदेशा रहता है, इसलिए विशेषज्ञ से सलाह ले कर इस का निदान करें.

अनेक बीमारियों के साथसाथ इन दिनों आम के पेड़ों को कुछ कीटों का भी खतरा रहता है. अगर ऐसा हो, तो अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र के बागबानी वैज्ञानिक की राय ले कर कीटों व बीमारी का निबटारा करें.

केले के फसल का रहे खयाल

इन दिनों सदाबहार फल केले के बागों का खयाल रखना भी जरूरी है. बाग में फैली तमाम सूखी पत्तियां बटोर कर खाद के गढ्डे में डाल दें.

केले की उम्दा फसल हासिल करने के लिए बाग की निराईगुड़ाई करने के बाद पर्याप्त मात्रा में नाइट्रोजन व पोटाश वाली खादें डालें. केले के पेड़ों पर अगर किसी बीमारी या कीटों का हमला नजर आए, तो तुरंत उस का इलाज फल वैज्ञानिक की राय के मुताबिक करें.

नीबूवर्गीय पौधों की करें रोपाई

फरवरी महीने में नीबूवर्गीय पौधों की भी बोआई करने का उचित समय है. नीबू, संतरा व मौसमी वगैरह के बीजों की बोआई पौधशाला में की जा सकती है.

पशुओं की देखभाल में न करें अनदेखी

आमतौर पर फरवरी महीने में ठंड कम होने लगती है. ऐसे में पशुपालक पशुओं की सेहत को ले-कर लापरवाह हो जाते हैं और अपने मवेशियों को सर्दी से बचाने के उपाय बंद कर देते हैं, जिस से पशुओं के बीमार होने की भी खतरा होता है, इसलिए मौसम के प्रति सजग रहें. Farming Tips

जाती हुई सर्दी इनसानों के साथसाथ जानवरों को भी बीमार करने वाली होती है, इसलिए सर्दी से बचाव के उपाय एकदम से बंद न करें. Farming Tips

Farming Work : मार्च महीने में करें ये जरूरी काम

Farming Work: गन्ने की बोआई का काम मार्च महीने में पूरा कर लें. गन्ने की देर से बोआई करने पर पैदावार में गिरावट आती है. बोआई के लिए 3 आंख वाले गन्ने के टुकड़ों का इस्तेमाल करें.

बीज सेहतमंद गन्ना फसल से ही लें और बीज के टुकड़ों को उपचारित कर के 60-70 सैंटीमीटर की दूरी पर कूंड़ों में बोआई करें. बोआई का काम शुगरकेन प्लांटर मशीन से करें तो ज्यादा बेहतर रहेगा.

गन्ने के साथ दूसरी फसलें जैसे मूंग, उड़द, लोबिया, चारे वाली मक्का वगैरह को 2 कूंड़ों के बीच वाली खाली जगह में बोआई करें. बोआई के लिए अपने इलाके की आबोहवा के मुताबिक ही किस्में चुनें.

जायद फसल मूंग की बोआई का काम भी इसी महीने पूरा करें. बोआई के लिए अच्छी उपज वाली किस्में जैसे पूसा बैसाखी, के-851, एसएसएल-668 वगैरह की बोआई करें. अगर खेत में नमी की कमी है तो बोआई से पहले खेत का पलेवा कर दें.

जायद फसल उड़द की बोआई का काम इस महीने में जरूर पूरा कर लें. बोआई के लिए अच्छी किस्में ही चुनें. अच्छी पैदावार हासिल करने के लिए प्रति हेक्टेयर 20 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस, 20 किलोग्राम पोटाश का इस्तेमाल करें.

बेहतर होगा, अगर पोषक तत्त्वों की मात्रा तय करने से पहले मिट्टी की जांच करा लें. फसल को बीमारी से बचाने के लिए बीजोपचार के बाद ही उन्हें बोएं.

चारे के लिए लोबिया की बोआई इस महीने कर सकते हैं. बोआई से पहले बीज को राइजोबियम कल्चर से उपचारित कर लें. खाद की मात्रा खेत के उपजाऊपन के आधार पर ही तय करनी चाहिए.

अगर मिट्टी जांच की सुविधा मौजूद नहीं है तो खेत की तैयारी के समय 20-30 क्विंटल सड़ी हुई गोबर की खाद मिट्टी में मिला दें. साथ ही, 30-40 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस व पोटाश प्रति हेक्टेयर दें.

अभी तक अगर  सूरजमुखी की फसल नहीं बोई है तो बोआई का काम 15 मार्च तक जरूर पूरा कर लें.

सूरजमुखी में निराईगुड़ाई भी इसी माह करें. आल्टरनेरिया ब्लाइट, डाउनी मिल्डयू और सफेद रतुआ के उपचार के लिए 600 से 800 ग्राम डाइथेन या इंडोफिल एम 45 को 250 लिटर पानी में घोल कर प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करें.

कटुआ सूंड़ी या हरे रंग की सूंड़ी का हमला हो तो 10 किलोग्राम फैनवालरेट 0.4 प्रतिशत प्रति एकड़ के हिसाब से स्पे्र करें. सफेद रतुआ या मृदुरोमिल रोग से ग्रसित टहनियों को काट कर जला दें.

इसी महीने गेहूं की फसल में दाने बनने लगते हैं. इस दौरान फसल को पानी की बहुत जरूरत होती है, इसलिए जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें.

Farming Work

अगर दिन में तेज हवा चल रही है तो सिंचाई रात के समय करें. खेत में बीमारी से ग्रसित बाली या पौधा दिखाई दे तो पूरा पौधा उखाड़ कर जला दें अन्यथा सेहतमंद पौधों को भी यह बीमारी अपनी चपेट में ले लेती है.

गेहूं में अमेरिकन सूंड़ी की रोकथाम के लिए कीटनाशक दवा का स्प्रे करें. गेहूं, सरसों व जौ में चेंपा या माहू कीट का हमला होने पर 400 मिलीलिटर मैटासिस्टाक्स या रोगर 30 ईसी को 300 लिटर पानी में मिला कर प्रति एकड़ छिड़कें. जिन स्थानों पर पत्तों में कांगियारी देखें, उन पौधों को काट कर जला दें.

चारे के लिए ज्वार, बाजरा, मक्का, सूडान घास वगैरह की बोआई इसी महीने करें. इसी महीने मेंथा की फसल में निराईगुड़ाई करें.

अगर अभी तक मेंथा की बोआई नहीं की गई है तो फौरन मेंथा की बोआई का काम पूरा करें.

बोआई के लिए उन्नतशील किस्में जैसे हिमालय, कुशल कोसी वगैरह को चुनें. ध्यान रहे कि बोआई के लिए इस्तेमाल होने वाली जड़ें सेहतमंद हों या सेहतमंद फसल से ली गई हों.

चने की फसल को पानी की जरूरत महसूस हो रही है तो हलकी सिंचाई करें. कीट व बीमारी से फसल को बचाने के लिए कारगर कीटनाशी दवा छिड़कें.

प्याज की फसल की निराईगुड़ाई भी इसी माह करें और जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें. हलदी व अदरक की बोआई भी इसी महीने पूरी कर लें. बैगन की रोपाई भी इसी महीने करें. पहले से रोपी गई फसल में निराईगुड़ाई करें व जरूरत के मुताबिक सिंचाई करते रहें.

अगर मटर के दाने वाली फसल तैयार हो गई है तो कटाई करें और हरी फलियों वाले खेत भी खाली हो गए हैं तो अगली फसल के लिए खेत तैयार करें.

आम के बागों को हौपर कीट की रोकथाम के लिए कारगर कीटनाशी दवा का स्प्रे करें, वहीं नीबू के पेड़ों को कैंकर बीमारी से बचाने के लिए कीटनाशी दवा का छिड़काव करें. पपीते की पौध तैयार करें. साथ ही, केले के बागों की सिंचाई करें. बीमारीग्रस्त पौधों को उखाड़ कर जला दें.

अंगूर की फसल की देखभाल अच्छी तरह करें. अंगूर के गुच्छों के फूल खिलते वक्त जिब्रेलिक एसिड के 50 पीपीएम वाले घोल में डुबाएं. तुलसी, गुलदाऊदी, सदाबहार वगैरह की बोआई भी इसी माह करें.

फरवरी महीने में खेती के खास काम (Farming Tasks)

फरवरी का महीना खेतीबारी के लिए बहुत अहम है, क्योंकि यह मौसम फसल और पशुओं के लिए नाजुक होता है, इसलिए किसानों को कुछ एहतियात बरतने चाहिए:

* समय पर बोई गेहूं की फसल में इन दिनों फूल आने लगते हैं. इस दौरान फसल को सिंचाई की बहुत जरूरत होती है. झुलसा, गेरुई, करनाल बंट जैसी बीमारी का हमला फसल पर दिखाई दे, तो मैंकोजेब दवा के 2 फीसदी घोल का छिड़काव करें.

* गन्ने की बोआई 15 फरवरी के बाद कर सकते हैं. बोआई के लिए अपने इलाके की आबोहवा के मुताबिक गन्ने की किस्मों का चुनाव करें. बोआई में 3 आंख वाले सेहतमंद बीजों का इस्तेमाल करें. बोआई 75 सैंटीमीटर की दूरी पर कूंड़ों में करें. बीज को फफूंदनाशक दवा से उपचारित कर के ही बोएं.

* सूरजमुखी की बोआई 15 फरवरी के बाद कर सकते हैं. उन्नत बीजों की बोआई लाइन में 4-5 सैंटीमीटर की गहराई पर करें. बीज को कार्बंडाजिम से उपचारित कर के बोएं.

* मैंथा की बोआई करें. बोआई के लिए उन्नतशील किस्में जैसे हाईब्रिड एमएसएस का चुनाव करें. 1 हेक्टेयर खेत के लिए 400-500 किलोग्राम मैंथा जड़ों की जरूरत पड़ती है. बोआई के दौरान 30 किलोग्राम नाइट्रोजन, 75 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें.

* आलू की फसल पर पछेता झुलसा बीमारी दिखाई दे, तो इंडोफिल दवा के 0.2 फीसदी वाले घोल का अच्छी तरह छिड़काव करें. फसल को कोहरे और पाले से बचाने का भी इंतजाम  करें.

* चना, मटर और मसूर की फसल में फलीछेदक कीट की रोकथाम के लिए कीटनाशी का इस्तेमाल करें. चने की फसल की सिंचाई करें. मटर की चूर्ण फफूंदी बीमारी की रोकथाम के लिए कैराथेन दवा का इस्तेमाल करें.

* टमाटर की गरमियों की फसल की रोपाई करें. रोपाई 60×45 सैंटीमीटर की दूरी पर करें. रोपाई से पहले खेत को अच्छी तरह तैयार कर लें.

* प्याज की रोपाई अभी तक नहीं की गई है, तो फौरन रोपाई करें. पिछले महीने रोपी गई फसल की निराईगुड़ाई करें. जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें.

* इस महीने धूप में चटकपन आ जाता है. धूप देख कर किसान पशुओं की देखरेख में लापरवाही बरतने लगते हैं. ऐसा न करें, पशुओं का ठंड से पूरा बचाव करें. जरा सी लापरवाही नुकसानदायक हो सकती है.

* अपने ऐसे पशु, जो जल्द ही ब्याने वाले हों, को दूसरे पशुओं से अलग कर दें और उन पर लगातार निगरानी रखें. गाभिन पशु का कमरा आदामदायक और कीटाणुरहित हो. इस में तूड़ी का सूखा डाल कर रखें.

* अगर बरसीम सही मात्रा में उपलब्ध हो, तो दाना मिश्रण में 5-7 फीसदी खल को कम कर के अनाज की मात्रा बढ़ा दें.

फरवरी में इन बातों पर दें ध्यान

कभी नरम धूप में खिला तो कभी धुंध की चादर में सिकुड़ा फरवरी का महीना खेतीकिसानी के लिए बहुत अहम है, क्योंकि यह मौसम फसल और पशुओं के लिए नाजुक होता है, इसलिए किसान बरतें कुछ  एहतियात:

* समय पर बोई गेहूं की फसल में इन दिनों फूल आने लगते हैं. इस दौरान फसल को सिंचाई की बहुत जरूरत होती है. झुलसा, गेरूई, करनाल बंट जैसी बीमारी का हमला फसल पर दिखाई दे तो मैंकोजेब दवा के 2 फीसदी घोल का छिड़काव करें.

* गन्ने की बोआई 15 फरवरी के बाद कर सकते हैं. बोआई के लिए अपने इलाके की आबोहवा के मुताबिक गन्ने की किस्मों का चुनाव करें. बोआई में 3 आंख वाले सेहतमंद बीजों का इस्तेमाल करें. बोआई 75 सेंटीमीटर की दूरी पर कूंड़ों में करें. बीज को फफूंदनाशक दवा से उपचारित कर के ही बोएं.

* सूरजमुखी की बोआई 15 फरवरी के बाद कर सकते हैं. उन्नत बीजों को बोआई लाइन में 4-5 सेंटीमीटर गहराई पर बोएं. बीज को कार्बंडाजिम से उपचारित कर के बोएं.

* मैंथा की बोआई करें. बोआई के लिए उन्नतशील किस्में जैसे हाईब्रिड एमएसएस का चुनाव करें. 1 हेक्टेयर खेत के लिए 400-500 किलो मैंथा जड़ों की जरूरत पड़ती है. बोआई के दौरान 30 किलोग्राम नाइट्रोजन,75 किलोग्राम फास्फोरस, 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें.

* आलू की फसल पर पछेता झुलसा बीमारी दिखाई दे, तो इंडोफिल दवा के 0.2 फीसदी वाले घोल का अच्छी तरह छिड़काव करें. फसल को कोहरे और पाले से बचाने का भी इंतजाम  करें.

* चना, मटर, मसूर की फसल में फलीछेदक कीट की रोकथाम के लिए कीटनाशी का इस्तेमाल करें. चने की फसल की सिंचाई करें. मटर की चूर्ण फफूंदी बीमारी की रोकथाम के लिए कैराथेन दवा का इस्तेमाल करें.

* टमाटर की गरमियों की फसल की रोपाई करें. रोपाई 60×45 सेंटीमीटर की दूरी पर करें. रोपाई से पहले खेत को अच्छी तरह तैयार कर लें.

* प्याज की रोपाई अभी तक नहीं की गई है, तो फौरन रोपाई करें. पिछले महीने रोपी गई फसल की निराईगुड़ाई करें. जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें.

* आम की चूर्णिल आसिता बीमारी की रोकथाम के लिए कैराथेन दवा का पेड़ों पर अच्छी तरह छिड़काव करें. भुनगा कीट के लिए सेविन दवा का इस्तेमाल करें.

* नर्सरी में अंगूर की सेहतमंद कलमों की रोपाई करें. अंगूर की श्यामवर्ण बीमारी की रोकथाम के लिए ब्लाइटाक्स 50 दवा का छिड़काव करें.

* इस महीने धूप में चटकपन आ जाता है. धूप देख कर किसान पशुओं की देखरेख में लापरवाही बरतने लगते हैं. ऐसा न करें, पशुओं का ठंड से पूरा बचाव करें. जरा सी लापरवाही नुकसानदायक हो सकती है.

* अपने ऐसे पशु जो कि जल्द ही ब्याने वाले हों, उन्हें दूसरे पशुओं से अलग कर दें और उन पर लगातार निगरानी रखें. गाभिन पशु का कमरा आदामदायक और कीटाणुरहित हो. इस में तूड़ी का सूखा डाल कर रखें.

अगर बरसीम सही मात्रा में उपलब्ध हो तो दाना मिश्रण में 5-7 फीसदी खल को कम कर के अनाज की मात्रा बढ़ा दें. दोहते समय थूक, झाग या दूध न लगाएं.

ट्रेंच विधि से गन्ना (Sugarcane) उत्पादन

मशहूर ट्रेंच विधि से गन्ने की बोआई करने से सामान्य विधि के मुकाबले 35-40 फीसदी ज्यादा उपज हासिल होती है. इस विधि से शरद यानी सर्दी, बसंत व देर बसंत में सफलतापूर्वक बोआई की जा सकती है.

बोआई का समय

शरदकालीन : 15 सितंबर से 15 अक्तूबर.

बसंतकालीन : 15 फरवरी से 15 मार्च.

देर बसंत : 15 मार्च से 15 अप्रैल.

बीजों का चुनाव : उत्पादन बढ़ाने में बीजों की बहुत ही खास भूमिका होती है, इसलिए बीजों का चयन बहुत ही सावधानी से करना चाहिए. सही बीजों का चुनाव नहीं होने से उत्पादन पर उलटा असर पड़ता है. लिहाजा 1 साल पहले से ही बीज फसल की समुचित देखभाल करनी चाहिए.

करीब 8-10 महीने की रोगों व कीटों से मुक्त फसल, जिसे सही मात्रा में पोषक तत्त्व दिए गए हों और गन्ना गिरा हुआ न हो, का बीजों के लिए चुनाव करें. बीजों के लिए कभी पतले गन्ने का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. जड़ वाले हिस्से का बीज में इस्तेमाल न करें. जिस खेत से बीज लेना हो उस में सिंचाई के बाद यूरिया डालनी चाहिए. 2 आंखों के टुकड़े तेज धार वाले हथियार से सावधानी से काटें. खयाल रखें कि गन्ने की आंखों को किसी तरह का नुकसान न हो.

बीज उपचार : बीजोपचार के लिए कार्बेंडाजिम की 200 ग्राम मात्रा को 100 लीटर पानी में घोल कर उस में गन्ने के टुकड़ोंको 25-30 मिनट तक डुबो कर रखना चाहिए. अकसर किसान भाई टुकड़ों को पानी में भिगोने के फौरन बाद ही निकाल लेते हैं, जो सही तरीका नहीं है, क्योंकि इतने कम समय में दवा टुकड़ों में असर नहीं कर पाती है.

बीज दर : 50-60 क्विंटल बीज प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें.

खेत की तैयारी : ट्रेंच विधि से बोआई करने के लिए पहली जुताई 20-25 सेंटीमीटर गहरी की जानी चाहिए. मिट्टी की किस्म के अनुसार 3-4 जुताई हैरो व कल्टीवेटर से कर के पाटा लगा कर मिट्टी को भुरभुरा व खेत को समतल कर लेना चाहिए.

ट्रेंच खोलना : सर्दी के मौसम में 120-150 सेंटीमीटर, बसंत में 100-120 सेंटीमीटर और देर बसंत में 90-100 सेंटीमीटर की दूरी पर 30 सेंटीमीटर चौड़ी व 20-25 सेंटीमीटर गहरी नालियां ट्रेंच डिगर से बनानी चाहिए.

बोआई : ट्रेंच विधि से आजकल 2 तरह से बोआई की जाती है:

* चौड़े आकार वाली ट्रेंच में बीजों के टुकड़ों की 2 लाइनों में सामानांतर बोआई.

* वी आकार वाली ट्रेंच में बीजों के टुकड़ों की लाइन में बोआई.

2 आंख के टुकड़ों को दवा से उपचारित करने के बाद लंबवत इस प्रकार डालें कि उन की आंखें अगलबगल में रहें. दीमक व अंकुर बेधक कीटों की रोकथाम के लिए बोआई के समय टुकड़ों के ऊपर रीजेंट 20 किलोग्राम या फोरेट 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर या क्लोरपाइरीफास 20 ईसी 6.25 लीटर प्रति हेक्टेयर को 1875 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें. टुकड़ों की ढकाई इस तरह करें कि उन के ऊपर 2-3 सेंटीमीटर से ज्यादा मिट्टी न गिरने पाए.

पोषक तत्त्व प्रबंधन

मिट्टी की जांच के आधार पर या मिट्टी की उर्वरता के मुताबिक कुल 180-200 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60-80 किलोग्राम फास्फोरस, 40-60 किलोग्राम पोटाश, 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट व 18-20 किलोग्राम फेरस सल्फेट का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. इस के अलावा बोआई के समय नाली में जैविक खाद प्रेसमड सड़ी 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर या गोबर कंपोस्ट 100-150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. बोआई के समय कुल नाइट्रोजन की 1/3 मात्रा और फास्फोरस, पोटाश व फेरस सल्फेट की पूरी मात्रा नाली में डाल कर मिट्टी में मिलाएं. बची नाइट्रोजन को 3-4 बार में सही नमी में टापड्रेसिंग करें. जिंक सल्फेट का इस्तेमाल अंतिम जुताई के साथ करें.

सिंचाई

बोआई के समय नमी की कमी होने या देर बसंत की हालत में पहली सिंचाई बोआई के तुरंत बाद करें. सही नमी की दशा में बोआई की गई हो तो पहली सिंचाई 10 दिनों के अंदर करनी चाहिए.

मिट्टी के मुताबिक गरमी में 10-15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करना जरूरी है. बारिश के मौसम में 20 दिनों तक बारिश न होने की दशा में सिंचाई जरूर करें. सिंचाई नाली में करें. इस से प्रति सिंचाई 60 फीसदी पानी की बचत होती है.

नाली में सिंचाई करने से समय कम लगता है, जिस से बिजली या डीजल की बचत की जा सकती है.

खरपतवारों की रोकथाम

आज के समय में खेती के कामों के लिए मजदूर मिलना बहुत कठिन हो गया  है और युवा वर्ग खेती करना नहीं चाह रहा है. ऐसे हालात में सही समय पर खरपतवारों की रोकथाम यांत्रिक या रासायनिक विधि से की जा सकती है. यांत्रिक विधि में ट्रैक्टर चालित कल्टीवेटर या पावर टिलर इस्तेमाल कर सकते हैं. इस के लिए यह जरूरी है कि किसान गन्ना बोते समय अपने फार्म पर मौजूद यंत्रों के हिसाब से गन्ने की 2 लाइनों के बीच की दूरी तय कर लें या यंत्रों को लाइनों की दूरी के मुताबिक एडजस्ट कर लें. गन्ने में इस तरह के कामों के लिए छोटे ट्रैक्टर का इस्तेमाल आर्थिक रूप से लाभकारी रहता है.

रसायनिक विधि से खरपतवारों की रोकथाम के लिए मेट्रीब्युजीन 725 ग्राम व 2,4 डी सोडियम साल्ट 1.25 किलोग्राम को 1000 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से 30 दिनों के अंतराल पर 2 बार छिड़काव करें.

मिट्टी चढ़ाना : मईजून (फसल की बोआई के मुताबिक) में बैल चालित डेल्टा या ट्रेंच ओपनर से गन्ने के थानों में जड़ों पर मिट्टी चढ़ानी चाहिए. इस से नाली की जगह पर मेंड़ व मेंड़ की जगह पर नाली बन जाती है, जो बारिश के दौरान जल निकास का काम करती है.

गन्ना बंधाई : बारिश में लंबे व मोटे गन्नों के गिरने की संभावना रहती है. लिहाजा जुलाई के आखिरी हफ्ते में पहली, अगस्त में दूसरी व जरूरत के हिसाब से तीसरी कैंचीनुमा बंधाई करनी चाहिए.

फसल सुरक्षा : मार्च से मईजून तक अंकुरबेधक व चोटीबेधक कीटों से प्रभावित गन्नों को काट कर निकाल दें. जून के आखिरी हफ्ते से जुलाई के पहले हफ्ते के बीच सही नमी होने की दशा में गन्ने की जड़ों के पास 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से फ्यूराडान का इस्तेमाल करें. जुलाई से सितंबर तक 15 दिनों के अंतराल पर ट्राइकोकार्ड 2-5 कार्ड प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करने चाहिए.

गन्ना (Sugarcane)

ट्रेंच विधि के लाभ

* इस विधि में गन्ने का जमाव 80-90 फीसदी तक होता है, जबकि परंपरागत विधि से बोआई करने पर जमाव 35-40 फीसदी तक ही होता है.

* प्रति सिंचाई 60 फीसदी तक पानी की बचत होती है.

* उर्वरकों की सदुपयोग कूवत में इजाफा होता है.

* गन्ना सामान्य विधि के मुकाबले कम गिरता है.

* मिल योग्य गन्ने एक समान मोटे व लंबे होते हैं और परंपरागत विधि की तुलना में 35-40 फीसदी ज्यादा उपज हासिल होती है.

* 0.2-0.5 फीसदी तक ज्यादा चीनी परता प्राप्त होता है.

* सामान्य विधि की तुलना में इस विधि से पेड़ी गन्ना की पैदावार 20-25 फीसदी तक ज्यादा होती है.

* भूमिगत कीट व्हाइट ग्रब व दीमक का प्रकोप कम होता है.

* इस विधि द्वारा गन्ने के बाद गन्ना प्रचलन के कुप्रभाव को कम किया जा सकता है, क्योंकि पेड़ी के बाद जहां गन्ना नहीं होता है, वहां पर गन्ने की बोआई की जा सकती है.

* उत्तर भारत में उपज कूवत व वास्तवित उपज में 35-40 फीसदी का अंतराल है, जिसे इस विधि द्वारा आसानी से पूरा किया जा सकता है.

* क्षेत्रफल में इजाफा किए बगैर गन्ने की उत्पादकता बढ़ाने में यह विधि मददगार है.

* बोआई के बाद टुकड़ों के ऊपर केवल 3-5 सेंटीमीटर मिट्टी डाली जाती है.

* खेत में नमी की कमी होने की दशा में ट्रेंच विधि से बोए गन्ने में फौरन सिंचाई की जा सकती है.

* अंत: फसल के लिए विशेष उपयोगी है, क्योंकि गन्ने की 2 लाइनों के बीच दूरी ज्यादा होने के कारण आपस में मुकाबला बहुत कम होता है, नतीजतन दोनों फसलों से अच्छी उपज हासिल होती है.

* इस विधि में गन्ने की बोआई नाली में और अंत: फसलों की बोआई मेंड़ों पर होती है, जिस के कारण दोनों फसलों में मुकाबला कम होता है.

* इस विधि में आलू की 1-2 लाइनें, लहसुन की 4-5 लाइनें, मटर व राजमा की 2-2 लाइनें, लाही की 2 लाइनें व गेहूं की 3 लाइनें आसानी से ली जा सकती हैं, जिस का गन्ने की फसल पर कोई खराब असर नहीं पड़ता है.

* बसंतकालीन गन्ने के साथ मूंग, उड़द व भिंडी की 2 लाइनें आसानी से उगा कर प्रति इकाई आय बढ़ाई जा सकती है.

* सामान्य विधि से गन्ने की उपज 600-800 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हासिल होती है, जबकि ट्रेंच विधि से गन्ने की उपज 1200-1400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हासिल की जा सकती है.

शरदकालीन गन्ने की वैज्ञानिक खेती

शरदकालीन गन्ने की खेती जो किसान भाई करना चाहते हैं तो इस के लिए सही समय अक्तूबरनवंबर माह का होता है. गन्ना घास समूह का पौधा है. इस का इस्तेमाल बहुद्देश्यीय फसल के रूप में चीनी उत्पादन के साथसाथ अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों जैसे कि पेपर, इथेनाल और दूसरे एल्कोहल से बनने वाले कैमिकल, पशु खाद्यों, एंटीबायोटिक्स, पार्टीकल बोर्ड, जैव उर्वरक व बिजली पैदा करने के लिए कच्चे पदार्थ के रूप में इस्तेमाल किया जाता है.

गन्ने को खासतौर पर व्यापारिक चीनी उत्पादन करने वाली फसल के रूप में इस्तेमाल में लाया जाता है, जो कि दुनिया में उत्पादित होने वाली चीनी के उत्पादन में तकरीबन 80 फीसदी योगदान देता है. गन्ने की खेती दुनियाभर में पुराने समय से ही होती आ रही है, पर 20वीं सदी में इस फसल को एक नकदी फसल में रूप में पहचान मिली है.

भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि आधारित होने के चलते गन्ने का इस में खासा योगदान है. गन्ने के क्षेत्र, उत्पादन व उत्पादकता में भारत दुनियाभर में दूसरे नंबर पर है. वर्तमान में गन्ना उत्पादन में भारत की विश्व में शीर्ष देशों में गिनती होती है. वैसे, ब्राजील व क्यूबा भी भारत के तकरीबन बराबर ही गन्ना पैदा करते हैं. भारत में 4 करोड़ किसान रोजीरोटी के लिए गन्ने की खेती पर निर्भर हैं और इतने ही खेतिहर मजदूर निर्भर हैं.

गन्ने के महत्त्व को इसी बात से समझा जा सकता है कि देश में निर्मित सभी प्रमुख मीठे उत्पादों के लिए गन्ना एक प्रमुख कच्चा माल है. इतना ही नहीं, इस का इस्तेमाल खांड़सारी उद्योग में भी किया जाता है.

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, पंजाब, हरियाणा मुख्य गन्ना उत्पादक राज्य हैं. मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और असम के कुछ इलाकों में भी गन्ना पैदा किया जाता है, लेकिन इन राज्यों में उत्पादकता बहुत कम है. इस के अलावा महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और गुजरात में भी गन्ने का उत्पादन किया जाता है.

कुल उत्पादित गन्ने का 40 फीसदी हिस्सा चीनी बनाने में इस्तेमाल किया जाता है. उत्तर प्रदेश देश की कुल गन्ना उपज का 35.8 फीसदी, महाराष्ट्र, 25.4 फीसदी और तमिलनाडु 10.3 फीसदी पैदा करते हैं यानी ये तीनों राज्य देश के कुल गन्ना उत्पादन का 72 फीसदी उत्पादन करते हैं.

गन्ने के बीज का चयन करते समय यह ध्यान रखें कि गन्ना बीज उन्नत प्रजाति का हो, शुद्ध हो व रोगरहित होना चाहिए. गन्ने की आंख पूरी तरह विकसित और फूली हुई हो. जिस गन्ने का छोटा कोर हो, फूल आ गए हों, आंखें अंकुरित हों या जड़ें निकली हों, ऐसा गन्ना बीज उपयोग न करें.

शरदकालीन गन्ने की बोआई के लिए अक्तूबर माह का पहला पखवाड़ा सही है. बोआई के लिए पिछले साल सर्दी में बोए गए गन्ने के बीज लेना अच्छा रहेगा. बोने से पहले खेत की तैयारी के समय ट्राईकोडर्मा मिला हुआ प्रेसमड गोबर की खाद 10 टन प्रति हेक्टेयर का प्रयोग जरूर करें.

कैसे बचाएं कीटों से

जिन खेतों में दीमक की समस्या है या फिर पेड़ी अंकुर बेधक कीटों की समस्या ज्यादा होती है, वहां पर इस की रोकथाम के लिए क्लोरोपाइरीफास 6.2 ईसी 5 लिटर प्रति हेक्टेयर या फ्लोरैंटो नीपोल 8.5 ईसी 500 से 600 मिलीलिटर प्रति हेक्टेयर का 1,500 से 1,600 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें.

गन्ने की खेती के लिए जैव उर्वरक : शोध के बाद वैज्ञानिकों ने पाया है कि गन्ने की खेती के लिए जैव उर्वरक काफी फायदेमंद साबित होते हैं. सही माने में देखा जाए तो जैविक खाद लाभकारी जीवाणुओं का ऐसा जीवंत समूह है जिन को बीज जड़ों या मिट्टी में प्रयोग करने पर पौधे को अधिक मात्रा में पोषक तत्त्व मिलने लगते हैं. साथ ही, मिट्टी की जीवाणु क्रियाशीलता व सामान्य स्वास्थ्य में भी बढ़वार देखी गई है.

गन्ने की खेती के लिए जीवाणु वातावरण में मौजूद नाइट्रोजन स्तर का प्रवर्तन कर उसे पौधों के लायक बना देते हैं. साथ ही, यह पौधे के लिए वृद्धि हार्मोन बनाते हैं. अकसर देखा गया है कि एसीटोबैक्टर, एजोटोबैक्टर, एजोस्पिरिलम वगैरह ऐसे जीवाणु हैं, जो गन्ने की खेती को फायदा पहुंचाते हैं.

जैविक खाद के बेअसर होने की वजह : प्रभावहीन जीवाणुओं का उपयोग, जीवाणु तादाद में कम होना, अनचाहे जीवाणुओं का ज्यादा होना, जीवाणु खाद को उच्च तापमान या सूरज की रोशनी में रखना, अनुशंसित विधि का ठीक से प्रयोग न करना, जीवाणु खाद को कैमिकल खाद के साथ प्रयोग करना, इस्तेमाल के समय मिट्टी में तेज तापमान या कम पानी का होना, मिट्टी का ज्यादा क्षारीय और अम्लीय होना, फास्फोरस और पोटैशियम की अनुपलब्धता और मिट्टी में जीवाणुओं व वायरस का अधिक होना भी उत्पादन को प्रभावित करता है.

कितनी करें सिंचाई : यह बात सही है कि जैविक खाद कैमिकल खाद की जगह नहीं ले सकती, लेकिन किसान अगर दोनों का सही मात्रा में अपनी खेती में इस्तेमाल करते हैं, तो माली फायदे के साथ में पानी भी दूषित नहीं हो सकेगा.

जैविक खाद का इस्तेमाल करना किसानों के लिए हितकारी ही नहीं, लाभकारी भी होगा. उष्णकटिबंधीय इलाकों में पहले 35 दिनों तक हर 7वें दिन, 36 से 110 दिनों के दौरान हर 10वें दिन, बेहद बढ़वार की अवस्था के दौरान 7वें दिन और पूरी तरह पकने की अवस्था के दौरान हर 15 दिन बाद सिंचाई की जानी चाहिए. इन दोनों को बारिश होने के मुताबिक अनुकूलित करना पड़ता है. गन्ने की खेती में तकरीबन 30 से 40 सिंचाइयों की जरूरत पड़ती है.

कम पानी में कैसे हो खेती

गन्ना एक से अधिक पानी की जरूरत वाली फसल है. एक टन गन्ने के उत्पादन के लिए तकरीबन 250 टन पानी की जरूरत होती है. वैसे तो बिना उत्पादन में कमी लाए पानी की जरूरत को अपनेआप में कम नहीं किया जा सकता है, मगर सिंचाई के लिए पानी की जरूरत में कमी पानी को उस के स्रोत से पाइपलाइन के द्वारा खेत जड़ क्षेत्र तक ला कर रास्ते में होने वाले रिसाव के कारण नुकसान को रोक कर या फिर सूक्ष्म सिंचाई विधियों को अपना कर लाई जा सकती है.

जब पानी की कमी के हालात हों, तब हर दूसरे हफ्ते में पानी से सिंचाई की जा सकती है या फिर मल्च का प्रयोग कर के पानी की जरूरत में कमी लाई जा सकती है. सूखे के हालात में 2.5 फीसदी यूरिया, 2.5 फीसदी म्यूरेट औफ पोटाश के घोल को पाक्षिक अंतराल पर 3 से 4 बार छिड़काव कर उस के प्रभाव को कम किया जा सकता है.

पानी के सही प्रयोग के लिए टपक सिंचाई व्यवस्था को दुरुस्त रखना बेहद जरूरी है. इस के लिए समयसमय पर पानी की नालियों के अंत के ढक्कन खोल कर इन में से पानी को तेजी से बह कर साफ करें. टपक प्रणाली के अंदर की सतह पर जमे पदार्थ को हटाने के लिए 30 फीसदी हाइड्रोक्लोरिक एसिड को इंजैक्ट करें. जब सिंचाई के पानी का स्रोत नदी, नहर और खुला कुआं वगैरह हों, तो व्यक्ति कवच वगैरह के लिए 1 पीपीएम ब्लीचिंग पाउडर से  साफ करना चाहिए. एसिड उपचार और साफ करते समय यह पानी की क्वालिटी पर निर्भर करती है.

Sugarcane

उन्नत प्रजातियां

जल्दी पकने वाली प्रजातियां : कोषा 681, कोषा 8436, कोषा 90265, कोषा 88230, कोषा 95435, कोषा 95255, कोषा 96258, कोसे 91232, कोसे 95436, कोएच 92201, कोजा 64 प्रमुख हैं.

मध्यम और देर से पकने वाली प्रजातियां : कोशा 7918, कोशा 8432, कोशा 767, कोशा 8439, कोशा 88216, कोशा 90269, कोशा 92263, कोशा 87220, कोशा 87222, कोशा 97225, कोपंत 84212, कोपंत 90223, यूपी 22, यूपी 9529, कोसे 92234, कोसे 91423, कोसे 95427, कोसे 96436 खास हैं.

सीमित सिंचित इलाकों के लिए : कोशा 767, कोशा 802, कोशा 7918, कोशा 8118 व यूपी 5 वगैरह हैं.

जलभराव वाले इलाकों के लिए : कोशा 767, कोशा 8001, कोशा 8016, कोशा 8118, कोशा 8099, कोशा 8206, कोशा 8207, कोशा 8119, कोशा 95255, कोसे 96436, यूपी 1, कोशा 9530 वगैरह हैं.

ऊसर जमीन के लिए : को 1158, कोशा 767 खास हैं.

गन्ने के साथ लें दूसरी फसल भी

गन्ने की शुद्ध फसल में गन्ने की बोआई 75 सैंटीमीटर और आलू, राई, चना, सरसों के साथ मिलवां फसल में 90 सैंटीमीटर की दूरी पर बोना चाहिए. एक आंख का टुकड़ा लगाने पर प्रति एकड़ 10 क्विंटल बीज लगेगा. 2 आंख के टुकड़े लगाने पर 20 क्विंटल बीज लगेगा.

पौलीबैग यानी पौलीथिन के उपयोग से बीज की बचत होगी और ज्यादा उत्पादन मिलेगा. बीजोपचार के बाद ही बीज बोएं. 205 ग्राम अर्टन या 500 ग्राम इक्वल को 100 लिटर पानी में घोल कर उस में तकरीबन 25 क्विंटल गन्ने के टुकड़े उपचारित किए जा सकते हैं.

जैविक उपचार प्रति एकड़ 1 लिटर एसीटोबैक्टर प्लस 1 लिटर पीएसबी का 100 लिटर पानी में घोल बना कर रासायनिक बीजोपचार के बाद गन्ने के टुकड़ों को सूखने के बाद सही घोल में 30 मिनट तक डुबो कर उपचार करने के बाद ही बोआई करें.

गन्ने को भी दें खादउर्वरक : गन्ने में खादउर्वरकों का इस्तेमाल मिट्टी जांच के आधार पर जरूरत के मुताबिक पोषक तत्त्वों का उपयोग कर के उर्वरक खर्च में बचत कर सकते हैं. अगर मिट्टी जांच न हुई हो तो बोआई के समय प्रति हेक्टेयर 60 से 75 किलोग्राम नाइट्रोजन, 70 से 80 किलोग्राम फास्फोरस, 20 से 40 किलोग्राम पोटाश व 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट का इस्तेमाल करना चाहिए.

गन्ने की लगाई तकरीबन 10 फीसदी फसल खराब होने की मुख्य वजह फसल को दी गई खाद के साथ पोटाश की सही मात्रा का उपलब्ध न होना है.

शोधों से पता चला है कि गन्ने की खेती में अच्छी पैदावार हासिल करने के लिए प्रति एकड़ तकरीबन 33 किलोग्राम पोटाश की जरूरत होती है, इसलिए गन्ने की खेती में पोटाश का प्रयोग जरूर करें.

गन्ना की खेती

गन्ना एक प्रमुख बहुवर्षीय फसल है. अच्छे प्रबंधन से साल दर साल 1,50,000 रुपए प्रति हेक्टेयर से अधिक मुनाफा कमाया जा सकताक है. प्रचलित फसल चक्रों जैसे मक्कागेहूं या धानगेहूं, सोयाबीनगेहूं की तुलना में अधिक लाभ प्राप्त होता है

यह निम्नतम जोखिम भरी फसल है, जिस पर रोग व कीट ग्रस्त व विपरीत परिस्थितियों का अपेक्षाकृत कम असर होता है. गन्ना के साथ अंतरर्वतीय फसल लगा कर 3-4 माह में ही प्रारंभिक लागत हासिल की जा सकती है. गन्ने की किसी भी अन्य फसल से प्रतिस्पर्धा नहीं है. सालभर उपलब्ध साधनों व मजदूरों का सदुपयोग होता है.

उपयुक्त भूमि, मौसम और खेत की तैयारी

उपयुक्त भूमि : गन्ने की खेती मध्यम से भारी काली मिट्टी में की जा सकती है. दोमट भूमि, जिस में सिंचाई की उचित व्यवस्था व जल निकास का अच्छा इंतजाम हो और पीएच मान 6.5 से 7.5 के बीच हो, गन्ने के लिए सर्वोत्तम होती है. उपयुक्त मौसम होने पर गन्ने की बोआई वर्ष में 2 बार की जा सकती है.

शरदकालीन बोआई : इस में अक्तूबरनवंबर माह में फसल की बोआई करते हैं और फसल 10-14 माह में तैयार होती है.

बसंतकालीन बोआई : इस में फरवरी से मार्च माह तक फसल की बोआई करते हैं. इस में फसल 10 से 12 माह में तैयार होती है.

नोट : शरदकालीन गन्ना, बसंत में बोए गए गन्ने से 25-30 फीसदी व ग्रीष्मकालीन गन्ने से 30-40 फीसदी अधिक पैदावार देता है.

खेत की तैयारी

ग्रीष्मकाल में 15 अप्रैल से 15 मई के पहले खेत की एक गहरी जुताई करें. इस के बाद 2 से 3 बार देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई कर के व रोटावेटर व पाटा चला कर खेत को भुरभुरा, समतल व खरपतवाररहित कर लें. रिजर की मदद से 3 फुट से 4.5 फुट की दूरी में 20-25 सैंटीमीटर गहरी कूंड़े बनाएं.

सही किस्म के बीज का चयन व तैयारी :  गन्ने के सारे रोगों की जड़ अस्वस्थ बीज का उपयोग ही हैं. गन्ने की फसल उगाने के लिए पूरा तना न बो कर इस के 2 या 3 आंख के टुकड़े काट कर उपयोग में लाएं. गन्ने के ऊपरी भाग का अंकुरण 100 फीसदी, बीच में 40 फीसदी और निचले भाग में केवल 19 फीसदी ही होता है. 2 आंख वाला टुकड़ा सर्वोत्तम रहता है.

गन्ना बीज का चुनाव करते समय सावधानियां

* उन्नत जाति के स्वस्थ, निरोग, शुद्ध बीज का ही चयन करें.

* गन्ना बीज की उम्र लगभग 8 माह या कम हो, तो अंकुरण अच्छा होता है.

*बीज ऐसे खेत से लें, जिस में रोग व कीट का प्रकोप न हो और जिस में खादपानी समुचित मात्रा में दिया जाता रहा हो.

* जहां तक हो, नरम, गरम हवा उपचारित (54 सैंटीग्रेड व 85 फीसदी आर्द्रता पर 4 घंटे) या टिश्यू कल्चर से उत्पादित बीज का ही चयन करें.

* हर 4-5 साल बाद बीज बदल दें, क्योंकि समय के साथ रोग व कीट ग्रस्तता में वृद्धि होती जाती है.

* बीज काटने के बाद कम से कम समय में बोनी कर दें.

गन्ने की उन्नत जातियां

को. 05011 (कर्ण-9), को. से. 11453, को. षा. 12232, को. षा. 08276, यू. पी. 05125, को. 0238 (कर्ण-4), को. 0118 (कर्ण-2), को. से. 98231, को. शा. 08279, को. शा. 07250, को. शा. 8432, को. शा. 96269 (शाहजहां), को. शा. 96275 (स्वीटी). ये प्रजातियां उत्तर प्रदेश के लिए सिफारिश की गई हैं.

गन्ना बोआई का समय अक्तूबरनवंबर ही क्यों चुनें

* फसल में अग्रवेधक कीट का प्रकोप नहीं होता.

* फसल वृद्धि के लिए अधिक समय मिलने के साथ ही अंतरर्वतीय फसलों की भरपूर संभावना.

* अंकुरण अच्छा होने से बीज कम लगता है व कल्ले अधिक फूटते हैं.

* अच्छी बढ़वार के कारण खरपतवार कम होते हैं.

* सिंचाई जल की कमी की दशा में देर से बोई गई फसल की तुलना में नुकसान कम होता है.

* फसल के जल्दी पकाव पर आने से कारखाने जल्दी पिराई शुरू कर सकते हैं.

* जड़ फसल भी काफी अच्छी होती है.

* बीज की मात्रा-75-80 क्विंटल प्रति हेक्टेयर. 2 आंख वाले टुकड़े लगेंगे.

बीजोपचार

बीजजनित रोग व कीट नियंत्रण के लिए कार्बंडाजिम 2 ग्राम लिटर पानी व क्लोरोपायरीफास 5 मिलीलिटर प्रति लिटर की दर से घोल बना कर आवश्यक बीज का 15 से 20 मिनट तक उपचार करें.

खाद और उर्वरक

फसल पकने की अवधि लंबी होने कारण खाद व उर्वरक की आवश्यकता भी अधिक होती है, इसलिए खेती की अंतिम जुताई से पहले 20 टन सड़ी गोबर या कंपोस्ट खाद खेत में समान रूप से मिलानी चाहिए. इस के अलावा 180 किलोग्राम नाइट्रोजन (323 किलोग्राम यूरिया), 80 किलोग्राम फास्फोरस (123 किलोग्राम डीएपी) व 60 किलोग्राम पोटाश (100 किलोग्राम म्यूरेट औफ पोटाश) प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए. फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बोआई के समय प्रयोग करें और नाइट्रोजन की मात्रा को इस तरह प्रयोग करें :

शरदकालीन गन्ना

शरदकालीन गन्ने में नाइट्रोजन की कुल मात्रा को 4 समान भागों में बांट कर बोनी के क्रमश: 30, 90, 120 व 150 दिनों में प्रयोग करें.

बसंतकालीन गन्ना

बसंतकालीन गन्ने में नाइट्रोजन की कुल मात्रा को 3 समान भागों में बांट कर बोनी क्रमश: 30, 90 व 120 दिन में प्रयोग करें.

नाइट्रोजन उर्वरक के साथ नीमखली के चूर्ण में मिला कर प्रयोग करने में नाइट्रोजन उर्वरक की उपयोगिता बढ़ती है. साथ ही, दीमक से भी सुरक्षा मिलती है. 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट व 50 किलोग्राम फेरस सल्फेट 3 साल के अंतराल में जिंक व आयरन सूक्षम तत्त्व की पूर्ति के लिए आधार खाद के रूप में बोआई के समय उपयोग करें.

Sugarcane
Sugarcane

कुछ खास सुझाव

मृदा परीक्षण के आधार पर ही आवश्यक तत्त्वों की आपूर्ति करें. स्फुर तत्त्व की पूर्ति सगिल सु.फा.फे. उर्वरक के द्वारा करने पर 12 फीसदी गंधक तत्त्व (60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) अपनेआप उपलब्ध हो जाता है.

जैव उर्वरकों की अनुशंसित मात्रा को 150 किलोग्राम वर्मी कंपोस्ट या गोबर खाद के साथ मिश्रित कर 1-2 दिन नम कर बोआई से पहले कूंड़ों में या पहली मिट्टी चढ़ाने के पहले उपयोग करें. जैव उर्वरकों के उपयोग से 20 फीसदी नाइट्रोजन व 25 फीसदी स्फुर तत्त्व की आपूर्ति होने के कारण रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में उस के मुताबिक कटौती करें. जैविक खादों की अनुशंसित मात्रा उपयोग करने पर नाइट्रोजन की 100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रासायनिक तत्त्व के रूप में कटौती करें.

जल प्रबंधन

सिंचाई व जल निकास गरमी के दिनों में भारी मिट्टी वाले खेतों में 8-10 दिन के अंतर पर व ठंड के दिनों में 15 दिनों के अंतर से करें. हलकी मिट्टी वाले खेतों में 5-7 दिनों के अंतर से गरमी के दिनों में व 10 दिन के अंतर से ठंड के दिनों में सिंचाई करनी चाहिए.

सिंचाई की मात्रा कम करने के लिए गरेड़ों में गन्ने की सूखी पत्तियों की पलवार की 10-15 सैंटीमीटर तह बिछाएं. गरमी में पानी की मात्रा कम होने पर एक गरेड़ छोड़ कर सिंचाई दे कर फसल बचाएं.

कम पानी उपलब्ध होने पर ड्रिप (टपक विधि) से सिंचाई करने से भी 60 फीसदी पानी की बचत होती है. गरमी में सिंचाई करने से भी 60 फीसदी पानी की बचत होती है. गरमी के मौसम मैं जब फसल 5-6 महीने तक की होती है, स्प्रिंकलर (फव्वारा) विधि से सिंचाई कर के 40 फीसदी पानी की बचत की जा सकती है.

वर्षा के मौसम में खेत में उचित जल निकास का प्रबंध रखें. खेत में पानी के जमाव होने से गन्ने की बढ़वार व रस की गुणवत्ता प्रभावित होती है.

खाली स्थानों की पूर्ति

कभीकभी पंक्तियों में कई जगहों पर बीज अंकुरित नहीं हो पाता है, इस बात को ध्यान में रखते हुए खेत में गन्ने की बोआई के साथसाथ अलग से सिंचाई स्रोत के नजदीक एक नर्सरी तैयार कर लें. इस में बहुत ही कम अंतराल पर एक आंख के टुकड़ों की बोआई करें. खेत में बोआई के एक माह बाद खाली स्थानों पर नर्सरी में तैयार पौधों को सावधानीपूर्वक निकाल कर रोपाई कर दें.

खरपतवार प्रबंधन

अंधी गुड़ाई : गन्ने का अंकुरण देर से होने के कारण कभीकभी खरपतवारों का अंकुरण गन्ने से पहले हो जाता है, जिस के नियंत्रण के लिए एक गुड़ाई करना जरूरी होता है, जिसे अंधी गुड़ाई कहते हैं.

निराईगुड़ाई : आमतौर पर हर सिंचाई के बाद एक गुड़ाई जरूरी होगी. इस बात का खास ध्यान रखें कि ब्यांत अवस्था (90-100 दिन) तक निराईगुड़ाई का काम पूरा हो जाए.

मिट्टी चढ़ाना : वर्षा शुरू होने तक फसल पर मिट्टी चढ़ाने का काम पूरा कर लें (120 व 150 दिन).

रासायनिक नियंत्रण

बोआई के बाद अंकुरण से पहले खरपतवारों के नियंत्रण के लिए एट्राजीन 2.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 600 लिटर पानी में घोल बना कर बोआई के एक सप्ताह के अंदर खेत में समान रूप से छिड़क दें.

खड़ी फसल में चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के लिए 2-4-डी सोडियम साल्ट 2.8 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 600 लिटर पानी का घोल बना कर बोआई के 45 दिन बाद छिड़काव करें.

खड़ी फसल में चौड़ीसंकरी मिश्रित खरपतवार के लिए 2-4-डी सोडियम साल्ट 2.8 किलोग्राम, मेटीब्यूजन 1 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 600 लिटर पानी का घोल बना कर बोआई के 45 दिन बाद छिड़काव करें. इन के उपयोग में खेत में नमी जरूरी है.

अंतरवर्ती खेती

गन्ने की फसल की बढ़वार शुरू के 2-3 माह तक धीमी गति से होती है. गन्ने की 2 कतारों के बीच का स्थान काफी समय तक खाली रह जाता है. इस बात को ध्यान में रखते हुए यदि कम अवधि के फसलों के अंतरर्वती खेती के रूप में उगाया जाए, तो निश्चित रूप से गन्ने के फसल के साथसाथ प्रति इकाई अतिरिक्त आमदनी प्राप्त हो सकती है. इस के लिए निम्न फसलें अंतरर्वती खेती के रूप में उगाई जा सकती हैं :

शरदकालीन खेती : गन्ना+आलू (1:2), गन्ना+प्याज (1:2), गन्ना+मटर (1:1), गन्ना+धनिया (1:2), गन्ना+चना (1:2), गन्ना+गेहूं (1:2).

बसंतकालीन खेती : गन्ना+मूंग (1:1), गन्ना+उड़द (1:1), गन्ना+धनिया (1:3), गन्ना+मेथी (1:3).

गन्ने को गिरने से बचाने के उपाय

* गन्ना की कतारों की दिशा पूर्वपश्चिम रखें.

* गन्ने की उथली बोनी न करें.

* गन्ने की कतारों की दोनों तरफ 15 से 30 सैंटीमीटर मिट्टी 2 बार जब पौधा 1.5 से 2 मीटर का हो. 120 दिन बाद हो और इस से अधिक बढ़वार होने पर चढ़ाएं (150 दिन बाद).

* गन्ने की बंधाई करें. इस में तनों को एकसाथ मिला कर पत्तियों के सहारे बांध दें. यह काम 2 बार तक करें.

* पहली बंधाई अगस्त में और दूसरी बंधाई इस के एक माह बाद जब पौधा 2 से 2.5 मीटर का हो जाए.

* बंधाई का काम इस प्रकार करें कि हरी पत्तियों का समूह एक जगह एकत्र न हो, वरना प्रकाश संश्लेषण की क्रिया प्रभावित होगी.

गन्ने की कटाई

फसल की कटाई उस समय करें, जब गन्ने में सुक्रोज की मात्रा सब से अधिक हो, क्योंकि यह अवस्था थोड़े समय के लिए होती है और जैसे ही तापमान बढ़ता है, सुक्रोज का ग्लूकोज में बदलाव शुरू हो जाता है और ऐसे गन्ने से शक्कर व गुड़ की मात्रा कम मिलती है. कटाई पूर्व पकाव सर्वे करें. इस के लिए रिफ्लैक्टो मीटर का उपयोग करें. यदि माप 18 या इस के ऊपर है, तो गन्ना पकने होने का संकेत है. गन्ने की कटाई गन्ने की सतह से करें.

गन्ना उत्पादन में उन्नत वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग कर के तकरीबन 1,000 से 1,500 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक गन्ना हासिल किया जा सकता है.

जड़ फसल से भरपूर पैदावार

जड़ फसल पर भी बीजू फसल की तरह ही ध्यान दें और बताए गए कम लागत वाले उपाय उपनाएं, तो जड़ से भरपूर पैदावार ले सकते हैं.

समय पर गन्ने की कटाई : मुख्य फसल को समय पर (नवंबर महीने में) काटने से पेड़ी की अधिक उपज ली जा सकती है. जड़ फसल 2 बार से अधिक न लें. गन्ने की कटाई सतह जाति के लगा कर सिचाई करें. मुख्य फसल के लिए अनुशंसा के अनुसार उर्वरक दें.

सूखी पत्ती बिछाएं : कटाई के बाद सूखी पत्तियों को खेत में जलाने के बजाय कूंड़ों के मध्य बिछाने से उर्वराशक्ति में वृद्धि होती है. उक्त सूखी पत्तियां बिछाने के बाद 1.5 फीसदी क्लोरोपायरीफास दवा छिड़कें.

पौध संरक्षण अपनाएं

कटे हुए ठूंठ पर कार्बंडाजिम 550 ग्राम मात्रा 250 लिटर पानी में घोल कर झारे की सहायता से ठेंठों के कटे हुए भाग पर छिड़कें.

जड़ के लिए उपयुक्त जातियां

जड़ की अधिक पैदावार लेने के लिए उन्नत जातियां जैसे को. 7318, को. 86032, को. जे. एन. 86-141, को. जे. एन. 86-600, को. जे. एन. 86-572, को. 94008 और को. 99004 का चुनाव करें.

अधिक उपज प्राप्त करने के लिए प्रमुख बिंदु

गन्ना फसल के लिए 8 माह की उम्र का गन्ना बीज बोएं. शरदकालीन गन्ना (अक्तूबरनवंबर) की ही बोआई करें. गन्ना की बोआई कतार से कतार 120-150 सैंमी के दूरी पर गीली कूंड़ पद्धति से करें.

बीजोपचार (फफूंदनाशक-कार्बंडाजिम 2 ग्राम प्रति लिटर और कीटनाशक क्लोरोपायरीफास 5 मिलीलिटर प्रति हेक्टेयर 15-20 मिनट तक डुबा कर) बोआई करें. जड़ प्रबंधन के तहत ठूंठ जमीन की सतह से काटना, गरेड़ तोड़ना, फफूंदनाशक व कीटनाशक से ठूंठ का उपचार, गेप फिलिंग, संतुलित उर्वरक (एनपीके-300:85:60) का उपयोग करें.

गन्ने की फसल के कतारों के मध्य कम समय में तैयार होन वाली फसलों चना, मटर, धनिया, आलू, प्याज आदि फसलें लें. खरपतवार नियंत्रण के लिए एट्राजीन 1.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर सक्रिय तत्त्व की दर से बोआई के 3 से 5 दिन के अंदर और 2-4-डी 750 ग्राम हेक्टेयर सक्रिय तत्त्व 35 दिन के अंदर छिड़काव करें.

गन्ना क्षेत्र विस्तार के लिए गन्ना उत्पादक किसानों के समूहों को शुगर केन हारवेस्टर, पावर बडचिपर व अन्य उन्नत कृषि यंत्रों को राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत 40 फीसदी अनुदान उपलब्ध कराया जाना चाहिए.

क्षेत्रीय गन्ना प्रजनन केंद्र में गन्ना किसान अचल कुमार मिश्रा हुए सम्मानित

लखीमपुर खीरी : जिले के प्रगतिशील गन्ना किसान अचल कुमार मिश्रा को भारत में गन्ने की किस्म सीओ 0238 में सर्वाधिक गन्ना उत्पादन 329 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन लेने पर आईसीएआर-गन्ना प्रजनन संस्थान, कोयंबटूर की निदेशक हेमा प्रभाकरन ने शील्ड दे कर सम्मानित किया.

इस दौरान उन्होंने कहा कि गन्ना किस्म सीओ 0238 ने भारत के किसानों के जीवन में मिठास घोली है. इस के परिणामस्वरूप 27 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में ये किस्म की बोआई हुई, जो कि देशभर में अभी तक इतने ज्यादा क्षेत्रफल में किसी भी किस्म की बोआई नहीं हुई है.

इस अवसर पर प्रधान वैज्ञानिक डा. एसके पांडेय, डा. एस. कुमार बगहा चीनी मिल बिहार के मुख्य प्रबंधक गन्ना बीएन त्रिपाठी, एसके राय व गुलरिया चीनी मिल खीरी के मनीष पुरोहित सहित अन्य चीनी मिलों के अधिकारी व किसान मौजूद रहे.

टिशू कल्चर से पुनः वापसी कर रही सीओ 0238 किस्म

स्वस्थ बीज प्रोग्राम के तहत किसानों को बीज प्रबंधन करा कर के सीओ 0238 गन्ने की किस्म टिशू कल्चर के माध्यम से पुनः वापसी कर रही है.

किसान अचल कुमार मिश्रा ने बताया कि एसबीआई, करनाल के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. रविंद्र कुमार की देखरेख में सीओ 0238 की टिशू कल्चर पौध रोपित की है. जल्द ही अन्य किसानों के बीच ये उन्नतशील किस्म फिर से धमाल मचाएगी.

गन्ने की बोआई के समय इन बातों का रखें ध्यान

सीओ 0238 के जनक पद्मश्री डा. बक्शी राम ने बताया कि किसानों को गन्ना बोते समय खेत में पाटा नहीं लगाना चाहिए. किसी भी प्रजाति के बीज को बोते समय स्वस्थ बीज का चुनाव कर उस को पहले शोधित अवश्य कर लें. उस के बाद ही बीज की बोआई करें, तो निश्चित तौर पर उत्पादन भी बढ़ेगा.